जब आप जीवन मे सबसे बुरी परिस्थिति में हों तब क़िस्म क़िस्म के लोग मिलते हैं;
एक वे जो आपको अपनी क्षमता अनुसार राहत देते हैं, और उतना ही उपकार समझ जो जितना साथ निभा दे की तर्ज़ पर आप हमेशा उनके शुक्रगुजार रहते हैं .
फिर वे जो किसी भी कारण या परिस्थिति वश दूर से दृष्टा रहते हैं, जिनके कारण न आपको फ़ायदा होता है न नुकसान. दुनिया मे हर व्यक्ति आपकी मदद की capacity में भी नही होता, आपके जीवन मे involve भी नहीं होना चाहता, तो ये भी ठीक ही है.
हाँ जिनसे आपका उम्मीद का रिश्ता हो वे भी दृष्टा रहें तो थोड़ी तकलीफ़ होती है.
फिर वे जो मदद का दिखावा करते हैं मगर दरअसल करते कुछ भी नहीं, ऐसे लोगों को पहचानना थोड़ा मुश्किल होता है, वे भले और मीठे बने रहते हैं, उम्मीद बनाए रखते हैं, मगर अंततः आपको अपने अनुभव से समझ आ जाता है कि इनसे उम्मीद रखना बेकार है. ये आपके समय की सबसे बड़ी हानि करते हैं.
फिर वे लोग भी मिलते हैं जो मदद करने को तैयार होते हैं मगर आपसे बदले में भी कुछ चाहते हैं, और सीधे सीधे कह देते हैं, ऐसे में आपके पास अपने लिये तय करने का अधिकार रहता है. और अगर आप बेहद ही कमज़ोर मानसिकता में न हों कि ख़ुद को छलने के लिये भी तैयार हों तो अपने लिये कैसा भी निर्णय कर ही लेते हैं.
फिर वे लोग होते हैं, जिनका आपको पता होता है कि वे आपका बुरा ही चाहते हैं और वे अपनी नीयत को अपनी बात या व्यवहार से छुपाते भी नहीं. आपका दुख उनके लिये ख़ुशी का सबब होता है, और आपको उनसे डील करना सीखना होता है.
यहाँ तक भी ठीक है आप मैनेज कर लेते हैं.
मगर सबसे ख़तरनाक वे होते हैं जो आपकी बुरी आर्थिक,मानसिक या भावनात्मक स्थिति का अपने पक्ष में फ़ायदा उठाते हैं यानी राहत का दिखावा करते हैं , आपका भरोसा जीतते हैं, उम्मीद जगाते हैं मगर असल मे अपना ही उल्लू सीधा करते हैं. ऐसे लोग जीवन के सबसे कड़वे , न भूलने वाले अनुभव देते हैं.
ये ऐसा ही है जैसे किसी रेल दुर्घटना में घायल व्यक्ति की तरफ़ मदद का हाथ बढाकर उसके कंगन लूट लिए जाएँ, और फिर उसे उसके हाल पर छोड़ दिया जाए. ऐसे में नुकसान सिर्फ़ कंगन का नही होता, इंसानियत पर से ही भरोसा उठ जाता है.
किसी दूसरे की आपदा में अपने लिये अवसर खोजने वाले लोग निकृष्टतम होते हैं , और इसमें कोई दोराय भी नहीं.
और मुझे अब तक का इस सरकार का सबसे निकृष्ट तम कृत्य लगा PM Care fund. संकट से जूझती जनता को उसके हाल पर छोड़ देने, चुनी हुई सरकार से होने वाली उम्मीद और भरोसे पर खरा न उतरने से भी ज़्यादा.
सिर्फ़ PM fund नाम होता तब भी ग़नीमत थी, आपने जनता को भरोसा दिलाया कि आप care करते हैं, आप मदद करना चाहते है , आपने जनता से अपील की कि देश की मदद के लिये आपदकाल में भी चंदा दें, यहाँ तक आपने उसके नाम पर लोगों की सैलरी तक काट ली, और फिर जब लोगों के घरों में चिताएँ जल रही थी, वह तमाम धन आप ग़बन कर गए, न आपने मदद की न हिसाब दिया, तिसपर मीडिया की मदद से अपनी संत और savior की छवि भी बनाए रखी.
इससे घटिया, इससे नीच भी कुछ हो सकता है?
अब जब सरकार की तरफ़ से संकटकाल की घोषणा हो ही चुकी है, और कल प्रधानमंत्री जी के कुल भाषण का सार " जो उचित समझो वो करो", यानी उपदेश देकर जनता को उसके हाल पर छोड़ देना ही है, तब सरकार से एक ही अंतिम उम्मीद है, जनता अपना ओढ़ खींच लेगी;
बस अबकी बार आप संकटग्रस्त जनता से किसी राहत और केयर के नाम पर फण्ड मत माँगना, इतना रहम करना. बाक़ी जो अभी तक अपने अनुभव से ये नहीं समझे कि इस सरकार से किसी तरह की उम्मीद का रिश्ता नही रखना चाहिये, उनका ऊपर वाला ही मालिक है.
लेखिका --- Kanupriya
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