काउन्टकीरो का नाम किसी पहचान का मोहताज नहीं है.पाश्चात्य जगत में हस्तरेखा शास्त्र का महत्त्व प्रतिपादित करने में इस महान आत्मा का विशेष योगदान है.CHIRO वस्तुतः यूनानी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है-हाथ.यूरोप जहाँ ज्योतिष को पहले ढोंग समझा जाता था काउन्ट कीरो द्वारा की गई और सच निकली भविष्यवाणियों के कारण ही ज्योतिष को मान्यता दे सका .विपरीत पर्यावरण में जन्म होने के बावजूद काउन्ट कीरो एक सफल हस्तरेखाविद कैसे बन गए,आईये इस बात पर गौर करें. उनकी जन्मपत्री से स्पष्ट होता है कि कीरो के दशम भाव में पूर्ण बलवान चंद्रमा की उपस्थिति के कारण 'गजपति योग'निर्मित हो रहा है,ऐसा योग रखने वाला व्यक्ति ऐश्वर्य संपन्न,धनीऔर सुखी होता है.शुक्र ग्रह ज्योतिष का मुख्य कारक ग्रह होता है जो कीरो की कुंडली में लग्न में बुध के साथ विद्यमान है.यह योग कीरो को प्रबल ज्योतिषी बना रहा है.अपने पूर्व जन्म के संस्कारों के कारण कीरो ज्योतिष के गूढ़ सिद्धांतों को समझने में सफल रहे,तृतीय भावगत ब्रहस्पति ने उन्हें उदार व सहिष्णु बनाया जिस कारण विरोध के बावजूद अपने सिद्धांतों पर अडिग रह कर वह हस्तरेखा शास्त्र में कीर्तिमान सफलता प्राप्त कर सके .काउन्ट कीरो ने शुक्र वलय को 'प्रेम की मेखला'संज्ञा दी है यह रेखा हथेली में अनामिका और मध्यमा को अर्द्ध चंद्राकार घेरे हुए होती है और चूंकि यह हथेली में मस्तिष्क रेखा के ऊपरी भाग में होती है इसलिए कीरो इसे मानसिक पक्ष से सम्बंधित मानते हैं उनके अनुसार ऐसी रेखा रखने वाले लोग शारीरिक रूप से उतने कामुक (SEXY)नहीं भी हो सकते जितने कि मानसिक रूप से होते हैं.ऐसी रेखा रखने वाले सेक्स मामलों में रूचि रखते हैं और उन्हें इसमें आनंद भी आता है.परन्तु कीरो का विचार है कि यदि ऐसा व्यक्ति प्रेम में असफल रहा हो तो आत्म-हत्या भी कर सकता है.परन्तु डा.नारायण दत्त श्रीमाली का दृष्टिकोण है कि ऐसा शुक्र-वलय रखने वाले लोग उतावले और कामुक होते हैं परन्तु वे अपनी कामुकता को छिपाने में माहिर भी होते हैं.कारण कि ऐसे लोग चतुर प्रेमी के साथ-साथ वार्तालाप करने में माहिर भी होते हैं.जहाँ कीरो का मत है कि,प्रेम में असफल रहने पर ऐसे लोग आत्महत्या भी कर सकते हैं वहीं डा.श्रीमाली का मत है कि प्रेम में असफल रहने पर ऐसे लोग धार्मिक लबादा ओढ़ लेते हैं और धार्मिकता का ढोंग करते हैं.यदि शुक्र वलय के साथ-साथ शुक्र पर्वत उन्नत्त हो और समानांतर विवाह रेखाएं भी हों तो ऐसे लोग प्रेम के क्षेत्र में सफलता भी प्राप्त कर सकते हैं और समाज में अपनी मर्यादा भी सुरक्षित रखने में सफल हो सकते हैं.कीरो महान हस्तरेखा विद थे उनकी चेतावनी को अर्थ हीन न समझना चाहिए और ऐसी रेखाएं रखने वालों को असफलता से बचना चाहिए.
Saturday, May 21, 2011
Tuesday, May 17, 2011
फांसी और आतंकवाद
२६ नवम्बर २००८ को मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमले में जीवित बचे एकमात्र आतंकवादी अजमल कसाब को अदालत द्वारा फांसी की सजा सूना दी गई है.कानूनी प्रक्रिया में जो भी समय लगे और जब भी कसाब को फांसी पर चढ़ाया जाए;उसका वास्तविक लाभ तभी मिल सकता है जब आतंवाद पूर्णतया :समाप्त हो जाए.प्रसिद्द कूट्नीतिग्य जी.पार्थ सारथी का अभिमत है कि कसाब को फांसी देने के बाद आतंकवाद को समाप्त नहीं किया जा सकता है.क्योंकि असली मुलजिम कहीं और सुरक्षित बचे रहेंगे.उनसे असहमत नहीं हुआ जा सकता है.यही सच्चाई भी है.आतंकवाद कैसे समाप्त होगा इस पर चर्चा करने स पहले यह जांच करना जरूरी है कि आतंकवाद है क्या?
भय फैला कर दहशत उत्पन्न कर किसी व्यक्ति ,समाज या देश को विविध प्रकार से संकट में फंसाए रखने की कला (आर्ट )ही आतंक है.और जो व्यक्ति,संस्था या देश इस कला को अपना कर अपना उद्देश्य पूरा करना चाहते हैं -वे सभी आतंकवादी हैं.आतंकवाद न कोई जाती है और न ही कोई धर्म या सम्प्रदाय .यह तो साम्राज्यवाद का हित-पोषक है.अतः आतंकवाद को साम्राज्यवाद की संतान मानना और तदनरूप इसके साथ व्यवहार करना भी उचित होगा.
यूं.एस.ए.एक प्रमुख साम्राज्यवादी देश है.हालांकि इसका जन्म साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष में सफलता द्वारा ही हुआ था.पूर्ववर्ती साम्राज्यवादी देशों में प्रमुख देश ब्रिटेन,फ्रांस,जर्मनी और इटली आज अमेरिकी साम्राज्यवाद के सहयोगी हैं.ब्रिटेन के साम्राज्य से स्वतन्त्र सभी देशों में चाहे वे बर्मा हो,भारत,पाकिस्तान या श्रीलंका.सभी आतंकवाद से त्रस्त देश हैं.सभी देशों की प्रगति व उन्नत्ति इन आतंकवादी गतिविधियों से बाधित हो रही है क्योंकि साम्राज्यवादी देश कभी नहीं चाहते हैं कि ये देश स्वतन्त्र रूप से विकसित हो सकें.साम्राज्यवादी देश एक और तो आतंकवाद को प्रश्रय देते हैं और दूसरी ओर आतंकवाद को नष्ट करने के नाम पर इन देशों की सरकारों को अपने चंगुल में फंसाये रखने हेतु सहायता भी देते हैं.
भय फैला कर दहशत उत्पन्न कर किसी व्यक्ति ,समाज या देश को विविध प्रकार से संकट में फंसाए रखने की कला (आर्ट )ही आतंक है.और जो व्यक्ति,संस्था या देश इस कला को अपना कर अपना उद्देश्य पूरा करना चाहते हैं -वे सभी आतंकवादी हैं.आतंकवाद न कोई जाती है और न ही कोई धर्म या सम्प्रदाय .यह तो साम्राज्यवाद का हित-पोषक है.अतः आतंकवाद को साम्राज्यवाद की संतान मानना और तदनरूप इसके साथ व्यवहार करना भी उचित होगा.
यूं.एस.ए.एक प्रमुख साम्राज्यवादी देश है.हालांकि इसका जन्म साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष में सफलता द्वारा ही हुआ था.पूर्ववर्ती साम्राज्यवादी देशों में प्रमुख देश ब्रिटेन,फ्रांस,जर्मनी और इटली आज अमेरिकी साम्राज्यवाद के सहयोगी हैं.ब्रिटेन के साम्राज्य से स्वतन्त्र सभी देशों में चाहे वे बर्मा हो,भारत,पाकिस्तान या श्रीलंका.सभी आतंकवाद से त्रस्त देश हैं.सभी देशों की प्रगति व उन्नत्ति इन आतंकवादी गतिविधियों से बाधित हो रही है क्योंकि साम्राज्यवादी देश कभी नहीं चाहते हैं कि ये देश स्वतन्त्र रूप से विकसित हो सकें.साम्राज्यवादी देश एक और तो आतंकवाद को प्रश्रय देते हैं और दूसरी ओर आतंकवाद को नष्ट करने के नाम पर इन देशों की सरकारों को अपने चंगुल में फंसाये रखने हेतु सहायता भी देते हैं.
Saturday, May 14, 2011
भारत में कम्युनिज्म कैसे कामयाब हो ? ------ विजय राजबली माथुर
वैदिक मत के अनुसार मानव कौन ?
त्याग-तपस्या से पवित्र -परिपुष्ट हुआ जिसका 'तन'है,
भद्र भावना-भरा स्नेह-संयुक्त शुद्ध जिसका 'मन'है.
होता व्यय नित-प्रति पर -हित में,जिसका शुची संचित 'धन'है,
वही श्रेष्ठ -सच्चा 'मानव'है,धन्य उसी का 'जीवन' है.
इसी को आधार मान कर महर्षि कार्ल मार्क्स द्वारा साम्यवाद का वह सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया जिसमें मानव द्वारा मानव के शोषण को समाप्त करने का मन्त्र बताया गया है. वस्तुतः मैक्स मूलर सा : हमारे देश से जो संस्कृत की मूल -पांडुलिपियाँ ले गए थे और उनके जर्मन अनुवाद में जिनका जिक्र था महर्षि कार्ल मार्क्स ने उनके गहन अध्ययन से जो निष्कर्ष निकाले थे उन्हें 'दास कैपिटल' में लिपिबद्ध किया था और यही ग्रन्थ सम्पूर्ण विश्व में कम्यूनिज्म का आधिकारिक स्त्रोत है.स्वंय मार्क्स महोदय ने इन सिद्धांतों को देश-काल-परिस्थिति के अनुसार लागू करने की बात कही है ;परन्तु दुर्भाग्य से हमारे देश में इन्हें लागू करते समय इस देश की परिस्थितियों को नजर-अंदाज कर दिया गया जिसका यह दुष्परिणाम है कि हमारे देश में कम्यूनिज्म को विदेशी अवधारणा मान कर उसके सम्बन्ध में दुष्प्रचार किया गया और धर्म-भीरु जनता के बीच इसे धर्म-विरोधी सिद्ध किया जाता है.जबकि धर्म के तथा-कथित ठेकेदार खुद ही अधार्मिक हैं परन्तु हमारे कम्यूनिस्ट साथी इस बात को कहते एवं बताते नहीं हैं.नतीजतन जनता गुमराह होती एवं भटकती रहती है तथा अधार्मिक एवं शोषक-उत्पीडक लोग कामयाब हो जाते हैं.आजादी के ६३ वर्ष एवं कम्यूनिस्ट आंदोलन की स्थापना के ८६ वर्ष बाद भी सही एवं वास्तविक स्थिति जनता के समक्ष न आ सकी है.मैंने अपने इस ब्लॉग 'क्रान्तिस्वर' के माध्यम से ढोंग,पाखण्ड एवं अधार्मिकता का पर्दाफ़ाश करने का अभियान चला रखा है जिस पर आर.एस.एस.से सम्बंधित लोग तीखा प्रहार करते हैं परन्तु एक भी बामपंथी या कम्यूनिस्ट साथी ने उसका समर्थन करना अपना कर्तव्य नहीं समझा है.'अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता' परन्तु कवीन्द्र रवीन्द्र के 'एक्ला चलो रे ' के तहत मैं लगातार लोगों के समक्ष सच्चाई लाने का प्रयास कर रहा हूँ -'दंतेवाडा त्रासदी समाधान क्या है?','क्रांतिकारी राम','रावण-वध एक पूर्व निर्धारित योजना','सीता का विद्रोह','सीता की कूटनीति का कमाल','सर्वे भवन्तु सुखिनः','पं.बंगाल के बंधुओं से एक बे पर की उड़ान','समाजवाद और वैदिक मत','पूजा क्या?क्यों?कैसे?','प्रलय की भविष्यवाणी झूठी है -यह दुनिया अनूठी है' ,समाजवाद और महर्षि कार्लमार्क्स,१८५७ की प्रथम क्रान्ति आदि अनेक लेख मैंने वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित अभिमत के अनुसार प्रस्तुत किये हैं जो संतों एवं अनुभवी विद्वानों के वचनों पर आधारित हैं.
मेरा विचार है कि अब समय आ गया है जब भारतीय कम्यूनिस्टों को भारतीय सन्दर्भों के साथ जनता के समक्ष आना चाहिए और बताना चाहिए कि धर्म वह नहीं है जिसमें जनता को उलझा कर उसका शोषण पुख्ता किया जाता है बल्कि वास्तविक धर्म वह है जो वैदिक मतानुसार जीवन-यापन के वही सिद्धांत बताता है जो कम्यूनिज्म का मूलाधार हैं.कविवर नन्द लाल जी यही कहते हैं :-
जिस नर में आत्मिक शक्ति है ,वह शीश झुकाना क्या जाने?
जिस दिल में ईश्वर भक्ति है वह पाप कमाना क्या जाने?
माँ -बाप की सेवा करते हैं ,उनके दुखों को हरते हैं.
वह मथुरा,काशी,हरिद्वार,वृन्दावन जाना क्या जाने?
दो काल करें संध्या व हवन,नित सत्संग में जो जाते हैं.
भगवान् का है विशवास जिन्हें दुःख में घबराना क्या जानें?
जो खेला है तलवारों से और अग्नि के अंगारों से .
रण- भूमि में पीछे जा के वह कदम हटाना क्या जानें?
हो कर्मवीर और धर्मवीर वेदों का पढने वाला हो .
वह निर्बल दुखिया बच्चों पर तलवार चलाना क्या जाने?
मन मंदिर में भगवान् बसा जो उसकी पूजा करता है.
मंदिर के देवता पर जाकर वह फूल चढ़ाना क्या जानें?
जिसका अच्छा आचार नहीं और धर्म से जिसको प्यार नहीं.
जिसका सच्चा व्यवहार नहीं 'नन्दलाल' का गाना क्या जानें?
संत कबीर आदि दयानंद सरस्वती,विवेकानंद आदि महा पुरुषों ने धर्म की विकृतियों तथा पाखंड का जो पर्दाफ़ाश किया है उनका सहारा लेकर भारतीय कम्यूनिस्टों को जनता के समक्ष जाना चाहिए तभी अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति और जनता का शोषण समाप्त किया जा सकता है.दरअसल भारतीय वांग्मय में ही कम्यूनिज्म सफल हो सकता है ,यूरोपीय वांग्मय में इसकी विफलता का कारण भी लागू करने की गलत पद्धतियाँ ही थीं.सम्पूर्ण वैदिक मत और हमारे अर्वाचीन पूर्वजों के इतिहास में कम्यूनिस्ट अवधारणा सहजता से देखी जा सकती है -हमें उसी का आश्रय लेना होगा तभी हम सफल हो सकते हैं -भविष्य तो उज्जवल है बस उसे सही ढंग से कहने की जरूरत भर है.
Tuesday, May 10, 2011
१८५७ की प्रथम क्रान्ति ------ विजय राजबली माथुर
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| Photo:Google search |
आज हमारे स्वाधीनता के प्रथम समर को हुए १५४ वर्ष व्यतीत हो गए हैं और आज इसकी १५५ वीं वर्षगाँठ है परन्तु सरकारी या अखबारी स्तर पर इसे मनाने की कोई हलचल नहीं है.क्रांतिकारियों के बलिदान से आज की या आने वाली पीढी को परिचित करने की कोई पहल नहीं है.सब अपने-अपने में मस्त हैं.अंग्रेजों ने जान-बूझ कर इस क्रांतिकारी आन्दोलन को सिपाही विद्रोह की संज्ञा दी थी.सन १९५७ ई. में इस क्रान्ति की सौंवीं वर्षगाँठ के अवसर पर किसी अखबार में एक कविता निकली थी जो हमें किसी मसाले की पुडिया में मिली थी. मेरी माता जी ने मेरे लगाव को देखते हुए वह पुर्जा मुझे दे दिया था -वह तो अब सुरक्षित नहीं है ,परन्तु मेरी कापी में उसकी नक़ल आज भी मौजूद है ,आप सब की सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूँ:-
हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा |
पाक वतन है कौम का, जन्नत से भी प्यारा ||
ये है हमारी मिल्कियत, हिंदुस्तान हमारा |
इसकी रूहानियत से, रोशन है जग सारा ||
कितनी कदीम, कितनी नईम, सब दुनिया से न्यारा |
करती है जरखेज जिसे, गंगो-जमुन की धारा ||
ऊपर बर्फीला पर्वत पहरेदार हमारा |
नीचे साहिल पर बजता सागर का नक्कारा ||
इसकी खाने उगल रहीं, सोना, हीरा, पारा |
इसकी शानो शौकत का दुनिया में जयकारा ||
आया फिरंगी दूर से, ऐसा मंतर मारा |
लूटा दोनों हाथों से, प्यारा वतन हमारा ||
आज शहीदों ने है तुमको, अहले वतन ललकारा |
तोड़ो, गुलामी की जंजीरें, बरसाओ अंगारा ||
हिन्दू मुसलमाँ सिख हमारा, भाई भाई प्यारा |
यह है आज़ादी का झंडा, इसे सलाम हमारा ||
उस समय (१९५७ में) मैं पांच वर्ष का था और हुसैनगंज लखनऊ की फखरुद्दीन मंजिल में अपने माता-पिता के साथ रहता था.सिर्फ कविता ही लिखी उसके रचयिता और छापने वाले अखबार का नाम नहीं लिखा था.क्योंकि शुरू से ही मेरे विचार क्रांतिकारी रहे हैं मुझे ऐसे लेख और कवितायें भाते थे और माता-पिता मुझे जो उपलब्ध होता था दे देते थे जिस कारण आज ५४ वर्ष बाद मैं उसे पुनः सार्वजानिक करने में सफल रहा.
राजनीतिक कारण-
व्यापारी बन कर आने वाले अंग्रेजों का राज्य स्थापन एवं उसका विस्तार होने से भारतीयों की राजनीतिक स्वतंत्रता का धीरे-धीरे अपहरण होता रहा. डलहौजी की साम्राज्यवादी नीति इस क्रान्ति के लिए सबसे अधिक उत्तरदायी है.
सामाजिक कारण-
शक्तिशाली अंग्रेज अधिकारी भारतीयों से घृणा करते थे.उन्हें अपमानित और लांक्षित करना अंग्रेजों के लिए मामूली बात थी.शासक और शासित के बीच का यह व्यवधान निश्चय ही शांति के लिए अनुकूल नहीं था.अंग्रेजों ने अपनी सभ्यता और संस्कृति का भी प्रसार करने की चेष्टा की जिसने क्रांति की चिंगारी को भड़का दिया.
आर्थिक कारण-
उचित-अनुचित अनेक उपायों के द्वारा अंग्रेज भारत का सोना इंग्लैण्ड भेज रहे थे और इस समृद्धि से हुयी औद्योगिक क्रांति का लाभ उठा कर उन्होंने देशी व्यापर और उद्योग को बहुत धक्का पहुंचाया.राजाओं और नवाबों की संपत्तियों का अबाध अपहरण किया,उनके सैनिक और सेवक बेरोजगार हो गए थे जो आक्रोशित थे और उन्होंने क्रांति में बढ़ -चढ़ कर योग दिया.
धार्मिक कारण-
अंग्रेजों ने ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार में संरक्षण और प्रोत्साहन प्रदान किया.उनके धर्मोपदेशक बड़े अहंकारी और उद्दंड थे.दोनों धर्मावलम्बियों को ईसायिओं ने अपना विरोधी बना लिया था.मौक़ा पाते ही सबने क्रान्ति में सहयोग दिया.
सैनिक कारण -
भारतीय सैनिकों के बल पर ही अंग्रेज भारत के विशाल भू-भाग के स्वामी बन सके थे परन्तु उनको वेतन कम दिया जाता था और उनकी सुख-सुविधा का बिलकुल ख्याल नहीं रखा जाता था जिससे उनमें असंतोष बढ़ता रहा था.चर्बी वाले कारतूस ने बारूद के ढेर में चिंगारी का काम किया.
क्रांति का संगठन-
१८५७ ई. की क्रांति एक पूर्व-नियोजित और संगठित क्रांति थी.'नाना साहब पेशवा' और उनके सलाहकार 'अजीमुल्ला खाँ'मुख्य संगठक थे.सतारा के राजा का मंत्री रंगों बापू जब इंग्लैण्ड गया तो अजीमुल्ला खाँ ने उनसे मिल कर क्रांति का कार्यक्रम निश्चित किया.रंगों बापू ने सतारा लौट कर विद्रोह की आग भड़काने का काम किया और अजीमुल्ला खाँ -रूस,मिश्र,इटली,टर्की आदि से सहानुभूति प्राप्त कर बिठूर लौटे और नाना साहब के साथ तय किया कि,२२ जून १८५७ ई. को सारे देश में एक साथ बहादुर शाह जफ़र के नेतृत्व में क्रांति की जायेगी.'कमल'और 'चपाती'प्रतीक के रूप में जनता में बाँट कर क्रांति का आह्वान किया गया.
समय पूर्व क्रांति-
२९ मार्च १८५७ ई. को बैरकपुर छावनी में चर्बी वाले कारतूसों को लेकर 'वीर मंगल पाण्डेय'ने अपने साथियों के साथ खुल्लमखुल्ला विद्रोह कर दिया घायलावस्था में उन्हें गिरफ्तार करके प्राण-दंड दे दिया गया.देशी पलटनें ख़तम कर दी गयीं.जब ये विद्रोही सिपाही मेरठ पहुंचे तो १० मई १८५७ को वहां से क्रांति शुरू कर दी गयी जिसे २२ जून को शुरू होना था .यह अधूरी तैयारी भी विफलता का कारण बनी और अधीरता भी.क्रांति की सफलता के लिए धैर्य एवं संयम बेहद जरूरी हैं.फिर भी क्रांतिकारियों के त्याग तथा बलिदान को भुलाया नहीं जा सकता और हमें उनसे प्रेरणा एवं कर्तव्य-बोद्ध ग्रहण करना चाहिए.
P . S . : ---
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फेसबुक पर प्राप्त कमेन्ट : 11-05-2015 :
P . S . : ---
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फेसबुक पर प्राप्त कमेन्ट : 11-05-2015 :
Thursday, May 5, 2011
समाजवाद और महर्षि कार्लमार्क्स ------ विजय राजबली माथुर
जब-जब धरा विकल होती,मुसीबत का समय आता.
किसी न किसी रूप में कोई न कोई महामानव चला आता ..
ये पंक्तियाँ महर्षि कार्ल मार्क्स पर पूरी तरह खरी उतरती हैं.मार्क्स का आविर्भाव एक ऐसे समय में हुआ जब मानव द्वारा मानव का शोषण अपने निकृष्टतम रूप में भयावह रूप धारण कर चुका था.औद्योगिक क्रान्ति के बाद जहाँ समाज का धन-कुबेर वर्ग समृद्धि की बुलंदियां छूता चला जा रहा था वहीं दूसरी ओर मेहनत करके जीवन निर्वाह करने वाला गरीब मजदूर और फटे हाल होता जा रहा था,यह परिस्थिति यूरोप में तब आ चुकी थी और भारत तब तक सामन्तवाद में पूरी तरह जकड चुका था.हमारे देश में जमींदार भूमिहीन किसानों पर बर्बर अत्याचार कर रहे थे.
Man is the product of his Environment .
मार्क्स का पितृ देश जर्मन था,परन्तु उन्हें निर्वासित होकर इंग्लैण्ड में अपना जीवन यापन करना पड़ा.जर्मन के लोग सदा से ही चिंतन-मनन में अन्य यूरोपीय समाजों से आगे रहे हैं और उन पर भारतीय चिंतन का विशेष प्रभाव पड़ा है.मैक्समूलर सा :तीस वर्ष भारत में रहे और संस्कृत का अध्ययन करके वेद,वेदान्त,उपनिषद और पुरानों की तमाम पांडुलिपियाँ तक प्राप्त करके जर्मन वापिस लौटे.मार्क्स जन्म से ही मेधावी रहे उन्होंने मैक्समूलर के अध्ययन का भरपूर लाभ उठाया और समाज व्यवस्था के लिए नए सिद्धांतों का सृजन किया.
मार्क्स का तप और त्याग
हालांकि एक गरीब परिवार में जन्में और कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा,परन्तु मार्क्स ने हार नहीं मानी,उन्होंने अपने कठोर तपी जीवन से गहन अध्ययन किया.समाज के विकास क्रम को समझा और भावी समाज निर्माण के लिए अपने निष्कर्षों को निर्भीकता के साथ समाज के सम्मुख रखा.व्यक्तिगत जीवन में अपने से सात वर्ष बड़ी प्रेमिका से विवाह करने के लिए भी उन्हें सात वर्ष तप-पूर्ण प्रतीक्षा करनी पडी.उनकी प्रेमिका के पिता जो धनवान थे मार्क्स को बेहद चाहते थे और अध्ययन में आर्थिक सहायता भी देते थे पर शायद अपनी पुत्री का विवाह गरीब मार्क्स से न करना चाहते थे.लेकिन मार्क्स का प्रेम क्षण-भंगुर नहीं था उनकी प्रेमिका ने भी मार्क्स की तपस्या में सहयोग दिया और विवाह तभी किया जब मार्क्स ने चाहा.विवाह के बाद भी उन्होंने एक आदर्श पत्नी के रूप में सदैव मार्क्स को सहारा दिया.जिस प्रकार हमारे यहाँ महाराणा प्रताप को उनकी रानी ने कठोर संघर्षों में अपनी भूखी बच्चीकी परवाह न कर प्रताप को झुकने नहीं दिया ठीक उसी प्रकार मार्क्स को भी उनकी पत्नी ने कभी निराश नहीं होने दिया.सात संतानों में से चार को खोकर और शेष तीनों बच्चियों को भूख से बिलखते पा कर भी दोनों पति-पत्नी कभी विचलित नहीं हुए और आने वाली पीढ़ियों की तपस्या में लीं रहे.देश छोड़ने पर ही मार्क्स की मुसीबतें कम नहीं हो गईं थीं,इंग्लैण्ड में भी उन्हें भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता था.लाईब्रेरी में अध्ययनरत मार्क्स को समय समाप्त हो जाने पर जबरन बाहर निकाला जाता था.
बेजोड़ मित्र
इंग्लैण्ड के एक कारखानेदार एन्जेल्स ने मार्क्स की उसी प्रकार सहायता की जैसी सुग्रीव ने राम को की थी.एन्जेल्स धन और प्रोत्साहन देकर सदैव मार्क्स के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर खड़े रहे.मार्क्स का दर्शन इन्हीं दोनों के त्याग का प्रतिफल है.विपन्नता और संकटों से झूजते मार्क्स को सदैव एन्जेल्स ने आगे बढ़ते रहने में सहायता की और जिस प्रकार सुग्रीव के सैन्य बल से राम ने साम्राज्यवादी रावण पर विजय प्राप्त की थी.ठीक उसी प्रकार मार्क्स ने एन्जेल्स के सहयोग बल से शोषणकारी -उत्पीडनकारी साम्राज्यवाद पर अपने अमर सिद्धांतों से विजय का मार्ग प्रशस्त किया.गरीब और बेसहारा लोगों के मसीहा के रूप में मार्क्स और एन्जेल्स तब तक याद किये जाते रहेंगें जब तक आकाश में सूरज-चाँद और तारे दैदीप्यमान रहेंगें.
भारतीय संस्कृति और मार्क्सवाद
हमारे प्राच्य ऋषि-मुनियों नें 'वसुधैव कुटुम्बकम'का नारा दिया था,वे समस्त मानवता में समानता के पक्षधर थे और मनुष्य द्वारा मनुष्य के उत्पीडन और शोषण के विरुद्ध.यही सब कुछ मार्क्स ने अपने देश -काल की परिस्थितियों के अनुरूप नए निराले ढंग से कहा है.कुछ विद्वान मार्क्स के दर्शन को भारतीय वांग्मयके अनुरूप मानते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि,मार्क्सवाद भारतीय संस्कृति में ही सही ढंग से लागू हो सकता है.यूरोप में मार्क्स के दर्शन पर क्रांतियाँ हुईं और मजदूर वर्ग की राजसत्ता स्थापित हुयी और वहां शोषण को समाप्त करके एक संता पर आधारित समाज संरचना हुयी,परन्तु इस प्रक्रिया में यूरोपीय संस्कृति के अनुरूप मार्क्स के अनुयाई शासकों से कुछ ऐसी गलतियां हुईं जो मार्क्स और एन्जेल्स के दर्शन से मेल नहीं खातीं थीं.रूसी राष्ट्रपति मिखाईल गोर्बाचोव ने इस कमी को महसूस किया और सुधारवादी कार्यक्रम लागू कर दिया जिससे समाज मार्क्स-दर्शन का वास्तविक लाभ उठा सके.यूरोप के ही कुछ शासकों ने सामंती तरीके से इसका विरोध किया,परिणामस्वरूप उन्हें जनता के कोप का भाजन बनना पडा.आज विश्व के आधे क्षेत्रफल और एक तिहाई आबादी में मार्क्सवादी शासन सत्ता विद्यमान है जो सतत प्रयास द्वारा जड़ता को समाप्त कर यथार्थ मार्क्सवाद की ओर बढ़ रही है.
स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि,नास्तिक वह नहीं है जिसका ईश्वर पर विशवास नहीं है,बल्कि' नास्तिक वह है जिसका अपने ऊपर विशवास नहीं है' मार्क्सवाद बेसहारा गरीब मेहनतकश वर्ग को अपने ऊपर विशवास करने की प्रेरणा देता है.विवेकानंद ने यह भी कहा था जब तक संसार में झौंपडी में निवास करने वाला हर आदमी सुखी नहीं होता यह संसार कभी सुखी नहीं होगा.मार्क्स ने जिस समाज-व्यवस्था का खाका प्रस्तुत किया उसमें सब व्यक्ति सामान होंगें और प्रत्येक व्यक्ति से उसकी क्षमता व योग्यतानुसार काम लिया जाएगा और प्रत्येक व्यक्ति को उसकी आवश्यकतानुसार दिया जाएगा जिससे उसका बेहतर जीवन निर्वाह हो सके.श्री कृष्ण ने भी गीता में यही बताया कि,मनुष्य को लोभवश परिग्रह नहीं करना चाहिए,अर्थात किसी मनुष्य को अपनी आवश्यकता से अधिक कुछ नहीं रखना चाहिए.यह आवश्यकता से अधिक रखने की लालसा अर्थात कृष्ण के बताये गए अपरिग्रह मार्ग का अनुसरण न करना ही शोषण है.और इसी शोषण को समाप्त करने का मार्ग मार्क्स ने आधुनिक काल में हमें दिखाया है.
भारत में गलत धारणा
हमारे देश में साधन सम्पन्न शोषक वर्ग ने धर्म की आड़ में मार्क्सवाद के प्रति विकृत धारणा का पोषण कर रखा है जब कि यह लोग स्वंय ही 'धर्म से अनभिग्य 'हैं.प्रसिद्ध संविधान शास्त्री और महात्मा गांधी के अनुयाई डा. सम्पूर्णानन्द ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा है :-सत्य,अहिंसा,अस्तेय,अपरिग्रहऔर ब्रह्मचर्य के समुच्य का नाम है-धर्म.अब देखिये यह सोचने की बात है कि,धर्म की दुहाई देने वाले इन पर कितना आचरण करते हैं.यदि समाज में शोषण विहीन व्यवस्था ही स्थापित हो जाए जैसा कि ,मार्क्स की परिकल्पना में-
सत्य-पूंजीपति शोषक वर्ग सत्य बोल और उस पर चल कर समृद्धत्तर नहीं हो सकता .
अहिंसा-मनसा-वाचा-कर्मणा अहिंसा का पालन करने वाला शोषण कर ही नहीं सकता.
अस्तेय-अस्तेय का पालन करके पूंजीपति वर्ग अपनी पूंजी नष्ट कर देगा.गरीब का हक चुराकर ही धनवान की पूंजी सृजित होती है.
अपरिग्रह-जिस पर वेदों से लेकर श्रीकृष्ण और स्वामी विवेकानन्द सभी मनीषियों ने ज्यादाजोर दिया यदि समाज में अपना लिया जाए तो कोई किसी का हक छीने ही नहीं और स्वतः समानता स्थापित हो जाए.
ब्रह्मचर्य-जिसकी जितनी उपेक्षा पूंजीपति वर्ग में होती है ,गरीब तबके में यह संभव ही नहीं है.अपहरण,बलात्कार और वेश्यालय पूंजीपति समाज की संतुष्टि का माध्यम हैं.
आखिर फिर क्यों धर्म का आडम्बर दिखा कर पूंजीपति वर्ग जनता को गुमराह करता है?ज़ाहिर है कि,ऐसा गरीब और शोषित वर्ग को दिग्भ्रमित करने के लिए किया जाता है,जिससे धर्म की आड़ में शोषण निर्बाध गति से चलता रहे.
कसूरवार मार्क्सवादी भी हैं
हमारे देश में धर्म का अनर्थ करके जहां पूंजीपति वर्ग शोषण को मजबूत कर लेता है;वहीं साम्राज्यवादी उसे इसके लिए प्रोत्साहित करते हैं जबकि मार्क्स के अनुयायी अंधविश्वास में जकड कर और शब्द जाल में फंस कर भारतीय जनता को भारतीय संस्कृति और धर्म से परिचित नहीं कराते.ऐसा करना वे मार्क्सवाद के सिद्धांतों के विपरीत समझते हैं.और यही कारण है अपनी तमाम लगन और निष्ठा के बावजूद भारत में मार्क्सवाद को विदेशी विचार-धारा समझा जाता है और यही दुष्प्रचार करके साम्राज्यवादी-साम्प्रदायिक शक्तियां विभिन्न धर्मों के झण्डे उठा कर जनता को उलटे उस्तरे से मूढ़ती चली जा रहीं हैं.इस परिस्थिति के लिए १९२५ से आज तक का हमारा मार्क्सवादी आन्दोलन स्वंय जिम्मेदार है.
अब समय आ गया है
जब हम प्रति वर्ष २२अप्रैल से ०५ मई तक मार्क्सवाद-लेनिनवाद के सिद्धांतों को भारतीय संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में 'चेतना पक्ष' के रूप में मनाएं और स्वंय मार्क्स के अनुयाई भी भारतीय वांग्मय के अनुकूल भाषा-शैली अपना कर राष्ट्र को प्राचीन 'वसुधैव कुटुम्बकम'की भावना फैलाने के लिए महर्षि कार्ल मार्क्स की चेतना से अवगत कराएं,अन्यथा फिर वही 'ढ़ाक के तीन पात'.
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