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Sunday, May 3, 2026

RSS और BJP भारतीय लोकतंत्र की हत्या के गुनाहगार ------ Rajesh R. Singh



RSS और BJP भारतीय लोकतंत्र की हत्या के गुनाहगार 
चंद्र बाबू नायडू और नीतीश कुमार जैसे अनुभवी सियासी बाजीगर, जो कभी मोदी को तानाशाह करार देते थे और आरएसएस की विचारधारा से दूरी बनाते दिखते थे, आज केंद्र में आरएसएस-प्रेरित सरकार को अटूट समर्थन प्रदान कर रहे हैं। 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा 240 सीटों पर सिमट गई, लेकिन टीडीपी के 16 और जेडीयू के 12 सांसदों समेत एनडीए के गैर-भाजपा सहयोगियों ने कुल 293 सांसदों का समर्थन देकर सरकार बनाई। इन नेताओं के कानों में लोकतंत्र के खात्मे की कोई पदचाप नहीं गूँज रही, न ही इनकी आंखों में आरएसएस की कथित तानाशाही का भय दिखाई दे रहा। नायडू 2018 में विशेष श्रेणी का दर्जा न मिलने पर एनडीए छोड़ चुके थे और मोदी सरकार पर हमले बोलते थे, लेकिन 2024 में आंध्र प्रदेश के लिए विशेष पैकेज और मंत्रालयों के लालच में फिर गले मिल गए। नीतीश कुमार तो पिछले दशक में कई बार पाला बदल चुके, 2013 में भाजपा से अलग हुए, 2017 में वापस लौटे, 2022 में महागठबंधन में गए और फिर 2024 से पहले एनडीए में लौट आए। यह सौदेबाजी है, बिहार और आंध्र के विकास, विशेष श्रेणी का दर्जा, रेलवे जैसे मंत्रालय और फंड्स के बदले संवैधानिक मूल्यों की बलि चढ़ाने का सौदा। इनके लिए सत्ता की कुर्सी संविधान और लोकतंत्र से कहीं ज्यादा अहम है, क्योंकि क्षेत्रीय अस्मिता और वोट बैंक बचाने की मजबूरी ने उन्हें सिद्धांतों से ऊपर उठा दिया। खैर नीतीश बाबू को उनकी करनी की सजा मिल गयी संघीयों नें उन्हें निगल लिया चंद्र बाबू को निगलने के लिए उनके खेमें में गद्दार तैयार किए जा रहे हैं देर सबेर उन्हें भी संघी निगल लेंगे।
आरएसएस, जिसकी स्थापना 1925 में डॉ. के.बी. हेडगेवार ने की, आजादी की लड़ाई में कोई संगठनात्मक भूमिका नहीं निभाई। बल्कि इसके संस्थापक और दूसरे सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर ने क्विट इंडिया आंदोलन जैसे राष्ट्रव्यापी संघर्षों से दूरी बनाए रखी और ब्रिटिश राज के खिलाफ सीधा मुकाबला 'प्रतिक्रियावादी' करार दिया। गोलवलकर की किताब 'वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड' (1939) में नाजी जर्मनी और फासीवादी इटली से प्रेरणा ली गई, जहां अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे का नागरिक मानने वाली सोच व्यक्त की गई। गांधीजी की हत्या के बाद संगठन पर प्रतिबंध लगा था। RSS ने शुरू से 'हिंदू एकता' और अनुशासन पर जोर दिया, लेकिन कांग्रेस के अखिल भारतीय आंदोलनों से परहेज किया। आज वही संगठन संविधान को 'पश्चिमी नकल' बताकर उसकी आलोचना करता रहा है और मनुस्मृति जैसे प्राचीन ग्रंथों को आदर्श मानता है। 1949 में आरएसएस के मुखपत्र 'ऑर्गनाइजर' ने संविधान बनने पर अफसोस जताया कि उसमें 'भारतीय' तत्व नहीं हैं और मनु के कानूनों का कोई उल्लेख नहीं। फिर भी 100 से ज्यादा गैर-आरएसएस सांसद मोदी-शाह के इशारे पर घूम रहे हैं, बिना इस ऐतिहासिक गद्दारी और विचारधारा के खतरे को समझे। लाखों स्वतंत्रता सेनानियों, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, गांधीजी के अनुयायियों की कुर्बानी से बड़ी ही मुश्किल से मिला लोकतंत्र अब 'हिंदू राष्ट्र' के खांचे में ढाला जा रहा है, जहां बहुलवाद की जगह एकरूपता थोपी जा रही है। इन सांसदों का ज़मीर सोया हुआ है या सत्ता की चकाचौंध में पूरी तरह बेहोश हो चुका है?
ये सांसद भूल गए कि आजादी की लड़ाई में कांग्रेस, समाजवादियों और क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश साम्राज्य से सीधा संघर्ष किया, जबकि आरएसएस ने हिंदू संगठन को मजबूत करने और मुस्लिम एकता को खतरा मानकर अलग राह चुनी। गोलवलकर ने लोकतंत्र को हिंदू संस्कृति के अनुकूल नहीं माना और मनुस्मृति को कानून का आधार बनाने की वकालत की, जिसमें वर्ण व्यवस्था और असमानता को वैध ठहराया गया। आज एनडीए सरकार में सहयोगी दल इसी विचारधारा के विस्तार को चुपचाप देख रहे हैं। चंद्र बाबू नायडू और नीतीश कुमार जानते हैं कि उनकी पार्टियां टीडीपी और जेडीयू क्षेत्रीय मुद्दों, आंध्र के विकास, बिहार के विशेष दर्जे पर टिकी हैं, लेकिन आरएसएस की सांस्कृतिक और संगठनात्मक मशीनरी धीरे-धीरे उनके वोट बैंक को भी निगल सकती है। 2024 में भाजपा के बहुमत न होने के बावजूद इन नेताओं ने 'अनकंडीशनल सपोर्ट' दिया, क्योंकि विकास के वादे, केंद्रीय फंड्स और मंत्रालयों का लालच लोकतंत्र के लंबे खतरे से बड़ा साबित हुआ। क्या ये लोग नहीं देख रहे कि उनकी पार्टियों का वजूद और क्षेत्रीय स्वायत्तता RSS की केंद्रीकृत 'एक राष्ट्र, एक संस्कृति' वाली सोच में धीरे-धीरे विलीन हो रही है? इतिहास में कई क्षेत्रीय दल बड़े सहयोगी के साथ घुल-मिलकर अपनी पहचान खो चुके हैं, लेकिन सत्ता का नशा इनके विवेक को कुचल रहा है।
लाखों शहीदों की शहादत पर सवाल उठाना आसान है, लेकिन सच्चाई यह है कि भारतीय लोकतंत्र ने सभी विचारधाराओं, वामपंथी, दक्षिणपंथी और सेकुलर को जगह दी। आरएसएस ने शुरू से ही 'हिंदू राष्ट्र' की कल्पना की, जिसमें अल्पसंख्यक 'हिंदू संस्कृति' अपनाने को मजबूर हों। इसके प्रारंभिक दस्तावेजों में बहुलवाद और समानता वाले संविधान से असहजता साफ झलकती है। 1949 के ऑर्गनाइजर संपादकीय में मनुस्मृति की तारीफ करते हुए कहा गया कि संविधान में प्राचीन भारतीय कानूनों का अभाव है। आज भी कुछ आरएसएस नेता 'सेकुलर' और 'सोशलिस्ट' शब्दों की समीक्षा की बात करते हैं। फिर भी ये समर्थन देने वाले दल इस बहस में नहीं पड़ना चाहते। उनका डर सिर्फ चुनावी हार और सत्ता गंवाने का है, न कि संवैधानिक मूल्यों का। इन्हे यह कहते हुए सुना जा सकता है कि अगर आरएसएस की तानाशाही आ रही होती, तो ये 'किंगमेकर' पहले ही पाला बदल चुके होते, लेकिन सत्ता और फंड्स का स्वाद इतना मीठा है कि लोकतंत्र के दुश्मन बनकर भी ये घूम रहे हैं। चंद्र बाबू ने 2014 से विशेष श्रेणी का दर्जा मांगा, नीतीश ने बिहार के लिए 2000 से मांग की, और 2024 में एनडीए में शामिल होकर इन्हें हासिल करने की उम्मीद में चुप्पी साध ली।
ये सब कब जागेंगे? शायद तब जब उनकी अपनी पार्टियां, टीडीपी और जेडीयू आरएसएस की शाखाओं में बदल चुकी होंगी, जब क्षेत्रीय अस्मिताएं केंद्रीय हिंदुत्व में पूरी तरह घुल-मिल गई होंगी। नीतीश कुमार का फ्लिप-फ्लॉप इतिहास प्रसिद्ध है, वे 'सुशासन बाबू' के रूप में जाने जाते थे, लेकिन सत्ता बचाने के लिए बार-बार गठबंधन बदलते रहे। नायडू भी ट्रांजेक्शनल पॉलिटिक्स के माहिर हैं। आज ये नेता जानते हैं कि भाजपा बिना उनके समर्थन के बहुमत नहीं बना सकती, फिर भी वे बिना शर्त समर्थन दे रहे हैं क्योंकि अल्पकालिक फायदे, विशेष पैकेज, मंत्रालय, लंबे लोकतांत्रिक खतरे से ज्यादा आकर्षक हैं। इतिहास गवाह है कि सत्ता के लिए सिद्धांत बेचने वाले अंत में खुद बिक जाते हैं। आरएसएस की विचारधारा अनुशासन के नाम पर बहुलवादी भारत को एकरूप बनाने की कोशिश लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती है। सहयोगी दल अगर आज पदचाप नहीं सुन रहे, तो कल उनके कार्यकर्ता और वोटर जब जागेंगे, तब तक उनकी पहचान मिट चुकी होगी।
अंत में, भारतीय लोकतंत्र मजबूत है क्योंकि यह बहुलवादी और समावेशी है, न कि किसी एक विचारधारा का गुलाम। आरएसएस चाहे जितना हिंदू राष्ट्र का सपना देखे, संविधान की जड़ें समता, स्वतंत्रता, न्याय गहरी हैं। लेकिन सवाल ये है कि जो सांसद आज आरएसएस के प्रभाव में 'मोदी-शाह के इशारे' पर चल रहे हैं, वे कल खुद को और अपनी विरासत को बचाने के लिए क्या करेंगे? लाखों शहीदों की आहें, संविधान निर्माताओं का सपना और आजादी की लड़ाई की यादें इनके कानों तक पहुंचनी चाहिए। जागना होगा, वरना इतिहास इन्हें सिर्फ सत्ता के दलाल और लोकतंत्र के कमजोर करने वाले के रूप में याद रखेगा, न कि रक्षक के रूप में। सच्चा लोकतंत्र तब बचता है जब सत्ता के सहयोगी भी सवाल पूछें, विपक्ष की तरह नहीं तो कम से कम अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनें। जनता को भी सतर्क रहना होगा, क्योंकि लोकतंत्र किसी एक दल या गठबंधन की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की अमूल्य विरासत है। सत्ता का खेल खेलते रहो, लेकिन याद रखो, जो आजादी के सपनों से समझौता करता है, वह खुद इतिहास की कचरा टोकरी में समा जाता है। जागो सोने वालों, वरना बहुत देर हो जाएगी।
Rajesh R. Singh

  ~विजय राजबली माथुर ©

 

Friday, November 11, 2016

बड़े आराम से ‘अकूत’ नोट सोने में बदल गया और बीमार व्यक्ति के लिए दवाई लेने वाली महिला दुकानदार से रात भर झगडती रही ------मंजुल भारद्वाज

नोट बदलने का खेल एक शुद्ध राजनैतिक छलावा !
-मंजुल भारद्वाज

काला धन, काला धन, काला धन ... ये संकल्पना ही सिरे से गलत है . दरअसल राजनैतिक पैतरे बाज़ी का यही कमाल है और बाबु किस्म के जीव इस पैतरे बाज़ी में अपना करियर चुनते हैं जिसे प्रोफेशन कहते हैं और उन बाबुओं को प्रोफेशनल . साफ़ और सच बात ये है कि पैसा घोषित होता है या अघोषित होता है ..काला या सफेद नहीं होता . लेकिन सारे के सारे जनता को काले पैसे के नाम पर गुमराह कर रहे हैं और बहुमत वाली सरकार उस काले धन को समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध और देश भक्त है ..बाकी सब इस बहुमत वाली सरकार की नज़र में क्या है? ये अब कहने की जरूरत नहीं ...
दरसल बहुमत वाली सरकार की सबसे बड़ी दिक्कत ये है की वो “कुछ” करते हुए दिखना चाहती है पर असल में “कुछ” करना नहीं चाहती  और उपर से उद्घोषणा का ग्रांड स्टाइल व्यक्तिवादी तरीका ...जैसे गोया एक तानाशाह की सरकार हो .. ना मंत्री मंडल .. ना सलाहकार ना कोई मन्त्रणा ..बस एक सनक की उठे और  त्यौहार में विलुत्प होती अपनी चर्चा को धमाके से सुर्ख़ियों में लाना ... और ऐलान करना देखो मैं हूँ और ... अब से मेरे हिसाब से चलो ..सुबह लाइन लगाना ..दूध ..सब्जी ..दवाई .. आटा यानी रोज़मर्रा की सारी चीज़ें खरीदते हुए मेरे नाम की माला जपना ...  ऐलान में कहा गया किसी को पता नहीं है की ये निर्णय लिया जा रहा है .. पर पूंजीपतियों ने तो पहले ही 30 दिसम्बर तक का ऐलान कर रखा है अपने मोबाइल और इन्टरनेट नेटवर्क का जिसकी पब्लिसिटी स्वयं “उद्घोषक” कर रहे हैं .
दावा “काला धन” खत्म ..बहुमत वाली सरकार के मुखिया ने कहा “बहनों , भाइयो .. बोरों में पैसे भरके रखें  हैं ..बात सही है ..ख़बरों में ..बोल चाल में .. सामान्य व्यवहार में ये देखने , सुनने में आता है कि राजनेताओं और  सरकारी बाबुओं के घर में ... “बोरों और बक्सों में नोट मिलते हैं”  .. अब इन बक्सों में नोट रखने वाले चंद लोगों के लिए 125 करोड़ जनता की फजीहत . क्योंकि गुड गवर्नेंस , आयकर विभाग , एमनेस्टी स्कीम सब टांय टांय फिस्स ! जरा विश्लेष्ण करें की ये बक्सों में नोट भरकर रखने वाले ... इतने नोट लाते कहाँ से हैं ..उनके पास वो कौन से तरीके हैं जिससे इतना धन उनके पास आता है ? क्या सरकर ने उन तरीकों को बंद किया ? मात्र नोट बदलने से क्या इन बक्सों वालों को फर्क पड़ेगा . जिन लोगों ने पहले वाले नोट दिए थे वही लोग इनको बड़े आराम से नये ‘वाले नोट” पुराने नोटों के बदले दे देंगें . इन अकूत नोट रखने वालों को जल्दबाजी तो है नहीं .. रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए तो उन्होंने ये ‘अकूत’ नोट रखे नहीं हैं . और जैसे ही ‘नोट’ बदलने की घोषणा हुई ..इन ‘अकूत’ नोट रखने वालों ने तुरंत ‘सोना’ खरीद लिया .. रातों रात सोने की और गहनों की दुकान खुली रहे ..बड़े आराम से ‘अकूत’ नोट सोने में बदल गया और बीमार व्यक्ति के लिए दवाई लेने वाली महिला दुकानदार से रात भर झगडती रही .. सरे आम  दलालों के वारे न्यारे .. बस्तियों में, स्टेशन पर .. टोल नाकों पर 500 रुपये के पुराने नोट के बदले ब्लैक में 400 रूपये देने का काम खुलम खुल्ला चला और जिनके पास खाते नहीं है उनके  साथ चल रहा है .. ये आम लोग फिर ठगे गये ...  बहुमत सरकार के गृह राज्य में सरे आम 1500 ( तीन पुराने 500 के नोट)  रूपये के बदले 1000 ( सौ रूपये के 10 नोट) देने का कारबार चला ...दलालों की चांदी ही चांदी...अब आप समझ गए .. आज सुबह बैंक का कर्मचारी अपने ग्राहक से कह रहा था , साहब ये सब चोर चोर मौसेरे भाई हैं ..नोट भी बदल गए और उनकी कीमत भी  ‘सोने’ से और बढ़ गयी .. और आप लोग भीड़ में एक दुसरे पर लाल – पीले हो रहे हो !
ये ‘अकूत’ नोट वाले ‘मेंढक’ की तरह है यानी विषम परिस्थतियों में  हाइबरनेशन में चले जाते हैं . ये नई सरकार आने तक या इसी सरकार की नीति बदलने तक पुराने नोटों को दबा के रख सकते हैं . मज़े की बात ये है कि... बात नोट बदलने की थी तो उसके लिए ‘आपात कालीन’ घोषणा करने की क्या ज़रूरत थी? ये काम तो पहले भी होता रहा है और बैंक करते रहे हैं ! ‘अकूत नोट वालों के पास बेनामी या नामी कारें , बंगलो , फ्लैट , आदि सम्पति होती है उसका क्या? जब नोट बंद करने हैं तो 500 और 2000 के नोट पुनः जारी करने की क्या ज़रूरत है .क्योंकि ऐलान में तर्क दिया गया कि आज 500 और 1000 के नोट का उपयोग 85 प्रतिशत लेन  देन  में हो रहा है . अरे  भाई जान लेना मंहगाई में जहाँ 500 रूपये में दाल और दूध नहीं आता ..वहां 100 रूपये के नोट की क्या औकात ? और दो महीने के बाद 2000 के नोट रखने में ‘बक्से’ कम लगेगें ! सरकार को जब 500 और 1000 के नोट बंद करने थे तो हमेशा के लिए करने थे ..नए नोट ज़ारी करने की क्या ज़रूरत .. अपने ही तर्क को अपने आप सरकार ने खारिज कर दिया है नए 500 और 2000 के नोट जारी कर ! दरअसल ‘कुछ” लोग अर्थ व्यवस्था को ‘आयकर नियमों’ के आईने में  समझ रहे हैं . वो ये भूल गए हैं की ‘अर्थ व्यवस्था’ के व्यापक आयाम हैं और उसमें मनोविज्ञान एवम सामजिक संरचना भी अहम है .
असल बात ये है की बहुमत वाली सरकार के मुखिया ‘अल्प ज्ञान , सतही समझ , गैर समझ , आधी अधूरी समझ और जनता में फैले कनफूजन को बड़ी कुशलता से अपने राजनैतिक फायदे के लिए उपयोग करने में माहिर है . उसने देश भक्ति के नाम पर यही किया है . जैसे जनता में ये आम समझ है की जो पैसा बैंक में है वो सफेद .. और जो हाथ में है वो काला.. अब सारे आम नागरिकों ने अपने 500 और 1000 रुपये के नोटों को  बाकयदा धक्का मुक्की करके ..पसीना बहाकर .. घंटों लाइन में खड़े होकर बैंक से ‘सफेद’ कर लिया . देश वासियों ने बड़ा त्याग किया और बहुमत वाली सरकार के मुखिया ने छलावा ! बहुत जल्द यूपी की चुनाव सभा में ये कहा जाएगा  “ भाइयो , बहनों .. हमने काले धन को बदल दिया .. आप सब ने साथ दिया .. आप सब खुद शामिल हुए ... वैगहरा वैगहरा” जबकि हकीक़त में बदला ‘कुछ’ नहीं ! ये है जुमले बाज़ी !
अब थोडा बात करें की पैसा काला या सफेद नहीं होता .. वो घोषित या अघोषित होता है .. और जनता ये भी समझ ले की नकद पैसा भी सफेद है और बैंक में रखा भी ... क्योंकि एक योग को हथियाए बाबा ‘स्विस बैंक’ में जमा काले धन को लाने की बात कर रहे थे पिछले लोकसभा चुनाव में .. बैंक में भी होता है काला धन .. यानी सरकार के नियमों के अनुसार अघोषित पैसा .. चाहे  वो बैंक में हो या नकद हाथ में .. अब इस नव उदारवाद काल में जब स्वयं ‘विश्व बैंक” एक लुटेरे की तरह काम कर रहा हो .. हमारे अपने बैंक घाटे में चल रहे हों .. बैंकों से अरबो रूपये का  क़र्ज़ लेकर पूंजीपति सरकार के सामने विदेशों में फ़रार हो रहे हों तो क्या जनता को बैंकों पर विश्वास करना चाहिए ? क्या ‘जनता’ को ये बात नहीं समझनी चाहिए की ये सिर्फ राजनैतिक चालबाज़ी है और उसको परेशान करने का एक सरकारी मुखिया का आदेश ! 
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 लेखक का संक्षिप्त परिचय -

“थिएटर ऑफ रेलेवेंस” नाट्य सिद्धांत के सर्जक व प्रयोगकर्त्ता मंजुल भारद्वाज वह थिएटर शख्सियत हैं, जो राष्ट्रीय चुनौतियों को न सिर्फ स्वीकार करते हैं, बल्कि अपने रंग विचार "थिएटर आफ रेलेवेंस" के माध्यम से वह राष्ट्रीय एजेंडा भी तय करते हैं।
एक अभिनेता के रूप में उन्होंने 16000 से ज्यादा बार मंच से पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।लेखक-निर्देशक के तौर पर 28 से अधिक नाटकों का लेखन और निर्देशन किया है। फेसिलिटेटर के तौर पर इन्होंने राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर थियेटर ऑफ रेलेवेंस सिद्धांत के तहत 1000 से अधिक नाट्य कार्यशालाओं का संचालन किया है। वे रंगकर्म को जीवन की चुनौतियों के खिलाफ लड़ने वाला हथियार मानते हैं। मंजुल मुंबई में रहते हैं। उन्हें 09820391859 पर संपर्क किया जा सकता है।

Thursday, February 13, 2014

यह माध्‍यम पूँजीवादी व्‍यवस्‍था-विरोधी सजग चेतना में रूपांतरित हो जाने से रोकता है-----कविता कृष्‍णपल्‍लवी

सोशल मीडिया के बहाने जनता, विचारधारा और तकनोलॉजी के बारे में कुछ बातें

February 12, 2014 at 9:35pm
--कविता कृष्‍णपल्‍लवी

मार्क जुकरबर्ग ने फेसबुक ईजाद करके भूमण्‍डलीय मीडिया बाजार में एक इजारेदार पूँजीपति के रूप में अपनी जगह बना ली। लेकिन यह केवल मुनाफा कूटने का ही साधन नहीं है, बल्कि विश्‍व पूँजी के वैचारिक सांस्‍कृतिक वर्चस्‍व का भी एक प्रभावी औजार है। सोशल मीडिया को जनता का वैकल्पि‍क मीडिया समझना या सांस्‍कृतिक प्रति-वर्चस्‍व का औजार समझना एक भारी मुगालते में जीना है। हाँ, इस बुर्ज़ुआ संचार माध्‍यम के कुछ ऐसे अन्‍तरविरोधों का, कुछ ऐसी प्राविधिक विवशताओं का हम लाभ उठा सकते हैं, जो शासक वर्ग के पूर्ण नियंत्रण के एक हद तक बाहर हैं। यह लाभ भी तभी उठाया जा सकता है जब प्रगतिकामी, जनपक्षधर बौद्धिक जमातें वैचारिक रूप से काफी सजग हों और सोशल मीडिया को लेकर किसी प्रकार के विभ्रम की शिकार न हों। ध्‍यान रहे कि तब भी हम इसका एक हद तक ही इस्‍तेमाल कर सकते हैं, यह हमारा मीडिया कदापि नहीं हो सकता।


समाज की एक भारी मध्‍यवर्गीय आबादी इण्‍टरनेट-फेसबुक पर बैठी हुई सामाजिक जीवन के यथार्थ से बाहर एक आभासी यथार्थ में जीने का आदी हो जाती है। वह वस्‍तुत: भीषण सामाजिक अलगाव में जीती है, पर फेसबुक मित्रों का आभासी साहचर्य उसे इस अलगाव के पीड़ादायी अहसास से काफी हद तक निजात दिलाता है। बुर्ज़ुआ समाज की भेड़चाल में वैयक्तिक विशिष्‍टता की मान्‍यता का जो संकट होता है, पहचान-विहीनता या अजनबीपन  की जो पीड़ा होती है, उससे फेसबुक-साहचर्य, एक दूसरे को या उनके कृतित्‍व को सराहना, एक दूसरे के प्रति सरोकार दिखाना काफी हद तक राहत दिलाता है। यानी यह भी एक तरह के अफीम की भूमिका ही निभाता है। यह दर्द निवारक का काम करता है और एक नशे का काम करता है, पर दर्द की वास्‍तविक जड़ तक नहीं पहुँचाता। इस तरह अलगाव के विरुद्ध संघर्ष की हमारी सहज सामाजिक चेतना को यह माध्‍यम पूँजीवादी व्‍यवस्‍था-विरोधी सजग चेतना  में रूपांतरित हो जाने से रोकता है। साथ ही, फेसबुक, टि्वटर और सोशल मीडिया के ऐसे तमाम अंग-उपांग हमें आदतन अगम्‍भीर और काहिल और ठिठोलीबाज भी बनाते हैं।

 खुशमिजाजी अच्‍छी चीज है, पर बेहद अंधकारमय और चुनौतीपूर्ण समय में भी अक्‍सर चुहलबाजी के मूड में रहने वाले अगम्‍भीर लोग न केवल अपनी वैचारिक क्षमता, बल्कि अपनी संवेदनशीलता भी खोते चले जाते हैं। आभासी दुनिया में दिखायी जाने वाली खुशमिजाजी वास्‍तविक सामाजिक जीवन में यदि दिखायी जाये तो यह अलगाव के विरुद्ध एक नागरिक का असरदार प्रतिकार होगा। इसी सन्‍दर्भ में नोम चोम्‍स्‍की का यह कथन विशेष रूप से महत्‍वपूर्ण और सारगर्भित है कि ''जबतक लोग... एक दूसरे से कटे रहेंगे और गम्‍भीर आलोचनात्‍मक विचार-विमर्श पर ध्‍यान नहीं देंगे, तबतक (शासक वर्ग द्वारा) विचारों को नियंत्रित किया जाना सम्‍भव बना रहेगा।''


इसलिए मेरा विचार है कि जो राजनीतिक-सांस्‍कृतिक रूप से जागरूक व्‍यवस्‍था-विरोधी नागरिक हैं, उन्‍हें सोशल मीडिया के आभासी संसार को अपनी समस्‍त व्‍यक्तिगत आत्मिक-सांस्‍कृतिक गतिविधियों का मंच बनाने के बजाय केवल गम्‍भीर सामाजिक-सांस्‍कृतिक-राजनीतिक विचार-विमर्श, पूँजी तंत्र द्वारा पार्श्‍व भूमि में धकेल दी गयी निर्मम-विद्रूप यथार्थ के उदघाटन , विश्‍व पूँजीवादी सांस्‍कृतिक-वैचारिक मशीनरी द्वारा इतिहास के विकृतिकरण के भण्‍डाफोड़ तथा जीवन के सभी क्षेत्रों की पूँजीवादी वैचारिकी की समालोचना के लिए ही इस माध्‍यम का इस्‍तेमाल करना चाहिए।

जनता के जनवादी अधिकारों के मसले पर एकजुटता के लिए पारस्‍परिक संवाद के लिए इस मंच का इस्‍तेमाल किया जाना चाहिए। बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया के सभी अंगों-उपांगों का विज्ञान, तर्कणा और सही इतिहास बोध देने तथा जनता की कला-साहित्‍य-संस्‍कृति के प्रचार के लिए इस्‍तेमाल किया जाना चाहिए। फेसबुक के धोबीघाट पर ''वामपंथी घरों के गंदे कपड़े धोने'' का दिखावा करने वाले वास्‍तव में प्रगतिकामी लोग हैं, या प्रतिशोधी आत्‍मदंभी लोग हैं, या छद्मवेषी घुसपैठिये हैं, इस प्रश्‍न पर भी सोचना होगा। वैचारिक-दार्शनिक प्रश्‍नों पर मतभेद कोई गुप्‍त बात नहीं है, इन पर तीखी से तीखी बहसें हो सकती हैं। पर सांग‍ठनिक या व्‍यक्तिगत चर्चाएँ, अफवाहबाजी और तोहमतबाजी, गाली-गलौज -- यह सब फेसबुक-ब्‍लॉग के सार्वजनिक मंचों पर करने वाले लोगों की मंशा क्‍या है, मक़सद क्‍या है? राजनीतिक वाद-विवाद और व्‍यक्तिगत गाली-गलौज के बीच यदि हम अंतर नहीं कर पाते, तब तो वास्‍तव में हमारी मति मारी गयी है।


हम चाहे जितनी कुशलता से काम करें, सोशल मीडिया का जितना व्‍यापक इस्‍तेमाल पूँजी की ताकत से भाड़े के टट्टू खरीदकर हिंदुत्‍ववादी फासिस्‍ट कर सकते हैं, बुर्ज़ुआ पार्टियाँ कर सकती हैं, साम्राज्‍यवादी वित्‍त-पोषित एन.जी.ओ. सुधारवादी कर सकते हैं, उतना हम नहीं कर सकते। इस मंच पर हम उनसे पार नहीं पा सकते। प्रतिवर्चस्‍व का हमारा वैकल्पिक मंच अलग होगा। पर यदि दृष्टि, पहुँच और संकल्‍प की एकजुटता हो, तो इस मंच पर भी बुर्ज़ुआ प्रभाव की काफी प्रभावी काट की जा सकती है, इसका भी काफी इस्‍तेमाल किया जा सकता  है।


प्रगतिशील-जनपक्षधर बुद्धिजीवी वेबसाइट, ब्‍लॉग, फेसबुक, टि्वटर, ऑरकुट आदि-आदि  का इस्‍तेमाल करते हुए न केवल पूँजीवादी व्‍यवस्‍था का एक्‍सपोजर कर सकते हैं, न केवल ब्‍लैकआउट की गयी खबरों को सामने लाने और जनता के जनवादी अधिकार के मसलों को उठाने का काम कर सकते हैं, न केवल गम्‍भीर वैचारिक बहस और विचार-विमर्श कर सकते हैं, न केवल वैज्ञानिक जनपक्षधर दृष्टि से इतिहास और वर्तमान का विश्‍लेषण प्रस्‍तुत कर सकते हैं, बल्कि अपने सांस्‍कृतिक प्रतीकों, अपने महान पूर्वजों के उद्धरणों, प्रगतिशील कलात्‍मक-साहित्यिक-सांगीतिक कृतियों, चलचित्रों-वृत्‍तचित्रों आदि-आदि से इन मंचों को ज्‍यादा से ज्‍यादा पाटने की कोशिश कर सकते हैं, मित्रों का बड़ा से बड़ा दायरा बनाकर उनतक अपनी बातें पहुँचाने की कोशिश कर सकते हैं। यानी हमें इस आभासी दुनिया में ज्‍यादा से ज्‍यादा 'स्‍पेस' छेंकने की कोशिश करनी चाहिए।


कालांतर में इस तंत्र के नियामक और नियंत्रक तरह-तरह के तकनीकी छल नियोजन से भी जनपक्षधर प्रयासों को निष्‍प्रभावी बनाने या उनका गला घोंटने की कोशिश करेंगे। कुछ देशों का उदाहरण हमारे सामने है जहाँ आन्‍दोलनरत जनता ने सोशल मीडिया का जब ज्‍यादा प्रभावी इस्‍तेमाल किया तो शासक वर्ग ने वहाँ इस माध्‍यम को ही काफी हद तक पंगु बना दिया। गौरतलब है कि ये आन्‍दोलन स्‍वत:स्‍फूर्त उभार थे और शासक वर्ग तात्‍कालिक तौर पर परेशान होने के बावजूद यह भी समझ रहा था कि ये पूरी व्‍यवस्‍था को ध्‍वस्‍त करने वाली चुनौती नहीं है। जब ऐसी चुनौती उनके सामने होगी तो वे और प्रभावी ढंग से कदम उठायेंगे। लेकिन जब सारी जनता संगठित होकर उठ खड़ी होगी तो वह और भी रास्‍ते निकाल लेगी। जैसा कि ब्रेष्‍ट की एक प्रसिद्ध कविता का आशय है, मशीनें चाहे जितनी प्रभावी हों, चलाता उन्‍हें मनुष्‍य है। तकनोलॉजी चाहे जितनी प्रभावी और स्‍वचालित हो, वह मनुष्‍य के नियंत्रण में ही होती है। तकनोलॉजी का इस्‍तेमाल शासक वर्ग करता है, पर तकनोलॉजी व्‍यापक जाग्रत संगठित जनता को काबू नहीं कर सकती। और फिर जनता भी तो अपने संघर्ष में तकनोलॉजी का समांतर इस्‍तेमाल करती ही है! 

 बस यह ध्‍यान रहे कि जनता मुख्‍य ताकत है, तकनोलॉजी नहीं। और तकनोलॉजी भी हमेशा उसीतरह विचारधारा और राजनीति के मातहत होनी चाहिए, जैसे कि हथियार।  

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कल यह पोस्ट-"केजरीवाल के भ्रष्‍टाचार-विरोधी ''मुहिम'' पर गदगद कम्‍युनिस्‍ट मार्क्‍सवादी राजनीतिक अर्थशास्‍त्र का ककहरा भी नहीं जानते----कविता कृष्‍णपल्‍लवी" अपने 'साम्यवाद(COMMUNISM)' पर दी थी Jitendra Naruka नामक CPIM के एक साहब जो केजरीवाल के अंध-भक्त हैं को इतनी नागवार गुज़री की उन्होने षड्यंत्र पूर्वक उसे ब्लाक करवा दिया है। इससे पूर्व भी केजरीवाल समर्थक कम्युनिस्ट प्रदीप तिवारी,आनंद प्रकाश तिवारी और प्रेम शंकर पांडे ने इस ब्लाग को ब्लाक करवाया था। इस प्रक्रिया से कविता कृष्‍णपल्‍लवी जी का यह दृष्टिकोण कि यह सोशल मीडिया सिर्फ पूंजीवादी हितों का ही संरक्षक है और जनवादी बातों का प्रसार इसके द्वारा नहीं किया जा सकता। किन्तु खेदजनक बात यह है कि खुद को कम्युनिस्ट कहने वाले लोग केजरी/मोदी/मनमोहनी भक्ति के कारण जनहित के मुद्दों को प्रसारित होने से रोकते हैं।
 — withJitendra Raghuvanshi and 4 others.
  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Thursday, August 30, 2012

सीमा आज़ाद ,जनता और सच्चाई

            हिंदुस्तान ,लखनऊ,29 अगस्त 2002,पृष्ठ-08

"हमे पकड़ने के बाद तत्कालीन प्रदेश सरकार ने कथित माओवादी खात्मे के नाम पर आठ हजार करोड़ 

का पेकेज लिया "---सीमा आज़ाद 

"एक दो नहीं हमे लगता है कि सारे कानून काले हैं"---विश्वविजय (मानवाधिकार कार्यकर्ता और सीमा आज़ाद के पति)

"अनेक राज्यों मे आंदोलनों को कुचलने के लिए सेना का इस्तेमाल किया जाता है। सेना के  साथ  अगर हैं तो देश भक्त हैं ... अगर नहीं हैं तो राष्ट्र द्रोही । "---आलोचक वीरेंद्र यादव 

एक साक्षात्कार मे सीमा आज़ाद ने यह भी बताया -सरकारें जल-जंगल-जमीन हड़पने के लिए कानून बना रही हैं ,जिसका लोग कडा विरोध कर रहे हैं। उनका साथ हमारे जैसे सामाजिक कार्यकर्ता दे रहे हैं । ऐसे मे राज्य के खिलाफ माहौल बन रहा है। उस पर काउंटर करने के लिए राज्य आक्रामक हो रहा है और लोकतन्त्र की धज्जियां उड़ा रहा है। उन्होने यह भी बताया कि पहले राज्य आम लोगों के लिए कार्य करता था । अब उसकी पहली प्राथमिकता मे प्राकृतिक संसाधनों की लूट करने वाले कारपोरेट घराने हैं। इसमे रोड़ा बनने वालों को दबाने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं।

भुक्तभोगी जुझारू कार्यकर्ताओं एवं आलोचक-विश्लेषक विद्वान के उपरोक्त कथनों के संबंध मे यदि ऐतिहासिक विवेचन किया जाये तो हम पाते हैं कि 65 वर्ष पूर्व जब भारत वर्ष स्वाधीन हुआ था तो यहाँ सुई भी नहीं बनती थी और आज हमारे यहाँ वायु यान ही नही,अस्त्र-शस्त्र ही नहीं राकेट,मिसाईल,परमाणु बम तक बन रहे हैं। आज़ादी के बाद कल-कारखानों का विकास हुआ है। किन्तु जनता की सुख-सुविधाएं पहले से भी ज़्यादा घटी हैं।'आसमान से टपका -खजूर मे अटका' की तर्ज पर सम्पूर्ण विकास का लाभ कुछ चुनिन्दा लोगों तक ही सिमट कर रह गया है और शेष जनता वैसे ही त्राही-माम,त्राही-माम करने को विवश है। हमारी शासन व्यवस्था राजनीतिक रूप से लोकतान्त्रिक है परंतु जब शोषित -दमित जनता एक जुट होकर अपने अधिकारों की रक्षा की बात करती है तब चुनी हुई सरकारें ही भ्रष्ट-व्यापारियों,उद्योगपतियों,देशी-विदेशी निवेशकों,कारपोरेट घरानों के इशारे पर आम जनता का दमन करने हेतु पुलिस और सेना का सहारा लेती हैं। एक बहाना गढ़ लिया गया है माओवादी आतंकवाद का। सच्चाई यह है कि CIA अमेरिकी कारपोरेट हितों की रक्षा के लिए कुछ प्रशिक्षित आतंकवादियों को धन व शस्त्र मुहैया कराकर पुलिस व सेना पर आघात कराती है जिससे सरकारों को उनके सफाये के नाम पर गरीब असहाय जनता का दमन करने हेतु पुलिस व सेना का प्रयोग करना जायज ठहराया जा सके।

शोषक कारपोरेट घरानों का विरोध करने के कारण ही सीमा आज़ाद और उनके पति को ढाई वर्ष तक जेल मे बंद रखा गया और उनको आजीवन कैद की सजा सुना दी गई परंतु अलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसी माह की छह तारीख को निर्णय दिया कि विपरीत विचार रखने के कारण किसी को जेल मे नहीं रखा जा सकता और दोनों को जमानत पर रिहा कर दिया। ऐसे लगभग दस हजार कार्यकर्ता पूरे देश मे जेलों मे बंद हैं। क़ानूनों का खुला दुरुपयोग किया गया है और सभी मुकदमा लड़ते हुये हाई कोर्ट तक नहीं पहुँच पाते उनकी जिंदगी जेलों मे सड़ जाती है। बाकी लोग भय से चुप रह जाते हैं।

जल-जंगल-ज़मीनों की लूट मे एक दूसरा पहलू पर्यावरण का भी है उसकी भी अनदेखी की जा रही है। प्रकृति की निर्मम लूट का दुष्परिणाम मौसम पर भी पड़ता है जिससे फसलों को क्षति पहुँचती है। खाद्यान का आभाव हो जाता है और मुनाफाखोर व्यापारी जनता का और अधिक शोषण करते हैं। मुश्किल और मुसीबत यह है कि जनता को यह सब समझाये कौन?

जो लोग और पार्टियां जन-हितैषी हैं उनको एक भूत सवार है कि वे 'नास्तिक' हैं और 'धर्म' तथा 'भगवान' को नहीं मानते। दूसरी ओर सांप्रदायिक लोग (सांप्रदायिकता और साम्राज्यवाद सहोदरी हैं) धर्म की व्याख्या व्यापारियों -लुटेरों के हित मे प्रस्तुत करके उसी गरीब-शोषित जनता को उनके विरुद्ध कर देते हैं जो उनके हकों की लड़ाई लड़ रहे होते हैं। इसलिए भी माओवाद के नाम का सहारा लिया जाता है। 

फिर क्या हो?

होना यह चाहिए कि जनवादी शक्तियों को एकजुट होकर आम जनता को यह समझाना चाहिए कि 'धर्म' वह नही है जो ढ़ोंगी पोंगा-पंथी बता रहे हैं। बल्कि धर्म वह है जो शरीर को धारण करने हेतु आवश्यक है,जैसे-'सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।

भगवान कभी भी नस और नाड़ी के बंधन मे नहीं बधता है इसलिए वह भगवान या उसका अवतार नही है जिसे  पोंगापंथी लुटेरे बताते हैं। भ (भूमि-प्रथिवी )+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल) का समुच्य ही भगवान है और चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं किसी ने बनाए नहीं हैं इसलिए ये ही खुदा हैं। इंका काम प्राणी मात्र का सृजन,पालन  और संहार है =G(जेनरेट)+O (आपरेट)+D(डेसट्राय)  अतः ये ही GOD हैं।

समस्या की जड़ यहीं है कि 'मार्क्स भगवान' कह गए हैं कि man has created the GOD for his mental security only तब उनके अंध-भक्त मार्क्सवादी-साम्यवादी कैसे जनता को 'धर्म' और 'भगवान' की वास्तविकता समझाएँ?

जनता लुटती-पिटती रहेगी ,सीमा आज़ाद उनके पति विश्वविजय और हजारों निरीह कार्यकर्ता बेकसूर जेलों मे बंद किए जाते रहेंगे। सांप्रदायिक तत्व धर्म के नाम पर धोखा परोस कर व्यापारियों,उद्योगपतियों और कारपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाते रहेंगे। काश जनवादी-साम्यवादी-बामपंथी समय की पुकार को समझ सकें?

Thursday, January 5, 2012

विधानसभा चुनाव और बाम-पंथ


सन1942 ई .के भारत छोड़ो आंदोलन मे मात्र 17 वर्ष की आयु मे सक्रिय भाग लेने वाले ग्राम -कांकेरा,पोस्ट-अकबरपुर,जिला-मथुरा-281406 के मूल निवासी विजय आर्य सिद्धान्त शास्त्री जी आर्यप्रतिनिधि सभा से 26 वर्ष एक माह सम्बद्ध रह कर फिर स्वतंत्र रूप से स्वामी दयानन्द'सरस्वती' की नीतियों तथा उपदेशों के प्रचारक रहे हैं उनकी यह देश-भक्तिपूर्ण रचना आप भी देखें-


सुखदाई        सत         युग               लाना है। 
कलि         काल      कलंक        मिटाना      है। 
नित     प्रातः    प्रभु       गुण              गायें गे । 
सिर    मात -पिता        को                नायें  गे। 
शुचि संध्या यज्ञ रचाएंगे। सुंदर सुगंध फैलाएँगे। 
                                    दुर्गुण दुर्गंध मिटाना है। । 1 । । 


कुल क्रूर कुरीति तोड़ेंगे,पापों का भण्डा  फोड़ेंगे । 
सब दुष्कर्मों को छोड़ेंगे,सत कर्म से नाता जोड़ेंगे। 
                                  सबको यह पाठ पढ़ाना है। । 2 । । 


कभी मदिरा मांस न खाएँगे,फल फूल अन्न ही पाएंगे। 
भूले भी कुसंग न जाएँगे,मिल मेल मिलाप बढ़ाएँगे। 
                                   सत प्रेम की गंग बहाना है। । 3 । । 


जो निर्बल निर्धन भाई है,हरिजन मुस्लिम ईसाई है। 
इस देश के सभी सिपाही हैं,सब एक राह के राही है। 
                                    समता का सूर्य  उगाना है। । 4 । । 


वेदों  को पढ़ें पढ़ाएंगे ,यज्ञों को      करें   कराएंगे।  
ताप दान शील अपनाएँगे,ऋषियों के नियम निभाएंगे। 
                                   बन 'विजय' वीर दिखलाना है। । 5 । ।   


सर्व-प्रथम आचार्य श्री राम शर्मा ने गायत्री परिवार बना कर (जो अब उनके पुत्र और दामाद के बीच दान के बँटवारे को लेकर विवाद मे है) आर्यसमाज और इसके वेदिक सिद्धांतों पर जोरदार हमला बोला एवं पुनः ढोंग-पाखंड को चतुर्दिक फैला दिया। उसके बाद विभिन्न 'बापू' ,'स्वामी' आते गए और पाखंड का जैकारा लगवाते रहे। 1925 मे आर एस एस के गठन के बाद तो द्रुत गति से स्वामी दयानन्द के बताए मार्ग को ध्वस्त किया गया। इस सांप्रदायिक /साम्राज्यवादी/आलोकतांत्रिक संगठन ने 'आर्यसमाज' मे प्रबंध के स्तर पर भी घुस कर उसे मूल सिद्धांतों से भटका दिया। इसलिए हो सकता है कि कहीं-कहीं आर्यसमाज के मंच से आर एस एस ने अपनी बात कहला दी हो । लेकिन क्यों?स्वामी सहजानन्द 'सरस्वती' और गेंदा लाल दीक्षित सरीखे वरिष्ठ आर्यसमजी नेता जहां क्रांतिकारी कम्युनिस्ट रहे हों वहाँ कम्युनिस्टों का आर्यसमाज को समर्थन न देना ही आर एस एस के लिए मैदान खुला छोड़ देने के कारण ही तो। सी पी एम ,पश्चिम बंगाल से संबन्धित एक विद्वान खुल कर ढ़ोंगी -पाखंडी लोगों का समर्थन और आर्यसमाज तथा स्वामी दयानन्द की नाहक निंदा करते हैं-

मुरारीबापू की कथा में अनेक ऐसी बातें आती हैं जो समानतावादी और विवेकपूर्ण विमर्श को बढ़ावा देती हैं। कायदे से मुरारीबापू को मासकल्चर के अंग के रूप में पढ़ें,वे मासकल्चर के अंग के रूप में भारतीय पाठ बना रहे हैं। मुरारीबापू का मानना है विवेक चार प्रकार से मिलता है। 



एक जमाने में दयानन्द सरस्वती और आर्यसमाज ने मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति तीखी नफरत का इजहार किया था। वे इन दोनों को राष्ट्रीय एकीकरण का हिस्सा नहीं मानते थे। भारत में राष्ट्रीय एकीकरण में अल्पसंख्यकों को रखना होगा। विकास में भी उन्हें शामिल करना होगा। वरना समाज अपंग बनेगा।भाजपा को अपनी अल्पसंख्यक विरोधी भावनाओं को त्यागकर राष्ट्रीय एकता के निर्माण में सहयोग करना चाहिए।







पुराण की एक कथा है। देवताओं को पता लगा कि पृथ्वीलोक में सहजानंद नामक एक ऐसे अनूठे साधक रहते हैं, जो भक्ति साधना में कुछ समय लगाने के बाद अधिकांश समय लोगों की सेवा करने, बीमारों का उपचार करने, बच्चों को शिक्षा देने जैसे परोपकार के काम में बिताते हैं। राग, द्वेष, लोभ, अहंकार, आसक्ति जैसे दुर्गुण उन्हें छू भी नहीं पाए हैं। 


लाउडस्पीकरसे आवाजें घर पर सुनायी दे रहीं थीं एक वेद-प्रचारक महोदय गा रहे थे-

(यह भजन पिछले वर्ष हमारे घर के समीप हो रहे एक आर्यसमजी कार्यक्रम मे जनता को सुनाया गया था,जिसका अर्थ है कि अभी भी आर्यसमाज मे वास्तविक 'सत्य' बोलने वाले लोग हैं)


दौलत के दीवानों उस दिन को पहचानों ;
जिस दिन दुनिया से खाली हाथ चलोगे..
चले दरबार चलोगे....
ऊंचे-ऊंचे महल अटारे एक दिन छूट जायेंगे सारे ;
सोने-चांदी तुम्हारे बक्सों में धरे रह जायेंगे...
जिस दिन दुनिया से खाली हाथ चलोगे...
चले दरबार चलोगे.......
दो गज कपडा तन की लाज बचायेगा ;
बाकी सब यहाँ पड़ा रह जाएगा......
चार के कन्धों पर चलोगे..
.चले दरबार चलोगे......
पत्थर की पूजा न छोडी-प्यार से नाता तोड़ दिया...
मंदिर जाना न छोड़ा -माता-पिता से नाता तोड़ दिया...
बेटे ने बूढ़ी माता से नाता तोड़ दिया ;
किसी ने बूढ़े पिता का सिर फोड़ दिया....
पत्थर की पूजा न छोडी ;मंदिर जाना न छोड़ा....
दया धर्म कर्म के रिश्ते छूट रहे;
माता-पिता से नाता छोड़ दिया....
उल्टी सीधी वाणी बोलकर दिल तोड़ दिया;
बूढ़ी माता से नाता तोड़ दिया.....
पत्थर की पूजा न छोडी मंदिर जाना न छोड़ा 
बूढ़ी माँ का दिल तोड़ दिया.....
वे क्या जाने जिसने प्रभु गुण गाया नहीं ;
वेद-शास्त्रों से जिसका नाता नहीं..
जिसने घर हवन कराया नहीं...
गुरुडम में फंस कर जिसने सत्य से मुंह मोड़ लिया ;
पाखण्ड को ओढ़ लिया ...
इसी कारण भारत देश गुलाम हुआ ...
भाई-भाई का आपस में घोर संग्राम हुआ ;
मंदिर ..मस्जिद तोड़े संग्राम हुआ.....
बुत परस्ती में लगा हुआ देश बुरी तरह गुलाम हुआ ;
देश मेरा बदनाम हुआ.....

कानों में आवाजें आ रहीं थीं कागज पर उतारा और आपको लिख दिया ;लेकिन सब बेकार है .हमारे फेसबुक / ब्लाग जगत में जहाँ सभी बुद्धीजीवी है -  पाखंड छोड़ने को तैयार नहीं तो आम जनता तो अबोध  है उससे क्या उम्मीद की जाये?


मेरठ सी पी एम से संबन्धित एक ब्लागर साहब तो मेरे पाखंड/ढोंग पर प्रहार का उपहास उड़ाने मे ही गर्व का अनुभव करते हैं जिस प्रकार कि,'गर्व से हिन्दू'होने का खुला ऐलान करने वाला सरकारी विभाग रेलवे का भ्रष्ट सर्जन। हालांकि खुलासा होने के बाद अब उस डॉ ने अपने प्रोफाईल से-'हिन्दी,हिन्दू,हिंदुस्तान'का स्लोगन हटा लिया है और इसी नाम का एक अलग ब्लाग खोल लिया है। एक तरफ सी पी एम यू पी मे चार दलों के बाम मोर्चा मे भी शामिल है दूसरी तरफ सी पी एम के लोग भाजपा/अन्ना के सर्वाधिकारवादी लोकपाल का भी समर्थन कर रहे हैं। 


आगामी माह होने वाले चुनावों मे यदि बाम मोर्चा को यू पी मे जनता के बीच अपनी स्थिति सुदृढ़ करनी है तो सन्त कबीर,स्वामी दयानन्द सरस्वती और स्वामी विवेकानंद के विचारों और दृष्टिकोण का सहारा लेकर ही भाजपा/ आर एस एस के मंसूबों को ध्वस्त किया जा सकता है। अब तक प्रचलित नीति का परिणाम यह हुआ है कि भाजपा आदि प्रतिगामी शक्तियाँ पूर्वज महापुरुषों के वचनों को तोड़-मरोड़ कर गलत-सलत व्याख्या प्रस्तुत करके जनता को मूर्ख बनाने मे कामयाब हो जाते हैं। उनके लिए धर्म का मैदान खुला छोडने की नीति ही वह मुख्य कारण है कि वे गलत होते हुये भी सफल रहते हैं और जनता का भारी अहित होता रहता है। 


संसदीय लोकतन्त्र मे धर्म (गलत रूप मे प्रचलित),जाति,संप्रदाय के नाम पर मतदाताओं को बहका कर पूंजीवादी दल बहुमत हासिल कर लेते हैं। कम्युनिस्ट पार्टियां और बाम-पंथी दल भी उसी गलत प्रचलित स्वरूप को धर्म मानने के कारण धर्म का विरोध करके जनता से कट जाते हैं और जनता का वोट हासिल नहीं कर पाते हैं। यदि 'धर्म' की वास्तविक व्याख्या प्रस्तुत कर महापुरुषों के हवाले से जनता को समझाया जाए तो ढोंगियों की पोल खुल सकेगी और वे विफल हो जाएँगे। परंतु दिग्गज बाम-पंथी पुराणो और ढोंगियों का समर्थन व्यक्त करके क्या भाजपा के ही मंसूबों को नहीं पूरा कर रहे हैं?


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भाकपा ने प्रत्याशियों की दूसरी सूची जारी की

अगली विधान सभा में मजबूत उपस्थिति दर्ज करेगी भाकपा
लखनऊ 5 जनवरी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने विधान सभा चुनावों के लिये आज अपनी दूसरी सूची जारी कर दी है। इससे पहले भाकपा 30 सीटों पर प्रत्याशियों की सूची जारी कर चुकी है। इस तरह भाकपा अब तक कुल 45 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर चुकी है। भाकपा अपनी अगली सूची शीघ्र ही जारी करेगी।
सूची जारी करते हुए भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने बताया कि भाकपा प्रदेश में चारों वामपंथी दलों के साथ मिलकर चुनाव मैदान में उतर रही है। इसके अलावा धर्मनिरपेक्ष, जातिनिरपेक्ष, प्रगतिशील एवं जनवादी कई अन्य पार्टियों से चुनावी तालमेल की कोशिशें जारी हैं।
भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा है कि भाकपा प्रदेश में एक संवेदनशील, संघर्षशील एवं सशक्त वामपंथी विकल्प को आगे बढ़ाने के काम में जुटी है। वह महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, शिक्षा के बाजारीकरण, भूमि अधिग्रहण और कानून-व्यवस्था के सवाल पर केन्द्र एवं राज्य सरकारों को बेनकाब करने के प्रयासों में जुटी रही है। इसके अलावा भाकपा सत्तालोलुप जातिवादी एवं सम्प्रदायवादी पार्टियों के मंसूबों को भी जनता के सामने बेनकाब करती रही है।
भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदेश की आम जनता में व्याप्त व्यापक चेतना के कारण आम जनता में वामपंथ के प्रति रूझान है और इस राजनैतिक वातावरण में निश्चय ही भाकपा और वामपंथ अगली विधान सभा में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करेंगे, इस दृढ़ विश्वास के साथ भाकपा चुनाव मैदान में उतर रही है।


भाकपा द्वारा जारी दूसरी सूची
1 -    पड़रौना                                   सगीर अहमद
2 -    गौरा                                       मसीहुद्दीन चौधरी
3 -    मेहनौन                                  श्रीमती मीनू वर्मा
4 -    महाराजगंज (सुरक्षित)            राम केवल पासवान
5 -    उतरौला                                  धर्मेन्द्र कुमार मिश्र
6 -    जहूराबाद                                शमीम अहमद
7 -    खागा                                      राम राज एडवोकेट
8 -    हुसैनगंज                                राकेश कुमार प्रजापति
9 -    बांगरमऊ                               राज बहादुर त्रिवेदी
10 -    ओबरा                                 सर्वचन्द पाण्डेय
11 -    अयोध्या                              अशोक तिवारी
12 -    फूलपुर                                इम्तियाज बेग
13 -    लालगंज (सुरक्षित)              उमेश चौधरी
14 -    आज़मगढ़ सदर                   जमील आज़मी
15 -    बबेरू                                   श्रीमती गीता सागर


Friday, December 9, 2011

सन 2011 की राष्ट्रीय त्रासदी

हिंदुस्तान,लखनऊ,19-08-2011 

हिंदुस्तान,लखनऊ,05 -12-2011 

हिंदुस्तान,लखनऊ,19-08-2011 
हिंदुस्तान,लखनऊ 05 दिसंबर 2011 के अंक मे दिल्ली मे 04 दिसंबर 2011,रविवार को  अन्ना टीम की केजरीवाल/किरण बेदी द्वारा निकाली वाहन रैली का  फोटो छ्पा है। इसमे स्पष्ट रूप से दिखाया गया है कि भागीदार 'राष्ट्र ध्वज'लेकर जुलूस निकाल रहे हैं।

स्वाधीनता दिवस -15 अगस्त,गणतन्त्र दिवस -26 जनवरी और गांधी जयंती -02 अक्तूबर को राष्ट्र ध्वज सार्वजनिक रूप से सभी जगह फहराया जा सकता है। शेष दिनों मे केवल सरकारी कार्यालयों मे ही राष्ट्र ध्वज फहराया जा सकता है। राष्ट्र ध्वज लेकर आंदोलन करना राष्ट्र द्रोह है जिसके लिए आंदोलनकारियों के विरुद्ध 'राष्ट्रध्वज का अपमान' करने के नियम के अंतर्गत कारवाई होनी चाहिए। परंतु अन्ना टीम शुरू से ही राष्ट्र ध्वज का अपमान करती आ रही है और कोई कारवाई न किया जाना इसमे सरकारी मिली-भगत के षड्यंत्र की ओर इंगित करता है।

अन्ना आंदोलन अमेरिकी प्रशासन,अमेरिकी व भारतीय कारपोरेट घरानों के हित मे कांग्रेस के मनमोहन गुट के समर्थन से चल रहा है और आर एस एस का भी इसे खुला समर्थन है।

अमेरिका मे जार्ज वाशिंगटन ने कहा था- जो कोई अमेरिकन राष्ट्र ध्वज का अपमान करे उसे तत्काल गोली मार दो। (Who hail the American Flag shoot him at the spot ) और भारत मे खुलमखुल्ला राष्ट्र ध्वज का अपमान हो रहा है और अपराधी सिर-माथे पर बैठाये जा रहे हैं,क्यों?
निम्नाकिंत स्कैन देख कर आपको सच्चाई का आभास हो जाएगा। 

जिस अमेरिकी सरकार से वहाँ के नागरिक असंतुष्ट हैं और अपने देश के कारपोरेट घरानों की लूट के विरुद्ध 'आकुपाई वाल स्ट्रीट' आंदोलन एक लंबे अरसे से चला रहे हैं। उनकी देखा-देखी यूरोप के दूसरे देशों मे भी कारपोरेट अत्याचार के विरुद्ध आंदोलन चल रहे हैं। लेकिन हमारा देश जो 'भूतपूर्व विश्व गुरु ' है उल्टी गंगा बहाये जा रहा है। हमारे यहाँ प्रबुद्ध लोग 'कारपोरेट घरानों 'के आव्हान पर उनके हितों की रक्षा के लिए जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़  कर 'अन्ना आंदोलन' मे जोत रहे हैं। अपनी रोजी-रोटी,भूख-प्यास,बेरोजगारी,असमानता,शोषण,लूट,उत्पीड़न,अत्याचार आदि मूलभूत समस्याओं को न उठा कर भोली जनता दीवानों की तरह कारपोरेट-भक्त 'अन्ना-टीम' के पीछे भटक रही है। 


सरकारी अधिकारी भी अपने-अपने ब्लाग्स और फेसबुक स्टेटस द्वारा 'अन्ना आंदोलन' का समर्थन कर रहे हैं। वस्तुतः IAS अधिकारियों ने अपनी-अपनी पत्नियों के नाम पर NGOs गठित कर रखे हैं जिनके जरिये सरकारी अनुदान हड़प कर जाते हैं साथ ही विदेशी कंपनियों को अनुग्रहीत करने के बदले 'दान' या 'चन्दा' भी झटक लेते हैं। समस्त NGOs ने अपनी ताकत 'अन्ना आंदोलन' के समर्थन मे झोंक रखी है और वे 'लोकपाल' से NGOs को अलग रखने की मुहिम चला रहे हैं। अन्ना-आंदोलन चाहता है कि सरकारी अधिकारी और उनकी पत्नियों के NGOs के  भ्रष्टाचार को कारपोरेट भ्रष्टाचार के साथ ही बचाए रखा जाये तथा निम्न पदों के कर्मचारियों को 'लोकपाल' के डंडे के सहारे 'आतंकित' रखा जाये। अनपढ़ लोग तो 'अज्ञान'के कारण अन्ना की आंधी मे बह रहे हैं लेकिन 'इंटरनेटी विद्वान' क्यों अन्ना के अंध-भक्त बने हुये हैं?क्या उनमे अपने देश के प्रति कुछ भी स्वाभिमान नहीं बचा है?लगता ऐसा ही है और यही सन 2011 की सबसे बड़ी 'राष्ट्रीय त्रासदी' है। भावी इतिहास आज की पीढ़ी को कभी छमा नहीं करेगा। 


कृपया इस लिंक को अवश्य देखें-
http://jantakapaksh.blogspot.com/2011/12/blog-post_14.html