Wednesday, November 1, 2017
Sunday, October 15, 2017
पूर्व छात्र नेता सत्यपाल मलिक ने पटना विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों का अपमान कैसे होने दिया ? ------ विजय राजबली माथुर
जिस वर्ष 1969 में मैंने मेरठ कालेज, मेरठ में बी ए में प्रवेश लिया छात्र संघ के अध्यक्ष श्री सत्यपाल मलिक ही थे। कालेज के प्राचार्य थे डॉ वी पुरी किन्तु वह अपनी प्राचार्य परिषद के पदाधिकारी बन जाने के कारण त्याग - पत्र दे गए और कार्यवाहक प्राचार्य डॉ बी भट्टाचार्य ने तमाम आरोप लगा कर श्री सत्यपाल मलिक को कालेज से निष्कासित कर दिया। पूर्व में लिखे अपने मेरठ के संस्मरणों में इसका ज़िक्र किया है उसे आगे ज्यों का त्यों दिया जा रहा है।
परंतु यहाँ मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि, समाजवादी युवजन सभा के बुलंद और जुझारू छात्र नेता रहे श्री सत्यपाल मलिक को बिहार के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति (चांसलर ) होते हुये यह कैसे गंवारा हुआ कि, पटना विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह में वहाँ के पूर्व छात्र रहे गण मान्य व्यक्तियों जैसे वहीं के एक सांसद शत्रुघन सिन्हा, पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा और पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव को बुलाया ही नहीं गया ? या अपमानजनक तौर पर निमंत्रित किया गया जो वे नहीं आए ?
लालू यादव भी श्री मलिक की भांति ही समाजवादी रहे हैं जबकि, सिन्हा द्वय उनके साथ भाजपा सांसद रहे हैं। जैसा व्यक्तित्व मेरठ कालेज, मेरठ में श्री मलिक का देखा है उससे तो प्रतीत होता है कि, पटना विश्वविद्यालय के समारोह में पूर्व वरिष्ठ छात्रों को न बुलाया जाना उनको मंजूर नहीं होना चाहिए था और उनको अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुये हस्तक्षेप करना चाहिए था। यदि उन्होने ऐसा नहीं किया तो इसका कारण क्या हो सकता है ?
जीमखाना मैदान , मेरठ में 23 जनवरी को आज़ाद हिन्द संघ द्वारा आयोजित समारोहों में श्री मलिक जोरदार ढंग से तब तक के तीनों प्रधानमंत्रियों ( जवाहर लाल, लाल बहादुर, इन्दिरा गांधी ) पर नेताजी सुभाष की उपेक्षा करने हेतु मुकदमा चलाने की मांग करते थे। आज जब राज्यपाल व कुलाधिपति की हैसियत से विश्वविद्यालय संबंधी गलत निर्णयों में वह हस्तक्षेप नहीं कर पाये तो इसका क्या मतलब है ?
पुराना संस्मरण :
" पिछले वर्षों तक कालेज यूनियन क़े प्रेसीडेंट रहे सतपाल मलिक (जो भारतीय क्रांति दल,इंदिरा कांग्रेस ,जन-मोर्चा,जनता दल होते हुए अब भाजपा में हैं और वी.पी.सिंह सरकार में उप-मंत्री भी रह चुके) को डा.भट्टाचार्य ने कालेज से निष्कासित कर दिया और उनके विरुद्ध डी.एम.से इजेक्शन नोटिस जारी करा दिया.
नतीजतन सतपाल मलिक यूनियन क़े चुनावों से बाहर हो गये और उनके साथ उपाद्यक्ष रहे राजेन्द्र सिंह यादव (जो बाद में वहीं अध्यापक भी बने) और महामंत्री रहे तेजपाल सिंह क्रमशः समाजवादी युवजन सभा तथा भा.क्र.द .क़े समर्थन से एक -दूसरे क़े विरुद्ध अध्यक्ष पद क़े उम्मीदवार बन बैठे.बाज़ी कांग्रेस समर्थित महावीर प्रसाद जैन क़े हाथ लग गई और वह प्रेसिडेंट बन गये.महामंत्री पद पर विनोद गौड (श्री स.ध.इ.कालेज क़े अध्यापक लक्ष्मीकांत गौड क़े पुत्र थे और जिन्हें ए.बी.वी.पी.का समर्थन था)चुने गये.यह एम्.पी.जैन क़े लिए विकट स्थिति थी और मजबूरी भी लेकिन प्राचार्य महोदय बहुत खुश हुए कि,दो प्रमुख पदाधिकारी दो विपरीत धाराओं क़े होने क़े कारण एकमत नहीं हो सकेंगे.लेकिन मुख्यमंत्री चौ.चरण सिंह ने छात्र संघों की सदस्यता को ऐच्छिक बना कर सारे छात्र नेताओं को आन्दोलन क़े एक मंच पर खड़ा कर दिया.
ताला पड़े यूनियन आफिस क़े सामने कालेज क़े अन्दर १९७० में जो सभा हुई उसमें पूर्व महामंत्री विनोद गौड ने दीवार पर चढ़ काला झंडा फहराया और पूर्व प्रेसीडेंट महावीर प्रसाद जैन ने उन्हें उतरने पर गले लगाया तो सतपाल मलिक जी ने पीठ थपथपाई और राजेन्द्र सिंह यादव ने हाथ मिलाया.इस सभा में सतपाल मलिक जी ने जो भाषण दिया उसकी ख़ास -ख़ास बातें ज्यों की त्यों याद हैं (कहीं किसी रणनीति क़े तहत वही कोई खण्डन न कर दें ).सतपाल मलिक जी ने आगरा और बलिया क़े छात्रों को ललकारते हुए,रघुवीर सहाय फिराक गोरखपुरी क़े हवाले से कहा था कि,उ .प्र .में आगरा /बलिया डायगनल में जितने आन्दोलन हुए सारे प्रदेश में सफल होकर पूरे देश में छा गये और उनका व्यापक प्रभाव पड़ा.(श्री मलिक द्वारा दी यह सूचना ही मुझे आगरा में बसने क़े लिए प्रेरित कर गई थी ).मेरठ /कानपुर डायगनल में प्रारम्भ सारे आन्दोलन विफल हुए चाहे वह १८५७ ई .की प्रथम क्रांति हो,सरदार पटेल का किसान आन्दोलन या फिर,भा .क .पा .की स्थापना क़े साथ चला आन्दोलन हो.श्री मलिक चाहते थे कि आगरा क़े छात्र मेरठ क़े छात्रों का पूरा समर्थन करें.श्री मलिक ने यह भी कहा था कि,वह चौ.चरण सिंह का सम्मान करते हैं,उनके कारखानों से चौ.सा :को पर्याप्त चन्दा दिया जाता है लेकिन अगर चौ.सा : छात्र संघों की अनिवार्य सदस्यता बहाल किये बगैर मेरठ आयेंगे तो उन्हें चप्पलों की माला पहनाने वाले श्री मलिक पहले सदस्य होंगें.चौ.सा :वास्तव में अपना फैसला सही करने क़े बाद ही मेरठ पधारे भी थे और बाद में श्री सतपाल मलिक चौ. सा : की पार्टी से बागपत क्षेत्र क़े विधायक भी बने और इमरजेंसी में चौ. सा :क़े जेल जाने पर चार अन्य भा.क्र.द.विधायक लेकर इंका.में शामिल हुए.
जब भारत का एक हवाई जहाज लाहौर अपहरण कर ले जाकर फूंक दिया गया था तो हमारे कालेज में छात्रों व शिक्षकों की एक सभा हुई जिसमें प्रधानाचार्य -भट्टाचार्य सा :व सतपाल मलिक सा :अगल -बगल खड़े थे.मलिक जी ने प्रारंभिक भाषण में कहा कि,वह भट्टाचार्य जी का बहुत आदर करते हैं पर उन्होंने उन्हें अपने शिष्य लायक नहीं समझा.जुलूस में भी दोनों साथ चले थे जो पाकिस्तान सरकार क़े विरोध में था.राष्ट्रीय मुद्दों पर हमारे यहाँ ऐसी ही एकता हमेशा रहती है,वरना अपने निष्कासन पर मलिक जी ने कहा था -इस नालायक प्रधानाचार्य ने मुझे नाजायज तरीके से निकाल दिया है अब हम भी उन्हें हटा कर ही दम लेंगें.बहुत बाद में भट्टाचार्य जी ने तब त्याग -पत्र दिया जब उनकी पुत्री वंदना भट्टाचार्य को फिलासफी में लेक्चरार नियुक्त कर लिया गया.
समाज-शास्त्र परिषद् की तरफ से बंगलादेश आन्दोलन पर एक गोष्ठी का आयोजन किया गया था.उसमें समस्त छात्रों व शिक्षकों ने बंगलादेश की निर्वासित सरकार को मान्यता देने की मांग का समर्थन किया.सिर्फ एकमात्र वक्ता मैं ही था जिसने बंगलादेश की उस सरकार को मान्यता देने का विरोध किया था और उद्धरण डा.लोहिया की पुस्तक "इतिहास-चक्र "से लिए थे (यह पुस्तक एक गोष्ठी में द्वितीय पुरूस्कार क़े रूप में प्राप्त हुई थी ).मैंने कहा था कि,बंगलादेश हमारे लिए बफर स्टेट नहीं हो सकता और बाद में जिस प्रकार कुछ समय को छोड़ कर बंगलादेश की सरकारों ने हमारे देश क़े साथ व्यवहार किया मैं समझता हूँ कि,मैं गलत नहीं था.परन्तु मेरे बाद क़े सभी वक्ताओं चाहे छात्र थे या शिक्षक मेरे भाषण को उद्धृत करके मेरे विरुद्ध आलोचनात्मक बोले.विभागाध्यक्ष डा.आर .एस.यादव (मेरे भाषण क़े बीच में हाल में प्रविष्ट हुए थे) ने आधा भाषण मेरे वक्तव्य क़े विरुद्ध ही दिया.तत्कालीन छात्र नेता आर.एस.यादव भी दोबारा भाषण देकर मेरे विरुद्ध बोलना चाहते थे पर उन्हें दोबारा अनुमति नहीं मिली थी.गोष्ठी क़े सभापति कामर्स क़े H .O .D .डा.एल .ए.खान ने अपने भाषण मेरी सराहना करते हुये कहा था
हम उस छात्र से सहमत हों या असहमत लेकिन मैं उसके साहस की सराहना करता हूँ कि,यह जानते हुये भी सारा माहौल बंगलादेश क़े पक्ष में है ,उसने विपक्ष में बोलने का फैसला किया और उन्होंने मुझसे इस साहस को बनाये रखने की उम्मीद भी ज़ाहिर की थी.
मेरे लिए फख्र की बात थी की सिर्फ मुझे ही अध्यक्षीय भाषण में स्थान मिला था किसी अन्य वक्ता को नहीं.इस गोष्ठी क़े बाद राजेन्द्र सिंह जी ने एक बार जब सतपाल मलिक जी कालेज आये थे मेरी बात उनसे कही तो मलिक जी ने मुझसे कहा कि,वैसे तो तुमने जो कहा था -वह सही नहीं है,लेकिन अपनी बात ज़ोरदार ढंग से रखी ,उसकी उन्हें खुशी है. ''
http://vidrohiswar.blogspot.in/2010/12/blog-post_18.html
~विजय राजबली माथुर ©
पटना विश्वविद्यालय की छात्राओं द्वारा शताब्दी समारोह पर प्रतिक्रिया :
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Saturday, October 14, 2017
यह साफ़गोई सिर्फ अर्द्ध - सत्य है ------ विजय राजबली माथुर
2011 में सोनिया जी के विदेश में इलाज कराने जाने के वक्त से डॉ मनमोहन सिंह जी हज़ारे/केजरीवाल के माध्यम से संघ से संबंध स्थापित किए हुये थे जिसके परिणाम स्वरूप 2014 के चुनावों में सरकारी अधिकारियों/कर्मचारियों ने भी परिणाम प्रभावित करने में अपनी भूमिका अदा की है।
1967,1975 ,1980,1989 में लिए गए इन्दिरा जी व राजीव जी के निर्णयों ने 2014 में भाजपा को पूर्ण बहुमत तक पहुंचाने में RSS की भरपूर मदद की है।
हमारे विद्वान क्यों सतही बातों से प्रभावित हो जाते हैं और तथ्य की गहराई तक जाये बिना ही आसान निष्कर्ष निकाल लेते हैं जैसा गिरीश मालवीय जी ने किया ? आइये तथ्यावलोकन करें : यों तो इंदिराजी की हत्या के बाद भी प्रणब मुखर्जी साहब पी एम बनने की अपेक्षा करते रहे किन्तु राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह जी ने इंका महासचिव और सांसद राजीव गांधी को सीधे ही पी एम पद की शपथ दिलवा दी थी अतः उनको ही इंका संसदीय दल का नेता भी चुन लिया गया। शायद इसी वजह से दोनों में कुछ मतभेद भी हुये और प्रणब साहब ने ' समाजवादी कांग्रेस ' बना ली किन्तु 1989 के चुनावों के समय राजीव गांधी के नेतृत्व में समाजवादी कांग्रेस का कांग्रेस में विलय कर दिया था। 1991 में भी पी एम पद शायद इसीलिए पी नरसिंघा राव साहब को मिला कि, एक बार प्रणब साहब कांग्रेस से बाहर जा चुके थे वैसे उनकी राजनीतिक शुरुआत ' बांग्ला कांग्रेस ' के माध्यम से हुई थी जिसका गठन पूर्व केंद्रीय शिक्षामंत्री हुमायूँ कबीर द्वारा इन्दिरा जी के विरोध में किया गया था।
लेकिन जैसा कि, मनमोहन जी ने कहा उनको 2004 में इत्तेफाक से पी एम बना दिया गया यह बात भ्रामक है। जिन ताकतों ने उनको 1991 में वित्तमंत्री बनवाया था उनके द्वारा ही वह इस पद के लिए चयनित किए गए थे सोनिया जी ने तो अपनी पार्टी की मोहर भर लगाई थी। जैसा कि, पदमुक्त होने के बाद पी नरसिंघा राव साहब ने अपने उपन्यास ' THE INSIDER ' में स्पष्ट कर दिया था कि, " हम स्वतन्त्रता के भ्रमजाल में जी रहे हैं '' ।
यही वजह रही कि, सोनिया जी चाह कर भी प्रणब साहब को पी एम नहीं बनवा सकती थी। और जब 2009 में उन्होने प्रणब साहब को प्रस्तावित करना चाहा तब यही साफ़गोई वाले मनमोहन सिंह साहब अड़ गए थे और 2011 में सोनिया जी के विदेश में इलाज कराने जाने के वक्त से डॉ मनमोहन सिंह जी ने हज़ारे / केजरीवाल के माध्यम से संघ से संबंध स्थापित किए व कारपोरेट घरानों के सहयोग से भ्रष्टाचार संरक्षण आंदोलन शुरू करा दिया था। परंतु सोनिया जी ने 2012 में मनमोहन जी को राष्ट्रपति व प्रणब जी को पी एम बनाने की मुहिम शुरू कर दी तब जापान से लौटते वक्त हवाई जहाज में ही ये साफ़गोई वाले मनमोहन जी ने कहा कि, वह जहां हैं वहीं ठीक हैं बल्कि तीसरा मौका मिले तो उसके लिए भी तैयार हैं जिसके परिणाम स्वरूप 2014 के चुनावों में सरकारी अधिकारियों / कर्मचारियों ने भी परिणाम प्रभावित करने में अपनी भूमिका अदा की है । आज की मोदी सरकार के गठन में आर एस एस , भाजपा के साथ - साथ मनमोहन जी का भी अप्रत्यक्ष व महत्वपूर्ण हाथ है जिसको बताने की साफ़गोई से वह बखूबी बचे रहे हैं। इनके अलावा 1967,1975 ,1980,1989 में लिए गए इन्दिरा जी व राजीव जी के निर्णयों ने भी 2014 में भाजपा को पूर्ण बहुमत तक पहुंचाने में RSS की भरपूर मदद की है।
~विजय राजबली माथुर ©
1967,1975 ,1980,1989 में लिए गए इन्दिरा जी व राजीव जी के निर्णयों ने 2014 में भाजपा को पूर्ण बहुमत तक पहुंचाने में RSS की भरपूर मदद की है।
हमारे विद्वान क्यों सतही बातों से प्रभावित हो जाते हैं और तथ्य की गहराई तक जाये बिना ही आसान निष्कर्ष निकाल लेते हैं जैसा गिरीश मालवीय जी ने किया ? आइये तथ्यावलोकन करें : यों तो इंदिराजी की हत्या के बाद भी प्रणब मुखर्जी साहब पी एम बनने की अपेक्षा करते रहे किन्तु राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह जी ने इंका महासचिव और सांसद राजीव गांधी को सीधे ही पी एम पद की शपथ दिलवा दी थी अतः उनको ही इंका संसदीय दल का नेता भी चुन लिया गया। शायद इसी वजह से दोनों में कुछ मतभेद भी हुये और प्रणब साहब ने ' समाजवादी कांग्रेस ' बना ली किन्तु 1989 के चुनावों के समय राजीव गांधी के नेतृत्व में समाजवादी कांग्रेस का कांग्रेस में विलय कर दिया था। 1991 में भी पी एम पद शायद इसीलिए पी नरसिंघा राव साहब को मिला कि, एक बार प्रणब साहब कांग्रेस से बाहर जा चुके थे वैसे उनकी राजनीतिक शुरुआत ' बांग्ला कांग्रेस ' के माध्यम से हुई थी जिसका गठन पूर्व केंद्रीय शिक्षामंत्री हुमायूँ कबीर द्वारा इन्दिरा जी के विरोध में किया गया था।
लेकिन जैसा कि, मनमोहन जी ने कहा उनको 2004 में इत्तेफाक से पी एम बना दिया गया यह बात भ्रामक है। जिन ताकतों ने उनको 1991 में वित्तमंत्री बनवाया था उनके द्वारा ही वह इस पद के लिए चयनित किए गए थे सोनिया जी ने तो अपनी पार्टी की मोहर भर लगाई थी। जैसा कि, पदमुक्त होने के बाद पी नरसिंघा राव साहब ने अपने उपन्यास ' THE INSIDER ' में स्पष्ट कर दिया था कि, " हम स्वतन्त्रता के भ्रमजाल में जी रहे हैं '' ।
यही वजह रही कि, सोनिया जी चाह कर भी प्रणब साहब को पी एम नहीं बनवा सकती थी। और जब 2009 में उन्होने प्रणब साहब को प्रस्तावित करना चाहा तब यही साफ़गोई वाले मनमोहन सिंह साहब अड़ गए थे और 2011 में सोनिया जी के विदेश में इलाज कराने जाने के वक्त से डॉ मनमोहन सिंह जी ने हज़ारे / केजरीवाल के माध्यम से संघ से संबंध स्थापित किए व कारपोरेट घरानों के सहयोग से भ्रष्टाचार संरक्षण आंदोलन शुरू करा दिया था। परंतु सोनिया जी ने 2012 में मनमोहन जी को राष्ट्रपति व प्रणब जी को पी एम बनाने की मुहिम शुरू कर दी तब जापान से लौटते वक्त हवाई जहाज में ही ये साफ़गोई वाले मनमोहन जी ने कहा कि, वह जहां हैं वहीं ठीक हैं बल्कि तीसरा मौका मिले तो उसके लिए भी तैयार हैं जिसके परिणाम स्वरूप 2014 के चुनावों में सरकारी अधिकारियों / कर्मचारियों ने भी परिणाम प्रभावित करने में अपनी भूमिका अदा की है । आज की मोदी सरकार के गठन में आर एस एस , भाजपा के साथ - साथ मनमोहन जी का भी अप्रत्यक्ष व महत्वपूर्ण हाथ है जिसको बताने की साफ़गोई से वह बखूबी बचे रहे हैं। इनके अलावा 1967,1975 ,1980,1989 में लिए गए इन्दिरा जी व राजीव जी के निर्णयों ने भी 2014 में भाजपा को पूर्ण बहुमत तक पहुंचाने में RSS की भरपूर मदद की है।
Friday, October 13, 2017
निष्पन्न अपराध है सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ------ जगदीश्वर चतुर्वेदी
Jagadishwar Chaturvedi
22 mins 13-10-2017
निष्पन्न अपराध है सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
यह वर्चुअल युग है ,यथार्थ और उसके समस्त संदर्भों के विध्वंस का युग है, इसमें अन्य या हाशिए के लोगों को मीडिया यथार्थ के बाहर खदेड़कर विध्वंस के हवाले कर दिया गया है। स्थिति बड़ी भयावह है लेकिन मीडिया में यथार्थ के चित्र और यथार्थ की ख़बरें ग़ायब हैं। मसलन्, सालाना हज़ारों औरतें दहेज और घरेलू हिंसा के ज़रिए मारी जा रही हैं,लेकिन उनकी चर्चा तक नहीं मिलती, लाखों किसान और मज़दूर ग़रीबी के कारण मर रहे हैं,वे खबर तक नहीं बन पा रहे हैं, अल्पसंख्यकों पर निरंतर हमले हो रहे हैं लेकिन अधिकांश को पुलिस बयान के आधार पर कभी-कभार अति सामान्य खबर के रुप में पेश करके दफ़्न कर दिया जाता है। इसके अलावा मेडीकल अपराध के कारण हर साल लाखों लोग मारे जा रहे हैं। लेकिन इस क्षेत्र की भी ख़बरें गायब हैं। सवाल यह है यथार्थ ख़बरों से मीडिया क्यों भाग रहा है ?
प्राइवेसी में सेंधमारी
हमारे चेहरे और शरीर पर प्लास्टिक सर्जरी का रंदा चल रहा है। व्यक्तिगत जैसी कोई चीज नहीं बची है। प्राइवेसी में सेंधमारी चल रही है, निगरानी चल रही है। कहने के लिए हम सूचना क्रांति में दाख़िल हो चुके हैं लेकिन वस्तुत: सूचना के कचरे में डूबे हुए हैं। हमारे आसपास जो दुनिया बनायी गयी है वह यथार्थ से कम और वर्चुअल यथार्थ से बनी ज्यादा है। सब चीज़ों में क्लोनिंग पद्धति दाख़िल हो गयी है।
हमने 'विकास' के जयघोष की आड़ में "अन्य" को हाशिए पर डाल दिया है। साथ ही 'अन्य' पर हमले तेज़ कर दिए हैं। इसके लिए इंटरनेट, सोशलमीडिया , मासमीडिया आदि का रीयल टाइम कम्युनिकेशन के रुप में इस्तेमाल किया जा रहा है। सूचना क्रांति के नाम पर विकसित समूचा ढाँचा समग्रता में यथार्थ की हत्या का तंत्र बन गया है। आज सच्चाई यह है कि कम्युनिकेशन ही यथार्थ और हाशिए के लोगों की हत्या का पूरक तंत्र बन गया है।
नए कम्युनिकेशन के परिदृश्य के प्रधान लक्षण ये हैं-
१. हाशिए के समुदायों का कम्युनिकेशन बंद ।
२.शत्रु के साथ बातचीत बंद।
३. अब किसी क़िस्म की नकारात्मकता मीडिया नज़र नहीं आती, सिर्फ़ परम सकारात्मकता की ही इमेज वर्षा होती रहती है ।
४. अब अन्य नहीं है सिर्फ़ अस्मिता और भिन्नता है
५.अब भ्रम नहीं है , बल्कि हायपर रियलिटी , वर्चुअल रियलिटी है
६. अब गोपनीयता नहीं है बल्कि ट्रांसपरेंसी के नाम पर निगरानी है।
७.मीडिया में सुंदर सामाजिक जीवन का सपना ग़ायब है, उसकी जगह सुंदर वस्तुओं ने ले ली है। यानी मीडिया अब भविष्य नहीं वस्तुओं का बोलबाला है।
यही वह परिप्रेक्ष्य है जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को निष्पन्न अपराध के रुप में निर्मित कर रहा है ।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद -
हाल के वर्षों में और ख़ासकर मोदी सरकार आने के बाद 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद 'को लेकर बुद्धिजीवियों से लेकर मीडिया तक चर्चाएं तेज हो गयी हैं। इन चर्चाओं के पीछे किस तरह की राजनीतिक मंशाएँ सक्रिय हैं इसे हम सबलोग जानते हैं।सवाल यह है सांस्कृतिक राष्ट्रवाद क्या है ? इसका उत्तर इस सवाल से मिलेगा कि ये लोग भारत को किस तरह देख रहे हैं ? किस तरह की सामाजिक इकाइयों के आधार पर देख रहे हैं ? यानी इनके नक़्शे में भारत की किस तरह की तस्वीर है।असल में, यह काल्पनिक धारणा है और इसका भारत के सामाजिक यथार्थ और उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रियाओं से कोई संबंध नहीं है। यह वर्तमान ,अन्य (अदर) और विविधता के निषेध पर निर्मित अवधारणा है।
' भगवा हिन्दूधर्म '
'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ' के पक्षधर भारतीय समाज को धार्मिक इकाइयों के आधार पर वर्गीकृत करके नस्ल के आधार पर देखते हैं। धर्म के आधार पर सामाजिक समूहों को वर्गीकृत करते हुए ये लोग खुलेआम एक ऐसे हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता का दावा कर रहे हैं जो परंपरा में कहीं नहीं मिलता।सामाजिक जीवन में कहीं पर भी नज़र नहीं आता। यह वह हिन्दूधर्म है जिसकी रचना सन् 1925 के आसपास आरंभ हुई। आरएसएस के संस्थापकों ने इसको निर्मित किया। यह वह हिन्दूधर्म नहीं है जो हज़ारों सालों से हमारे देश में विभिन्न सम्प्रदायों के आचार-व्यवहार और शास्त्र विमर्श ने बनाया है। इसलिए इसे 'भगवा हिन्दूधर्म 'कहना समीचीन होगा।' भगवा हिन्दूधर्म 'हमारे वर्तमान के वैविध्य को देखने, समझने में एकदम असमर्थ है।इसके अधिकांश नेताओं की स्वाधीनता संग्राम में नकारात्मक भूमिका रही है। यहां तक कि संविधान बनने के समय और बाद में भी अनेकबार संविधान विरोधी भूमिका रही है।
संविधान विरोधी भूमिका
स्वाधीनता संग्राम में कई तरह की विचारधाराएं और उनके मानने वाले संगठन सक्रिय थे ,संघ ने उनमें से लिबरल और क्रांतिकारी नेताओं और संगठनों के विचारों से प्रेरणा लेने की बजाय उन परंपराओं और राजनीतिक ताक़तों से प्रेरणा ली जिनके पास धर्म के आधार पर देखने या नस्ल के आधार पर देखने का नजरिया था, यही नजरिया संघ ने समाज, राजनीति, इतिहास आदि पर लागू किया।
' सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का मूलाधार है एम.एस. गोलवलकर की किताब "वी ओर अवर नेशनहुड डिफाइंड" है, यह किताब सन् 1938 में लिखी गयी और सन् 1939 में इसका पहला संस्करण प्रकाशित हुआ। इस किताब में नस्ल के आधार पर देश,राष्ट्र ,धर्म , संस्कृति , भाषा आदि को व्याख्यायित किया गया।
गोलवलकर के नज़रिए की सबसे बड़ी समस्या है कि वह भारत में उपलब्ध ज्ञान संपदा और उसके वैविध्यपूर्ण मूल्याँकन की अनदेखी करके कपोल- कल्पनाओं पर आधारित राष्ट्र -राज्य की परिकल्पना पेश करते हैं।उन्होंने हमारी ज्ञान संपदा से मदद लेने की बजाय हिटलर-मुसोलिनी के नजरिए से राष्ट्र-राज्य को परिभाषित करते हैं। यही समझ भारत के बारे में आरएसएस के राजनीतिक विवेक की धुरी है और इसी से निर्देशित होकर संघ और उसके द्वारा संचालित संगठन आए दिन आधुनिक भारत की बातें करते रहते हैं। गोलवलकर ने संघियों में ज्ञान की जो नींव डाली उसका आधार है किंवदन्ती, कपोल कथाएँ और अविवेकवादवाद। इसका सामाजिक लक्ष्य है 'अन्य' के खिलाफ घृणा और हिंसा केन्द्रित शासनतंत्र की स्थापना करना, मौजूदा शासनतंत्र में अविवेकवाद को नॉर्मल विचारधारा के रुप में प्रतिष्ठित करना। लोकतंत्र का आधार नागरिक को आधार बनाने की बजाय धर्म और खासकर हिन्दूधर्म को आधार बनाना। सामाजिक इकाई की नियामक धुरी के रुप में जाति की संरचना की हर हालत में रक्षा करना। संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरुप को बदलना। आमलोगों में धर्मनिरपेक्षता की बजाय 'भगवा हिन्दूधर्म' का पिरचार करना,धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ घृणा पैदा करना।
गोलवलकर की कपोल -कल्पनाएँ भयावह और बर्बर है
गोलवलकर की कपोल -कल्पनाएँ सतह पर सामान्य और सहज प्रतीत होती हैं लेकिन इनका राजनीतिक आयाम भयावह और बर्बर है। कपोलकथाएं बर्बरता का अंग कैसे बन गयां यह चीज आरएसएस रचित शास्त्र और विभिन्न राज्य और केन्द्र सरकारों के नीतिगत फैसलों के मूल्याँकन के ज़रिए सहज ही समझी जा सकती है। मसलन्, यह कपोल कल्पना कि हिन्दू श्रेष्ठ होते हैं,पहले यह चीज पंडितों की कहानियों तक सीमित थी, इसका राजनीति से कोई संबंध नहीं था। इसके आधार कोई नया शास्त्र, सामाजिक नियम, संविधान अथवा दण्डविधान बनाने की कोई कोशिश पहले नहीं की गयी, यहां तक कि धर्मनिरपेक्षता और बहुलतावादी संरचनाओं के खिलाफ कभी हमले नहीं किए गए। लेकिन पहलीबार आरएसएस ने अपने जन्म से लेकर आज तक इन कल्पित कहानियों को सामयिक राजनीतिक विमर्श , सामाजिक संरचनाओं और राज्य की नीतियों ,शिक्षा के पाठ्यक्रम और राजनीतिक गोलबंदी का आधार बना दिया।
आरएसएस के जन्म के पहले रैनेसां में पुनरुत्थानवादी धारा थी जिनमें शामिल कई बडे विचारकों ने धर्म और नस्ल के आधार समाज को देखने का नज़रिया पेश किया। इस तरह के लोग ब्रिटिश परंपरा, प्राच्यवादी परंपरा और देशज पुनरुत्थानवादी रैनेसां परंपरा में मौजूद थे। आरएसएस के प्रचारक इन विचारकों का बार - बार जिक्र करते हैं। मूल बात यह है कि समाज को धर्म और नस्ल के आधार पर देखने की राजनीतिक परंपरा का श्रीगणेश ब्रिटिश दौर में हुआ। यह नजरिया मध्यकाल में नहीं मिलता। यहां तक कि मध्यकाल में हिन्दू- मुस्लिम वैमनस्य के दर्शन भी नहीं होते। यही वजह है कि संघ का पुनरुत्थानवादी विचारकों और ब्रिटिशपंथी विचारकों के साथ सहज रुप में गहरा संबंध भी है। उनके इस नजरिए का साहित्य और कला रुपों में किस तरह का असर हुआ है इस पर गंभीरता से सोचने की जरुरत है और यह भी विचारणीय है कि साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में इसका किस तरह विरोध किया गया।
आधुनिककाल में हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखते समय आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के सामने भी यह संकट था कि पुरुत्थानवादी नजरिए से साहित्य का इतिहास लिखा जाय या प्राच्यवादी नजरिए से लिखा जाय? शुक्लजी ने इन दोनों ही दृष्टियों का इतिहास और आलोचना में इस्तेमाल नहीं किया और इतिहासदृष्टि का जो मॉडल चुना वह मानवतावादी -वस्तुवादी है। इस मॉडल की अपनी समस्याएं हैं लेकिन पुनरुत्थानवादी और प्राच्यवादी इतिहास मॉडल से यह भिन्न और ज्यादा उदार मॉडल है। इसमें विकास की अनंत संभावनाएँ हैं, यह लचीला मॉडल है।
'हिन्दी साहित्य का इतिहास ' उदार मानवतावादी दृष्टिकोण
मसलन्, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने साहित्य के इतिहास को धर्म और अध्यात्मवाद के आधार पर निर्मित नहीं किया,हिन्दी और हिन्दीभाषी क्षेत्र की बोलियों और भाषाओं को संस्कृत की बेटी नहीं माना। संस्कृत साहित्य से अलग करके हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखा। पुनरुत्थानवादी और संघ यह मानता है कि संस्कृत तो हिन्दी की जननी है। जबकि शुक्लजी यह नहीं मानते। इसके विपरीत उन्होंने हिन्दी के उदय और विकास को हिन्दीभाषी क्षेत्र की जनता,जनभाषाओं और लोक संस्कृति के साथ जोडकर देखा। उन्होंने प्राच्यवादियों के नजरिए से अलगाते हुए साहित्य का दनक रहस्यवाद या धर्म या अध्यात्मवाद को नहीं माना । जबकि गोलवलकर यह माँग करते हैं कि साहित्य और कलाओं को अध्यात्म और धर्म के आधार पर देखा जाना चाहिए। उल्लेखनीय है शुक्लजी जब इतिहास लिख रहे थे तब आरएसएस का जन्म हो चुका था और विभिन्न क्षेत्रों में धर्म के आधार पर और ख़ासकर हिन्दूधर्म के आधार पर देखने की बातें अनेक बड़े लोग कर रहे थे। इनमें मदनमोहन मालवीय और उनके दूसरे समानधर्मा नेताओं के नाम आते हैं। लेकिन शुक्लजी ने अपने को इनके नज़रिए से मुक्त रखा । शुक्लजी ने 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' उदार मानवतावादी दृष्टिकोण के आधार निर्मित किया और इतिहास को इतिवृत्तवादियों, प्राच्यविदों और पुनरुत्थानवादियों के नज़रिए से मुक्त होकर लिखा।*( दिलचस्प बात यह है पुनरुत्थानवाद के नज़रिए का बड़े पैमाने पर आर्यसमाज के संस्थापक दयानन्द सरस्वती ने जमकर प्रचार किया। इस नज़रिए के अनेक पहलुओं का माधव सदाशिव गोलवलकर के नज़रिए से मेल बैठता है। यही वजह है कि आर्यसमाज का 1920-21 के बाद से लगातार साम्प्रदायिकता की ओर रुझान बढ़ा है। आज देश में अधिकांश स्थानों पर आर्यसमाज संगठन पर संघ का ही क़ब्ज़ा है।
दयानन्द सरस्वती का मानना था कि भक्ति आंदोलन की कोई भूमिका नहीं है। वहीं पर एम.एस. गोलवलकर ने "वी ओर अवर नेशनहुड डिफाइंड" में लिखा है कि भगवान से बडा भर्त को मानने की मध्यकालीन परंपरा सही नहीं है इससे व्यक्तिवादिता का विकास हुआ और धार्मिक सामूहिकता का क्षय हुआ। )* यानी वे भी प्रकारान्तर से भक्ति आंदोलन के बुनियादी नजरिए का विरोध करते हैं। भक्ति आंदोलन के अधिकांश कवि यह मानते हैं कि धर्म निजी चीज है , सभी धर्म समान हैं, सबका सम्मान करना चाहिए ,धर्म का राजनीति और राजसत्ता से कोई संबंध नहीं है। यही वह बुनियादी नजरिया है जो आधुनिककाल में राजा राममोहन राय के धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण औरआधुनिक भारत की अवधारणा का बुनियादी आधार बनता है। दिलचस्प बात यह है कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के नजरिए का भी यही मूलाधार है। वे पुनरुत्थानवादियों और प्राच्यविदों के नजरिए से भिन्न धर्मनिरपेक्ष नजरिए से साहित्य के इतिहास का जो ढांचा प्रस्तावित करते हैं वह तुलनात्मक तौर खुला है और उसमें विवेकवादी दृष्टिकोण के विकास की अनंत संभावनाएं हैं।
साम्प्रदायिक इतिहासदृष्टि का मानना है हिन्दीभाषी क्षेत्र में एक ही प्रमुख भाषा है वह है खडी बोली हिन्दी और यह सैंकडों सालों से बोली जा रहीहै। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इस नजरिए को खंडित किया है। उनका मानना है कि आधुनिककाल के पहले खडी बोली हिन्दी का प्रयोग बहुत कम लोग करते थे , ज्यादातर जनता अवधी,भोजपुरी,मैथिली ,ब्रजभाषा आदि आंचलिक बोलियों और भाषाओं का प्रयोग करती थी , मध्यकाल के प्रमुख लेखक गैर-खडी बोली की भाषाओं से आते हैं। उनका लिखा साहित्य ही हिन्दी का मूल साहित्य है। इन बोलियों और भाषाओं की जननी संस्कृत नहीं बल्कि इस इलाके में रहने वाली जनता है। भाषा का निर्माण जनता करती है। इसी प्रक्रिया में विभिन्न भाषाओंके साहित्य की परंपरा और इतिहास को भी देखा जाना चाहिए। इससे यह तथ्य सामने आता है कि हिन्दीभाषी क्षेत्र एकभाषी न होकर बहुभाषी है।यहां संस्कृति की बहुलतावादी परंपरा रही है। इसमें सभी किस्म की जातियों के लेखकों की बडी भूमिका रही है।अत: हिन्दीभाषी क्षेत्र को एकभाषी क्षेत्र के रुप में देखना सही नहीं होगा। यहां सवर्ण और असवर्ण लेखकों में जाति के आधार पर भेद नहीं था ।अत: वर्णाश्रम व्यवस्था और जातिप्रथा का साहित्य और संस्कृति में कोई मूल्य नहीं है, प्रासंगिकता नहीं है। इसके अलावा शुक्लजी ने साहित्य का इतिहास लिखते समय राष्ट्रवाद को अप्रासंगिक धारणा के रुप में ही देखा। आश्चर्य है कि वे राष्ट्रवादी लेखकों का नामोल्लेख तक नहीं करते। बल्कि वीरगाथा काल के लेखकों की रचनाओं की प्रामाणिकता पर संदेह व्यक्त करते हुए प्रकारान्तर से राष्ट्रवाद को ही खारिज करते हैं। वे उन लेखकों पर कम लिखते हैं जिनकी रचनाओं में धर्म को आधार बनाया गया या दो धार्मिक दृष्टिकोण और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से लिखी गयी हैं। वे लेखक का परिचय लिखते समय जाति का उल्लेख जरुर करते हैं लेकिन लेखक को जाति के नजरिए से न देखकर मनुष्य के रुप में देखते हैं, लेखक के रुप में देखते हैं। उन्होंने अपने इतिहास ग्रंथ में धर्म, जाति या वर्ण को साहित्य से जोडकर नहीं देखा अपितु मनुष्य और उसके सामाजिक अन्तर्विरोधों को साहित्य और समाज के अन्तस्संबंध के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा है। इसके अलावा वे 'वर्ग' और ' वर्गसंघर्ष' के आधार पर भी साहित्य को नहीं देखते।
'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की मूल समस्या है धर्म और अध्यात्मवाद के साथ साहित्य, कला , राजनीति , इतिहास आदि को जोडकर देखना । जबकि यह वह नजरिया है जिसके आधार पर साहित्य और कलाओं को सही ढंग से समझा ही नहीं जा सकता। इससे भी बडी बात यह कि धर्म या नस्ल के आधार पर साहित्य और कलाओं की भूमिका को सही रुप में परिभाषित ही नहीं कर सकते। इसका प्रधान कारण है साहित्य और धर्म की प्रकृति का मूल अंतर । धर्म में मनुष्य को आगे की दिशा में बदलने की क्षमता ही नहीं है, जबकि साहित्य और कलाओं में मनुष्य में सांस्कृतिक तौर पर प्रगतिशील मूल्य पैदा करने की क्षमता है। धर्म में निजी संरचना में सतही परिवर्तन करने की क्षमता है लेकिन मूलगामी परिवर्तन की इच्छाशक्ति नहीं है।
' सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की वैचारिक संरचनात्मक विशेषता है कला और राजनीति के अन्तस्संबंध का अस्वीकार। विचारधारा का निषेध। साहित्य और विचारधारा के संबंध का निषेध।संरचनात्मक तौर पर साहित्य में परिवर्तन का निषेध। शाश्वत साहित्य की धारणा पर जोर। लेकिन साहित्य और कलाएं राजनीति से संबंध काटकर अपना विकास नहीं कर सकतीं। खासकर सामयिक समाज और सामयिक राजनीतिक आंदोलनों से साहित्य का गहरा संबंध है। यही वजह है साहित्य को विभिन्न राजनीतिक आंदोलनों के संदर्भ में विभिन्न किस्म की भूमिकाओं में देख सकते हैं । ये लोग हमेशा 'धर्म के लिए साहित्य', 'धार्मिकता के लिए साहित्य' पर जोर देते हैं। भक्ति साहित्य को साहित्य न मानकर धार्मिक साहित्य के रुप में देखते हैं। उनके लिए रामचरित मानस एक धार्मिक कृति है।
'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' जातीयता की धारणा का निषेध करता है। भाषावार राज्यों के गठन को गलत मानता है। वैसी अवस्था में जातीयभाषा, जातीय साहित्य, भारतीय साहित्य और विश्व साहित्य की अवधारणाएं एकसिरे से अप्रासंगिक हो जाएंगी।
असंभव विनिमय -
'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ' असंभव सामाजिक- सांस्कृतिक -राजनीतिक विनिमय है। उनके यहाँ हर चीज संभव से आरंभ होती है लेकिन असंभव और अनिश्चितता में रुपान्तरित हो जाती है। इसके कारण इसमें वर्णित किसी भी विचार या व्यवहार का विनिमय नहीं कर सकते। फलत:इसका तथ्यों , आचार-विचार,परंपरा, संस्कृति , राजनीति आदि के साथ किसी भी किस्म का विनिमय नहीं कर सकते ।साथ ही यथार्थ के साथ भी विनिमय नहीं कर सकते। बल्कि यह कहें तो ज्यादा सही होगा कि 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद 'में तो हर चीज अनिश्चित और जड है। इसमें वर्तमान जगत के लिए तो कोई जगह ही नहीं है इसलिए इसकी वैधता की किसी भी रुप में पुष्टि नहीं कर सकते। वह ऐसे यथार्थ को पेश करता है जिसको पुष्ट करना संभव नहीं है। वह ऐसी धारणा है जिस पर बहस नहीं हो सकती , आप इसे मानें या खारिज करें।
' सांस्कृतिक राष्ट्रवाद 'ऐसी अवधारणा है जिसके बदले में विनिमय करके आप कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकते। इस तरह की अनेक धारणाएँ प्रचलन में हैं उनका विनिमय करना मुश्किल है। 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ' की हिमायत में जो लोग बोल रहे हैं उनसे सवाल करें कि जीवन या समाज पर किसका शासन होगा ? धर्म का शासन होगा या विज्ञान का शासन होगा ? इसी तरह कलाओं पर किसका असर होगा धर्म का असर होगा या विज्ञान का असर होगा? यह भी ध्यान रखें कि चंद प्रतीकों और चिह्नों के ज़रिए भी 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद 'का विनिमय नहीं कर सकते।
कोई भी सिस्टम अपना विकास तब ही कर पाता है जब वह समानता के आधार पर अपना विनिमय करे और उसके अपने मूल्य हों। इस तरह के सिस्टम के तदर्थ और स्थायी मक़सद भी होते हैं। जिसके कारण उनका तयशुदा विलोम या विरोध भी होता है। जैसे अच्छा -बुरा,सत्य-असत्य ,सब्जेक्ट -ऑब्जेक्ट आदि। लेकिन 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के पास कोई सुचिंतित धारणा या सिस्टम की समझ नहीं है।
' सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' वस्तुत: आधारहीन विभाजक विचारधारा है।इसके पास सामाजिक यथार्थ और अंतर्विरोधों को देखने की क्षमता नहीं है। लेकिन वह यथार्थ को विभ्रम में बदलने की क्षमता जरुर रखता है। यह मूलत: डिसरप्टिव व्यवस्था तोडक विचारधारा है।अराजकता इसकी मूल आत्मा है। इसमें कोई चीज स्थिर नहीं रह सकती। भिन्नता और वैविध्य के साथ इसका वैचारिक अन्तर्विरोध है। मुश्किल यह है कि यह जनता के जिस हिस्से पर टिकी है वह जनता अनालोचनात्मक है।
'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के तर्क हमेशा यथार्थ के किसी न किसी कोण से शुरु होते हैं , उसके आधार पर यह आभास पैदा करने की कोशिश करता है कि वह वैध अवधारणा है लेकिन वे यह भूल जाते हैं इस अवधारणा के आधार पर विनिमय नहीं हो सकता,आधुनिक समाज नहीं बनाया जा सकता। कोई भी नई चीज या संरचना बना नहीं सकते। क्योंकि इस धारणा का विनिमय मूल्य नहीं है। यह नपुंसक धारणा है। यह धारणा कृत्रिम रुप से बंधक यथार्थ के तहत ही अपनी वैधता का ढोल बजाती है।
' सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के मौजूदा प्रचार अभियान ने बडे पैमाने पर 'अनक्रिटिकल जनता 'तैयार की है। ' क्रिटिकल जनता 'घटी है। ख़ासकर सूचनावर्षा ने सूचना का बेतहाशा कचरा समाज में फेंका है। यही सूचना कचरा बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ने इस्तेमाल किया है। सूचना कचरे के रुप के तौर पर जो विषय सामने आए हैं वे हैं -मुस्लिम तुष्टीकरण, भ्रष्टाचार, नैतिक - अनैतिक , सामान्य -असामान्य , छद्म धर्मनिरपेक्षता , हिन्दुत्व, आरक्षण , जाति द्वेष , बीफ या गोमांस आदि । यही वह कचरा है जिसने 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद 'का परिवेश निर्मित किया है।फलत: 'सूचना क्रांति 'और 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ' में हम गहरा याराना भी देखते हैं, मीडिया के साथ गहरी मित्रता भी देखते हैं।
' सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ' ने 'अन्य' या हाशिए के लोगों प्रति शत्रुता या बदले की भावना को नई बुलंदियों तक पहुँचाया है। बहुलतावाद पर हमले किए गए हैं। अकल्पनीय सामाजिक अव्यवस्था और अशांति की नींव रखी है। 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की मूल विशेषता है कि इसके पास मित्र कम और अपने निजी शत्रु ज्यादा हैं। इसके आधार पर वे सामाजिक व्यवस्था को ही नहीं बल्कि राजनीतिक व्यवस्था और बायलॉजिकल व्यवस्था को भी प्रभावित कर रहे हैं।
दार्शनिक तौर पर 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ' आइने में अपनी इमेज का गुलाम है। जिस व्यक्ति की इमेज को वे देखते हैं वे उससे भिन्न इमेज स्वीकार नहीं करते।। वे आइने में हिन्दू देखते हैं या फिर धार्मिक पहचान को देखते हैं और उसी को पीटते हैं। इस क्रम में सद्भाव की इमेज का लोप हो जाता है। वे असल में आइने में हिन्दू इमेज देखते हैं तो उसी को दोहराते हैं। वे यही चाहते हैं कि आइने में जिस तरह के व्यक्ति की इमेज वे देखते हैं तो बाद में उसी इमेज को समाज में देखना चाहते हैं। यही अवस्था उनके सपने या यूटोपिया की है वे आइने में अपना जो सपना देखते हैं वही समाज में दोहराते हैं।
"अन्य " या "अदर " के ख़िलाफ़ जंग -
" अन्य "को बड़े कौशल के साथ हमने सार्वजनिक विमर्श से ग़ायब किया है। अन्य या हाशिए के सवाल कहने को चर्चा में हैं लेकिन अर्थहीन और निष्प्रभावी होकर रह हए हैं। हमने आरक्षण , दलित साहित्य , स्त्री साहित्य आदि के बहाने हाशिए के लोगों के जीवन के सारवान रुप को ग़ायब ही कर दिया है। अब हाशिए के लोग हैं उनके सवाल भी हैं लेकिन सब सारहीन हैं। हाशिए के आदमी का विध्वंस कैसे हुआ ? वह ग़ायब कैसे हुआ ?यह कोई नहीं जानता। आज स्थिति यह है कि दलित अरबपति हैं, करोड़पति हैं, लेकिन परिदृश्य से दलित ग़ायब है कहीं पर कोई विॹुअल तक नज़र नहीं आता। चारों ओर औरतें ही औरतें हैं लेकिन उनके सवाल ग़ायब हैं, औरत की यथार्थ अनुभूति ग़ायब है। अब दलित, औरत, मुसलमान, आदिवासी लाक्षणिक रुप से ही बचे रह गए हैं। वास्तव रुप में हम उनको कहीं पर नहीं देख रहे। यथार्थ में उनका चारों ओर संकुचन हुआ है।
19वीं शताब्दी में हम जब आधुनिकता के दौर में दाख़िल हुए थे तो उस समय "अन्य" यानी स्त्री -दलित के सवालों पर व्यापक चर्चा हुई, आधुनिक स्त्री निर्मित की गयी, आधुनिक दलित निर्मित किया गया। उस समय "अन्य" की हत्या करने का लक्ष्य नहीं था। बल्कि 'अन्य' को उद्घाटित करने का लक्ष्य था। उस समय यही कहा गया कि "अन्य "को पहले प्रस्तुत करो, बाद में उससे प्यार या घृणा करो।
यह भी देखा गया कि व्यक्तिगत मूल्यों और व्यक्तिवादिता का जितना प्रचार-प्रसार हुआ "अन्य" ग़ायब होता चला गया।व्यक्तिवादिता के विकास के फलस्वरूप अन्य का लोप हो सकता है यह हमने कभी सोचा ही नहीं। फलत:आधुनिककाल में "अन्य" का स्पेस सीमित होता चला गया। अब "अन्य" है लेकिन भगवान भरोसे है! "अन्य" है लेकिन भिन्नता और विशिष्टता के साथ। क्रमश: "अन्य" अमूर्त और वायवीय होता चला गया। अब 'अन्य' को 'भिन्नता' के रुप में विश्लेषित करने की परंपरा चल निकली जिससे वह क्रमश: वायवीय बना है। खासकर 1975-76 के बाद से स्त्री और दलित के बारे में जितना साहित्य लिखा गया है वह 'भिन्नता 'के पैराडाइम के आधार पर लिखा गया है।इससे स्त्री और दलित की सामाजिक इमेज और अवस्था क्षतिग्रस्त हुई है।
"भिन्नता" ने औरत , दलित और मुसलमान की नई इमेज की सृष्टि की है। यह इमेज सतह पर गतिशील है लेकिन सामाजिक मर्म के स्तर पर यह मध्यवर्गीय परजीवी की इमेज से मिलती जुलती है। मसलन्, १९वीं सदी में मर्दों में स्त्री को लेकर एक ख़ास क़िस्म का प्रचंड आवेग नज़र आता है। जिसे रैनेसां के नाम से जाना जाता है। वे परंपरागत औरत की जगह नए क़िस्म की आधुनिक औरत चाहते हैं, ऐसी औरत चाहते हैं जिसकी साज-श्रृंगार में पश्चिमी स्त्री से तुलना की जा सके। इसका शरीर कैसा होगा, सौंदर्य कैसा होगा , वह किस तरह सजेगी , किस तरह चलेगी और किस तरह रहेगी , यह सब पश्चिम से प्रेरणा लेकर मर्दों ने तय किया। इसके गर्भ से ही आधुनिक आदर्श स्त्री इमेज का जन्म हुआ । अब वह स्त्री केन्द्र में नहीं थी जिसे दरबारी सभ्यता या श्रृंगार साहित्य या रीतिकालीन कवियों ने रचा था । श्रृंगारी स्त्री अपने शारीरिक सौंदर्य के आधार पर ही मर्दों को सम्मोहित करती थी लेकिन नई आधुनिक औरत का गठन कुछ इस तरह किया गया जिससे वह अपने यथार्थ को हासिल कर सके। इसमें उसके आदर्शशरीर और यथार्थशरीर का विलक्षण सम्मिश्रण था। अब स्त्री - पुरुष का भेद कहने को तो था लेकिन असल में वे एक दूसरे के आईने में देख रहे थे। वे भिन्न थे लेकिन आईने के रुप में।
आधुनिक काल के आने के साथ यह कहा गया कि रीतिकाल और श्रृंगार रस की विदाई हो गयी है, लेकिन २०वीं सदी के तीसरे दशक के बाद से नए सिरे रीतिकाल लौट आया। लेकिन इसबार वह नए रुप में लौटा। मसलन् पहले रीतिकालीन नायिका - नायकभेद (अन्य) का संबंध दरबारी (विलक्षण) लोगों तक सीमित था वे ही उसके भोक्ता थे,यह संबंध ' विलक्षण 'और 'अन्य ' के बीच के संबंध के रुप में जाना जाता है।
लेकिन आधुनिकता के साथ नए नायक -नायिका का जो रुप सामने आया उसमें 'विलक्षण 'और 'अन्य' के संबंध की बजाय दोनों में 'समानता 'और 'एक जैसी पसंद 'पर ज़ोर है। रीतिकाल में स्त्री 'सुपरफ्लुअस ' थी लेकिन आधुनिककाल में वह पुरुष की पूरक है । फलत: औरत वास्तव अर्थ में ग़ायब हो गयी। कायिकतौर पर वह मौजूद थी लेकिन कला और साहित्य के क्षेत्र से वह ग़ायब हो गयी, आप साहित्य को उठाकर देखें कि हिन्दी में आधुनिककाल में स्त्री, अल्पसंख्यक और आदिवासी कब मुख्यधारा के केन्द्र में आते हैं। भारतेन्दु काल से लेकर आपातकाल के समापन तक औरत, दलित और मुसलमान ग़ायब हैं। इनके सवाल ग़ायब हैं। इस क्रम में पहले औरत 'श्रमशक्ति रिपोर्ट 'के ज़रिए केन्द्र में आती है , फिर मंडल कमीशन रिपोर्ट के ज़रिए अन्य पिछड़े लोग केन्द्र में आते हैं और उसके बाद सच्चर कमीशन की रिपोर्ट के ज़रिए मुसलमान सामने आते हैं। जबकि संविधान में इन तीनों के बारे में तमाम क़िस्म की पवित्र घोषणाएँ की गयी थीं लेकिन वे सभी घोषणाएँ खोखला साबित हुईं, इस बीच में बड़े पैमाने पर औरत, दलित और मुस्लिम मध्यवर्ग का उदय होता है। इससे इन समूहों में विशेष क़िस्म की सक्रियता नज़र आती है।
यही स्थिति पुरुष की भी है। पुरुष की जो इमेज आधुनिककाल के पहले थी वही इमेज आधुनिककाल आने के बाद नहीं रही। स्त्री की बदलती इमेज की संगति में पुरुष की इमेज का भी तेज़ी से रूपान्तरण हुआ है। जिस तरह रीयल औरत ग़ायब हुई है वैसे ही रीयल पुरुष भी ग़ायब हुआ है। अब मर्द सिर्फ़ एक इमेज मात्र बनकर रह गया है। यह ऐसी इमेज है जिसका सिर्फ़ अनुमान कर सकते हैं, ठीक -ठीक कहना संभव ही नहीं है कि आख़िरकार पुरुष कैसा होता है ! अब सलमान -शाहरुख़-आमिर का जो आख्यान है वह मात्र कायिक आख्यान है। यही हाल स्त्री के आख्यान का है। वहाँ पर शरीर चर्चा , रुपचर्चा महत्वपूर्ण होकर रह गयी है। इस तरह के रुपों की अंतहीन कहानियाँ हमारे बीच प्रचलन में हैं, प्रसारित होती रहती हैं। दोनों के रुप, शरीर, सौंदर्य प्रसाधन आदि को लेकर ही चर्चाएँ होती रही हैं। इसने शरीर का राजनीतिक अर्थशास्त्र पैदा किया है। इसका साइड इफ़ेक्ट यह हुआ है कि लिंग के सवाल और समस्याएँ साहित्य और मीडिया के बाहर चले गए हैं।
अब हम प्रतिकृतियों के युग में आ गए हैं। प्रतिकृतियों के रुपों पर इंकार बहस कर रहे हैं। इस क्रम में लिंगभेद और जातिभेद के सवालों को हमने आरक्षण के ज़रिए अपदस्थ कर दिया है। अव जब भी बहस होती है आरक्षण पर होती है लिंगभेद या जातिप्रथा पर बहस नहीं होती। तात्कालिक समाधानों पर बहस होती है दीर्घकालिक समाधानों पर बहस नहीं होती। इस तरह की बहसों से सामाजिकचेतना निर्मित नहीं होती, वायवीय सचेतनता पैदा होती है जो अंतत अचेत रखती है। मसलन् , स्त्री ,मुसलमान और दलित के पक्षधर अधिकांश लेखक अंतत: वही बने रहते हैं जो वे हैं। वे यथास्थिति बनाए रखते हैं। यही वजह है कि बडे पैमाने पर स्त्री और दलित साहित्य प्रकाशित हुआ है लेकिन सामाजिक स्थिति में मूलगामी बदलाव नहीं हुआ है। यह ऐसा साहित्य है जो स्त्री - दलित चेतना तो देता है लेकिन मनुष्य का समग्र भावाबोध पैदा नहीं करता। इस अर्थ में यह अनुत्पादक साहित्य है। अब स्त्री - पुरुष के शरीर को लिंग ( जेण्डर) ने अपदस्थ कर दिया है। इसे कामुक भूमिका के प्रगतिशील रुप के तौर पर व्याख्यायित किया जा रहा है। यह असल में लिंगक्षय है। यह लिंग के सवालों का अंत है। यह स्त्री -पुरुष की समानता का अंत है। इन दोनों के भेद अब अ-भेद में रुपान्तरित हो गए हैं। अब दोनों ही लिंग या हाशिए के लोग आत्म- प्रसिद्धि में लगे हैं , इसने लिंगभेद या सामाजिक भेद के रुपों को अप्रासंगिक बना दिया है। अब लोग कह रहे हैं लिंगभेद, जातिभेद , धर्मभेद को भूल जाओ और सिर्फ़ विकास की बात करो। विकास होगा तो सभी क़िस्म के भेद ख़त्म हो जाएँगे। यह असल में स्त्री,पुरुष,दलित,मुसलमान आदि को वायवीय बना देने का मार्ग है जिस पर हम सब आरक्षण , विशिष्ट साहित्य रुप और भिन्न यथार्थ के नाम पर चल निकले हैं।
स्त्री- पुरुष दोनों एक दूसरे की आँखों में आँखें डालकर देख रहे हैं। यह सामान्य भाव है। इसके ज़रिए हमारे सामयिक नैतिक और सांस्कृतिक मूल्य अभिव्यक्त हो रहे हैं। हम सच्ची आँखों से छद्म को देख रहे हैं, सुंदर आँखों से गंदी या घटिया चीज को देख रहे हैं,सुंदर आँखों से शैतान या गुंडे को देख रहे हैं। यह वाइस वर्सा भी हो सकता है। वे एक दूसरे को देख रहे हैं। इस प्रक्रिया में 'अन्य'भिन्न किस्म से चीज़ें ग्रहण कर रहा है। दोनों के साथ भेदभाव हो रहा है और दोनों ही 'शॉर्टकट 'मार रहे हैं। वे संचार जहाज़ की तरह कम्युनिकेट कर रहे हैं। यह संचार का वह रुप है जो हम फेसबुक, चैटिंग, एसएमएस आदि के रुप में नज़र आता है। यह वह कम्युनिकेशन है जिसने लिंगभेद और जातिभेद के सवालों पर बहस का अंत कर दिया है। अंतर्क्रिया और विनिमय की संभावनाएँ नष्ट कर दी हैं। यही वह बृहत्तर प्रक्रिया है जो हमें अनक्रिटिकल जनता बना रही है और हमें 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का सहज निशाना भी बना रही है।
( वर्द्धमान विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा "सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिन्दी साहित्य"विषय पर २९सितम्बर २०१५ को आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में दिया गया वक्तव्य)
साभार :
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"*( दिलचस्प बात यह है पुनरुत्थानवाद के नज़रिए का बड़े पैमाने पर आर्यसमाज के संस्थापक दयानन्द सरस्वती ने जमकर प्रचार किया। इस नज़रिए के अनेक पहलुओं का माधव सदाशिव गोलवलकर के नज़रिए से मेल बैठता है। यही वजह है कि आर्यसमाज का 1920-21 के बाद से लगातार साम्प्रदायिकता की ओर रुझान बढ़ा है। आज देश में अधिकांश स्थानों पर आर्यसमाज संगठन पर संघ का ही क़ब्ज़ा है।
दयानन्द सरस्वती का मानना था कि भक्ति आंदोलन की कोई भूमिका नहीं है। वहीं पर एम.एस. गोलवलकर ने "वी ओर अवर नेशनहुड डिफाइंड" में लिखा है कि भगवान से बडा भर्त को मानने की मध्यकालीन परंपरा सही नहीं है इससे व्यक्तिवादिता का विकास हुआ और धार्मिक सामूहिकता का क्षय हुआ। )* "
जगदीश्वर चतुर्वेदी जी जिनका उपरोक्त कथन उद्धृत किया है मथुरा के हैं और वहीं स्वामी विरजनन्द जी से स्वामी दयानन्द जी ने शिक्षा ग्रहण की थी और उनके आदेशानुसार ही वेदों का प्रचार - प्रसार किया था। 1857 की क्रांति में सक्रिय भाग लेने वाले स्वामी दयानन्द सरस्वती ने 1875 में 'आर्यसमाज ' की स्थापना 'कृण्वंतोंविश्वमार्यम ' अर्थात सम्पूर्ण विश्व को 'आर्ष ' = श्रेष्ठ बनाने हेतु की थी। सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित 'सत्यार्थ प्रकाश ' के पृष्ठ : 314 - 315 पर एकादशसमुल्लास : में भागवत पुराण में वर्णित अवैज्ञानिक, अतार्किक बातों के संबंध में स्वामी दयानन्द सरस्वती के विचार दिये गए हैं, यथा ------
" वाहरे वाह ! भागवत के बनाने वाले लालभुजक्कड़ ! क्या कहना ! तुझको ऐसी ऐसी मिथ्या बातें लिखने में तनिक भी लज्जा और शर्म न आई, निपट अंधा ही बन गया ! ........... शोक है इन लोगों की रची हुई इस महा असंभव लीला पर , जिसने संसार को अभी तक भ्रमा रखा है। भला इन महा झूठ बातों को वे अंधे पोप और बाहर भीतर की फूटी आँखों वाले उनके चेले सुनते और मानते हैं। बड़े ही आश्चर्य की बात है कि, ये मनुष्य हैं या अन्य कोई ! ! ! इन भागवतादि पुराणों के बनाने वाले जन्मते ही ( वा ) क्यों नहीं गर्भ ही में नष्ट हो गए ? वा जन्मते समय मर क्यों न गए ? क्योंकि इन पापों से बचते तो आर्यावर्त्त देश दुखों से बच जाता । "
स्पष्ट है कि, जैसे ढोंग और हिंदुवाद आर एस एस का है वैसा स्वामी दयानन्द का हो ही नहीं सकता क्योंकि वह तो देश-काल-लिंग-जाति-क्षेत्र के भेद भाव से परे समस्त विश्व को ही आर्य = आर्ष = श्रेष्ठ बनाना चाहते थे।
स्वामी दयानन्द के उत्तराधिकारी स्वामी श्रद्धानंद की हत्या के बाद आर्यसमाज पर संघ ने हावी होना शुरू किया था और आज भी जकड़े है परंतु लगातार आर्यसमाज के भीतर से ऐसे दोहरे चरित्र वाले ( संघी / हिन्दू समर्थक ) लोगों का विरोध आगरा व लखनऊ में होते मैंने स्वम्य देखा है। अतः जगदीश्वर जी का स्वामी दयानंद जी पर आरोप पूर्वाग्रह पूर्ण प्रतीत होता है और अवास्तविक एवं निराधार है।
------ ~विजय राजबली माथुर ©
Sunday, October 1, 2017
प्रेमचंद ने ब्राह्मणवादी चेतना के विरुद्ध जो शंखनाद किया था उसे भूल कर लगभग पूरी कायस्थ बिरादरी .......? ------ अश्विनी श्रीवास्तव
Ashwani Srivastava
यशवंत सिन्हा प्रसंग
प्रेमकुमार मणि
भाजपा नेता और भारत के पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा के लेख " I need to speak up now " ( इंडियन एक्सप्रेस , 27 सितम्बर ) ने तहलका मचा दिया है . यह लेख ऐसे समय पर आया है , जब गुजरात में प्रांतीय असेम्ब्ली के चुनाव होने जा रहे हैं और 2019 के तय लोकसभा चुनावों के भी बस डेढ़ साल रह गए हैं . मैं नहीं जानता , न ही इसकी जरुरत समझता हूँ कि श्री सिन्हा ने किसी व्यक्तिगत खुन्नस से ऐसा लिखा है . सिन्हा के तथ्य आंकड़ों से जुड़े हैं ,और उन्हें यूँ ही ख़ारिज नहीं किया जा सकता . न सिन्हा अर्थशास्त्री हैं , न जेटली , लेकिन दोनों वित्त मंत्री बने . एक पूर्व हो गए और दूसरे हैं . इसलिए सिन्हा के आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए . यह सच है कि आलोचना जब भीतर से फूटती है ,तब इसका अर्थ है मामला गंभीर है . राजीव गाँधी प्रचंड बहुमत के साथ मिस्टर क्लीन की छवि बनाये घूम रहे थे , लेकिन कांग्रेस के भीतर से ही जब वीपी सिंह ने बोफोर्स घोटाले के आरोप लगाए तब राजीव उससे उबर नहीं पाए . उस वक़्त भी इंडियन एक्सप्रेस ने ही पहल की थी . इस दफा ऐसा यदि हुआ , तब इंडियन एक्सप्रेस और सिन्हा दोनों एक बार फिर भावी इतिहास के उपकरण बनेंगे . राजीव गाँधी सरकार में वीपी सिंह भी वित्त मंत्री ही थे . रक्षा मंत्री बाद में बने थे .
लेकिन इस विवाद का एक दूसरा कोण भी हो सकता है . उस पर विचार करना बुरा नहीं होना चाहिए . क्या यह विवाद उस ब्राह्मण -कायस्थ संघर्ष की पुनरावृत्ति है , जो कुछ लोगों के अनुसार ख़त्म हो गई थी और मेरे जैसे लोगों के अनुसार हाइबरनेशन में चली गई थी ? दो सौ सालोँ तक यह लड़ाई जॉब चार्नक के शहर कोलकाता में चली . 1911 में जब कोलकाता से राजधानी उठकर दिल्ली आई तब यह लड़ाई भी दिल्ली चली आई . इस लड़ाई का पूरा ब्यौरा यहाँ एक पोस्ट में नहीं दिया जा सकता ,लेकिन देवासुर संग्राम ,महिषासुर -दुर्गा , शैव -वैष्णव या फिर बौद्ध -ब्राह्मण संग्राम की तरह यह संग्राम भी दिलचस्प है . शैव और वैष्णवों ने हाजीपुर के पास सांस्कृतिक समझौता किया था , वह स्थान आज भी हरि(विष्णु )हर (शिव ) अर्थात हरिहर क्षेत्र कहा जाता है और वहां हर साल विशाल मेला लगता है . बंगाल में कायस्थों और ब्राह्मणों की लड़ाई को थोड़ा विराम मिला रामकृष्ण -विवेकानंद के समझौते में . यह कायस्थों का ब्राह्मणवाद के प्रति समर्पण था . मैत्री भाव नहीं , गुरु चेला भाव . कायस्थों ने अपनी सांस्कृतिक क्रन्तिकारी भूमिका खो दी , और वर्णवादी ब्राह्मण परंपरा से जुड़ गए . इसीलिए हिंदुत्ववादी -ब्राह्मणवादी शक्तियां विवेकानंद का गुणगान करते थकतीं नहीं . पिछले पचास वर्षों में कायस्थों का इतना सांस्कृतिक पतन हुआ ,जिसका कोई हिसाब नहीं . प्रेमचंद ने ब्राह्मणवादी चेतना के विरुद्ध जो शंखनाद किया था उसे भूल कर लगभग पूरी कायस्थ बिरादरी आज संघ -भाजपा के ब्राह्मणवादी चौखटे पर माथा टेक चुकी है .
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लेकिन लगता है यशवंत सिन्हा ने सचमुच एक विद्रोह किया है . उन्होंने कर्पूरी ठाकुर के साथ काम किया है . वे थोड़े अक्खड़ हैं ,लेकिन डरपोक नहीं हैं . मैं अभी उनके अगले क़दमों का इंतज़ार करूँगा . कम से कम मेरी दिलचस्पी के पात्र तो वे हो ही गए हैं .
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'कायस्थ' वर्णाश्रम व्यवस्था से ऊपर :
पौराणिक-पोंगापंथी -ब्राह्मणवादी व्यवस्था मे जो छेड़-छाड़ विभिन्न वैज्ञानिक आख्याओं के साथ की गई है उससे 'कायस्थ' शब्द भी अछूता नहीं रहा है।
'कायस्थ'=क+अ+इ+स्थ
क=काया या ब्रह्मा ;
अ=अहर्निश;इ=रहने वाला;
स्थ=स्थित।
'कायस्थ' का अर्थ है ब्रह्म से अहर्निश स्थित रहने वाला सर्व-शक्तिमान व्यक्ति।
आज से दस लाख वर्ष पूर्व मानव जब अपने वर्तमान स्वरूप मे आया तो ज्ञान-विज्ञान का विकास भी किया। वेदों मे वर्णित मानव-कल्याण की भावना के अनुरूप शिक्षण- प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई। जो लोग इस कार्य को सम्पन्न करते थे उन्हे 'कायस्थ' कहा गया। क्योंकि ये मानव की सम्पूर्ण 'काया' से संबन्धित शिक्षा देते थे अतः इन्हे 'कायस्थ' कहा गया। किसी भी अस्पताल मे आज भी जेनरल मेडिसिन विभाग का हिन्दी रूपातंरण आपको 'काय चिकित्सा विभाग' ही लिखा मिलेगा। उस समय आबादी अधिक न थी और एक ही व्यक्ति सम्पूर्ण काया से संबन्धित सम्पूर्ण जानकारी देने मे सक्षम था। किन्तु जैसे-जैसे आबादी बढ़ती गई शिक्षा देने हेतु अधिक लोगों की आवश्यकता पड़ती गई। 'श्रम-विभाजन' के आधार पर शिक्षा भी दी जाने लगी। शिक्षा को चार वर्णों मे बांटा गया-
1- जो लोग ब्रह्मांड से संबन्धित शिक्षा देते थे उनको 'ब्राह्मण' कहा गया और उनके द्वारा प्रशिक्षित विद्यार्थी शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत जो उपाधि धारण करता था वह 'ब्राह्मण' कहलाती थी और उसी के अनुरूप वह ब्रह्मांड से संबन्धित शिक्षा देने के योग्य माना जाता था।
2- जो लोग शासन-प्रशासन-सत्ता-रक्षा आदि से संबन्धित शिक्षा देते थे उनको 'क्षत्रिय'कहा गया और वे ऐसी ही शिक्षा देते थे तथा इस विषय मे पारंगत विद्यार्थी को 'क्षत्रिय' की उपाधि से विभूषित किया जाता था जो शासन-प्रशासन-सत्ता-रक्षा से संबन्धित कार्य करने व शिक्षा देने के योग्य माना जाता था।
3-जो लोग विभिन व्यापार-व्यवसाय आदि से संबन्धित शिक्षा प्रदान करते थे उनको 'वैश्य' कहा जाता था। इस विषय मे पारंगत विद्यार्थी को 'वैश्य' की उपाधि से विभूषित किया जाता था जो व्यापार-व्यवसाय करने और इसकी शिक्षा देने के योग्य माना जाता था।
4-जो लोग विभिन्न सूक्ष्म -सेवाओं से संबन्धित शिक्षा देते थे उनको 'क्षुद्र' कहा जाता था और इन विषयों मे पारंगत विद्यार्थी को 'क्षुद्र' की उपाधि से विभूषित किया जाता था जो विभिन्न सेवाओं मे कार्य करने तथा इनकी शिक्षा प्रदान करने के योग्य माना जाता था।
ध्यान देने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि,'ब्राह्मण','क्षत्रिय','वैश्य' और 'क्षुद्र' सभी योग्यता आधारित उपाधियाँ थी। ये सभी कार्य श्रम-विभाजन पर आधारित थे । अपनी योग्यता और उपाधि के आधार पर एक पिता के अलग-अलग पुत्र-पुत्रियाँ ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और क्षुद्र हो सकते थे उनमे किसी प्रकार का भेद-भाव न था।'कायस्थ' चारों वर्णों से ऊपर होता था और सभी प्रकार की शिक्षा -व्यवस्था के लिए उत्तरदाई था। ब्रह्मांड की बारह राशियों के आधार पर कायस्थ को भी बारह वर्गों मे विभाजित किया गया था। जिस प्रकार ब्रह्मांड चक्राकार रूप मे परिभ्रमण करने के कारण सभी राशियाँ समान महत्व की होती हैं उसी प्रकार बारहों प्रकार के कायस्थ भी समान ही थे।
कालांतर मे व्यापार-व्यवसाय से संबन्धित वर्ग ने दुरभि-संधि करके शासन-सत्ता और पुरोहित वर्ग से मिल कर 'ब्राह्मण' को श्रेष्ठ तथा योग्यता आधारित उपाधि-वर्ण व्यवस्था को जन्मगत जाति -व्यवस्था मे परिणत कर दिया जिससे कि बहुसंख्यक 'क्षुद्र' सेवा-दाताओं को सदा-सर्वदा के लिए शोषण-उत्पीड़न का सामना करना पड़ा उनको शिक्षा से वंचित करके उनका विकास-मार्ग अवरुद्ध कर दिया गया।'कायस्थ' पर ब्राह्मण ने अतिक्रमण करके उसे भी दास बना लिया और 'कल्पित' कहानी गढ़ कर चित्रगुप्त को ब्रह्मा की काया से उत्पन्न बता कर कायस्थों मे भी उच्च-निम्न का वर्गीकरण कर दिया। खेद एवं दुर्भाग्य की बात है कि आज कायस्थ-वर्ग खुद ब्राह्मणों के बुने कुचक्र को ही मान्यता दे रहा है और अपने मूल चरित्र को भूल चुका है। कहीं कायस्थ खुद को 'वैश्य' वर्ण का अंग बता रहा है तो कहीं 'क्षुद्र' वर्ण का बता कर अपने लिए आरक्षण की मांग कर रहा है।
शूद्रक लिखित संस्कृत नाटक 'मृच्छ्कटिक ' में कायस्थों को निम्न जाति का वर्णन किया गया है और ब्राह्मणों का सहायक घोषित किया गया है। यह सब 'चित्रगुप्त' की संतान बताने की काल्पनिक ब्राह्मणवादी कहानी ( जिसे कायस्थ शिरोधार्य कर रहे हैं )का दुष्परिणाम है ।
यह जन्मगत जाति-व्यवस्था शोषण मूलक है और मूल भारतीय अवधारणा के प्रतिकूल है। आज आवश्यकता है योग्यता मूलक वर्ण-व्यवस्था बहाली की एवं उत्पीड़क जाति-व्यवस्था के निर्मूलन की।'कायस्थ' वर्ग को अपनी मूल भूमिका का निर्वहन करते हुये भ्रष्ट ब्राह्मणवादी -जातिवादी -जन्मगत व्यवस्था को ध्वस्त करके 'योग्यता आधारित' मूल वर्ण व्यवस्था को बहाल करने की पहल करनी चाहिए।
~विजय राजबली माथुर ©
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