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Wednesday, April 8, 2026

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त का बम ------ विजय राजबली माथुर

आज ०८ अप्रैल है -वह दिन जब केन्द्रीय असेम्बली में सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बम फेंका था.वह बम गूंगी -बहरी सरकार और क़ानून निर्माताओं को जगाने के लिए फेंका गया था किसी हिंसक इरादे से नहीं.न ही किसी की जान ही गई थी. २६ जनवरी १९३० को बांटे गए पर्चे में भगत सिंह ने कहा था-"एक क्रांतिकारी सबसे अधिक तर्क में विशवास करता है.वह केवल तर्क और तर्क में ही विशवास करता है.किसी प्रकार का गाली-गलौच या निन्दा,चाहे वह ऊंचे से ऊंचे स्तर से की गई हो,उसे अपने निश्चित उद्देश्य -प्राप्ति से वंचित नहीं कर सकती.यह सोचना कि यदि जनता का सहयोग न मिला या उसके कार्य की प्रशंसा न की गई तो वह अपने उद्देश्य को छोड़ देगा ,निरी मूर्खता है."



लोअर कोर्ट के जवाब में उन्होंने कहा था क्रान्ति से हमारा अभिप्राय है-अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज -व्यवस्था में आमूल परिवर्तन."समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मजदूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढी कमाई का सारा धन शोषक पूंजीपति हड़प जाते हैं.दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मोहताज हैं.दुनिया भर के बाजारों को कपड़ा मुहैय्या करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढंकने -भर को भी कपडा नहीं पा रहा है.सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर,लोहार तथा बढ़ई स्वंय गंदे बाड़ों में रह कर ही अपनी   जीवन-लीला समाप्त कर जाते हैं.इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूंजीपति जरा-जरा सी बातों के लिए लाखों का वार-न्यारा कर देते हैं.........स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठ कर रंगरेलियां मना रहा है शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल पड़े हैं."


आज भी जो शासन-व्यवस्था है वह भगत सिंह आदि क्रांतिकारियों के सपनों का स्वराज्य नहीं है.उनका कथन है-"क्रांतिकारियों का विशवास है कि देश को क्रान्ति से ही स्वतंत्रता मिलेगी.वे जिस क्रान्ति के लिए प्रयत्नशील हैं और जिस क्रान्ति का रूप उनके सामने स्पष्ट है उसका अर्थ केवल यह नहीं है कि विदेशी शासकों तथा उनके पिट्ठुओं से क्रांतिकारियों का सशस्त्र संघर्ष हो ,बल्कि इस सशस्त्र संघर्ष के साथ -साथ नवीन सामाजिक व्यवस्था के द्वार देश के लिए मुक्त हो जाएँ.क्रान्ति पूंजीवाद,वर्गवाद तथा कुछ लोगों को ही विशेषाधिकार दिलाने वाली ओरानाली का अंत कर देगी.यह राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़ा करेगी,उससे नवीन राष्ट्र और नए समाज का जन्म होगा.क्रान्ति से सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि वह मजदूर तथा किसानों का राज्य कायम कर उन सब सामजिक अवांछित तत्वों को समाप्त कर देगी जो देश की राजनीतिक शक्ति को हथियाए बैठे हैं."


आप खुद ही तुलना करें क्या हमें जो आजादी मिली है वह वैसी ही है जिसके लिए भगत सिंह ,बटुकेश्वर दत्त,अशफाक उल्ला खाँ,राम प्रसाद बिस्मिल ,चन्द्र शेखार आजाद आदि असंख्य क्रांतिकारियों ने अपना बलिदान दिया था.यदि नहीं तो उसे प्राप्त करने में आप क्या योगदान देंगें?

  ~विजय राजबली माथुर ©

Saturday, November 18, 2017

शहीद - ए - आजम के क्रांतिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के जन्मदिवस दिवस पर नमन्

  बटुकेश्वर दत्त (१८ नवंबर १९०८ - २० जुलाई १९६५) : 





बटुकेश्वर दत्त एक प्रसिद्ध क्रान्तिकारी हैं जिनका जन्म  18 नवम्बर, 1908 में कानपुर में हुआ था। उनका पैतृक गाँव बंगाल के 'बर्दवान ज़िले ' में था, पर पिता 'गोष्ठ बिहारी दत्त ' कानपुर में नौकरी करते थे। बटुकेश्वर ने 1925 ई. में मैट्रिक की परीक्षा पास की और तभी माता व पिता दोनों का देहान्त हो गया। इसी समय वे सरदार भगतसिंह और चन्द्रशेखर आज़ाद के सम्पर्क में आए और क्रान्तिकारी संगठन ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन’ के सदस्य बन गए। सुखदेव और राजगुरु के साथ भी उन्होंने विभिन्न स्थानों पर काम किया।
प्रतिशोध की भावना : 
विदेशी सरकार जनता पर जो अत्याचार कर रही थी, उसका बदला लेने और उसे चुनौती देने के लिए क्रान्तिकारियों ने अनेक काम किए। 'काकोरी' ट्रेन की लूट और लाहौर के पुलिस अधिकारी सांडर्स की हत्या इसी क्रम में हुई। तभी सरकार ने केन्द्रीय असेम्बली में श्रमिकों की हड़ताल को प्रतिबंधित करने के उद्देश्य से एक बिल पेश किया। क्रान्तिकारियों ने निश्चय किया कि वे इसके विरोध में ऐसा क़दम उठायेंगे, जिससे सबका ध्यान इस ओर जायेगा।
असेम्बली बम धमाका : 
8 अप्रैल, 1929 ई. को भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दर्शक दीर्घा से केन्द्रीय असेम्बली के अन्दर बम फेंककर धमाका किया। बम इस प्रकार बनाया गया था कि, किसी की भी जान न जाए। बम के साथ ही ‘लाल पर्चे’ की प्रतियाँ भी फेंकी गईं। जिनमें बम फेंकने का क्रान्तिकारियों का उद्देश्य स्पष्ट किया गया था। दोनों ने बच निकलने का कोई प्रयत्न नहीं किया, क्योंकि वे अदालत में बयान देकर अपने विचारों से सबको परिचित कराना चाहते थे। साथ ही इस भ्रम को भी समाप्त करना चाहते थे कि काम करके क्रान्तिकारी तो बच निकलते हैं, अन्य लोगों को पुलिस सताती है।
आजीवन कारावास : 
भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त दोनों गिरफ्तार हुए, उन पर मुक़दमा चलाया गया। 6 जुलाई, 1929 को भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने अदालत में जो संयुक्त बयान दिया, उसका लोगों पर बड़ा प्रभाव पड़ा। इस मुक़दमें में दोनों को आजीवन कारावास की सज़ा हुई। बाद में लाहौर षड़यंत्र केस में भी दोनों अभियुक्त बनाए गए। इससे भगतसिंह को फ़ाँसी की सज़ा हुई, पर बटुकेश्वर दत्त के विरुद्ध पुलिस कोई प्रमाण नहीं जुटा पाई। उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा भोगने के लिए अण्डमान भेज दिया गया।
रिहाई : 
इसके पूर्व राजबन्दियों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार के लिए भूख हड़ताल में बटुकेश्वर दत्त भी सम्मिलित थे। यही प्रश्न जब उन्होंने अण्डमान में उठाया तो, उन्हें बहुत सताया गया। गांधीजी के हस्तक्षेप से वे 1938 ई. में अण्डमान से बाहर आए, पर बहुत दिनों तक उनकी गतिविधियाँ प्रतिबन्धित रहीं। 1942 के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में भी उन्हें गिरफ्तार किया गया था। छूटने के बाद वे पटना में रहने लगे थे।

12  जून 1929  को इन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गयी. बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास काटने के लिए काला पानी जेल भेज दिया गया। जेल में ही उन्होंने 1933 और 1937 में ऐतिहासिक भूख हड़ताल की। सेल्यूलर जेल से 1937 में बांकीपुर केन्द्रीय कारागार, पटना में लाए गए और 1938 में रिहा कर दिए गए। काला पानी से गंभीर बीमारी लेकर लौटे दत्त फिर गिरफ्तार कर लिए गए और चार वर्षों के बाद 1945 में रिहा किए गए। बटुकेश्वर दत्त अपनी आखिरी दिनों में अभाव में गुजारे! चाहते तो वो भी अपनी पहचान का उपयोग करके आसानी से ऐश की जिंदगी जीते . पर ऐसे मतवाले क्रांतिकारियों को देश ही सब कुछ होता है और इन्हें सिद्धानतों के सिवा कुछ भी मंजूर नहीं होता
निधन : 
 एक दुर्घटना में घायल हो जाने के कारण दत्त की मृत्यु 20 जुलाई, 1965 को नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में हुई। मृत्यु के बाद इनका दाह संस्कार इनके अन्य क्रांतिकारी साथियों-भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव की समाधि स्थल पंजाब के हुसैनी वाला,फिरोजपुर में किया गया आज वहीं  उनकी समाधि है। 

साभार : 





~विजय राजबली माथुर ©

Monday, February 8, 2016

लोकतन्त्र, राजनीति,आस्था,अध्यात्म,धर्म : सत्यार्थ का आभाव ------ विजय राजबली माथुर

*****'डार्विन वाद ' ने मतस्य से मनुष्य तक की विकास -गाथा को रचा व माना है। इस सिद्धान्त में 'पहले अंडा ' या 'पहले मुर्गी' वाला विवाद चलता रहता है और उसका व्यावहारिक समाधान नहीं हो पाने के बावजूद उसी के अनुसार सारी व्याख्याएँ की जाती हैं।  'युवा - पुरुष ' और 'युवा - स्त्री ' वाला सिद्धान्त 'तर्कसंगत' व 'व्यावहारिक' है किन्तु इसका मखौल इसलिए उड़ाया जाता है कि, इससे सफ़ेद जाति के मध्य - यूरोपीय मनुष्यों की श्रेष्ठता का सिद्धान्त और उनका 'डार्विन वाद ' थोथा सिद्ध हो जाता है। 

'डार्विन वाद ' के अनुसार जब मानव विकास माना जाता है तब यह जवाब नहीं दिया जाता है कि शिशु मानव का पालन और विकास कैसे संभव हुआ था ? जबकि 'युवा - पुरुष ' और 'युवा - स्त्री ' वाला सिद्धान्त इसलिए  'तर्कसंगत' व 'व्यावहारिक' है क्योंकि युवा नर- व नारी न केवल अपना खुद का अस्तित्व बचाने में बल्कि  'प्रजनन' में भी सक्षम हैं और नई संतान का पालन -पोषण करने में भी। 

मध्य -यूरोपीय सफ़ेद मनुष्यों की जाति शोषण पर चल कर ही सफल हुई है और उस शोषण को निरंतर मजबूत बनाने के लिए नित्य नए-नए अनुसंधान करके नई-नई कहानियाँ गढ़ती रहती है। उसी में एक कहानी है भारत पर 'आर्यों के आक्रमण ' की जबकि आर्य कोई जाति या धर्म नहीं है।  श्रेष्ठता का प्रतीक है 'आर्ष ' जिसका अपभ्रंश है -'आर्य' अर्थात कोई भी मनुष्य जो श्रेष्ठ कर्म करता है वह आर्ष अर्थात आर्य है चाहे वह किसी भी क्षेत्र का हो या किसी भी नस्ल का चाहे किसी भी आस्था को अपनाने वाला।*****  मानव जीवन को सुंदर- सुखद- समृद्ध  बनाने  की धारणा वालों ने खुद को धर्म-निरपेक्ष अर्थात सद्गुणों  से रहित घोषित कर रखा है और नास्तिक भी ; साथ ही डॉ अंबेडकर के अनुयाई कहलाने वालों ने खुद को  सफ़ेद जाति के षड्यंत्र में फंस कर मूल निवासी घोषित कर रखा है। स्पष्ट है इन परिस्थितियों का पूरा-पूरा लाभ शोषणकारी  - साम्राज्यवादी /सांप्रदायिक  - ब्राह्मण वादी शक्तियाँ  उठा कर खुद को मजबूत व शोषितों को विभक्त करने में उठाती हैं। यदि हम शब्दों के खेल में न फंस कर उनके सत्य अर्थ  को समझें व समझाएँ  तो सफल हो सकते हैं अन्यथा भारत का संविधान व लोकतन्त्र नष्ट हुये बगैर नहीं रह सकता। *****




डॉ अंबेडकर द्वारा संविधान सभा में दिये गए समापन भाषण का जो अंश  इस वर्ष गणतंत्र  दिवस पर प्रकाशित हुआ है उससे साफ झलकता है कि, आज जो कुछ संविधान को नष्ट किया जा रहा है उसका उनको पूर्वानुमान था और उन्होने तभी सचेत भी कर दिया था। किन्तु निहित स्वार्थी तत्वों ने जान-बूझ कर उस चेतावनी को नज़रअंदाज़ किया जिससे मुट्ठी भर लोगों के लाभ के लिए असंख्य लोगों का अबाध शोषण व उत्पीड़न किया जा सके।इसके लिए  लोकतन्त्र, राजनीति,आस्था,अध्यात्म,धर्म सबकी मनमानी झूठी व्याख्याएँ गढ़ी गईं । विरोध व प्रतिक्रिया स्वरूप जो तथ्य सामने लाये गए स्व्भाविक तौर पर वे भी गलत ही हुये क्योंकि वे गलत व्याख्याओं पर ही तो आधारित थे। महर्षि कार्ल मार्क्स, शहीद भगत सिंह व डॉ अंबेडकर ने इसी कारण धर्म का गलत आधार पर विरोध किया है जिसके परिणाम स्वरूप पोंगापंथी, शोषण वादी पुरोहितों की गलत व्याख्याएँ और भी ज़्यादा मजबूत हो गईं हैं। हम मनुष्य तभी हैं जब 'मनन' करें किन्तु आज मनन के बजाए 'आस्था' पर ज़्यादा ज़ोर दिया जा रहा है और अदालतों तक से आस्था के आधार पर निर्णय दिये जा रहे हैं। आज 08 फरवरी, 2016 के हिंदुस्तान का जो सम्पादकीय प्रस्तुत किया गया है उसमें भी आस्था को अक्ल (मनन ) से ज़्यादा तरजीह दी गई है। 


अबसे दस लाख वर्ष पूर्व  पृथ्वी पर जब 'मनुष्य की उत्पति ' हुई  तो वह 'युवा - पुरुष ' और 'युवा - स्त्री ' के रूप तीन क्षेत्रों - अफ्रीका, मध्य - यूरोप व 'त्रि वृष्टि' (तिब्बत ) में एक साथ हुई थी। भौगोलिक प्रभाव से तीनों क्षेत्रों के मनुष्यों के रंग क्रमशः काला, सफ़ेद व गेंहुआ हुये। प्रारम्भ में तीनों क्षेत्रों की मानव - जाति का विकास प्रकृति द्वारा उपलब्ध सुविधाओं पर निर्भर था। किन्तु कालांतर में सफ़ेद रंग के मध्य यूरोपीय मनुष्यों ने खुद को सर्व- श्रेष्ठ घोषित करते हुये तरह- तरह की कहानियाँ गढ़ डालीं और उनकी पुष्टि के लिए मानव-विकास के क्रम को अपने अनुसार लिख डाला। 

'डार्विन वाद ' ने मतस्य से मनुष्य तक की विकास -गाथा को रचा व माना है। इस सिद्धान्त में 'पहले अंडा ' या 'पहले मुर्गी' वाला विवाद चलता रहता है और उसका व्यावहारिक समाधान नहीं हो पाने के बावजूद उसी के अनुसार सारी व्याख्याएँ की जाती हैं।  'युवा - पुरुष ' और 'युवा - स्त्री ' वाला सिद्धान्त 'तर्कसंगत' व 'व्यावहारिक' है किन्तु इसका मखौल इसलिए उड़ाया जाता है कि, इससे सफ़ेद जाति के मध्य - यूरोपीय मनुष्यों की श्रेष्ठता का सिद्धान्त और उनका 'डार्विन वाद ' थोथा सिद्ध हो जाता है। 

'डार्विन वाद ' के अनुसार जब मानव विकास माना जाता है तब यह जवाब नहीं दिया जाता है कि शिशु मानव का पालन और विकास कैसे संभव हुआ था ? जबकि 'युवा - पुरुष ' और 'युवा - स्त्री ' वाला सिद्धान्त इसलिए  'तर्कसंगत' व 'व्यावहारिक' है क्योंकि युवा नर- व नारी न केवल अपना खुद का अस्तित्व बचाने में बल्कि  'प्रजनन' में भी सक्षम हैं और नई संतान का पालन -पोषण करने में भी। 

मध्य -यूरोपीय सफ़ेद मनुष्यों की जाति शोषण पर चल कर ही सफल हुई है और उस शोषण को निरंतर मजबूत बनाने के लिए नित्य नए-नए अनुसंधान करके नई-नई कहानियाँ गढ़ती रहती है। उसी में एक कहानी है भारत पर 'आर्यों के आक्रमण ' की जबकि आर्य कोई जाति या धर्म नहीं है।  श्रेष्ठता का प्रतीक है 'आर्ष ' जिसका अपभ्रंश है -'आर्य' अर्थात कोई भी मनुष्य जो श्रेष्ठ कर्म करता है वह आर्ष अर्थात आर्य है चाहे वह किसी भी क्षेत्र का हो या किसी भी नस्ल का चाहे किसी भी आस्था को अपनाने वाला।  

किन्तु आर्य को एक जाति और भारत में आक्रांता घोषित करने वाले सिद्धान्त ने यहाँ के निवासियों को अंत हींन  विवादों व संघर्षों में उलझा कर रख दिया है  'मूल निवासी आंदोलन ' भी उसी की एक कड़ी है। ' नास्तिक वाद' भी उसी  थोथे सिद्धान्त का खड़ा हुआ विभ्रम है। वस्तुतः शब्दों के खेल को समझ कर  'मनन' करने व सच्चा  मनुष्य बनने की ज़रूरत है और मानव-मानव में  विभेद करने वालों को बेनकाब करने की । 

मनुष्य   = जो मनन कर सके। अन्यथा 'नर-तन' धारी पशु। 
आस्तिक = जिसका स्वम्य  अपने ऊपर विश्वास हो। 
नास्तिक = जिसका अपने ऊपर विश्वास न हो। 
अध्यात्म = अध्यन  अपनी  आत्मा का । न कि  अपनी आत्मा से परे। 
धर्म = जो मनुष्य तन व समाज को धारण  करने हेतु आवश्यक है , यथा --- सत्य, अहिंसा (मनसा - वाचा - कर्मणा ), अस्तेय, अपरिग्रह व ब्रह्मचर्य। 
भगवान = भ (भूमि-पृथ्वी )+ ग (गगन -आकाश )+ व (वायु - हवा )+I ( अनल - अग्नि ) + न  (नीर - जल )। 
खुदा = चूंकि ये पांचों तत्व खुद ही बने हैं इनको किसी मनुष्य ने नहीं बनाया है इसलिए ये ही 'खुदा' हैं। 
GOD = G (जेनरेट )+ O (आपरेट ) + D (डेसट्राय )। इन तत्वों का कार्य  उत्पति - पालन - संहार = GOD है। 

मानव जीवन को सुंदर- सुखद- समृद्ध  बनाने  की धारणा वालों ने खुद को धर्म-निरपेक्ष अर्थात सद्गुणों  से रहित घोषित कर रखा है और नास्तिक भी ; साथ ही डॉ अंबेडकर के अनुयाई कहलाने वालों ने खुद को  सफ़ेद जाति के षड्यंत्र में फंस कर मूल निवासी घोषित कर रखा है। स्पष्ट है इन परिस्थितियों का पूरा-पूरा लाभ शोषणकारी  - साम्राज्यवादी /सांप्रदायिक  - ब्राह्मण वादी शक्तियाँ  उठा कर खुद को मजबूत व शोषितों को विभक्त करने में उठाती हैं। यदि हम शब्दों के खेल में न फंस कर उनके सत्य अर्थ  को समझें व समझाएँ  तो सफल हो सकते हैं अन्यथा भारत का संविधान व लोकतन्त्र नष्ट हुये बगैर नहीं रह सकता। 


  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।
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Thursday, June 26, 2014

सावधान झूठ का खेल शुरू हो चुका है ---विजय राजबली माथुर

" मधुकर दत्तात्रेय (उर्फ बाला साहब) देवरस चाहते हैं कि,संघ उनके जीवन काल मे सत्ता पर काबिज हो जाये। इसके लिए डा जयदत्त पन्त के मतानुसार उन्होने लक्ष्य रखा था कि,शहरों का 2 प्रतिशत और गावों का 3 प्रतिशत जनसमर्थन प्राप्त कर लिया जाये जो संभवतः रामजन्म भूमि आंदोलन बनाम आडवाणी कमल रथ यात्रा से पूरा हो गया लगता है।"
http://krantiswar.blogspot.in/2011/09/blog-post_25.html

उपरोक्त पोस्ट के माध्यम से मैंने 1991 में व्यक्त विचारों को प्रकाशित किया था। 2014 के चुनाव परिणामों से उसकी पुष्टि भी हो गई है। कुल मतदान का 31 प्रतिशत वोट हासिल करके भाजपा (अप्रत्यक्ष रूप से RSS) सत्तासीन है, इसी ब्लाग के माध्यम से लगातार आगाह करता रहा हूँ परंतु मेरी हैसियत ही क्या है जो कोई मेरे विचारों पर ध्यान देता?

रियूमर स्पीच्युटिंग सोसाईटी ने अपना अफवाह फैलाने का कार्य बदस्तूर शुरू कर दिया है और इस बार मोहरा बनाया गया है नेताजी सुभाष चंद्र बोस को । फेसबुक पर नेताजी के संबंध में RSS समर्थक अखबार द्वारा भ्रामक प्रचार किया गया है जिसका कुछ वांम समर्थकों पर यह प्रभाव हुआ है कि वे नेताजी को संकीर्ण जातिवादी और श्रमिक विरोधी मान बैठे। नेताजी सुभाष खुद को साम्यवादी विचार धारा का वाहक कहते थे और देश में समाजवादी व्यवस्था स्थापित किए जाने के हामी थे। जिस प्रकार पुराणों के माध्यम से 'राम' व 'कृष्ण' का चारित्रिक पतन किया गया है उसी प्रकार वर्तमान में आधुनिक जन-नायकों के चरित्र हनन का सिलसिला शुरू किया गया है। यदि अभी से इसका डट कर मुक़ाबला नहीं किया गया तो दुष्प्रचारक अपने उद्देश्य में उसी प्रकार सफल हो जाएँगे जिस प्रकार जनता का वोट हासिल करने मे सफल हो गए थे। 

कामरेड बाला साहब देवाधे धन्यवाद के पात्र हैं जिनके सद प्रयत्नों से सच्चाई का तुरंत खुलासा भी हो गया है। इसी प्रकार हम सब को सतत जागरूक रहना होगा व जनता को भ्रमित होने से बचाना होगा।






लन्दन के फुटपाथ पर दो भारतीय रुके और
जूते पोलिश करने वाले से एक व्यक्ति ने जूते पोलिश करने को कहा ...

जूते पोलिश हो गये ..
पैसे चुका दिए और वो दोनों अगले जूते पोलिश करने वाले के
पास पहुँच गये !

वहां पहुँच कर भी उन्होंने वही किया...
जो व्यक्ति अभी जूते पोलिश करवाके आया था,

उसने फिर जूते पोलिश करवाए और पैसे चूका कर
अगले जूते पोलिश करने वाले के पास चला गया...........

जब उस व्यक्ति ने 7-8 बार पोलिश किये हुए ~
जूतो को पोलिश करवाया तो .....
उसके साथ के व्यक्ति के सब्र का बाँध टूट पड़ा.....
उसने पूछ ही लिया

" भाई जब एक बार में तुम्हारे जूते पोलिश हो चुके तो
बार-बार क्यों पोलिश करवा रहे हो"?

प्रथम व्यक्ति बोला
" ये अंग्रेज मेरे देश में राज़ कर रहे हैं,
मुझे इन घमंडी अंग्रेजो से जूते साफ़ करवाने में बड़ा मज़ा आता है !!

वह थे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस..!!!
www.nationalparivartan.com













 ~विजय राजबली माथुर ©
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Sunday, April 8, 2012

देश के लिए शहादत




08 अप्रैल-1857 को मंगल पांडे जी की शहादत,1929 मे भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा असेंबली मे बम फेंका जाना -मुंबई के आतंकवादी हमले मे शहीद संदीप उन्नीकृष्णन जी का जन्मदिन। 

http://krantiswar.blogspot.in/2011/03/blog-post_22.html



Wednesday, September 28, 2011

आधुनिक शिशुपाल शर्मा-न्याय मूर्ति आलोक बोस


बाराबंकी जो हमारा गृह जिला है काफी भाग्यशाली रहा जो वहाँ के जिला जज के रूप मे न्याय मूर्ति आलोक कुमार बोस का आगमन हुआ। बोस साहब ने आते ही न्यायालय क्षेत्र का वास्तविक निरीक्षण किया और रेकार्ड्स का भौतिक सत्यापन कराया। सर्व-प्रथम तो उन्होने रिजर्व बैंक द्वारा जमींदारी -उन्मूलन के समय जारी किए गए मुआवजा बाण्ड्स जो दोहरे तालों मे सील किए रखे थे खुलवा कर देखे तथा उनके दावेदारों को वितरण की पहल की। अब ये बाण्ड्स पूर्व जमींदारों के उत्तराधिकारियों को 25 सितंबर 2011 को विशेष लोक -अदालत मे वितरित किए जा चुके हैं,जिनकी स्कैन कापी नीचे देख सकते हैं । वंचितों को न्याय प्रदान कर बोस साहब ने तो अपने कर्तव्य का वास्तविक पालन किया किन्तु हमे यह विश्वास होता है कि यदि सभी न्यायाधीश ही नहीं सभी अधिकारी उनका अनुसरण करें तो समाज मे व्याप्त कुंठा और उपेक्षा भाव को भी समाप्त किया जा सकता है एवं न्याय का शासन भी स्थापित किया जा सकता है। 

बोस साहब ने अपने कार्यालय के कर्मचारियों द्वारा अतीत मे दबाई हजारों फाइलों (समाचार की कटिंग का स्कैन नीचे देखें) को सामने निकलवा कर दोषी दर्जनभर  कर्मचारियों को सस्पेंड ,एक को बर्खास्त कर दिया  तथा 134 के विरुद्ध न्यायिक जांच कमेटी बैठा दी ,एक की पेंशन तथा जांच चलने तक दोषी कर्मचारियों की फंड से धन निकासी पर रोक लगा दी। 

आज शहीद भगत सिंह के जन्मदिवस पर एक कर्तव्यनिष्ठ न्यायाधीश आलोक कुमार बोस साहब का अभिनन्दन करते हुये हाई स्कूल मे पढ़ी एक विद्वान लिखित कहानी मे' सम्राट अशोक 'की न्याय-व्यवस्था की लोकप्रियता मे उनके न्याय मंत्री शिशुपाल शर्मा जी की याद आ गई और लगा कि हमारे न्याय मूर्ति आलोक बोस साहब भी आधुनिक शिशुपाल शर्मा ही हैं। 

'अर्थशास्त्र'के रचयिता कौटिल्य /चाणक्य ने जिन चंद्र गुप्त मौर्य को चक्रवर्ती सम्राट बनवाया था उन्ही के पौत्र थे सम्राट अशोक और उनकी न्याय-व्यवस्था इतिहास मे ही अमर नहीं है अपने काल मे बेहद लोकप्रिय भी थी जिसके पीछे थे न्यायमन्त्री शिशुपाल शर्मा जी। शिशुपाल जी ने गुप्तचर व्यवस्था पर भी गुप्तचरी की व्यवस्था कर रखी थी। उन्हें नित्य सम्पूर्ण ब्यौरा उपलब्ध होता रहता था और वह जनता की ओर से शिकायत पहुँचने से पूर्व ही न्याय कर दिया करते थे। यही कारण था कि जनता अपने शासक सम्राट अशोक को बहौत चाहती थी। 

सम्राट अशोक अपने न्यायमन्त्री शिशुपाल शर्मा का बहुत आदर -सम्मान करते थे। एक बार उनके मन मे आया कि जरा अपने न्यायमन्त्री का न्याय जांचा जाये। सम्राट अशोक भेष बदल कर नगर मे शाम को दिन ढलते ही विचरण को निकाल पड़े और कुछ लोगों से पूछा कि किसी को कोई शिकायत हो तो बताए। जब किसी से उन्हें कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई तो गुप्तचरों की कार्यप्रणाली जाँचने हेतु एक विधवा के मकान का दरवाजा खट-खटाया  और न खुलने पर दरवाजे  को झकझोरना शुरू कर दिया ,शिकायत किसी नागरिक ने उचित स्थान पर कर दी और एक कर्तव्यनिष्ठ गुप्तचर अपना वेश बदल कर मौके पर पहुंचा ,वह वेश बदले सम्राट अशोक को पहचान न सका और उसके जब समझाने से भी वह वहाँ से नहीं हटे तो उन्हें बल पूर्वक हटाना चाहा जिस पर दोनों मे संघर्ष हुआ और अशोक ने गुप्त हथियार से उस गुप्तचर पर वार कर दिया जिससे उसका प्राणान्त हो गया। वेश बदले सम्राट अशोक वहाँ से तुरंत हट गए और राजसी-वेश मे महल पहुँच गए । जब कई दिन तक शिशुपाल शर्मा अपने गुप्तचर के हत्यारे का पता न लगा सके तो सम्राट अशोक ने कहा अब प्रयास छोड़ दीजिये बेकार है। परंतु शिशुपाल शर्मा ने कहा मै हत्यारे को हत्या का दण्ड दिये बगैर प्रयास नही छोड़ सकता। 

शिशुपाल खुद जांच पर निकले परंतु कोई नहीं बता सका कि उस रात किस व्यक्ति ने हत्या की । परेशान शिशुपाल उस विधवा के मकान के पास भी गए और विचारमग्न ही थे कि उस महिला ने उन्हें पहचानते हुये भीतर बुलाया और कहा मै आपको हत्यारे का पता बता देती हूँ परंतु आप उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाएंगे क्योंकि वह खुद सम्राट अशोक हैं। शिशुपाल ने उस महिला से सम्पूर्ण संघर्ष की कहानी ज्ञात की और निर्देश दिया कि उन्होने सम्राट को पहचान लिया था यह बात किसी को न बताएं। शिशुपाल ने सम्राट अशोक को सूचित किया कि हत्यारे का पता लग गया है और उसे (निश्चित तिथि बताते हुये ) फांसी दे दी जाएगी। 

सम्राट अशोक ने समझा कि शिशुपाल किसी गलत और बेगुनाह को फांसी पर चढ़ा देंगे तब उनसे उनके न्याय का हिसाब मांगेंगे। लेकिन शिशुपाल ने एक सुनार से गुप्त रूप से सम्राट अशोक की सोने की मूर्ती बनवाई और जेब मे डाल कर फैसले के दिन  दरबार मे पहुँच गए । निश्चित समय पर सम्राट ने पूछा अपराधी कहाँ है?न्यायमन्त्री बोले अभी उसे हाजिर भी कर रहा हूँ और यहीं दण्ड भी दे रहा हूँ। सम्राट अशोक अचंभित थे कि हो क्या रहा है?शिशुपाल ने पहले फैसला सुनाया कि गुप्तचर का हत्यारा यहीं दरबार मे है और उसे अभी फांसी दी जा रही है फिर सारा वृतांत बताया। जेब से सम्राट अशोक की मूर्ती निकाल कर उन्ही के सामने कर्मचारी को देकर फांसी पर लटकवा दिया। सम्राट अशोक ,सारे दरबारी और जनता सभी हैरान थे। 

शिशुपाल ने सम्राट अशोक को उनकी दी राज मुद्रा लौटाते हुए  पद-त्याग दिया। सम्राट अशोक ने कहा वह उद्दंड था इस लिए मार दिया परंतु शिशुपाल ने यह तर्क स्वीकार नहीं किया उन्होने सम्राट पर अकेली विधवा महिला के घर रात के अंधेरे मे जाने, उसे परेशान करने और गुप्तचर की हत्या करने के मामले मे क्षमा नहीं किया न ही यह तर्क माना उनका अभीष्ट उसे मारना नहीं था वह केवल डरा रहे थे पर वह धोखे मे मारा गया। न ही उन्होने सम्राट द्वारा फिर ऐसा न होने के आश्वासन को माना। 

ऐसी थी शिशुपाल शर्मा की न्याय-व्यवस्था जिसने सम्राट अशोक को लोकप्रियता की बुलंदियों पर पहुंचाया था। राज्य मे अपराध ही नहीं होते थे ,होते तो कड़े दण्ड दिये जाते थे। न्यायमन्त्री ने सम्राट तक को नहीं क्षमा किया। आज विपरीत स्थितियाँ तो हैं उनमे भी न्याय मूर्ति आलोक कुमार बोस साहब ने जिस अदम्य-साहस का परिचय दिया है और जनता को उसका वास्तविक न्याय दिलाना प्रारम्भ किया है उससे आशा की एक किरण दिखाई देती है। यदि सम्पूर्ण न्याय-व्यवस्था न्याय मूर्ति आलोक कुमार बोस साहब की भांति दृढ़ निश्चय कर ले तो विदेशियों से प्रभावित और उनके हक के लिए काम करने वाले अन्ना-टीम के गुब्बारे की हवा निकलते देर नहीं लगेगी।

Hindustan-Lucknow-27/09/2011

Hindustan-Lucknow-27/09/2011



Hindustan-Lucknow-26/09/2011





Friday, April 8, 2011

ढोंग पाखण्ड जिंदाबाद !तो नहीं ख़तम होगा आतंकवाद!! ------ विजय राजबली माथुर

6 अप्रैल 2010 से दंतेवाड़ा से प्रारंभ हुआ नक्सली आतंकवाद लगातार बढ़ता जा रहा है.नक्सली और सैन्य बल कर्मी दोनों भारत माँ की संतानें हैं और एक दुसरे के खून की प्यासी हो रही हैं.नक्सलियों को वायुसेना के प्रहार से नष्ट करने की मांग ज़ोर पकड़ रही है परन्तु नक्सलवाद के उभार के जो कारण हैं उन्हें दूर करने की मांग दबाई जा रही है.अभी २ मई से २३ जुलाई २०१ ० तक गुरु मीन राशी में रहकर शनि से सम-सप्तक योग बना रहा था -यह योग  जन साधारण के हित में नहीं है;चाहे लैला नमक समुद्री तूफ़ान हो या छत्तीस गढ़ का नक्सली आन्दोलन,पिसना गरीब जनता को ही पड  रहा है.सरकारी दमन से नक्सलवाद को कुछ समय के लिए दबाया तो जा सकता है परन्तु सदा के लिए समाप्त नहीं किया जा सकता.यह छोटी सी बात सरकार चलाने  वाले या सरकार की आलोचना करने वाले नेतागण नहीं समझ रहे हैं या जानबूझ कर नहीं समझना चाह रहे हैं यह शोध का विषय नहीं है.स्पष्ट है की लोकतान्त्रिक सरकार जनता की,जनता द्वारा और जनता के लिए सैद्दांतिक अवधारणा मात्र है.वस्तुतः सरकार बनाने और चलाने में धनाढ्य और साफ साफ कहा जाये तो पूंजीपति वर्ग का हाथ रहता है जो जन साधारण के हित की बात सोच ही नहीं सकता। स्वाभाविक रूप से पूजीपति वर्ग से प्रभावित सरकारें चाहे वे जिस भी दल की हों पूंजीपति वर्ग का ही हित साधन सोच व संपन्न कर सकती हैं.तंत्र पर जन नहीं प्रभावी है बल्कि जन पर तंत्र हावी है.ऐसे में यदि जन साधारण अपने हक़ और हुकूक की बात करता है तो उसे अनसुना करदिया जाता है तभी नक्सलवाद जन को प्रभावित कर ले जाता है.नक्सलवाद कोई सिरफिरे देशद्रोही नौजवानों का खेल नहीं है जैसा की किसी मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया है।

नक्सलवाद १९६७ में बंगाल के सिलिगुड़ी के निकट नक्सलबारी से शुरू हुआ था.१९६९ में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से अलग होकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिन वादी) का गठन करने वाले नेताओं और उनके विभाजित अनुयाइयों द्वारा संचालित सशस्त्र आन्दोलन ही नक्सलवाद है.१९६४ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन से भाकपा (M) का गठन हुआ था जबकि भाकपा का गठन १९२५ में कानपूर में हुआ था जिसको गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे उद्भट विद्वान का समर्थन प्राप्त था.१९१७ में रूस में लेनिन के नेत्रत्त्व में कम्युनिस्ट सरकार की स्थापना से प्रभावित हो कर भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के उद्भट और कर्मठ नेताओं ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की थी.१९२५ में ही स्थापित आर.एस.एस.(जो साम्राज्यवादियों से समर्थन प्राप्त था) का राजनैतिक संगठन तो ६ वर्ष तक केंद्र सरकार का नेत्रत्त्व करने में कामयाब रहा परन्तु कम्युनिस्ट आन्दोलन बिखरते बिखरते जनता से दूर हो गया.

तमाम विद्वानों,बुद्दिजीवियों,लेखकों,कवियों,रंगकर्मियों से  समर्थन प्राप्त होने के बावजूद भी कम्युनिस्ट आम जनता को प्रभावित करने में असमर्थ रहे इसीलिए जनता और सत्ता से दूर रहे.पश्चिम बंगाल और केरल में वाम मोर्चा की सरकारें प्रचलित तंत्र और ढर्रे पर ही चलीं.चूंकि वे कोई क्रांतिकारी कदम उठा ही नहीं सकती थीं न उठा ही सकीं.आज सोवियत संघ ही बिखर गया,कम्युनिज्म उखड गया कम्युनिस्ट हताशा निराशा में चले गए. जब सभी कम्युनिस्ट एकजुट भी थे तभी उनके विरुद्ध १९३० में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना हो चुकी थी जिसके पुरोधा डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने अपनी पुस्तक इतिहास चक्र में लिखा है की,भारत के लिए कोई भी यूरोपीय वाद न तो पूँजी वाद और न ही साम्यवाद उपयुक्त है.परन्तु डॉक्टर लोहिया समाजवाद का समर्थन करते थे.समाजवाद वह आर्थिक प्रणाली है जिसमे उत्पादन व वितरण के साधनों पर समाज का नियंत्रण हो.यदि व्यव्हार में ऐसा भी होता या गाँधी जी का ट्रस्टीशिप सिद्दांत ही अमल में लाया जाता तो आज नक्सल वाद की कोई समस्या ही नहीं होती.कम्युनिज्म पूर्णतय:  भारतीय दर्शन है न तो खुद कम्युनिस्टों ने कभी दावा किया न ही विद्वानों ने कभी सोचा की महर्षि कार्ल मार्क्स ने जिस सिद्दांत का प्रतिपादन किया वो मौलिक रूप से भारतीय दर्शन ही है.साम्यवाद का मूल मन्त्र है प्रत्येक से उसकी योग्यतानुसार और प्रत्येक को उसकी आवश्यकतानुसार.सर्वे सन्तु निरामयः और सर्वे सन्तु सुखिनः की कामना की सुन्दर व्याख्या आधुनिक युग में पहले पहल महर्षि कार्ल मार्क्स ने ही की थी' दास कैपिटल' एवं' कम्युनिस्ट मनिफैस्तो' द्वारा मार्क्स ने मानव द्वारा मानव के शोषण का पुर जोर विरोध किया था.कार्लमार्क्स मूलतः जर्मन थे जहाँ के मैक्समूलर साहब ने भारत में ३० वर्ष रहकर संस्कृत का गहन अध्ययन किया था और हमारी प्राचीन पांडुलिपियों को लेकर जर्मन चले गए थे.वेदोक्त सिद्दांतों का मैक्समूलर  साहब ने जर्मन भाषा में अनुवाद किया था और उन्ही का पूर्ण अध्ययन करने के बाद महर्षि कार्लमार्क्स ने साम्यवाद के सिद्दांतों का निरूपण किया था इसलिए मार्क्स के सिद्दांत पूर्णतः भारतीय दर्शन पर आधारित हैं.रूस में साम्यवाद की विफलता का कारण भारतीय दर्शन का अनुपालन न होने की वजह है.भारतीय कम्युनिस्टों की विफलता का कारण भी भारतीय दर्शन से दूरी बनाये रखना ही है और यही वजह है की भारत की जनता अपने ही दर्शन से कटे होने के कारण त्राहि त्राहि कर रही है.साम्राज्यवादियों द्वारा प्र्ष्ठपोषित तथाकथित भारतीयता वादियों के दर्शन में साधारण जन का हित साधन नहीं है वे तो पूंजीपतियों के हित चिन्तक हैं.


आर्ष चरित्रों की पूंजीवादी व्याख्या -हमारे प्राचीन आर्ष चरित्र चाहे वे मर्यादा  पुरोषत्तम श्री राम हों या योगिराज श्री कृष्ण ,उत्तरवर्ती महावीर जिन हों या तथागत बुद्ध ,मध्य युगीन गुरुनानक,कबीर,तुलसीदास,आधुनिक दयानंद सरस्वती,विवेकानंद,राजा  राम मोहन राय,लाला लाजपत राय,विपिनचन्द्र पाल ,बाल गंगाधर तिलक आदि महापुरुषों को पूंजीवादियों ने इस रूप में पेश किया है की वे सबल वर्ग का समर्थन करते हैं जबकि हकीकत यह है की इनमे से प्रत्येक तथा बाद के डॉ.अम्बेडकर,महात्मा गाँधी आदि सभी ने निर्बल व असहाय वर्ग के उत्थान के लिए प्रयास किया है.तुलसीदास ने रामचरितमानस को सर्वजन हिताय लिखा है जिसमे कागभुशुंडी से गरुण को उपदेश दिलाते हुए उन्होंने समाज में हेय वर्ग के उत्थान का सन्देश दिया है परन्तु आज के ढोंगी और पाखंडियों ने क्रन्तिकारी कृति का  पूंजीवादीकरण कर लिया है और उसका अखंड पाठ करने के नाम पर जनता को भ्रमित कर रखा है.रामचरितमानस का अखंड पाठ करने पुस्तक की पूजा करने और आरती उतारने से किसी का भला होने वाला नहीं है.तुलसीदास जी के मर्म को समझने की आवश्यकता है उन्होंने अपने महाकाव्य के माध्यम से उत्पीडित जनता को साम्राज्यवादी शोषण के विरुद्द जाग्रत कर संघर्ष करने का आह्वाहन किया है जिस प्रकार राम ने साम्राज्यवादी रावन का संहार कर के किया था.परन्तु आज हमारे देश में हो क्या रहा है-रामचरित मानस का पाठ ,भोग,आरती,और शोषकों उत्पीदकों का महिमा मंडन इसी प्रकार अन्याय का विरोध करने वाले योगिराज श्री कृष्ण के उच्च एवं आर्ष चरित्र को रासलीला के माध्यम से एक रसिक के रूप में पेश करदिया गया है.श्री कृष्ण के तप  और त्याग को भुला कर उनकी जन्माष्टमी को भोग कीर्तन,आरती तक सीमित कर दिया गया है.परिणाम हमारे और आप के सब के सामने हैं-अशांति,अव्यवस्था,अराजकता और आतंकवाद।


यदि हमें विश्व को सुन्दर,सुखद व सम्रद्द बनाना है ,मानव द्वारा मानव के शोषण को समाप्त करना ही होगा.जब तक दरिद्र नारायण की सच्ची सेवा नहीं होगी,प्रत्येक निर्धन के घर में दीपक की रौशनी नहीं होगी केवल मुट्ठी भर धनवानों की चलती रहेगी तो हमारा भारत ही नहीं पूरी दुनिया कराहती रहेगी.आज यहाँ,कल वहां,आतंकवाद का साया छाया रहेगा ढोंग व पाखंड को छाती से चिपका कर खुशहाली के सपने देखना आकाश -कुसुम तोड़ने जैसा ही है ये याद रखें.


(इसी ब्लाग में यह लेख पहले ०४ जून २०१० को तथा लखनऊ के एक स्थानीय अखबार में २५ मई २०१० को प्रकाशित हो चूका है,आज भी परिस्थितियें वैसी की वैसी ही होने के कारण पुनर्प्रकाशित किया है ) 

विशेष-आज ०८ अप्रैल है -वह दिन जब केन्द्रीय असेम्बली में सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बम फेंका था.वह बम गूंगी -बहरी सरकार और क़ानून निर्माताओं को जगाने के लिए फेंका गया था किसी हिंसक इरादे से नहीं.न ही किसी की जान ही गई थी. २६ जनवरी १९३० को बांटे गए पर्चे में भगत सिंह ने कहा था-"एक क्रांतिकारी सबसे अधिक तर्क में विशवास करता है.वह केवल तर्क और तर्क में ही विशवास करता है.किसी प्रकार का गाली-गलौच या निन्दा,चाहे वह ऊंचे से ऊंचे स्तर से की गई हो,उसे अपने निश्चित उद्देश्य -प्राप्ति से वंचित नहीं कर सकती.यह सोचना कि यदि जनता का सहयोग न मिला या उसके कार्य की प्रशंसा न की गई तो वह अपने उद्देश्य को छोड़ देगा ,निरी मूर्खता है."



लोअर कोर्ट के जवाब में उन्होंने कहा था क्रान्ति से हमारा अभिप्राय है-अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज -व्यवस्था में आमूल परिवर्तन."समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मजदूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढी कमाई का सारा धन शोषक पूंजीपति हड़प जाते हैं.दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मोहताज हैं.दुनिया भर के बाजारों को कपड़ा मुहैय्या करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढंकने -भर को भी कपडा नहीं पा रहा है.सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर,लोहार तथा बढ़ई स्वंय गंदे बाड़ों में रह कर ही अपनी   जीवन-लीला समाप्त कर जाते हैं.इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूंजीपति जरा-जरा सी बातों के लिए लाखों का वार-न्यारा कर देते हैं.........स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठ कर रंगरेलियां मना रहा है शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल पड़े हैं."


आज भी जो शासन-व्यवस्था है वह भगत सिंह आदि क्रांतिकारियों के सपनों का स्वराज्य नहीं है.उनका कथन है-"क्रांतिकारियों का विशवास है कि देश को क्रान्ति से ही स्वतंत्रता मिलेगी.वे जिस क्रान्ति के लिए प्रयत्नशील हैं और जिस क्रान्ति का रूप उनके सामने स्पष्ट है उसका अर्थ केवल यह नहीं है कि विदेशी शासकों तथा उनके पिट्ठुओं से क्रांतिकारियों का सशस्त्र संघर्ष हो ,बल्कि इस सशस्त्र संघर्ष के साथ -साथ नवीन सामाजिक व्यवस्था के द्वार देश के लिए मुक्त हो जाएँ.क्रान्ति पूंजीवाद,वर्गवाद तथा कुछ लोगों को ही विशेषाधिकार दिलाने वाली ओरानाली का अंत कर देगी.यह राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़ा करेगी,उससे नवीन राष्ट्र और नए समाज का जन्म होगा.क्रान्ति से सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि वह मजदूर तथा किसानों का राज्य कायम कर उन सब सामजिक अवांछित तत्वों को समाप्त कर देगी जो देश की राजनीतिक शक्ति को हथियाए बैठे हैं."


आप खुद ही तुलना करें क्या हमें जो आजादी मिली है वह वैसी ही है जिसके लिए भगत सिंह ,बटुकेश्वर दत्त,अशफाक उल्ला खाँ,राम प्रसाद बिस्मिल ,चन्द्र शेखार आजाद आदि असंख्य क्रांतिकारियों ने अपना बलिदान दिया था.यदि नहीं तो उसे प्राप्त करने में आप क्या योगदान देंगें?

Tuesday, March 22, 2011

भगत सिंह का बम ------ विजय राजबली माथुर




जब स्वामी श्रद्धानंद  सं १८८४ ई.में जालंधर में मुंशी राम के रूप में वकालत कर रहे थे तो भगत सिंह जी के बाबा जी सरदार अर्जुन सिंह उनके मुंशी थे.भगत सिंह के चाचा सरदार अजीत सिंह भी उनके साथ थे.इस प्रकार सिख होते हुए भी यह परिवार वैदिक-धर्मी बन गया और मुंशी राम जी (श्रद्धानंद जी) के साथ आर्य समाज के माध्यम से स्वाधीनता आन्दोलन में सक्रिय  भाग लेने लगा .'सत्यार्थ प्रकाश' में महर्षि दयानंद जी के ये विचार कि,विदेशी शासन यदि माता-पिता से भी बढ़ कर ख्याल रखता हो तब भी बुरा है और उसे जल्दी से जल्दी उखाड़-फेंकना चाहिए पढ़ कर युवा भगत सिंह जी ने भारत को आजादी दिलाने का दृढ निश्चय किया .


 २३ मार्च १९३१ को सरदार भगत सिंह को असेम्बली में बम फेंकने के इल्जाम में फांसी दी गयी थी और फांसी के तख्ते की तरफ बढ़ते हुए वीर भगत सिंह मस्ती के साथ गा रहे थे-


सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.
देखना है जोर कितना बाजुये कातिल में है..


कैसी अपूर्व मस्ती थी,कैसी उग्रता थी उनके संकल्प में जिससे वह हँसते-हँसते मौत का स्वागत कर सके और उनके कंठों से यह स्वर फूट सके-


शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले .
वतन पर मरने वालों का ,यही बाकी निशाँ होगा..


२३ दिसंबर १९२९ को भी क्रांतिकारियों ने वायसराय की गाडी उड़ाने को बम फेंका था जो चूक गया था.तब गांधी जी ने एक कटुता पूर्ण लेख 'बम की पूजा' लिखा था.इसके जवाब में भगवती चरण वोहरा ने 'बम का दर्शन ' लेख लिखा.सत्यार्थ प्रकाश के अनुयायी भगत सिंह के लिए बम का सहारा लेना आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि उसके रचयिता स्वामी दयानंद अपनी युवावस्था -३२ वर्ष की आयु में १८५७ की क्रांति में सक्रिय भाग खुद ही ले चुके थे.दयानंद जी पर तथाकथित पौराणिक हिन्दुओं ने कई बार प्राण घातक हमले किये और उनके रसोइये जगन्नाथ के माध्यम से उनकी हत्या करा दी,उनके बाद आर्य समाज में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के हितैषी आर.एस.एस.की घुसपैठ बढ़ गयी थी.अतः भगत सिंह आदि युवाओं के लिए अग्र-गामी कदम उठाना अनिवार्य हो गया था.अतः 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन 'का गठन कर क्रांतिकारी गतिविधियाँ संचालित की गयीं.


२६ जनवरी १९३० को बांटे गए पर्चे में भगत सिंह ने 'करतार सिंह'के छद्म नाम से जो ख़ास सन्देश दिया था उसका सार यह है-"क्या यह अपराध नहीं है कि ब्रिटेन ने भारत में अनैतिक शासन किया ?हमें भिखारी बनाया तथा हमारा समस्त खून चूस लिया?एक जाती और मानवता के नाते हमारा घोर अपमान तथा शोषण किया गया है.क्या जनता अब भी चाहती है कि इस अपमान को भुला कर हम ब्रिटिश शासकों को क्षमा कर दें?हम बदला लेंगे,जनता द्वारा शासकों से लिया गया न्यायोचित बदला होगा.कायरों को पीठ दिखा कर समझौता और शांति की आशा से चिपके रहने दीजिये.हम किसी से भी दया की भिक्षा नहीं मांगते हैं और हम भी किसी को क्षमा नहीं करेंगे.हमारा युद्ध विजय या मृत्यु के निनाय तक चलता ही रहेगा.इन्कलाब जिंदाबाद!"


और सच में हँसते हुए ही उन्होंने मृत्यु का वरण किया.जिस बम के कारण उनका बलिदान हुआ उसका निर्माण आगरा के नूरी गेट में हुआ था जो अब उन्ही के नाम पर 'शहीद भगत सिंह द्वार'कहलाता है.वहां अब बूरा बाजार है.एक छोटी प्रतिमा 'नौजवान सभा',आगरा द्वारा वहां स्थापित की गयी थी जिसे अब आर.एस.एस. वाले अपनी जागीर समझने लगे हैं.यह बम किसी की हत्या करने के इरादे से नहीं बनाया गया था-०६ जून १९२९ को दिल्ली के सेशन जज मि.लियोनार्ड मिडिल्टन की अदालत में भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त ने कहा था-"हमारे विचार से उन्हें वैज्ञानिक ढंग से बनाया ही ऐसा गया था.पहली बात ,दोनों बम बेंचों तथा डेस्कों के बीच की खाली जगह में ही गिरे थे .दुसरे उनके फूटने की जगह से दो फिट पर बैठे हुए लोगों को भी ,जिनमें श्री पी.आर.राऊ ,श्री शंकर राव तथा सर जार्ज शुस्टर के नाम उल्लेखनीय हैं,या तो बिलकुल ही चोटें नहीं आयीं या मात्र मामूली आयीं.अगर उन बमों में जोरदार पोटेशियम क्लोरेट और पिक्रिक एसिड भरा होता ,जैसा सरकारी विशेग्य ने कहा है,तो इन बमों ने उस लकड़ी के घेरे को तोड़ कर कुछ गज की दूरी पर खड़े लोगों तक को उड़ा दिया होता .और यदि उनमें कोई और भी शक्तिशाली विस्फोटक भरा जाता तो निश्चय ही वे असेम्बली के अधिकाँश सदस्यों को उड़ा देने में समर्थ होते..................लेकिन इस तरह का हमारा कोई इरादा नहीं था और उन बमों ने उतना ही काम किया जितने के लिए उन्हें तैयार किया गया था.यदि उससे कोई अनहोनी घटना हुयी तो यही कि वे निशाने पर अर्थात निरापद स्थान पर गिरे ".


मजदूरों की जायज मांगों के लिए उनके आन्दोलन को कुचलने के उद्देश्य से जो 'औद्योगिक विवाद विधेयक 'ब्रिटिश सरकार  लाई थी उसी का विरोध प्रदर्शन ये बम थे.भगत सिंह और उनके साथी क्या चाहते थे वह भी कोर्ट में दिए उनके बयान से स्पष्ट होता है-"यह भयानक असमानता ....आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठ कर रंगरेलियाँ मना  रहा है और शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल पड़े हैं.............साम्यवादी सिद्धांतों पर समाज का पुनर्निर्माण करें .........क्रांति से हमारा मतलब अन्तोगत्वा एक ऐसी समाज -व्यवस्था की स्थापना से है जो इस प्रकार के संकटों से बरी होगी और जिसमें सर्वहारा वर्ग का आधिपत्य सर्वमान्य होगा और जिसके फलस्वरूप स्थापित होने वाला विश्व -संघ पीड़ित मानवता को पूंजीवाद के बंधनों से और साम्राज्यवादी युद्ध की तबाही से छुटकारा दिलाने में समर्थ हो सकेगा."


शहीद भगत सिंह कैसी व्यवस्था चाहते थे उसे लाहौर हाई कोर्ट के जस्टिस एस.फोर्ड ने फैसले में लिखा:"यह बयान कोई गलती न होगी कि ये लोग दिल की गहराई और पूरे आवेग के साथ वर्तमान समाज के ढाँचे को बदलने की इच्छा से प्रेरित थे.भगत सिंह एक ईमानदार और सच्चे क्रांतिकारी हैं .मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि वे इस स्वप्न को लेकर पूरी सच्चाई से खड़े हैं कि दुनिया  का सुधार वर्तमान सामजिक  ढाँचे को तोड़ कर ही हो सकता है.........."