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Sunday, March 11, 2018

निर्णायक शंखनाद ------ महेश राठी

 

वर्ष 1978-79 में सहारनपुर के 'नया जमाना ' के संपादक स्व. कन्हैया लाल मिश्र 'प्रभाकर 'ने अपने एक तार्किक लेख मे 1951  - 52 मे सम्पन्न संघ के एक नेता स्व .लिंमये के साथ अपनी वार्ता के हवाले से लिखा था कि,कम्युनिस्टों  और संघियों के बीच सत्ता की निर्णायक लड़ाई  दिल्ली की सड़कों पर लड़ी जाएगी।

प्रस्तुत लेख से उसकी पुष्टि ही होती है।


 *भारत के बंटवारे और पाकिस्तान की मांग करने वाली मुस्लिम लीग के साथ मिलकर भाजपा के आदर्श नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी सत्ता का आनन्द लेते हैं। बंगाल में बनी मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा के गठजोड़ वाली सरकार में श्यामा प्रसाद मुखर्जी वित्तमंत्री रहे। इस सरकार के मुख्यमंत्री फजुल हक थे जो बाद में भारत के बंटवारे और पाकिस्तान निर्माण की लड़ाई का एक हिस्सा थे, जो बाद में चलकर एक समय में पाकिस्तान के गृहमंत्री भी रहे। इसके अलावा भारत के बंटवारे को लेकर भी सबसे अधिक उत्साहित श्यामा प्रसाद मुखर्जी और सावरकर ही थे। ध्यान रहे वह सावरकर ही थे जिन्होंने द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत दिया था। यहां तक 1944 में कलकता की एक रैली में सार्वजनिक तौर पर भारत के विभाजन का समर्थन कर दिया था। इसके अलावा उन्होंने 2 मई 1942 को लार्ड माउंटबेटन को एक गुप्त पत्र लिखते हुए यहां तक कह दिया था कि भारत का विभाजन अगर नही भी हो पाता है तो बंगाल का विभाजन तो होना ही चाहिए।
वास्तव में श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारतीय बहुलतावादी संस्कृति के विपरीत एक जातिवादी, सांप्रदायिक और पक्के ब्राहमणवादी नेता थे। इसका सबसे बड़ा प्रमाण भारतीय संविधान निर्माण के समय हिंदू कोड़ बिल का विरोध किया था।
** यह निर्माण से विध्वंस की तरफ स्थानान्तरण का ऐसा भगवा अभियान है, जिसमें फासीवाद की दस्तक साफ सुनी और देखी जा सकती है। अंधराष्टवादी फासीवाद के इस हमले की शुरूआत त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति से हुई है। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि लेनिन ऐसी विचारधारा का प्रतीक हैं जो कारपोरेट पूंजीवाद के झूठ और उसकी लूट को वास्तविक चुनौती देती है।
***यदि लेनिन की रूसी क्रान्ति नही होती तो शहीदे आजम भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, सुखदेव थापर की हिंदुस्तान रिवोल्यूशनरी आर्मी 1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान मेें हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन नही बन पाती। सभी जानते हैं कि शहीदे आजम भगत सिंह लेनिन के कितने दिवाने थे। यह लेनिन के समाजवाद की ही प्रेरणा थी कि भगत सिंह की नौजवान भाारत सभा और एचआरए ने अपना लक्ष्य भारत में मजदूरों और किसानों का स्वतंत्र गणराज्य स्थापित करने को बनाया था।

आलेख, विमर्श
श्यामा प्रसाद मुखर्जी और लेनिन, अंबेडकर, पेरियार के टकराव का निर्णायक शंखनाद

Written by innbharat on March 11, 2018
By महेश राठी
भगवा ब्रिगेड भारतीय समाज में विचारों के टकराव की नई इबारत लिख रही है। भारतीय समाज अभी तक मूर्तियों की स्थापना में विचारों के टकराव की आहट सुनता आया था परंतु अब वह मूर्तियों के विध्वंस में विचारों का टकराव देखने की तरफ बढ़ रहा है। यह निर्माण से विध्वंस की तरफ स्थानान्तरण का ऐसा भगवा अभियान है, जिसमें फासीवाद की दस्तक साफ सुनी और देखी जा सकती है। अंधराष्टवादी फासीवाद के इस हमले की शुरूआत त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति से हुई है। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि लेनिन ऐसी विचारधारा का प्रतीक हैं जो कारपोरेट पूंजीवाद के झूठ और उसकी लूट को वास्तविक चुनौती देती है। वह जनपक्षीय आर्थिक ढ़ांचे और बहुलवादी संस्कृति और आर्थिक, सामाजिक राजनीतिक समानता की चेतना का नायक और वास्तविक सामाजिक रूपांतरण के वाहक विचार का प्रतीक है। मूर्तिभंजन के बाद अब भाजपा-संघ की भगवा ब्रिगेड लेनिन को विदेशी बताकर लेनिन की मूर्ति की मौजूदगी पर सवाल खड़ा करके जनमानस को बरगलाने की कोशिश कर रही है। दूसरी तरफ किसी रेडिकल वाम संगठन से जुड़े लोगों ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को खण्ड़ित करने का प्रयास किया है। बेशक किसी भी लोकतान्त्रिक समाज में विचारों के टकराव का यह रूप जनवादी सहिष्णुता के अनिवार्य जनवादी सिद्धांत के विरूद्ध है पंरतु लेनिन की मूर्ति पर हमले ने जहां भारतीय जनमानस को लेनिन को जानने का अवसर दिया है तो वहीं श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बारे में समझ साफ करने और स्वतंत्रता संग्राम में श्यामा प्रसाद मुखार्जी के बहाने संघ और भाजपा के कथित महापुरूषों के बारे में भी जानने का अवसर दे दिया है।

लेनिन को बेशक सतही समझदारी के साथ एक विदेशी व्यक्तित्व कहकर उनकी मूर्ति को गिराये जाने को न्यायोचित ठहराने की भगवा ब्रिगेड कोशिश करें और दावा करे कि भारत से और भारतीय समाज से लेनिन का कोई संबंध नही परंतु रूसी क्रान्ति और उसके नायक लेनिन एक ऐसा नाम है जिसने ना केवल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम बल्कि आजादी के बाद के भारत पर भी एक ऐसी अमिट छाप छोड़ी जिसे आज भी भुलाया नही जा सकता है। लेनिन और उनके द्वारा स्थापित दुनिया में पहले समाजवादी समाज की स्थापना का असर केवल भारतीय समाज ही नही भारतीय संविधान प्रस्तावना में भी पाते हैं। भारतीय संविधान में समाजवादी समाज के निर्माण की परिकल्पना की प्रेरणा का स्रोत लेनिन का समाजवादी सोवियत संघ ही था। समाजवाद की यह परिकल्पना केवल भारतीय संविधान में ही निहित नही है बल्कि 1980 में स्थापित भारतीय जनता पार्टी भी इस समाजवादी स्थापना से अछूती नही रहती है जब वह अपने घोषणा पत्र में गांधीवादी समाजवाद को अपना लक्ष्य बताती है। याद रहे वह लेनिन का समाजवाद ही था जिसने 1917 की रूसी क्रान्ति के बाद दुनिया के प्रत्येक प्रगतिशील, जनवादी आंदोलन को पुनर्परिभाषित करने का काम किया। वह लेनिन ही थे जिनकी बोल्शेविक क्रान्ति ने फासीवाद के प्रतीक हिटलर को समाजवाद की आड़ लेने के लिए मजबूर कर दिया।

यदि भारतीय संदर्भो में भी हम देखें तो आजादी की लड़ाई के प्रत्येक नायक, महानायक को लेनिन ने ना केवल प्रभावित किया बल्कि उन्हें नई दिशा दिखाने का भी काम किया। नेहरू का समाजवाद का सपना सभी जानते हैं कि रूसी समाजवाद से ही प्रेरित था। यदि लेनिन की रूसी क्रान्ति नही होती तो शहीदे आजम भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, सुखदेव थापर की हिंदुस्तान रिवोल्यूशनरी आर्मी 1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान मेें हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन नही बन पाती। सभी जानते हैं कि शहीदे आजम भगत सिंह लेनिन के कितने दिवाने थे। यह लेनिन के समाजवाद की ही प्रेरणा थी कि भगत सिंह की नौजवान भाारत सभा और एचआरए ने अपना लक्ष्य भारत में मजदूरों और किसानों का स्वतंत्र गणराज्य स्थापित करने को बनाया था। और लेनिन की प्रेरणा ने क्या भगत सिंह को सिखाया की उन्होंने आजादी और समाजवाद की पुरानी और स्थापित परिभाषा को ही बदलकर रख दिया और उसका प्रभाव बाद में सभी धाराओं की राजनीति पर साफ दिखाई पड़ता है।

भगत सिंह, बटुकेश्वर दत और विजय कुमार सिन्हा के संपर्क में रहे कम्युनिस्ट नेता शौकत उस्मानी ने लिखा था कि जब वे एचआर का नाम एचएसआरए होने के बाद 1928 में भगत सिंह से मिले थे तो उन्होंने कहा था कि उनका नया संगठन कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के साथ काम करने का इच्छुक है। भगत सिंह की जीवनी लिखने वाले डाॅ. दयाल भी इस तथ्य का हवाला देते हुए लिखते हैं कि भगत सिंह जेल में लेनिन की जीवनी और कम्युनिस्ट घोषणा पत्र का अध्ययन कर रहे थे। शहीदे आजम की जीवनी लिखने वाले एक और लेखक गोपाल ठाकुर भी उनके बारे में लिखते हैं कि जब भगत सिंह से पूछा गया उनकी आखिरी इच्छा क्या है तो उन्होंने कहा कि वे लेनिन की जीवनी पढ़ना चाहते हैं और चाहते हैं कि फांसी से पहले उसे पूरा पढ़ लें।

भगत सिंह के कामरेड और भाकपा के महासचिव रहे अजय घोष भी अपनी किताब भगत सिंह एण्ड हीज कामरेडस में लिखते हैं कि भगत सिंह और उनके साथियों ने जेल से 7 नवंबर 1930 को रूसी क्रान्ति की सालगिरह के अवसर पर मास्को एक बधाई का तार भेजा था। वहीं डाॅ. दयाल लिखते हैं कि जनवरी 1930 में भगत सिंह और उनके साथी लेनिन की याद में लेनिन की पुण्यतिथि पर वे लाल स्काॅर्फ बांधकर कोर्ट में आये थे। गोपाल ठाकुर अपनी किताब में लिखते हैं कि भगत सिंह ने फांसी से कुछ दिनों पहले सुखदेव को एक पत्र लिखा जिसमें वह लिखते हैं कि मैं और तुम रहे अथवा नही परंतु देश की जनता जरूर रहेगी। कम्युनिज्म और माक्र्सवाद की विचारधारा की निश्चित ही विजय होगी। यह केवल भगत सिंह और उनके साथियों का ही सवाल नही है बल्कि पूरे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर एक लेनिन की बोल्शेविक क्रान्ति का प्रभाव देख सकते हैं और ना केवल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम बल्कि तीसरी दुनिया के उन सभी देशों के  मुक्ति आंदोलनों को लेनिन और रूसी क्रान्ति पे प्रभावित किया। यह बोल्शेविक क्रान्ति और सोवियत संघ के प्रभाव के कारण ही था कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद तीसरी दुनिया के देशों में आजादी की एक बाढ़ सी आ गयी थी।


दूसरी तरफ हम यदि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में लेनिन की मूर्ति ध्वस्त करने वाली और उसके बाद पेरियार की मूर्ति पर धावा बोलने वाली भाजपा के आदर्शो और विशेषकर उनके जनक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन और उनके कृत्यों का विश्लेषण करें तो वह ना केवल अंग्रेजों की तरफ झुकाव वाला बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की राह में गतिरोध करने वाला दिखाई देता है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत कांग्रेस से की थी। वह कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर पहली बार बंगाल प्रांतीय परिषद के सदस्य चुने गये थे। उसके बाद वह आगे चलकर 1939 में सावरकर के प्रभाव में आकर हिंदू महासभा के साथ जुड गये। हालांकि उनके और उनके जैसे कई अन्य बंगाली भद्रपुरूषों की कांग्रेस से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़ने की भी एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। 1939 से 1946 तक श्यामा प्रसाद मुखर्जी हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहे। वैसे वह गांधी की हत्या के बाद भी दिसंबर 1948 तक हिंदू महासभा के साथ जुड़े रहे थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भाजपा और संघ के नेता महान राष्ट्रवादी नेता के तौर पर पेश करते हैं। परंतु यदि भारतीय स्वतंत्रता संगाम में उनकी भूमिका को देखें तो वह बेहद विवादास्पद और अंग्रेज परस्ती की दिखाई पड़ती है। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का उन्होंने जमकर विरोध किया यहां तक बंगाल के गवर्नर जाॅहन हरबर्ट को 26 जुलाई 1942 को एक पत्र लिखा और उसमें गांधी और कांग्रेस के भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध करते हुए उसे विफल बनाने के लिए भरपूर सहयोग देने का वादा भी किया था। उन्होंने अपने पत्र में साफ लिखा था कि आपके मंत्री हाने के नाते हम भारत छोड़ों आंदोलन को विफल करने के लिए पूरा सक्रिय सहयोग करेंगे। केवल इतना ही नही जब गांधी और कांग्रेस करो या मरो के नारे के तहत अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन चला रहे थे उस समय श्यामा प्रसाद मुखर्जी सावरकर के साथ मिलकर अंग्रेजों का सहयोग कर रहे थे। कांग्रेस और गांधी ने अंग्रेजों द्वारा भारत को दूसरे विश्व युद्ध में शामिल करने की घोषणा का विरोध किया तो वहीं सावरकर पूरे भारत में घूमकर अंग्रेजी फौज में भारतीयों को भर्ती होने के लिए प्रेरित कर रहे थे। जाहिर है बंगाल के वित्तमंत्री और भाजपा और संघ के आदर्श नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी इसमें शामिल थे। अंग्रेजों द्वारा भारत को दूसरे विश्व युद्ध में शामिल करने की घोषणा पर 1939 में गांधी के आहवान पर कांग्रेस के विधायकों ओर मन्त्रियों ने अंतरिम सरकार के अपने पदों से इस्तीफा दे दिया तो जिन्ना ने इस पर खुशी जाहिर करते हुए इसे मुक्ति का दिन बताया और इस मुक्ति के दिन में मुखर्जी ने मंत्री पद की अपेक्षा कांग्रेस छोड़कर जिन्ना की खुशी में शामिल होकर मुस्लिम लीग सरकार में साझेदारी करना बेहतर माना था।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी और उनकी हिंदू महासभा और बाद में उनके द्वारा स्थापित जनसंघ जोकि बाद में चलकर भाजपा के गठन का आधार बनी हमेशा कांग्रेस और गांधी एवं नेहरू पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाते रहे। परंतु सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि भारत के बंटवारे और पाकिस्तान की मांग करने वाली मुस्लिम लीग के साथ मिलकर भाजपा के आदर्श नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी सत्ता का आनन्द लेते हैं। बंगाल में बनी मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा के गठजोड़ वाली सरकार में श्यामा प्रसाद मुखर्जी वित्तमंत्री रहे। इस सरकार के मुख्यमंत्री फजुल हक थे जो बाद में भारत के बंटवारे और पाकिस्तान निर्माण की लड़ाई का एक हिस्सा थे, जो बाद में चलकर एक समय में पाकिस्तान के गृहमंत्री भी रहे। इसके अलावा भारत के बंटवारे को लेकर भी सबसे अधिक उत्साहित श्यामा प्रसाद मुखर्जी और सावरकर ही थे। ध्यान रहे वह सावरकर ही थे जिन्होंने द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत दिया था। यहां तक 1944 में कलकता की एक रैली में सार्वजनिक तौर पर भारत के विभाजन का समर्थन कर दिया था। इसके अलावा उन्होंने 2 मई 1942 को लार्ड माउंटबेटन को एक गुप्त पत्र लिखते हुए यहां तक कह दिया था कि भारत का विभाजन अगर नही भी हो पाता है तो बंगाल का विभाजन तो होना ही चाहिए।


वास्तव में श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारतीय बहुलतावादी संस्कृति के विपरीत एक जातिवादी, सांप्रदायिक और पक्के ब्राहमणवादी नेता थे। इसका सबसे बड़ा प्रमाण भारतीय संविधान निर्माण के समय हिंदू कोड़ बिल का विरोध किया था। हालंकि वे जब तक नेहरू सरकार में मंत्री रहे उन्होंने इसके बारे में कुछ नही कहा था परंतु 1951 में मन्त्रिमण्डल छोडने के बाद उन्होंने हिंदू कोड़ बिल को हिंदू समाज को छिन्न भिन्न करने वाला बताकर इसका विरोध किया। उनका कहना था कि यह हिंदू समाज की बुनियाद और उसकी विवाह संस्था को खत्म कर देगा। साथ ही यह हमारे धर्म के स्वाभाविक स्रोत को नष्ट कर देगा। इसके अलावा 1943-44 के बंगाल अकाल के राहत कार्यो में भी उनकी हिंदू महासभा पर राहत कार्यो में भेदभाव के आरोप लगे थे। बंगाल सरकार के गुप्तचर विभाग के अलावा उस समय के दि हिंदू के रिपोर्टर टी आर नारायणन और प्रसिद्ध चित्रकार चितोप्रसाद ने भी इस प्रकार की रिपोर्ट की थी। ना केवल राहत कार्यो में भेदभाव बल्कि बंगाल सरकार द्वारा उस समय चालाई जा रही कैंटीन पर भी मुखर्जी और उनकी हिंदू महासभा को आपति थी क्योंकि उसमें खाना पकाने और उसके वितरण का काम अल्पसंख्यकों औरदलितों के पास था। इस प्रकार के ब्राहमणवादी, सांप्रदायिक और जातिवादी नेता को आज भारतीय समाज के आदर्श के रूप पेश किया जा रहा है। इसी कारण से सब उन मूर्तियों पर हमले किये जा रहे हैं जो इस ब्राहमणवादी, सांप्रदायिक और जातिवादी नेता की विचारधारा के स्वाभाविक विरोधी हैं अथवा वैचारिक विरोध का प्रतीक हैं। वह चाहे अंबेडकर हो पेरियार, फूले अथवा गांधी और लेनिन आने वाले समय में सभी के बुत निशाने पर होंगे क्योंकि वे ब्राहमणवादी फासीवाद के विरोध के प्रतीक हैं और हिंदुत्ववादी भगवा ब्रिगेड को वैचारिक चुनोती पेश करते हैं। अभी तक यह लड़ाई मूर्तियों के निर्माण की थी परंतु अब लड़ाई मूर्तियों के ध्वंस की है। यह विध्वंस की निर्णायक लड़ाई की शुरूआत है उसका शंखनाद है।

वर्ष 1978-79 में सहारनपुर के 'नया जमाना ' के संपादक स्व. कन्हैया लाल मिश्र 'प्रभाकर 'ने अपने एक तार्किक लेख मे 1951  - 52 मे सम्पन्न संघ के एक नेता स्व .लिंमये के साथ अपनी वार्ता के हवाले से लिखा था कि,कम्युनिस्टों  और संघियों के बीच सत्ता की निर्णायक लड़ाई  दिल्ली की सड़कों पर लड़ी जाएगी।
प्रस्तुत लेख से उसकी पुष्टि ही होती है। 

 ~विजय राजबली माथुर ©

Monday, October 31, 2011

खाड़ी युद्ध के भारत पर भावी परिणाम-1991 का अप्रकाशित लेख(1 )


सन 1991 मे राजनीतिक परिस्थितिए कुछ इस प्रकार तेजी से मुड़ी कि हमारे लेख जो एक अंक मे एक से अधिक संख्या मे 'सप्त दिवा साप्ताहिक',आगरा के प्रधान संपादक छाप देते थे उन्हें उनके फाइनेंसर्स जो फासिस्ट  समर्थक थे ने मेरे लेखों मे संशोधन करने को कहा। मैंने अपने लेखों मे संशोधन करने के बजाए उनसे वापिस मांग लिया जो अब तक कहीं और भी प्रकाशित नहीं कराये थे उन्हें अब इस ब्लाग पर सार्वजनिक कर रहा हूँ और उसका कारण आज फिर देश पर मंडरा रहा फासिस्ट तानाशाही का खतरा है। जार्ज बुश,सद्दाम हुसैन आदि के संबंध मे उस वक्त के हिसाब से लिखे ये लेख ज्यों के त्यों उसी  रूप मे प्रस्तुत हैं-

दुर्भाग्य से 17 जनवरी 1991 की प्रातः खाड़ी मे अमेरिका ने युद्ध छेड़ ही दिया है । दोषी ईराक है अथवा अमेरिका इस विषय मे मतभेद हो सकते हैं। परन्तु अमेरिकी कारवाई न्यायसंगत न होकर निजी स्वार्थ से प्रेरित है। जार्ज बुश (जो तेल कंपनियों मे नौकरी कर चुके हैं) अनेकों बार ईराकी सेना को नष्ट करने की धम्की दे चुके थे। उनके पूर्ववर्ती रोनाल्ड रीगन लीबिया के कर्नल गद्दाफ़ी को नष्ट करने का असफल प्रयास कर चुके थे। बुश पनामा के राष्ट्रपति का अपहरण करने मे कामयाब रहे । ईराक पर अमेरिकी आक्रमण का उद्देश्य कुवैत को मुक्त  कराना नहीं अमेरिकी साम्राज्यवाद को पुख्ता कराना है।

जब खाड़ी समस्या प्रारम्भ हुई तो वी पी सरकार के कुशल कदम से ईराक और कुवैत मे फंसे भारतीयों को स्वदेश ले आया गया। परन्तु जब युद्ध के बादल मंडराने लगे तो राजीव गांधी-समर्थित चंद्रशेखर सरकार ने खाड़ी क्षेत्र मे फंसे 12-13 लाख भारतीयों को स्वदेश लाने का कोई प्रयत्न नहीं किया। प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सफाई देते हैं कि वे प्रवासी भारतीय लौटना नहीं चाहते थे और अब युद्ध काल मे उन्हें बुलाया नहीं जा सकता।

युद्ध का लाभ-

एक ओर जहां लाखों भारतीयों का जीवन दांव पर लगा है। हमारे देश के जमाखोर व्यापारी खाड़ी संकट की आड़ मे खाद्यान ,खाद्य-तेल और पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ा कर अपना काला व्यापार बढ़ा कर लाभ उठाने मे लगे हुये हैं। प्रधानमंत्री कोरी धमकियाँ दाग कर जनता को दिलासा दे रहे हैं। बाज़ार मे कीमतें आसमान छू रही हैं। राशन की दुकानों मे चीनी और गेंहू चिराग लेकर ढूँढने से भी नहीं मिल रहा है।

गरीब जनता विशेष कर रोज़ कमाने-खाने वाले भुखमरी के कगार पर पहुँचने वाले हैं। सरकार ऐययाशी मे व्यस्त  है। उप-प्रधानमंत्री और किसानों के तथाकथित ताऊ चौ. देवीलाल कहते हैं मंहगाई बढ़ाना उनकी सरकार का लक्ष्य है जिससे किसानों को लाभ हो। वह सोने के मुकुट और चांदी की छड़ियाँ लेकर अट्हास कर रहे हैं।

लुटेरा कौन?

लेकिन निश्चित रूप से बढ़ती हुई कीमतों का लाभ किसानों को नहीं मिल रहा है। किसान कम दाम पर फसल उगते ही व्यापारियों को बेच देता है। जमाखोर व्यापारी कृत्रिम आभाव पैदा कर जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ रहे हैं और उन्हें सरकारी संरक्षण मिला हुआ है।

गाँव के कृषि मजदूर को राशन मे उपलब्ध गेंहू नहीं मिल रहा ,अधिक दाम देकर वह खरीद नहीं सकता। खेतिहर  मजदूर भूखा रह कर मौत के निकट पहुँच रहा है। प्रदेश और केंद्र की सरकारें अपना अस्तित्व बचाने के लिए पूँजीपतियों के आगे घुटने टेके हुये हैं। पूंजीपति वर्ग और व्यापारी वर्ग मिल कर जनता का शोषण कर रहे हैं और गरीब जनता को भूखा मारने की तैयारी कर रहे हैं और वह भी सरकारी संरक्षण मे।

भूखे भजन होही न गोपाला- 

मध्यम वर्गीय जमाखोर व्यापारियों की पार्टी भाजपा हिन्दुत्व की ठेकेदार बन कर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के नाम का दुरुपयोग कर जनता को बेवकूफ बनाने मे लगी हुई है उसका उद्देश्य जनता को गुमराह कर व्यापारियों की सत्ता कायम करना है। उधर पूँजीपतियों की पार्टी इंका अवसरवादी सरकारों को टिका कर शोषक वर्ग की सेवा कर रही है। ये दोनों पार्टियां मण्डल आयोग द्वारा घोषित पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की विरोधी हैं इसलिए मंदिर-मस्जिद के थोथे  झगड़े खड़े करके भूखी,त्रस्त जनता को आपस मे लड़ा कर मार देना चाहती हैं।

क्रान्ति होगी-

यदि हालात ऐसे ही चलते रहे और खाड़ी युद्ध लम्बा चला जिसकी कि प्रबल संभावना है तो निश्चय ही शोषित ,दमित,पीड़ित और भूखी जनता एक न एक दिन (चाहे वह जब भी आए)भारत मे भी वैसी ही 'क्रान्ति'कर देगी जैसी 1917 मे रूस मे और 1949 मे चीन की भूखी जनता ने की थी उसे तलाश है किसी 'लेनिन' अथवा 'माओ' की जिसे भारत -भू पर अवतरित होना ही होगा।
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(एक तो हमारे देश के शोषक वर्ग ने 'पुरोहितवाद'की आड़ मे 'फूट' फैलाकर जनता के एकीकरण मे बाधा खड़ी कर रखी है दूसरे शासक वर्ग असंतोष की चिंगारी देखते ही अपने लोगों को बीच मे घुसा कर जन-असंतोष को दूसरी ओर कामयाबी से मोड देता है जैसा कि 2011 मे 'अन्ना' के माध्यम से किया गया है। अफसोस यह कि साम्यवादी और प्रगतिशील लोग शोषकों द्वारा परिभाषित 'पुरोहितवाद' को ही 'धर्म' मान कर "धर्म" का विरोध कर डालते हैं। "धर्म" का अर्थ है -'धारण'करना जो वह नहीं है जैसा पोंगा-पंथी बताते हैं। भारत के लेनिन और माओ को 'धर्म'(वास्तविक =वेदिक/वैज्ञानिक)का सहारा लेकर पोंगा-पंथी 'पुरोहितवाद पर प्रहार करना होगा तभी भारत मे 'क्रान्ति'सफल हो सकेगी अन्यथा 1857 की भांति ही कुचल दी जाएगी। )