Tuesday, July 17, 2012

श्रद्धांजली सभा की सैर




साभार फेसबुक
इस स्लोगन को देखा,पढ़ा और सोचा तो क्यों न अपनी श्रद्धांजली सभा ही आयोजित कर ली जाये। क्योंकि बाद मे कौन मेरे बारे मे क्या कहेगा मुझे कैसे पता चलेगा?वैसे यह विचार मेरा खुद का मौलिक नहीं है। आर्यसमाज,कमलनगर-बलकेशवर,आगरा मे जब पांचवा रविवार पड़ता था तो एक सन्यासी -स्वामी स्वरूपानन्द जी प्रवचन देने आते थे वह अक्सर प्रबन्धकों से यही निवेदन करते थे कि उनके जीते जी उनकी श्रद्धांजली सभा आयोजित कर दें जिससे वह भी जान सकें कि उन्हें किसने क्या कहा। लेकिन ऐसा होता कहाँ है ?अतः उनकी श्रद्धांजली सभा उनके मरणोपरांत ही हुई थी। हमारे देश मे बुरे से बुरा व्यक्ति भी मरणोपरांत पूजनीय हो जाता है फिर वह तो सन्यासी प्रचारक थे। सभी ने उनकी तारीफ़ों के पुल बांधे जिनमे वे लोग भी शामिल थे जिन्हें उनकी बातें 'शूल' की तरह चुभा करती थीं। 

पूरन चंद एंड कंपनी आगरा मे 'गोदरेज'  की एक मशहूर फर्म थी जहां टाईप राइटर से लेकर लाकर,सेफ आदि सभी उपलब्ध थे। पूरन चंद जी के बड़े बेटे ने शिक्षा संस्थान भी खोल लिए थे जो भारी मुनाफा देते हुये चल रहे थे। पूरन चंद जी को आर्यसमाज,आगारा का भामाशाह कहा जाता था। उनके पुत्र और पौत्र भी पूरन चंद जी के लिहाज मे आर्यसमाजी थे (व्यवहार मे थे या नहीं यह नहीं पता ) किन्तु उनके प्रपौत्रों की पीढ़ी इन विचारों पर नहीं चलना चाहती थी और पूरन चंद जी उनको भी बांधे रखना चाहते थे। अपने एक और प्रपौत्र के नामकरण संस्कार को 'अग्रसेन सेवा सदन,'कमला नगर,आगरा मे  उन्होने बड़े पैमाने पर आयोजित किया था और उसमे 'आचार्य' के रूप मे स्वामी स्वरूपा नन्द जी को सादर आमंत्रित किया था। उनके रिश्तेदार,नगर के आर्यसमाजी तथा अन्य तमाम लोगों के मजमे के बीच अपने प्रवचन के बीच मे स्वामी जी ने कहा -"आपके खानदान मे पैसा ,प्रतिष्ठा,पढ़ाई अभी तक सब कुछ है,लेकिन आगे सब कुछ अच्छा नहीं है क्योंकि पैसा तो एक 'वेश्या' और एक 'कसाई' के पास भी हो सकता है लेकिन समाज मे उनकी हैसियत क्या होती है ?" उन्होने आगे कहा-"यदि कमाया गया पैसा किसी का शोषण करके आया है या अपनी कमाई से किसी ज़रूरतमन्द की भलाई नहीं की जाती है तो वह कसाई और वेश्या की कमाई से भी बदतर है। " इतना सुनते ही पंडाल मे एकदम मुरदनी छा गई पूरन चंद जी के पौत्र और प्रपौत्र सभी के चेहरे गुस्से से लाल हो गए। उनके पुत्र गण सबको समझाने लगे। स्वामी जी ने ऐलान कर दिया वह कार्यक्रम छोड़ कर जा रहे हैं क्योंकि उनकी भावी पीढ़ियों को सही बात सुनना पसंद नहीं है। पूरन चंद जी ने पहले अपने परिजनों को लगभग डपटते हुये कहा कि तुम लोग बिगड़ने लगे हो इसलिए स्वामी जी को बुलाया था कि उनकी फटकार से सम्हल जाओ नहीं खुद तो डूबोगे ही और उनका नाम भी ऊपर से डुबाओगे। फिर स्वामी जी की मनुहार की। स्वामी जी ने फिर चंद शब्दों मे ही प्रवचन समाप्त कर दिया।

स्वामी जी की इच्छा उनके जीवन काल मे उनकी श्रद्धांजली सभा आयोजित करने की पूर्ण न हो सकी। अतः मैंने सोचा कि क्यों न इन्टरनेट के खुले मैदान मे खुद की श्रंधाजली सभा खुद ही आयोजित कर ली जाये। तो देखिये मुझे श्रद्धांजली देते हुये किसने क्या कहा-

(वैसे नाम आदि सभी 'काल्पनिक' हैं किन्तु यदि संयोग से किसी का नाम,पद आदि उससे मिलता-जुलता हो तो वह खुद अपने लिए न समझे) 

एस जी (मैं हू-मैं हूँ)---पर्ले दर्जे का मूर्ख और बेपर की उड़ाने वाला चला गया चलो अब जनता को राहत मिली।

एम के(दिल्ली ) ---इस आदमी को तो बंगाल की खाड़ी मे पहले ही डुबा देना चाहिए था।

एम के (कलकत्ता )---यह सनकी जन नायक अन्ना का सबसे बड़ा विरोधी था बताओ "अन्ना के पीछे नहीं भागें तो किसके पीछे भागें"?अब अन्ना आंदोलन की खिलाफत कम होगी और भ्रष्टाचार  खूब फूले फलेगा।

ए पी म ---यह जातिवादी था और नेगेटिव एप्रोच वाले सुभाष बोस का समर्थन करता था मेरे 'स्टालिन' की खिलाफत के जवाब मे इसने 'लेनिन' के दोष सामने रख दिये थे चलो अब राहत मिली।

एम एस ---कभी मैं मार्क्सवादी शिक्षक था और आज एक तो कोई मुझे पूछता ही नही उस पर भी यह बीच-बीच मे 'धार्मिक-भटकाव' खड़े कर देता था अब कोई विघ्न नहीं डाल पाएगा।

पी सी जी ---इसको गोडसे की किताब पढ़ने को कहा था नहीं पढ़ी 'शिव' को 'बामदेव'-बामपंथी कहता था। चलो अब रोड़ा हट गया।

डॉ अंतर्मंठन---अन्ना के आशय पर संशय नहीं करना चाहिए इतना क्या कह दिया इसने दनादन अन्ना विरोधी लेखों,वीडियों की झड़ी लगा दी। एक तो सबसे कटा रहा -टिप्पणियों का मामला गिव एंड टेक होता है। कौन इस पर टिप्पणी करता और कौन पढ़ता? बेकार का लिखना अब बंद हो गया।

एस एम  एम (पार्सल बाबू)---मैंने इसका मकान हड़पने की सोची थी इसके बेटे को तो दबोच लेता यह आगरा छोड़ कर लखनऊ भाग गया मुझे घाटा दे गया।

एस एम (काली पप्पी )---मैंने हर तरह के हथकंडे अपना कर इस आदमी को अपने कब्जे मे घेरने का हर प्रयास किया जिसे इसने विफल कर दिया और हम उसके मकान को हड़प न सके इस बात का तो मलाल रहेगा लेकिन अब चैन भी मिलेगा क्योंकि अब कौन पोल खोलेगा?

के एम एम (कुक्कू)---मैंने इसके सारे रिशतेदारों को तोड़ रखा है दुनिया मे जहां भी जाता मैं इसे परेशान रखता चलो झंझट खत्म हुआ।

के बी एम ---35 सालों तक साले को छकाए रखा ,लखनऊ जाकर पकड़ से निकल भागा था चलो अब कुक्कू भाई की तरह मुझे भी चैन मिला।

एस एम ---बड़ा 'आत्म कथा' लिखने चला था, अब रह गई न अधूरी।'कलम और कुदाल' लेकर 'क्रान्ति' और 'विद्रोह' के 'स्वर' बड़े 'जन हित' मे बुलंद करता था ,हो गई आस पूरी?

सी पी एम (मु),पूना ---मैंने तो खूब फेक आई डी बना कर खूब परेशान किया था अब किसे परेशान करेंगे?

उर्वशी (बब्बी ),पूना ---कमबख्त को सबके सब षडयंत्रों का पता नहीं कैसे पता चल जाता था अब कोई खतरा नहीं रहा।

टी पी,पूना---बहुत धम्की देता था बच्चों की  जन्म कुंडली के आधार पर  मखौल उड़ाने वाले का खुलासा कर देंगे अपनी कुंडली का कुछ पता था क्या?

यू पी एस,जूलाजिस्ट ---सारे राजनेता धूर्त होते हैं ,नेता गिरी करता था,अङ्ग्रेज़ी की,IAS आफ़ीसर्स की  खिलाफत करता था अब क्या कर लेगा?

डी डी आर आर ---कहता था 'हवन' करो कौन बैठेगा घंटों पुजारी को डिब्बा दिखाया और लड्डू खाया उसे गलत कहता था। अरे भाई डाइबिटीज़ नहीं होगी,दवा नहीं खाएँगे तो डॉ और केमिस्ट न भूखे मर जाएँगे?सबको स्तुतिए बाँट कर इलाज करता था, अमीरों की कोई फिकर ही नहीं थी अब चक्कर खत्म।

गरूरी सिंह---बहुत समझाया कि 1- 1 =0 होता है उसे इतनी सी गणित ही न समझ आई। शहर छोड़ कर चला गया। आगारा का पागलखाना छोड़ कर पगला लखनऊ गया था ,क्या हासिल कर लिया?

गरूरन (घमंडना)---मैंने बराबर कहा 1 और 1 ग्यारह (11 ) होता है यह भी न समझ आया। हाँ यह ज़रूर है कि उस आदमी ने जिसे मदद की उसने उसे धोखा दिया और जिससे संपर्क ही न था और  जिसके लिए कुछ न किया उसने वक्त पर उसका भला  किया और इसी वजह से हम सब मिल कर भी उसे परास्त न कर सके वह अकेला ही हम सबको परास्त कर गया।

आर एम ---मैंने उसे ट्रेंड किया और ऊपर उठाया इसलिए उसे मेरे गलत कार्यों मे भी मदद करनी चाहिए थी। वह सिद्धांतवादी बन कर अड़ गया। मैंने धमकाया कि "हमारी बिल्ली हमही से म्याऊँ?मैं हाथ पर बैठी मक्खी की तरह मसल कर फेंक दूंगा। " तपाक से कहता है  'मक्खी' तो बड़ा जीव है वह उससे भी छोटी 'चींटी' है और मुझे 'हाथी' और फिर  से कहता है कि बचा के सूंड को रखना कहीं उसमे चींटी घुस न जाये। जहां कोई मेरे सामने ज़ुबान नहीं खोल सकता था उसने मेरे अपने अज़ीज़ को मेरे खिलाफ खड़ा करके मुझे पदच्युत करा दिया। 9 वर्ष कमांडर रह कर 9 वर्ष सन्यास मे रहना पड़ा। कोई बात नहीं उसका काम सही था वह ईमानदार भी था फिर से कमांडर बनने पर मैंने उसे अपना सहायक बना लिया लेकिन वह मेरे चंगुल से निकल भागा। दरअसल मकान बेचने का आइडिया उसे मैंने ही दिया था मैं  सस्ते मे उससे लेना चाहता था। उसने मुझे भी चकमा दे दिया। वह जो कुछ भी था मेरे ही बदौलत था।

वी बी एस ---मैंने उसे दबाना चाहा वह दबा नहीं पता नहीं अकेले-अकेले कैसे इतने सबसे टकरा गया?मैंने सस्ते मे उससे मकान मांगा था उसने दो टूक मना कर दिया। फिर तो वह मुझसे अपनी तारीफ भी सुनने को राज़ी नहीं था उसके न रहने से एक हेंकड़ीबाज तो कम हुआ।

एस एस एस ---वह एक ईमानदार और सहयोगी आदमी था और ऐसा आदमी कभी किसी से दब नहीं सकता  ये सब लोग बेवकूफ थे जो आदमी की काबिलियत को न समझ कर उसे बेवकूफ मानते हुये उसकी प्रापर्टी हड़प करना चाहते थे। मेरे हर सार्वजनिक कार्यक्रम मे उसने मदद की और व्यक्तिगत बुलावे पर भी खुशी-खुशी आया। उसने केवल मुझ पर ही विश्वास किया मकान बेचने मे मैंने उसे मदद दी और उसने 'कैश' मेरे कस्टडी मे रखवाया। पूरी सर्विस मे 10 प्रतिशत कमीशन खाता रहा हूँ पर उस आदमी से मैंने 10 पैसे भी नहीं लिए। उसके शहर छोडने से मुझे 'सलाहकार'से वंचित होना पड़ा था अब उसके न रहने से मुझे क्या फर्क?

पी एस ,बालाघाट ---मैंने उसे उल्लू बनाना चाहा कि द्वादश भाव लग्न होता है तो उसने मुझसे ऐसा साफ्टवेयर बना कर देने को कह दिया। अब उसे कैसे समझाता कि उसे उल्लू बनाना चाहता था। पर वह था उल्लू ही 'अंधेरे' मे भी देख लेता था।

एन एस,बालाघाट ---  "निशाना बहुत सही है" यह व्यंग्य तब किया था जब वह सड़ा हुआ अमरूद तो खिड़की से पार न फेंक सका । परंतु सारी दुनिया को पार पाने का मार्ग बताता फिरता था। अब खुद पार पाया या कहीं भटक गया,क्या पता?

बड़का  ---इससे-उससे सबसे चकमा देकर भिड़ाने का प्रयास किया लेकिन वह किसी से न भिड़ कर मुझसे ही भिड़ गया  नतीजा क्या हुआ खुद का खात्मा।

बड़कन  ---कई बार आना टलवाया इस बार भी एड़ी-चोटी का दम लगाया लेकिन इस बार उसने कोई दाल न गलने दी तो क्या हुआ मैं भी अपनी दौरानी की असली जिठानी हूँ उससे तगड़ा व्यंग्य जड़ दिया -"फिर आइये,बार-बार आइये। " जबकि अपने जोरू के गुलाम को निर्देश दे दिया था उसको भीतर तक कचोट देने को जो उसने बखूबी किया और आज उसका परिणाम भी सामने आ ही गया।

एस वी,कदम कुआं ---मैंने ब्लाग जगत मे उसके विरुद्ध तगड़ी लाम बंदी कर रखी है  खुद अपने पर शक न होने देने के लिए उसे 'चरण स्पर्श','प्रणाम','मुझ पर शताब्दियों तक आशीर्वाद बनाए रखिए' जैसे शब्दों के जरिये उलझाना चाहता था। लेकिन लगता है वह सब समझ रहा था और मुझसे किनारा कर लिया। अब तो सबको ही उससे छुटकारा मिल गया।

पी टी ---'मार्कस्वाद' मे 'धर्म' का घाल-मेल कर देता था। कोरा सिद्धांतवादी था,व्यावहारिक ज्ञान से बहुत दूर। अरे भाई जब 'धर्म' भी ठीक हो जाये और 'मार्कस्वाद' भी तब हमारा क्या होगा?यह वह नहीं सोचता था उसे तो सब कुछ ठीक-ठाक करने की पड़ी रहती थी। दुनिया के लिए एकदम अनफ़िट और धरती पर बोझ था वह।

ए पी एम ---कुछ कहने से छूट गया था वह यह कि उस कामरेड को मैंने इन्टरनेट माध्यमों से दबाना चाहा यह जानते हुये भी कि वह मेरे बारे मे सब कुछ जानता है। मैंने ऊपर से अविश्वास रखते हुये भी अपनी जन्मपत्री का विश्लेषण उसी से कराया था।  टी पी तो पूना मे प्रवास करते हुये अपने बच्चों की जन्मपत्रियाँ बनवा कर धोखा दे सकती है तो मैं तो विदेश मे प्रवास कर रहा हूँ धोखा देने मे पीछे क्यों रहता?लेकिन उसका ज्ञान क्या था ?वह यह क्यों नहीं समझा कि मैं धोखेबाज़ शख्स था या वह जान बूझ कर मुझे एक्सपोज कर रहा था?चलो अब छुटकारा मिल गया।

इस श्रद्धांजली समारोह की संयुक्त रूप से अध्यक्षता कर रहे-ब्लागस्पाट और फेसबुक ने अब कोई वक्ता शेष न रहने के कारण मुझे बोलने को पुकारा। मेरा नाम सुनते ही  और मुझ पर निगाह पड़ते ही ए पी एम ने जेब से बाल पेन टाईप कुछ  निकाला और बटन दबा कर उसे कान मे खोंस लिया जैसे डाकिये अपने कान मे पेन लगा कर चलते हैं और कोई गेरुआ कपड़ा हिलाता हुआ 'भूत'---'भूत'---'भूत' चिल्लाता हुआ आसमान मे उड़ गया विदेश प्रवास को । बाकी लोग उस कामरेड का चमत्कार हैरानी पूर्वक निहारते रह गए।


मैंने अपनी ओर से कुछ न कह कर यही कहा कि , पत्रकार स्व .शारदा पाठक ने स्वंय अपने लिए जो पंक्तियाँ लिखी थीं ,मैं भी अपने ऊपर लागू समझता हूँ :-


लोग कहते हम हैं काठ क़े उल्लू ,हम कहते हम हैं सोने क़े .
इस दुनिया में बड़े मजे हैं  उल्लू   होने   क़े ..


ऐसा इसलिए समझता हूँ जैसा कि सरदार पटेल क़े बारदौली वाले किसान आन्दोलन क़े दौरान बिजौली में क्रांतिकारी स्व .विजय सिंह 'पथिक 'अपने लिए कहते थे मैं उसे ही अपने लिए दोहराता रहता हूँ :-

यश ,वैभव ,सुख की चाह नहीं ,परवाह नहीं जीवन न रहे .
इच्छा है ,यह है ,जग में स्वेच्छाचार  औ दमन न रहे ..








1 comment:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

जग में स्वेच्छाचार औ दमन न रहे ..

ऐसा समाज ही मानवीयता के मूल्यों को सहेज सकेगा.....