RSS और BJP भारतीय लोकतंत्र की हत्या के गुनाहगार
चंद्र बाबू नायडू और नीतीश कुमार जैसे अनुभवी सियासी बाजीगर, जो कभी मोदी को तानाशाह करार देते थे और आरएसएस की विचारधारा से दूरी बनाते दिखते थे, आज केंद्र में आरएसएस-प्रेरित सरकार को अटूट समर्थन प्रदान कर रहे हैं। 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा 240 सीटों पर सिमट गई, लेकिन टीडीपी के 16 और जेडीयू के 12 सांसदों समेत एनडीए के गैर-भाजपा सहयोगियों ने कुल 293 सांसदों का समर्थन देकर सरकार बनाई। इन नेताओं के कानों में लोकतंत्र के खात्मे की कोई पदचाप नहीं गूँज रही, न ही इनकी आंखों में आरएसएस की कथित तानाशाही का भय दिखाई दे रहा। नायडू 2018 में विशेष श्रेणी का दर्जा न मिलने पर एनडीए छोड़ चुके थे और मोदी सरकार पर हमले बोलते थे, लेकिन 2024 में आंध्र प्रदेश के लिए विशेष पैकेज और मंत्रालयों के लालच में फिर गले मिल गए। नीतीश कुमार तो पिछले दशक में कई बार पाला बदल चुके, 2013 में भाजपा से अलग हुए, 2017 में वापस लौटे, 2022 में महागठबंधन में गए और फिर 2024 से पहले एनडीए में लौट आए। यह सौदेबाजी है, बिहार और आंध्र के विकास, विशेष श्रेणी का दर्जा, रेलवे जैसे मंत्रालय और फंड्स के बदले संवैधानिक मूल्यों की बलि चढ़ाने का सौदा। इनके लिए सत्ता की कुर्सी संविधान और लोकतंत्र से कहीं ज्यादा अहम है, क्योंकि क्षेत्रीय अस्मिता और वोट बैंक बचाने की मजबूरी ने उन्हें सिद्धांतों से ऊपर उठा दिया। खैर नीतीश बाबू को उनकी करनी की सजा मिल गयी संघीयों नें उन्हें निगल लिया चंद्र बाबू को निगलने के लिए उनके खेमें में गद्दार तैयार किए जा रहे हैं देर सबेर उन्हें भी संघी निगल लेंगे।
आरएसएस, जिसकी स्थापना 1925 में डॉ. के.बी. हेडगेवार ने की, आजादी की लड़ाई में कोई संगठनात्मक भूमिका नहीं निभाई। बल्कि इसके संस्थापक और दूसरे सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर ने क्विट इंडिया आंदोलन जैसे राष्ट्रव्यापी संघर्षों से दूरी बनाए रखी और ब्रिटिश राज के खिलाफ सीधा मुकाबला 'प्रतिक्रियावादी' करार दिया। गोलवलकर की किताब 'वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड' (1939) में नाजी जर्मनी और फासीवादी इटली से प्रेरणा ली गई, जहां अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे का नागरिक मानने वाली सोच व्यक्त की गई। गांधीजी की हत्या के बाद संगठन पर प्रतिबंध लगा था। RSS ने शुरू से 'हिंदू एकता' और अनुशासन पर जोर दिया, लेकिन कांग्रेस के अखिल भारतीय आंदोलनों से परहेज किया। आज वही संगठन संविधान को 'पश्चिमी नकल' बताकर उसकी आलोचना करता रहा है और मनुस्मृति जैसे प्राचीन ग्रंथों को आदर्श मानता है। 1949 में आरएसएस के मुखपत्र 'ऑर्गनाइजर' ने संविधान बनने पर अफसोस जताया कि उसमें 'भारतीय' तत्व नहीं हैं और मनु के कानूनों का कोई उल्लेख नहीं। फिर भी 100 से ज्यादा गैर-आरएसएस सांसद मोदी-शाह के इशारे पर घूम रहे हैं, बिना इस ऐतिहासिक गद्दारी और विचारधारा के खतरे को समझे। लाखों स्वतंत्रता सेनानियों, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, गांधीजी के अनुयायियों की कुर्बानी से बड़ी ही मुश्किल से मिला लोकतंत्र अब 'हिंदू राष्ट्र' के खांचे में ढाला जा रहा है, जहां बहुलवाद की जगह एकरूपता थोपी जा रही है। इन सांसदों का ज़मीर सोया हुआ है या सत्ता की चकाचौंध में पूरी तरह बेहोश हो चुका है?
ये सांसद भूल गए कि आजादी की लड़ाई में कांग्रेस, समाजवादियों और क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश साम्राज्य से सीधा संघर्ष किया, जबकि आरएसएस ने हिंदू संगठन को मजबूत करने और मुस्लिम एकता को खतरा मानकर अलग राह चुनी। गोलवलकर ने लोकतंत्र को हिंदू संस्कृति के अनुकूल नहीं माना और मनुस्मृति को कानून का आधार बनाने की वकालत की, जिसमें वर्ण व्यवस्था और असमानता को वैध ठहराया गया। आज एनडीए सरकार में सहयोगी दल इसी विचारधारा के विस्तार को चुपचाप देख रहे हैं। चंद्र बाबू नायडू और नीतीश कुमार जानते हैं कि उनकी पार्टियां टीडीपी और जेडीयू क्षेत्रीय मुद्दों, आंध्र के विकास, बिहार के विशेष दर्जे पर टिकी हैं, लेकिन आरएसएस की सांस्कृतिक और संगठनात्मक मशीनरी धीरे-धीरे उनके वोट बैंक को भी निगल सकती है। 2024 में भाजपा के बहुमत न होने के बावजूद इन नेताओं ने 'अनकंडीशनल सपोर्ट' दिया, क्योंकि विकास के वादे, केंद्रीय फंड्स और मंत्रालयों का लालच लोकतंत्र के लंबे खतरे से बड़ा साबित हुआ। क्या ये लोग नहीं देख रहे कि उनकी पार्टियों का वजूद और क्षेत्रीय स्वायत्तता RSS की केंद्रीकृत 'एक राष्ट्र, एक संस्कृति' वाली सोच में धीरे-धीरे विलीन हो रही है? इतिहास में कई क्षेत्रीय दल बड़े सहयोगी के साथ घुल-मिलकर अपनी पहचान खो चुके हैं, लेकिन सत्ता का नशा इनके विवेक को कुचल रहा है।
लाखों शहीदों की शहादत पर सवाल उठाना आसान है, लेकिन सच्चाई यह है कि भारतीय लोकतंत्र ने सभी विचारधाराओं, वामपंथी, दक्षिणपंथी और सेकुलर को जगह दी। आरएसएस ने शुरू से ही 'हिंदू राष्ट्र' की कल्पना की, जिसमें अल्पसंख्यक 'हिंदू संस्कृति' अपनाने को मजबूर हों। इसके प्रारंभिक दस्तावेजों में बहुलवाद और समानता वाले संविधान से असहजता साफ झलकती है। 1949 के ऑर्गनाइजर संपादकीय में मनुस्मृति की तारीफ करते हुए कहा गया कि संविधान में प्राचीन भारतीय कानूनों का अभाव है। आज भी कुछ आरएसएस नेता 'सेकुलर' और 'सोशलिस्ट' शब्दों की समीक्षा की बात करते हैं। फिर भी ये समर्थन देने वाले दल इस बहस में नहीं पड़ना चाहते। उनका डर सिर्फ चुनावी हार और सत्ता गंवाने का है, न कि संवैधानिक मूल्यों का। इन्हे यह कहते हुए सुना जा सकता है कि अगर आरएसएस की तानाशाही आ रही होती, तो ये 'किंगमेकर' पहले ही पाला बदल चुके होते, लेकिन सत्ता और फंड्स का स्वाद इतना मीठा है कि लोकतंत्र के दुश्मन बनकर भी ये घूम रहे हैं। चंद्र बाबू ने 2014 से विशेष श्रेणी का दर्जा मांगा, नीतीश ने बिहार के लिए 2000 से मांग की, और 2024 में एनडीए में शामिल होकर इन्हें हासिल करने की उम्मीद में चुप्पी साध ली।
ये सब कब जागेंगे? शायद तब जब उनकी अपनी पार्टियां, टीडीपी और जेडीयू आरएसएस की शाखाओं में बदल चुकी होंगी, जब क्षेत्रीय अस्मिताएं केंद्रीय हिंदुत्व में पूरी तरह घुल-मिल गई होंगी। नीतीश कुमार का फ्लिप-फ्लॉप इतिहास प्रसिद्ध है, वे 'सुशासन बाबू' के रूप में जाने जाते थे, लेकिन सत्ता बचाने के लिए बार-बार गठबंधन बदलते रहे। नायडू भी ट्रांजेक्शनल पॉलिटिक्स के माहिर हैं। आज ये नेता जानते हैं कि भाजपा बिना उनके समर्थन के बहुमत नहीं बना सकती, फिर भी वे बिना शर्त समर्थन दे रहे हैं क्योंकि अल्पकालिक फायदे, विशेष पैकेज, मंत्रालय, लंबे लोकतांत्रिक खतरे से ज्यादा आकर्षक हैं। इतिहास गवाह है कि सत्ता के लिए सिद्धांत बेचने वाले अंत में खुद बिक जाते हैं। आरएसएस की विचारधारा अनुशासन के नाम पर बहुलवादी भारत को एकरूप बनाने की कोशिश लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती है। सहयोगी दल अगर आज पदचाप नहीं सुन रहे, तो कल उनके कार्यकर्ता और वोटर जब जागेंगे, तब तक उनकी पहचान मिट चुकी होगी।
अंत में, भारतीय लोकतंत्र मजबूत है क्योंकि यह बहुलवादी और समावेशी है, न कि किसी एक विचारधारा का गुलाम। आरएसएस चाहे जितना हिंदू राष्ट्र का सपना देखे, संविधान की जड़ें समता, स्वतंत्रता, न्याय गहरी हैं। लेकिन सवाल ये है कि जो सांसद आज आरएसएस के प्रभाव में 'मोदी-शाह के इशारे' पर चल रहे हैं, वे कल खुद को और अपनी विरासत को बचाने के लिए क्या करेंगे? लाखों शहीदों की आहें, संविधान निर्माताओं का सपना और आजादी की लड़ाई की यादें इनके कानों तक पहुंचनी चाहिए। जागना होगा, वरना इतिहास इन्हें सिर्फ सत्ता के दलाल और लोकतंत्र के कमजोर करने वाले के रूप में याद रखेगा, न कि रक्षक के रूप में। सच्चा लोकतंत्र तब बचता है जब सत्ता के सहयोगी भी सवाल पूछें, विपक्ष की तरह नहीं तो कम से कम अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनें। जनता को भी सतर्क रहना होगा, क्योंकि लोकतंत्र किसी एक दल या गठबंधन की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की अमूल्य विरासत है। सत्ता का खेल खेलते रहो, लेकिन याद रखो, जो आजादी के सपनों से समझौता करता है, वह खुद इतिहास की कचरा टोकरी में समा जाता है। जागो सोने वालों, वरना बहुत देर हो जाएगी।
Rajesh R. Singh

