Tuesday, February 8, 2011

वीर -भोग्या वसुंधरा

 आज वसंत पंचमी है-सरस्वती पूजा.सुनिये एक छोटी स्तुति-



सरस्वती परमात्मा क़े उस स्वरूप को कहते हैं जिसके द्वारा हम ज्ञान-विज्ञान  ,बुद्धि,विवेक  को अर्जित करते हैं.जिस प्रकार किसी संस्था या संगठन की स्थापना से पूर्व उसके लिये नियम-विधान बनाये जाते हैं.उसी प्रकार परमात्मा ने सृष्टि क़े सृजन से पूर्व मनुष्यों द्वारा पालन करने हेतु नियमों की संरचना वेदों क़े रूप में की.मनुष्य है ही मनुष्य इसलिए कि,उसमें मनन करने की क्षमता है,अन्य किसी भी प्राणी को परमात्मा ने यह योग्यता नहीं दी है.पूर्व-सृष्टि की मोक्ष -प्राप्त आत्माओं को परमात्मा ने अंगिरा आदि ऋषियों क़े रूप में वेद-ज्ञान प्रदान करने हेतु प्रथ्वी पर अवतरित किया.परमात्मा स्वंय अवतार नहीं लेता है न ही नस और नाडी क़े बंधन में बंधता है जैसा कि,पोंगा-पंथियों ने प्रचारित कर रखा है.,ढोंगियों-पाखंडियों ने वेद-विपरीत अपने निहित स्वार्थ में गलत पूजा पद्धतियाँ विकसित कर ली हैं.आज आम जनता उन्हीं दुश्चक्रों में फंस कर अपना अहित करती जाती और दुखी होती रहती है.आज ज्ञान-विज्ञान क़े देवता सरस्वती की पूजा क़े अवसर पर एक बार फिर सबको पाखण्ड से बचने हेतु प्रेरित करने का छोटा सा प्रयास इस लेख क़े माध्यम से कर रहा हूँ.

देवता वह है जो देता है और बदले में लेता नहीं है,जैसे-वृक्ष  ,नदी,वायु,बादल(मेघ),अग्नि,भूमि,अंतरिछ आदि.अतः जो लोग इनसे अलग देवता की कल्पना कर पूजते हैं ,निश्चय ही वेद-विपरीत आचरण करते हैं जो परमात्मा क़े निर्देशों का खुला उल्लंघन नहीं तो और क्या है?.फिर कष्ट भोगने पर परमात्मा को कोसते है और अपनी गलती को सुधारते नहीं.क्योंकि ढोंगी-पाखंडी सुधार होने नहीं देना चाहते.दोषी कौन?

आज कल एक रिवाज़ चल रहा है वैज्ञानिक धर्म को अवैज्ञानिक बताने का.आज क़े तथा-कथित वैज्ञानिक सुनियोजित तरीके से प्रचार करते हैं कि,धर्म-ज्योतिष आदि अवैज्ञानिक ,ढोंग एवं टोटका हैं.अज्ञान की इंतिहा इस से ज्यादा क्या होगी?जो वास्तव में अविज्ञान है,टोटका और टोना,ढोंग तथा पाखण्ड है उसे तो पूजा जाता है और ऐसा वे तथा-कथित साईंस्दा ही ज्यादा करते हैं.बनारस जो धर्म-नगरी समझा जाता है वहीं से सम्बंधित लोग ऐसा करने में अग्रणी हैं.यह कोई आज नयी बात नहीं है.बनारस क़े ही तथा कथित विद्वानों ने जो उस समय क़े शासकों क़े अनुगामी थे पहले तो गोस्वामी तुलसी दास जी क़े लिखित ग्रन्थ को जलाना  शुरू किया और जब उन्होंने बनारस शहर छोड़ कर अवधी में 'राम चरित मानस'की रचना करके जनता का आव्हान शासन व्यवस्था को उलट देने का किया तो कुचक्र चला कर मानस को पूज्य बना दिया गया और राम को अवतार ,भगवान् आदि घोषित कर दिया गया जिससे आम जनता उनके चरित्र  का आचरण न करने की सोचे तथा पंगु ही बनी रहे और शासकों की लूट बरकरार रहे.राम ने साम्राज्यवादी रावण का संहार करके भारतीय राष्ट्रवाद की रक्षा की थी. अब आप उन्हें भगवान् का अवतार मानें तब आप वैसा ही कैसे कर सकते हैं और नहीं कर भी रहे हैं.तब लुटते  रहिये फिर क्यों रोते हैं हमारा धन स्विस बैकों में क्यों पहुंचा ? हम गण-तन्त्र में भी औपनैवेशिक बस्ती  जैसे क्यों हैं ?बनारस क़े करमकांडी वर्ग  ने गंगा क़े घाटों पर बड़े -बड़े आरे लगा रखे थे और स्वर्ग जाने क़े इच्छुक लोगों से मोटी दान -दक्षिणा लेकर उन्हें ढलान क़े रास्ते भेज देते थे.बेवकूफ स्वर्ग लालची उन आरों से कट कर गंगा में बह जाता था उसके परिवार जन जश्न मना कर उन तोदुओं का पेट और भरते थे. यह था गुलाम भारत में बनारस का विज्ञान.वहां क़े तीस मारखा विज्ञानी ब्लॉगर  आज फिर दहाड़ रहे हैं उन क़े मंतव्य को समझने और अपनी रक्षा करने की महती आवश्यकता है.
हमारा भारतीय वैदिक-विज्ञान हमें बताता है कि,हम जिस पृथ्वी क़े वासी हैं वह अपनी धुरी पर एक लाख ग्यारह हजार छै सौ कि.मी.प्रति घंटे की गति से घुमते हुए अपने से १३ लाख गुना बड़े और नौ करोड़ ३० लाख मील की दूरी पर स्थित सूर्य की परिक्रमा कर रही है.सब ग्रहों का परिवार एक सौर परिवार है और एक अरब सौर परिवारों क़े समूह को एक नीहारिका कहते हैं और ऐसी १५०० निहारिकायें वैज्ञानिक साधनों द्वारा देखी गई हैं.एक आकाश गंगा में २०० अरब तारे हैं और अरबों आकाश गंगाएं विद्यमान हैं.एक आकाश गंगा का प्रकाश प्रथ्वी पर आने में १० अरब वर्ष लग जाते हैं.प्रकाश की गति ३ लाख कि.मी.प्रति सेकिंड है.अर्थात जब से यह पृथ्वी बनी है तब से कुछ नक्षत्रों का प्रकाश प्रथ्वी पर अभी नहीं पहुंचा है.इतने विशाल ब्रहमांड क़े रचियता की व्यवस्था में ग्रह-उपग्रह ,नक्षत्र आदि अपने स्थान (आर्बिट)पर सक्रिय हैं एक दूसरे से दूरी बनाये रख कर गतिशील हैं और आपस में नहीं टकरा रहे हैं.सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ३६० डिग्री में फैला है.सूर्य जिस पर निरन्तर हीलियम और हाईड्रोजन क़े विस्फोट हो रहे हैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का परिभ्रमण ३० -३० डिग्री  क़े हिसाब से कर रहा है ,इस प्रकार १२ राशियाँ हैं और २७ नक्षत्र हैं २८ वें अभिजित को गणना लायक न होने क़े कारण नहीं गिनते हैं.प्रत्येक नक्षत्र में चार चरण होते हैं .सूर्य छै माह उत्तरायण तथा छै माह द्क्शिनायन रहता है.सूर्य की ६० कलाएं हैं.
३६०*६० =२१६०० /उत्तरायण/दक्षिणायन २१६००/२ =१०८००  और बाद क़े शून्य की गणना नहीं होने क़े कारण १०८ मान बना इसी को माला में मनके क़े रूप में रखा और विधान बना दिया कि १०८ बार जाप करने से वह एक माला या माने ब्रह्माण्ड का एक चक्र पूर्ण हुआ. यह है हमारा वैदिक विज्ञान,जिसे पाश्चात्य क़े पिट्ठू गररियों  क़े गीत बताते हैं.मैक्स मूलर सा :जर्मनी क़े विद्वान भारत आ कर ३० वर्ष रह कर संस्कृत सीखते हैं और यहाँ से संस्कृत की मूल पांडू लिपियें ले कर चले जाते हैं और जर्मनी में उसके आधार पर रिसर्च होती है तथा वह पश्चिम का विज्ञान कहलाती है. जर्मन वैज्ञानिकों को रूस तथा अमेरिका ले जा कर (हिटलर की पराजय क़े बाद)अणु(एटम )बम्ब का अविष्कार होता है और  वह पश्चिम की खोज बन जाती है ,है न हम भारतीयों का कमाल?हमारे बनारसी साईंस ब्लागर्स हमारे ज्योतिष विज्ञान को अवैज्ञानिक बताने का दुह्साहस कर डालते हैं क्योंकि वे आज भी दासत्व -भाव में जी रहे हैं.
अथर्व वेद १० /३ /३१ में कहा है 'अष्टचक्रा नवद्वारा देव पूरयोध्या ' अर्थात यह शरीर देवताओं की ऐसी नगरी है कि उसमें दो आँखें,दो कान,दो नासिका द्वार एक मुंह तथा दो द्वार मल-मूत्र विसर्ज्नार्थ हैं.ये कुल नौ द्वार अर्थात दरवाजे हैं जिस अयोध्या नगर में रहता हुआ जीवात्मा अर्थात पुरुष कर्म करता और उनके फल भोगता है.द्वारों क़े सन्दर्भ में ही इस शरीर को द्वारिकापुरी भी कहा जाता है.आप आज क्या कर रहे है ? जिस अयोध्या को राम जन्म भूमी बना कर ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा गढ़ी कहानी क़े आधार पर बेवजह लड़ रहे हैं उसे तो सम्राट हर्ष वर्धन ने साकेत नाम से बसाया था.राम क़े चरित्र को अपने में ढालेंगे नहीं ,राम की तरह साम्राज्यवाद का विनाश करेंगे नहीं बल्की साम्राज्यवादियों की चाल में फंस कर राम क़े नाम पर अपने ही देश में खून खराबा करेंगें.राम ने तो साम्राज्यवादी रावण का संहार उसके यहाँ जाकर किया था. आज क़े साम्राज्यवादी अमेरिका की चाकरी हमारे देश क़े वैज्ञानिक करने को सदैव आतुर रहते हैं.यह क्या है?
'ब्रह्म्सूत्रेण पवित्रीक्रित्कायाम 'यह लिखा है कादम्बरी में सातवीं शताब्दी में आचार्य बाणभट्ट ने.अर्थात  महाश्वेता ने जनेऊ पहन रखा है, तब तक लड़कियों का भी उपनयन होता था.(अब तो सबका उपहास अवैज्ञानिक कह कर उड़ाया जाता है).श्रावणी पूर्णिमा अर्थात रक्षा बंधन पर उपनयन क़े बाद नया विद्यारम्भ होता था.उपनयन अर्थात जनेऊ क़े तीन धागे तीन महत्वपूर्ण बातों क़े द्योतक हैं-
१ .-माता,पिता,तथा गुरु का ऋण उतारने  की प्रेरणा.
२ .-अविद्या,अन्याय ,आभाव दूर करने की जीवन में प्रेरणा.
३ .-हार्ट,हार्निया,हाईड्रोसिल (ह्रदय,आंत्र और अंडकोष -गर्भाशय )संबंधी नसों का नियंत्रण ;इसी हेतु कान पर शौच एवं मूत्र विसर्जन क़े वक्त धागों को लपेटने का विधान था.आज क़े तथा कथित पश्चिम समर्थक विज्ञानी इसे ढोंग, टोटका कहते हैं क्या वाकई ठीक कहते हैं?
विश्वास-सत्य द्वारा परखा  गया तथ्य
अविश्वास-सत्य को स्वीकार न  करना
 अंध-विश्वास--विश्वास अथवा अविश्वास पर बिना सोचे कायम रहना
विज्ञान-किसी भी विषय क़े नियमबद्ध एवं क्रमबद्ध अध्ययन को विज्ञान कहते हैं.
इस प्रकार जो लोग साईंस्दा होने क़े भ्रम में भारतीय वैज्ञानिक तथ्यों को झुठला रहे हैं वे खुद ही घोर अन्धविश्वासी हैं.वे तो प्रयोग शाळा में बीकर आदि में केवल भौतिक पदार्थों क़े सत्यापन को ही विज्ञान मानते हैं.यह संसार स्वंय ही एक प्रयोगशाला है और यहाँ निरन्तर परीक्षाएं चल रहीं हैं.परमात्मा एक निरीक्षक (इन्विजीलेटर)क़े रूप में देखते हुए भी नहीं टोकता,परन्तु एक परीक्षक (एक्जामिनर)क़े रूप में जीवन का मूल्यांकन करके परिणाम देता है.इस तथ्य को विज्ञानी होने का दम्भ भरने वाले नहीं मानते.यही समस्या है.
आज वसंत-पंचमी को ही महा कवी पं.सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'का जन्मदिन भी है उन्होंने माँ सरस्वती से हम सब भारतीयों क़े लिये जो वरदान मँगा है ,वही इस लेख का अभीष्ट है-

वर दे वीणावादिनी
वर दे वीणावादिनी वर दे!
प्रिय स्वतंत्र-रव, अमृत-मंत्र नवभारत में भर दे ।
काट अंध उर के बंधन-स्तर
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर
कलुष- भेद-तम हर प्रकाश भर जगमग जग कर दें !
नव गति, नव लय, ताल-छंद नव
नवल कंठ, नव जलद-मंद्र रव
नव नभ के नव विहग-वृंद को नव पर, नव स्वर दे ।

(--निराला)
 (इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

Wednesday, February 2, 2011

रावण वध एक पूर्व निर्धारित योजना (पुनर्प्रकाशन- अंतिम किश्त )

प्रस्तुत  आलेख मूल रूप से आगरा से प्रकाशित साप्ताहिक सप्तदिवा क़े २७ अक्तूबर १९८२ एवं ३ नवम्बर १९८२ क़े अंकों में दो किश्तों में पूर्व में ही प्रकाशित हो चुका है  तथा इस ब्लॉग पर भी पहले प्रकाशित किया जा चुका है.पूर्व में प्रकाशित इस आलेख की अशुद्धियों को यथासम्भव सुधारते हुए तथा पाठकों की सुविधा क़े लिये यहाँ ४ किश्तों में पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है.

प्रस्तुत है अंतिम  किश्त (प्रथम किश्त देखने  क़े लिये यहाँ क्लिक करें व दूसरी किश्त यहाँ क्लिक करके  देख सकते हैं एवं ३ सरी किश्त यहाँ देख सकते हैं )

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जब राम लक्ष्मण के साथ मारीच का वध कर के लौटे तो सीता को न पाकर और संवाददाता से पूर्ण समाचार पाकर राम ने अपने को भावी लक्ष्य की पूर्ती में सफल समझा.अब उन्हें उपनिवेशाकांक्षी रावण  के साम्राज्यवादी समझबूझ के विरुद्ध युद्ध छेड़ने का मार्ग तो मिल गया था,किन्तु जब तक बाली- रावण friendly aliance था लंका पर आक्रमण करना एक बड़ी मूर्खता थी,यद्यपि  अयोध्या में शत्रुहन के नेतृत्व  में समस्त आर्यावर्त की सेना उन की सहायता के लिए तैयार खडी  थी.अतः बाली का पतन करना अवश्यम्भावी था.उसका अनुज सुग्रीव राज्याधिकार हस्तगत करने को लालायित था.इसलिए उसने सत्ता प्राप्त करने के पश्चात् रावण  वध में सहायता करने का वचन दिया.राम ने सुग्रीव का पक्ष ले कर बाली को द्वन्द युद्ध में मार डाला क्योंकि यदि राम (अवध से सेना बुलाकर उसके राज्य पर)प्रत्यक्ष आक्रमण करते तो बाली का बल दो-गुना हो जाता.(बाली रावण friendly allaince के अनुसार केवल बाली ही नहीं,बल्कि रावण की सेना से भी भारत भू पर ही युद्ध करना पड़ता) जो किसी भी हालत में भारत के हित में न था.यह आर्यावर्त की सुरक्षा के लिए संहारक  सिद्ध होता.राम को तो साम्राज्यवादियों के घर में ही उन को नष्ट करना था.उनका उद्देश्य लंका को आर्यावर्त में मिलाना नहीं था.अपितु भारतीय राष्ट्रीयता को एकता के सूत्र में आबद्ध करने के पश्चात् राम का अभीष्ट लंका में ही लंका वालों का ऐसा मंत्रिमंडल बनाना था जो आर्यावर्त के साथ सहयोग कर सके.विभीषण तो रावण  का प्रतिद्वंदी था ही,अतः राम ने उसे अपनी ओर तोड़ेने के लिए एयर मार्शल (पवन-सूत) हनुमान को अपना दूत बनाकर गुप्त रूप से लंका भेजा.उन्हें यह निर्देश था की यदि समझौता हो जाता है तो वह रावण के सामने अपने को अवश्य प्रकट कर दें .किन्तु हनुमान की Diplomacy यह है की उन्होंने रावण दरबार में बंदी के रूप में उपस्थित होने पर स्वयं को राम का शांती दूत बताया.इसी आधार पर विभीषण ने (जो सत्ता पिपासु हो कर भाई के प्रति विश्वासघात कर रहा था) अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक नियमों की आड़ में हनुमान को मुक्त करा दिया.परन्तु रावण के निर्देशानुसार लंका की वायु सेना ने लौट ते हुए हनुमान के यान की पूँछ पर प्रहार किया.कुशलता पूर्वक अत्मरक्षित हो कर हनुमान ने लंका में अग्नि बमों (नेपाम बमों) की वर्षा कर सेना का विध्वंस किया जिससे लंका का वैभव नष्ट हो गया तथा सैन्य शक्ति जर्जर हो गयी.रावण  ने संसद ( दरबार) में विभीषण पर राजद्रोह का अभियोग लगाकर मंत्रिमंडल से निष्कासित कर दिया।

लंका को जर्जर और खोखला बनाकर राम ने जब आक्रमण किया तो इसकी घोषणा सुनते ही मौके पर विभीषण अपने समर्थकों सहित राम की शरण में चला आया.राम ने उसी समय उसे रावण का उत्तराधिकारी घोषित किया और राज्याभिषेक भी कर दिया.इस प्रकार पारस्परिक द्वेष के कारण  वैभवशाली एवं सम्रद्ध लंका साम्राज्य का पतन और रावण का अंत हुआ.लंका में विभीषण की सरकार स्थापित हुई जिसने आर्यावर्त की अधीनता तथा राम को कर देना विवशता पूर्वक स्वीकार किया.लंका को आर्यावर्त के अधीन करदाता राज्य बनाकर राम ने किसी साम्राज्य की स्थापना नहीं की बल्कि उन्होंने राष्ट्रवाद की स्थापना कर आर्यावर्त में अखिल भारतीय राष्ट्रीय एकता की सुद्र्ण  नींव डाली.


सीता लंका से मुक्त हो कर स्वदेश लौटीं.इस प्रकार रावण वध का एकमात्र कारण  सीता हरण नहीं कहा जा सकता,बल्कि 'रावण  वध’भारतीय ऋषियों द्वारा नियोजित एवं पूर्व निर्धारित योजना थी;उसका सञ्चालन राष्ट्र के योग्य,कर्मठ एवं राजनीती निपुण कर्णधारों के हाथ में था जिसकी बागडोर कौशल-नरेश राम ने संभाली.राम के असीम त्याग,राष्ट्र-भक्ति और उच्चादर्शों के कारन ही आज हम उनका गुण गान करते हैं-मानो ईश्वर  इस देश की रक्षा के लिए स्वयं ही अवतरित हुए थे।

(समाप्त)
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 एक निवेदन-"रावण वध एक पूर्व-निर्धारित योजना" तथा शीघ्र प्रकाशित होने जा रहा  "सीता का विद्रोह" दोनों लेख मेरी कपोल-कल्पना नहीं हैं.मूल रूप से संत श्याम जी पराशर क़े १९६७ -१९६८ में सुने हुये प्रवचनों (जैसाकि 'विद्रोही स्व स्वर' में जिसके सम्बन्ध में आज क़े 'हिंदुस्तान' में रवीश कुमार जी द्वारा ज़िक्र किया गया है में पहले ही  वर्णन किया है कि नानाजी तथा उनके भतीजे क़े साथ जाते थे) तथा उन्ही की लिखित पुस्तक -'रामायण का ऐतिहासिक महत्त्व' का अध्ययन एवं १९७० -७१ में  बी. ए.में पढी डा. रघुवीर शरण मित्र की पुस्तक 'भूमिजा' से अर्जित ज्ञान का सार्वजानिक हित में सहयोग है.

आज कुछ लोगों को यह प्रयास हास्यास्पद इसलिए लग सकता है क्योंकि आम धारणा है कि हमारा देश जाहिलों का देश था और हमें विज्ञान से विदेशियों ने परिचित कराया है.जबकि यह कोरा भ्रम ही है.वस्तुतः हमारा प्राचीन विज्ञान जितना  आगे था उसके किसी भी कोने तक आधुनिक विज्ञान पहुंचा ही नहीं है.हमारे पोंगा-पंथियों की मेहरबानी से हमारा समस्त विज्ञान विदेशी अपहृत कर ले गये और हम उनके परमुखापेक्षी बन गये ,इसीलिये मेरा उद्देश्य "अपने सुप्त ज्ञान को जनता जाग्रत करे" ऐसे आलेख प्रस्तुत करना है.मैं प्रयास ही कर सकता हूँ ,किसी को भी मानने या स्वीकार करने क़े लिये बाध्य नहीं कर सकता न ही कोई विवाद खड़ा करना चाहता हूँ .हाँ देश-हित और जन-कल्याण की भावना में ऐसे प्रयास जारी ज़रूर रखूंगा. 
मैं देश-भक्त जनता से यह भी निवेदन करना चाहता हूँ कि,हमारी परम्परा में देश-हित,राष्ट्र-हित सर्वोपरी रहे हैं "राष्ट्रवादी कैकेयी" तथा "सीता की कूट नीति का कमाल"  में भी आप आगे पढेंगे,उपरोक्त लेखों में भी आपने देखा ही है.तो क्यों न आज अपने देश-राष्ट्र हित में साम्राज्यवादियों व उनके प्रष्ट पोषकों का हम सब मिल कर सामाजिक ,आर्थिक बहिष्कार करते जैसा कि गांधीजी क़े आव्हान पर स्वतंत्रता आन्दोलन क़े दौरान किया था?

 मेरे निष्कर्षों एवं दृष्टिकोण का लोगों द्वारा मखौल बनाने पर मैंने अपने माता-पिता से कहा था--एक दिन लोग इन पर डाक्टरेट हासिल करेंगें.मेरी छोटी बहन श्रीमती शोभा माथुर(पत्नी श्री कमलेश बिहारी माथुर,अवकाश-प्राप्त फोरमैन,बी.एच.ई.एल.,झाँसी) ने अपनी संस्कृत क़े राम विषयक नाटक की थीसिस में मेरे 'रावण-वध एक पूर्व निर्धारित योजना 'को उधृत किया है.इस प्रकार माता-पिता क़े  जीवन काल में ही मेरे लेखों को आगरा विश्वविद्यालय से  डाक्टरेट हासिल करने में बहन ने प्रयोग कर लिया और मेरा अनुमान सही निकला.

सत्य,सत्य होता है और इसे अधिक समय तक दबाया नहीं जा सकता.एक न एक दिन लोगों को सत्य स्वीकार करना ही पड़ेगा तथा ढोंग एवं पाखण्ड का भांडा फूटेगा ही फूटेगा.राम और कृष्ण को पूजनीय बना कर उनके अनुकरणीय आचरण से बचने का जो स्वांग ढोंगियों तथा पाखंडियों ने रच रखा है उस पर प्रहार करने का यह मेरा छोटा सा प्रयास था.








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Monday, January 31, 2011

महाभारत क्यों होता?

फ़ौज में कभी-कभी परेड को आदेश मिलता है कि,पीछे मुड और सारी परेड आगे चलते-चलते एकदम से पीछे लौट चलती है.पी.एस.डी.एवं एन.सी.सी.की ट्रेनिंग क़े दौरान हवलदार सा :क़े आदेश पर हम लोगों ने भी ऐसा किया है. आज अपने पुराने कागजात पलटते -पलटते १९६९ -७० क़े दौरान लिखी अपनी यह लघु तुक-बन्दी जिसे २६ .१० १९७१ को हिन्दी टाईप सीखते समय टाईप किया था नज़र आ गई ,प्रस्तुत है-

जो ये भीष्म प्रतिज्ञा न करते देवव्रत ,
 तो यह महाभारत क्यों होता?
 होते न जन्मांध धृतराष्ट्र ,
 तो यह महाभारत क्यों होता?
 इन्द्रप्रस्थ क़े राजभवन से होता न तिरस्कार कुरुराज का,
तो यह महाभारत क्यों होता?
 ध्रूत-भवन में होता न चीर -हरण द्रौपदी का,
 तो यह महाभारत क्यों होता?
 होता न यदि यह महाभारत,
 तो यह भारत,गारत क्यों होता?
 होता न यदि यह महाभारत,
 तो यह गीता का उपदेश क्यों होता?
 होता न यदि यह गीता का उपदेश,
 तो इन वीरों का क्या होता?
मिलती न यदि वीर गति इन वीरों को,
तो इस संसार में हमें गर्व क्यों होता?
*               *              *



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Saturday, January 29, 2011

गाँधी जी की हत्या –साम्राज्यवादी साजिश (बलिदान दिवस ३० जनवरी पर विशेष )



१५ अगस्त,१९४७ को प्राप्त राजनीतिक आज़ादी और ३० जन.१९४८ को गाँधी जी की हत्या को सांप्रदायिक देन बताया जाता है. परन्तु भारत से बर्मा को १९३५ में अलग किये जाने के बाद नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के वक्तव्य की मीमांसा की जाये तो स्पष्ट हो जायेगा की भारत-विभाजन और गाँधी जी की हत्या दोनों ही साम्राज्यवादी साजिश के परिणामस्वरूप घटित घटनाएँ हैं.नेता जी सुभाष ने स्पष्ट कहा था कि जिस प्रकार आयेरलैंड से अलस्टर को अलग किया गया था उसी प्रकार बर्मा को भारत से अलग किया गया है और यह आने वाले समय में देश का खंडन किये जाने का संकेत है.खेद की बात है कि क्योंकि स्वयं गाँधी जी ही नेता जी के विरोधी थे;इसलिए नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की बात को गंभीरता से नहीं लिया गया. नेता जी बोस की बात को समझने के लिए इतिहास को पलट कर देखने की आवश्यकता है. १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में मराठों ने मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर के नेतृत्व  में अंग्रेजों के छक्के छुडाये थे. रानी विक्टोरिया के अधीन शासन सँभालने के बाद पहले पहल ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने अपनी नीव मज़बूत करने हेतु भारत में मुस्लिमों का दमन किया और वे आर्थिक-शैक्षिक क्षेत्र में पीछे हो गए.लेकिन आज़ादी के आन्दोलनों में मुस्लिम बढ़ चढ़ कर भाग लेते रहे.१९०५ में धार्मिक आधार पर बंगाल का विभाजन कर मुस्लिमों को अलग करने की चाल चली गयी.बंग-भंग को रद्द करने हेतु जार्ज पंचम को भारत आना पड़ा. शातिर दिमाग साम्राज्यवादियों ने १९२० में ढाका के नवाब को मोहरा बना कर मुस्लिम लीग की स्थापना करायी.साम्राज्यवादी शासकों की प्रेरणा से ही १९२५ में हिन्दू महासभा तथा आर एस.एस. का गठन किया गया और खुलकर धार्मिक वैमनस्य का खेल खेला गया .भारत का राष्ट्रीय आन्दोलन भी इसी साजिश का शिकार हुआ और १९४० में पहली बार पाकिस्तान के निर्माण की बात सामने आई.दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने आई.अन.ऐ.के माध्यम से ब्रिटिश सरकार से सेन्य संघर्ष किया जिस के परिणाम स्वरुप वायु सेना व नौ सेना में भी विदेशी सरकार के प्रति छुट-पुट बगावत हुई.अतः घबरा कर ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने भारत का विखंडन कर पाकिस्तान व भारत दो स्वतंत्र देशों का निर्माण कर दिया.पाकिस्तान में तो साम्राज्यवादी अपने पसंद की सरकारें गठित करने में कामयाब हो जाते हैं,परन्तु भारत में साम्राज्यवादी पूरे कामयाब नहीं हो पाते हैं.गाँधी जी की हत्या पाकिस्तान को अनुदान दिए जाने की गाँधी जी की सिफारिश के विरोध में की गयी-ऐसा हत्यारे ने अपने मुक़दमे के दौरान कहा.आशय साफ था देश में पुनः सांप्रदायिक तनाव पैदा कर विकास को अवरुद्ध किया जाना. तमाम साम्राज्यवादी सांप्रदायिक साजिशों के भारत आज प्रगति पथ पर अग्रसर तो है,परन्तु इसका लाभ समान रूप से सभी देश वासियों को प्राप्त नहीं है.सामाजिक रूप से इंडिया और भारत में अंतर्द्वंद चल रहा है और यह साम्राज्यवादियों की साजिश का ही हिस्सा है.आज आवश्यकता है भारत-विभाजन और गाँधी जी की हत्या को साम्राज्यवादियों की साजिश का परिणाम स्वीकार कर लेने की तथा देश के आर्थिक विकास में उत्पन्न असमानता को दूर करने की ,वर्ना साम्राज्यवादी शक्तियां भारत को अन्दर से खोखला करने हेतु विद्द्वेश के बीज बोती रहेंगी और नफरत के शोले भड़कते रहेंगे और इस प्रकार का विकास बेमानी ही रहेगा.जिसका लाभ देश की अधिकांश जनता को नहीं,कुछ मुट्ठी भर लोगों को ही मिलता रहेगा.जनतंत्र में देश के विकास का लाभ जनता को दिलाना है तो साम्राज्यवादी साजिशों को विफल करना ही होगा .इसके लिए आज की पीढ़ी और नौजवानों को जागरूक करना ही होगा.




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 (इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)
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फेसबुक  में प्राप्त टिप्पणी :30 जनवरी 2015 




के ग्रुप CPI BEGUSARAI

Friday, January 28, 2011

"गांधी को महात्मा बनाने वाले ग्रह -नक्षत्र"



यद्यपि  महात्मा गांधी ने सरकार में कोई पद ग्रहण नहीं किया;परन्तु उन्हें राष्ट्रपिता की मानद उपाधि से विभूषित किया गया है.गांधी जी क़े जन्मांग में लग्न में बुध बैठा है और सप्तम भाव में बैठ कर गुरु पूर्ण १८० अंश से उसे देख रहा है जिस कारण रूद्र योग घटित हुआ.रूद्र योग एक राजयोग है और उसी ने उन्हें राष्ट्रपिता का खिताब दिलवाया है.गांधी जी का जन्म तुला लग्न में हुआ था जिस कारण उनके भीतर न्याय ,दया,क्षमा,शांति एवं अनुशासन क़े गुणों का विकास हुआ.पराक्रम भाव में धनु राशि ने उन्हें वीर व साहसी बनाया जिस कारण वह ब्रिटिश सरकार से अहिंसा क़े बल पर टक्कर ले सके.


गांधी जी क़े सुख भाव में उपस्थित होकर केतु ने उन्हें आश्चर्यजनक ख्याति दिलाई परन्तु इसी क़े कारण उनके जीवन क़े अंतिम वर्ष कष्टदायक व असफल रहे.(राजेन्द्र बाबू को भी ऐसे ही केतु क़े कारण अंतिम रूप से नेहरु जी से मतभेदों का सामना करना पड़ा था.)एक ओर तो गांधी जी देश का विभाजन न रुकवा सके और दूसरी ओर साम्प्रदायिक सौहार्द्र  भी स्थापित न हो सका और अन्ततः उन्हें अंध -धर्मान्धता का शिकार होना पड़ा.

गांधी जी क़े विद्या भाव में कुम्भ राशि होने क़े कारण ही वह कष्ट सहने में माहिर बने ,दूसरों की भलाई और परोपकार क़े कार्यों में लगे रहे और उन्होंने कभी भी व्यर्थ असत्य भाषण नहीं किया.गांधी जी क़े अस्त्र सत्य और शास्त्र अहिंसा थे.गांधी जी क़े सप्तमस्थ  गुरु ने ही उन्हें विद्वान व राजा क़े तुल्य राष्ट्रपिता की पदवी दिलाई.

गांधी जी क़े भाग्य भाव में मिथुन राशि है जिस कारण उनका स्वभाव सौम्य,सरस व सात्विक बना रहा.धार्मिक सहिष्णुता इसी कारण उनमें कूट -कूट कर भरी हुई थी.उन्होंने सड़ी -गली रूढ़ियों व पाखण्ड का विरोध किया अपने सदगुणों और उच्च विचारों क़े कारण अहिंसक क्रांति से देश को आज़ाद करने का लक्ष्य उन्हें इसी क़े कारण प्राप्त हो सका.गांधी जी क़े कर्म भाव में कर्क राशि की उपस्थिति ने ही उनकी आस्था श्रम,न्याय व धर्म में टिकाये रखी और इसी कारण राजनीति में रह कर भी वह पाप-कर्म से दूर रह कर गरीबों की सेवा क़े कार्य कर सके.गांधी जी का सर्वाधिक जोर दरिद्र -नारायण की सेवा पर रहता था और उसका कारण यही योग है.गांधी जी क़े एकादश भाव में सिंह राशि एवं चन्द्र ग्रह की स्थिति ने उन्हें हठवादी,सादगी पसन्द ,सूझ -बूझ व नेतृत्व की क्षमता सम्पन्न तथा विचारवान बनाया.इसी योग क़े कारण उनके विचार मौलिक एवं अछूते थे जो गांधीवाद क़े नाम से जाने जाते हैं.अस्तु गांधी जी को साधारण इन्सान से उठ कर महात्मा बनाने में उनके जन्म-कालीन ग्रह व नक्षत्रों का ही योग है.



(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)