Wednesday, June 3, 2026

प्रिय #students #GenZ के बच्चों, ------ रश्मि दीक्षित




प्रिय #students #GenZ के बच्चों,

#नीट, #सीबीएसई, #सीयूईटी और #एसएससी #जीडी जैसी परीक्षाओं की अव्यवस्थित अनियमितताओ के चक्रव्यूह में फंसकर आज तुम जिस मानसिक तनाव, अनिश्चितता और गहरे दुख-दर्द से गुजर रहे हो, उसे पूरा देश देख रहा है।

अपनी मेहनत को चंद रुपयों में लीक होते देखना और अपने साथियों को प्रशासनिक नाकामियों के कारण आत्मघाती कदम उठाते देखना कोई मामूली तकलीफ नहीं है। व्यवस्था के इस क्रूर मजाक के खिलाफ तुम्हारा गुस्सा बिल्कुल जायज है और सत्ता पक्ष में किसी को तो इसकी जिम्मेदारी लेनी ही होगी।

लेकिन इस बेहद संवेदनशील मोड़ पर तुम्हें बहुत सतर्क रहने की जरूरत है। इस खुले खत के जरिए मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूं कि अपनी इस वास्तविक तकलीफ और आंसुओं का फायदा किसी और को अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए मत उठाने दो।

जो इंसान अब तक अपने डर की वजह से कभी हिंदुस्तान वापस आना ही नहीं चाहता था, वह अचानक 6 जून को ही वापस क्यों आ रहा है? समय के खेल को समझो; ठीक 6 जून को देश के प्रमुख विपक्षी दलों की एक बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है,जो हफ़्तों से तुम्हारे हक की लड़ाई चिलचिलाती गर्मी में सड़को पर लड़ रहा है।

यह लड़ाई विशुद्ध रूप से तुम्हारी है, तुम्हारे भविष्य की है, और इसे बेहद मजबूत कंधों के सहारे ही लड़ा जा सकता है। याद रखो, वे कंधे कभी मजबूत नहीं हो सकते जो CJI के एक बयान के बाद महज हंसी-मजाक ,उत्तेजना और सैटायर (व्यंग्य) के रूप में तुम्हें मिले थे। जिस मंच की अपनी कोई ठोस वैचारिक गहराई या जमीनी रीढ़ ही नहीं है, वह इतने बड़े देश के युवाओं के भविष्य का बोझ कैसे उठा सकता है?

इस पूरे ताने-बाने को थोड़ी और गहराई से समझो। जो व्यक्ति आज विदेश में बैठकर सोशल मीडिया पर वीडियो में चमका रहा है अचानक भारत लौटकर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहा है, उसके बयानों के पीछे छुपे अहंकार को पहचानो। उसके संवादों में छिपा यह 'मैं' और व्यक्तिगत अहंकार देखने लायक है- "मैं आ रहा हूं इस्तीफा मांगने", जैसे वह अकेला अपने दम पर तुम्हें यह लड़ाई जिता देगा।

वह विपक्ष के अब तक के जमीनी और शांतिपूर्ण संघर्ष को यह कहकर छोटा और कमजोर दिखाने की कोशिश की रहा है कि देश भर में प्रोटेस्ट तो हो रहे हैं पर उनसे सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ रहा। यानी जो लोग हफ्तों से लाठियां खा रहे हैं, जमीन पर संघर्ष कर रहे हैं, उनकी मेहनत बेकार है और चमत्कार सिर्फ इसके आने से होगा? यह आत्ममुग्धता इतनी सीधी और सरल नहीं है, इसके पीछे एक गहरी राजनीतिक मंशा हो सकती है।

यह व्यक्ति पूर्व में आम आदमी पार्टी में सक्रिय कार्यकर्ता रह चुका है ये तो सभी जानते हैं। पर सवाल इसके बाद उठता है कि वह अच्छी तरह जानता है कि पिछले 12 सालों से देश की राजनीति में न तो जवाबदेही बची है और न इस्तीफों का कोई चलन है। और उसे यह भी बखूबी मालूम है कि भारत के कानून के तहत किसी भी प्रदर्शन के लिए पहले से प्रशासनिक अनुमति लेनी अनिवार्य होती है। इसके बावजूद उसने कोई पूर्व अनुमति नहीं ली?

ये जानते हुए भी कि सत्ता पक्ष आन्दोलनों को किस तरह संभालता है, बस हवा-हवाई दावों के सहारे सबको सोशल मीडिया पर सीधे एयरपोर्ट पर पहुंचने का बुलावा दे दिया। बिना किसी कानूनी तैयारी के भीड़ इकट्ठा करना और फिर पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने जाकर परमिशन मांगने का नाटक करना, आठ लाख ऑनलाइन हस्ताक्षरों का भ्रम फैलाकर एक गंभीर छात्र आंदोलन को प्रशासनिक टकराव की अंधी गली में धकेलने की साजिश है।

हिंदुस्तान में पैर रखने से पहले ही अपनी संभावित गिरफ्तारी का अंदेशा जताकर पहले से ही एक 'विक्टिम कार्ड' तैयार कर लेना साफ इशारा है कि यहाँ कोई ठोस व्यावहारिक योजना नहीं है। अभिजीत दीपके राजनीतिक रूप से कोई अपरिचित इंसान नहीं है, मुझे अभिजीत में संभावना नजर आती है और मैं चाहती हूं कि ऐसे लोग राजनीति में आएं, लेकिन खेल-खेल में बनी इस वेबसाइट की सोशल मीडिया पर अप्रत्याशित रीच देखकर, करियर री-लॉन्चिंग यह एक बुरा विचार है वह भी छात्र आंदोलन जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दे पर।

अभिजीत दीपके का लाईफ प्लान विदेश में पढ़ाई कर वहीं नौकरी करना था,अगर देश और समाज की इतनी ही चिंता हमेशा से थी, तो अपनी पुरानी पार्टी के बिखरने के बाद इसे समाज में सक्रिय रहना चाहिए था, जो कि यह बिल्कुल नहीं रहा। अब जरा ठंडे दिमाग से सोचो, कहीं यह तुम्हारे वास्तविक और पवित्र प्रोटेस्ट को पूरी तरह खराब और बदनाम करने के लिए बुना गया कोई सियासी ताना-बाना तो नहीं है?

बिना किसी संगठन और व्यावहारिक सोच के खड़ा किया गया यह गैर-जिम्मेदाराना तमाशा मौजूदा सरकार की एक 'सी-टीम' की तरह काम करता दिख रहा है, जिसका इकलौता मकसद विपक्ष के अब तक के गंभीर, वास्तविक और शांतिपूर्ण संघर्ष को जनता की नजरों में हल्का करना, असली मुद्दे को भटकाकर बिखरा देना और अंततः व्यवस्था को फायदा पहुंचाना है।

एक दशक पहले अन्ना आंदोलन के जरिए भी पूरे हिंदुस्तान की भावनाओं और गुस्से को इसी तरह भुनाकर एक बहुत बड़ा धोखा दिया गया था, जिसका हर्जाना देश पिछले 12 सालों से भुगत रहा है। यही वजह है कि जो समझदार और अनुभवी लोग शुरुआत में इस मंच के जोश में जुड़े थे, उन्होंने इतिहास की कड़वाहट को याद रखते हुए समय रहते अपने कदम पीछे खींच लिए।

तुम इस हिंदुस्तान की सबसे समझदार, जागरूक और तार्किक पीढ़ी हो। भावनाओं के सैलाब में बहकर कोई भी ऐसा कदम मत उठाओ जिससे तुम्हारी सालों की तपस्या और यह आंदोलन एक राजनीतिक ड्रामे में तब्दील हो जाए। अगर आज कोई तुमसे यह कहता है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों या सत्याग्रह से तुम व्यवस्था से नहीं जीत सकते, तो तुम्हें इतिहास को दोबारा पलटने की जरूरत है।

हमारी आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी की भूमिका को याद करो, जिसे पिछले 12 सालों में एक सोची-ऐसी रणनीति के तहत बेहद कमजोर दिखाने की कोशिश की गई है। सत्य, अहिंसा और बिना किसी हुड़दंग के किया गया शांतिपूर्ण आंदोलन ही इस देश में अधर्म और दमनकारी व्यवस्था के खिलाफ सबसे अचूक और मजबूत हथियार रहा है। वर्तमान में इसका सबसे बड़ा उदाहरण किसान आंदोलन था।

अपनी लड़ाई खुद लड़ो, गरिमा के साथ लड़ो, और ऐसे किसी भी छलावे या सोशल मीडिया के मुखौटों के मोहरे मत बनो जिनका मकसद सिर्फ अपनी सियासी दुकान चमकाना है।

इस पूरे सफर में तुम खुद को अकेला मत समझना। सच की इस राह पर हम सब, पूरा देश तुम्हारे साथ है। तुम्हारी इस जायज और पवित्र लड़ाई में हम कदम से कदम मिलाकर तुम्हारे पीछे खड़े हैं। हिम्मत मत हारना, हौसला बनाए रखना, जीत अंततः तुम्हारी ही होगी।

एक अभिभावक और तुम्हारी शुभचिंतक,
रश्मि दीक्षित






  ~विजय राजबली माथुर ©