Thursday, June 30, 2011

किस नक्षत्र में जन्म लेने वाले बच्चे का कैसा भविष्य रहेगा?

इधर ज्योतिष संबंधी लेखों पर पाठक ब्लागर्स की ख्वाहिश को देखते हुए प्रस्तुत आलेख को तुरन्त प्रकाशित करना उचित समझा था.हालांकि यह 'ब्रह्मपुत्र समाचार',आगरा में दो बार-२६ जून से ०२ जूलाई २००३ एवं २५ सितम्बर से ०१ अक्टूबर २००३ के अंकों में पूर्व प्राकाशित है.यह भी खुशी की बात रही है कि,हमारे बाम-पंथी ब्लागर बंधुओं ने भी अपने पुत्र-पुत्रियों के सम्बन्ध में मुझ से ज्योतिषीय जानकारी प्राप्त की है जिन्हें मैंने तत्काल  सहर्ष उपलब्ध करवा दिया है.पूर्व में आर.एस.एस.से सम्बंधित ब्लागर्स (विदेश स्थित डा.,दिल्ली स्थित इंजीनियर और बैंक अधिकारी)को भी उनके हितार्थ जानकारियाँ दी थीं,परन्तु उनका व्यवहार अपने संगठन के चरित्र और संस्कृति के अनुसार  कटु एवं तिक्त रहा था.जबकि बाम-पंथी बंधुओं ने सहृदयता एवं सम्मान का परिचय दिया है. अभी 'विद्रोही स्व-स्वर में' मैं जो विवरण दे रहा हूँ ,वह लगभग घटनाओं के क्रम में है,बाद में उसे ग्रहों की महादशा-अंतर-दशा के क्रम में स्पष्ट करूंगा तब सबको चाहे वे ज्योतिष के जानकार न भी हों आसानी से ग्रह-नक्षत्रों का प्रभाव समझ आ जाएगा. तो जानिये उन लक्षणों को जिनसे किसी नक्षत्र विशेष  में जन्म लेने वाले व्यक्ति का स्वभाव ज्ञात होता है------- 
   
अब से लगभग दो अरब वर्ष पूर्व वर्तमान सृष्टि का उदय हुआ.ब्रह्माण्ड में असंख्य तारे व नक्षत्र हैं.तारों के समूह को कुल सत्ताईस नक्षत्रों में विभक्त कर दिया गया है और इन नक्षत्रों को बारह राशियों में बांटा गया है.प्रत्येक में चार चरण होते हैं.सूर्य (जो कि एक तारा है),चन्द्र (जो सूर्य से प्रकाशित और खुद छाया ग्रह है),मंगल,बुध,ब्रहस्पति,शुक्र और शनि -ये सात ग्रह माने जाते हैं.हमारी पृथ्वी अपनी धुरी पर थोड़ी सी (२३.५ डिग्री)झुकी हुयी है .इस प्रकार इसके उत्तरी व दक्षिणी दोनों ध्रुवों का भी इसके निवासियों पर प्रभाव पड़ता है.साथ ही प्रत्येक ग्रह व नक्षत्र से आने वाली रश्मियों  को भी ये ध्रुव परावर्तित करते हैं.ज्योतिष में पृथ्वी  के इन छोरों की गणना छाया ग्रह के रूप में क्रमशः राहू व केतु नामों से की गयी है.(तथा कथित धार्मिकों-पौरानिकों के अमृत-कलश और  सर-धड वाली झूठी कहानी के बहकावे में न आयें) इसी लिए राहू व केतु कभी भी साथ-साथ एक ही राशि में नहीं पड़ते बल्कि इनकी राशियों में पूर्ण १८० डिग्री का अंतर रहता है.भारतीय ज्योतिष में चंद्रमा को मन का प्रतीक  माना गया है और यह तीव्रगामी ग्रह है.किसी बच्चे के जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र व राशि में भ्रमण कर रहा है उस बच्चे का जन्म का वही नक्षत्र व राशि निर्धारित होती है. आजीवन इस नक्षत्र का प्रभाव उस बच्चे पर पड़ता है.ऐसा उसके पूर्व जन्मों के संस्कारों पर निर्भर होता है.किस नक्षत्र में जन्म लेने वाले बच्चे का कैसा भविष्य रहेगा,ऐसा हमारे ऋषियों ने (जो महान वैज्ञानिक भी थे) अपने अनुभव के आधार पर निर्धारित किया है जो इस प्रकार है-


अश्वनी नक्षत्र  -में उत्त्पन्न मनुष्य सुन्दर रूप वाला ,सुभग(भाग्यवान),हर एक कामों में चतुर,मोटी देह वाला,बड़ा धनवान और लोगों का प्रिय होता है.

भरणी नक्षत्र-में उत्त्पन्न मनुष्य निरोग,सत्य-वक्ता,सुन्दर जीवन,दृढ  नियम वाला,खूब सुखी और धनवान होता है.

कृतिका नक्षत्र -में जन्म लेने वाला मनुष्य कंजूस,पाप-कर्म करने वाला,हर समय भूखा,नित्य पीड़ित रहने वाला और सदा नीच कर्म करने वाला होता है.

रोहिणी नक्षत्र-में जन्म लेने वाला बुद्धिमान,राजा से मान्य,प्रिय बोलने वाला,सत्य -वक्ता,और सुन्दर रूप वाला होता है.

मृगशिरा नक्षत्र-में उत्त्पन्न मनुष्य देह आकृति से ठीक ,मानसिक रूप से असंतुष्ट,समाज प्रिय ,अपने कार्य में दक्ष,चपल-चंचल,संगीत-प्रेमी,सफल व्यवसायी,अन्वेषक,अल्प-व्यवहारी,परोपकारी,नेत्रित्व क्षमताशील होता है.

आर्द्रा  नक्षत्र-में उत्त्पन्न मनुष्य कृतघ्न -किये हुए उपकार को न मानने वाला -क्रोधी,पाप में रत रहने वाला ,शठ और धन-धान्य से रहित होता है.

पुनर्वसु नक्षत्र -में जन्म लेने वाला मनुष्य शान्त स्वभाव वाला,सुखी,अत्यंत भोगी,सुभग,सभी जनों का प्रेमी

और पुत्र,मित्र आदि से युक्त होता है.

पुष्य नक्षत्र -में उत्त्पन्न मनुष्य देव,धर्म,धन आदि सबों से युक्त,पुत्र से युत,पंडित(ज्ञानी),शान्त स्वभाव ,सुभग और सुखी होता है.

आश्लेषा नक्षत्र -में उत्त्पन्न मनुष्य सब पदार्थों को खाने वाला अर्थात मांसाहारी ,दुष्ट आचरण वाला,कृतघ्न,ठग और दुर्जन तथा स्वार्थपरक कामों को करने वाला होता है.

मघा नक्षत्र -में उत्त्पन्न मनुष्य धनी,भोगी,नौकरी से संपन्न,पितृ-भक्त,बड़ा उद्योगी,सेनापति या राजसेवा करने वाला होता है.

पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र-में जन्म लेने वाला मनुष्य विद्या ,गौ,धन आदि से युक्त,गम्भीर,स्त्री-प्रिय,सुखी और विद्वान से आदर पाने वाला होता है.

उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र -में उत्त्पन्न मनुष्य सहनशील,वीर,कोमल वचन बोलने वाला,शस्त्र विद्या में प्रवीण ,महान योद्धा और लोकप्रिय होता है.

हस्त नक्षत्र -में उत्त्पन्न मनुष्य मिथ्या बोलने वाला,ढीठ ,शराबी,चोर,बंधुहीन और पर स्त्रीगामी होता है.

चित्रा नक्षत्र-में जन्म लेने वाला मनुष्य पुत्र और स्त्री से युक्त,सदा संतुष्ट,धन-धान्य से युक्त देवता और ब्राह्मणों का भक्त होता है.

स्वाती नक्षत्र -में उत्त्पन्न मनुष्य चतुर ,धर्मात्मा,कंजूस,स्त्रियों का प्रेमी,सुशील और देश भक्त होता है.

विशाखा नक्षत्र -में उत्त्पन्न मनुष्य अधिक लोभी ,अधिक घमंडी,कठोर,कलहप्रिय और वेश्यागामी होता है.

अनुराधा नक्षत्र -में उत्त्पन्न मनुष्य अपने पुरुषार्थ से विदेश में रहने वाला ,अपने भाई -बंधुओं की सेवा करने वाला परन्तु ढीठ होता है.

ज्येष्ठा  नक्षत्र -में उत्त्पन्न मनुष्य मित्रों से संपन्न,श्रेष्ठ,कवि,सहशील,विद्वान,धर्म में तत्पर और शूद्रों द्वारा पूजा जाता है.

मूल नक्षत्र -में जन्म लेने वाला मनुष्य सुख-संपन्न,धन,वाहन से युक्त,हिंसक,बलवान,विचारवान,शत्रुहंता,विद्वान और पवित्र होता है.

पूर्वाषाढ़ नक्षत्र -में उत्त्पन्न मनुष्य देखने मात्र से ही परोपकारी ,भाग्यवान,लोकप्रिय और सम्पूर्ण विद्वान होता है.

उत्तराषाढ़ नक्षत्र-में उत्त्पन्न मनुष्य बहू-मित्र संपन्न,हृष्ट-पुष्ट,वीर,विजयी,सुखी और विनीत स्वभाव का होता है.

श्रवण नक्षत्र -में उत्त्पन्न मनुष्य किये हुए उपकार को मानने वाला,सुन्दर,दानी,सर्वगुण-संपन्न,धनवान और अधिक संतान्युक्त होता है.

धनिष्ठा नक्षत्र -में उत्त्पन्न मनुष्य गाने का शौक़ीन ,भाइयों से आदर प्राप्त करने वाला,स्वर्ण-रत्न आदि से भूषित तथा सैंकड़ों मनुष्यों का मालिक बन कर रहता है.

शतभिषा नक्षत्र-में उत्त्पन्न मनुष्य कंजूस,धनवान,पर-स्त्री का सेवक तथा विदेशी महिला से काम करने वाला होता है.

पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र-में उत्त्पन्न मनुष्य सभा-वक्ता,सुखी,संतान-युक्त,अधिक सोने वाला और अकर्मण्य होता है.

उत्तराभाद्रपद नक्षत्र -में उत्त्पन्न मनुष्य गौर-वर्ण,सत्व-गुण युक्त ,धर्मग्य,साहसी,शत्रु हन्ता और देव-तुली होता है.

रेवती नक्षत्र-में उत्त्पन्न मनुष्य के सर्वांग पूर्ण-पुष्ट,पवित्र,चतुर,सज्जन,वीर,विद्वान और भौतिक सुखों से संपन्न होता है.

इन सत्ताईस नक्षत्रों के एक २८ वां नक्षत्र भी होता है जो उत्तराषाढ़ नक्षत्र की अंतिम १५ घटी तथा श्रवण नक्षत्र की प्रारम्भिक ०४ घटी अर्थात कुल १९ घटी का बनता है .इसे 'अभिजित नक्षत्र 'कहते हैं.

अभिजित नक्षत्र-में जन्मा मनुष्य उत्तम भाग्य शाली होता है.वह अत्यंत सुन्दर,कान्तियुक्त,स्वजनों का प्रिय,कुलीन,यश्भागी,ब्राह्मण एवं देवता का भक्त,स्पष्ट-वक्ता और अपने खानदान में नृप तुल्य होता है.

अपने-अपने पूर्वजन्मों के संचित संस्कारों के आधार पर मनुष्य विभिन्न नक्षत्रों में जन्म लेकर तदनुरूप चरित्र तथा आचरण वाला बन जाता है.यदि आप अपने कर्म को परिष्कृत करके आचरण करें तो आगामी जन्म अपने अनुकूल नक्षत्र में भी प्राप्त कर सकते हैं.तो चुनिए अपने आगामी जन्म का नक्षत्र और अभी से सदाचरण में लग जाइए और अपने भाग्य के विधाता स्वंय बन जाइए.

जो यह कहना चाहें कि,पूर्व जन्म और पुनर्जन्म होता ही नहीं है ,वे इस आलेख को सहजता से नजर-अंदाज कर सकते हैं.


Sunday, June 26, 2011

समान कार्य हेतु समान वेतन

24/06/2011

आय की असमानता और मंहगाई  
यह सम्पादकीय इस बारे में चिंता व्यक्त करता है कि,मंहगाई बढ़ने से जनता के जीवन-स्तर की प्रगति किस प्रकार रुक जाती है.बिलकुल सही बात है,लेकिन एक और भी समस्या प्रमुख है और वह है आय की असमानता .आम तौर पर केन्द्रीय कर्मचारियों का वेतन बढ़ते ही बाजार में मंहगाई बढ़ जाती है तब राज्यों में कर्मचारी आंदोलनों के जरिये अपने वेतन में कुच्छ बढ़ोतरी करवा लेते हैं,लेकिन निजी क्षेत्र के कर्मचारियों का वेतन आम-तौर पर नहीं बढ़ता है.ऐसी स्थिति में निजी क्षेत्र के मजदूर(हाथ और कलम दोनों के),छोटे किसान,फेरी वाले आदि को जीवन गुजारना दुरूह होता जाता है.उदाहरणार्थ सरकार जब गैस के दाम बढाती है तो भुगतान सभी को एक सा करना होता है जबकि आय सब की एक सी नहीं है.अनाज,दालें,दवाएं,दूध,फल,सब्जी सभी चीजें तो सब को एक दाम पर खरीदनी हैं लेकिन उन्हें उनके श्रम का भुगतान अलग-अलग दर से होता है.

आज जरूरत इस बात की है कि 'एक समान कार्य के लिए एक समान वेतनमान 'हो -कर्मचारी चाहे केंद्र सरकार में हो,चाहे राज्य सरकार में ,चाहे निजी क्षेत्र में उसे एक जैसे कार्य का एक समान वेतन मिलना चाहिए.व्यापारी और उद्योगपति तो अपने प्रोडक्ट का दाम खुद तय करता है,लेकिन किसान अपने प्रोडक्ट को अपने तय दाम पर नहीं बेच पाता है.अन्न दाता होकर भी किसान कंगाल ही रह जाता है ,तिस पर भी विकास के नाम पर उसकी जमीन छीन लेने का एक फैशन चल रहा है.

समय का तकाजा है कि जो लोग समृद्ध  हैं,खुद-ब-खुद बाकी लोगों का ख्याल करते हुए त्याग का परिचय दें और उनका जीवन-स्तर ऊपर उठाने में वांछित सहयोग दें.अन्यथा समय अपने हिसाब से न्याय कर ही देगा.आजकल भ्रष्टाचार उन्मूलन का जोअन्ना- फैशन चल रहा है वह वास्तविक जन -मुद्दों से आम लोगों को भटका कर शोषण कारियों  को लाभ दिला रहा है.'हिंदुस्तान लीवर लि.'जो मजदूरों का खुद शोषण करने में पीछे नहीं है आखिर क्यों अन्ना-टीम को आन्दोलन हेतु धन उपलब्ध करा रहा है जिसका उन्हीं के पूर्व साथी बाबा रामदेव ने खुलासा किया था.२५ जून २०११ के हिंदुस्तान,लखनऊ में छपे इस लेख का अवलोकन करें.


हिंदुस्तान-लखनऊ-२५/०६/२०११


वर्तमान शासकों की लापरवाही का ही यह परिणाम है जैसा की श्री शशी शेखर ने अपने २६ जून २०११ के सम्पादकीय में हिन्दुस्तान में लिखा है-"इसीलिये कुछ लोग खुद को जनता की आकांक्षाओं के मुखौटे के तौर पर पेश कर रहे हैं.इनमें से किसी का सियासी अनुभव नहीं है.इससे कुछ आशंकाएं बलवती हो रही हैं .कहीं ऐसा तो नहीं कि वे अनजाने ही जन आक्रोश को इतनी हवा दे  दें कि उसे सम्हालना मुश्किल हो जाए?मैं यहाँ कतई ऐसा नहीं कह रहा कि साफ़ -सुथरी सत्ता प्रणाली की मांग नाजायज है;पर इसके लिए उतावलापन उचित नहीं.परिवर्तन कामियों  ने एक मशाल जला दी है.अब उन्हीं की जिम्मेदारी है कि इसका प्रयोग सिर्फ और सिर्फ उजाला फैलाने के लिए हो ;आग भड़काने के लिए नही."

शशी शेखर जी भले ही साफ़-साफ़ न कहें परन्तु मुझे सच कहने से कोई गुरेज नहीं है कि अन्ना-रामदेव के आन्दोलन आर.एस.एस.के प्रभाव में हैं और साम्राज्यवादियों की चाल के तहत जनता को गुमराह करने हेतु चलाये जा रहे हैं अन्यथा धार्मिक भ्रष्टाचार जो आर्थिक भ्रष्टाचार की जननी है को समाप्त किये बगैर आधी-अधूरी बात क्यों की जा रही है?पेट्रोलियम पदार्थों में बढ़ोत्तरी करके सरकार ने जनता की कमर तोड़ दी है -कम वेतन वाले कैसे क्या  करें ?यह चिंतन का विषय प्राथमिकता पर होना चाहिए एवं समान कार्य हेतु समान वेतन का आन्दोलन सम्पूर्ण देश में एक साथ प्रारम्भ करने का प्रयास किया जाना चाहिए.




Friday, June 24, 2011

पास्को का विरोध जायज है


'Hindustan-Lucknow-2 0/06/2011-Page-14

कोरिया की 'पोहांग आयरन एंड स्टील कं.'को ५० हजार करोड़ रूपये से भी अधिक निवेश से उडीसा के जगत सिंह पुर  जिले में महानदी डेल्टा की उपजाऊभूमि  में इस्पात  कारखाना खोलने की इजाजत नियमों एवं कानूनों का उल्लंघन करके दे दी गयी है. इसके विरोध में अभय साहू के नेत्रित्व में पिछले छः वर्षों से 'पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति'के तत्वावधान में सशक्त जन-आन्दोलन चल रहा है.लेकिन केंद्र तथा उड़ीसा की सरकारें इसकी परवाह किये बगैर विदेशी कं. के हित में कार्य कर रही हैं.  

कहा जाता है कि,यह परियोजना भारत के सार्वजनिक क्षेत्र की अनेक जानी-मानी परियोजनाओं की कुल उत्पादन क्षमता के मुकाबले भी बहुत अधिक १२० लाख टन वार्षिक इस्पात  का उत्पादन करने वाली है.अंतर राष्ट्रीय बाजार में लौह अयस्क की कीमतें बढी हुयी हैं लेकिन इस कं. को सस्ती दर पर ही उपलब्ध कराया जा रहा है.एक ही स्थान पर बेहद अधिक लौह अयस्क जमा करने से पर्यावरण पर भारी विपरीत प्रभाव पड़ेगा.यह बेहद उपजाऊ भूमि है इसके छिनने से खेती,वन,पशु-पालन आदि पर आधारित आजीविकाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने जा रहा है.जितना रोजगार यह परियोजना उपलब्ध करायेगी उससे कहीं अधिक टिकाऊ आजीविका की क्षति होगी.

जगतसिंह पुर जिले के गोबिंदपुर गाँव में ३०० मासूम बच्चे ६०० लाठी,डंडों और मशीनगन से लैस पुलिस  जवानों के समक्ष अपनी पुश्तैनी जमीन बचाने के लिए डटे हुए हैं.ग्रामीणों के साथ महिलाओं और बच्चों का यह सहयोग 'लव-कुश /राम संगर्ष 'की याद दिलाता है.तब वाल्मीकि मुनि की रण-नीति के अनुसार ऐसा करके लव-कुश ने राम पर विजय प्राप्त की थी.आज अब देखना है कल-युग में महिलायें और बच्चे कितनी जीत प्राप्त कर सकते हैं.भारत के नागरिक होने के नाते हम सब का यह पुनीत कर्तव्य है कि,हम सब उड़ीसा की जनता के साथ अपनी एकजुटता का सन्देश सरकार को दें.आज पूरे देश में 'पास्को विरोधी दिवस'मनाया जा रहा है -हम उत्तर-प्रदेश वासी तहेदिल से अपने उडिया बंधुओं के साथ हैं.हम उड़ीसा और केंद्र की सरकारों से यह मांग करते हैं कि तत्काल प्रभाव से पास्को कं. को गलत ढंग से दिया गया आदेश रद्द किया जाए और किसानों की उपजाऊ भूमि को उनसे न छीना जाए.

ममता बैनर्जी सहयोग दें

प.बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बैनर्जी ने सिंगूर और नंदीग्राम में देश की टाटा कं.को कारखाना नहीं खोलने दिया तथा किसानों की जमीन वापिस करा रही हैं.इसी प्रकार उन्हें अपने पडौसी राज्य उडीसा की ग्रामीण जनता के हक़ में वहां के मुख्यमंत्री श्री नवीन पटनायक को समझाना चाहिए.यदि वह ऐसा नहीं करती हैं तो यह समझा जाना चाहिए कि ,ममता जी केवल बंगाल का मुख्यमंत्री बनने के लिए किसान-हितैषी होने का स्वांग कर रही थीं वस्तुतः वह कुर्सीवादी हैं और किसान-हितैषी नहीं.

नवीन पटनायक राष्ट्रभक्ति का परिचय दें

उडीसा के मुख्यमंत्री नवीन जी के पिता श्री विजयेन्द्र (उर्फ़ बीजू)पटनायक ने उस वक्त असीम राष्ट्र भक्ति का परिचय दिया था जब काश्मीर पर पकिस्तान का कबाइली हमला हुआ था.बीजू पटनायक जी विमान चलाना जानते थे और कांग्रेसी नेता थे.तत्कालीन केन्द्रीय खाद्य  मंत्री रफ़ी अहमद किदवई साहब के भाई जो तब गृह मंत्रालय में सचिव थे को लेकर बीजू साहब विमान से श्रीनगर पहुंचे थे और राजा हरी सिंह के साथ भारत में विलय का समझौता कराया था.उन्हीं के पुत्र हैं नवीन पटनायक जी अतः उनसे अपेक्षा है कि अपने पिता की
भांति राष्ट्रभक्ति का परिचय देते हुए पास्को से किये गए समझौते को रद्द करने में सक्रीय कदम उठायें तथा -

निरीह किसानों की आजीविका का साधन उनकी उपजाऊ जमीने न छीनें.

यह क्षेत्र देश की सीमा की सुरक्षा की दृष्टि से भी विदेशी कं. के पास नहीं जाना चाहिए ,अतः समस्त देशवासियों से आग्रह है कि वे उड़ीसा की जनता के साथ एकजुटता बनाएं और सरकार को देश-हित में कदम उठाने पर बाध्य कर दें.


Wednesday, June 22, 2011

भ्रष्टाचार दूर करना चाहते हैं या लोकतंत्र को नष्ट करना?

दबाव से मुक्त हों संस्थाएं


पूर्व प्रधानमंत्री एच .डी देवेगौडा ने कहा है कि,लोकपाल विधेयक जल्दबाजी में नहीं बनना चाहिए.निर्णय लेने वाली संस्थाओं को इस तरह के राजनीतिक दबाव से मुक्त होना चाहिए.('हिंदुस्तान' लखनऊ में प्रथम पृष्ठ पर  प्रकाशित)

देवगौड़ा जी के ब्यान को हलके में नहीं लेना चाहिए.जब वह प्रधानमंत्री थे तो उनके मंत्रीमंडल में का.इन्द्रजीत गुप्त और का.चतुरानन मिश्र के प्रभाव से पहली बार 'लोकपाल'विधेयक संसद में पेश हुआ था,उसके बाद कई प्रयास हुए परन्तु अभी तक पास होकर क़ानून नहीं बन सका है.सुप्रसिद्ध मजदूर नेता का.गुरुदास दास गुप्त   एक लम्बे समय से भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने तथा विदेशों से काला धन वापिस करने की मांग करते आ रहे थे और जब केंद्र की सरकार में कम्युनिस्टों को भागीदारी मिली तो उनके प्रयास से सार्थक पहल हुयी थी.भाजपा ने कांग्रेस से मिल कर देवगौड़ा जी की सरकार गिरवा दी थी.

आज जब देवगौड़ा जी धैर्य रखने की बात कर रहे हैं तो उसके पीछे सार्थक कारण हैं.वस्तुतः यदि वास्तव में कम्युनिस्टों की पहल पर भ्रष्टाचार विरोधी कोई भी उपाय किया जाता है तो उससे आम जनता निश्चय ही लाभान्वित होगी परन्तु जो भ्रष्ट तत्व हैं वे ऐसा नहीं चाहते;उनका प्रयास है कि जनता को गुमराह करके एक थोथा लोकपाल बिल पास करा दिया जाये और उनका कार्य बदस्तूर जारी रह सके.इसी लिए कार्पोरेट घरानों ने स्पोंसर करके अन्ना हजारे और रामदेव को आगे खडा कर दिया है.इन दोनों द्वारा जिस प्रकार की गतिविधियाँ चल रही हैं उनसे लोकतंत्र पर संकट मंडराता दीख रहा है.एक तो वैसे ही यह लोकतंत्र मात्र दिखावे का है पर जो है उसे भी ख़त्म कर देना कौन सी अक्लमंदी है? डा. डंडा लखनवी जी ने अपनी पोस्ट 'लोकपाल होगा नहीं,होगा एप्रिल फूल' में इसी खतरे का जिक्र किया है.

धार्मिक भ्रष्टाचार ,आर्थिक भ्रष्टाचार की जननी है 

अन्ना ,रामदेव आदि जिस प्रकार के लोकपाल की बात कर रहे हैं वह निरंकुश होगा तथा जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों से भी ऊपर होगा.यदि ऐसा हो तो लोकतंत्र के क्या मायने हैं?वस्तुतः शोषण कारी ,पूंजीवादी शक्तियां जो साम्राज्यवादियों का खेल खेल रही हैं चाहती ही नहीं कि देश में लोकतंत्र रहे.उनका उद्देश्य अपने मुनाफे और लूट को बढ़ाना है.इसलिए अन्ना और रामदेव के आन्दोलन जनता का ध्यान वास्तविकता से हटाने हेतु चलवाए गए हैं न कि भ्रष्टाचार दूर करने हेतु.

कुछ माह पहले हमारे घर के पास 'सत्य नारायण वेद प्रचार ट्रस्ट'के तत्वाधान में हुए एक कार्यक्रम में एक आर्यसमाजी उपदेशक महोदय बता रहे थे कि हमारे देश में जन्मते ही बच्चे को लेने की आदत डाल दी जाती है,देना तो सिखाया ही नहीं जाता.उन्होंने उदाहरण देकर बताया था कि,जन्म के समय बच्चे को सब हथौना देते हैं,फिर नामकरण,मुंडन ,कर्णछेदन ,अन्नप्राशन आदि आदि तमाम संस्कारों पर बच्चा लेता ही लेता है.बड़ा होने पर जन्म दिन,पढ़ाई शुरू करने,परीक्षा में उत्तीर्ण होने,विवाह होने सभी कार्यक्रमों में वह लेता आ रहा होता है.अतः नौकरी मिलने पर वह रिश्वत लेने लगता है,व्यापार करने पर टैक्स में हेर-फेर कर लेता है,उद्योगपति बन कर मजदूरों का हक़ हड़प लेता है.आर्यसमाजी  उपदेशक महोदय ने बहुत जोर देकर कहा कि बच्चे को लेना ही लेना सिखाने वाला यह समाज और वे धार्मिक के नाम पर व्याप्त कुरीतियाँ ही आज के भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार हैं.

अभी २० जून को ही हिन्दुस्तान,लखनऊ ने एक धार्मिक भ्रष्टाचार का खुलासा करते हुए एक प्रो.पुत्री के ठगे जाने का विस्तृत समाचार छापा था.लखनऊ यूनिवर्सिटी के पास गोमती नदी पर बने पुल को हनुमान सेतु के नाम से अब जाना जाता है.१९६१ में हम लोगों ने जब लखनऊ छोड़ा था तब यह बन कर तैयार हो गया था.उससे पहले एक नीचा पुल था जो इससे थोडा पूर्व की और था और उसे तब मंकी ब्रिज कहा जाता था.उसके किनारे एक हनुमान मंदिर था.वह पुल टूट गया अब नया वाला  ही है और यहाँ भी एक बड़ा हनुमान मंदिर स्थापित हो गया है.रोजाना भी और मंगल के दिन विशेष तौर पर यहाँ कारों,मोटर साईकिलों,स्कूटरों से आने वाले समृद्ध एवं प्राभावशाली लोग जिनमें तमाम प्राशसनिक और पुलिस अधिकारी भी शामिल हैं ,प्रो.,डा.,वकील भी हैं,गरीब और साधारण लोगों की तो बात ही नहीं.क्या गजब तमाशा है-जिस इंसान ने (मजदूर ने)वह मूर्ती गढ़ दी वह तो उपेक्षित है परन्तु उसकी रचना यह मूर्ती पूजी जाती है.सब कुछ होता है उस  दलाल के माध्यम से जो पूजने वाले और मूर्ती के बीच बिचौलिया है.ऐसे ही बिचौलिया सरकारी दफ्तरों में काम करवाने वाली जनता तथा काम करने वाले कर्मचारी एवं अधिकारी के मध्य दलाली करते हैं.अन्ना हजारे और रामदेव इस भ्रष्टाचार के विरुद्ध जबान खोलने के लिए तैयार ही नहीं हैं फिर वे क्या ख़ाक भ्रषाचार दूर करेंगे?इसी प्रकार कितने मंदिर,मस्जिद,मजार आदि -आदि इस देश में हैं जहाँ भ्रष्टाचार पुष्पवित -पल्लवित होता है ;दान के नाम पर मजदूरों का खून चूस कर लूटा गया पैसा इन्हीं के माध्यम से पुण्य में परिवर्तित होता रहता है,उसके विरुद्ध कोई भी जबान नहीं खोलना चाहता है और भ्रष्टाचार दूर करने का नारा देने  वाला मसीहा बन जाता है.

निर्वाचित प्रतिनिधियों की वापिसी

यदि सच में भ्रष्टाचार दूर करना है तो कानपूर की पत्रकार सुश्री  कृति बाजपेयी द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों को वापिस बुलाने वाली मांग जिसे १९७४ में लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने तब जोर शोर से उठाया था को अमली जामा पहनाया जाना चाहिए.यह एक लोकतांत्रिक मांग है और यह भ्रष्टाचार के राजनीतिक संस्करण पर रोक लगाने में सक्षम उपाय होगा.जब राजनीतिग्य पद जाने से भयभीत होकर भ्रष्टाचार से दूर रहेंगें तभी वे ब्यूरोक्रेट्स की भी लगाम कस सकेंगें एवं उनके विरुद्ध कड़ी कारवाई होगी.अन्ना और रामदेव की मांगों में ये बात शामिल नहीं हैं ,क्योंकि वे तो कारपोरेट घरानों द्वारा तय एजेंडे पर चल रहे हैं,जन-साधारण का हित उनकी मांगों में शामिल हो तो हो कैसे?

सुश्री कृति ने अपनी एक और पोस्ट में 'भारत,पकिस्तान एवं बांग्लादेश'के एकीकरण अथवा संघ निर्माण की बात भी कही है.यदि ऐसा हो तो तीनों देशों का रक्षा खर्च बचे जो वहां की जनता पर कल्याणार्थ खर्च हो सकता है.अधिकाँश रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार की गूँज सुनायी दी है और बोफोर्स काण्ड में तो राजीव गांधी को अपनी सरकार ही गवानी पड़ गयी थी.युद्धक सामान बनाने वाली कम्पनियाँ जिन पर अमेरिका का अस्तित्व टिका है कभी विश्व में शांति नहीं चाहतीं ,वे ऐसा होने नहीं देंगीं.भारत विभाजन ही साम्राज्यवाद (साम्प्रदायिकता उसी की सहोदरी है)की घिनौनी साजिश का परिणाम है.अमेरिकी कार निर्माता क.'फोर्ड'ने बाकायदा 'फोर्ड फाउंडेशन'के माध्यम से विश्व हिन्दू परिषद् को दान दिया था.ईसाइयत के अनुयायिओं ने हिन्दू संगठन को दान धार्मिक आस्था से नहीं साम्राज्यवादी कूटनीति के तहत दिया था,जिसका परिणाम दंगों और असंख्य बेगुनाहों की मौत के रूप में सामने आया था.

थोथी बातें करके वाहवाही लूटना अलग बात है और ठोस तथा वास्तविक चिंतन करके समस्या का वास्तविक निदान करना दूसरी बात.धमकी देकर अपनी मनमानी करवाने की कोशिशों को लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता.अन्ना एवं रामदेव के आंदोलनों को इसी परिप्रेक्ष में देखा जाना चाहिए और जैसा भी लोकतंत्र है उसे बचाने का प्रयास किया जाना चाहिए.

Monday, June 20, 2011

पढ़े -लिखे लोग भी ठगी का शिकार क्यों होते हैं?


Hindustan-20/06/2011-page-3,Lucknow
हिन्दुस्तान,लखनऊ के २० जून २०११ के अंक में पृष्ठ ३ पर अलीगंज,लखनऊ निवासी एक प्रो.पुत्री के ठगी का शिकार होने की दर्दनाक व्यथा छपी है.२१ वर्ष पूर्व गुडगाँव के सेक्टर सात वाले हिमगिरी बाबा ने भी एक माँ-बेटी को झांसा देकर ठगा था वे लोग भी पढ़े-लिखे ही थे.इस सम्बन्ध में 'सप्तदिवा',आगरा में छपे अपने लेख को इसी ब्लॉग पर मैंने २५ .०४ .२०११ को 'तन,मन,धन गुरु जी के अर्पण' शीर्षक से दिया था.बेहद अफ़सोस होता है इस प्रकार के समाचार पढ़ कर और तरस आता है इन पढ़े-लिखे लोगों की बुद्धी पर कि,वे क्यों और कैसे गुमराह हो जाते हैं.वैसे मैं इसका उत्तर भी जानता हूँ और कई बार इसी ब्लॉग में दोहरा भी चूका हूँ-

अर्थशास्त्र में ग्रेषम  का एक सिद्धांत है ,'खराब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है'.यही सिद्धांत सभी क्षेत्रों में लागू होता है.लोग आजकल प्रचार,मार्केटिंग इत्यादि को महत्व देते हैं न कि वास्तविक ज्ञान को और उसी का नतीजा होते हैं -लखनऊ एवं गुडगाँव जैसे हादसे.इस ब्लॉग के माध्यम से मैं धर्म,ज्योतिष आदि की आड़ में फैले ढोंग-पाखण्ड के प्रति लोगों को लगातार आगाह करता आ रहा हूँ.कुछ चुने हुए विशेष आलेख इस प्रकार हैं---

१.-१० .०७ २०१० को 'धर्म के नाम पर अधर्म का बोलबाला' (१० .०४ २०११ को पुनर्प्रकाशन भी)

२.- १३ .०८.२०१० को 'समस्या धर्म को न समझना ही है'

३.-१४ .०९.२०१० को 'ढोंग,पाखण्ड और ज्योतिष'

४.-२३.०९.२०१० को 'ज्योतिष और हम'

५.-२४.०९.२०१० को 'प्रलय की भविष्यवाणी झूठी है,यह दुनिया अनूठी है'

६.-१४.१०.२०१० को 'उठो जागो और महान बनो'

७.-२५.१०.२०१० को 'धर्म और विज्ञान'

८.-२८.१०.२०१० को 'पूजा क्या?क्यों?और कैसे?'

९.-११.११.२०१० को 'सूर्य उपासना का वैज्ञानिक दृष्टिकोण'

१०.-०६.१२.२०१० को 'श्रधा,विश्वास और ज्योतिष'   

मेरा उद्देश्य यह था कि इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले सभी लोग पढ़े-लिखे और विद्वान हैं और वे किसी से गुमराह न हो सकें इसलिए वैज्ञानिक आधार पर सत्य को सब के समक्ष रख रहा था.किन्तु प्रतिगामी एवं निहित-स्वार्थी शक्तियों ने बजाए उनका लाभ उठाने के मेरे विरुद्ध अनर्गल प्रचार -अभियान चला दिया.ऐसे लोगों ने वैज्ञानिक निष्कर्षों को अधार्मिक ,मूर्खतापूर्ण,बे पर की उड़ान कह कर मखौल उड़ाया तथा आर.एस.एस. सम्बन्धी ब्लागर्स ने सुनियोजित तरीके से लोगों को गुमराह किया.ऐसे लोग खुद को धर्म का ठेकेदार समझते हैं और गर्व से खुद को 'हिन्दू'घोषित करते हैं.इस सम्बन्ध में 'लोक संघर्ष पत्रिका',जून २०११ के अंक में भिक्षु विमल कीर्ति महास्थविर (मो.-०७३९८९३५६७२)ने बहुत तर्क-संगत विचार प्रस्तुत किये हैं,उनका अवलोकन करने से वास्तविकता का आभास होगा-

"हिन्दू'शब्द मध्ययुगीन है.श्री रामधारी सिंह दिनकर के शब्दों में 'हिन्दू'शब्द हमारे प्राचीन साहित्य में नहीं मिलता है .भारत में इसका सबसे पहले उल्लेख ईसा की आठवीं सदी में लिखे गए एक 'तंत्र ग्रन्थ'में मिलता है.जहां इस शब्द का प्रयोग धर्मावलम्बी के अर्थ में नहीं किया गया जाकर,एक 'गिरोह' या'जाति के अर्थ में किया गया है.

गांधी जी भी 'हिन्दू'शब्द को विदेशी स्वीकार करते हुए कहते थे-हिन्दू धर्म का यथार्थ नाम,'वर्णाश्रमधर्म  ' है.

हिन्दू शब्द मुस्लिम आक्रमणकारियों का दिया हुआ एक विदेशी नाम है.'हिन्दू'शब्द फारसी के 'गयासुललुगात'नामक शब्दकोष में मिलता है .जिसका अर्थ-काला,काफिर,नास्तिक,सिद्धांत विहीन,असभ्य,वहशी आदि है और इसी घ्रणित नाम को बुजदिल लोभी ब्राह्मणों ने अपने धर्म का नाम स्वीकार कर लिया है.

हिंसया यो दूषयति अन्यानां मानांसी जात्यहंकार वृन्तिना सततं सो हिन्दू : से बना है ,जो जाति अहंकार के कारण हमेशा अपने पडौसी या अन्य धर्म के अनुयायी का,अनादर करता है,वह हिन्दू है.डा.बाबा साहब आंबेडकर ने सिद्ध किया है कि,'हिन्दू'शब्द देश वाचक नहीं है,वह जाति वाचक है.वह 'सिन्धु'शब्द से नहीं बना है.हिंसा से 'हिं'और दूषयति से 'दू'शब्द को मिलाकर 'हिन्दू'बना है.

अपने आपको कोई 'हिन्दू'नहीं कहता है,बल्कि अपनी-अपनी जाति बताते हैं."

परन्तु दुखद स्थिति यह है कि 'हिदू'अलंबरदारों ने जान बूझ कर मेरे वैज्ञानिक विश्लेषणों को जो अर्वाचीन ऋषि-मुनियों की खोजों पर आधारित थे को गलत करार दिया है.ग्रेषम के नियम के अनुसार गलत बातों का असर तेजी से होता है.नतीजा फिर चाहे लखनऊ के अलीगंज में प्रो.पुत्री के साथ ठगी हो चाहे गुडगाँव में हुयी वर्षों पूर्व ठगी हो धडाके से चलती रहती है.लोग ठोकर खा कर भी नहीं सम्हलते हैं,नहीं सम्हलना चाहते हैं.लुटना-  ठगा जाना और मिटना लोगों को कबूल है,लेकिन सत्य को स्वीकारना मंजूर नहीं है.वर्ना इंटरनेट का प्रयोग करने वाले धर्म की आड़ में नहीं ठगे जा सकते थे.लगभग एक वर्ष से 'क्रन्तिस्वर'पर पढ़े-लिखे लोगों को ही आगाह किया जा रहा है और इसी का प्रभाव है कि अब दुसरे शहरोंके  बामपंथी ब्लागर्स भी वैज्ञानिक ज्योतिषीय समाधान हेतु मुझ से संपर्क कर लाभ उठाने लगे हैं.परन्तु चूंकि वे बामपंथी होने के नाते समझदार हैं ,'हिन्दू' नासमझ नहीं हैं जो सही बात की मुखालफत करते फिरें.

लोग चमत्कार को नमस्कार करने के चक्कर में अपना तिरस्कार बखूबी करा लेते हैं ,जिसका ताजा-तरीन नमूना है प्रो.पुत्री का इस प्रकार ठगा जाना.यदि इसी शहर में रह कर भी कोई सस्ता वैज्ञानिक समाधान न कराये और बाहर के ठगों के जाल में धर्म और मंदिर के नाम पर फंसे तो इसे अपने पावों पर अपने आप कुल्हाड़ी चलाना ही कहा जाना चाहिए.