Monday, July 20, 2026

अरुणा आसफ अली ------ Old is Gold Films's Post





भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई ऐसे नाम हैं जिन्हें इतिहास की किताबों में कुछ पन्नों तक सीमित कर दिया गया, जबकि उनका योगदान किसी पूरे अध्याय से कम नहीं था। जब भी "भारत छोड़ो आंदोलन" की बात होती है, हमारे मन में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और अन्य बड़े नेताओं की छवि उभरती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि 9 अगस्त 1942 की वह सुबह, जब लगभग पूरा कांग्रेस नेतृत्व अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार किया जा चुका था, तब एक महिला ने हजारों लोगों के सामने तिरंगा फहराकर पूरे ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दे दी थी। यही महिला थीं अरुणा आसफ अली।

उन्हें "भारत छोड़ो आंदोलन की नायिका", "1942 की रानी" और बाद में "Grand Old Lady of the Independence Movement" कहा गया। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान केवल तिरंगा फहराने तक सीमित नहीं थी। उन्होंने महात्मा गांधी के सम्मान के बावजूद, जब उन्हें लगा कि उनका रास्ता अलग है, तब गांधी जी की सलाह तक मानने से इनकार कर दिया। आखिर ऐसी कौन-सी महिला थी, जिसने देश की आजादी के लिए अपना घर, संपत्ति, पहचान और वर्षों का जीवन दांव पर लगा दिया? यही कहानी है उस असाधारण व्यक्तित्व की, जिसे आज भी भारत पूरी तरह जान नहीं पाया है।

एक ऐसे परिवार में जन्म, जहाँ विचारों की आजादी विरासत थी

16 जुलाई 1909 को ब्रिटिश भारत के कालका (आज का हरियाणा) में जन्मी अरुणा गांगुली एक शिक्षित बंगाली ब्राह्मण परिवार से थीं। उनका परिवार ब्रह्म समाज से जुड़ा हुआ था, जो उस दौर में सामाजिक सुधार और आधुनिक विचारों का समर्थन करता था। उनके पिता उपेंद्रनाथ गांगुली एक व्यवसायी थे, जबकि माँ अंबालिका देवी प्रसिद्ध समाज सुधारक त्रैलोक्यनाथ सान्याल की पुत्री थीं।

उनका परिवार साहित्य, शिक्षा और समाज सुधार से गहराई से जुड़ा था। उनके चाचा धीरेंद्रनाथ गांगुली भारतीय सिनेमा के शुरुआती फिल्म निर्देशकों में गिने जाते हैं, जबकि दूसरे चाचा नागेंद्रनाथ गांगुली ने गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बेटी मीरा देवी से विवाह किया था। उनकी बहन पूर्णिमा बनर्जी आगे चलकर भारत की संविधान सभा की सदस्य बनीं।

ऐसे वातावरण में पली-बढ़ी अरुणा ने बचपन से ही स्वतंत्र सोच, शिक्षा और सामाजिक न्याय के मूल्य सीखे। उन्होंने लाहौर के Sacred Heart Convent और नैनीताल के All Saints' College में शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे कोलकाता के गोखले मेमोरियल स्कूल में अध्यापिका बनीं। लेकिन शायद नियति ने उनके लिए केवल अध्यापन नहीं, बल्कि इतिहास लिखना तय कर रखा था।

एक ऐसा विवाह जिसने पूरे समाज को हिला दिया

इलाहाबाद में उनकी मुलाकात कांग्रेस नेता और प्रसिद्ध वकील आसफ अली से हुई। आसफ अली वही व्यक्ति थे जिन्होंने भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों का अदालत में बचाव किया था। वे अरुणा से लगभग 23 वर्ष बड़े थे और मुस्लिम थे।

1928 में दोनों ने विवाह करने का निर्णय लिया।

आज के समय में यह सामान्य लग सकता है, लेकिन उस दौर में यह फैसला सामाजिक विद्रोह से कम नहीं था। परिवार ने इस रिश्ते का तीखा विरोध किया। अरुणा के संरक्षक चाचा ने सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी कि उनके लिए अरुणा मर चुकी हैं और उन्होंने उनका श्राद्ध तक कर दिया।

लेकिन अरुणा ने समाज के डर के बजाय अपने विवेक की आवाज सुनी। यही साहस आगे चलकर उन्हें अंग्रेजी साम्राज्य के सामने भी अडिग खड़ा करने वाला था।

जब जेल उनके संघर्ष की पहली पाठशाला बनी

विवाह के बाद अरुणा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गईं और नमक सत्याग्रह सहित अनेक आंदोलनों में सक्रिय भाग लेने लगीं।

1931 में उन्हें गिरफ्तार किया गया। गांधी-इरविन समझौते के बाद अधिकांश राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया गया, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने अरुणा को छोड़ने से इनकार कर दिया। जेल की अन्य महिला कैदियों ने भी जेल छोड़ने से मना कर दिया और कहा कि यदि अरुणा नहीं जाएँगी तो वे भी नहीं जाएँगी।

आखिरकार जनता के दबाव और महात्मा गांधी के हस्तक्षेप के बाद उन्हें रिहा किया गया।

लेकिन उनका संघर्ष यहीं नहीं रुका।

1932 में उन्हें फिर गिरफ्तार किया गया और तिहाड़ जेल भेजा गया। वहाँ राजनीतिक कैदियों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार के विरोध में उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी। उनके आंदोलन के बाद जेल प्रशासन को कई सुधार करने पड़े। हालांकि इसकी सजा उन्हें एकांत कारावास के रूप में मिली और बाद में अंबाला जेल भेज दिया गया।

9 अगस्त 1942... जब पूरा नेतृत्व जेल में था, तब एक महिला ने इतिहास बदल दिया

8 अगस्त 1942 को बंबई में कांग्रेस ने "भारत छोड़ो आंदोलन" का प्रस्ताव पारित किया। महात्मा गांधी ने "करो या मरो" का आह्वान किया।

ब्रिटिश सरकार ने तुरंत कार्रवाई करते हुए गांधी, नेहरू, पटेल और लगभग पूरे कांग्रेस नेतृत्व को रातोंरात गिरफ्तार कर लिया।

अंग्रेजों को लगा कि नेतृत्व खत्म होते ही आंदोलन भी खत्म हो जाएगा।

लेकिन वे अरुणा आसफ अली को भूल चुके थे।

9 अगस्त 1942 को बंबई के गोवालिया टैंक मैदान (आज का अगस्त क्रांति मैदान) में हजारों लोगों की भीड़ जमा थी। पुलिस चारों ओर तैनात थी। गिरफ्तारी और गोलियों का खतरा था।

ऐसे समय में अरुणा आसफ अली मंच पर पहुँचीं।

उन्होंने निर्भीक होकर तिरंगा फहराया।

यह केवल एक झंडा फहराने की घटना नहीं थी। यह संदेश था कि आंदोलन नेताओं की गिरफ्तारी से नहीं रुकेगा।

उस क्षण की तस्वीर पूरे भारत में प्रतिरोध का प्रतीक बन गई। अंग्रेजों के लिए यह खुली चुनौती थी और भारतीय युवाओं के लिए यह क्रांति का नया बिगुल।

जब अंग्रेजों ने उनकी हर चीज छीन ली, लेकिन उनका हौसला नहीं

तिरंगा फहराने के बाद अंग्रेजों ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया।

उनकी संपत्ति जब्त कर ली गई।

घर और सामान नीलाम कर दिए गए।

उनके सिर पर इनाम घोषित किया गया।

लेकिन अरुणा गिरफ्तार नहीं हुईं।

वे भूमिगत हो गईं और लगभग चार वर्षों तक अंग्रेजों को चकमा देती रहीं। इसी दौरान उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया के साथ मिलकर कांग्रेस की गुप्त पत्रिका "इंकलाब" का संपादन किया।

उनके लेख युवाओं को केवल भाषण सुनने के लिए नहीं, बल्कि क्रांति में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करते थे।

उन्होंने लिखा कि अब समय केवल बहस का नहीं, बल्कि कार्रवाई का है।

जब उन्होंने महात्मा गांधी की सलाह भी नहीं मानी

1946 में अरुणा लगातार भूमिगत जीवन जीते-जीते बेहद कमजोर हो चुकी थीं।

महात्मा गांधी ने उन्हें एक भावनात्मक पत्र लिखा।

उन्होंने कहा कि तुम्हारा साहस और बलिदान प्रेरणादायक है। अब सामने आकर आत्मसमर्पण कर दो। तुम्हारी गिरफ्तारी पर रखा गया इनाम हरिजन कल्याण में लगाया जा सकता है।

यह पत्र आज भी भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित पत्रों में गिना जाता है।

लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि अरुणा ने गांधी जी की इस सलाह को स्वीकार नहीं किया।

उन्होंने निर्णय लिया कि जब तक अंग्रेज स्वयं उनके खिलाफ जारी वारंट वापस नहीं लेते, तब तक वे सामने नहीं आएँगी।

बाद में जब इनाम और वारंट दोनों वापस लिए गए, तभी उन्होंने सार्वजनिक जीवन में वापसी की।

यह घटना दिखाती है कि वे गांधी जी का सम्मान करती थीं, लेकिन अंधानुकरण नहीं।

आजादी के बाद भी खत्म नहीं हुआ उनका संघर्ष

1947 में देश स्वतंत्र हुआ, लेकिन अरुणा का मिशन समाप्त नहीं हुआ।

उन्होंने महसूस किया कि राजनीतिक आजादी के बाद सामाजिक और आर्थिक न्याय की लड़ाई अभी बाकी है।

1948 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर सोशलिस्ट पार्टी का दामन थाम लिया।

कुछ वर्षों बाद वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से भी जुड़ीं, हालांकि 1956 में सोवियत संघ की राजनीतिक घटनाओं के बाद उन्होंने उससे भी दूरी बना ली।

उन्होंने जीवनभर वामपंथी सामाजिक सोच, मजदूर अधिकार, महिलाओं की भागीदारी और सामाजिक समानता के मुद्दों पर काम जारी रखा।

दिल्ली की पहली महिला मेयर बनने तक का सफर

1958 में अरुणा आसफ अली दिल्ली की पहली महिला मेयर चुनी गईं।

उन्होंने केवल राजनीति नहीं की बल्कि दिल्ली के विकास, नागरिक सुविधाओं, शिक्षा और सामाजिक कल्याण पर विशेष ध्यान दिया।

उन्होंने "Patriot" नामक दैनिक समाचार पत्र और "Link" साप्ताहिक पत्रिका की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पत्रकारिता को उन्होंने सत्ता की प्रशंसा का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आवाज माना।

महिलाओं, दलितों और समाज के वंचित वर्गों के लिए आजीवन संघर्ष

अरुणा आसफ अली का मानना था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है।

वे दलितों, मजदूरों और गरीबों के अधिकारों के लिए लगातार आवाज उठाती रहीं।

उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सशक्तिकरण पर विशेष बल दिया।

दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने महिलाओं के लिए आरक्षण का खुलकर समर्थन नहीं किया। उनका विश्वास था कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ महिलाओं को कहीं अधिक मजबूत बनाएँगी।

उन्होंने अनियंत्रित औद्योगिकीकरण का भी विरोध किया क्योंकि उनका मानना था कि इससे पर्यावरण और समाज दोनों को नुकसान होगा।

सम्मान जिनसे बड़ी थी उनकी सादगी

अरुणा आसफ अली को जीवनभर अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले।

उन्हें International Lenin Peace Prize, Jawaharlal Nehru Award for International Understanding, Padma Vibhushan और मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया।

दिल्ली की एक प्रमुख सड़क अरुणा आसफ अली मार्ग उनके नाम पर है। उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया गया और दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल का नाम भी उनके नाम पर रखा गया।

लेकिन जिन लोगों ने उन्हें करीब से जाना, वे कहते हैं कि उन्हें पुरस्कारों से अधिक संतोष उस दिन मिला था, जब उन्होंने अंग्रेजों की आँखों में आँखें डालकर तिरंगा फहराया था।

क्यों आज भी अरुणा आसफ अली की कहानी अधूरी लगती है?

इतिहास में अक्सर वही चेहरे सबसे ज्यादा दिखाई देते हैं जो सत्ता के केंद्र में रहे। लेकिन कई बार असली परिवर्तन उन लोगों ने किया, जिन्होंने सबसे कठिन समय में नेतृत्व संभाला।

अरुणा आसफ अली उन्हीं लोगों में से एक थीं।



उन्होंने सामाजिक बंधनों को तोड़ा, अंतरधार्मिक विवाह किया, जेल की यातनाएँ झेलीं, भूख हड़ताल की, अंग्रेजों से वर्षों तक बचती रहीं, भूमिगत रहकर आंदोलन को जीवित रखा, गांधी जी से मतभेद होने पर भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया और आजादी के बाद भी समाज के कमजोर वर्गों के लिए काम करती रहीं।

आज जब हम भारत छोड़ो आंदोलन को याद करते हैं, तो केवल 9 अगस्त 1942 का तिरंगा ही नहीं, बल्कि उस तिरंगे के पीछे खड़ी उस निर्भीक महिला को भी याद करना चाहिए जिसने साबित कर दिया था कि इतिहास केवल बड़े नेताओं से नहीं, बल्कि साहस से लिखा जाता है।

अरुणा आसफ अली का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा देशभक्त वही है जो परिस्थितियों के सामने झुकने के बजाय अपने सिद्धांतों पर अडिग रहकर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन जाए।

OLDISGOLDFILMS ऐसी ही भूली-बिसरी ऐतिहासिक हस्तियों की अनसुनी कहानियों को आपके सामने लाता रहेगा, ताकि इतिहास केवल याद न रहे, बल्कि समझा भी जाए।


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  ~विजय राजबली माथुर ©


Wednesday, July 15, 2026

क्योंकि वे कर नहीं सकते ------ Pankaj Kumar Singh / Shyam Singh



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मोदी प्रेस से क्यों डरते हैं?
यह ऐसा सवाल है जो पिछले बारह वर्षों से भारतीयों के ज़हन और सार्वजनिक चर्चा में तो प्रायः आता रहता है और अब इस पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी बातें हो रही हैं लेकिन जवाब किसी के पास नहीं है।
इसी मुद्दे पर Pankaj Kumar Singh की यह पोस्ट कुछ संकेत करती है, पढ़िए—
मोदी जी की चुप्पी के पीछे छिपा सच 
मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस इसलिए नहीं करते क्योंकि उन्हें पैसे देने वाले लोग उन्हें करने नहीं देते। यह सिर्फ़ एक इल्ज़ाम से कहीं ज़्यादा है। यह एक ऐसे 'स्ट्रक्चर' की पुष्टि है जो बहुत पहले से बना हुआ था और ज़्यादातर लोगों की सोच से कहीं ज़्यादा गहरा है।
(1). ACYPL ➤
यह सिर्फ़ 'ट्रेनिंग प्रोग्राम' नहीं, बल्कि 'रिक्रूटमेंट' की दीर्घकालिक योजना भी है।
मोदी ने 1993 में RSS के ग्रासरूट ऑर्गेनाइज़र (प्रचारक) के तौर पर यूनाइटेड स्टेट्स का दौरा किया, जिसे अमेरिकन काउंसिल ऑफ़ यंग पॉलिटिकल लीडर्स (ACYPL) ने होस्ट किया था। हालांकि, ACYPL सिर्फ़ एक एक्सचेंज प्रोग्राम नहीं था; इसे बड़े पैमाने पर CIA द्वारा विदेशी पॉलिटिकल टैलेंट को तैयार करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक फ्रंटल ऑर्गेनाइज़ेशन माना जाता था।
एक ज़रूरी बात यह है कि मोदी ने इसी दौरान यूरोप के कई हिस्सों का भी दौरा किया और उनकी यात्रा और रहने का खर्च विदेशी प्राइवेट कंपनियों ने उठाया। इसका मतलब है कि उनका 1993 का ट्रिप कोई इंडिपेंडेंट डिप्लोमैटिक एंगेजमेंट नहीं था, बल्कि एंगेजमेंट और कल्चर का एक स्ट्रक्चर्ड, बाहर से फंडेड प्रोसेस था। 
मोदी का नाम ACYPL की ऑफिशियल एल्युमनाई लिस्ट में है। 
जुलाइ 2026 में पाकिस्तानी मीडिया ने साफ तौर पर बताया कि ACYPL को आम तौर पर CIA का फ्रंट माना जाता है, एक ऐसा ऑर्गनाइज़ेशन जिसका इस्तेमाल CIA दुनिया भर में एसेट्स बनाने और भविष्य के लीडर्स को U.S. एजेंडा के साथ जोड़ने के लिए तैयार करने के लिए करती है।
मोदी सिर्फ CIA प्रोग्राम के एल्युमनाई नहीं थे। उन्होंने 1999 में युवा लीडर्स के लिए U.S. स्टेट डिपार्टमेंट के 'स्टडी ऑफ द U.S. इंस्टिट्यूट्स' (SUSI) प्रोग्राम में भी हिस्सा लिया था। नेशनल पॉलिटिकल स्टेज में आने से पहले उन्होंने कम से कम छह साल तक ट्रेनिंग ली।
 (2). 2014 ➤  CIA और मोसाद ने मोदी की जीत कैसे सुनिश्चित की—
2014 के चुनाव के नतीजे, जिसमें काँग्रेस पार्टी के साँसदों की संख्या 206 से घटकर 44 हो गई थी, वह 'नैचुरल मैंडेट' नहीं था।  काँग्रेस के पूर्व MP कुमार केतकर ने सबके सामने आरोप लगाया कि CIA और मोसाद ने काँग्रेस पार्टी की हार की साज़िश रची थी।
वजह? एक स्थिर, काँग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार भारत के फ़ैसले लेने में किसी भी बाहरी दखल को कम करेगी। इसलिए, उन्होंने एक गैर-कांग्रेसी बहुमत वाली सरकार बनाने का फ़ैसला किया, यह मानते हुए कि ऐसी लीडरशिप उनके फ़ायदे के लिए बेहतर होगी। खबर है कि मोसाद ने भारत के अलग-अलग राज्यों और चुनाव क्षेत्रों को कवर करते हुए डिटेल्ड पॉलिटिकल असेसमेंट डेटा इकट्ठा किया।
(3). ऐपस्टीन नेटवर्क मोसाद की शैडो डिप्लोमेसी ➤
'द न्यूयॉर्क टाइम्स' की रिपोर्ट्स ने सबसे गुप्त लेयर का खुलासा किया—
जेफ्री ऐपस्टीन ने भारत-इज़राइल सम्बंधों के स्ट्रेटेजिक मोड़ में एक अहम भूमिका निभाई।
ऐपस्टीन ने मोदी को सलाह दी कि वे इज़राइल से मिलिट्री और इंटेलिजेंस खरीद $2 बिलियन बढ़ा दें। ताकि रिश्ते मज़बूत हों और ह्वाइट हाउस का सपोर्ट मिल सके। मोदी के एक्शन लेने से पहले उन्होंने ट्रंप प्रशासन के कैबिनेट अपॉइंटमेंट और फॉरेन पॉलिसी में बदलाव के बारे में पहले से जानकारी शेयर की थी। ऐपस्टीन ने भारतीय अरबपति अनिल अंबानी को भी गाइड किया कि स्टीव बैनन, टॉम बैरक और जेरेड कुशनर जैसे ट्रंप के करीबी लोगों से कैसे जुड़े थे।
खास बात यह है कि ऐपस्टीन इस्राएली इंटेलिजेंस एजेंसी—मोसाद के लिए एक हाइ-लेवल ऑपरेटिव था। एक FBI मेमो में साफ तौर पर लिखा है, "ऐपस्टीन के इस्राएल के पूर्व प्रधानमंत्री एहुद बराक के साथ करीबी रिश्ते थे और उन्होंने उसकी गाइडेंस में जासूसी की ट्रेनिंग ली थी।" 
बराक 2013 और 2017 के बीच 30 से ज़्यादा बार ऐपस्टीन के न्यूयॉर्क टाउन हाउस गए।
ऐपस्टीन ने मोदी और इस्राएली 'डीप स्टेट' के बीच एक कनेक्शन का काम किया। उसकी भूमिका पर्सनल क्रिमिनैलिटी से कहीं ज़्यादा थी; यह एक जियोपॉलिटिकल ऑपरेशन था।  
(4). मोसाद के तरीके RAW ने दोहराए ➤
दरअसल, इज़राइल ने जो टूल फ़िलिस्तीनियों पर नज़र रखने के लिए बनाए थे, उन्हें भारत ने अपने आलोचकों को टारगेट करने के लिए अपनाया। मोसाद ने दशकों में 'टारगेटेड एलिमिनेशन' का जो तरीका विकसित किया, जिसमें ईरानी न्यूक्लियर साइंटिस्ट की हत्या भी शामिल है, उसे भारत के रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) ने कनाडा के सबअर्ब में सिख एक्टिविस्ट को टारगेट करने के लिए दोहराया।
14 फरवरी, 2026 को, भारतीय नागरिक निखिल गुप्ता ने मैनहट्टन फ़ेडरल कोर्ट में एक US-कैनेडियन सिख एक्टिविस्ट गुरपतवंत सिंह पन्नून की हत्या की साज़िश में शामिल होने का गुनाह कबूल किया और माना कि उसने एक भारतीय सरकारी कर्मचारी के कहने और कोऑर्डिनेशन पर काम किया। मोसाद के तरीकों को मोदी के ऑफ़िस के साथ भारत में सफ़लतापूर्वक 'एक्सपोर्ट' किया गया था, जो चेन ऑफ़ कमांड में सबसे ऊपर था।
(5). भारत इस्राएल के लिए एक 'प्रॉक्सी स्टेट' बन गया है ➤
मोदी प्रशासन असल में इस्राएल के लिए एक प्रॉक्सी स्टेट बन गया है, जिसमें भारतीय एजेंसियाँ ​​जासूसी के लिए इस्राएली टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रही हैं। RAW और मोसाद के बीच जो सहयोग 1980 के दशक में शुरू हुआ था, मोदी के राज में एक फॉर्मल डिफेंस और इंटेलिजेंस अलायंस में बदल गया है।
|• इज़राइली पेगासस स्पाइवेयर का इस्तेमाल राहुल गाँधी, कम से कम 40 पत्रकारों, सुप्रीम कोर्ट के जजों और चुनाव कमिश्नरों की निगरानी के लिए किया गया था।
|• भारत के सुप्रीम कोर्ट ने जाँचे गए 29 डिवाइस में से 5 में मैलवेयर पाया।
|• मोदी प्रशासन ने जाँच में सहयोग करने से इनकार कर दिया।
|• इस्राएल की डिफेंस एक्सपोर्ट कंट्रोल एजेंसी (DECA) ने पेगासस की बिक्री को मंज़ूरी दी।
सबसे बड़ा सच ➤
मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते क्योंकि वे कर नहीं सकते। वे जब एक बार बोलते हैं, तो ये सवाल उठने ज़रूरी हो जाते हैं—
• 2014 ➤ CIA और मोसाद ने काँग्रेस पार्टी की हार कैसे करवाई?
• ऐपस्टीन ➤ एक सिद्ध-दोषी सेक्स अपराधी और मोसाद के एसेट ने इस्राएल के प्रति भारत की विदेश नीति बनाने में भूमिका क्यों निभाई?
• पेगासस ➤ भारतीय पत्रकारों, जजों और विपक्षी नेताओं पर नज़र रखने के लिए इज़राइली स्पाइवेयर का इस्तेमाल क्यों किया गया?
• हत्याएं ➤ RAW ने विदेशों में हत्याओं के लिए मोसाद के टारगेटेड किलिंग के तरीके को क्यों कॉपी किया?
• प्रॉक्सी स्टेटस ➤ भारत इज़राइल के लिए प्रॉक्सी स्टेट क्यों बन गया है?
मोदी की चुप्पी सिर्फ़ एक कम्युनिकेशन स्टाइल नहीं है, यह उनकी असली पहचान छिपाने के लिए बनाया गया एक शील्डिंग मैकेनिज्म है। बोलना पूरे स्ट्रक्चर को एक्सपोज़ करना होगा और ऐसा वे कभी नहीं होने देंगे।♦️
#एकदा_जंबूद्वीपे 
फोटो—ACYPL की वेबसाइट से See less














  ~विजय राजबली माथुर ©

Monday, June 8, 2026

युवा आक्रोश को भटकाने का नया खेल ------ रश्मि दीक्षित

 




स्क्रिप्टेड गुस्सा और दिशाहीन नेतृत्व: युवा आक्रोश को भटकाने का नया खेल
देश में बदहाली और बेरोजगारी का दौर कोई आज की पैदाइश नहीं है, और न ही नीट (NEET) का पेपर पहली बार लीक हुआ है। यह युवाओं के भविष्य पर बरसों से लगा एक ऐसा घाव है, जिसका दर्द वही समझ सकता है जिसने अपनी रातों की नींद और माता-पिता की खून-पसीने की कमाई को सिस्टम की भेंट चढ़ते देखा है। जब सालों का यह दबा हुआ गुस्सा अचानक फूटता है, तो वह पूरी तरह स्वाभाविक और जायज है। लेकिन आज जब मुख्य विपक्ष सड़क से संसद तक इस मुद्दे पर पूरी ताकत से सरकार से लोहा ले रहा है, ठीक उसी वक्त एक समानांतर 'नए मोर्चे' का उभरना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
बारीकी से देखें तो समझ आता है कि यह नया उबाल युवाओं की उस वास्तविक बदहाली को न्याय दिलाने के लिए नहीं आया, बल्कि न्यायपालिका की एक टिप्पणी में उछाले गए 'कॉकरोच' शब्द की चोट और तात्कालिक आवेश से पैदा हुआ है। युवाओं का भविष्य तो बरसों से दांव पर लगा था, तब इस नए मोर्चे का यह दर्द क्यों नहीं जागा?
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे की कड़ियों को जोड़ें तो एक अलग ही खेल नज़र आता है। इस मुहिम के मुख्य चेहरों का अतीत और उनके तार कहीं न कहीं घूम-फिरकर एक खास राजनीतिक सोच और दलीय पृष्ठभूमि से जुड़ते रहे हैं। भले ही खुद को 'स्वतंत्र' और 'गैर-राजनीतिक' कहकर पेश किया जाए, लेकिन जब किसी मोर्चे की वैचारिक रीढ़ ही सीधे तौर पर स्थापित राजनीतिक दलों के पूर्व सिपहसालारों और सोशल मीडिया हैंडलर्स से जुड़ी हो, तो यह बात साफ़ हो जाती है कि इस पूरे गुस्से की दिशा कहीं और तय की जा रही है।
सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इस पूरे उभार के पीछे युवाओं, छात्रों या देश के भविष्य को लेकर कोई सोची-समझी नीति या विज़न है ही नहीं। यह किसी लंबी वैचारिक लड़ाई या ज़मीनी संघर्ष का नतीजा नहीं है। यह तो महज एक अदालती टिप्पणी के बाद हंसी-मजाक और तात्कालिक आवेश में खड़ी कर दी गई एक वेबसाइट और कुछ सोशल मीडिया पेजों का 'संयोग' है। जो ताकत खुद एक 'इत्तेफाक' या हादसे की तरह पैदा हुई हो, वह भला इतने बड़े और जटिल हालातों से जूझ रहे देश और युवाओं को संभालने का खाका कैसे पेश कर सकती है? जब आंदोलन का मुख्य नेतृत्व खुद सरेआम यह स्वीकार करता दिखे कि उसे समझ नहीं आ रहा कि आगे क्या करना है, तो समझ आता है कि नींव कितनी खोखली है। जहां नेतृत्व ही दिशाहीन हो, वहां योजनाएं बाद में सोची जाती हैं और राजनीति पहले शुरू हो जाती है।
सत्ता और व्यवस्था के चरित्र को समझने के लिए किसी समाजशास्त्रीय शोध की आवश्यकता नहीं होती, बस किसी भी शहर के धरना स्थल पर एक चक्कर लगा आना काफी है। लोकतांत्रिक देशों में विरोध प्रदर्शन का अधिकार एक बुनियादी हक माना गया है, लेकिन हकीकत यह है कि अमूमन एक अदद धरने की अनुमति पाने में आम इंसान की चप्पलें घिस जाती हैं। पुलिस रिपोर्ट और न जाने कितने दफ्तरों के चक्कर काटने के बाद भी 'कानून-व्यवस्था' का हवाला देकर फाइल बंद कर दी जाती है। लेकिन जब व्यवस्था अचानक इतनी दरियादिल हो जाए कि इन नए नवेले चेहरों को मांगते ही हाथों-हाथ धरने की अनुमति का परवाना थमा दिया जाए, तो माथा ठनकना स्वाभाविक है। जब प्रशासन खुद आगे बढ़कर लाल कालीन बिछाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि यह गुस्सा जनता का नहीं, बल्कि व्यवस्था द्वारा ही प्रायोजित एक स्क्रिप्ट का हिस्सा है।
यहाँ एक अजीब विरोधाभास दिखाई देता है। ये चेहरे मौजूदा सत्ता की नीतियों और कमियों पर उतने मुखर नहीं हैं, जितनी ऊर्जा वे व्यवस्था के खिलाफ लड़ रही मुख्य विपक्षी ताकतों की कमियां ढूंढने में लगा रहे हैं। अगर यह वाकई सत्ता की नीतियों से परेशान आम नागरिकों का कोई संगठन है, तो इनके तीखे सवाल सीधे शासन से होने चाहिए थे। लेकिन ज़मीनी हकीकत को समझने के बजाय, ये चेहरे अपने सोशल मीडिया फॉलोअर्स की संख्या के बूते अकेले ही पूरी जंग जीतने का भ्रम पालकर बैठ गए हैं। इस बिखराव का सीधा नुकसान उस लड़ाई को होगा जो लंबे समय से ज़मीन पर लड़ी जा रही है, और इसका सीधा फायदा अंततः सत्तासीन दल की झोली में जाकर गिरेगा। यह कोई साधारण चूक नहीं, बल्कि एक ऐसी रणनीति है जो बदलाव की हर गंभीर कोशिश को भीतर से कमज़ोर करती है।
इस तमाशे का सबसे दुखद पहलू यह है कि इसमें हमारे देश का भोला युवा वर्ग सबसे आसानी से इस्तेमाल हो जाता है। जिस ऊर्जा, जोश और आक्रोश को बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी अधिकारों के लिए एक ठोस नीतिगत लड़ाई में बदलना चाहिए था, वह भीड़ बनकर किसी शॉर्ट-कट एजेंडे के पीछे दौड़ रही है। युवाओं को लगता है कि वे क्रांति कर रहे हैं, जबकि असल में वे केवल उस बड़े खेल के मोहरे मात्र बन जाते हैं, जिसका रिमोट कंट्रोल किसी और के हाथ में है।
जब तक देश का युवा और आम नागरिक इन अचानक पैदा हुए आंदोलनों और तथाकथित 'सांस्कृतिक या सामाजिक लड़ाइयों' के कृत्रिम शोर में उलझा रहेगा, तब तक पर्दे के पीछे बैठे नीति-नियंताओं का काम बेहद आसान हो जाता है। व्यवस्था की नजर में आम जनता की हैसियत कॉकरोच से ज्यादा कुछ नहीं है। उन्हें लगता है कि इन्हें एक सुरक्षित कोना दे दो, जहाँ ये बैठकर चिल्लाते रहें और खुश रहें कि इन्हें अभिव्यक्ति की आजादी मिली हुई है। जब तक यह शोर एक तय दायरे के अंदर है और सत्ता की जड़ों को नहीं हिलाता, तब तक ऐसी हर अनुमति हाथों-हाथ मिलती रहेगी।
लेकिन युवाओं को अब यह अक्ल लानी होगी कि वे इस व्यवस्था के सुरक्षित कोने में रेंगने वाले मोहरे नहीं हैं। बदलाव रातों-रात किसी वायरल पोस्ट या बिना विज़न के खड़े हुए मंचों से नहीं आता। अगर वाकई देश की तस्वीर बदलनी है, तो युवाओं को 'शोर' और 'ठोस नीति' के बीच का अंतर समझना होगा। उन्हें किसी प्रायोजित स्क्रिप्ट का हिस्सा बनने से इंकार करना होगा। असली क्रांति सोशल मीडिया के फॉलोअर्स की गिनती में नहीं, बल्कि ज़मीनी संघर्ष, स्पष्ट रोडमैप और व्यवस्था को हिला देने वाली वैचारिक एकजुटता में होती है। जब युवा केवल आक्रोश दिखाना छोड़, एक स्पष्ट विज़न के साथ डटना सीख जाएगा, तब व्यवस्था उसे कॉकरोच समझने की भूल कभी नहीं कर पाएगी।




 ~विजय राजबली माथुर ©
 

Wednesday, June 3, 2026

प्रिय #students #GenZ के बच्चों, ------ रश्मि दीक्षित




प्रिय #students #GenZ के बच्चों,

#नीट, #सीबीएसई, #सीयूईटी और #एसएससी #जीडी जैसी परीक्षाओं की अव्यवस्थित अनियमितताओ के चक्रव्यूह में फंसकर आज तुम जिस मानसिक तनाव, अनिश्चितता और गहरे दुख-दर्द से गुजर रहे हो, उसे पूरा देश देख रहा है।

अपनी मेहनत को चंद रुपयों में लीक होते देखना और अपने साथियों को प्रशासनिक नाकामियों के कारण आत्मघाती कदम उठाते देखना कोई मामूली तकलीफ नहीं है। व्यवस्था के इस क्रूर मजाक के खिलाफ तुम्हारा गुस्सा बिल्कुल जायज है और सत्ता पक्ष में किसी को तो इसकी जिम्मेदारी लेनी ही होगी।

लेकिन इस बेहद संवेदनशील मोड़ पर तुम्हें बहुत सतर्क रहने की जरूरत है। इस खुले खत के जरिए मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूं कि अपनी इस वास्तविक तकलीफ और आंसुओं का फायदा किसी और को अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए मत उठाने दो।

जो इंसान अब तक अपने डर की वजह से कभी हिंदुस्तान वापस आना ही नहीं चाहता था, वह अचानक 6 जून को ही वापस क्यों आ रहा है? समय के खेल को समझो; ठीक 6 जून को देश के प्रमुख विपक्षी दलों की एक बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है,जो हफ़्तों से तुम्हारे हक की लड़ाई चिलचिलाती गर्मी में सड़को पर लड़ रहा है।

यह लड़ाई विशुद्ध रूप से तुम्हारी है, तुम्हारे भविष्य की है, और इसे बेहद मजबूत कंधों के सहारे ही लड़ा जा सकता है। याद रखो, वे कंधे कभी मजबूत नहीं हो सकते जो CJI के एक बयान के बाद महज हंसी-मजाक ,उत्तेजना और सैटायर (व्यंग्य) के रूप में तुम्हें मिले थे। जिस मंच की अपनी कोई ठोस वैचारिक गहराई या जमीनी रीढ़ ही नहीं है, वह इतने बड़े देश के युवाओं के भविष्य का बोझ कैसे उठा सकता है?

इस पूरे ताने-बाने को थोड़ी और गहराई से समझो। जो व्यक्ति आज विदेश में बैठकर सोशल मीडिया पर वीडियो में चमका रहा है अचानक भारत लौटकर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहा है, उसके बयानों के पीछे छुपे अहंकार को पहचानो। उसके संवादों में छिपा यह 'मैं' और व्यक्तिगत अहंकार देखने लायक है- "मैं आ रहा हूं इस्तीफा मांगने", जैसे वह अकेला अपने दम पर तुम्हें यह लड़ाई जिता देगा।

वह विपक्ष के अब तक के जमीनी और शांतिपूर्ण संघर्ष को यह कहकर छोटा और कमजोर दिखाने की कोशिश की रहा है कि देश भर में प्रोटेस्ट तो हो रहे हैं पर उनसे सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ रहा। यानी जो लोग हफ्तों से लाठियां खा रहे हैं, जमीन पर संघर्ष कर रहे हैं, उनकी मेहनत बेकार है और चमत्कार सिर्फ इसके आने से होगा? यह आत्ममुग्धता इतनी सीधी और सरल नहीं है, इसके पीछे एक गहरी राजनीतिक मंशा हो सकती है।

यह व्यक्ति पूर्व में आम आदमी पार्टी में सक्रिय कार्यकर्ता रह चुका है ये तो सभी जानते हैं। पर सवाल इसके बाद उठता है कि वह अच्छी तरह जानता है कि पिछले 12 सालों से देश की राजनीति में न तो जवाबदेही बची है और न इस्तीफों का कोई चलन है। और उसे यह भी बखूबी मालूम है कि भारत के कानून के तहत किसी भी प्रदर्शन के लिए पहले से प्रशासनिक अनुमति लेनी अनिवार्य होती है। इसके बावजूद उसने कोई पूर्व अनुमति नहीं ली?

ये जानते हुए भी कि सत्ता पक्ष आन्दोलनों को किस तरह संभालता है, बस हवा-हवाई दावों के सहारे सबको सोशल मीडिया पर सीधे एयरपोर्ट पर पहुंचने का बुलावा दे दिया। बिना किसी कानूनी तैयारी के भीड़ इकट्ठा करना और फिर पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने जाकर परमिशन मांगने का नाटक करना, आठ लाख ऑनलाइन हस्ताक्षरों का भ्रम फैलाकर एक गंभीर छात्र आंदोलन को प्रशासनिक टकराव की अंधी गली में धकेलने की साजिश है।

हिंदुस्तान में पैर रखने से पहले ही अपनी संभावित गिरफ्तारी का अंदेशा जताकर पहले से ही एक 'विक्टिम कार्ड' तैयार कर लेना साफ इशारा है कि यहाँ कोई ठोस व्यावहारिक योजना नहीं है। अभिजीत दीपके राजनीतिक रूप से कोई अपरिचित इंसान नहीं है, मुझे अभिजीत में संभावना नजर आती है और मैं चाहती हूं कि ऐसे लोग राजनीति में आएं, लेकिन खेल-खेल में बनी इस वेबसाइट की सोशल मीडिया पर अप्रत्याशित रीच देखकर, करियर री-लॉन्चिंग यह एक बुरा विचार है वह भी छात्र आंदोलन जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दे पर।

अभिजीत दीपके का लाईफ प्लान विदेश में पढ़ाई कर वहीं नौकरी करना था,अगर देश और समाज की इतनी ही चिंता हमेशा से थी, तो अपनी पुरानी पार्टी के बिखरने के बाद इसे समाज में सक्रिय रहना चाहिए था, जो कि यह बिल्कुल नहीं रहा। अब जरा ठंडे दिमाग से सोचो, कहीं यह तुम्हारे वास्तविक और पवित्र प्रोटेस्ट को पूरी तरह खराब और बदनाम करने के लिए बुना गया कोई सियासी ताना-बाना तो नहीं है?

बिना किसी संगठन और व्यावहारिक सोच के खड़ा किया गया यह गैर-जिम्मेदाराना तमाशा मौजूदा सरकार की एक 'सी-टीम' की तरह काम करता दिख रहा है, जिसका इकलौता मकसद विपक्ष के अब तक के गंभीर, वास्तविक और शांतिपूर्ण संघर्ष को जनता की नजरों में हल्का करना, असली मुद्दे को भटकाकर बिखरा देना और अंततः व्यवस्था को फायदा पहुंचाना है।

एक दशक पहले अन्ना आंदोलन के जरिए भी पूरे हिंदुस्तान की भावनाओं और गुस्से को इसी तरह भुनाकर एक बहुत बड़ा धोखा दिया गया था, जिसका हर्जाना देश पिछले 12 सालों से भुगत रहा है। यही वजह है कि जो समझदार और अनुभवी लोग शुरुआत में इस मंच के जोश में जुड़े थे, उन्होंने इतिहास की कड़वाहट को याद रखते हुए समय रहते अपने कदम पीछे खींच लिए।

तुम इस हिंदुस्तान की सबसे समझदार, जागरूक और तार्किक पीढ़ी हो। भावनाओं के सैलाब में बहकर कोई भी ऐसा कदम मत उठाओ जिससे तुम्हारी सालों की तपस्या और यह आंदोलन एक राजनीतिक ड्रामे में तब्दील हो जाए। अगर आज कोई तुमसे यह कहता है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों या सत्याग्रह से तुम व्यवस्था से नहीं जीत सकते, तो तुम्हें इतिहास को दोबारा पलटने की जरूरत है।

हमारी आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी की भूमिका को याद करो, जिसे पिछले 12 सालों में एक सोची-ऐसी रणनीति के तहत बेहद कमजोर दिखाने की कोशिश की गई है। सत्य, अहिंसा और बिना किसी हुड़दंग के किया गया शांतिपूर्ण आंदोलन ही इस देश में अधर्म और दमनकारी व्यवस्था के खिलाफ सबसे अचूक और मजबूत हथियार रहा है। वर्तमान में इसका सबसे बड़ा उदाहरण किसान आंदोलन था।

अपनी लड़ाई खुद लड़ो, गरिमा के साथ लड़ो, और ऐसे किसी भी छलावे या सोशल मीडिया के मुखौटों के मोहरे मत बनो जिनका मकसद सिर्फ अपनी सियासी दुकान चमकाना है।

इस पूरे सफर में तुम खुद को अकेला मत समझना। सच की इस राह पर हम सब, पूरा देश तुम्हारे साथ है। तुम्हारी इस जायज और पवित्र लड़ाई में हम कदम से कदम मिलाकर तुम्हारे पीछे खड़े हैं। हिम्मत मत हारना, हौसला बनाए रखना, जीत अंततः तुम्हारी ही होगी।

एक अभिभावक और तुम्हारी शुभचिंतक,
रश्मि दीक्षित






  ~विजय राजबली माथुर ©

Sunday, May 31, 2026

सच बोलने वाले साहसी ------ विजय राजबली माथुर











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अकबर इलाहाबादी  का कथन  है  ------

"  न खींचो तीर कमानों को , न तलवार निकालो   । 

  जब तोप मुकाबिल हो ,        तो अखबार निकालो।। "

आचार्य महावीर प्रसाद  द्विवेदी ने भी कहा है कि,  जो शक्ति साहित्य में छिपी रहती है वह तोप, तलवार और बम के गोलों में भी नहीं पाई जाती। 

 स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अखबार साहित्य का  भी प्रतिविम्ब होते थे। साहित्य समाज का भी दर्पण होता है। 



आज क्या अखबार क्या दृश्य चेनल्स  सभी शोषकों - उत्पीड़कों का गुण - गान करने में व्यस्त हैं तब दीपक शर्मा ,  पल्लवी राय और मनोरमा सिंह सरीखे पत्रकार निर्भीकता - पूर्वक समाज और साहित्य का दर्पण बन कर जनता को जागरूक और देश को गौरान्वित कर रहे हैं , हम उनके साहस और निर्भीकता की सराहना करते और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए मंगलकामनाए करते हैं। 





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 ~विजय राजबली माथुर ©
 

Friday, May 8, 2026

ये सिर्फ़ एसआईआर का प्रभाव है ------ Mukesh Kumar

 
ममता बैनर्जी का दावा है कि बीजेपी ने उनसे 100 सीटें छीनी हैं। राहुल गाँधी ने उनके इस दावे का समर्थन भी किया है। तमाम विपक्षी दल भी उनसे सहमत हैं। लेकिन बीजेपी और गोदी मीडिया तरह-तरह के तर्क और आँकड़े देकर उन्हें झुठलाने में लगा हुआ है। 
इस अभियान के तहत एक नरैटिव ये बनाया जा रहा है कि ममता बैनर्जी की हार जनता की ज़बर्दस्त नाराज़गी की वज़ह से हुई। ये सही है कि पंद्रह साल से सत्ता में रहने की वज़ह से एंटी एनकंबेंसी रही होगी। मगर ये नहीं भूलना चाहिए कि लोकसभा चुनाव में उन्होंने ज़बर्दस्त प्रदर्शन किया था और बीजेपी को धूल चटा दी थी। 
दूसरे नरैटिव के तहत बताया जा रहा है कि हिंदुत्व की सुनामी ने ममता को डुबा दिया। यानी बीजेपी का घुसपैठिए का हौआ और ममता बैनर्जी का तथाकथित मुस्लिम प्रेम उनके ख़िलाफ़ चला गया। 
इसे भी आंशिक रूप से ही सही माना जा सकता है। सचाई ये है कि ये तमाम तर्क वोट चोरी को छिपाने के लिए दिए जा रहे हैं। कोशिश ये की जा रही है कि लोग धांधलियों की बात करने के बजाय ममता की नाकामी और बीजेपी की अभूतपूर्व कामयाबी की बात की जाए। 
लेकिन सचाई क्या है, आँकड़े क्या कहते हैं...जबरन थोपी गई एसआईआर का चुनाव पर कोई असर पड़ा या नहीं पड़ा। आँकड़ों की छानबीन करके बताया जा रहा है कि 49 से लेकर 105 सीटें ऐसी हैं जिन पर एसआईआर का असर देखा जा सकता है। बल्कि कहा जा सकता है कि एसआईआर की वज़ह नतीजों पर सीधा असर पड़ा। 
द वायर के मुताबिक 150 सीटें ऐसी हैं जिन पर हार जीत का अंतर हटाए गए मतदाताओं की संख्या से कम रहा। बीजेपी ने इनमें से 99 सीटें जीतीं, जबकि 2021 में उसने केवल 19 सीटें जीती थीं। यानी 80 सीटों का फ़ायदा। 
स्क्रोल . इन के मुताबिक 105 ऐसी सीटें हैं जिनमें बीजेपी की जीत का अंतर उन सीटों पर काटे गए वोटों से कम है। यानी अगर वोट नहीं काटे गए होते तो बीजेपी शायद नहीं जीत पाती। 
चुनाव में टीएमसी ने 129 सीटें गँवाई हैं। अगर इनमें से स्विंग सीटों को देखें तो 86 सीटें ऐसी हैं जिनमें बीजेपी की जीत का अंतर काटे गए वोटों से भी कम है। 
जादवपुर सीट को लीजिए। पिछले चुनाव में बीजेपी यहाँ तीसरे नंबर पर थी। मगर इस बार वह सत्ताईस हज़ार वोट से जीत गई। इस सीट पर 56 हज़ार मतदाताओं के नाम काटे गए थे। 
द ऑल्ट के मुताबिक 49 सीटें ऐसी हैं जहाँ पर हार जीत का अंतर ऐसे वोटरों की संख्या से कम रहा जो इसलिए वोट नहीं डाल सके क्योंकि उनके मताधिकार का फ़ैसला ही नहीं हो सका। 
एक विश्लेषक विकास कुमार ने दिलचस्प आँकड़े दिए हैं। सबसे ज़्यादा डिलीशन वाली 100 सीटों में भारी उलटफेर हुआ है। उनके मुताबिक 2021 में इन 100 सीटों में से बीजेपी के पास केवल 20 सीटें थीं मगर एसआईआर की बदौलत वे बढ़कर 68 हो गईँ। यानी 48 सीटों पर खेला।
ध्यान रहे, ये सिर्फ़ एसआईआर का प्रभाव है। और दूसरी तरह से जो खेल किए गए उनका हिसाब किताब भी लगाया जाए तो बीजेपी कहाँ होगी सोचा जा सकता है।






 ~विजय राजबली माथुर ©
 

Sunday, May 3, 2026

RSS और BJP भारतीय लोकतंत्र की हत्या के गुनाहगार ------ Rajesh R. Singh



RSS और BJP भारतीय लोकतंत्र की हत्या के गुनाहगार 
चंद्र बाबू नायडू और नीतीश कुमार जैसे अनुभवी सियासी बाजीगर, जो कभी मोदी को तानाशाह करार देते थे और आरएसएस की विचारधारा से दूरी बनाते दिखते थे, आज केंद्र में आरएसएस-प्रेरित सरकार को अटूट समर्थन प्रदान कर रहे हैं। 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा 240 सीटों पर सिमट गई, लेकिन टीडीपी के 16 और जेडीयू के 12 सांसदों समेत एनडीए के गैर-भाजपा सहयोगियों ने कुल 293 सांसदों का समर्थन देकर सरकार बनाई। इन नेताओं के कानों में लोकतंत्र के खात्मे की कोई पदचाप नहीं गूँज रही, न ही इनकी आंखों में आरएसएस की कथित तानाशाही का भय दिखाई दे रहा। नायडू 2018 में विशेष श्रेणी का दर्जा न मिलने पर एनडीए छोड़ चुके थे और मोदी सरकार पर हमले बोलते थे, लेकिन 2024 में आंध्र प्रदेश के लिए विशेष पैकेज और मंत्रालयों के लालच में फिर गले मिल गए। नीतीश कुमार तो पिछले दशक में कई बार पाला बदल चुके, 2013 में भाजपा से अलग हुए, 2017 में वापस लौटे, 2022 में महागठबंधन में गए और फिर 2024 से पहले एनडीए में लौट आए। यह सौदेबाजी है, बिहार और आंध्र के विकास, विशेष श्रेणी का दर्जा, रेलवे जैसे मंत्रालय और फंड्स के बदले संवैधानिक मूल्यों की बलि चढ़ाने का सौदा। इनके लिए सत्ता की कुर्सी संविधान और लोकतंत्र से कहीं ज्यादा अहम है, क्योंकि क्षेत्रीय अस्मिता और वोट बैंक बचाने की मजबूरी ने उन्हें सिद्धांतों से ऊपर उठा दिया। खैर नीतीश बाबू को उनकी करनी की सजा मिल गयी संघीयों नें उन्हें निगल लिया चंद्र बाबू को निगलने के लिए उनके खेमें में गद्दार तैयार किए जा रहे हैं देर सबेर उन्हें भी संघी निगल लेंगे।
आरएसएस, जिसकी स्थापना 1925 में डॉ. के.बी. हेडगेवार ने की, आजादी की लड़ाई में कोई संगठनात्मक भूमिका नहीं निभाई। बल्कि इसके संस्थापक और दूसरे सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर ने क्विट इंडिया आंदोलन जैसे राष्ट्रव्यापी संघर्षों से दूरी बनाए रखी और ब्रिटिश राज के खिलाफ सीधा मुकाबला 'प्रतिक्रियावादी' करार दिया। गोलवलकर की किताब 'वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड' (1939) में नाजी जर्मनी और फासीवादी इटली से प्रेरणा ली गई, जहां अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे का नागरिक मानने वाली सोच व्यक्त की गई। गांधीजी की हत्या के बाद संगठन पर प्रतिबंध लगा था। RSS ने शुरू से 'हिंदू एकता' और अनुशासन पर जोर दिया, लेकिन कांग्रेस के अखिल भारतीय आंदोलनों से परहेज किया। आज वही संगठन संविधान को 'पश्चिमी नकल' बताकर उसकी आलोचना करता रहा है और मनुस्मृति जैसे प्राचीन ग्रंथों को आदर्श मानता है। 1949 में आरएसएस के मुखपत्र 'ऑर्गनाइजर' ने संविधान बनने पर अफसोस जताया कि उसमें 'भारतीय' तत्व नहीं हैं और मनु के कानूनों का कोई उल्लेख नहीं। फिर भी 100 से ज्यादा गैर-आरएसएस सांसद मोदी-शाह के इशारे पर घूम रहे हैं, बिना इस ऐतिहासिक गद्दारी और विचारधारा के खतरे को समझे। लाखों स्वतंत्रता सेनानियों, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, गांधीजी के अनुयायियों की कुर्बानी से बड़ी ही मुश्किल से मिला लोकतंत्र अब 'हिंदू राष्ट्र' के खांचे में ढाला जा रहा है, जहां बहुलवाद की जगह एकरूपता थोपी जा रही है। इन सांसदों का ज़मीर सोया हुआ है या सत्ता की चकाचौंध में पूरी तरह बेहोश हो चुका है?
ये सांसद भूल गए कि आजादी की लड़ाई में कांग्रेस, समाजवादियों और क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश साम्राज्य से सीधा संघर्ष किया, जबकि आरएसएस ने हिंदू संगठन को मजबूत करने और मुस्लिम एकता को खतरा मानकर अलग राह चुनी। गोलवलकर ने लोकतंत्र को हिंदू संस्कृति के अनुकूल नहीं माना और मनुस्मृति को कानून का आधार बनाने की वकालत की, जिसमें वर्ण व्यवस्था और असमानता को वैध ठहराया गया। आज एनडीए सरकार में सहयोगी दल इसी विचारधारा के विस्तार को चुपचाप देख रहे हैं। चंद्र बाबू नायडू और नीतीश कुमार जानते हैं कि उनकी पार्टियां टीडीपी और जेडीयू क्षेत्रीय मुद्दों, आंध्र के विकास, बिहार के विशेष दर्जे पर टिकी हैं, लेकिन आरएसएस की सांस्कृतिक और संगठनात्मक मशीनरी धीरे-धीरे उनके वोट बैंक को भी निगल सकती है। 2024 में भाजपा के बहुमत न होने के बावजूद इन नेताओं ने 'अनकंडीशनल सपोर्ट' दिया, क्योंकि विकास के वादे, केंद्रीय फंड्स और मंत्रालयों का लालच लोकतंत्र के लंबे खतरे से बड़ा साबित हुआ। क्या ये लोग नहीं देख रहे कि उनकी पार्टियों का वजूद और क्षेत्रीय स्वायत्तता RSS की केंद्रीकृत 'एक राष्ट्र, एक संस्कृति' वाली सोच में धीरे-धीरे विलीन हो रही है? इतिहास में कई क्षेत्रीय दल बड़े सहयोगी के साथ घुल-मिलकर अपनी पहचान खो चुके हैं, लेकिन सत्ता का नशा इनके विवेक को कुचल रहा है।
लाखों शहीदों की शहादत पर सवाल उठाना आसान है, लेकिन सच्चाई यह है कि भारतीय लोकतंत्र ने सभी विचारधाराओं, वामपंथी, दक्षिणपंथी और सेकुलर को जगह दी। आरएसएस ने शुरू से ही 'हिंदू राष्ट्र' की कल्पना की, जिसमें अल्पसंख्यक 'हिंदू संस्कृति' अपनाने को मजबूर हों। इसके प्रारंभिक दस्तावेजों में बहुलवाद और समानता वाले संविधान से असहजता साफ झलकती है। 1949 के ऑर्गनाइजर संपादकीय में मनुस्मृति की तारीफ करते हुए कहा गया कि संविधान में प्राचीन भारतीय कानूनों का अभाव है। आज भी कुछ आरएसएस नेता 'सेकुलर' और 'सोशलिस्ट' शब्दों की समीक्षा की बात करते हैं। फिर भी ये समर्थन देने वाले दल इस बहस में नहीं पड़ना चाहते। उनका डर सिर्फ चुनावी हार और सत्ता गंवाने का है, न कि संवैधानिक मूल्यों का। इन्हे यह कहते हुए सुना जा सकता है कि अगर आरएसएस की तानाशाही आ रही होती, तो ये 'किंगमेकर' पहले ही पाला बदल चुके होते, लेकिन सत्ता और फंड्स का स्वाद इतना मीठा है कि लोकतंत्र के दुश्मन बनकर भी ये घूम रहे हैं। चंद्र बाबू ने 2014 से विशेष श्रेणी का दर्जा मांगा, नीतीश ने बिहार के लिए 2000 से मांग की, और 2024 में एनडीए में शामिल होकर इन्हें हासिल करने की उम्मीद में चुप्पी साध ली।
ये सब कब जागेंगे? शायद तब जब उनकी अपनी पार्टियां, टीडीपी और जेडीयू आरएसएस की शाखाओं में बदल चुकी होंगी, जब क्षेत्रीय अस्मिताएं केंद्रीय हिंदुत्व में पूरी तरह घुल-मिल गई होंगी। नीतीश कुमार का फ्लिप-फ्लॉप इतिहास प्रसिद्ध है, वे 'सुशासन बाबू' के रूप में जाने जाते थे, लेकिन सत्ता बचाने के लिए बार-बार गठबंधन बदलते रहे। नायडू भी ट्रांजेक्शनल पॉलिटिक्स के माहिर हैं। आज ये नेता जानते हैं कि भाजपा बिना उनके समर्थन के बहुमत नहीं बना सकती, फिर भी वे बिना शर्त समर्थन दे रहे हैं क्योंकि अल्पकालिक फायदे, विशेष पैकेज, मंत्रालय, लंबे लोकतांत्रिक खतरे से ज्यादा आकर्षक हैं। इतिहास गवाह है कि सत्ता के लिए सिद्धांत बेचने वाले अंत में खुद बिक जाते हैं। आरएसएस की विचारधारा अनुशासन के नाम पर बहुलवादी भारत को एकरूप बनाने की कोशिश लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती है। सहयोगी दल अगर आज पदचाप नहीं सुन रहे, तो कल उनके कार्यकर्ता और वोटर जब जागेंगे, तब तक उनकी पहचान मिट चुकी होगी।
अंत में, भारतीय लोकतंत्र मजबूत है क्योंकि यह बहुलवादी और समावेशी है, न कि किसी एक विचारधारा का गुलाम। आरएसएस चाहे जितना हिंदू राष्ट्र का सपना देखे, संविधान की जड़ें समता, स्वतंत्रता, न्याय गहरी हैं। लेकिन सवाल ये है कि जो सांसद आज आरएसएस के प्रभाव में 'मोदी-शाह के इशारे' पर चल रहे हैं, वे कल खुद को और अपनी विरासत को बचाने के लिए क्या करेंगे? लाखों शहीदों की आहें, संविधान निर्माताओं का सपना और आजादी की लड़ाई की यादें इनके कानों तक पहुंचनी चाहिए। जागना होगा, वरना इतिहास इन्हें सिर्फ सत्ता के दलाल और लोकतंत्र के कमजोर करने वाले के रूप में याद रखेगा, न कि रक्षक के रूप में। सच्चा लोकतंत्र तब बचता है जब सत्ता के सहयोगी भी सवाल पूछें, विपक्ष की तरह नहीं तो कम से कम अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनें। जनता को भी सतर्क रहना होगा, क्योंकि लोकतंत्र किसी एक दल या गठबंधन की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की अमूल्य विरासत है। सत्ता का खेल खेलते रहो, लेकिन याद रखो, जो आजादी के सपनों से समझौता करता है, वह खुद इतिहास की कचरा टोकरी में समा जाता है। जागो सोने वालों, वरना बहुत देर हो जाएगी।
Rajesh R. Singh

  ~विजय राजबली माथुर ©

 

Wednesday, April 29, 2026

लाल बहादुर शास्त्री ------ Pankaj Kumar Jat




9 जून 1964 को एक 5 फुट 2 इंच का दुबला-पतला आदमी भारत का प्रधानमंत्री बना था और 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में उनकी रहस्यमयी मौत हो गई। कुल कार्यकाल लगभग 19 महीने। बस 19 महीने। 
इन 19 महीनों का वजन आज की कई पूरी सरकारों पर भारी पड़ता है। जिस आदमी को विदेशी प्रेस ने “अनलाइकली सक्सेसर” कहा, उसी ने पाकिस्तान को जवाब दिया, अमेरिका के दबाव को ठुकराया, किसानों को सम्मान दिया, सैनिकों का मनोबल बढ़ाया और देश को आत्मनिर्भरता की राह पर धकेल दिया। 
नाम था लाल बहादुर शास्त्री। कद छोटा था, काम हिमालय जितना बड़ा था।
आज देश में कैमरे की चमक को नेतृत्व समझ लिया गया है, भाषण को नीति और नारे को उपलब्धि। ऐसे समय में शास्त्री जी का नाम लेना ही कई लोगों की राजनीति पर तमाचा है। क्योंकि शास्त्री जी ने सत्ता को निजी ब्रांड नहीं बनाया, देश सेवा बनाया।
उन्होंने प्रधानमंत्री बनते ही खुद की मूर्तियाँ नहीं लगवाईं, खुद का चेहरा हर दीवार पर नहीं चिपकवाया, हर योजना का नाम अपने ऊपर नहीं रखा। वे उन नेताओं में थे जो काम करके चुप रहते थे, आज वाले उन नेताओं में हैं जो चुप रहकर भी प्रचार करवा लेते हैं।
रेल मंत्री रहते हुए 1956 में अरियालुर रेल दुर्घटना हुई। आज के नेताओं की तरह जांच बैठाओ, बयान दो, विपक्ष को दोष दो, मीडिया मोड़ दो वाला खेल नहीं खेला। शास्त्री जी ने नैतिक जिम्मेदारी ली और इस्तीफा दे दिया। सोचिए, एक रेल दुर्घटना पर इस्तीफा। 
आज तो पुल गिर जाए, ट्रेन भिड़ जाए, पेपर लीक हो जाए, बेरोजगार सड़क पर पिट जाएं, तब भी कुर्सी से चिपके रहते हैं जैसे फेविकोल की सरकारी स्कीम में आए हों।
प्रधानमंत्री बने तो देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था। अमेरिका PL-480 के तहत गेहूं देकर दबाव बनाता था। शास्त्री जी ने कहा हम भूखे रह लेंगे, झुकेंगे नहीं। खुद एक वक्त उपवास रखा, देश से अपील की। पहले खुद त्याग किया, फिर जनता से कहा। 
आज पहले जनता से गैस महंगी करवाओ, फिर खुद वातानुकूलित मंच से त्याग पर भाषण दो। यही फर्क है चरित्र और अभिनय में।
शास्त्री जी ने “जय जवान जय किसान” नारा दिया था। यह नारा चुनावी मंच की तुकबंदी नहीं था, राष्ट्रीय दर्शन था। उन्होंने 1965 युद्ध में सेना को खुला मनोबल दिया। पाकिस्तान के अयूब खान जिन्हें लगा था छोटा आदमी है, बाद में उसी आदमी की दृढ़ता माननी पड़ी। 
दूसरी तरफ किसानों के लिए FCI, राष्ट्रीय बीज ढांचा, हरित क्रांति की नींव, डेयरी विकास के लिए NDDB, अमूल मॉडल का विस्तार। आज किसान सड़क पर बैठे रहें, महीनों मरते रहें, तब सरकार उन्हें राष्ट्रविरोधी बताने लगती है। 
शास्त्री जी होते तो पहले बात करते, बाद में बिल लाते।
उनके पास अपनी कार तक नहीं थी। परिवार के कहने पर 12,000 रुपये का लोन लेकर फिएट कार खरीदी। मृत्यु के समय कर्ज बाकी था। पत्नी ने पेंशन से चुकाया। जरा तुलना कर लो। आज वार्ड स्तर का नेता करोड़पति, जिला स्तर वाला उद्योगपति, ऊपर वाला तो मानो चलता-फिरता विज्ञापन साम्राज्य। और एक प्रधानमंत्री ऐसा भी था जो कर्ज में मरा मगर ईमानदारी में अमर हो गया।
उनके बेटे को नौकरी में प्रमोशन मिला तो रद्द करवा दिया। सरकारी कार निजी काम में चली तो किलोमीटर का हिसाब लेकर पैसा जमा कराया। आज परिवारवाद पर भाषण देने वाले खुद रिश्तेदारों, मित्रों, चहेतों और कॉरपोरेट दरबारियों से घिरे रहते हैं। जनता को प्रवचन, अपने लोगों को संरक्षण। पुरानी चाल है, बस पैकिंग नई है।
शास्त्री जी फटा कुर्ता कोट के नीचे पहन लेते थे। कहते थे शर्म तब होनी चाहिए जब किसान नंगा सोए। आज शर्म किसे है? लाखों का सूट, करोड़ों का प्रचार, और जनता को डेटा पैक से राष्ट्रवाद डाउनलोड कराया जाता है। 
किसान की आय दोगुनी का सपना दिखाकर लागत चौगुनी कर दी। बेरोजगार को ऐप दे दिया, मजदूर को भाषण, छात्र को परीक्षा घोटाला।
11 जनवरी 1966 को ताशकंद में उनकी मृत्यु हुई। आधिकारिक कारण हार्ट अटैक बताया गया। परिवार ने सवाल उठाए। पोस्टमार्टम नहीं हुआ। फाइलें वर्षों बंद रहीं। सरकारें बदलीं, राज बदला, पर सच पर ताला जस का तस। 
कांग्रेस हो या बीजेपी, दोनों ने इस प्रश्न से दूरी बनाई। क्योंकि इतिहास की ईमानदार जांच से कई नकाब उतरते हैं, और सत्ता को नकाब बहुत प्रिय होता है।
आज कुछ लोग शास्त्री जी का नाम लेते हैं, पर उनकी आत्मा से डरते हैं। क्योंकि अगर शास्त्री मॉडल लागू हो जाए तो आधे नेता संपत्ति घोषित करते ही बेहोश हो जाएं, चौथाई इस्तीफा देने पड़ जाएं, बाकी प्रचार विभाग में नौकरी मांगते फिरें। 
शास्त्री जी का जीवन बताता है कि देश भाषणों से नहीं, संस्थाओं से चलता है। नारे से नहीं, नीति से चलता है। फोटो से नहीं, फैसलों से चलता है।
नरेंद्र भाई और बीजेपी को सबसे ज्यादा खतरा विपक्ष से नहीं, शास्त्री जी जैसे नेताओं की स्मृति से है। क्योंकि जनता अगर तुलना करने लगी तो सवाल पूछेगी कि 19 महीने में जिसने युद्ध भी संभाला, कृषि भी संभाली, संस्थाएं भी खड़ी कीं, सादगी भी निभाई, वह बड़ा नेता था या वह जो वर्षों से सत्ता में रहकर भी हर विफलता का दोष पिछले 70 साल पर डालता है।
लाल बहादुर शास्त्री जी साबित करते हैं कि ऊंचाई शरीर की नहीं, रीढ़ की होती है। कुर्सी की नहीं, चरित्र की होती है। नाम पोस्टर से नहीं, त्याग से बनता है। 
देश को आज फिर भाषणवीर नहीं, शास्त्री जैसे कर्मवीर चाहिए। बाकी पोस्टर तो बारिश में भीगकर उतर ही जाते हैं।



  ~विजय राजबली माथुर ©


Sunday, April 26, 2026

भारत ऐसे ही ज्ञान और कला के लिए विख्यात था ------ Chandrashekhar Joshi

मुस्लिम बंधुओं ने बनाया था ऐतिहासिक सुपर कंप्यूटर---
यह दुर्लभ खगोलीय एस्ट्रोलैब 17वीं शताब्दी में पीतल से बनाया गया था। जमाने की अद्भुत कलाकारी देख इसे पुराना सुपर कंप्यूटर नाम दिया गया। अब यह लंदन में नीलाम किया जाएगा।
...ऐसा बताते हैं कि 17वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में भारतीयों में उच्च दर्जे की खगोलीय रुचि थी। मुगल साम्राज्य में लाहौर खगोलीय उपकरण बनाने का प्रमुख केंद्र बना। यहां ज्ञान विज्ञान के एक संस्थान का नाम लाहौर स्कूल था। यहां खगोलीय उपकरण बनाने का शिल्प एक ही परिवार के चार पीढ़ियों तक पिता से पुत्र के बीच आगे बढ़ता रहा। लंदन में मौजूद दुर्लभ एस्ट्रोलैब को दो भाई कइम मोहम्मद और मोहम्मद मुकिम ने इसी स्कूल में बनाया था।
...वर्ष 1612 में तैयार किया गया यह एस्ट्रोलैब उस जमाने का अपनी तरह का सबसे बड़ा कंप्यूटर था। इसे सरदार आगा अफजल ने बनवाया था। वह मुगल साम्राज्य के एक बेहद शक्तिशाली सरदार थे और उस समय सम्राट जहांगीर के अधीन लाहौर का प्रशासन संभालते थे। बाद में यह जटिल उपकरण महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय के शाही संग्रह का हिस्सा रहा फिर उनकी पत्नी गायत्री देव के पास सुरक्षित रहा। उसके बाद निजी संग्रह में लंदन चला गया।
...इसकी कारीगरी वाकई अद्भुत है। इसमें 94 शहरों के देशांतर और अक्षांश सहित विविध विवरण अंकित हैं। फूलों की नक्काशी से जुड़े 38 तारा चिह्न हैं, पांच प्लेटें हैं और डिग्री का विभाजन बेहद बारीक है। इस एस्ट्रोलैब पर तारों के फारसी नाम और देवनागरी लिपि में संस्कृत नाम अंकित हैं। इसपर मक्का, बीजापुर, अजमेर, कश्मीर और लाहौर के स्थानों को दर्शाने वाली पट्टियां भी हैं। इसकी विकसित तकनीक को देख इसे सुपर कंप्यूटर कहा गया। यह इस्लामिक जगत और भारत की कला का बेजोड़ नमूना है।
...दोनों भाइयों ने कई एस्ट्रोलैब बनाए जो आज भी मौजूद हैं। इन दोनों ने मिलकर एक अन्य एस्ट्रोलैब बनाया था, जो अब इराक के राष्ट्रीय संग्रहालय में है। उसका व्यास मात्र 12 सेंटीमीटर है।
...लंदन में मौजूद सुपर कंप्यूटर को अगले सप्ताह सोथबी नीलामी घर में नीलाम किया जाएगा। इसका व्यास 29.5 सेंटीमीटर और ऊंचाई लगभग 50 सेंटीमीटर है। नीलामी में इसकी अनुमानित कीमत 15 से 25 लाख पौंड के बीच है। नीलामी की अन्य प्रमुख कलाकृतियों में जहांगीर की एक मुगलकालीन पेंटिंग भी शामिल है। इसकी अनुमानित कीमत 150,000 से 200,000 पौंड के बीच है। 
.. भारत ऐसे ही ज्ञान और कला के लिए विख्यात था..


  ~विजय राजबली माथुर ©
 

Wednesday, April 8, 2026

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त का बम ------ विजय राजबली माथुर

आज ०८ अप्रैल है -वह दिन जब केन्द्रीय असेम्बली में सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बम फेंका था.वह बम गूंगी -बहरी सरकार और क़ानून निर्माताओं को जगाने के लिए फेंका गया था किसी हिंसक इरादे से नहीं.न ही किसी की जान ही गई थी. २६ जनवरी १९३० को बांटे गए पर्चे में भगत सिंह ने कहा था-"एक क्रांतिकारी सबसे अधिक तर्क में विशवास करता है.वह केवल तर्क और तर्क में ही विशवास करता है.किसी प्रकार का गाली-गलौच या निन्दा,चाहे वह ऊंचे से ऊंचे स्तर से की गई हो,उसे अपने निश्चित उद्देश्य -प्राप्ति से वंचित नहीं कर सकती.यह सोचना कि यदि जनता का सहयोग न मिला या उसके कार्य की प्रशंसा न की गई तो वह अपने उद्देश्य को छोड़ देगा ,निरी मूर्खता है."



लोअर कोर्ट के जवाब में उन्होंने कहा था क्रान्ति से हमारा अभिप्राय है-अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज -व्यवस्था में आमूल परिवर्तन."समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मजदूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढी कमाई का सारा धन शोषक पूंजीपति हड़प जाते हैं.दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मोहताज हैं.दुनिया भर के बाजारों को कपड़ा मुहैय्या करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढंकने -भर को भी कपडा नहीं पा रहा है.सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर,लोहार तथा बढ़ई स्वंय गंदे बाड़ों में रह कर ही अपनी   जीवन-लीला समाप्त कर जाते हैं.इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूंजीपति जरा-जरा सी बातों के लिए लाखों का वार-न्यारा कर देते हैं.........स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठ कर रंगरेलियां मना रहा है शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल पड़े हैं."


आज भी जो शासन-व्यवस्था है वह भगत सिंह आदि क्रांतिकारियों के सपनों का स्वराज्य नहीं है.उनका कथन है-"क्रांतिकारियों का विशवास है कि देश को क्रान्ति से ही स्वतंत्रता मिलेगी.वे जिस क्रान्ति के लिए प्रयत्नशील हैं और जिस क्रान्ति का रूप उनके सामने स्पष्ट है उसका अर्थ केवल यह नहीं है कि विदेशी शासकों तथा उनके पिट्ठुओं से क्रांतिकारियों का सशस्त्र संघर्ष हो ,बल्कि इस सशस्त्र संघर्ष के साथ -साथ नवीन सामाजिक व्यवस्था के द्वार देश के लिए मुक्त हो जाएँ.क्रान्ति पूंजीवाद,वर्गवाद तथा कुछ लोगों को ही विशेषाधिकार दिलाने वाली ओरानाली का अंत कर देगी.यह राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़ा करेगी,उससे नवीन राष्ट्र और नए समाज का जन्म होगा.क्रान्ति से सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि वह मजदूर तथा किसानों का राज्य कायम कर उन सब सामजिक अवांछित तत्वों को समाप्त कर देगी जो देश की राजनीतिक शक्ति को हथियाए बैठे हैं."


आप खुद ही तुलना करें क्या हमें जो आजादी मिली है वह वैसी ही है जिसके लिए भगत सिंह ,बटुकेश्वर दत्त,अशफाक उल्ला खाँ,राम प्रसाद बिस्मिल ,चन्द्र शेखार आजाद आदि असंख्य क्रांतिकारियों ने अपना बलिदान दिया था.यदि नहीं तो उसे प्राप्त करने में आप क्या योगदान देंगें?

  ~विजय राजबली माथुर ©

Thursday, April 2, 2026

पाप और पुण्य का भुगतान इसी ईह लोक में है ------ अरविन्द राज स्वरूप


कानपुर 2 अप्रैल 2026 
पाप और पुण्य का भुगतान इसी ईह लोक में है।
कल रात में लखनऊ से कानपुर आया । एक दिन के लिए।आज सवेरे का हिंदुस्तान अखबार पढ़ा।पूरा पेज कानपुर वासियों की गैस की किल्लत से हो रही परेशानी से भरा हुआ है। 
सरकार सिर्फ बयान बाजी तक सीमित है। 
सारी रिस्पांसिबिलिटी इस दिक्कत की भारतीय जनता पार्टी की केंद्रीय सरकार की है। उसकी अमेरिकन चाटुकारिता की नीति ने भारत देश की पूरी जनता को परेशानी में डाल दिया है। यह उतनी ही बड़ी परेशानी है जितनी भारत देश को कोविड में भुगतनी पड़ी थी। तब तत्काल मौत का खतरा था और अब रोज-रोज रोटी बनाना मुश्किल हो गया। 
ईरान भारत का दोस्त था। ईरान से भारत को कोई खतरा नहीं था। फिर भी प्रधानमंत्री श्री मोदी इसराइल जाकर नस्ली सहांरक नेतन्याहू से गले मिलने लगे । 26 तारीख फ़रवरी को वहां से लौटे और 28 को इसराइल और अमेरिका ने ईरान पर हमला कर दिया। इतना ही नहीं इसराइल को फादर लैंड भी प्रधानमंत्री घोषित कर आए।
अगर भारत सरकार स्पष्ट रूप से ईरान के साथ खड़ी होती तो हमको कोई दिक्कत ना होती ।जबकि ईरान हमारा पुराना दोस्त था ।भारत सरकार ने अमेरिका का चाटुकार  बनना स्वीकार किया और अमेरिका का राष्ट्रपति तो दुनिया का सबसे रद्दी  और बेकार राष्ट्रपति साबित हुआ।
मैं देख रहा हूं कि भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों में भी उनकी पार्टी में जो चल रहा है और जो देश में हो रहा है उसका प्रभाव है और वहां भी खलबली है। 
आरएसएस का प्रभाव तो भाषण भरों में सीमित है। उनको पता है कि उनका महत्व सिर्फ और सिर्फ भारतीय जनता पार्टी सरकार की वजह से है। इसलिए उनकी तो बोलती ही बंद है।
उनके पदाधिकारी बड़े-बड़े खाली पीली शब्द बोलते हैं बस। 
सब लोगों को अपने किए का भुगतान होता है। पाप का पाप से। पुण्य का पुण्य से। 
एक पाप देश की जनता से अनजाने में हो गया और अब हम भुगत रहे हैं ।हम ही तो देश की जनता है ,और हमारे जैसे 140 करोड़ भारतीय। 
अब इससे छुटकारा पाना है ।जनतंत्र में वोट के द्वारा ही छुटकारा पाया जाता है, सो 2027 में उत्तर प्रदेश में और 2029 में पूरे भारतवर्ष से बीजेपी से  छुटकारा पाना है।
जो भी आएगा वह इससे तो अच्छा ही होगा।




  ~विजय राजबली माथुर ©

Monday, March 30, 2026

भारत की राजधानियों का ऐतिहासिक क्रम ------ डॉ. गिरीश कुमार वर्मा

 
भारत की राजधानियों का ऐतिहासिक क्रम
(एकरेखीय विकास यात्रा)
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✍🏻 डॉ. गिरीश कुमार वर्मा
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भारत  का  इतिहास अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और विविधतापूर्ण   है, जिसमें सत्ता के केंद्र —अर्थात् राजधानियाँ—समय-समय पर बदलती  रही  हैं। इन  परिवर्तनों  के  पीछे राजनीतिक, सामरिक, आर्थिक और प्रशासनिक कारण निहित थे। यदि हम इन राजधानियों को एकरेखीय क्रम में देखें, तो भारतीय इतिहास की एक स्पष्ट और सतत धारा हमारे सामने उभरती है।
प्राचीन भारत में पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) एक अत्यंत   महत्त्वपूर्ण   एवं प्रभावशाली राजधानी रही। इसे एक सुदृढ़ राजधानी के रूप में स्थापित करने में महापद्मनंद का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने सोलह महाजनपदों को अपने अधीन कर एक विशाल और सशक्त राज्य की आधारशिला रखी। बाद   में   मौर्य  और  गुप्त   जैसे   महान साम्राज्यों ने यहीं से शासन किया। चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक के काल में यह नगर अपनी चरम   उन्नति   पर पहुँचा। गंगा के किनारे स्थित होने   के   कारण   यह   व्यापार, प्रशासन और संस्कृति का प्रमुख केंद्र बना रहा।
प्राचीन  भारत   में  जहाँ   पाटलिपुत्र जैसे   नगर व्यापक साम्राज्यों की राजधानी रहे, वहीं अनेक क्षेत्रीय   राजधानियाँ   भी अपने-अपने स्तर पर अत्यंत महत्त्वपूर्ण थीं। उदाहरणतः मथुरा शूरसेन जनपद   की   राजधानी   थी   और धार्मिक तथा सांस्कृतिक  दृष्टि  से  अत्यंत   समृद्ध  केंद्र  रहा, जबकि हस्तिनापुर  कुरु  राज्य  की राजधानी के रूप   में  विख्यात था। यद्यपि   ये  नगर  सम्पूर्ण  भारत  की   राजधानियाँ नहीं थे, तथापि इन्होंने प्राचीन भारतीय सभ्यता, राजनीति और संस्कृति के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मध्यकाल  में  दिल्ली सल्तनत के उदय के साथ सत्ता का  केंद्र   दिल्ली बना। हालांकि, मोहम्मद बिन   तुगलक   ने राजधानी को दक्षिण भारत के दौलताबाद (पूर्व नाम देवगिरि) स्थानांतरित करने का प्रयास किया था। इसका उद्देश्य साम्राज्य पर बेहतर  नियंत्रण   स्थापित  करना था, किंतु यह प्रयोग सफल नहीं हो सका और अंततः राजधानी पुनः दिल्ली लौटा दी गई।
मुगल काल में भी राजधानियों में परिवर्तन देखने को मिलता   है।   प्रारंभ में आगरा को राजधानी बनाया   गया,   जहाँ   से अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ   ने   शासन   किया।  इसके   पश्चात्   शाहजहाँ   ने दिल्ली में शाहजहाँनाबाद बसाकर उसे राजधानी   बनाया।   इस काल में इलाहाबाद  (प्रयाग)   भी   पूर्ण   राजधानी  न   होकर   एक महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक और सामरिक केंद्र के रूप में उभरा।
ब्रिटिश   काल   में    प्रारंभ   में कलकत्ता   (अब कोलकाता) को भारत की राजधानी बनाया गया, जो   व्यापार   और   प्रशासन    का प्रमुख   केंद्र    था। किन्तु 1911 में ब्रिटिश सरकार ने राजधानी को पुनः  दिल्ली  स्थानांतरित   कर  दिया, ताकि भारत  के  उत्तरी और मध्य भागों पर प्रशासनिक नियंत्रण और अधिक सुदृढ़ बनाया जा सके।
15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी दिल्ली को ही भारत की राजधानी बनाए रखा गया। आज   नई   दिल्ली भारत का राजनीतिक,  प्रशासनिक  और कूटनीतिक केंद्र है। यदि भारत की राजधानियों   का   एकरेखीय  क्रम निर्धारित किया जाए, तो वह इस प्रकार उभरता है—
पाटलिपुत्र → दिल्ली → दौलताबाद (अल्पकालिक) → दिल्ली →
आगरा → दिल्ली → कलकत्ता → दिल्ली (वर्तमान)
अंततः   कहा   जा‌  सकता   है   कि भारत  की राजधानियों   का ‌ यह   परिवर्तन   केवल   स्थान परिवर्तन   नहीं था, बल्कि  यह समय-समय पर बदलती  राजनीतिक   परिस्थितियों, प्रशासनिक आवश्यकताओं   और   साम्राज्य   विस्तार  की रणनीतियों का दर्पण भी था। यह क्रम भारतीय इतिहास   की   गतिशीलता,   निरंतरता   और विकासशीलता   को  स्पष्ट   रूप  से प्रतिबिंबित करता है।
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 ~विजय राजबली माथुर ©
 

Sunday, March 29, 2026

खतरनाक साजिश ------ Ansh Kidsplay


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⁉️ क्या आपको पता है कि हम भारतीय एक खतरनाक साजिश का शिकार हो चुके हैं और वह साजिश है हमारे संयुक्त परिवारों को तोड़कर उन्हें उपभोक्ता बनाने की..???
 जब परिवार टूटते हैं, तभी बाजार फलते फूलते हैं— ये सिर्फ विचार नहीं, पूरी रणनीति है ....
भारत की सबसे मजबूत चीज क्या थी..???
भारत पर मुगल आए, अंग्रेज़ आए, और कई हमलावर आए लेकिन एक चीज कभी नहीं टूटी, वो थी एकता....??
  3 पीढ़ियाँ एक छत के नीचे रहती थी बुज़ुर्गों का अनुभव बच्चों में संस्कार खर्च में सामूहिकता और त्यौहारों में गर्माहट हुआ करती थी...
यह हमारी असली “Social Security” थी। कोई पेंशन की ज़रूरत नहीं थी, कोई अकेलापन नहीं, कोई Mental Health Crisis नहीं।
पश्चिमी देशों को यह चीज खटकने लगी और उन्होंने परिवारों को तोड़ने के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया..???
क्योंकि पश्चिमी देश हमेशा से ही उपनिवेशवादी रहे हैं — उनके लिए बाज़ार सबसे बड़ा धर्म है??
लेकिन भारत जैसा देश, जहाँ लोग साझा करते हैं, कम खर्च करते हैं, और सामूहिक सोच रखते हैं — वहां वे अपने उत्पाद बेच ही नहीं पा रहे थे।
इसलिए एक शातिर रणनीति बनाई गई...???
इनके परिवार ही तोड़ दो, हर कोई अकेला हो जाएगा,और हर कोई ग्राहक बन जाएगा।
कैसे हुआ ये हमला..???
1.मीडिया का सहारा लेकर संयुक्त परिवारों को तोड़ने की शुरुआत...
संयुक्त परिवार को “झगड़ों का अड्डा”, “बोझ” और “रुकावट” के रूप में दिखाया गया।
न्यूक्लियर परिवार को “फ्रीडम”, “मॉर्डन”, “Self-made” बताकर  ग्लैमराइज किया गया।
याद कीजिए: टीवी पर आज भी कितने ही शो हैं जहां पूरे दिन बहू-सास की लड़ाई, नन्द भाभी की लड़ाई, देवरानी जिठानी की लड़ाई पूरे दिन दिखाई जाती है, और हमारे/आपके परिवार की घरेलू औरतें पूरे दिन यही धारावाहिकों को देखती है और इनका निष्कर्ष/सॉल्यूशन निकलता है – “अलग हो जाओ!”
 2. उपभोक्तावाद के ज़रिए...
जब हर जोड़ा अलग रहने लगा...
पश्चिमी देशों अपनी चाल में कामयाब हुए और हमारे परिवार विखर का उनका बाजार बन गए 
पहले 1 परिवार में चार भाई रहते थे, अब एक परिवार सिर्फ चार लोग (पति-पत्नी, और 2 बच्चे)
 पहले 4 भाईयों के बीच 1 टीवी, अब 4 भाईयों के बीच 4 टीवी
 पहले 4 भाईयों के बीच 1 रसोई, अब 4 भाईयों के बीच 4 किचन सेट
 पहले 4 भाईयों के बीच 1 कार और 1 मोटरसाइकिल, अब 4 भाईयों के बीच 4 कार, 4स्कूटी और 4 मोटरसाइकिल।
बाजार में बूम आ गया – और समाज में टूटन।
भारत में क्या हुआ इस “सोचलेवा हमले” के बाद?
 सामाजिक पतन...???
 बुज़ुर्ग अब बोझ हैं
 बच्चे अकेले हैं (और स्क्रीन में गुम)
 रिश्तेदार “उपलब्ध नहीं” हैं
 संस्कारों की जगह “Influencers” ने ले ली
मानसिक स्वास्थ्य संकट...???
 पहले जो बात नानी-दादी से होती थी, अब काउंसलर से होती है...
 अकेलापन अब इलाज़ मांगता है, पहले प्यार से दूर होता था
 बाजार का फायदे...????
 हर समस्या का एक उत्पाद
 हर भावना का एक ऐप
 हर उत्सव का एक“ *ऑनलाइन ऑर्डर”
“संस्कार की जगह सब्सक्रिप्शन ने ले ली है”
आज का सवाल — हम क्या बनते जा रहे हैं?
हमने “आधुनिकता” की दौड़ में...???
 संयुक्तता को “Old culture” कहा...
 माता-पिता को “Obstacles” कहा...
 परिवार को “फालतू भावना” कहा...
 रिश्तों को “Unfollow” कर दिया...
लेकिन क्या आपने सोचा..???
Amazon का फायदा तभी है जब आप Diwali पर अकेले हों — और Shopping करें, परिवार के साथ न बैठें।
Zomato तभी कमाता है जब कोई माँ का खाना नहीं खा रहा।
Netflix तभी देखेगा जब कोई दादी की कहानी नहीं सुन रहा।
समाधान: हम अभी भी वापसी कर सकते हैं???
 संयुक्त परिवार को पुनः “संपत्ति” मानें, बोझ नहीं।
 बच्चों को उपभोक्ता नहीं, संस्कारी इंसान बनाएं।
 बुज़ुर्गों को घर से बाहर न करें — उनके अनुभव हर Google Search से ऊपर हैं।
त्यौहार मनाएं, सामान नहीं।
अकेलापन कम करने के लिए App नहीं, अपनापन बढ़ाइए।
निष्कर्ष :--
“पश्चिम ने व्यापार के लिए परिवार तोड़े,और हम ‘आधुनिक’ बनने के लिए अपना वजूद बेच आए।”
अब समय है रुकने का, सोचने का, और अपने संस्कारों को फिर से अपनाने का — नहीं तो अगली पीढ़ी को ‘संयुक्त परिवार’ शब्द का अर्थ बताने के लिए भी शायद Google की जरूरत पड़ेगी l
क्या आपको नहीं लगता कि हम  ज़िन्दगी की सुख सुविधाओं के लिए अपने परिवारिक माहौल के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं हम अपनी असल जिंदगी खोते जा रहे हैं,हम स्वार्थी हो रहे हैं एक बार अपना 30 बर्ष पुराना जीवन याद करके देख लो, जहां सिर्फ भाईचारा था इमोशन था कोई सोसाइड नहीं करता था, सहयोग की भावना थी, संस्कार ऐसे कि गांव के हर आदमी को पिता जितना सम्मान दिया जाता था किन्तु आज तो पिता ही "यार पापा" हो गए , और आज यही संस्कार हमारी आधुनिकता को दर्शाती है और हमें घिन आती है ऐसी आधुनिकता पर, कृपया एक बार विचार अवश्य करें।

                                                                             
                                                                     लेखिका ---  Ansh Kidsplay

  ~विजय राजबली माथुर ©



























Saturday, March 28, 2026

निकृष्ट तम कृत्य : PM Care fund. ------ Kanupriya

जब आप जीवन मे सबसे बुरी परिस्थिति में हों तब क़िस्म क़िस्म के लोग मिलते हैं; 
 एक वे जो आपको  अपनी क्षमता अनुसार राहत देते हैं, और उतना ही उपकार समझ जो जितना साथ निभा दे की तर्ज़ पर आप हमेशा उनके शुक्रगुजार रहते हैं . 
फिर वे जो किसी भी कारण या परिस्थिति वश दूर से दृष्टा रहते हैं,   जिनके कारण न आपको फ़ायदा होता है न नुकसान. दुनिया मे हर व्यक्ति आपकी मदद की capacity में भी नही होता, आपके जीवन मे involve भी नहीं होना चाहता,  तो ये भी ठीक ही है.
   हाँ जिनसे आपका उम्मीद का रिश्ता हो वे भी दृष्टा रहें तो थोड़ी तकलीफ़ होती है.
 फिर वे जो मदद का दिखावा करते हैं मगर दरअसल करते कुछ भी नहीं,  ऐसे लोगों को पहचानना थोड़ा मुश्किल होता है, वे भले और मीठे बने रहते हैं, उम्मीद बनाए रखते हैं, मगर अंततः आपको अपने अनुभव से समझ आ जाता है कि इनसे उम्मीद रखना बेकार है. ये आपके समय की सबसे बड़ी हानि करते हैं. 
फिर वे लोग भी मिलते हैं  जो मदद करने को तैयार होते हैं मगर आपसे बदले में भी कुछ चाहते हैं, और सीधे सीधे कह देते हैं, ऐसे में आपके पास अपने लिये तय करने का अधिकार रहता है. और अगर आप बेहद ही कमज़ोर मानसिकता में न हों कि ख़ुद को छलने के लिये भी तैयार हों तो अपने लिये कैसा भी निर्णय कर ही लेते हैं. 
फिर वे लोग होते हैं, जिनका आपको पता होता है कि वे आपका बुरा ही चाहते हैं और वे अपनी नीयत को अपनी बात या व्यवहार से  छुपाते भी नहीं. आपका दुख उनके लिये ख़ुशी का सबब होता है, और आपको उनसे डील करना सीखना होता है. 
 यहाँ तक भी ठीक है आप मैनेज कर लेते हैं. 
मगर सबसे ख़तरनाक वे होते हैं जो आपकी बुरी आर्थिक,मानसिक या भावनात्मक स्थिति का अपने पक्ष में फ़ायदा उठाते हैं यानी राहत का दिखावा करते हैं , आपका भरोसा जीतते हैं, उम्मीद जगाते हैं मगर असल मे अपना ही उल्लू सीधा करते हैं. ऐसे लोग जीवन के सबसे कड़वे , न भूलने वाले अनुभव देते हैं. 
ये ऐसा ही है जैसे किसी रेल दुर्घटना में घायल व्यक्ति की तरफ़ मदद का हाथ बढाकर उसके कंगन लूट लिए जाएँ, और फिर उसे उसके हाल पर छोड़ दिया जाए.  ऐसे में नुकसान सिर्फ़ कंगन का नही होता, इंसानियत पर से ही भरोसा उठ जाता है.  
 किसी दूसरे की आपदा में अपने लिये अवसर खोजने वाले लोग निकृष्टतम होते हैं , और इसमें कोई दोराय भी नहीं.
और मुझे अब तक का इस सरकार का सबसे निकृष्ट तम कृत्य लगा PM Care fund. संकट से जूझती जनता को उसके हाल पर छोड़ देने, चुनी हुई सरकार से होने वाली उम्मीद और भरोसे पर खरा न उतरने से भी ज़्यादा. 
सिर्फ़ PM fund नाम होता तब भी ग़नीमत थी, आपने जनता को भरोसा दिलाया कि आप care करते हैं, आप मदद करना चाहते है , आपने जनता से अपील की कि देश की मदद के लिये आपदकाल में भी चंदा दें, यहाँ तक आपने उसके नाम पर लोगों की सैलरी तक काट ली, और फिर जब लोगों के घरों में चिताएँ जल रही थी,  वह तमाम धन आप ग़बन कर गए, न आपने मदद की न हिसाब दिया,  तिसपर मीडिया की मदद से अपनी संत और savior की छवि भी बनाए रखी. 
इससे घटिया, इससे नीच भी कुछ हो सकता है?
अब जब सरकार की तरफ़ से संकटकाल की घोषणा हो ही चुकी है, और कल प्रधानमंत्री जी के कुल भाषण का सार " जो उचित समझो वो करो", यानी उपदेश देकर जनता को उसके हाल पर छोड़ देना ही है, तब सरकार से एक ही अंतिम उम्मीद है, जनता अपना ओढ़ खींच लेगी;
बस अबकी बार आप संकटग्रस्त जनता से  किसी राहत और केयर के नाम पर फण्ड मत माँगना, इतना रहम करना. बाक़ी जो अभी तक अपने अनुभव से ये नहीं समझे कि इस सरकार से किसी तरह की उम्मीद का रिश्ता नही रखना चाहिये, उनका ऊपर वाला ही मालिक है.


                                                                      

                                                      लेखिका ---   Kanupriya


 ~विजय राजबली माथुर ©