Tuesday, August 2, 2011

विद्रोही स्व-स्वर में

इसी शीर्षक से एक तुकबंदी तब लिखी थी जब होटल मुग़ल,आगरा में किसी संघर्ष का समय था.अचानक किसी बात के जवाब में आफिस में तत्काल लिख कर इसे प्रसारित कर दिया था.इसी शीर्षक से एक पृथक  ब्लॉग भी चल रहा है और आज उसे प्रारम्भ किये हुए एक वर्ष भी पूर्ण हो गया है.यह अलग ब्लॉग बनाने का कारण यह था कि उसमें व्यक्तिगत संघर्षों का विवरण दिया जा सके.वैसे आम तौर पर किसी एक को दुसरे के व्यक्तिगत जीवन से तब तक कोई सरोकार नहीं होता जब तक कि उसका उसके व्यक्तिगत जीवन पर कोई प्रभाव न पड़ रहा हो.जिन बातों का उल्लेख किया जा रहा है उनमें से किसी भी बात का प्रभाव ब्लाग जगत के किसी भी व्यक्ति पर नहीं पड़ता है.लेकिन यदि मैं कहीं असफल रहा हूँ तो क्या उससे बचा जा सकता था?या यदि सफलता हासिल की तो क्या और कोई भी उसी प्रकार सफल हो सकता है?दुसरे की ठोकर देख कर खुद को ठोकर खाने से बचाना चाहिए अतः वह ब्लॉग पढ़ने के बाद यदि कोई भी अपने जीवन में असफलता से बच कर सफल हो सके तो यह सब लिखना सार्थक हो सकता है -इसी ध्येय को लेकर 'विद्रोही स्व-स्वर में' ब्लाग शुरू किया था.

ब्लाग जगत में जैसा कि प्रचलंन है लोग अपने -अपने हिसाब से टिप्पणियाँ देते हैं.उस ब्लॉग पर मेरे उद्देश्य को भांप कर सटीक टिप्पणियाँ केवल डा.डंडा लखनवी जी ने ही दी हैं.उनके अतिरिक्त मनोज कुमार जी, वीणा श्रीवास्तव जी,अल्पना वर्मा जी,के.आर.जोशी साहब(Patali The Village),जी.एन.शा साहब भी टिप्पणी देने वालों में प्रमुख हैं.इन सभी के प्रति बहुत-बहुत आभार.

जब टिप्पणियों का जिक्र हुआ है तो  श्री राम शिव  मूर्ती  यादव साहब की प्रशंसा न करना अन्याय होगा.राम शिव मूर्ती जी ने मुझे अपना ब्लाग 'यदुकुल'देखने को निमंत्रित किया था.कुछ लेखों पर मैंने अनुकूल टिप्पणियाँ दी थीं परन्तु 'बाबा रामदेव 'सम्बंधित लेख पर मैंने प्रतिकूल टिप्पणी दी थी जिसे उन्होंने डिलीट नहीं किया है.उनके विपरीत एक अच्छे कवि ज्यादातर ई मेल द्वारा अपनी कवितायें देखने को कहते थे उनकी बाबा रामदेव संबंधी कविता पर भी विपरीत टिप्पणी की थी परन्तु उन्होंने उसे रोक लिया.जबकि वह जानते थे और देख चुके थे मेरे ब्लॉग पर राम देव विरोधी लेख था तो निमंत्रित ही क्यों किया?इन कवि महोदय के विपरीत मैंने अपने लेख पर अभद्र टिप्पणी लिखने वाले 'गर्व से...'पार्टी के ब्लॉगर की टिप्पणी को प्रकाशित कर दिया था.यह तुलना आर.एस.एस.संबंधी ब्लागर्स की फासिस्ट प्रवृति को उजागर करने हेतु की है.अतः राम  शिव  मूर्ती यादव साहब का बहुत-बहुत आभारी हूँ कि वह लोकतांत्रिक उदार विचारों का निर्वहन करते हैं.

उस ब्लॉग की शुरुआत बचपन के लखनऊ के काल से हुई थी और फिर क्रमशः बरेली,शाहजहांपुर,सिलीगुड़ी ,शाहजहांपुर,मेरठ,होते हुए आगरा में बिताए -अनुभव किये वर्णन दिए हैं.१९८१ और १९८२ में दो बार कारगिल टेम्पोरेरी ट्रांसफर पर गए वहाँ का वर्णन भी दिया है जो महत्वपूर्ण हैऔर जिन्हें केवल रक्षा मंत्रालय से संबद्ध मनोज कुमार जी ने ही समझा है.

अभी आगरा में बिताये और २७ वर्षों का वर्णन आना है तब उसके बाद ही लौट कर लखनऊ आने का क्रम होगा.किन्तु उस ब्लाग के एक वर्ष पूर्ण होने के अवसर का लाभ उठा कर इस दौरान यहाँ की कुछ बातों का उल्लेख करना अप्रासंगिक  न होगा.

अपने एक निकटतम और घनिष्टतम रिश्तेदार जो हमारे लखनऊ आने के प्रबल विरोधी रहे है और हाल ही में एक वैवाहिक कार्यक्रम में लखनऊ पधारने पर हमारे घर भी आये थे और उस घटना का थोडा विवरण इस ब्लॉग में दिया जा चूका है उसका दोहराव न करते हुए इतना ही बताना आवश्यक है कि वे क्यों हमारे लखनऊ पुनः आने के विरोधी थे.हम उन  पर अविश्वास नहीं करते थे और इसी बात का नाजायज फायदा वे लोग उठा कर हमें नुक्सान पहुंचाते रहे और यहाँ आने पर उसकी पोल खुल गई,यही भय उन्हें सताता था.उनके छोटे दामाद और उनके घनिष्ठ मित्र (और भतीज दामाद) कुकू के भतीज दामाद दोनों साफ्टवेयर इंजीनियर हैं उनकी मदद से उन लोगों ने पोल खुलने से पूर्व हमारे ब्लाग्स से कुछ तस्वीरें आदि गायब करा दीं.हालांकि इससे उन्हें क्या लाभ हुआ हम अब भी नहीं समझ सके हैं.परन्तु निष्कर्ष निकलता है कि उन्होंने यह ट्रायल इसलिए किया होगा कि भविष्य में उनकी कारगुजारियों का उल्लेख होने पर वे ब्लाग से उसे चोरी से हटा सकें.यही नहीं उनकी छोटी बिटिया ने फेक आई डी बना कर कुछ ढुलमुल यकीन ब्लागर्स को हमारे विरुद्ध अनर्गल लिख कर भेजा जिसका उन पर प्रभाव भी पड़ा.एक ब्लॉगर साहब ने तो ई.मेल् भेज कर प्रश्न उठाया जब मैं ब्राह्मण नहीं हूँ तो ज्योतिष क्यों कर रहा हूँ?जब आगरा में था तो डा.बी.एम्.उपाध्याय,डा.वी.के.तिवारी,श्री एम्.एल.दिवेदी,पं.सुरेश पालीवाल ,इ.एस.एस.शर्मा आदि अनेकों जन्मगत ब्राह्मणों ने मुझ से ग्रह शान्ति और हवन करवाए थे;किसी ने भी मेरे गैर-ब्राह्मण होने का परहेज नहीं किया था.अब भी एक ब्राह्मण ब्लॉगर ने अपनी जन्म-पत्री का विश्लेषण मुझ से करवाया है.समय -समय पर मैं ज्योतिष संबंधी चेतावनियाँ इसी ब्लॉग में देता रहता हूँ. विमान एवं रेलों की दुर्घटनाएं और मुम्बई बम -विस्फोट उन विश्लेषणों के सही होने के प्रमाण हैं.लेकिन आरी में जब लकड़ी के हत्थे लगते हैं तब ही लकड़ी  कटती है उसी प्रकार जब अपने ही लोग मुखालफत करते हैं तब ही उसका असर होता है.यही सोच कर धूर्त-मंडली ने हमारे रिश्तेदार महोदय को मोहरा बना रखा है और वे बने आ रहे हैं.

वैसे तो उन साहब की मौसी के देवर श्री सतीश माथुर ने हमारे भाई अजय से बहुत पहले बहुत कुछ बताया था,लेकिन हम लोग समझते थे कि वे हमारे साथ अपनी कलाकारी नहीं दिखाएंगें जो हम लोगों की भारी भूल सिद्ध हुई और उसी गलती का खामियाजा अब तक भुगतते रहे.हमारे लखनऊ आने पर उन्होंने अपने इंजीनियर मित्र के अनुज लुटेरिय  तथा बाबूजी के एक वकील भतीजा का माध्यम लेकर हमें हर तरह से परेशान  करने का उपक्रम बना लिया.वे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हमने लखनऊ आकर भारी गलती की.क्योंकि अब यहाँ उनका अलीगढ़ का जादू फेल हो गया तो ओछे हथकंडों का सहारा लिया.यूं तो वे अपनी छोटी बेटी की शादी के समय से रिश्ते तोडना चाह रहे थे परन्तु अब लखनऊ आकर ऐसे करतब कर गए जिनके बाद (वे रिश्ते में सबसे छोटे और मैं सबसे बड़ा था इसलिए चुपचाप बर्दाश्त कर रहा था उन्हें लगता था वे अपने अमीर होने के नाते झुका रहे हैं) व्यर्थ में  अब और झुकना हमारे लिए भी मुश्किल हो गया.'एक बिल्ली की याचना भरी पुकार' लेख में उल्लेख सचित्र किया था कि बिल्ली के बच्चों को दूध इसलिए दिया कि वे ताकतवर होकर हमारे घर से चले जाएँ और वे पास में ही अन्यत्र चले गए.किन्तु दूध का दान (जरूरतमंद को देना दान ही है)हमारे लिए घातक  है.परिणामतः एक रोज(२७ जून २०११) तेज बारिश में ऊपर से कपडे लाते में मैं सीढ़ियों पर फिसलता चला गया.चोटें तो बहुत आईं,किन्तु अपनी वैज्ञानिक पूजा पद्धति के बल पर झेल गया और अपनी ही दवाओं से ठीक भी हो गया.१९८२ में कुकू और उसकी माँ ने भी मेरी हत्या करने का प्रयास किया था तब भी बच ही गया था इलाज करने वाले .डा.आर.के.टंडन ने उस एक्सीडेंट की पुलिस में रिपोर्ट करना चाहा था परन्तु बाबूजी ने ही पता नहीं क्यों उन्हें रोक दिया जो आगे के लिए बहुत घातक सिद्ध हुआ.इन लोगों ने हमेशा कुक्कू परिवार को फायदा पहुंचाने का प्रयत्न किया है.कोशिश तो इन लोगों ने यशवन्त को भी मुझ से अलग करने की बहुत की.नाकामयाब रहने पर उसे क्षति पहुंचाने के नित नए प्रयास खुद और अपनी बेटी-दामाद के माध्यम से करते रहते हैं.मैं किसी को नुक्सान नहीं पहुंचाता इसलिए खुद भी नुक्सान उठाने से बच ही जाता हूँ.२७ दिसंबर२०१०  को पूनम भी सीढ़ियों से रात में गिर गईं थीं इसी प्रकार तब भी उपचार किया था. अभी ०८ जुलाई को रात के समय बिल्ली और उसके बच्चों पर बिलौटा ने हमला कर दिया वे सब हमारे घर की छत पर आ कर बचाव की गुहार करने लगे.बिलौटा को भगाया तो वह भागते समय दीवार पर बैठे बिल्ली के दोनों काला व भूरा बच्चों पर कूदता हुआ गया.काला वाला हमारे घर की छत पर गिरा उसे कम चोट लगी यशवन्त ने तो उसे हाथ का सहारा देकर रोका और २० फुट नीचे गिरने से बचा लिया, किन्तु भूरा वाला दुसरे के घर की नीची छत पर गिरा उसके पिछले दोनों पैरों में गंभीर चोटें आ गईं.पहले पूनम ने उसकी रक्षा हेतु खुद स्तुतियाँ कीं फिर मुझे भी करने को कहा.हालांकि वे सब दुसरे के घर पर डेरा डाले थे परन्तु उनके जीवन की रक्षार्थ सफल प्रार्थना हम लोगों ने की और अब वह बिल्ली बच्चा भी ३० फुट ऊपर-नीचे चढ-उतर जाता है.हमारी वैज्ञानिक और पोंगा-पाखण्ड रहित पूजा पद्धति का मखौल ब्लॉग जगत में खूब हुआ है किन्तु प्रत्येक प्राणी का कल्याण केवल उसी से संभव है;ढोंग वाली विकृत पद्धति जिसका पालन ज्यादातर लोग करते हैं केवल लूट और शोषण का रक्षण करती है.अफ़सोस है कि पढ़े-लिखे विद्वान और उच्चाधिकारी भी इंसान की बनाई मूर्तियों को पूजते तथा घंटे बजा कर गौरान्वित होते हैं.27 जूलाई से हमने 'जन हित मे' एक नए ब्लाग के माध्यम से कुछ स्तुतियों को सार्वजनिक करना भी प्रारम्भ किया है .

लखनऊ वापिसी का लाभ इतना ही है कि हमें इंटरनेट में ब्लॉग के माध्यम से अनेकों विद्वानों के विचारों को जानने का मौका मिला उनमें से कुछ से व्यक्तिगत मुलाक़ात भी हुई और अनुभव अच्छा रहा.इस वर्ष लखनऊ में 'आल इण्डिया स्टुडेंट्स फेडरेशन ' के ७५ वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में एक समारोह अमीनाबाद के गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल में संपन्न होने जा रहा है.व्यक्तिगत रूप से उसमें भाग लेने का अवसर मिल रहा है,यदि अभी आगरा में रहता तो मेरे लिए यहाँ आकर भाग लेना मुमकिन नहीं हो पाता.हमारे वे रिश्तेदार कहते हैं सम्मान से पेट नहीं भरता है मुफ्त में इंटरनेट पर सलाह देना बंद करो.उम्र और रिश्ते में छोटे होकर वे हमें बेढंगा उपदेश देते हैं.पेट तो भिखारी  और जानवर भी भर लेते हैं किन्तु उनका मान-सम्मान क्या  है?


मनोज कुमार जी,डा.दराल साहब,डा.डंडा लखनवी जी  सरीखे विद्वान जब अपनी टिप्पणियों में सराहना करते हैं तो हम समझते हैं कि हमारा लिखना सार्थक है.धन तो टिकाऊ होता नहीं है ये सद्भावनाएं हमारे लिए  अमूल्य निधि हैं.

5 comments:

डॉ टी एस दराल said...

माथुर जी , व्यक्तिगत बातों को सार्वजानिक रूप में न ही लें तो अच्छा है ।
आप अपनी जगह सही हैं , यही महत्त्वपूर्ण बात है ।
शुभकामनायें ।

Maheshwari kaneri said...

दुनिया में हर तरह के लोग होते है ..किसी की परवाह किये विना ही अपना काम करते रहना चाहिये। आप जो भी करते हैं जो सोचते है ं वो अपनी जगह बिल्कुल सही है.... दूसरा ब्लॉग जिसका एक वर्ष पूर्ण हो गया है उसके लिये बधाई...

मनोज कुमार said...

हमें तो आपका लिखा अच्छा लगता है। और जो हमें अच्छा लगता है उससे खुद को वंचित कयों करूं, और उसे स्वीकार करने से कतराऊं क्यों।
ज्योतिष किसी जाति विशेष के लिए निर्धारित ज्ञान तो नहीं है। एक विज्ञान है और हर किसी को इसे जानने का अधिकार है।

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

आपके विचार दूसरी सभी बातों से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं.....

Rakesh Kumar said...

आपके ब्लॉग पर पहली दफा आना हुआ.
गायत्री मन्त्र सुनकर बहुत अच्छा लगा.

आपको सद्लेखन के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ.

मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है.