Monday, September 27, 2010

अयोध्या विवाद साम्राज्यवादी साजिश



२४ सितम्बर 2010 शुक्रवार  को फैजाबाद की अदालत ने बाबरी मस्जिद/राम मंदिर विवाद में बौद्ध महा सभा का दावा खारिज कर दिया है,उत्तर  प्रदेश हाई कोर्ट के रुके फैसले पर  सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि वह जारी किया जाए या स्थगित रखा जाए.कुछ लोग मंदिर-मस्जिद समर्थकों में समझौता कराने की कोशिश कर रहे हैं,परन्तु सच्चाई कोई भी सामने आने देना नहीं चाहता.ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने सत्ता मुगलों से छीनी थी इसलिए शुरू में मुसलमानों को दबाया और १८५७ की क्रांति के बाद उन्हें उभारा उनका मुख्य उद्देश्य येन-केन-प्रकारेण अपनी सत्ता बनाये रखना था इसलिए वे यहाँ  सामाजिक सौहार्द्र नहीं बनने देना चाहते थे. 

महाभारत काल के बाद वैदिक मत क्षीण हो चुका था तमाम विसंगतियां उत्पन्न हो गयी थीं.अतः महात्मा बुद्ध ने उस पर करारा प्रहार किया.बौद्ध मत भारत ही नहीं विदेशों में भी फैला.भारत से नेपाल की तराई में बिहार-बंगाल तक बौद्ध मत के अनुयाई हो गए थे.बौद्ध मठों और विहारों की प्रचुरता थी.आज का बिहार तो विहारों की बहुतायात के ही कारण इस नाम को प्राप्त कर सका.वैष्णवों ने बौद्धों पर भीषण अत्याचार किये उनके मठों को उजाड़ा और विहारों को जलाया गया.इसलिए जब भारत में इस्लामी शासक आये तो बौद्धों ने उनका समर्थन और स्वागत किया तथा ख़ुशी-खुशी इस्लाम क़ुबूल कर लिया तथा अपने विहारों व मठों को मस्जिद में तब्दील कर दिया.इन्हीं में से एक वह मस्जिद अयोध्या की भी थी जिसका विवाद परिचर्चा में है. 

वास्तविकता यह है कि विवादित अयोध्या की स्थापना सम्राट हर्षवर्धन ने साकेत नाम से की थी जिसे कालान्तर में अयोध्या कहा जाने लगा परन्तु यह राम की जन्म भूमि नहीं है.राम के त्रेता युग की अयोध्या तो वर्तमान झारखंड के गिरिडीह जिले में है जो आज बिलकुल उपेक्षित है और उसके पुनरुद्दार पर किसी का भी ध्यान नहीं है.गोस्वामी तुलसी दास जी ने राम चरित मानस की रचना नाना पुराण निगमागम सम्मत और सर्वजन हिताय बहु जन सुखाय की थी जिस में राम-सीता विवाह वर्णन में जिन साधनों व समय का ज़िक्र किया गया है वह गिरिडीह से मिथिला पहुँचने का है.इस आज की अयोध्या से इतने कम समय में उन साधनों से नहीं पहुंचा जा सकता था.लेकिन आज के बुद्धिजीवी भी तथ्यों को सही सन्दर्भ में समझने को तैयार नहीं हैं तथा आस्था व विश्वास के नाम पर मरने और मारने की गुलाम मानसिकता से ग्रस्त है.

डाक्टर अम्बेडकर की द्वितीय पत्नी डाक्टर सविता अम्बेडकर जो ब्राह्मण पुत्री थीं इलाहबाद  हाईकोर्ट में बौद्ध मठ का  दावा करने आयीं थीं.वह कई दिन होटल में रुकने के बाद निराश हो कर लौट गयीं.कोई वकील उनकी रिट दायर करने को तैयार नहीं था,सच कोई भी सामने नहीं आने  देना चाहता था.तब भारतीय बौद्ध महासभा की ओर से बौद्ध भिक्षु दीपंकर धम्म ने फैजाबाद की अदालत में वाद संख्या १९/९१ के द्वारा विवादित स्थल को बौद्ध संपत्ति घोषित करने का दावा किया था.उन्होंने बताया कि इस का निर्माण बौद्ध अनुयायी विशाखा ने ''सुखा राम बौद्ध विहार''के रूप में कराया था.वह वाद तत्कालीन सिविल जज ने १० जुलाई १९९२ को अदम पैरवी में खारिज कर दिया जिस के बाद बौद्ध भिक्षु श्री धम्म ने १७ मई २००२ को वाज दायरा किया.उन्होंने बरेली के वकील महेंद्र प्रताप सिंह को पैरोकार नियुक्त किया था और बराबर फीस देते रहे जबकि वह वकील साः लगभग १०० वर्ष के हैं और वकालत छोड़ कर दिल्ली चले गए हैं.वादी के अधिवक्ता शत्रुहन गोस्वामी अब जिला न्यायाधीश के समक्ष रेगुलर सूट दायर करेंगे.

इस प्रकार हम देखते हैं कि आजादी के ६३ वर्ष बाद भी साम्राज्यवादी कुचक्र के तहत मंदिर/मस्जिद विवाद उभारा जाता है जबकि यह अयोध्या त्रेता युग के राम की है ही नहीं तो राम जन्म भूमि वहां कैसे हो गयी?
बौद्धों को उनकी वास्तविक संपत्ति वापिस की जानी चाहिए अथवा देश हित का कोई कार्य -संग्राहलय आदि वहां बनाना चाहिए तथा गुलामी के विवाद का सदा के लिए समाधान कर लेना चाहिए. 


Typist -यशवन्त


Sunday, September 26, 2010

प्रलय की भविष्यवाणी झूठी है-यह दुनिया अनूठी है--(अंतिम भाग)

(पिछली पोस्ट से आगे....)

प्रकृति में जितने भी जीव हैं उनमे मनुष्य ही केवल मनन करने के कारण श्रेष्ठ है,शेष जीव ज्ञान और विवेक द्वारा अपने उपार्जित कर्मफल को अच्छे या बुरे में बदल सकता है.कर्म तीन प्रकार के होते हैं-सद्कर्म का फल अच्छा,दुष्कर्म का फल बुरा होता है.परन्तु सब से महत्वपूर्ण अ-कर्म होता है  जिसका अक्सर लोग ख्याल ही नहीं करते हैं.अ-कर्म वह कर्म है जो किया जाना चाहिए था किन्तु किया नहीं गया.अक्सर लोगों को कहते सुना जाता है कि हमने कभी किसी का बुरा नहीं किया फिर हमारे साथ बुरा क्यों होता है.ऐसे लोग कहते हैं कि या तो भगवान है ही नहीं या भगवान के घर अंधेर है.वस्तुतः भगवान के यहाँ अंधेर नहीं नीर क्षीर विवेक है परन्तु पहले भगवान को समझें तो सही कि यह क्या है--किसी चाहर दिवारी में सुरक्षित काटी तराशी मूर्ती या  नाडी के बंधन में बंधने वाला नहीं है अतः उसका जन्म या अवतार भी नहीं होता.भगवान तो घट घट वासी,कण कण वासी है उसे किसी एक क्षेत्र या स्थान में बाँधा नहीं जा सकता.भगवान क्या है उसे समझना बहुत ही सरल है--अथार्त भूमि,-अथार्त गगन,व्-अथार्त वायु, I -अथार्त अनल (अग्नि),और -अथार्त-नीर यानि जल,प्रकृति के इन पांच तत्वों का समन्वय ही भगवान है जो सर्वत्र पाए जाते हैं.इन्हीं के द्वारा जीवों की उत्पत्ति,पालन और संहार होता है तभी तो GOD अथार्त Generator,Operator ,Destroyer  इन प्राकृतिक तत्वों को  किसी ने बनाया नहीं है ये खुद ही बने हैं इसलिए ये खुदा हैं.

जब भगवान,गौड और खुदा एक ही हैं तो झगड़ा किस बात का?परन्तु झगड़ा है नासमझी का,मानव द्वारा मनन न करने का और इस प्रकार मनुष्यता से नीचे गिरने का.इस संसार में कर्म का फल कैसे मिलता है,कब मिलता है सब कुछ एक निश्चित प्रक्रिया के तहत ही होता है जिसे समझना बहुत सरल है किन्तु निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा जटिल बना दिया गया है.हम जितने भी सद्कर्म,दुष्कर्म या अकरम करते है उनका प्रतिफल उसी अनुपात में मिलना तय है,परन्तु जीवन काल में जितना फल भोग उसके अतिरिक्त कुछ शेष भी बच जाता है.यही शेष अगले जनम में प्रारब्ध(भाग्य या किस्मत) के रूप में प्राप्त होता है.अब मनुष्य अपने मनन द्वारा बुरे को अच्छे में बदलने हेतु एक निश्चित प्रक्रिया द्वारा समाधान कर सकता है.यदि समाधान वैज्ञानिक विधि से किया जाए तो सुफल परन्तु यदि ढोंग-पाखंड विधि से किया जाये तो प्रतिकूल फल मिलता है.

प्रारब्ध को समझने हेतु जन्म समय के ग्रह-नक्षत्रों से गणना करते हैं और उसी के अनुरूप समाधान प्रस्तुत करते हैं.अधिकाँश लोग इस वैज्ञानिक नहीं चमत्कार का लबादा ओड़ कर भोली जनता को उलटे उस्तरे से मूढ़ते हैं.गाँठ के पूरे किन्तु अक्ल के अधूरे लोग तो खुशी खुशी मूढ़ते हैं लेकिन अभावग्रस्त  पीढित लोगों को भी भयाक्रांत करके जबरन मूढा जाता है जो कि ज्योतिष के नियमों के विपरीत है.ज्योतिष में २+२=४ ही होंगे किन्तु जब पौने चार या सवा चार बता कर लोगों को गुमराह किया जाए तो वह ज्योतिष नहीं ठगी का उदहारण बन जाता है .ज्योतिष जीवन को सही दिशा में चलाने के संकेत देता है.बस आवश्यकता है सही गणना करने की और समय को साफ़ साफ़ समझने और समझाने की.जिस प्रकार धूप या वर्षा को हम रोक तो नहीं सकते परन्तु उसके प्रकोप से बचने हेतु छाता और बरसाती का प्रयोग कर लेते हैं उसी प्रकार जीवन में प्रारब्ध के अनुसार आने वाले संकटों का पूर्वानुमान लगाकर उनसे बचाव का प्रबंध किया जा सकता है और यही ज्योतिष विज्ञान का मूल आधार है.कुछ लोग अपने निजी स्वार्थों के कारण इस ज्योतिष का व्यापारीकरण करके इसके वैज्ञानिक आधार को क्षति पहुंचा देते हैं उन से बचने और बचाने की आवश्यकता है.मनुष्य अपने ग्रह-नक्षत्रों द्वारा नियंत्रित पर्यावरण की उपज है.

पर्यावरण को शुद्ध रखना और ग्रह नक्षत्रों का शमन करना ज्योतिष विज्ञान सिखाता है.हम ज्योतिष के वैज्ञानिक नियमों का पालन कर के अनूठी दुनिया  का अधिक से अधिक लुत्फ़ उठा सकते हैं.आवश्यकता है सच को सच स्वीकार करने की और अपनी इस धरती को तीन लोक से न्यारी बनाने की. 

Typist -यशवन्त

Friday, September 24, 2010

प्रलय की भविष्यवाणी झूठी है-ये दुनिया अनूठी है

एक समय हमारे देश में जगन मिथ्या का मिथ्या का पाठ पढाया जाने लगा था.मध्य अमेरिकी माया सभ्यता ने पहले पहल भविष्यवाणी की थी कि,21  दिसंबर 2012  को यह दुनिया समाप्त हो जाएगी.प्राचीन चीनी पुस्तक चाइनीज़ बुक  ऑफ चेंजेज़ एवं बाइबिल तथा कुछ पौराणिक ग्रन्थ भी ऐसी ही संभावना व्यक्त करते हैं.आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार अमेरिका का येलो स्टोन नेशनल पार्क गर्म सोतों का क्षेत्र है जो दुनिया के सबसे बड़े ज्वालामुखी के ऊपर स्थित है.वैज्ञानिकों के अनुसार हर साड़े छः लाख वर्ष बाद यह ज्वालामुखी फटता है.वैसे यह समय निकल चुका है किन्तु भू-गर्भ वैज्ञानिक २०१२ में इसके फटने का अनुमान लगा रहे हैं.लन्दन की एक महिला ने 1970  के आस पास भविष्यवाणी की थी कि world  will  end  in  1991 .उन्नीस वर्ष बाद भी दुनिया अपनी जगह कायम है.फ्रांसीसी भविष्य वेत्ता नेस्त्रादम ने 1999 में चीन द्वारा अमेरिका पर आक्रमण किये जाने से तृतीय विश्व युद्ध होने की बात कही थी जो नहीं हुआ.वर्ष 2004 में बाबा जी पत्रिका में भविष्यवाणी छपी थी कि पूर्व प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी 15 दिन के भीतर सत्ता में वापिस आ जायेंगे.आखिर सभी भविष्यवाणियाँ थोथी क्यों सिद्ध हुईं?बर्कले विश्वविद्यालय के भौतिकी वैज्ञानिकों समेत सभी की भविष्यवाणियाँ 2012 में प्रलय का खौफ पैदा कर सकती हैं परन्तु प्रलय लाने में कामयाब नहीं होंगी-आखिर क्यों?इस अनूठी दुनिया को समझने का  यथार्थ रहस्य हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने शुद्ध वैज्ञानिक आधार पर बहुत पहले ही खोज रखा है-आवश्यकता है बुद्धि का सही प्रयोग कर उसे समझने की.
किसी भी विषय के क्रमबद्ध एवं नियम बद्ध अध्ययन को विज्ञान कहते हैं और विज्ञान के नियमों में एक निश्चित अनुपात रहता है.उदाहरण के तौर पर -हाइड्रोजन के दो भाग और ऑक्सीजन का एक भाग मिलने से पानी बनेगा.अब यदि हाइड्रोजन के दो भाग के साथ ऑक्सीजन भी दो भाग मिला देंगे तो वह हाइड्रोजन पराक्साइड बनकर उड़ जायेगा.यजुर्वेद 40/5  के अनुसार तद दूरे तदवान्तक अथार्त सम्पूर्ण  ब्रह्मांड में विद्यमान होने के कारण परमात्मा दूर से भी दूर व पास से भी पास है.यजुर्वेद 31 -3 के अनुसार परमात्मा के 1 /4 भाग में यह ब्रह्मांड विद्यमान है अतः ब्रह्मांड के 3 /4 भाग में परमात्मा है.परमात्मा अथार्त ब्रह्मा का दिन और रात कितने समय का है वह इस गणना से स्पष्ट होगा:-
कलयुग-4 लाख 32 हज़ार वर्ष
द्वापर युग (कल*2 )-8 लाख 64 हज़ार वर्ष
त्रेता युग (कल*3 )-12 लाख 96 हज़ार वर्ष
सत युग (कल*4 )-17 लाख 28 हज़ार वर्ष
एक चतुर्युगी=43 लाख 20 हज़ार वर्ष
एक हज़ार चतुर्युगी=43 लाख 20 हज़ार*1000
अथार्त 4 अरब 32 करोड़ वर्ष का ब्रह्मा का एक दिन और इतना ही समय रात का होता है.
दिन अथार्त सृष्टि और रात अथार्त प्रलय.
वर्तमान समय में इस सृष्टि का 1 अरब 97 करोड़ 29 लाख 49 हज़ार 110 वां वर्ष चल  रहा है  अथार्त अभी भी २ अरब ३४ करोड़ ७० लाख ५० हज़ार ८९० वर्ष यह सृष्टी चलेगी उसी के बाद प्रलय होगी.अतः उससे पूर्व २०१२ या कभी भी प्रलय - भविष्य वाणी अवैज्ञानिक होने के कारण झूठी ही सिद्ध होगी.
मुंबई के श्री वेंकटेश्वर शताब्दी पञ्चांग (जो संवत 2100 तक का है) के अनुसार 21 दिसंबर 2012 को ग्रह स्थिति निम्न प्रकार होगी-
दिन-शुक्रवार
तिथी-नवमी
सूर्य-धनु राशी में
चन्द्रमा-मीन राशी में
मंगल-मकर राशी में
बुध-वृश्चिक राशी में
गुरु -वृष राशी में
शुक्र-वृश्चिक राशी में
शनि-तुला राशी में
राहू-वृश्चिक राशी में
केतु-वृष राशी में
हम और आप जिस दुनिया में रह रहे हैं वह अभी ख़तम होने वाली नहीं है,घबराइये नहीं और परमात्मा की कृति इस इस अनूठी दुनिया में अपने जीवन का भरपूर लुत्फ़ उठाइए.यह दुनिया है क्या और यह जीवन क्या है?यह सृष्टी यह दुनिया तीन तत्वों पर आधारित है-आत्मा,परमात्मा और प्रकृति.इनमे से एक को भी कम करदें तो यह सृष्टी नहीं चल सकती.परमात्मा और आत्मा सखा हैं अजर और अमर हैं,प्रकृति भी नष्ट नहीं होती है परन्तु उस का रूपांतरण हो जाता है.प्रकृति में समस्त पदार्थ ठोस,द्रव और गैस  हैं,ठोस रूप में वह बर्फ है,द्रव रूप में जल  और गैस रूप में हाइड्रोजन व् ऑक्सीजन के परमाणुओं में बदल जाता है.प्रकृति में सत रज और तम के परमाणुओं का सम्मिश्रण पाया जाता है और ये विषम अवस्था में होते हैं तभी सृष्टी का संचालन होता है.इन तीनों की सम अवस्था ही प्रलय की अवस्था है.प्रकृति में हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है और कोई भी दो तत्व मिल कर तीसरे का सृजन करते हैं.उदाहरण के लिए गाय के गोबर और दही को एक सम अवस्था में  किसी मिटटी के बर्तन में वर्षा ऋतु में बंद कर के रख दें तो बिच्छू का उद्भव हो जायेगा जो घातक जीव है,जबकि गोबर और दही दोनों ही मानव के लिए कल्याणकारी हैं.अब यदि rectified sprit में बिच्छू को पकड कर डाल दें और जब स्प्रिट में उसका विलयन हो जाए तो फ़िल्टर से छान कर सुरक्षित रखने पर वही बिच्छू दंश उपचार हेतु सटीक औषधी  है.हम देखते हैं कि गोबर  और दही की क्रिया पर प्रतिक्रिया स्वरुप बिच्छू,और बिच्छू और स्प्रिट की क्रिया पर बिच्छू काटे में उपचार हेतु दवा प्राप्त हो जाती है.
शेष अगली पोस्ट में.......
(विशेष-मेरा यह आलेख मई २०१० में  लखनऊ के एक साप्ताहिक समाचार पत्र में प्रकाशित हो चुका है,जन कल्याणार्थ इसे यहाँ भी प्रस्तुत किया जा रहा है.)
Typist -यशवन्त माथुर  

Thursday, September 23, 2010

ज्योतिष और हम

अक्सर यह चर्चा सुनने को मिलती है की ज्योतिष का सम्बन्ध मात्र धर्म और आध्यात्म से है.यह विज्ञान सम्मत नहीं है और यह मनुष्य को भाग्य के भरोसे जीने को मजबूर कर के अकर्मण्य बना देता है.परन्तु ऐसा कथन पूर्ण सत्य नहीं है.ज्योतिष पूर्णतः एक विज्ञान है.वस्तुतः विज्ञान किसी भी विषय के नियम बद्द एवं क्रमबद्द अध्ययन को कहा जाता है.ज्योतिष के नियम खगोलीय गणना पर आधारित हैं और वे पूर्णतः वैज्ञानिक हैं वस्तुतः ज्योतिष में ढोंग पाखण्ड का कोंई स्थान नहीं है.परन्तु फिर भी हम देखते हैं कि कुछ लोग अपने निजी स्वार्थों की खातिर जनता को दिग्भ्रमित कर के ठगते हैं और उन्हीं के कारण सम्पूर्ण ज्योतिष विज्ञान पर कटाक्ष किया जाता है.यह एक गलत क्रिया की गलत प्रतिक्रिया है.जहाँ तक विज्ञान के अन्य विषयों का सवाल है वे What & How का तो जवाब देते हैं परन्तु उनके पास Why का उत्तर नहीं है.ज्योतिष विज्ञान में इस Why का भी उत्तर मिल जाता है.
जन्म लेने वाला कोई भी बच्चा अपने साथ भाग्य (प्रारब्ध) लेकर आता है.यह प्रारब्ध क्या है इसे इस प्रकार समझें कि हम जितने भी कार्य करते हैं,वे तीन प्रकार के होते हैं-सद्कर्म,दुष्कर्म और अकर्म.
यह तो सभी जानते हैं की सद्कर्म का परिणाम शुभ तथा दुष्कर्म का अशुभ होता है,परन्तु जो कर्म किया जाना चाहिए और नहीं किया गया अथार्त फ़र्ज़ (duity) पूरा नहीं हुआ वह अकर्म है और इसका भी परमात्मा से दण्ड मिलता है.अतएव सद्कर्म,दुष्कर्म,और अकर्म के जो फल इस जन्म में प्राप्त नहीं हो पाते वह आगामी जन्म के लिए संचित हो जाते हैं.अब नए जन्मे बच्चे के ये संचित कर्म जो तीव्रगामी होते हैं वे प्रारब्ध कहलाते हैं और जो मंदगामी होते हैं वे अनारब्ध कहलाते हैं.मनुष्य अपनी बुद्धि व् विवेक के बल पर इस जन्म में सद्कर्म ही अपना कर ज्ञान के द्वारा अनारब्ध कर्मों के दुष्फल को नष्ट करने में सफल हो सकता है और मोक्ष भी प्राप्त कर सकता है.मोक्ष वह अवस्था है जब आत्मा को कारण और सूक्ष्म शरीर से भी मुक्ति मिल जाती है.और वह कुछ काल ब्रह्मांड में ही स्थित रह जाता है.ऐसी मोक्ष प्राप्त आत्माओं को संकटकाल में परमात्मा पुनः शरीर देकर जन-कल्याण हेतु पृथ्वी पर भेज देता है.भगवान् महावीर,गौतम बुद्ध,महात्मा गांधी,स्वामी दयानंद ,स्वामी विवेकानंद,आदि तथा और भी बहुत पहले मर्यादा पुरषोत्तम श्री राम एवं योगी राज श्री कृष्ण तब अवतरित हुए जब पृथ्वी पर अत्याचार अपने चरम पर पहुँच गया था.
जब किसी प्राणी की मृत्यु हो जाती है तो वायु,जल,आकाश,अग्नि और पृथ्वी इन पंचतत्वों से निर्मित यह शरीर तो नष्ट हो जाता है परन्तु आत्मा के साथ-साथ कारण शरीर और सूक्ष्म शरीर मोक्ष प्राप्ति तक चले चलते हैं और अवशिष्ट संचित कर्मफल के आधार पर आत्मा भौतिक शरीर को प्राप्त कर लेती है जो उसे अपने किये कर्मों का फल भोगने हेतु मिला है.यदि जन्म मनुष्य योनी में है तो वह अपनी बुद्धि व विवेक के प्रयोग द्वारा मोक्ष प्राप्ति का प्रयास कर सकता है.
बारह राशियों में विचरण करने के कारण आत्मा के साथ चल रहे सूक्ष्म व कारण शरीर पर ग्रहों व नक्षत्रों का प्रभाव स्पष्ट अंकित हो जाता है.जन्मकालीन समय तथा स्थान के आधार पर ज्योतिषीय गणना द्वारा बच्चे की जन्म-पत्री का निर्माण किया जाता है और यह बताया जा सकता है कि कब कब क्या क्या अच्चा या बुरा प्रभाव पड़ेगा.अच्छे प्रभाव को प्रयास करके प्राप्त क्या जा सकता है और लापरवाही द्वारा छोड़ कर वंचित भी हुआ जा सकता है.इसी प्रकार बुरे प्रभाव को ज्योतिष विज्ञान सम्मत उपायों द्वारा नष्ट अथवा क्षीण किया जा सकता है और उस के प्रकोप से बचा जा सकता है.जन्मकालीन नक्षत्रों की गणना के आधार पर भविष्य फल कथन करने वाला विज्ञान ही ज्योतिष विज्ञान है.
ज्योतिष कर्मवान बनाता है
ज्योतिष विज्ञान से यह ज्ञात करके कि समय अनुकूल है तो सम्बंधित जातक को अपने पुरुषार्थ व प्रयास से लाभ उठाना चाहिए.यदि कर्म न किया जाये और प्रारब्ध के भरोसे हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहे तो यह अवसर निष्फल चला जाता है.इसे एक उदहारण से समझें कि माना आपके पास कर्णाटक एक्सप्रेस से बंगलौर जाने का reservation है और आप नियत तिथि व निर्धारित समय पर स्टेशन पहुँच कर उचित plateform पर भी पहुँच गए पर गाड़ी आने पर सम्बंधित कोच में चढ़े नहीं और plateform पर ही खड़े रह गए.इसमें आपके भाग्य का दोष नहीं है.यह सरासर आपकी अकर्मण्यता है जिसके कारण आप गंतव्य तक नहीं पहुँच सके.इसी प्रकार ज्योतिष द्वारा बताये गए अनुकूल समय पर तदनुरूप कार्य न करने वाले उसके लाभ से वंचित रह जाते हैं.लेकिन यदि किसी की महादशा/अन्तर्दशा अथवा गोचर ग्रहों के प्रभाव से खराब समय चल रहा है तो ज्योतिष द्वारा उन ग्रहों को ज्ञात कर के उनकी शान्ति की जा सकती है और हानि से बचा भी जा सकता है,अन्यथा कम किया जा सकता है.
ज्योतिष अकर्मण्य नहीं बनाता वरन यह कर्म करना सिखाता है.परमात्मा द्वारा जीवात्मा का नाम क्रतु रखा गया है.क्रतु का अर्थ है कर्म करने वाला.जीवात्मा को अपने बुद्धि -विवेक से कर्मशील रहते हुए इस संसार में रहना होता है.जो लोग अपनी अयोग्यता और अकर्मण्यता को छिपाने हेतु सब दोष भगवान् और परमात्मा पर मढ़ते हैं वे अपने आगामी जन्मों का प्रारब्ध ही प्रतिकूल बनाते हैं.
ज्योतिष अंधविश्वास नहीं
कुछ निहित स्वार्थी तत्वों ने ज्योतिष विज्ञान का दुरूपयोग करते हुए इसे जनता को उलटे उस्तरे से मूढने का साधन बना डाला है.वे लोग भोले भाले एवं धर्मभीरु लोगों को गुमराह करके उनका मनोवैज्ञानिक ढंग से दोहन करते हैं और उन्हें भटका देते हैं.इस प्रकार से पीड़ित व्यक्ति ज्योतिष को अंधविश्वास मानने लगता है और इससे घृणा करनी शुरू कर देता है.ज्योतिषीय ज्ञान के आधार पर होने वाले लाभों से वंचित रहकर ऐसा प्राणी घोर भाग्यवादी बन जाता है और कर्महीन रह कर भगवान को कोसता रहता है.कभी कभी कुछ लोग ऐसे गलत लोगों के चक्रव्यूह में फंस जाते हैं,जिन के लिए ज्योतिष गंभीर विषय न हो कर लोगों को मूढने का साधन मात्र होता है.इसी प्रकार कुछ कर्म कांडी भी कभी -कभी ज्योतिष में दखल देते हुए लोगों को ठग लेते हैं. साधारण जनता एक ज्योतिषी और ढोंगी कर्मकांडी में विभेद नहीं करती और दोनों को एक ही पलड़े पर रख देती है.इससे ज्योतिष विद्या के प्रति अनास्था और अश्रद्धा उत्पन्न होती है और गलतफहमी में लोग ज्योतिष को अंधविश्वास फैलाने का हथियार मान बैठते हैं.जबकि सच्चाई इसके विपरीत है.मानव जीवन को सुन्दर,सुखद और समृद्ध बनाना ही वस्तुतः ज्योतिष का अभीष्ट है.
क्या ग्रहों की शांति हो सकती है?
यह संसार एक परीक्षालय(Examination Hall) है और यहाँ सतत परीक्षा चलती रहती है.परमात्मा ही पर्यवेक्षक(Invegilator) और परीक्षक (Examiner) है. जीवात्मा कार्य क्षेत्र में स्वतंत्र है और जैसा कर्म करेगा परमात्मा उसे उसी प्रकार का फल देगा.आप अवश्य ही जानना चाहेंगे कि तब ग्रहों की शांति से क्या तात्पर्य और लाभ हैं?मनुष्य पूर्व जन्म के संचित प्रारब्ध के आधार पर विशेष ग्रह-नक्षत्रों की परिस्थिति में जन्मा है और अपने बुद्धि -विवेक से ग्रहों के अनिष्ट से बच सकता है.यदि वह सम्यक उपाय करे अन्यथा कष्ट भोगना ही होगा.जिस प्रकार जिस नंबर पर आप फोन मिलायेंगे बात भी उसी के धारक से ही होगी,अन्य से नहीं.इसी प्रकार जिस ग्रह की शांति हेतु आप मंत्रोच्चारण करेंगे वह प्रार्थना भी उसी ग्रह तक हवन में दी गयी आपकी आहुति के माध्यम से अवश्य ही पहुंचेगी.अग्नि का गुण है उसमे डाले गए पदार्थों को परमाणुओं (Atoms) में विभक्त करना और वायु उन परमाणुओं को मन्त्र के आधार पर ग्रहों की शांति द्वारा उनके प्रकोप से बच सकता है.प्रचलन में लोग अन्य उपाय भी बताते हैं परन्तु उन से ग्रहों की शांति होने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं मिलता,हाँ मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ सकता है.

Thursday, September 16, 2010

ब्रह्मवर्चसी जायताम आराष्ट्रे

यजुर्वेद के अध्याय २२ के मन्त्र संख्या २२ ''ॐ आ ब्राह्मन........वीरो जयताम......योगक्षेमों न कल्पताम'' का स्वामी भवानी दयाल जी द्वारा हिंदी काव्यानुवाद का अवलोकन करें-
ब्राह्मन!स्वराष्ट्र में हों द्विज ब्रह्म तेजधारी
क्षत्रिय महारथी हों,अरिदल विनाश कारी
होवें दुधारू गौवें ,वृष अश्व आशु वाही
आधार राष्ट्र की हों नारी सुभग सदा ही
बलवान सभ्य योद्धा,यजमान पुत्र होवें
इच्छानुसार वर्षें,पर्जन्य ताप धोवें
फल फूल से लदीं हों,औषध अमोघ सारी
हो योगक्षेम्कारी,स्वाधीनता हमारी.
युगदृष्टा मूलशंकर तिवारी जो महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती के नाम से जाने जाते है,मूल नक्षत्र में जन्म लेने के कारण मौलिक या मूल ज्ञान के पक्षधर रहे उन्होंने प्रत्येक गृहस्थ के पालन हेतु जिन वेद मन्त्रों का संकलन किया है उन में इस मन्त्र का राष्ट्रीय चेतना के रूप में विशेष महत्त्व है.वेद सृष्टि के आदि काल में पिछली सृष्टि की मोक्ष प्राप्त आत्माओं के इस सृष्टि के वैदिक ज्ञान प्रदाता ऋषियों के मुख से आम जन के समक्ष आये.सुन कर याद किये जाने के कारण इन्हें श्रुति और स्मृति भी कहा जाता है.महाभारत काल के बाद जब वैदिक ज्ञान क्षीण होने लगा तो समाज में विकृति आने लगी और अब से लगभग १३ सौ वर्ष पूर्व हम गुलामी के भंवर जाल फंसते गए.उस समय के शासकों को खुश करने के लिए और इनाम में धन व् रुतबा पाने के लिए हमारे विद्वानों ने कुरआन की तर्ज़ पर पुराण रच लिए तथा अपनी संस्कृति व् ज्ञान को नष्ट कर दिया.राष्ट्रवादी महापुरुषों मर्यादा पुरषोत्तम श्री राम व् योगी राज श्री कृष्ण को अवतार घोषित कर के उनके कृत्यों को अलौकिक बना दिया अथार्त पूज्य जबकि अनुकरणीय बनाया जाना चाहिए था तभी हमारी राष्ट्रीयता की अस्मिता की रक्षा हो सकती थी.गुरु नानक,कबीर आदि संतों ने जनता को जगाने की भरपूर कोशिश की किन्तु ''पराधीन सपनेहूँ सुख नाहीं''का सन्देश देने वाले गोस्वामी तुलसीदास जी के ग्रन्थों को संस्कृति के रखवालों की नगरी काशी में जला डाला गया और उन्हें अवधी की शरण लेनी पड़ी.
जनता पार्टी के शासन में हिमाचल यूनिवर्सिटी के उप कुलपति रहे डाक्टर गणपति चन्द्र गुप्त ने १९६८ में छपे ''साप्ताहिक हिन्दुस्तान'' के अपने लेख में लिखा था की देश में क्षेत्रीय राष्ट्रवाद तीव्र है.उदाहरण के तौर पर उन्होंने बताया की राजस्थान में ''म्हारो देस'' तथा पंजाब में ''साड्डा देस पंजाब मारा''के गीत गाये जाते हैं.उन्होंने कहा की बंकिम बाबु के वन्दे मातरम में भी -''सुजलाम,सुफलाम,मलयज शीतलाम'' में ''बंग'' की कल्पना है भारत की नहीं.
साम्राज्यवादियों ने भारत को प्रायदीप (सब कंटीनेंट)इसीलिए कहा की वे इसे बहु राष्ट्र मानते हैं.पहले पाकिस्तान फिर बांगला देश राष्ट्र बने.काश्मीर में अलगाववादी संघर्ष चलता रहता है.मिजोरम और नागालैंड में भी ऐसा हो चुका है.सिर्फ जनता ही सम्पूर्ण भारत को एक राष्ट्र मानती है.बड़े विद्वान समय -समय पर क्षेत्रीय राष्ट्रवाद को हवा देते रहते हैं जो की देश हित की बात नहीं है.अब तो चिदम्बरम भी हिंदी बोलने लगे हैं और करूणानिधि भी अब हिंदी विरोधी नहीं हैं.हिन्दी सम्पूर्ण भारत को एक राष्ट्र के रूप में मानने वाली भाषा है कोई क्षेत्रीय भाषा नहीं है.क्षेत्रीय भाषाएँ तो ब्रज,अवधी,भोजपुरी,मैथिलि आदि हैं और उन का हिंदी से कोई विरोध नहीं है.मन्ना डे और ए.आर.रहमान बांगला और तमिल भाषी होते हुए भी हिंदी के अच्छे गायक हैं.लता मंगेशकर और आशा भोंसले मराठी होते हुए भी हिंदी भाषियों में लोकप्रिय हैं. हिंदी संविधान के अनुसार तो राजभाषा के साथ राष्ट्र भाषा है ही जनता उसे केवल राष्ट्र भाषा मानती है,राज भाषा तो अभी तक बनी ही नहीं.अफ़सोस है आज हिंदी के बड़े-बड़े विद्वान् राष्ट्रीयता शब्द को यूरोप के देन बताते हैं.जब हमारे यहाँ वेदों का जय घोष हो रहा था यूरोप वासी नंगे रहते व् पेड़ों पर निवास किया करते थे.हमारे हिंदी के विद्वान् आज उसी यूरोप के एनसाईंक्लोपीडिया और विकिपीडिया को ब्रह्म वाक्य मान कर भारत को राष्ट्र के रूप में अपूर्ण मानते हैं. वस्तुतः जब हम कहते हैं-''ॐ नमः शिवाय च'' तो संत श्याम जी पराशर के अनुसार उसका अर्थ होता है--''the salutation to that lord the benifactor of all ''.उन के अनुसार भारत के उत्तर में बर्फीला हिमालय शिव के मस्तक का अर्ध चन्द्र है और सर से निकलती गंगा मानसरोवर (तिब्बत)से इसके उदगम का प्रतीक है जब की ''शिव''अथार्त हमारा भारत राष्ट्र है.राम चरित मानस में तुलसी दास ने राम से कहलाया है-''जो सिव द्रोही सो मम द्रोही'' अथार्त भारत से द्वेष रखने वाला राम भक्त नहीं हो सकता.इसी प्रकार राम को मानने वाले को भारत भक्ति अथार्त भारतीय राष्ट्रवाद पर शक नहीं करना चाहिए और विदेशों का मुहं नहीं ताकना चाहिए.