Thursday, June 9, 2011

कम होते जीवन के दिन

"यह ख़ास तौर पर एक ध्यान देने योग्य बात है कि बहुत से लोग जान-बूझ कर ,उतावलेपन में या स्पष्ट चेतावनियों की उपेक्षा करके अपने जीवन की आयु को स्वंय ही घटा लेते हैं."

"जीवन का यह बहुमूल्य उपहार यूं ही बर्बाद करने के लिए नहीं मिला है.प्रतिभा,स्वास्थ्य,बौद्धिक उपलब्धियां व विभिन्न अवसरों के रूप में प्राप्त ये उपहार हमें इसलिए मिले हैं कि हम उनमें और भी वृद्धि करें.सफलताओं का ताज सिर पर पहने बुढापे से चाहे वह कितना छोटा ही क्यों न हो अधिक सुन्दर दृश्य और क्या हो सकता है?और नाकामयाबी से भी खराब वह मायूसी भला कैसी होगी जहां आदमी ने अपने पावों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारी हो."

"हस्तरेखा -शास्त्र एक पूरा विज्ञान है.यह बहुत उपयोगी हो सकता है.लेकिन बहुत खतरनाक भी यदि कुछ बेईमान लोग इसका दुरूपयोग करने लगें."

ये कथन हैं काउंट कीरो साहब के जिन्होंने २१ वर्ष के अपने व्यवसायिक अनुभव के बाद पुस्तक-लेखन के माध्यम से यूरोपीय जनता को जाग्रत और प्रशिक्षित करने का महत्वपूर्ण कार्य संपादित किया था.हम देखते हैं कीरो को भी पाखंड का पर्दाफ़ाश करने हेतु घोर संघर्षों का सामना करना पड़ा था परन्तु वह मुस्तैदी से अपने सिद्धांतों पर डटे रहे और अपने मिशन में कामयाब भी हुए.इस ब्लॉग के माध्यम से परिणाम की चिंता किये बगैर मैं आप लोगों को कीरो साहब के विचारों से इसलिए अवगत करा रहा हूँ कि आप मानें या न मानें ,लाभ उठायें या न उठायें मेरा तो कर्तव्य पाखण्ड पर प्रहार करना ही है और मुझे अपना कर्तव्य पालन करना ही है.

पुस्तकों के माध्यम से कीरो साहब ने जनता को इसलिए समझाया था कि लोग स्वंय को समझ सकें.उनका दृढ विशवास था कि ये चिन्ह हमारी हथेली में होते ही इसलिए हैं कि उन्हें देखा व समझा जाये. लेकिन दुर्भाग्य यह है कि बहुत कम लोग इन चिन्हों को समझते हैं. कीरो साहब के अनुसार वह प्रत्येक समस्या जो किसी भी समझदार व्यक्ति को परेशानी में डाले रहती है,इन रेखाओं व चिन्हों की मदद से समझी जा सकती है.

प्रत्येक व्यक्ति में यह जिज्ञासा होती है कि वह यह जाने-"वे कौन सी शक्तियां हैं जो मेरे जीवन का संचालन करती हैं?उसे प्रभावित करती हैं?जो कुछ मेरे भाग्य में लिखा है,क्या उसे मुझे भुगतना पडेगा?क्या उससे बचने के कुछ उपाए भी हैं?" जहाँ तक मेरा विचार है मैं यह मानता हूँ कि प्रत्येक मनुष्य अपने भाग्य का स्वंय निर्माता है,यदि वह चाहे तो अपने अच्छे वक्त को ख़राब में तब्दील कर सकता है और करता भी है.यदि मनुष्य चाहे तो वह अपने खराब वक्त को अच्छे में भी बदल सकता है और पुराशार्थी व्यक्ति ऐसा ही करते हैं जबकि आलसी,निकम्मे और परोपजीवी व्यक्ति भाग्य और भगवान् के भरेसे बैठ कर दोनों को कोसते रहते हैं.मुझे आर्थिक लाभ इसी लिए नहीं होते क्योंकि मैं भगवान् वाद के फंदे में नहीं फंसता.जो लोग ज्ञान का दुरूपयोग करके पहले पीड़ित को दहशत में ला देते हैं फिर उसकी जेब के अनुसार उसे उलटे उस्तरे से मूढ़ते हैं व्यवहारिक जगत में कामयाब हैं.

हस्तरेखा शास्त्र का महत्त्व भी तभी है जब वह संभावित घटनाओं की हमें पहले से चेतावनी देती हो -

यदि जीवन -रेखा किसी जंजीर की तरह बनी हो या बहुत छोटे-छोटे टुकड़ों में बनी हो तो यह निश्चय ही ऐसे खराब स्वाथ्य का संकेत है जिसके प्रति सावधान रहना बहुत जरूरी है.सम्राट एडवर्ड जब प्रिंस आफ वेल्स थे तो मखमली परदे के पीछे उनका हाथ कीरो ने समाज की प्रतिष्ठित महिला के घर भोज पर देखा था बगैर परिचय जाने.अतः सन १८९१ में सम्राट एडवर्ड ने कीरो को बुला कर अपने सबसे बड़े पुत्र 'ड्यूक आफ क्लेरेंश'के हाथ में जीवन-रेखा को छोटे-छोटे भागों में टूटी होने की बात बताई थी.यह अशुभ लक्षण था और १४ जनवरी १८९२ को छोटी सी बीमारी के बाद उसकी मृत्यु हो गयी जिसके बारे में उसके चिकित्सक ने कहा-"जैसे कोई मोमबत्ती बुझ जाती है वह इस तरह से चला गया."
(अपार समदा एवं क्षमता के बावजूद राजकुमार की ऐसी मौत  केवल ठोस उपाए न करने के कारण ही   संभव हुयी )

कीरो साहब ने मिस्टर पीटर राबिन्सन के बेटे का हाथ जब देखा तो वह जरूरत से अधिक कपडे पहन कर उनके पास आया था.उसके हाथ में अपार धन-सम्पदा के योग थे और उन्हीं के कारण उसे बुद्धिमानी के अवसर भी मिले थे.,परन्तु उसके दाहिने हाथ में जीवन रेखा टूटती हुयी थी.अतः कीरो ने उससे कहा-"कुछ निश्चित संकेतों के आधार पर मैं आपको यह सलाह देता हूँ कि स्वास्थ्य को लेकर आप अत्यधिक सावधानी बरतें.वरना मुझे नहीं लगता कि आपकी बहुत लम्बी उम्र है.'

वह व्यक्ति उपेक्षा से मुस्कराते हुए बोला-"आप चिंता न करें, कीरो.मैं घोड़े की तरह तंदरुस्त हूँ.और पूरे नब्बे साल तक जीवित रहूँगा.हमारे परिवार में सभी लोग बूढ़े होकर मरते हैं."
कीरो ने बहुत जोर देकर कहा-"मेरी चेतावनी से सावधान हो जाइए और अति मत कीजिये.यदि आप सावधानियां बरतेंगे तो संकट टल जाएगा,वर्ना......"और उन्होंने अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया.

चूंकि वह एक बिगडैल रईसजादा था जिसके बाप ने मरते वक्त उसके लिए दस लाख पौंड की सम्पत्ति छोडी थी और तुरंत ही सारा धन उसके हाथ लग गया था. चमचों का झुण्ड उसके आस-पास मंडराने लगा थाजो उसका सारा धन हजम कर गए.उसके दोस्तों ने उसे 'मेंडनहेड'के जिस मकान में ठहराया हुआ था वहां वे उसके पैसों से मस्ती कर रहे थे.उसका स्वाथ्य इतनी तेजी से बिगड़ा कि वह मौत के दरवाजे तक पहुँच गया.हर अखबार में उसकी अंधाधुंध फिजूल खर्ची व तेजी से बिगड़ते हुए स्वाथ्य के समाचार छपने लगे. 

उसे कीरो की चेतावनी याद आई तो उसने सावधानियां बरतीं और उसका स्वास्थ्य भी सुधरने लगा.लेकिन फिर उसे पुराने ढर्रे पर ले आया गया और अपने जीवन का आधा समय जिए बिना ही उसकी मृत्यु हो गई.

ये दोनों उदाहरण हाथ की लकीरों की उपेक्षा करने के परिणाम हैं.वस्तुतः मैं पहले भी इसी ब्लॉग में ज्योतिष सम्बन्धी आलेखों के माध्यम से बता चुका हूँ कि कृत्रिम पूजा-पद्धति अपनाने और ढोंग-पाखण्ड पर चलने के कारण लोग अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी चलाते हैं.उसी की पुष्टि इनसे होती है.मनुष्य मनन करने के कारण होता है.परन्तु यदि मनन की बजाए 'आस्था' और अंध-विशवास को महत्त्व दिया जाये जैसा कि एक उद्योगपति,एक नेता और एक अभिनेता ने निकट अतीत में हमारे देश में किया है -क्या वह मनुष्यत्व के दायरे में आता है?शीघ्र आपको उसके दुष्परिणाम देखने को मिलेंगे.       

3 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

रोचक ...जानकारीपरक विवेचन

Ram Shiv Murti Yadav said...

आपकी बातें तो काफी गूढ़ हैं. आपके विचार अच्छे लगे.



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कभी 'यदुकुल' की यात्रा पर भी आयें !!

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

सोचने के लिये विवश करने वाली पोस्ट है