Wednesday, September 28, 2011

आधुनिक शिशुपाल शर्मा-न्याय मूर्ति आलोक बोस


बाराबंकी जो हमारा गृह जिला है काफी भाग्यशाली रहा जो वहाँ के जिला जज के रूप मे न्याय मूर्ति आलोक कुमार बोस का आगमन हुआ। बोस साहब ने आते ही न्यायालय क्षेत्र का वास्तविक निरीक्षण किया और रेकार्ड्स का भौतिक सत्यापन कराया। सर्व-प्रथम तो उन्होने रिजर्व बैंक द्वारा जमींदारी -उन्मूलन के समय जारी किए गए मुआवजा बाण्ड्स जो दोहरे तालों मे सील किए रखे थे खुलवा कर देखे तथा उनके दावेदारों को वितरण की पहल की। अब ये बाण्ड्स पूर्व जमींदारों के उत्तराधिकारियों को 25 सितंबर 2011 को विशेष लोक -अदालत मे वितरित किए जा चुके हैं,जिनकी स्कैन कापी नीचे देख सकते हैं । वंचितों को न्याय प्रदान कर बोस साहब ने तो अपने कर्तव्य का वास्तविक पालन किया किन्तु हमे यह विश्वास होता है कि यदि सभी न्यायाधीश ही नहीं सभी अधिकारी उनका अनुसरण करें तो समाज मे व्याप्त कुंठा और उपेक्षा भाव को भी समाप्त किया जा सकता है एवं न्याय का शासन भी स्थापित किया जा सकता है। 

बोस साहब ने अपने कार्यालय के कर्मचारियों द्वारा अतीत मे दबाई हजारों फाइलों (समाचार की कटिंग का स्कैन नीचे देखें) को सामने निकलवा कर दोषी दर्जनभर  कर्मचारियों को सस्पेंड ,एक को बर्खास्त कर दिया  तथा 134 के विरुद्ध न्यायिक जांच कमेटी बैठा दी ,एक की पेंशन तथा जांच चलने तक दोषी कर्मचारियों की फंड से धन निकासी पर रोक लगा दी। 

आज शहीद भगत सिंह के जन्मदिवस पर एक कर्तव्यनिष्ठ न्यायाधीश आलोक कुमार बोस साहब का अभिनन्दन करते हुये हाई स्कूल मे पढ़ी एक विद्वान लिखित कहानी मे' सम्राट अशोक 'की न्याय-व्यवस्था की लोकप्रियता मे उनके न्याय मंत्री शिशुपाल शर्मा जी की याद आ गई और लगा कि हमारे न्याय मूर्ति आलोक बोस साहब भी आधुनिक शिशुपाल शर्मा ही हैं। 

'अर्थशास्त्र'के रचयिता कौटिल्य /चाणक्य ने जिन चंद्र गुप्त मौर्य को चक्रवर्ती सम्राट बनवाया था उन्ही के पौत्र थे सम्राट अशोक और उनकी न्याय-व्यवस्था इतिहास मे ही अमर नहीं है अपने काल मे बेहद लोकप्रिय भी थी जिसके पीछे थे न्यायमन्त्री शिशुपाल शर्मा जी। शिशुपाल जी ने गुप्तचर व्यवस्था पर भी गुप्तचरी की व्यवस्था कर रखी थी। उन्हें नित्य सम्पूर्ण ब्यौरा उपलब्ध होता रहता था और वह जनता की ओर से शिकायत पहुँचने से पूर्व ही न्याय कर दिया करते थे। यही कारण था कि जनता अपने शासक सम्राट अशोक को बहौत चाहती थी। 

सम्राट अशोक अपने न्यायमन्त्री शिशुपाल शर्मा का बहुत आदर -सम्मान करते थे। एक बार उनके मन मे आया कि जरा अपने न्यायमन्त्री का न्याय जांचा जाये। सम्राट अशोक भेष बदल कर नगर मे शाम को दिन ढलते ही विचरण को निकाल पड़े और कुछ लोगों से पूछा कि किसी को कोई शिकायत हो तो बताए। जब किसी से उन्हें कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई तो गुप्तचरों की कार्यप्रणाली जाँचने हेतु एक विधवा के मकान का दरवाजा खट-खटाया  और न खुलने पर दरवाजे  को झकझोरना शुरू कर दिया ,शिकायत किसी नागरिक ने उचित स्थान पर कर दी और एक कर्तव्यनिष्ठ गुप्तचर अपना वेश बदल कर मौके पर पहुंचा ,वह वेश बदले सम्राट अशोक को पहचान न सका और उसके जब समझाने से भी वह वहाँ से नहीं हटे तो उन्हें बल पूर्वक हटाना चाहा जिस पर दोनों मे संघर्ष हुआ और अशोक ने गुप्त हथियार से उस गुप्तचर पर वार कर दिया जिससे उसका प्राणान्त हो गया। वेश बदले सम्राट अशोक वहाँ से तुरंत हट गए और राजसी-वेश मे महल पहुँच गए । जब कई दिन तक शिशुपाल शर्मा अपने गुप्तचर के हत्यारे का पता न लगा सके तो सम्राट अशोक ने कहा अब प्रयास छोड़ दीजिये बेकार है। परंतु शिशुपाल शर्मा ने कहा मै हत्यारे को हत्या का दण्ड दिये बगैर प्रयास नही छोड़ सकता। 

शिशुपाल खुद जांच पर निकले परंतु कोई नहीं बता सका कि उस रात किस व्यक्ति ने हत्या की । परेशान शिशुपाल उस विधवा के मकान के पास भी गए और विचारमग्न ही थे कि उस महिला ने उन्हें पहचानते हुये भीतर बुलाया और कहा मै आपको हत्यारे का पता बता देती हूँ परंतु आप उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाएंगे क्योंकि वह खुद सम्राट अशोक हैं। शिशुपाल ने उस महिला से सम्पूर्ण संघर्ष की कहानी ज्ञात की और निर्देश दिया कि उन्होने सम्राट को पहचान लिया था यह बात किसी को न बताएं। शिशुपाल ने सम्राट अशोक को सूचित किया कि हत्यारे का पता लग गया है और उसे (निश्चित तिथि बताते हुये ) फांसी दे दी जाएगी। 

सम्राट अशोक ने समझा कि शिशुपाल किसी गलत और बेगुनाह को फांसी पर चढ़ा देंगे तब उनसे उनके न्याय का हिसाब मांगेंगे। लेकिन शिशुपाल ने एक सुनार से गुप्त रूप से सम्राट अशोक की सोने की मूर्ती बनवाई और जेब मे डाल कर फैसले के दिन  दरबार मे पहुँच गए । निश्चित समय पर सम्राट ने पूछा अपराधी कहाँ है?न्यायमन्त्री बोले अभी उसे हाजिर भी कर रहा हूँ और यहीं दण्ड भी दे रहा हूँ। सम्राट अशोक अचंभित थे कि हो क्या रहा है?शिशुपाल ने पहले फैसला सुनाया कि गुप्तचर का हत्यारा यहीं दरबार मे है और उसे अभी फांसी दी जा रही है फिर सारा वृतांत बताया। जेब से सम्राट अशोक की मूर्ती निकाल कर उन्ही के सामने कर्मचारी को देकर फांसी पर लटकवा दिया। सम्राट अशोक ,सारे दरबारी और जनता सभी हैरान थे। 

शिशुपाल ने सम्राट अशोक को उनकी दी राज मुद्रा लौटाते हुए  पद-त्याग दिया। सम्राट अशोक ने कहा वह उद्दंड था इस लिए मार दिया परंतु शिशुपाल ने यह तर्क स्वीकार नहीं किया उन्होने सम्राट पर अकेली विधवा महिला के घर रात के अंधेरे मे जाने, उसे परेशान करने और गुप्तचर की हत्या करने के मामले मे क्षमा नहीं किया न ही यह तर्क माना उनका अभीष्ट उसे मारना नहीं था वह केवल डरा रहे थे पर वह धोखे मे मारा गया। न ही उन्होने सम्राट द्वारा फिर ऐसा न होने के आश्वासन को माना। 

ऐसी थी शिशुपाल शर्मा की न्याय-व्यवस्था जिसने सम्राट अशोक को लोकप्रियता की बुलंदियों पर पहुंचाया था। राज्य मे अपराध ही नहीं होते थे ,होते तो कड़े दण्ड दिये जाते थे। न्यायमन्त्री ने सम्राट तक को नहीं क्षमा किया। आज विपरीत स्थितियाँ तो हैं उनमे भी न्याय मूर्ति आलोक कुमार बोस साहब ने जिस अदम्य-साहस का परिचय दिया है और जनता को उसका वास्तविक न्याय दिलाना प्रारम्भ किया है उससे आशा की एक किरण दिखाई देती है। यदि सम्पूर्ण न्याय-व्यवस्था न्याय मूर्ति आलोक कुमार बोस साहब की भांति दृढ़ निश्चय कर ले तो विदेशियों से प्रभावित और उनके हक के लिए काम करने वाले अन्ना-टीम के गुब्बारे की हवा निकलते देर नहीं लगेगी।

Hindustan-Lucknow-27/09/2011

Hindustan-Lucknow-27/09/2011



Hindustan-Lucknow-26/09/2011





Sunday, September 25, 2011

डा सुब्रह्मण्यम स्वामी चाहते क्या हैं?

(मूल रूप से यह लेख 1990 मे लिखा था जो प्रेस के सांप्रदायिक प्रभाव में होने के कारण प्रकाशित   नहीं किया  गया था ,मुझे लगता है परिस्थितियों मे कोई बदलाव नहीं हुआ है अतः इसे ब्लाग पर दे रहा हूँ)

डा सुब्रह्मण्यम स्वामी जनसंघ और संघ के एक समर्पित कर्मठ नेता रहे हैं। आपात काल मे भूमिगत रह कर इन्होने इंदिरा गांधी को नाकों चने चबवाये थे। गिरफ्तारी से बच कर अमेरिका चले गए बीच मे आकर राज्यसभा के अधिवेशन मे भाग लेकर इंदिरा गांधी को चौंका दिया फिर पंजाबी न जानते हुये भी सिख-वेश मे पुनः फरार हो गए। जनसंघ के जनता पार्टी मे विलय के पश्चात संघ ने प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई के पीछे डा सुब्रह्मण्यम स्वामी को ही लगाया था। अटल बिहारी बाजपेयी चौ.चरण सिंह के पीछे और नाना जी देशमुख जनता पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर के पीछे छाये रहे।

जनता पार्टी के तीसरे विभाजन के समय अटल जी भाजपा के अध्यक्ष बन कर चले गए। नाना जी देशमुख इंदिरा जी के साथ होकर सक्रिय राजनीति से पीछे हट गए और डा स्वामी जनता पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर के साथ चिपक गए और मोरारजी से भी संबन्ध बरकरार रखे रहे। मोरारजी के मन्त्र पर  चंद्रशेखर के विरुद्ध जनता पार्टी अध्यक्ष का चुनाव लड़ा -हार गए और चंद्रशेखर पर तानाशाही व हेरा-फेरी का आरोप लगाने के कारण शेखर जी द्वारा जनता पार्टी से निष्कासित किए गए।

मोरारजी द्वारा सक्रिय राजनीति से निष्क्रिय होने पर संघ के आदेश पर जनता पार्टी मे चंद्रशेखर से माफी मांग कर पुनः शामिल हो गए और उन्हें अपना स्वामी बना लिया। जनता पार्टी के जनता दल मे विलय होने पर चंद्रशेखर और संघ के प्रथक-प्रथक आदेशों पर डा स्वामी ने इन्दु भाई पटेल की अध्यक्षता मे जनता पार्टी को जीवित रखा जिसे राजीव सरकार की कृपा से चुनाव आयोग ने जनता पार्टी (जे पी) के रूप मे पंजीकृत कर लिया।

1980 से ही संघ इंदिरा कांग्रेस समर्थक कारवाइयाँ कर रहा था। आपात काल मे' देवरस-इंदिरा सम्झौता ' हो गया था और उसी का परिणाम पहले मोरारजी फिर वी पी सरकारों का पतन रहा। मधुकर दत्तात्रेय (उर्फ बाला साहब) देवरस चाहते हैं कि,संघ उनके जीवन काल मे सत्ता पर काबिज हो जाये। इसके लिए डा जयदत्त पन्त के मतानुसार उन्होने लक्ष्य रखा था कि,शहरों का 2 प्रतिशत और गावों का 3 प्रतिशत जनसमर्थन प्राप्त कर लिया जाये जो संभवतः रामजन्म भूमि आंदोलन बनाम आडवाणी कमल रथ यात्रा से पूरा हो गया लगता है।

जनता दल सरकार का विघटन कराने मे संघ ने दोतरफा कारवाई की। बाहरी हमले के रूप मे आडवाणी कमल रथ यात्रा सम्पन्न कराकर प्रत्यक्ष रूप से वी पी सरकार को गिरा दिया । दूसरे कदम के रूप मे डा स्वामी के माध्यम से जनता दल मे चंद्रशेखर समर्थक लाबी बनवाकर दल का विभाजन करा दिया और राजीव कांग्रेस की मदद से चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री बनवा दिया। संघ के निर्देश पर चंद्रशेखर सरकार मे डा स्वामी कानून और बानिज्य जैसे महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री बन कर संघ की सत्ता प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं।

भाजपा सांसद जस्वन्त सिंह पूर्व मे ही बोफोर्स तोपों को सही ठहरा चुके हैं। अतः बोफोर्स कमीशन भी भाजपा बनाम संघ की निगाह मे जायज है और बानिज्य मंत्री के रूप मे डा स्वामी राजीव भैया को बोफोर्स कमीशन की दलाली के दलदल से उबारने का प्रयास करेंगे।

कानून मंत्री के रूप मे डा स्वामी ने सर्वप्रथम व्यवस्थापिका का अवमूल्यन करने हेतु लोकसभा अध्यक्ष श्री रबी रे को गिरफ्तार करने की धमकी  दी जिसमे पाँसा उलटते देख कर माफी मांग ली फिर हाईकोर्ट ,दिल्ली मे अपने सचिव से हलफनामा दाखिल कराकर लोकसभा अध्यक्ष के अधिकारों को दल -बदल कानून की आड़ मे चुनौती दी जहां फिर मुंह की खानी पड़ी।

बचकाना हरकतें नहीं:

प्रेस मे डा स्वामी की कारवाईयों को बचकाना कह कर उपहास  उड़ाया जा रहा है उनकी गंभीरता पर विचार नहीं किया जा रहा। हारवर्ड विश्वविद्यालय,अमेरिका का यह विजिटिंग प्रोफेसर न केवल प्रकाण्ड विद्वान है वरन दिलेरी के साथ बातें कह कर अपने मंसूबों को कभी छिपाता नहीं है।

डा स्वामी को जब चीन सरकार ने आमंत्रित किया तो दिल्ली हवाई अड्डे पर आपने पत्रकारों से दो-टूक कहा था कि,"मै रूस विरोधी हूँ इसलिए चीन सरकार ने मुझे ही बुलाया"। आप इज़राईल के प्रबल समर्थक हैं जो कि,साम्राज्यवाद के सरगना अमेरिका का कठपुतली देश है सांसद का .सुभाषिणी अली ने 11 जनवरी 1991  को चंद्रशेखर सरकार से मांग की है कि,अक्तूबर 1990 मे 'इंडियन एक्स्प्रेस'मे छ्पे समाचारों मे डा स्वामी ने श्री लंका के विद्रोही 'लिट्टे छापामारों' और इज़राईली गुप्तचर संगठन 'मोसाद'मे संपर्क कराने की जो स्वीकारोक्ति की है उसकी जांच की जाये। डा स्वामी जो करते रहे हैं या कर रहे हैं उसमे उन्हें का .सुभाषिणी अली की हिदायत की आवश्यकता नहीं है वह तो उनके संघ से प्राप्त आदेशों का पालन करना था न कि कम्यूनिस्टों की संतुष्टि करना।

अब क्या करेंगे?:

डा सुब्रह्मण्यम स्वामी हर तरह की संदेहास्पद गतिविधियां जारी रख कर 'लोकतान्त्रिक ढांचे की जड़ों को हिलाते रहेंगे' और संघ सिद्धांतों की सिंचाई द्वारा उसे अधिनायकशाही  की ओर ले जाने का अनुपम प्रयास करेंगे।

07 नवंबर 1990 को वी पी सरकार के लोकसभा मे गिरते ही चंद्रशेखर ने तुरन्त आडवाणी को गले मिल कर बधाई दी थी और 10 नवंबर को खुद प्रधानमंत्री बन गए। चंद्रशेखर के प्रभाव से मुलायम सिंह यादव जो धर्म निरपेक्षता की लड़ाई के योद्धा बने हुये थे 06 दिसंबर 1990 को विश्व हिन्दू परिषद को सत्याग्रह केलिए बधाई और धन्यवाद देने लगे। राजीव गांधी को भी रिपोर्ट पेश करके मुलायम सिंह जी ने उत्तर-प्रदेश के वर्तमान दंगों से भाजपा,विहिप आदि को बरी कर दिया है।

आगरा मे बजरंग दल कार्यकर्ता से 15 लीटर पेट्रोल और 80 लीटर तेजाब बरामद होने ,संघ कार्यकर्ताओं के यहाँ बम फैक्टरी पकड़े जाने और पुनः शाहगंज पुलिस द्वारा भाजपा प्रतिनिधियों से आग्नेयास्त्र बरामद होनेपर भी सरकार दंगों के लिए भाजपा को उत्तरदाई नहीं ठहरा पा रही है। छावनी विधायक की पत्नी खुल्लम-खुल्ला बलिया का होने का दंभ भरते हुये कह रही हैं प्रधानमंत्री चंद्रशेखर उनके हैं और उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। चंद्रास्वामी भी विहिप की तर्ज पर ही मंदिर निर्माण की बात कह रहे हैं।

संघ की तानाशाही:

डा सुब्रह्मण्यम स्वामी,चंद्रास्वामी और चंद्रशेखर जिस दिशा मे योजनाबद्ध ढंग से आगे बढ़ रहे हैं वह निकट भविष्य मे भारत मे संघ की तानाशाही स्थापित किए जाने का संकेत देते हैं। 'संघ विरोधी शक्तियाँ' अभी तक कागजी पुलाव ही पका रही हैं। शायद तानाशाही आने के बाद उनमे चेतना जाग्रत हो तब तक तो डा स्वामी अपना गुल खिलाते ही रहेंगे।

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यह लेख 1990 की परिस्थितियों मे लिखा गया था जिसे भयभीत प्रेस ने अपने समाचार पत्रों मे स्थान नहीं दिया था। 


 आज ब्लाग के माध्यम से इसे सार्वजनिक करने का उद्देश्य यह आगाह करना है कि 'संघ' अपनी योजना के अनुसार आज केवल एक दल भाजपा पर निर्भर नहीं है 30 वर्षों(पहली बार संघ समर्थन से इंदिरा जी की सरकार 1980 मे  बनने से)  मे उसने कांग्रेस मे भी अपनी लाबी सुदृढ़ कर ली है और दूसरे दलों मे भी । अभी -अभी अन्ना के माध्यम से एक रिहर्सल भी संसदीय लोकतन्त्र की चूलें हिलाने का सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया है।(हिंदुस्तान,लखनऊ ,25 सितंबर 2011 के पृष्ठ 13 पर प्रकाशित समाचार मे विशेज्ञ विद्व जनों द्वारा अन्ना के जन लोकपाल बिल को संविधान विरोधी बताया है। )   जिन्होने अन्ना के  राष्ट्रद्रोही आंदोलन की पोल खोली उन्हें गालियां दी गई  ब्लाग्स मे भी फेस बुक पर भी और विभिन्न मंचों से भी और जो उसके साथ रहे उन्हें सराहा गया है। यह स्थिति  देश की आजादी और इसके लोकतन्त्र के लिए खतरे की घंटी है। समस्त  भारत वासियों का कर्तव्य है कि विदेशी साजिश को समय रहते समझ कर परास्त करें अन्यथा अतीत की भांति उन्हें एक बार फिर रंजो-गम के साथ गाना पड़ेगा-'मरसिया है  एक का,नौहा  है सारी कौम का '।


Hindustan-Lucknow-25/09/2011

Thursday, September 22, 2011

सड़क पर हुई वार्ता का ब्यौरा

यूं तो वार्ताएं पहले से तय प्रोग्राम के आधार पर होती हैं और किसी निश्चित स्थान पर होती हैं। सड़क पर हुई कोई भी बात महत्वपूर्ण नहीं होती है। परंतु मै यहाँ जिस वार्ता को सड़क पर सम्पन्न होने के बावजूद महत्व दे रहा हूँ उसके पीछे ठोस कारण हैं। यहाँ पुस्तक मेला चल रहा है और गत वर्ष की ही भांति हम इस बार भी पुस्तक मेला का भ्रमण करने गए थे। रविवार का दिन था और उस दिन बैंकों मे भर्ती की कोई परीक्षा भी हो रही थी। पास ही मे किसी कालेज मे परीक्षा दे रहे उम्मीदवारों के अभिभावक सड़क पर खड़े वार्ता कर रहे थे। वैसे मेरी  आदत बीच मे कूद पड़ने की नहीं है। चूंकि वे लोग अन्ना की तारीफ़ों के पुल बांध रहे थे ,मुझे अच्छा नहीं लगा और मै रुक कर चुप-चाप उनकी बातों को सुनने लगा। कुछ छात्रों को सेंटर से लौटा दिया गया था जब एक साहब ने उस संबंध मे प्रश्न उठाया तो मैंने हस्तक्षेप करते हुये बात को अन्ना -आंदोलन की तरफ मोड दिया और उन लोगों को समझाया कि अमेरिकी प्रशासन और उनकी कारपोरेट कंपनियों के चंदे से यह आंदोलन हमारे संविधान को ध्वस्त करने,संसद की गरिमा को खत्म करने और भारतीय कारपोरेट कंपनियों के भ्रष्टाचार को ढकने हेतु चलाया गया था जिसे कांग्रेस के मनमोहन गुट का भी समर्थन प्राप्त था।

धारा 370 को हटाने की मांग के पीछे छिपे राष्ट्र विरोधी मंतव्यों की भी उनसे चर्चा की और उनहे समझाया कि यह जोजीला दर्रे मे छिपे प्लेटिनम को विदेशियों के हवाले करने की मांग है। 1980 से आर एस एस द्वारा कांग्रेस के एक गुट का समर्थन करने की बात भी उन्हें समझाई तथा डा जय दत्त पन्त द्वारा बाला साहब देवरस की योजना का खुलासा करने की बात भी उन्हें समझाई जिसके अनुसार शहरों का 2 प्रतिशत और गावों का 3 प्रतिशत समर्थन प्राप्त करके आर एस एस अपनी अर्ध सैनिक तानाशाही स्थापित कर सकता है।

वे सभी लोग काफी समझदार थे उन्हें आसानी से सारी बातें समझ आ गईं और उन्होने मुझ से मेरे ब्लाग्स के रेफरेंस भी लेकर नोट कर लिए। फिर मेरा परिचय मांगने पर जब उन्हें बताया कि पेशे से ज्योतिषी और राजनीतिक रूप से कम्यूनिस्ट हूँ तो उन्हें आश्चर्य भी हुआ और स्पष्टीकरण मांगा कि कम्यूनिस्ट पार्टी माने अतुल अनजान  की पार्टी । जब जवाब हाँ मे दिया तो बोले अनजान साहब की पार्टी तो अच्छी पार्टी है । जैसे आगरा मे भाकपा की पहचान चचे की पार्टी या हफीज साहब की पार्टी के रूप मे थी उसी प्रकार लखनऊ मे भाकपा से तात्पर्य अनजान साहब की पार्टी से लिया जाता है। उनमे से दो-तीन लोग तो यूनीवर्सिटी मे अनजान साहब के साथ के पढे हुये भी थे ,इसलिए भी अनजान साहब की पार्टी मे मेरा होना उन्हें अच्छा लगा।

उनमे से एक जो बैंक अधिकारी थे ने बताया कि अब यू पी मे AIBEA को उसके नेताओं ने कमजोर कर दिया है जो खुद तो लाभ व्यक्तिगत रूप से उठाते हैं लेकिन कर्मचारियों की परवाह नहीं करते। इसी कारण छोटे स्तर के नेता प्रमोशन लेकर आफ़ीसर बन गए और दूसरे संगठनों की आफ़ीसर यूनियन से सम्बद्ध हो गए। वह यह चाहते थे कि अनजान साहब कुछ हस्तक्षेप करके AIBEA को फिर से पुरानी बुलंदियों पर पहुंचाने मे मदद करे जिसका लाभ पार्टी को भी मिलेगा।

उनमे एक सज्जन AG आफिस मे उच्चाधिकारी थे। उन्होने अमर सिंह संबन्धित बातों की पुष्टि भी कर दी। मैंने उन्हें बताया था कि अमर सिंह ने वीर बहादुर सिंह के पेटी कांट्रेक्टर के रूप मे आजीविका और उनके सहायक के रूप मे राजनीति शुरू की थी और आज बड़े उद्योगपति बन गए हैं। उन्होने बताया कि जब वह सिंचाई विभाग  गोरखपुर मे आडिट करने गए थे वीर बहादुर सिंह बतौर मुख्यमंत्री सर्किट हाउस मे बैठक कर रहे थे ।अकाउंटेंट ने एक एक्जीक्यूटिव इंजीनियर को आकर बताया कि मुख्यमंत्री उन्हें नाम लेकर बुला रहे हैं। उन सज्जन ने पूछा आपको मुख्यमंत्री क्यों बुला रहे हैं उन्होने स्पष्ट किया पहले वह उन्हीं के आधीन ठेकेदार थे इसलिए।

एक और सज्जन ने अन्ना संबन्धित मेरे द्वारा बताई बातों की पुष्टि कर दी। ये सब अनजान लोग थे और इत्तिफ़ाकिया सड़क पर मिल गए थे किन्तु तर्कसंगत बातों से सहमत थे। एक हमारा ब्लाग जगत है जहां सभी लोग हैं तो समझदार किन्तु तर्क को नहीं समझते और भावावेश मे बहे जाकर अन्ना का अंध समर्थन करते और सत्य उद्घाटित करने वाले को 'बकवास' एवं 'वाहियात' घोषित कर देते हैं। अतः मेरे लिए सड़क पर सम्पन्न यह वार्ता काफी यादगार एवं महत्वपूर्ण रहेगी। 

Sunday, September 18, 2011

बामपंथी कैसे सांप्रदायिकता का संहार करेंगे? ------ विजय राजबली माथुर

लगभग 12 (अब  32)  वर्ष पूर्व सहारनपुर के 'नया जमाना'के संपादक स्व. कन्हैया लाल मिश्र 'प्रभाकर'ने अपने एक तार्किक लेख मे 1951  - 52 मे सम्पन्न संघ के एक नेता स्व .लिंमये के साथ अपनी वार्ता के हवाले से लिखा था कि,कम्युनिस्टों  और संघियों के बीच सत्ता की निर्णायक लड़ाई  दिल्ली की सड़कों पर लड़ी जाएगी।

आज संघ और उसके सहायक संगठनों ने सड़कों पर लड़ाई का बिगुल बजा दिया है,वामपंथी अभी तक कागजी तोपें दाग कर सांप्रदायिकता का मुक़ाबला कर रहे हैं;व्यापक जन-समर्थन और प्रचार के बगैर क्या वे संघियों के सांप्रदायिक राक्षस का संहार कर सकेंगे?

भारत विविधता मे एकता वाला एक अनुपम राष्ट्र है। विभिन्न भाषाओं,पोशाकों,आचार-व्यवहार आदि के उपरांत भी भारत अनादी  काल से एक ऐसा राष्ट्र रहा है जहां आने के बाद अनेक आक्रांता यहीं के होकर रह गए और भारत ने उन्हें आत्मसात कर लिया। यहाँ का प्राचीन आर्ष धर्म हमें "अहिंसा परमों धर्मा : "और "वसुधेव कुटुम्बकम" का पाठ पढ़ाता रहा है। नौवीं सदी के आते-आते भारत के व्यापक और  सहिष्णु  स्वरूप  को आघात लग चुका था। यह वह समय था जब इस देश की धरती पर बनियों और ब्राह्मणों के दंगे हो रहे थे। ब्राह्मणों ने धर्म को संकुचित कर घोंघावादी बना दिया था । सिंधु-प्रदेश के ब्राह्मण आजीविका निर्वहन के लिए समुद्री डाकुओं के रूप मे बनियों के जहाजों को लूटते थे। ऐसे मे धोखे से अरब व्यापारियों को लूट लेने के कारण सिंधु प्रदेश पर गजनी के शासक महमूद गजनवी ने बदले की  लूट के उद्देश्य से अनेकों आक्रमण किए और सोमनाथ को सत्रह बार लूटा। महमूद अपने व्यापारियों की लूट का बदला जम कर लेना चाहता था और भारत मे उस समय बैंकों के आभाव मे मंदिरों मे जवाहरात के रूप मे धन जमा किया जाता था। प्रो नूरुल हसन ने महमूद को कोरा लुटेरा बताते हुये लिखा है कि,"महमूद वाज ए डेविल इन कार्नेट फार दी इंडियन प्युपिल  बट एन एंजिल फार हिज गजनी सबजेक्ट्स"। महमूद गजनवी न तो इस्लाम का प्रचारक था और न ही भारत को अपना उपनिवेश बनाना चाहता था ,उसने ब्राह्मण लुटेरों से बदला लेने के लिए सीमावर्ती क्षेत्र मे व्यापक लूट-पाट की । परंतु जब अपनी फूट परस्ती के चलते यहीं के शासकों ने गोर के शासक मोहम्मद गोरी को आमंत्रित किया तो वह यहीं जम गया और उसी के साथ भारत मे इस्लाम का आगमन हुआ।

भारत मे इस्लाम एक शासक के धर्म के रूप मे आया जबकि भारतीय धर्म आत्मसात करने की क्षमता त्याग कर संकीर्ण घोंघावादी हो चुका था। अतः इस्लाम और अनेक मत-मतांतरों मे विभक्त और अपने प्राचीन गौरव से भटके हुये यहाँ प्रचलित धर्म मे मेल-मिलाप न हो सका। शासकों ने भारतीय जनता का समर्थन प्राप्त कर अपनी सत्ता को सुदृढ़ता प्रदान करने के लिए इस्लाम का ठीक वैसे ही प्रचार किया जिस प्रकार अमीन सायानी सेरोडान की टिकिया का प्रचार करते रहे हैं। जनता के भोलेपन का लाभ उठाते हुये भारत मे इस्लाम के शासकीय प्रचारकों ने कहानियाँ फैलाईं कि,हमारे पैगंबर मोहम्मद साहब इतने शक्तिशाली थे कि,उन्होने चाँद के दो टुकड़े कर दिये थे। तत्कालीन धर्म और  समाज मे तिरस्कृत और उपेक्षित क्षुद्र व पिछड़े वर्ग के लोग धड़ाधड़ इस्लाम ग्रहण करते गए और सवर्णों के प्रति राजकीय संरक्षण मे बदले की कारवाइया करने लगे। अब यहाँ प्रचलित कुधर्म मे भी हरीश भीमानी जैसे तत्कालीन प्रचारकों ने कहानियाँ गढ़नी शुरू कीं और कहा गया कि,मोहम्मद साहब ने चाँद  के दो टुकड़े करके क्या कमाल किया?देखो तो हमारे हनुमान लला पाँच वर्ष की उम्र मे सम्पूर्ण सूर्य को रसगुल्ला समझ कर निगल गए थे---

"बाल समय रवि भक्षि लियौ तब तींन्हू लोक भयो अंधियारों।
............................ तब छाणि दियो रवि कष्ट निवारों। "
(सेरीडान  की तर्ज पर डाबर की सरबाइना जैसा सायानी को भीमानी जैसा जवाब था यह कथन)

इस्लामी प्रचारकों ने एक और अफवाह फैलाई कि,मोहम्मद साहब ने आधी रोटी मे छह भूखों का पेट भर दिया था। जवाबी अफवाह मे यहाँ के धर्म के ठेकेदारों ने कहा तो क्या हुआ?हमारे श्री कृष्ण ने डेढ़ चावल मे दुर्वासा ऋषि और उनके साठ हजार शिष्यों को तृप्त कर दिया था। 'तर्क' कहीं नहीं था कुतर्क के जवाब मे कुतर्क चल रहे थे।

अभिप्राय यह कि,शासक और शासित के अंतर्विरोधों से ग्रसित इस्लाम और यहाँ के धर्म को जिसे इस्लाम वालों ने 'हिन्दू' धर्म नाम दिया के परस्पर उखाड़-पछाड़ भारत -भू पर करते रहे और ब्रिटेन के व्यापारियों की गुलामी मे भारत-राष्ट्र को सहजता से जकड़ जाने दिया। यूरोपीय व्यापारियों की गुलामी मे भारत के इस्लाम और हिन्दू दोनों के अनुयायी समान रूप से ही उत्पीड़ित हुये बल्कि मुसलमानों से राजसत्ता छीनने के कारण शुरू मे अंग्रेजों ने मुसलमानों को ही ज्यादा कुचला और कंगाल बना दिया।

ब्रिटिश दासता  :

साम्राज्यवादी अंग्रेजों ने भारत की धरती और जन-शक्ति का भरपूर शोषण और उत्पीड़न किया। भारत के कुटीर उदद्योग -धंधे को चौपट कर यहाँ का कच्चा माल विदेश भेजा जाने लगा और तैयार माल लाकर भारत मे खपाया  जाने लगा। ढाका की मलमल का स्थान लंकाशायर और मेंनचेस्टर की मिलों ने ले लिया और बंगाल (अब बांग्ला देश)के मुसलमान कारीगर बेकार हो गए। इसी प्रकार दक्षिण भारत का वस्त्र उदद्योग तहस-नहस हो गया।

आरकाट जिले के कलेक्टर ने लार्ड विलियम बेंटिक को लिखा था-"विश्व के आर्थिक इतिहास मे ऐसी गरीबी मुश्किल से ढूँढे मिलेगी,बुनकरों की हड्डियों से भारत के मैदान सफ़ेद हो रहे हैं। "

सन सत्तावन की क्रान्ति :

लगभग सौ सालों की ब्रिटिश गुलामी ने भारत के इस्लाम और हिन्दू धर्म के अनुयायीओ को एक कर दिया और आजादी के लिए बाबर के वंशज बहादुर शाह जफर के नेतृत्व मे हरा झण्डा लेकर समस्त भारतीयों ने अंग्रेजों के विरुद्ध क्रान्ति कर दी। परंतु दुर्भाग्य से भोपाल की बेगम ,ग्वालियर के सिंधिया,नेपाल के राणा और पंजाब के सिक्खों ने क्रान्ति को कुचलने मे साम्राज्यवादी अंग्रेजों का साथ दिया।

अंग्रेजों द्वारा अवध की बेगमों पर निर्मम अत्याचार किए गए जिनकी गूंज हाउस आफ लार्ड्स मे भी हुयी। बहादुर शाह जफर कैद कर लिया गया और मांडले मे उसका निर्वासित के रूप मे निधन हुआ। झांसी की रानी लक्ष्मी बाई वीर गति को प्राप्त हुयी। सिंधिया को अंग्रेजों से इनाम मिला। असंख्य भारतीयों की कुर्बानी बेकार गई।

वर्तमान सांप्रदायिकता का उदय :

सन 1857 की क्रान्ति ने अंग्रेजों को बता दिया कि भारत के मुसलमानों और हिंदुओं को लड़ा कर ही ब्रिटिश साम्राज्य को सुरक्षित  रखा जा सकता है। लार्ड डफरिन के आशीर्वाद से स्थापित ब्रिटिश साम्राज्य का सेफ़्टी वाल्व कांग्रेस राष्ट्र वादियों  के कब्जे मे जाने लगी थी। बाल गंगाधर 'तिलक'का प्रभाव बढ़ रहा था और लाला लाजपत राय और विपिन चंद्र पाल के सहयोग से वह ब्रिटिश शासकों को लोहे के चने चबवाने लगे थे। अतः 1905 ई मे हिन्दू और मुसलमान के आधार पर बंगाल का विभाजन कर दिया गया । हालांकि बंग-भंग आंदोलन के दबाव मे 1911 ई मे पुनः बंगाल को एक करना पड़ा परंतु इसी दौरान 1906 ई मे ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन को फुसला कर मुस्लिम लीग नामक सांप्रदायिक संगठन की स्थापना करा दी गई और इसी की प्रतिकृया स्वरूप 1920 ई मे हिन्दू महा सभा नामक दूसरा सांप्रदायिक संगठन भी सामने आ गया। 1932 ई मे मैक्डोनल्ड एवार्ड के तहत हिंदुओं,मुसलमानों,हरिजन और सिक्खों के लिए प्रथक निर्वाचन की घोषणा की गई। महात्मा गांधी के प्रयास से सिक्ख और हरिजन हिन्दू वर्ग मे ही रहे और 1935 ई मे सम्पन्न चुनावों मे बंगाल,पंजाब आदि कई प्रान्तों मे लीगी सरकारें बनी और व्यापक हिन्दू-मुस्लिम दंगे फैलते चले गए।


वामपंथ का आगमन :

1917 ई मे हुयी रूस मे लेनिन की क्रान्ति से प्रेरित होकर भारत के राष्ट्र वादी कांग्रेसियों ने 25 दिसंबर 1925 ई को कानपुर मे 'भारतीय  कम्युनिस्ट  पार्टी'की स्थापना करके पूर्ण स्व-राज्य के लिए क्रांतिकारी आंदोलन शुरू कर दिया और सांप्रदायिकता को देश की एकता के लिए घातक बता कर उसका विरोध किया।  कम्युनिस्टों से राष्ट्रवादिता मे पिछड्ता पा कर 1929 मे लाहौर अधिवेन्शन मे जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस का लक्ष्य भी पूर्ण स्वाधीनता घोषित करा दिया। अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग,हिन्दू महासभा के सैन्य संगठन आर एस एस (जो कम्यूनिस्टों का मुकाबिला करने के लिए 1925 मे ही अस्तित्व मे आया) और कांग्रेस के नेहरू गुट को प्रोत्साहित किया एवं  कम्युनिस्ट पार्टी को प्रतिबंधित कर दिया । सरदार भगत सिंह जो  कम्युनिस्टों के युवा संगठन 'भारत नौजवान सभा'के संस्थापकों मे थे भारत मे समता पर आधारित एक वर्ग विहीन और शोषण विहीन समाज की स्थापना को लेकर अशफाक़ उल्ला खाँ व राम प्रसाद 'बिस्मिल'सरीखे साथियों केसाथ साम्राज्यवादियों से संघर्ष करते हुये शहीद हुये सदैव सांप्रदायिक अलगाव वादियों की भर्तस्ना करते रहे।

वर्तमान  सांप्रदायिकता :

1980 मे संघ के सहयोग से सत्तासीन होने के बाद इंदिरा गांधी ने सांप्रदायिकता को बड़ी बेशर्मी से उभाड़ा। 1980 मे ही जरनैल सिंह भिंडरावाला के नेतृत्व मे बब्बर खालसा नामक घोर सांप्रदायिक संगठन खड़ा हुआ जिसे इंदिरा जी का आशीर्वाद पहुंचाने खुद संजय गांधी और ज्ञानी जैल सिंह पहुंचे थे। 1980 मे ही संघ ने नारा दिया-भारत मे रहना होगा तो वंदे मातरम कहना होगा जिसके जवाब मे काश्मीर मे प्रति-सांप्रदायिकता उभरी कि,काश्मीर मे रहना होगा तो अल्लाह -अल्लाह कहना होगा। और तभी से असम मे विदेशियों को निकालने की मांग लेकर हिंसक आंदोलन उभरा।

पंजाब मे खालिस्तान की मांग उठी तो कश्मीर को अलग करने के लिए  अनुच्छेद 370 को हटाने की मांग उठी और सारे देश मे एकात्मकता यज्ञ के नाम पर यात्राएं आयोजित करके सांप्रदायिक दंगे भड़काए। माँ की गद्दी पर बैठे राजीव गांधी ने अपने शासन की विफलताओं और भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने हेतु संघ की प्रेरणा से अयोध्या मे विवादित रामजन्म भूमि/बाबरी मस्जिद का ताला खुलवा कर हिन्दू सांप्रदायिकता एवं मुस्लिम वृध्दा शाहबानों को न्याय से वंचित करने के लिए संविधान मे संशोधन करके मुस्लिम सांप्रदायिकता को नया बल प्रदान किया।

वामपंथी कोशिश :

भारतीय  कम्युनिस्ट ,मार्क्सवादी कम्युनिस्ट ,क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी और फारवर्ड ब्लाक के ' वामपंथी मोर्चा'ने सांप्रदायिकता के विरुद्ध व्यापक जन-अभियान चलाया । बुद्धिजीवी और विवेकशील  राष्ट्र वादी  सांप्रदायिक सौहार्द के प्रबल पक्षधर हैं,परंतु ये सब संख्या की दृष्टि से अल्पमत मे हैं,साधनों की दृष्टि से विप्पन  हैं और प्रचार की दृष्टि से बहुत पिछड़े हुये हैं। पूंजीवादी प्रेस वामपंथी सौहार्द के अभियान को वरीयता दे भी कैसे सकता है?उसका ध्येय तो व्यापारिक हितों की पूर्ती के लिए सांप्रदायिक शक्तियों को सबल बनाना है। अपने आदर्शों और सिद्धांतों के बावजूद वामपंथी अभियान अभी तक बहुमत का समर्थन नहीं प्राप्त कर सका है जबकि,सांप्रदायिक शक्तियाँ ,धन और साधनों की संपन्नता के कारण अलगाव वादी प्रवृतियों को फैलाने मे सफल रही हैं।

सड़कों पर दंगे :

अब सांप्रदायिक शक्तियाँ खुल कर सड़कों पर वैमनस्य फैला कर संघर्ष कराने मे कामयाब हो रही हैं। इससे सम्पूर्ण विकास कार्य ठप्प हो गया है,देश के सामने भीषण आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया है । मंहगाई सुरसा की तरह बढ़ कर सांप्रदायिकता के पोषक पूंजीपति वर्ग का हित-साधन कर रही है। जमाखोरों,सटोरियों और कालाबाजारियों की पांचों उँगलियाँ घी मे हैं। अभी तक वामपंथी अभियान नक्कार खाने मे तूती की आवाज की तरह चल रहा है। वामपंथियों ने सड़कों पर निपटने के लिए कोई 'सांप्रदायिकता विरोधी दस्ता' गठित नहीं किया है। अधिकांश जनता अशिक्षित और पिछड़ी होने के कारण वामपंथियों के आदर्शवाद के मर्म को समझने मे असमर्थ है और उसे सांप्रदायिक शक्तियाँ उल्टे उस्तरे से मूंढ रही हैं।

दक्षिण पंथी तानाशाही का भय :

वर्तमान (1991 ) सांप्रदायिक दंगों मे जिस प्रकार सरकारी मशीनरी ने एक सांप्रदायिकता का पक्ष लिया है उससे अब संघ की दक्षिण पंथी असैनिक तानाशाही स्थापित होने का भय व्याप्त हो गया है। 1977 के सूचना व प्रसारण मंत्री एल के आडवाणी ने आकाशवाणी व दूर दर्शन मे संघ की कैसी घुसपैठ की है उसका हृदय विदारक उल्लेख सांसद पत्रकार संतोष भारतीय ने वी पी सरकार के पतन के संदर्भ मे किया है। आगरा पूर्वी विधान सभा क्षेत्र मे 1985 के परिणामों मे संघ से संबन्धित क्लर्क कालरा ने किस प्रकार भाजपा प्रत्याशी को जिताया ताज़ी घटना है।

पुलिस और ज़िला प्रशासन मजदूर के रोजी-रोटी के हक को कुचलने के लिए जिस प्रकार पूंजीपति वर्ग का दास बन गया है उससे संघी तानाशाही आने की ही बू मिलती है।

वामपंथी असमर्थ :

वर्तमान परिस्थितियों का मुक़ाबला करने मे सम्पूर्ण वामपंथ पूरी तरह असमर्थ है। धन-शक्ति और जन-शक्ति दोनों ही का उसके पास आभाव है। यदि अविलंब सघन प्रचार और संपर्क के माध्यम से बामपंथ जन-शक्ति को अपने पीछे न खड़ा कर सका तो दिल्ली की सड़कों पर होने वाले निर्णायक युद्ध मे संघ से हार जाएगा जो देश और जनता के लिए दुखद होगा।

परंतु बक़ौल स्वामी विवेकानंद -'संख्या बल प्रभावी नहीं होता ,यदि मुट्ठी भर लोग मनसा- वाचा-कर्मणा संगठित हों तो सारे संसार को उखाड़ फेंक सकते हैं। 'आदर्शों को कर्म मे उतार कर बामपंथी संघ का मुक़ाबला कर सकते हैं यदि चाहें तो!वक्त अभी निकला नहीं है।
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उपयुर्क्त लेख 'सप्तदिवा ,आगरा' ने 1991 मे छापने से इंकार कर दिया था जिसके बाद से उनसे संपर्क तोड़ लिया था। अभी अन्ना हज़ारे के तानाशाहीपूर्ण देशद्रोही /आतंकवादी आक्रमण जो अमेरिकी प्रशासन के समर्थन एवं उनकी कारपोरेट कंपनियों के दान से चला है  और उसमे प्रधानमंत्री महोदय की दिलचस्पी देख(पी एम साहब ने राष्ट्र ध्वज का अपमान करने वाले,संविधान और संसद को चुनौती देने वाले,रात्रि मे राष्ट्र ध्वज फहराने वाले को गुलदस्ता भेज कर तथा पी एम ओ के पूर्व मंत्री और अब महाराष्ट्र के सी एम से कमांडोज़ दिला कर महिमा मंडित किया है ) कर इस ब्लाग पर प्रकाशित कर रहा हूँ क्योंकि परिस्थितियाँ आज भी वही हैं जो 20 वर्ष पूर्व  थीं।बल्कि और भी खतरनाक हो गई हैं क्योंकि अब रक्षक (शासक) जनता का नहीं भक्षक का हितैषी हो गया है। जिसे राष्ट्रद्रोह मे सजा मिलनी चाहिए उसे पुरस्कृत किया जा रहा है।

आगामी  28 सितंबर  2011 को शहीदे आजम सरदार भगत सिंह का जन्मदिन है और उनकी नौजवान सभा ए आई एस एफ के साथ छात्रों-नौजवानों की शिक्षा-रोजगार आदि की समस्याओं को लेकर उस दिन  प्रदेश-व्यापी धरना-प्रदर्शन कर रही है। छात्रों-नौजवानों को देश के सामने आई विकट समस्याओं पर भी विचार करना चाहिए क्योंकि भविष्य मे फासिस्ट तानाशाही से उन्हें ही टकराना पड़ेगा। अतः आज ही कल के बारे मे भी निर्णय कर लेना देश और जनता के हित मे उत्तम रहेगा।

पुनश्च : ( 11-01-2020 )

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28-02-2016 

22-01-2017 

Wednesday, September 14, 2011

जन-भाषा हिन्दी

'हिन्दी' को भारत की राष्ट्र भाषा /राज भाषा का दर्जा प्राप्त है परंतु व्यवहार मे अभी भी हिन्दी अपना स्थान नहीं प्राप्त कर सकी है। प्रति वर्ष 14 सितंबर को 'हिन्दी दिवस' के रूप मे मनाया जाता है क्योंकि संविधान सभा ने इसी दिन इसे राष्ट्र भाषा बनाने का प्रस्ताव पारित किया था। आज कल हमारे देश मे दिखावा और तड़क -भड़क को अतीव महत्व दिया जाने लगा है जिस कारण कुछ लोग हिन्दी सप्ताह एवं कुछ हिन्दी पखवाड़ा भी मनाते हैं।


हिन्दी को खतरा हिन्दी भाषियों से

27 अगस्त को सुविख्यात ब्लागर डा ज़ाकिर अली रजनीश साहब ने 'तसलीम ' और उ प्र हिन्दी संस्थान द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित 'हिन्दी मे नव बाल साहित्य लेखन' गोष्ठी मे बुलाया था ,हम गए थे और विद्वानों के विचारों को सुना था। दिल्ली से पधारे डा श्याम सिंह 'शशि' जी ने चिंता व्यक्त की थी कि आज हिन्दी को खतरा हिन्दी वालों से ही है। उन्होने बताया कि 'मैथिली' को संविधान की आठवीं सूची मे स्थान मिल चुका है और 'राजस्थानी','हरियाणवी','गढ़वाली,''छत्तीसगढ़ी','भोजपुरी','संथाली''बुंदेलखंडी' आदि बोलियों को भी संविधान की आठवीं सूची मे डालने की मांग उठ रही है। उनके अनुसार ऐसा हो जाने पर हिन्दी केवल उ प्र की ही भाषा रह जाएगी और यदि 'अवधी'तथा 'ब्रज' को भी आठवीं सूची मे डालने की मांग हो जो ज्यादा समृद्ध भी हैं तो हिन्दी कहीं बचेगी ही नहीं। उनका मत है कि यह सब हिन्दी को राष्ट्र भाषा के दर्जे से हटाने का षड्यंत्र है। तमिलनाडू जहां कभी हिन्दी का मुखर विरोध था अब हिन्दी को प्रोत्साहन दे रहा है। बांग्ला के रवीन्द्र नाथ टैगोर,नेताजी सुभाष चंद्र बॉस  ,तमिल के सुब्रमनियम भारती,गुजराती के स्वामी दयानंद सरस्वती एवं महात्मा गांधी मराठी के  तिलक ,पंजाबी के लाला लाजपत राय आदि ने हिन्दी को महत्व दिया था जिस कारण संविधान सभा ने 'हिन्दी' को राष्ट्र भाषा/राज भाषा स्वीकृत किया था।

जनता पार्टी सरकार के विदेश मंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र संघ मे हिन्दी मे सर्व-प्रथम भाषण दिया था। आज हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त है। परंतु हिन्दी भाषी लोग ही क्षुद्र स्वार्थों के चलते विभिन्न बोलियों को भाषा का दर्जा दिलाने की मांग करके हिन्दी के महत्व को कम कर रहे हैं। 'हिन्दी दिवस' मनाते समय यह भी संकल्प लिया जाये कि हिन्दी के मान-सम्मान को कम नहीं होने दिया जाएगा।

28/08/2011-Hindustan-Lucknow
रोमन हिन्दी

11 सितंबर को कर्मठ ब्लागर द्वय रणधीर सिंह 'सुमन' जी एवं रवीन्द्र प्रभात जी ने 'समाज मे न्यू मीडिया की भूमिका' नामक गोष्ठी मे बुलाया था । हमने विद्वानों के विचार सुने,एक विद्वान ने हिन्दी को रोमन लिपी मे लिखने का सुझाव दिया जिसे दूसरे विद्वानों ने उचित नहीं बताया। हिंदुस्तान ,लखनऊ के 12 ता की इस समाचार से संबन्धित स्कैन प्रस्तुत है-

12/09/2011-Hindustan-Lucknow


आजादी से पहले हिन्दी स्व-स्वाभिमान की भाषा थी। क्रांतिकारियों तथा सत्याग्रहियों दोनों ने हिन्दी को जन-जन तक फैलाया था और आज भी 'हिन्दी' 'जन-भाषा' ही है। क्षेत्र वादी,विदेश से सहाता प्राप्त एन जी ओज आदि मिल कर हिन्दी को क्षीण करके इसे राष्ट्र भाषा/राज भाषा के दर्जे से हटाना चाहते हैं। हमे इस दुष्चक्र से सावधान रहने की आवश्यकता है। कारपोरेट कंपनियाँ हिन्दी का एक विकृत रूप पेश कर रही हैं उससे भी सचेत रहना होगा। आज हिन्दी दिवस पर हम हिन्दी के अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे को निर्मूल करने का संकल्प लेकर उस   की रक्षा,संरक्षण एवं संवर्धन करने का प्रयास् करें तभी हमारा 'हिन्दी दिवस' मनाना सार्थक हो सकता है।