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Wednesday, August 15, 2012

स्वाधीनता और स्वतन्त्रता का भ्रम -जाल

15 अगस्त 1947 को मिली आज़ादी क्या झूठी है?

सुप्रसिद्ध जन-कवि अदम गोंडवी साहब का कहना है-

"सौ मे 70 आदमी फिलहाल जब नाशाद है,
दिल पे रख कर हाथ कहिए ,देश क्या आज़ाद है?"



'राजनीतिक' रूप से 65 वर्ष पूर्व हमारा देश ब्रिटिश दासता से मुक्त हुआ था जिस उपलक्ष्य मे 15 अगस्त को स्वाधीनता दिवस के रूप मे मनाया जाता है। हमारे देश का अपना स्वतंत्र संविधान भी है जिसके अनुसार जनता अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से अपना शासन स्वतंत्र रूप से चलाती है। लेकिन आर्थिक नीतियाँ वही हैं जो ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने बनाई थीं अतः आज़ादी के थोड़े दिनों बाद कामरेड बी टी रणदिवे के आह्वान पर भाकपा ने नारा दे दिया था-'यह आज़ादी झूठी है,भारत की जनता भूखी है'। असंख्य कार्यकर्ता और नेता बेरहमी से गिरफ्तार किए गए और आंदोलन कुचल दिया गया। भाकपा जो सत्तारूढ़ कांग्रेस के बाद संसद मे दूसरे नंबर पर थी और मुख्य विरोधी दल थी धीरे-धीरे सिमटती गई।

नेहरू जी की  'मिश्रित आर्थिक नीति' बनाने वाले डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी RSS के थे और उन्होने बाद मे 'जनसंघ' बनाया जो अब 'भाजपा' के रूप मे मुख्य विरोधी दल है। 1991 मे 'उदारवाद' की नीति के प्रणेता डॉ मनमोहन सिंह अब पी एम हैं और उनकी नीतियों को यू एस ए मे जाकर अपनी नीतियों को चुराया जाना कहने वाले एल आडवाणी साहब की शिष्या श्रीमती सुषमा स्वराज लोकसभा मे विरोधी दल की नेता हैं।

पद से हटने के बाद 1991 के पी एम पामूलपति वेंकट नरसिंघा राव साहब ने 'दी इन साईडर' मे स्पष्ट किया था-"हम स्वतन्त्रता के भ्रमजाल मे जी रहे हैं"।

निम्नलिखित लिंक्स का अवलोकन करेंगे तो पाएंगे कि विद्वान लेखक भी यही दोहरा रहे हैं जिसे पूर्व पी एम ने कुबूल किया था-

1-http://loksangharsha.blogspot.com/2012/08/blog-post_13.html

2-http://loksangharsha.blogspot.com/2012/08/2_13.html

राजनीतिक आज़ादी के बावजूद पूर्ण कार्यकाल मे अनुभव के आधार पर नरसिंघा राव जी का कथन और सुनील दत्ता जी के विश्लेषण  मे समानता है कि हमारे देश की आर्थिक नीतियाँ आज भी 'दासता युग' की ही हैं और पूर्णतः जन -विरोधी हैं। उनका निष्कर्ष है -"
साम्राज्यी देशो के साठ लूट व प्रभुत्व बनाये रखने वाले संबंधो को तोड़ने इससे इस राष्ट्र को मुक्त कराने औनिवेशिक काल के कानूनों को खत्म करने और औपनिवेशिक राज्य के ढाचे को राष्ट्र हित एवं जनहित के जनतांत्रिक ढाचे के रूप में बदलने की जिम्मेवारी भी अब देश के जनसाधारण की ही है | इसलिए उसे ही 1947 के वास्तविक चरित्र को अब अपरिहार्य रूप से समझना होगा |"
एक नज़र -हम गुलाम कैसे हुये थे?- 
 'गजनी' का शासक महमूद गजनवी तो तब के बैंक (मंदिरों) से खजाना लूट-लूट कर चला गया था किन्तु 'गोर' का शासक मोहम्मद गौरी ,जयचंद के बुलावे पर आने के बाद यहाँ का शासक बन बैठा और उसके बाद बने शासक यहाँ राजनीतिक शासन तो करते रहे किन्तु आर्थिक सम्पदा लूट कर अपने-अपने देश नहीं ले गए यही एशों-आराम पर खर्च कर दी। अंतिम मुगल शासक के कमजोर होने के कारण ईस्ट इंडिया कंपनी ने यहाँ किस प्रकार और किस उद्देश्य से सत्ता स्थापित की उसका विस्तृत विवरण उपरोक्त लिंक्स मे स्पष्ट है। 
जन साधारण को 'साम्राज्यवाद' की सहोदरी 'सांप्रदायिकता' ने बुरी तरह से ग्रसित कर रखा है। सांप्रदायिकता को धर्म के नाम पर पुष्पित-पल्लवित किया जाता है और 'धर्म'='सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह,ब्रह्मचर्य' का कहीं भी पालन नहीं हो रहा है। दुर्भाग्य यह है कि जन-साधारण के पक्षधर प्रगतिशील तत्व भी पाखंडियो-ढोंगियों द्वारा घोषित सांप्रदायिक तत्वों को ही धर्म के रूप मे मान्यता देते हैं और वास्तविक 'धर्म' की चर्चा करना तो दूर सुनना भी नहीं पसंद करते हैं। परिणाम यह होता है कि,साम्राज्यवादी शक्तियाँ अपनी सहयोगी सांप्रदायिक शक्तियों के सहारे से झूठ को धर्म के नाम पर फैलाने व जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ्ने मे हमेशा सफल हो जाती हैं। प्रगतिशील और बामपंथी आंदोलन निरंतर विभक्त होता तथा सिकुड़ता जाता है। यदि जनता को जागरूक करके 'वास्तविक धर्म' का मर्म समझाने का प्रयास किया जाता है तो प्रगतिशीलता का लबादा ओढ़े विदेश मे प्रवास कर रहे प्रो अपने सांप्रदायिक हितों के संरक्षण तथा साम्राज्यवादी आकाओं की संतुष्टि हेतु प्रयास कर्ता पर व्यक्तिगत प्रहार करके उन प्रयासों को निष्प्रभावी बनाने मे जुट जाते हैं। दिल्ली मे बैठे दूसरे प्रो 'राम' की तुलना 'ओबामा' से करके जन-मानस को ठेस पहुंचाते हैं । इन परिस्थितियों मे 'जन साधारण' कैसे राष्ट्र के औपनिवेशिक ढांचे को लोकतान्त्रिक ढांचे मे बदल सकता है?
साम्राज्यवादी देश विभाजन जिसे सांप्रदायिक विभाजन कहा जाता है को विफल करने हेतु पाकिस्तानी फ़िल्मकार वजाहत मलिक का विचार है कि,"भारत और पाकिस्तान के लिए सुखद रिश्ते बनाने का सबसे अच्छा रास्ता लोगों के बीच ज़्यादा मेल-जोल है। इसके लिए व्यापार और पर्यटन भी ज़रूरी है। .... 'यदि लोग साथ आएंगे तो सरकारें भी पीछे-पीछे आएंगी। "
 भारत-पाकिस्तान-बांग्ला देश सभी आंतरिक और बाह्य समस्याओं से ग्रसित हैं जब तक इनकी सरकारें (साम्राज्यवाद के शिकंजे मे जकड़े होने के कारण )एकमत नहीं होतीं तब तक सभी देशों की जनता को साहित्यिक -सांस्कृतिक आदान-प्रदान के जरिये एकता की पहल करके साम्राज्यवादी /सांप्रदायिक शक्तियों को परास्त करना चाहिए । यही कदम वास्तविक स्वाधीनता,शांति और एकता बहाल कर सकता है।
 

 

Monday, October 31, 2011

खाड़ी युद्ध के भारत पर भावी परिणाम-1991 का अप्रकाशित लेख(1 )


सन 1991 मे राजनीतिक परिस्थितिए कुछ इस प्रकार तेजी से मुड़ी कि हमारे लेख जो एक अंक मे एक से अधिक संख्या मे 'सप्त दिवा साप्ताहिक',आगरा के प्रधान संपादक छाप देते थे उन्हें उनके फाइनेंसर्स जो फासिस्ट  समर्थक थे ने मेरे लेखों मे संशोधन करने को कहा। मैंने अपने लेखों मे संशोधन करने के बजाए उनसे वापिस मांग लिया जो अब तक कहीं और भी प्रकाशित नहीं कराये थे उन्हें अब इस ब्लाग पर सार्वजनिक कर रहा हूँ और उसका कारण आज फिर देश पर मंडरा रहा फासिस्ट तानाशाही का खतरा है। जार्ज बुश,सद्दाम हुसैन आदि के संबंध मे उस वक्त के हिसाब से लिखे ये लेख ज्यों के त्यों उसी  रूप मे प्रस्तुत हैं-

दुर्भाग्य से 17 जनवरी 1991 की प्रातः खाड़ी मे अमेरिका ने युद्ध छेड़ ही दिया है । दोषी ईराक है अथवा अमेरिका इस विषय मे मतभेद हो सकते हैं। परन्तु अमेरिकी कारवाई न्यायसंगत न होकर निजी स्वार्थ से प्रेरित है। जार्ज बुश (जो तेल कंपनियों मे नौकरी कर चुके हैं) अनेकों बार ईराकी सेना को नष्ट करने की धम्की दे चुके थे। उनके पूर्ववर्ती रोनाल्ड रीगन लीबिया के कर्नल गद्दाफ़ी को नष्ट करने का असफल प्रयास कर चुके थे। बुश पनामा के राष्ट्रपति का अपहरण करने मे कामयाब रहे । ईराक पर अमेरिकी आक्रमण का उद्देश्य कुवैत को मुक्त  कराना नहीं अमेरिकी साम्राज्यवाद को पुख्ता कराना है।

जब खाड़ी समस्या प्रारम्भ हुई तो वी पी सरकार के कुशल कदम से ईराक और कुवैत मे फंसे भारतीयों को स्वदेश ले आया गया। परन्तु जब युद्ध के बादल मंडराने लगे तो राजीव गांधी-समर्थित चंद्रशेखर सरकार ने खाड़ी क्षेत्र मे फंसे 12-13 लाख भारतीयों को स्वदेश लाने का कोई प्रयत्न नहीं किया। प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सफाई देते हैं कि वे प्रवासी भारतीय लौटना नहीं चाहते थे और अब युद्ध काल मे उन्हें बुलाया नहीं जा सकता।

युद्ध का लाभ-

एक ओर जहां लाखों भारतीयों का जीवन दांव पर लगा है। हमारे देश के जमाखोर व्यापारी खाड़ी संकट की आड़ मे खाद्यान ,खाद्य-तेल और पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ा कर अपना काला व्यापार बढ़ा कर लाभ उठाने मे लगे हुये हैं। प्रधानमंत्री कोरी धमकियाँ दाग कर जनता को दिलासा दे रहे हैं। बाज़ार मे कीमतें आसमान छू रही हैं। राशन की दुकानों मे चीनी और गेंहू चिराग लेकर ढूँढने से भी नहीं मिल रहा है।

गरीब जनता विशेष कर रोज़ कमाने-खाने वाले भुखमरी के कगार पर पहुँचने वाले हैं। सरकार ऐययाशी मे व्यस्त  है। उप-प्रधानमंत्री और किसानों के तथाकथित ताऊ चौ. देवीलाल कहते हैं मंहगाई बढ़ाना उनकी सरकार का लक्ष्य है जिससे किसानों को लाभ हो। वह सोने के मुकुट और चांदी की छड़ियाँ लेकर अट्हास कर रहे हैं।

लुटेरा कौन?

लेकिन निश्चित रूप से बढ़ती हुई कीमतों का लाभ किसानों को नहीं मिल रहा है। किसान कम दाम पर फसल उगते ही व्यापारियों को बेच देता है। जमाखोर व्यापारी कृत्रिम आभाव पैदा कर जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ रहे हैं और उन्हें सरकारी संरक्षण मिला हुआ है।

गाँव के कृषि मजदूर को राशन मे उपलब्ध गेंहू नहीं मिल रहा ,अधिक दाम देकर वह खरीद नहीं सकता। खेतिहर  मजदूर भूखा रह कर मौत के निकट पहुँच रहा है। प्रदेश और केंद्र की सरकारें अपना अस्तित्व बचाने के लिए पूँजीपतियों के आगे घुटने टेके हुये हैं। पूंजीपति वर्ग और व्यापारी वर्ग मिल कर जनता का शोषण कर रहे हैं और गरीब जनता को भूखा मारने की तैयारी कर रहे हैं और वह भी सरकारी संरक्षण मे।

भूखे भजन होही न गोपाला- 

मध्यम वर्गीय जमाखोर व्यापारियों की पार्टी भाजपा हिन्दुत्व की ठेकेदार बन कर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के नाम का दुरुपयोग कर जनता को बेवकूफ बनाने मे लगी हुई है उसका उद्देश्य जनता को गुमराह कर व्यापारियों की सत्ता कायम करना है। उधर पूँजीपतियों की पार्टी इंका अवसरवादी सरकारों को टिका कर शोषक वर्ग की सेवा कर रही है। ये दोनों पार्टियां मण्डल आयोग द्वारा घोषित पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की विरोधी हैं इसलिए मंदिर-मस्जिद के थोथे  झगड़े खड़े करके भूखी,त्रस्त जनता को आपस मे लड़ा कर मार देना चाहती हैं।

क्रान्ति होगी-

यदि हालात ऐसे ही चलते रहे और खाड़ी युद्ध लम्बा चला जिसकी कि प्रबल संभावना है तो निश्चय ही शोषित ,दमित,पीड़ित और भूखी जनता एक न एक दिन (चाहे वह जब भी आए)भारत मे भी वैसी ही 'क्रान्ति'कर देगी जैसी 1917 मे रूस मे और 1949 मे चीन की भूखी जनता ने की थी उसे तलाश है किसी 'लेनिन' अथवा 'माओ' की जिसे भारत -भू पर अवतरित होना ही होगा।
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(एक तो हमारे देश के शोषक वर्ग ने 'पुरोहितवाद'की आड़ मे 'फूट' फैलाकर जनता के एकीकरण मे बाधा खड़ी कर रखी है दूसरे शासक वर्ग असंतोष की चिंगारी देखते ही अपने लोगों को बीच मे घुसा कर जन-असंतोष को दूसरी ओर कामयाबी से मोड देता है जैसा कि 2011 मे 'अन्ना' के माध्यम से किया गया है। अफसोस यह कि साम्यवादी और प्रगतिशील लोग शोषकों द्वारा परिभाषित 'पुरोहितवाद' को ही 'धर्म' मान कर "धर्म" का विरोध कर डालते हैं। "धर्म" का अर्थ है -'धारण'करना जो वह नहीं है जैसा पोंगा-पंथी बताते हैं। भारत के लेनिन और माओ को 'धर्म'(वास्तविक =वेदिक/वैज्ञानिक)का सहारा लेकर पोंगा-पंथी 'पुरोहितवाद पर प्रहार करना होगा तभी भारत मे 'क्रान्ति'सफल हो सकेगी अन्यथा 1857 की भांति ही कुचल दी जाएगी। )