Showing posts with label संघ. Show all posts
Showing posts with label संघ. Show all posts

Saturday, July 21, 2018

संसद में राहुल - मोदी मिलाप : जो न समझे वे गफलत में ------ विजय राजबली माथुर













पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिंघा राव साहब ने पदमुक्त होने के बाद अपने उपन्यास ' The Insider ' में उल्लेख किया है कि, हम लोकतन्त्र के भ्रमजाल में जी रहे हैं। 

वस्तुतः आज संसद और विधायिकाओं में जन- प्रतिनिधि के रूप में निर्वाचित लोग अधिकतर किसी न किसी व्यवसायिक घराने से संबंध रखते हैं और वे अपने वर्ग के लोगों के हक में निर्णय लेते हैं न कि जनता के हक में। 
यही गठबंधन राष्ट्रीय स्तर पर हो जाये तो विपक्ष को अपना गठबंधन बनाने में आसानी हो जाये वरना अभी तो कुछ विपक्ष इधर कुछ उधर भटक रहा है और यही आर एस एस की नीति है कि , सत्ता और विपक्ष दोनों पर उसका नियंत्रण रहे । 1980 में इन्दिरा गांधी और 1985 में राजीव गांधी आर एस एस के सहयोग से बहुमत पा सके थे इसीलिए उनको खुश करने के लिए अयोध्या से ताला खुलवाया था और 1992 में कांग्रेस शासन में ही विवादित ढांचा गिराया गया जिसके बाद तेजी से भाजपा की बढ़त हुई थी और वर्तमान मोदी सरकार मनमोहन सिंह की कृपा का फल है। लेकिन कांग्रेस-भाजपा विरोधी विपक्ष जनता से कटा होने के कारण उसके लिए कांग्रेस का साथ देना मजबूरी हो जाती है। राहुल गांधी खुद को मोदी से अधिक हिन्दू होने का दावा कर रहे हैं और चूंकि मोदी - शाह गठजोड़ आर एस एस को कबजाने की कोशिश कर रहा है इसलिए राहुल कांग्रेस को आर एस एस का समर्थन मिल सकता है।  
इस संदर्भ में  पी यू सी एल नेता सीमा आज़ाद जी का दृष्टिकोण यह है --- '' भाजपा को हराकर कांग्रेस को सत्ता में ले आने पर भी भाजपा और उनके अनुसंगी संगठन समाज में बने ही रहेंगे और अपना काम करते रहेंगे। कांग्रेस उन पर रोक लगायेगी ऐसा सोचना भी नासमझी है, उल्टे पिछली घटनायंे बताती हैं कि कांग्रेस सहित दूसरे चुनावी दल उनके साम्प्रदायिक कर्मांे को अपने हित के लिए इस्तेमाल ही करती रही है। ''
(https://www.facebook.com/seema.azad.33/posts/2509223352636533


एक बहुत ही सोची - समझी रणनीति के तहत जनता के मध्य यह प्रचारित करा दिया गया है कि, राजनेता भ्रष्ट होते हैं और भले लोगों को राजनीति में नहीं आना चाहिए। जब देश आज़ाद हुआ तब आज़ादी के आंदोलन से तपे तपाये नेता राजनीति में आए थे और तब राजनीतिक आदर्श उच्च थे। धीरे - धीरे व्यापारी वर्ग राजनीतिज्ञों को प्रभावित करने लगा और अपने हक में नियम - कानून बनवाने लगा। वर्तमान में राजनीतिज्ञों के नाम पर व्यापारी, उद्योगपति और कारपोरेट घराने संसद व विधानसभाओं में काबिज हैं। ऐसे में गरीब जनता, किसान और मजदूर के हक की बातें कहाँ से विधायिका में उठ सकती हैं ? 
12 जून 1975 को तत्कालीन पी एम इन्दिरा गांधी का चुनाव इलाहाबाद हाई कोर्ट में रद्द घोषित करने वाले न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा साहब के एक रिश्तेदार वकील प्रोफेसर साहब ने अपने छात्रों को ऐसा परिणाम आ सकने  का आभास पहले ही दे दिया था जो उनकी निडरता व निष्पक्षता से पूर्ण परिचित थे। उन प्रोफेसर सिन्हा साहब ने ही 1974 - 75 के छात्रों को बता दिया था कि , जिस प्रकार की अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियेँ चल रही हैं उनके अनुसार  1980 से भारत में भी श्रम - न्यायालयों  (Labour Court ) से श्रमिकों के विरुद्ध फैसले होने लगेंगे। 
एमर्जेंसी के दौरान सम्पन्न ' देवरस - इन्दिरा ' गुप्त समझौते के अंतर्गत 1980 में संघ के समर्थन से इन्दिरा गांधी के पुनः सत्तासीन होने पर श्रमिक विरोधी निर्णय श्रम न्यायालयों से होने शुरू हो गए थे। संघ के समर्थन से ही 1984 में पी एम बने उनके पुत्र राजीव गांधी तो सरकार कारपोरेट की तर्ज पर चलाने लगे थे। उदाहरण के तौर पर शिक्षा मंत्रालय का नामांतरण मानव संसाधन मंत्रालय किया जाना है। 
1991 में पी एम बने नरसिंघा राव साहब के वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने जिन उदारीकरण की नीतियों को लागू किया उनको न्यूयार्क जाकर एल के आडवाणी साहब ने उनकी अर्थात भाजपा की नीतियों का चुराया जाना बताया था। उनके बाद बाजपेयी साहब के वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा साहब ने उन नीतियों को ही जारी रखा तथा फिर पी एम बनने पर मनमोहन सिंह जी ने वही नीतियाँ जारी रखीं और आजके पी एम मोदी साहब भी वही नीतियाँ चला रहे हैं। इस प्रकार संघ अर्थात व्यापारियो, उद्योगपतियों व कारपोरेट घरानों का शुभचिंतक राजनीति में मजबूत होता गया है। भाजपा और कांग्रेस की आर्थिक नीतियों में कोई अंतर है ही नहीं। अतः पूर्व राष्ट्रपति मुखर्जी साहब द्वारा नागपूर जाकर संघ को मजबूती देने का प्रयास अनायास नहीं है जनतंत्र पर हावी होते कारपोरेट तंत्र का यह स्व्भाविक परिणाम है। 

 परंतु 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के विरोध जैसी भयानक गलती फिर भाकपा द्वारा दोहराई गई है  पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के संघ कार्यक्रम में दिये भाषण की सराहना करके। : 

इसी प्रकार संघ प्रमुख मोहन भागवत साहब की सीख के अनुसार राहुल गांधी द्वारा 20 जूलाई 2018 को पी एम मोदी को गले लगाने की घटना की भी अनेक भाकपा नेताओं ने सराहना करते समय 1980 से चल रहे संघ - कांग्रेस के परस्परिक रिश्तों को नजरंदाज कर दिया है। इसका खामियाजा देश और जनता को भुगतना होगा। 
 ~विजय राजबली माथुर ©
**************************************************************************
फेसबुक कमेंट्स : 
22-07-2018 

Saturday, December 9, 2017

गुजरात चुनाव में मोदी को हराने की भगवा अपील क्यों ? ------ विजय राजबली माथुर

  











जिन बातों का अब भगवादधारियों और संघ की ओर से खुलासा हो रहा है उनके संबंध में हमने पहले ही लिख दिया था। 
~विजय राजबली माथुर ©

Sunday, September 25, 2011

डा सुब्रह्मण्यम स्वामी चाहते क्या हैं?

(मूल रूप से यह लेख 1990 मे लिखा था जो प्रेस के सांप्रदायिक प्रभाव में होने के कारण प्रकाशित   नहीं किया  गया था ,मुझे लगता है परिस्थितियों मे कोई बदलाव नहीं हुआ है अतः इसे ब्लाग पर दे रहा हूँ)

डा सुब्रह्मण्यम स्वामी जनसंघ और संघ के एक समर्पित कर्मठ नेता रहे हैं। आपात काल मे भूमिगत रह कर इन्होने इंदिरा गांधी को नाकों चने चबवाये थे। गिरफ्तारी से बच कर अमेरिका चले गए बीच मे आकर राज्यसभा के अधिवेशन मे भाग लेकर इंदिरा गांधी को चौंका दिया फिर पंजाबी न जानते हुये भी सिख-वेश मे पुनः फरार हो गए। जनसंघ के जनता पार्टी मे विलय के पश्चात संघ ने प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई के पीछे डा सुब्रह्मण्यम स्वामी को ही लगाया था। अटल बिहारी बाजपेयी चौ.चरण सिंह के पीछे और नाना जी देशमुख जनता पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर के पीछे छाये रहे।

जनता पार्टी के तीसरे विभाजन के समय अटल जी भाजपा के अध्यक्ष बन कर चले गए। नाना जी देशमुख इंदिरा जी के साथ होकर सक्रिय राजनीति से पीछे हट गए और डा स्वामी जनता पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर के साथ चिपक गए और मोरारजी से भी संबन्ध बरकरार रखे रहे। मोरारजी के मन्त्र पर  चंद्रशेखर के विरुद्ध जनता पार्टी अध्यक्ष का चुनाव लड़ा -हार गए और चंद्रशेखर पर तानाशाही व हेरा-फेरी का आरोप लगाने के कारण शेखर जी द्वारा जनता पार्टी से निष्कासित किए गए।

मोरारजी द्वारा सक्रिय राजनीति से निष्क्रिय होने पर संघ के आदेश पर जनता पार्टी मे चंद्रशेखर से माफी मांग कर पुनः शामिल हो गए और उन्हें अपना स्वामी बना लिया। जनता पार्टी के जनता दल मे विलय होने पर चंद्रशेखर और संघ के प्रथक-प्रथक आदेशों पर डा स्वामी ने इन्दु भाई पटेल की अध्यक्षता मे जनता पार्टी को जीवित रखा जिसे राजीव सरकार की कृपा से चुनाव आयोग ने जनता पार्टी (जे पी) के रूप मे पंजीकृत कर लिया।

1980 से ही संघ इंदिरा कांग्रेस समर्थक कारवाइयाँ कर रहा था। आपात काल मे' देवरस-इंदिरा सम्झौता ' हो गया था और उसी का परिणाम पहले मोरारजी फिर वी पी सरकारों का पतन रहा। मधुकर दत्तात्रेय (उर्फ बाला साहब) देवरस चाहते हैं कि,संघ उनके जीवन काल मे सत्ता पर काबिज हो जाये। इसके लिए डा जयदत्त पन्त के मतानुसार उन्होने लक्ष्य रखा था कि,शहरों का 2 प्रतिशत और गावों का 3 प्रतिशत जनसमर्थन प्राप्त कर लिया जाये जो संभवतः रामजन्म भूमि आंदोलन बनाम आडवाणी कमल रथ यात्रा से पूरा हो गया लगता है।

जनता दल सरकार का विघटन कराने मे संघ ने दोतरफा कारवाई की। बाहरी हमले के रूप मे आडवाणी कमल रथ यात्रा सम्पन्न कराकर प्रत्यक्ष रूप से वी पी सरकार को गिरा दिया । दूसरे कदम के रूप मे डा स्वामी के माध्यम से जनता दल मे चंद्रशेखर समर्थक लाबी बनवाकर दल का विभाजन करा दिया और राजीव कांग्रेस की मदद से चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री बनवा दिया। संघ के निर्देश पर चंद्रशेखर सरकार मे डा स्वामी कानून और बानिज्य जैसे महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री बन कर संघ की सत्ता प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं।

भाजपा सांसद जस्वन्त सिंह पूर्व मे ही बोफोर्स तोपों को सही ठहरा चुके हैं। अतः बोफोर्स कमीशन भी भाजपा बनाम संघ की निगाह मे जायज है और बानिज्य मंत्री के रूप मे डा स्वामी राजीव भैया को बोफोर्स कमीशन की दलाली के दलदल से उबारने का प्रयास करेंगे।

कानून मंत्री के रूप मे डा स्वामी ने सर्वप्रथम व्यवस्थापिका का अवमूल्यन करने हेतु लोकसभा अध्यक्ष श्री रबी रे को गिरफ्तार करने की धमकी  दी जिसमे पाँसा उलटते देख कर माफी मांग ली फिर हाईकोर्ट ,दिल्ली मे अपने सचिव से हलफनामा दाखिल कराकर लोकसभा अध्यक्ष के अधिकारों को दल -बदल कानून की आड़ मे चुनौती दी जहां फिर मुंह की खानी पड़ी।

बचकाना हरकतें नहीं:

प्रेस मे डा स्वामी की कारवाईयों को बचकाना कह कर उपहास  उड़ाया जा रहा है उनकी गंभीरता पर विचार नहीं किया जा रहा। हारवर्ड विश्वविद्यालय,अमेरिका का यह विजिटिंग प्रोफेसर न केवल प्रकाण्ड विद्वान है वरन दिलेरी के साथ बातें कह कर अपने मंसूबों को कभी छिपाता नहीं है।

डा स्वामी को जब चीन सरकार ने आमंत्रित किया तो दिल्ली हवाई अड्डे पर आपने पत्रकारों से दो-टूक कहा था कि,"मै रूस विरोधी हूँ इसलिए चीन सरकार ने मुझे ही बुलाया"। आप इज़राईल के प्रबल समर्थक हैं जो कि,साम्राज्यवाद के सरगना अमेरिका का कठपुतली देश है सांसद का .सुभाषिणी अली ने 11 जनवरी 1991  को चंद्रशेखर सरकार से मांग की है कि,अक्तूबर 1990 मे 'इंडियन एक्स्प्रेस'मे छ्पे समाचारों मे डा स्वामी ने श्री लंका के विद्रोही 'लिट्टे छापामारों' और इज़राईली गुप्तचर संगठन 'मोसाद'मे संपर्क कराने की जो स्वीकारोक्ति की है उसकी जांच की जाये। डा स्वामी जो करते रहे हैं या कर रहे हैं उसमे उन्हें का .सुभाषिणी अली की हिदायत की आवश्यकता नहीं है वह तो उनके संघ से प्राप्त आदेशों का पालन करना था न कि कम्यूनिस्टों की संतुष्टि करना।

अब क्या करेंगे?:

डा सुब्रह्मण्यम स्वामी हर तरह की संदेहास्पद गतिविधियां जारी रख कर 'लोकतान्त्रिक ढांचे की जड़ों को हिलाते रहेंगे' और संघ सिद्धांतों की सिंचाई द्वारा उसे अधिनायकशाही  की ओर ले जाने का अनुपम प्रयास करेंगे।

07 नवंबर 1990 को वी पी सरकार के लोकसभा मे गिरते ही चंद्रशेखर ने तुरन्त आडवाणी को गले मिल कर बधाई दी थी और 10 नवंबर को खुद प्रधानमंत्री बन गए। चंद्रशेखर के प्रभाव से मुलायम सिंह यादव जो धर्म निरपेक्षता की लड़ाई के योद्धा बने हुये थे 06 दिसंबर 1990 को विश्व हिन्दू परिषद को सत्याग्रह केलिए बधाई और धन्यवाद देने लगे। राजीव गांधी को भी रिपोर्ट पेश करके मुलायम सिंह जी ने उत्तर-प्रदेश के वर्तमान दंगों से भाजपा,विहिप आदि को बरी कर दिया है।

आगरा मे बजरंग दल कार्यकर्ता से 15 लीटर पेट्रोल और 80 लीटर तेजाब बरामद होने ,संघ कार्यकर्ताओं के यहाँ बम फैक्टरी पकड़े जाने और पुनः शाहगंज पुलिस द्वारा भाजपा प्रतिनिधियों से आग्नेयास्त्र बरामद होनेपर भी सरकार दंगों के लिए भाजपा को उत्तरदाई नहीं ठहरा पा रही है। छावनी विधायक की पत्नी खुल्लम-खुल्ला बलिया का होने का दंभ भरते हुये कह रही हैं प्रधानमंत्री चंद्रशेखर उनके हैं और उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। चंद्रास्वामी भी विहिप की तर्ज पर ही मंदिर निर्माण की बात कह रहे हैं।

संघ की तानाशाही:

डा सुब्रह्मण्यम स्वामी,चंद्रास्वामी और चंद्रशेखर जिस दिशा मे योजनाबद्ध ढंग से आगे बढ़ रहे हैं वह निकट भविष्य मे भारत मे संघ की तानाशाही स्थापित किए जाने का संकेत देते हैं। 'संघ विरोधी शक्तियाँ' अभी तक कागजी पुलाव ही पका रही हैं। शायद तानाशाही आने के बाद उनमे चेतना जाग्रत हो तब तक तो डा स्वामी अपना गुल खिलाते ही रहेंगे।

------------------------------------------------*********-------------------------------------------------


यह लेख 1990 की परिस्थितियों मे लिखा गया था जिसे भयभीत प्रेस ने अपने समाचार पत्रों मे स्थान नहीं दिया था। 


 आज ब्लाग के माध्यम से इसे सार्वजनिक करने का उद्देश्य यह आगाह करना है कि 'संघ' अपनी योजना के अनुसार आज केवल एक दल भाजपा पर निर्भर नहीं है 30 वर्षों(पहली बार संघ समर्थन से इंदिरा जी की सरकार 1980 मे  बनने से)  मे उसने कांग्रेस मे भी अपनी लाबी सुदृढ़ कर ली है और दूसरे दलों मे भी । अभी -अभी अन्ना के माध्यम से एक रिहर्सल भी संसदीय लोकतन्त्र की चूलें हिलाने का सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया है।(हिंदुस्तान,लखनऊ ,25 सितंबर 2011 के पृष्ठ 13 पर प्रकाशित समाचार मे विशेज्ञ विद्व जनों द्वारा अन्ना के जन लोकपाल बिल को संविधान विरोधी बताया है। )   जिन्होने अन्ना के  राष्ट्रद्रोही आंदोलन की पोल खोली उन्हें गालियां दी गई  ब्लाग्स मे भी फेस बुक पर भी और विभिन्न मंचों से भी और जो उसके साथ रहे उन्हें सराहा गया है। यह स्थिति  देश की आजादी और इसके लोकतन्त्र के लिए खतरे की घंटी है। समस्त  भारत वासियों का कर्तव्य है कि विदेशी साजिश को समय रहते समझ कर परास्त करें अन्यथा अतीत की भांति उन्हें एक बार फिर रंजो-गम के साथ गाना पड़ेगा-'मरसिया है  एक का,नौहा  है सारी कौम का '।


Hindustan-Lucknow-25/09/2011