Sunday, May 3, 2026

RSS और BJP भारतीय लोकतंत्र की हत्या के गुनाहगार ------ Rajesh R. Singh



RSS और BJP भारतीय लोकतंत्र की हत्या के गुनाहगार 
चंद्र बाबू नायडू और नीतीश कुमार जैसे अनुभवी सियासी बाजीगर, जो कभी मोदी को तानाशाह करार देते थे और आरएसएस की विचारधारा से दूरी बनाते दिखते थे, आज केंद्र में आरएसएस-प्रेरित सरकार को अटूट समर्थन प्रदान कर रहे हैं। 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा 240 सीटों पर सिमट गई, लेकिन टीडीपी के 16 और जेडीयू के 12 सांसदों समेत एनडीए के गैर-भाजपा सहयोगियों ने कुल 293 सांसदों का समर्थन देकर सरकार बनाई। इन नेताओं के कानों में लोकतंत्र के खात्मे की कोई पदचाप नहीं गूँज रही, न ही इनकी आंखों में आरएसएस की कथित तानाशाही का भय दिखाई दे रहा। नायडू 2018 में विशेष श्रेणी का दर्जा न मिलने पर एनडीए छोड़ चुके थे और मोदी सरकार पर हमले बोलते थे, लेकिन 2024 में आंध्र प्रदेश के लिए विशेष पैकेज और मंत्रालयों के लालच में फिर गले मिल गए। नीतीश कुमार तो पिछले दशक में कई बार पाला बदल चुके, 2013 में भाजपा से अलग हुए, 2017 में वापस लौटे, 2022 में महागठबंधन में गए और फिर 2024 से पहले एनडीए में लौट आए। यह सौदेबाजी है, बिहार और आंध्र के विकास, विशेष श्रेणी का दर्जा, रेलवे जैसे मंत्रालय और फंड्स के बदले संवैधानिक मूल्यों की बलि चढ़ाने का सौदा। इनके लिए सत्ता की कुर्सी संविधान और लोकतंत्र से कहीं ज्यादा अहम है, क्योंकि क्षेत्रीय अस्मिता और वोट बैंक बचाने की मजबूरी ने उन्हें सिद्धांतों से ऊपर उठा दिया। खैर नीतीश बाबू को उनकी करनी की सजा मिल गयी संघीयों नें उन्हें निगल लिया चंद्र बाबू को निगलने के लिए उनके खेमें में गद्दार तैयार किए जा रहे हैं देर सबेर उन्हें भी संघी निगल लेंगे।
आरएसएस, जिसकी स्थापना 1925 में डॉ. के.बी. हेडगेवार ने की, आजादी की लड़ाई में कोई संगठनात्मक भूमिका नहीं निभाई। बल्कि इसके संस्थापक और दूसरे सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर ने क्विट इंडिया आंदोलन जैसे राष्ट्रव्यापी संघर्षों से दूरी बनाए रखी और ब्रिटिश राज के खिलाफ सीधा मुकाबला 'प्रतिक्रियावादी' करार दिया। गोलवलकर की किताब 'वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड' (1939) में नाजी जर्मनी और फासीवादी इटली से प्रेरणा ली गई, जहां अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे का नागरिक मानने वाली सोच व्यक्त की गई। गांधीजी की हत्या के बाद संगठन पर प्रतिबंध लगा था। RSS ने शुरू से 'हिंदू एकता' और अनुशासन पर जोर दिया, लेकिन कांग्रेस के अखिल भारतीय आंदोलनों से परहेज किया। आज वही संगठन संविधान को 'पश्चिमी नकल' बताकर उसकी आलोचना करता रहा है और मनुस्मृति जैसे प्राचीन ग्रंथों को आदर्श मानता है। 1949 में आरएसएस के मुखपत्र 'ऑर्गनाइजर' ने संविधान बनने पर अफसोस जताया कि उसमें 'भारतीय' तत्व नहीं हैं और मनु के कानूनों का कोई उल्लेख नहीं। फिर भी 100 से ज्यादा गैर-आरएसएस सांसद मोदी-शाह के इशारे पर घूम रहे हैं, बिना इस ऐतिहासिक गद्दारी और विचारधारा के खतरे को समझे। लाखों स्वतंत्रता सेनानियों, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, गांधीजी के अनुयायियों की कुर्बानी से बड़ी ही मुश्किल से मिला लोकतंत्र अब 'हिंदू राष्ट्र' के खांचे में ढाला जा रहा है, जहां बहुलवाद की जगह एकरूपता थोपी जा रही है। इन सांसदों का ज़मीर सोया हुआ है या सत्ता की चकाचौंध में पूरी तरह बेहोश हो चुका है?
ये सांसद भूल गए कि आजादी की लड़ाई में कांग्रेस, समाजवादियों और क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश साम्राज्य से सीधा संघर्ष किया, जबकि आरएसएस ने हिंदू संगठन को मजबूत करने और मुस्लिम एकता को खतरा मानकर अलग राह चुनी। गोलवलकर ने लोकतंत्र को हिंदू संस्कृति के अनुकूल नहीं माना और मनुस्मृति को कानून का आधार बनाने की वकालत की, जिसमें वर्ण व्यवस्था और असमानता को वैध ठहराया गया। आज एनडीए सरकार में सहयोगी दल इसी विचारधारा के विस्तार को चुपचाप देख रहे हैं। चंद्र बाबू नायडू और नीतीश कुमार जानते हैं कि उनकी पार्टियां टीडीपी और जेडीयू क्षेत्रीय मुद्दों, आंध्र के विकास, बिहार के विशेष दर्जे पर टिकी हैं, लेकिन आरएसएस की सांस्कृतिक और संगठनात्मक मशीनरी धीरे-धीरे उनके वोट बैंक को भी निगल सकती है। 2024 में भाजपा के बहुमत न होने के बावजूद इन नेताओं ने 'अनकंडीशनल सपोर्ट' दिया, क्योंकि विकास के वादे, केंद्रीय फंड्स और मंत्रालयों का लालच लोकतंत्र के लंबे खतरे से बड़ा साबित हुआ। क्या ये लोग नहीं देख रहे कि उनकी पार्टियों का वजूद और क्षेत्रीय स्वायत्तता RSS की केंद्रीकृत 'एक राष्ट्र, एक संस्कृति' वाली सोच में धीरे-धीरे विलीन हो रही है? इतिहास में कई क्षेत्रीय दल बड़े सहयोगी के साथ घुल-मिलकर अपनी पहचान खो चुके हैं, लेकिन सत्ता का नशा इनके विवेक को कुचल रहा है।
लाखों शहीदों की शहादत पर सवाल उठाना आसान है, लेकिन सच्चाई यह है कि भारतीय लोकतंत्र ने सभी विचारधाराओं, वामपंथी, दक्षिणपंथी और सेकुलर को जगह दी। आरएसएस ने शुरू से ही 'हिंदू राष्ट्र' की कल्पना की, जिसमें अल्पसंख्यक 'हिंदू संस्कृति' अपनाने को मजबूर हों। इसके प्रारंभिक दस्तावेजों में बहुलवाद और समानता वाले संविधान से असहजता साफ झलकती है। 1949 के ऑर्गनाइजर संपादकीय में मनुस्मृति की तारीफ करते हुए कहा गया कि संविधान में प्राचीन भारतीय कानूनों का अभाव है। आज भी कुछ आरएसएस नेता 'सेकुलर' और 'सोशलिस्ट' शब्दों की समीक्षा की बात करते हैं। फिर भी ये समर्थन देने वाले दल इस बहस में नहीं पड़ना चाहते। उनका डर सिर्फ चुनावी हार और सत्ता गंवाने का है, न कि संवैधानिक मूल्यों का। इन्हे यह कहते हुए सुना जा सकता है कि अगर आरएसएस की तानाशाही आ रही होती, तो ये 'किंगमेकर' पहले ही पाला बदल चुके होते, लेकिन सत्ता और फंड्स का स्वाद इतना मीठा है कि लोकतंत्र के दुश्मन बनकर भी ये घूम रहे हैं। चंद्र बाबू ने 2014 से विशेष श्रेणी का दर्जा मांगा, नीतीश ने बिहार के लिए 2000 से मांग की, और 2024 में एनडीए में शामिल होकर इन्हें हासिल करने की उम्मीद में चुप्पी साध ली।
ये सब कब जागेंगे? शायद तब जब उनकी अपनी पार्टियां, टीडीपी और जेडीयू आरएसएस की शाखाओं में बदल चुकी होंगी, जब क्षेत्रीय अस्मिताएं केंद्रीय हिंदुत्व में पूरी तरह घुल-मिल गई होंगी। नीतीश कुमार का फ्लिप-फ्लॉप इतिहास प्रसिद्ध है, वे 'सुशासन बाबू' के रूप में जाने जाते थे, लेकिन सत्ता बचाने के लिए बार-बार गठबंधन बदलते रहे। नायडू भी ट्रांजेक्शनल पॉलिटिक्स के माहिर हैं। आज ये नेता जानते हैं कि भाजपा बिना उनके समर्थन के बहुमत नहीं बना सकती, फिर भी वे बिना शर्त समर्थन दे रहे हैं क्योंकि अल्पकालिक फायदे, विशेष पैकेज, मंत्रालय, लंबे लोकतांत्रिक खतरे से ज्यादा आकर्षक हैं। इतिहास गवाह है कि सत्ता के लिए सिद्धांत बेचने वाले अंत में खुद बिक जाते हैं। आरएसएस की विचारधारा अनुशासन के नाम पर बहुलवादी भारत को एकरूप बनाने की कोशिश लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती है। सहयोगी दल अगर आज पदचाप नहीं सुन रहे, तो कल उनके कार्यकर्ता और वोटर जब जागेंगे, तब तक उनकी पहचान मिट चुकी होगी।
अंत में, भारतीय लोकतंत्र मजबूत है क्योंकि यह बहुलवादी और समावेशी है, न कि किसी एक विचारधारा का गुलाम। आरएसएस चाहे जितना हिंदू राष्ट्र का सपना देखे, संविधान की जड़ें समता, स्वतंत्रता, न्याय गहरी हैं। लेकिन सवाल ये है कि जो सांसद आज आरएसएस के प्रभाव में 'मोदी-शाह के इशारे' पर चल रहे हैं, वे कल खुद को और अपनी विरासत को बचाने के लिए क्या करेंगे? लाखों शहीदों की आहें, संविधान निर्माताओं का सपना और आजादी की लड़ाई की यादें इनके कानों तक पहुंचनी चाहिए। जागना होगा, वरना इतिहास इन्हें सिर्फ सत्ता के दलाल और लोकतंत्र के कमजोर करने वाले के रूप में याद रखेगा, न कि रक्षक के रूप में। सच्चा लोकतंत्र तब बचता है जब सत्ता के सहयोगी भी सवाल पूछें, विपक्ष की तरह नहीं तो कम से कम अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनें। जनता को भी सतर्क रहना होगा, क्योंकि लोकतंत्र किसी एक दल या गठबंधन की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की अमूल्य विरासत है। सत्ता का खेल खेलते रहो, लेकिन याद रखो, जो आजादी के सपनों से समझौता करता है, वह खुद इतिहास की कचरा टोकरी में समा जाता है। जागो सोने वालों, वरना बहुत देर हो जाएगी।
Rajesh R. Singh

  ~विजय राजबली माथुर ©

 

Wednesday, April 29, 2026

लाल बहादुर शास्त्री ------ Pankaj Kumar Jat




9 जून 1964 को एक 5 फुट 2 इंच का दुबला-पतला आदमी भारत का प्रधानमंत्री बना था और 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में उनकी रहस्यमयी मौत हो गई। कुल कार्यकाल लगभग 19 महीने। बस 19 महीने। 
इन 19 महीनों का वजन आज की कई पूरी सरकारों पर भारी पड़ता है। जिस आदमी को विदेशी प्रेस ने “अनलाइकली सक्सेसर” कहा, उसी ने पाकिस्तान को जवाब दिया, अमेरिका के दबाव को ठुकराया, किसानों को सम्मान दिया, सैनिकों का मनोबल बढ़ाया और देश को आत्मनिर्भरता की राह पर धकेल दिया। 
नाम था लाल बहादुर शास्त्री। कद छोटा था, काम हिमालय जितना बड़ा था।
आज देश में कैमरे की चमक को नेतृत्व समझ लिया गया है, भाषण को नीति और नारे को उपलब्धि। ऐसे समय में शास्त्री जी का नाम लेना ही कई लोगों की राजनीति पर तमाचा है। क्योंकि शास्त्री जी ने सत्ता को निजी ब्रांड नहीं बनाया, देश सेवा बनाया।
उन्होंने प्रधानमंत्री बनते ही खुद की मूर्तियाँ नहीं लगवाईं, खुद का चेहरा हर दीवार पर नहीं चिपकवाया, हर योजना का नाम अपने ऊपर नहीं रखा। वे उन नेताओं में थे जो काम करके चुप रहते थे, आज वाले उन नेताओं में हैं जो चुप रहकर भी प्रचार करवा लेते हैं।
रेल मंत्री रहते हुए 1956 में अरियालुर रेल दुर्घटना हुई। आज के नेताओं की तरह जांच बैठाओ, बयान दो, विपक्ष को दोष दो, मीडिया मोड़ दो वाला खेल नहीं खेला। शास्त्री जी ने नैतिक जिम्मेदारी ली और इस्तीफा दे दिया। सोचिए, एक रेल दुर्घटना पर इस्तीफा। 
आज तो पुल गिर जाए, ट्रेन भिड़ जाए, पेपर लीक हो जाए, बेरोजगार सड़क पर पिट जाएं, तब भी कुर्सी से चिपके रहते हैं जैसे फेविकोल की सरकारी स्कीम में आए हों।
प्रधानमंत्री बने तो देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था। अमेरिका PL-480 के तहत गेहूं देकर दबाव बनाता था। शास्त्री जी ने कहा हम भूखे रह लेंगे, झुकेंगे नहीं। खुद एक वक्त उपवास रखा, देश से अपील की। पहले खुद त्याग किया, फिर जनता से कहा। 
आज पहले जनता से गैस महंगी करवाओ, फिर खुद वातानुकूलित मंच से त्याग पर भाषण दो। यही फर्क है चरित्र और अभिनय में।
शास्त्री जी ने “जय जवान जय किसान” नारा दिया था। यह नारा चुनावी मंच की तुकबंदी नहीं था, राष्ट्रीय दर्शन था। उन्होंने 1965 युद्ध में सेना को खुला मनोबल दिया। पाकिस्तान के अयूब खान जिन्हें लगा था छोटा आदमी है, बाद में उसी आदमी की दृढ़ता माननी पड़ी। 
दूसरी तरफ किसानों के लिए FCI, राष्ट्रीय बीज ढांचा, हरित क्रांति की नींव, डेयरी विकास के लिए NDDB, अमूल मॉडल का विस्तार। आज किसान सड़क पर बैठे रहें, महीनों मरते रहें, तब सरकार उन्हें राष्ट्रविरोधी बताने लगती है। 
शास्त्री जी होते तो पहले बात करते, बाद में बिल लाते।
उनके पास अपनी कार तक नहीं थी। परिवार के कहने पर 12,000 रुपये का लोन लेकर फिएट कार खरीदी। मृत्यु के समय कर्ज बाकी था। पत्नी ने पेंशन से चुकाया। जरा तुलना कर लो। आज वार्ड स्तर का नेता करोड़पति, जिला स्तर वाला उद्योगपति, ऊपर वाला तो मानो चलता-फिरता विज्ञापन साम्राज्य। और एक प्रधानमंत्री ऐसा भी था जो कर्ज में मरा मगर ईमानदारी में अमर हो गया।
उनके बेटे को नौकरी में प्रमोशन मिला तो रद्द करवा दिया। सरकारी कार निजी काम में चली तो किलोमीटर का हिसाब लेकर पैसा जमा कराया। आज परिवारवाद पर भाषण देने वाले खुद रिश्तेदारों, मित्रों, चहेतों और कॉरपोरेट दरबारियों से घिरे रहते हैं। जनता को प्रवचन, अपने लोगों को संरक्षण। पुरानी चाल है, बस पैकिंग नई है।
शास्त्री जी फटा कुर्ता कोट के नीचे पहन लेते थे। कहते थे शर्म तब होनी चाहिए जब किसान नंगा सोए। आज शर्म किसे है? लाखों का सूट, करोड़ों का प्रचार, और जनता को डेटा पैक से राष्ट्रवाद डाउनलोड कराया जाता है। 
किसान की आय दोगुनी का सपना दिखाकर लागत चौगुनी कर दी। बेरोजगार को ऐप दे दिया, मजदूर को भाषण, छात्र को परीक्षा घोटाला।
11 जनवरी 1966 को ताशकंद में उनकी मृत्यु हुई। आधिकारिक कारण हार्ट अटैक बताया गया। परिवार ने सवाल उठाए। पोस्टमार्टम नहीं हुआ। फाइलें वर्षों बंद रहीं। सरकारें बदलीं, राज बदला, पर सच पर ताला जस का तस। 
कांग्रेस हो या बीजेपी, दोनों ने इस प्रश्न से दूरी बनाई। क्योंकि इतिहास की ईमानदार जांच से कई नकाब उतरते हैं, और सत्ता को नकाब बहुत प्रिय होता है।
आज कुछ लोग शास्त्री जी का नाम लेते हैं, पर उनकी आत्मा से डरते हैं। क्योंकि अगर शास्त्री मॉडल लागू हो जाए तो आधे नेता संपत्ति घोषित करते ही बेहोश हो जाएं, चौथाई इस्तीफा देने पड़ जाएं, बाकी प्रचार विभाग में नौकरी मांगते फिरें। 
शास्त्री जी का जीवन बताता है कि देश भाषणों से नहीं, संस्थाओं से चलता है। नारे से नहीं, नीति से चलता है। फोटो से नहीं, फैसलों से चलता है।
नरेंद्र भाई और बीजेपी को सबसे ज्यादा खतरा विपक्ष से नहीं, शास्त्री जी जैसे नेताओं की स्मृति से है। क्योंकि जनता अगर तुलना करने लगी तो सवाल पूछेगी कि 19 महीने में जिसने युद्ध भी संभाला, कृषि भी संभाली, संस्थाएं भी खड़ी कीं, सादगी भी निभाई, वह बड़ा नेता था या वह जो वर्षों से सत्ता में रहकर भी हर विफलता का दोष पिछले 70 साल पर डालता है।
लाल बहादुर शास्त्री जी साबित करते हैं कि ऊंचाई शरीर की नहीं, रीढ़ की होती है। कुर्सी की नहीं, चरित्र की होती है। नाम पोस्टर से नहीं, त्याग से बनता है। 
देश को आज फिर भाषणवीर नहीं, शास्त्री जैसे कर्मवीर चाहिए। बाकी पोस्टर तो बारिश में भीगकर उतर ही जाते हैं।



  ~विजय राजबली माथुर ©


Sunday, April 26, 2026

भारत ऐसे ही ज्ञान और कला के लिए विख्यात था ------ Chandrashekhar Joshi

मुस्लिम बंधुओं ने बनाया था ऐतिहासिक सुपर कंप्यूटर---
यह दुर्लभ खगोलीय एस्ट्रोलैब 17वीं शताब्दी में पीतल से बनाया गया था। जमाने की अद्भुत कलाकारी देख इसे पुराना सुपर कंप्यूटर नाम दिया गया। अब यह लंदन में नीलाम किया जाएगा।
...ऐसा बताते हैं कि 17वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में भारतीयों में उच्च दर्जे की खगोलीय रुचि थी। मुगल साम्राज्य में लाहौर खगोलीय उपकरण बनाने का प्रमुख केंद्र बना। यहां ज्ञान विज्ञान के एक संस्थान का नाम लाहौर स्कूल था। यहां खगोलीय उपकरण बनाने का शिल्प एक ही परिवार के चार पीढ़ियों तक पिता से पुत्र के बीच आगे बढ़ता रहा। लंदन में मौजूद दुर्लभ एस्ट्रोलैब को दो भाई कइम मोहम्मद और मोहम्मद मुकिम ने इसी स्कूल में बनाया था।
...वर्ष 1612 में तैयार किया गया यह एस्ट्रोलैब उस जमाने का अपनी तरह का सबसे बड़ा कंप्यूटर था। इसे सरदार आगा अफजल ने बनवाया था। वह मुगल साम्राज्य के एक बेहद शक्तिशाली सरदार थे और उस समय सम्राट जहांगीर के अधीन लाहौर का प्रशासन संभालते थे। बाद में यह जटिल उपकरण महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय के शाही संग्रह का हिस्सा रहा फिर उनकी पत्नी गायत्री देव के पास सुरक्षित रहा। उसके बाद निजी संग्रह में लंदन चला गया।
...इसकी कारीगरी वाकई अद्भुत है। इसमें 94 शहरों के देशांतर और अक्षांश सहित विविध विवरण अंकित हैं। फूलों की नक्काशी से जुड़े 38 तारा चिह्न हैं, पांच प्लेटें हैं और डिग्री का विभाजन बेहद बारीक है। इस एस्ट्रोलैब पर तारों के फारसी नाम और देवनागरी लिपि में संस्कृत नाम अंकित हैं। इसपर मक्का, बीजापुर, अजमेर, कश्मीर और लाहौर के स्थानों को दर्शाने वाली पट्टियां भी हैं। इसकी विकसित तकनीक को देख इसे सुपर कंप्यूटर कहा गया। यह इस्लामिक जगत और भारत की कला का बेजोड़ नमूना है।
...दोनों भाइयों ने कई एस्ट्रोलैब बनाए जो आज भी मौजूद हैं। इन दोनों ने मिलकर एक अन्य एस्ट्रोलैब बनाया था, जो अब इराक के राष्ट्रीय संग्रहालय में है। उसका व्यास मात्र 12 सेंटीमीटर है।
...लंदन में मौजूद सुपर कंप्यूटर को अगले सप्ताह सोथबी नीलामी घर में नीलाम किया जाएगा। इसका व्यास 29.5 सेंटीमीटर और ऊंचाई लगभग 50 सेंटीमीटर है। नीलामी में इसकी अनुमानित कीमत 15 से 25 लाख पौंड के बीच है। नीलामी की अन्य प्रमुख कलाकृतियों में जहांगीर की एक मुगलकालीन पेंटिंग भी शामिल है। इसकी अनुमानित कीमत 150,000 से 200,000 पौंड के बीच है। 
.. भारत ऐसे ही ज्ञान और कला के लिए विख्यात था..


  ~विजय राजबली माथुर ©
 

Wednesday, April 8, 2026

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त का बम ------ विजय राजबली माथुर

आज ०८ अप्रैल है -वह दिन जब केन्द्रीय असेम्बली में सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बम फेंका था.वह बम गूंगी -बहरी सरकार और क़ानून निर्माताओं को जगाने के लिए फेंका गया था किसी हिंसक इरादे से नहीं.न ही किसी की जान ही गई थी. २६ जनवरी १९३० को बांटे गए पर्चे में भगत सिंह ने कहा था-"एक क्रांतिकारी सबसे अधिक तर्क में विशवास करता है.वह केवल तर्क और तर्क में ही विशवास करता है.किसी प्रकार का गाली-गलौच या निन्दा,चाहे वह ऊंचे से ऊंचे स्तर से की गई हो,उसे अपने निश्चित उद्देश्य -प्राप्ति से वंचित नहीं कर सकती.यह सोचना कि यदि जनता का सहयोग न मिला या उसके कार्य की प्रशंसा न की गई तो वह अपने उद्देश्य को छोड़ देगा ,निरी मूर्खता है."



लोअर कोर्ट के जवाब में उन्होंने कहा था क्रान्ति से हमारा अभिप्राय है-अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज -व्यवस्था में आमूल परिवर्तन."समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मजदूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढी कमाई का सारा धन शोषक पूंजीपति हड़प जाते हैं.दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मोहताज हैं.दुनिया भर के बाजारों को कपड़ा मुहैय्या करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढंकने -भर को भी कपडा नहीं पा रहा है.सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर,लोहार तथा बढ़ई स्वंय गंदे बाड़ों में रह कर ही अपनी   जीवन-लीला समाप्त कर जाते हैं.इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूंजीपति जरा-जरा सी बातों के लिए लाखों का वार-न्यारा कर देते हैं.........स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठ कर रंगरेलियां मना रहा है शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल पड़े हैं."


आज भी जो शासन-व्यवस्था है वह भगत सिंह आदि क्रांतिकारियों के सपनों का स्वराज्य नहीं है.उनका कथन है-"क्रांतिकारियों का विशवास है कि देश को क्रान्ति से ही स्वतंत्रता मिलेगी.वे जिस क्रान्ति के लिए प्रयत्नशील हैं और जिस क्रान्ति का रूप उनके सामने स्पष्ट है उसका अर्थ केवल यह नहीं है कि विदेशी शासकों तथा उनके पिट्ठुओं से क्रांतिकारियों का सशस्त्र संघर्ष हो ,बल्कि इस सशस्त्र संघर्ष के साथ -साथ नवीन सामाजिक व्यवस्था के द्वार देश के लिए मुक्त हो जाएँ.क्रान्ति पूंजीवाद,वर्गवाद तथा कुछ लोगों को ही विशेषाधिकार दिलाने वाली ओरानाली का अंत कर देगी.यह राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़ा करेगी,उससे नवीन राष्ट्र और नए समाज का जन्म होगा.क्रान्ति से सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि वह मजदूर तथा किसानों का राज्य कायम कर उन सब सामजिक अवांछित तत्वों को समाप्त कर देगी जो देश की राजनीतिक शक्ति को हथियाए बैठे हैं."


आप खुद ही तुलना करें क्या हमें जो आजादी मिली है वह वैसी ही है जिसके लिए भगत सिंह ,बटुकेश्वर दत्त,अशफाक उल्ला खाँ,राम प्रसाद बिस्मिल ,चन्द्र शेखार आजाद आदि असंख्य क्रांतिकारियों ने अपना बलिदान दिया था.यदि नहीं तो उसे प्राप्त करने में आप क्या योगदान देंगें?

  ~विजय राजबली माथुर ©

Thursday, April 2, 2026

पाप और पुण्य का भुगतान इसी ईह लोक में है ------ अरविन्द राज स्वरूप


कानपुर 2 अप्रैल 2026 
पाप और पुण्य का भुगतान इसी ईह लोक में है।
कल रात में लखनऊ से कानपुर आया । एक दिन के लिए।आज सवेरे का हिंदुस्तान अखबार पढ़ा।पूरा पेज कानपुर वासियों की गैस की किल्लत से हो रही परेशानी से भरा हुआ है। 
सरकार सिर्फ बयान बाजी तक सीमित है। 
सारी रिस्पांसिबिलिटी इस दिक्कत की भारतीय जनता पार्टी की केंद्रीय सरकार की है। उसकी अमेरिकन चाटुकारिता की नीति ने भारत देश की पूरी जनता को परेशानी में डाल दिया है। यह उतनी ही बड़ी परेशानी है जितनी भारत देश को कोविड में भुगतनी पड़ी थी। तब तत्काल मौत का खतरा था और अब रोज-रोज रोटी बनाना मुश्किल हो गया। 
ईरान भारत का दोस्त था। ईरान से भारत को कोई खतरा नहीं था। फिर भी प्रधानमंत्री श्री मोदी इसराइल जाकर नस्ली सहांरक नेतन्याहू से गले मिलने लगे । 26 तारीख फ़रवरी को वहां से लौटे और 28 को इसराइल और अमेरिका ने ईरान पर हमला कर दिया। इतना ही नहीं इसराइल को फादर लैंड भी प्रधानमंत्री घोषित कर आए।
अगर भारत सरकार स्पष्ट रूप से ईरान के साथ खड़ी होती तो हमको कोई दिक्कत ना होती ।जबकि ईरान हमारा पुराना दोस्त था ।भारत सरकार ने अमेरिका का चाटुकार  बनना स्वीकार किया और अमेरिका का राष्ट्रपति तो दुनिया का सबसे रद्दी  और बेकार राष्ट्रपति साबित हुआ।
मैं देख रहा हूं कि भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों में भी उनकी पार्टी में जो चल रहा है और जो देश में हो रहा है उसका प्रभाव है और वहां भी खलबली है। 
आरएसएस का प्रभाव तो भाषण भरों में सीमित है। उनको पता है कि उनका महत्व सिर्फ और सिर्फ भारतीय जनता पार्टी सरकार की वजह से है। इसलिए उनकी तो बोलती ही बंद है।
उनके पदाधिकारी बड़े-बड़े खाली पीली शब्द बोलते हैं बस। 
सब लोगों को अपने किए का भुगतान होता है। पाप का पाप से। पुण्य का पुण्य से। 
एक पाप देश की जनता से अनजाने में हो गया और अब हम भुगत रहे हैं ।हम ही तो देश की जनता है ,और हमारे जैसे 140 करोड़ भारतीय। 
अब इससे छुटकारा पाना है ।जनतंत्र में वोट के द्वारा ही छुटकारा पाया जाता है, सो 2027 में उत्तर प्रदेश में और 2029 में पूरे भारतवर्ष से बीजेपी से  छुटकारा पाना है।
जो भी आएगा वह इससे तो अच्छा ही होगा।




  ~विजय राजबली माथुर ©

Monday, March 30, 2026

भारत की राजधानियों का ऐतिहासिक क्रम ------ डॉ. गिरीश कुमार वर्मा

 
भारत की राजधानियों का ऐतिहासिक क्रम
(एकरेखीय विकास यात्रा)
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✍🏻 डॉ. गिरीश कुमार वर्मा
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भारत  का  इतिहास अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और विविधतापूर्ण   है, जिसमें सत्ता के केंद्र —अर्थात् राजधानियाँ—समय-समय पर बदलती  रही  हैं। इन  परिवर्तनों  के  पीछे राजनीतिक, सामरिक, आर्थिक और प्रशासनिक कारण निहित थे। यदि हम इन राजधानियों को एकरेखीय क्रम में देखें, तो भारतीय इतिहास की एक स्पष्ट और सतत धारा हमारे सामने उभरती है।
प्राचीन भारत में पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) एक अत्यंत   महत्त्वपूर्ण   एवं प्रभावशाली राजधानी रही। इसे एक सुदृढ़ राजधानी के रूप में स्थापित करने में महापद्मनंद का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने सोलह महाजनपदों को अपने अधीन कर एक विशाल और सशक्त राज्य की आधारशिला रखी। बाद   में   मौर्य  और  गुप्त   जैसे   महान साम्राज्यों ने यहीं से शासन किया। चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक के काल में यह नगर अपनी चरम   उन्नति   पर पहुँचा। गंगा के किनारे स्थित होने   के   कारण   यह   व्यापार, प्रशासन और संस्कृति का प्रमुख केंद्र बना रहा।
प्राचीन  भारत   में  जहाँ   पाटलिपुत्र जैसे   नगर व्यापक साम्राज्यों की राजधानी रहे, वहीं अनेक क्षेत्रीय   राजधानियाँ   भी अपने-अपने स्तर पर अत्यंत महत्त्वपूर्ण थीं। उदाहरणतः मथुरा शूरसेन जनपद   की   राजधानी   थी   और धार्मिक तथा सांस्कृतिक  दृष्टि  से  अत्यंत   समृद्ध  केंद्र  रहा, जबकि हस्तिनापुर  कुरु  राज्य  की राजधानी के रूप   में  विख्यात था। यद्यपि   ये  नगर  सम्पूर्ण  भारत  की   राजधानियाँ नहीं थे, तथापि इन्होंने प्राचीन भारतीय सभ्यता, राजनीति और संस्कृति के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मध्यकाल  में  दिल्ली सल्तनत के उदय के साथ सत्ता का  केंद्र   दिल्ली बना। हालांकि, मोहम्मद बिन   तुगलक   ने राजधानी को दक्षिण भारत के दौलताबाद (पूर्व नाम देवगिरि) स्थानांतरित करने का प्रयास किया था। इसका उद्देश्य साम्राज्य पर बेहतर  नियंत्रण   स्थापित  करना था, किंतु यह प्रयोग सफल नहीं हो सका और अंततः राजधानी पुनः दिल्ली लौटा दी गई।
मुगल काल में भी राजधानियों में परिवर्तन देखने को मिलता   है।   प्रारंभ में आगरा को राजधानी बनाया   गया,   जहाँ   से अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ   ने   शासन   किया।  इसके   पश्चात्   शाहजहाँ   ने दिल्ली में शाहजहाँनाबाद बसाकर उसे राजधानी   बनाया।   इस काल में इलाहाबाद  (प्रयाग)   भी   पूर्ण   राजधानी  न   होकर   एक महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक और सामरिक केंद्र के रूप में उभरा।
ब्रिटिश   काल   में    प्रारंभ   में कलकत्ता   (अब कोलकाता) को भारत की राजधानी बनाया गया, जो   व्यापार   और   प्रशासन    का प्रमुख   केंद्र    था। किन्तु 1911 में ब्रिटिश सरकार ने राजधानी को पुनः  दिल्ली  स्थानांतरित   कर  दिया, ताकि भारत  के  उत्तरी और मध्य भागों पर प्रशासनिक नियंत्रण और अधिक सुदृढ़ बनाया जा सके।
15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी दिल्ली को ही भारत की राजधानी बनाए रखा गया। आज   नई   दिल्ली भारत का राजनीतिक,  प्रशासनिक  और कूटनीतिक केंद्र है। यदि भारत की राजधानियों   का   एकरेखीय  क्रम निर्धारित किया जाए, तो वह इस प्रकार उभरता है—
पाटलिपुत्र → दिल्ली → दौलताबाद (अल्पकालिक) → दिल्ली →
आगरा → दिल्ली → कलकत्ता → दिल्ली (वर्तमान)
अंततः   कहा   जा‌  सकता   है   कि भारत  की राजधानियों   का ‌ यह   परिवर्तन   केवल   स्थान परिवर्तन   नहीं था, बल्कि  यह समय-समय पर बदलती  राजनीतिक   परिस्थितियों, प्रशासनिक आवश्यकताओं   और   साम्राज्य   विस्तार  की रणनीतियों का दर्पण भी था। यह क्रम भारतीय इतिहास   की   गतिशीलता,   निरंतरता   और विकासशीलता   को  स्पष्ट   रूप  से प्रतिबिंबित करता है।
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 ~विजय राजबली माथुर ©
 

Sunday, March 29, 2026

खतरनाक साजिश ------ Ansh Kidsplay


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⁉️ क्या आपको पता है कि हम भारतीय एक खतरनाक साजिश का शिकार हो चुके हैं और वह साजिश है हमारे संयुक्त परिवारों को तोड़कर उन्हें उपभोक्ता बनाने की..???
 जब परिवार टूटते हैं, तभी बाजार फलते फूलते हैं— ये सिर्फ विचार नहीं, पूरी रणनीति है ....
भारत की सबसे मजबूत चीज क्या थी..???
भारत पर मुगल आए, अंग्रेज़ आए, और कई हमलावर आए लेकिन एक चीज कभी नहीं टूटी, वो थी एकता....??
  3 पीढ़ियाँ एक छत के नीचे रहती थी बुज़ुर्गों का अनुभव बच्चों में संस्कार खर्च में सामूहिकता और त्यौहारों में गर्माहट हुआ करती थी...
यह हमारी असली “Social Security” थी। कोई पेंशन की ज़रूरत नहीं थी, कोई अकेलापन नहीं, कोई Mental Health Crisis नहीं।
पश्चिमी देशों को यह चीज खटकने लगी और उन्होंने परिवारों को तोड़ने के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया..???
क्योंकि पश्चिमी देश हमेशा से ही उपनिवेशवादी रहे हैं — उनके लिए बाज़ार सबसे बड़ा धर्म है??
लेकिन भारत जैसा देश, जहाँ लोग साझा करते हैं, कम खर्च करते हैं, और सामूहिक सोच रखते हैं — वहां वे अपने उत्पाद बेच ही नहीं पा रहे थे।
इसलिए एक शातिर रणनीति बनाई गई...???
इनके परिवार ही तोड़ दो, हर कोई अकेला हो जाएगा,और हर कोई ग्राहक बन जाएगा।
कैसे हुआ ये हमला..???
1.मीडिया का सहारा लेकर संयुक्त परिवारों को तोड़ने की शुरुआत...
संयुक्त परिवार को “झगड़ों का अड्डा”, “बोझ” और “रुकावट” के रूप में दिखाया गया।
न्यूक्लियर परिवार को “फ्रीडम”, “मॉर्डन”, “Self-made” बताकर  ग्लैमराइज किया गया।
याद कीजिए: टीवी पर आज भी कितने ही शो हैं जहां पूरे दिन बहू-सास की लड़ाई, नन्द भाभी की लड़ाई, देवरानी जिठानी की लड़ाई पूरे दिन दिखाई जाती है, और हमारे/आपके परिवार की घरेलू औरतें पूरे दिन यही धारावाहिकों को देखती है और इनका निष्कर्ष/सॉल्यूशन निकलता है – “अलग हो जाओ!”
 2. उपभोक्तावाद के ज़रिए...
जब हर जोड़ा अलग रहने लगा...
पश्चिमी देशों अपनी चाल में कामयाब हुए और हमारे परिवार विखर का उनका बाजार बन गए 
पहले 1 परिवार में चार भाई रहते थे, अब एक परिवार सिर्फ चार लोग (पति-पत्नी, और 2 बच्चे)
 पहले 4 भाईयों के बीच 1 टीवी, अब 4 भाईयों के बीच 4 टीवी
 पहले 4 भाईयों के बीच 1 रसोई, अब 4 भाईयों के बीच 4 किचन सेट
 पहले 4 भाईयों के बीच 1 कार और 1 मोटरसाइकिल, अब 4 भाईयों के बीच 4 कार, 4स्कूटी और 4 मोटरसाइकिल।
बाजार में बूम आ गया – और समाज में टूटन।
भारत में क्या हुआ इस “सोचलेवा हमले” के बाद?
 सामाजिक पतन...???
 बुज़ुर्ग अब बोझ हैं
 बच्चे अकेले हैं (और स्क्रीन में गुम)
 रिश्तेदार “उपलब्ध नहीं” हैं
 संस्कारों की जगह “Influencers” ने ले ली
मानसिक स्वास्थ्य संकट...???
 पहले जो बात नानी-दादी से होती थी, अब काउंसलर से होती है...
 अकेलापन अब इलाज़ मांगता है, पहले प्यार से दूर होता था
 बाजार का फायदे...????
 हर समस्या का एक उत्पाद
 हर भावना का एक ऐप
 हर उत्सव का एक“ *ऑनलाइन ऑर्डर”
“संस्कार की जगह सब्सक्रिप्शन ने ले ली है”
आज का सवाल — हम क्या बनते जा रहे हैं?
हमने “आधुनिकता” की दौड़ में...???
 संयुक्तता को “Old culture” कहा...
 माता-पिता को “Obstacles” कहा...
 परिवार को “फालतू भावना” कहा...
 रिश्तों को “Unfollow” कर दिया...
लेकिन क्या आपने सोचा..???
Amazon का फायदा तभी है जब आप Diwali पर अकेले हों — और Shopping करें, परिवार के साथ न बैठें।
Zomato तभी कमाता है जब कोई माँ का खाना नहीं खा रहा।
Netflix तभी देखेगा जब कोई दादी की कहानी नहीं सुन रहा।
समाधान: हम अभी भी वापसी कर सकते हैं???
 संयुक्त परिवार को पुनः “संपत्ति” मानें, बोझ नहीं।
 बच्चों को उपभोक्ता नहीं, संस्कारी इंसान बनाएं।
 बुज़ुर्गों को घर से बाहर न करें — उनके अनुभव हर Google Search से ऊपर हैं।
त्यौहार मनाएं, सामान नहीं।
अकेलापन कम करने के लिए App नहीं, अपनापन बढ़ाइए।
निष्कर्ष :--
“पश्चिम ने व्यापार के लिए परिवार तोड़े,और हम ‘आधुनिक’ बनने के लिए अपना वजूद बेच आए।”
अब समय है रुकने का, सोचने का, और अपने संस्कारों को फिर से अपनाने का — नहीं तो अगली पीढ़ी को ‘संयुक्त परिवार’ शब्द का अर्थ बताने के लिए भी शायद Google की जरूरत पड़ेगी l
क्या आपको नहीं लगता कि हम  ज़िन्दगी की सुख सुविधाओं के लिए अपने परिवारिक माहौल के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं हम अपनी असल जिंदगी खोते जा रहे हैं,हम स्वार्थी हो रहे हैं एक बार अपना 30 बर्ष पुराना जीवन याद करके देख लो, जहां सिर्फ भाईचारा था इमोशन था कोई सोसाइड नहीं करता था, सहयोग की भावना थी, संस्कार ऐसे कि गांव के हर आदमी को पिता जितना सम्मान दिया जाता था किन्तु आज तो पिता ही "यार पापा" हो गए , और आज यही संस्कार हमारी आधुनिकता को दर्शाती है और हमें घिन आती है ऐसी आधुनिकता पर, कृपया एक बार विचार अवश्य करें।

                                                                             
                                                                     लेखिका ---  Ansh Kidsplay

  ~विजय राजबली माथुर ©



























Saturday, March 28, 2026

निकृष्ट तम कृत्य : PM Care fund. ------ Kanupriya

जब आप जीवन मे सबसे बुरी परिस्थिति में हों तब क़िस्म क़िस्म के लोग मिलते हैं; 
 एक वे जो आपको  अपनी क्षमता अनुसार राहत देते हैं, और उतना ही उपकार समझ जो जितना साथ निभा दे की तर्ज़ पर आप हमेशा उनके शुक्रगुजार रहते हैं . 
फिर वे जो किसी भी कारण या परिस्थिति वश दूर से दृष्टा रहते हैं,   जिनके कारण न आपको फ़ायदा होता है न नुकसान. दुनिया मे हर व्यक्ति आपकी मदद की capacity में भी नही होता, आपके जीवन मे involve भी नहीं होना चाहता,  तो ये भी ठीक ही है.
   हाँ जिनसे आपका उम्मीद का रिश्ता हो वे भी दृष्टा रहें तो थोड़ी तकलीफ़ होती है.
 फिर वे जो मदद का दिखावा करते हैं मगर दरअसल करते कुछ भी नहीं,  ऐसे लोगों को पहचानना थोड़ा मुश्किल होता है, वे भले और मीठे बने रहते हैं, उम्मीद बनाए रखते हैं, मगर अंततः आपको अपने अनुभव से समझ आ जाता है कि इनसे उम्मीद रखना बेकार है. ये आपके समय की सबसे बड़ी हानि करते हैं. 
फिर वे लोग भी मिलते हैं  जो मदद करने को तैयार होते हैं मगर आपसे बदले में भी कुछ चाहते हैं, और सीधे सीधे कह देते हैं, ऐसे में आपके पास अपने लिये तय करने का अधिकार रहता है. और अगर आप बेहद ही कमज़ोर मानसिकता में न हों कि ख़ुद को छलने के लिये भी तैयार हों तो अपने लिये कैसा भी निर्णय कर ही लेते हैं. 
फिर वे लोग होते हैं, जिनका आपको पता होता है कि वे आपका बुरा ही चाहते हैं और वे अपनी नीयत को अपनी बात या व्यवहार से  छुपाते भी नहीं. आपका दुख उनके लिये ख़ुशी का सबब होता है, और आपको उनसे डील करना सीखना होता है. 
 यहाँ तक भी ठीक है आप मैनेज कर लेते हैं. 
मगर सबसे ख़तरनाक वे होते हैं जो आपकी बुरी आर्थिक,मानसिक या भावनात्मक स्थिति का अपने पक्ष में फ़ायदा उठाते हैं यानी राहत का दिखावा करते हैं , आपका भरोसा जीतते हैं, उम्मीद जगाते हैं मगर असल मे अपना ही उल्लू सीधा करते हैं. ऐसे लोग जीवन के सबसे कड़वे , न भूलने वाले अनुभव देते हैं. 
ये ऐसा ही है जैसे किसी रेल दुर्घटना में घायल व्यक्ति की तरफ़ मदद का हाथ बढाकर उसके कंगन लूट लिए जाएँ, और फिर उसे उसके हाल पर छोड़ दिया जाए.  ऐसे में नुकसान सिर्फ़ कंगन का नही होता, इंसानियत पर से ही भरोसा उठ जाता है.  
 किसी दूसरे की आपदा में अपने लिये अवसर खोजने वाले लोग निकृष्टतम होते हैं , और इसमें कोई दोराय भी नहीं.
और मुझे अब तक का इस सरकार का सबसे निकृष्ट तम कृत्य लगा PM Care fund. संकट से जूझती जनता को उसके हाल पर छोड़ देने, चुनी हुई सरकार से होने वाली उम्मीद और भरोसे पर खरा न उतरने से भी ज़्यादा. 
सिर्फ़ PM fund नाम होता तब भी ग़नीमत थी, आपने जनता को भरोसा दिलाया कि आप care करते हैं, आप मदद करना चाहते है , आपने जनता से अपील की कि देश की मदद के लिये आपदकाल में भी चंदा दें, यहाँ तक आपने उसके नाम पर लोगों की सैलरी तक काट ली, और फिर जब लोगों के घरों में चिताएँ जल रही थी,  वह तमाम धन आप ग़बन कर गए, न आपने मदद की न हिसाब दिया,  तिसपर मीडिया की मदद से अपनी संत और savior की छवि भी बनाए रखी. 
इससे घटिया, इससे नीच भी कुछ हो सकता है?
अब जब सरकार की तरफ़ से संकटकाल की घोषणा हो ही चुकी है, और कल प्रधानमंत्री जी के कुल भाषण का सार " जो उचित समझो वो करो", यानी उपदेश देकर जनता को उसके हाल पर छोड़ देना ही है, तब सरकार से एक ही अंतिम उम्मीद है, जनता अपना ओढ़ खींच लेगी;
बस अबकी बार आप संकटग्रस्त जनता से  किसी राहत और केयर के नाम पर फण्ड मत माँगना, इतना रहम करना. बाक़ी जो अभी तक अपने अनुभव से ये नहीं समझे कि इस सरकार से किसी तरह की उम्मीद का रिश्ता नही रखना चाहिये, उनका ऊपर वाला ही मालिक है.


                                                                      

                                                      लेखिका ---   Kanupriya


 ~विजय राजबली माथुर ©
 

Tuesday, March 24, 2026

ममता बनर्जी की संभावनाएं ------ विजय राजबली माथुर

 


Friday, October 19, 2012

 "ममता बनर्जी के प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं ? "

उद्धृत लेख द्वारा मैंने स्पष्ट किया था :

पुराने अखबारों का अवलोकन करते समय सुश्री ममता बनर्जी की यह जन्मपत्री दिखाई दे गई जिसमे सन 2002 तक का उनका भविष्य लेखक ने अपनी थ्यौरी से दिया था। उसके सही-गलत होने की विवेचना मैं नहीं कर रहा हूँ। मैंने विगत विधानसभा चुनावों से पूर्व अपने एक लेख द्वारा ममता जी की कटु राजनीतिक आलोचना भी की थी और पश्चिम बंगाल की जनता से आह्वान भी किया था कि वह ममता जी को सत्तारूढ़ न होने दे। परंतु ममता जी मुख्यमंत्री बनी और बड़ी शान से बनीं। इसलिए भी कौतूहल था उनका भविष्य जानने का और इसलिए भी कि दार्जिलिंग ज़िले के सिलीगुड़ी मे 8वी कक्षा से 10वी बोर्ड की परीक्षा पास करने तक रहने के कारण बंगाल की राजनीति मे दिलचस्पी सदा ही रही है। वहाँ से 10-15 किलोमीटर दूर ही है नक्सल बाड़ी जहां 1967 मे 'नक्सल बाड़ी से नल बाड़ी तक' आंदोलन हमारे रहते ही शुरू हुआ था। इस आंदोलन का सम्पूर्ण लाभ राजस्थान के मारवाड़ियों को हुआ था जिनको इंश्योरेंस क्लेम नुकसान से कहीं बहुत ज़्यादा मिला था। अपनी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर आज भी मैं ममता जी का समर्थक नहीं हूँ,परंतु उनके ग्रह-नक्षत्र जो बोल रहे हैं उनको झुठलाया भी तो नहीं जा सकता। misuse of knowledge भी मैं नहीं कर सकता। अतः ममता जी की कुंडली का वैज्ञानिक निष्पक्ष  विश्लेषण प्रस्तुत करने मे कोई पूर्वाग्रह(IBN7 के प्रतिनिधि ब्लागर एवं उनकी  सहयोगी पूना प्रवासी ब्लागर की भांति जो ज्योतिष को मीठा जहर कहते हैं ) भी नहीं है। 



ममता जी की प्रस्तुत जन्मपत्री के अनुसार उनका जन्म लग्न-मकर है और---



द्वितीय भाव मे कुम्भ का 'मंगल'



पंचम भाव मे वृष का 'चंद्रमा'



षष्ठम भाव मे मिथुन का 'केतू'



सप्तम भाव मे कर्क का 'ब्रहस्पति'



दशम भाव मे तुला का 'शनि'



एकादश भाव मे वृश्चिक का 'शुक्र'



द्वादश भाव मे धनु के 'सूर्य','बुध' और 'राहू'



अखबारी विश्लेषण से अलग मेरा विश्लेषण यह है कि जन्म के बाद ममता जी की 'चंद्र महादशा' 07 वर्ष 08 आठ माह एवं 07 दिन शेष बची थी। इसके अनुसार 03 जूलाई 2010 से वह 'शनि'महादशांतर्गत 'शुक्र' की अंतर्दशा मे 03 सितंबर 2013 तक चलेंगी। यह उनका श्रेष्ठत्तम समय है। इसी मे वह मुख्य मंत्री बनी हैं। 34 वर्ष के मजबूत बामपंथी शासन को उखाड़ने मे वह सफल रही हैं तो यह उनके अपने ग्रह-नक्षत्रों का ही स्पष्ट प्रभाव है। 



इसके बाद पुनः 'सूर्य' की शनि मे  अंतर्दशा 15 अगस्त 2014 तक  उनके लिए अनुकूल रहने वाली है और लोकसभा के चुनाव इसी अवधि के  मध्य होंगे। केंद्र (दशम भाव मे )'शनि' उनको 'शश योग' प्रदान कर रहा है   

जो 'राज योग' है।



ममता जी को समयानुकूल सही बात कहने व उठाने का विलक्षण लाभ भी   उनके ग्रह प्रदान कर रहे हैं   

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आजकल इधर कई यू ट्यूब चेनल्स पर दिग्गज ज्योतिषी गण ' ममता बनर्जी ' के सत्ता वापसी को असंभव  बताते नहीं थक रहे है ऐसा  कर वे सत्तारूढ़ केंद्र सरकार से  पुरस्कार प्राप्त कर सकते हैं। 

मेरे अपने आँकलंन  के अनुसार ०६ फरवरी २०२६ से ०६ दिसंबर २०२८ तक ममता जी की बुध महादशान्तर्गत ' शुक्र' की अंतर्दशा चल रही है जो सुखदायक और श्रेष्ठ है उसके बाद भी ०९ मार्च २०३२ तक  ममता जी का समय लाभदायक,श्रेष्ठ और राज्य वृद्धिदायक होगा। अतः यदि व्यापक हेराफेरी ,धांधली और धूर्तता कामयाब न हो तो ममता जी की पुनः जीत अवश्य ही होगी। हम उनकी सफलता के लिए  मंगलकांनाएं। 











 ~विजय राजबली माथुर ©