Sunday, December 7, 2014

जिन्ना की नहीं ब्रिटिश साम्राज्यवाद की चाल थी :सच्चाई से साक्षात्कार ----- विजय राजबली माथुर

हिंदुस्तान,लखनऊ के 19 दिसंबर 2011 के अंक मे प्रकाशित समपादकीय और इतिहासकार रामचन्द्र गुहा जी के लेख (जिनकी स्कैन कपियाँ नीचे दी हैं) सच्चाई को उजागर करती हैं।
(फोटो पर डबल क्लिक करके स्पष्ट पढ़ा जा सकता है)

19/12/2011,hindustan LUCKNOW

19/12/2011,hindustan LUCKNOW
मैंने अपने लेखों के माध्यम से पहले ही यह बताने का प्रयत्न किया था कि आर्य भारत के पश्चिम मे आर्यनगर-ऐरयान-ईरान होते हुये मध्य एशिया तथा यूरोप गए थे ,उधर से इधर नहीं आए थे जैसा कि मैक्समूलर ने गलत बताया है। इस तथ्य की पुष्टि नई वैज्ञानिक खोजों से भी हुई है जिंनका जिक्र इस समपादकीय मे किया गया है। 

उस समय जिसे 'त्रेता'युग कहा जाता है मे  भी रावण ने अपना आर्थिक साम्राज्य विस्तारित कर रखा था । वर्तमान यू एस ए का शासक तब एरावण और साईबेरिया का शासक कुंभकरण लंका के शासक रावण के सहयोगी थे। भारत के युवा राजकुमार राम जो मर्यादा पुरोशत्तम के रूप मे इतिहास प्रसिद्ध हैं ने अपनी 'कूटनीति' द्वारा अपनी पत्नी सीता को साम्राज्यवादी  लंका मे प्रविष्ट करवाकर और 'सीता की कूटनीति' का लाभ उठा कर अंतर-राष्ट्रीय 'साम्राज्यवाद' का विध्वंस किया था। दिये गए लिंक्स पर इस संबंध मे इसी ब्लाग मे अपने पूर्व प्रकाशित लेखों मे मैंने स्पष्ट किया था।

आज हमारे देश मे उल्टा हो रहा है। आज यू स ए का साम्राज्यवाद हमारे देश की 'अर्थ नीति' और 'राजनीति' दोनों को प्रभावित कर रहा है। और 'गर्व से ..... 'का नारा लगा कर उनही राम को पूजने वाले बड़े गर्व से साम्राज्यवादी अमेरिका की चालों को सफल बना रहे हैं। गुहा साहब का लेख जिन्ना के दो राष्ट्रों के सिद्धान्त की पोल खोल रहा है ,वस्तुतः यह जिन्ना की नहीं ब्रिटिश साम्राज्यवाद की चाल थी और उसी के तहत बाद मे गांधी जी की हत्या भी कारवाई गई थी। 

पूरे देश की जनता को क्या कहें जबकि हमारे ब्लाग जगत के विद्वान ही इन तथ्यात्मक बातों की परवाह नहीं करते। ये सब खाते-पीते समृद्ध लोग हैं। इन्टरनेट इनके मनोरंजन का साधन है और वे सुविधा के अनुसार भरपूर मौज -ब्लाग्स तथा फेसबुक के माध्यम से करते रहते हैं। फैशन के मुताबिक एक-दूसरे की प्रशंसा करके छुट्टी कर लेते हैं। देश-समाज के बारे मे वे क्यों सोचें?उन्हें क्या दिक्कत है?

एक लंबे अरसे से अमेरिकी साम्राज्यवाद ने 'अन्ना टीम' के माध्यम से हमारी संसद,संसदीय निकायों ,न्यायपालिका,कार्यपालिका सभी पर हमला बोल रखा है और यह हमला 2001 के शस्त्रों से हुये हमले से ज्यादा घातक  है। लेकिन अफसोस कि अनपढ़ जनता को तो छोड़ ही दीजिये पढे-लिखे इंटरनेटी विद्वान अन्ना के पीछे अंधों की तरह दौड़ लगा रहे हैं। जो व्यक्ति राष्ट्रध्वज तक का बेरहमी से अपमान कर रहा है उसका महिमा मंडन किया जाना इस बात का सुबूत है कि हमारा विद्वान आज मानसिक रूप से पूरा दिवालिया हो चुका है। ये लक्षण समाज और राष्ट्र के भविष्य के लिए सुखद नहीं हैं। 
************************************
उस समय भी समृद्ध लोग हज़ारे के पीछे भाग रहे थे और आज भी केजरीवाल को महान बता रहे हैं साथ ही साथ विलाप भी कर रहे हैं:
.......
मैं अपने ब्लाग्स के माध्यम से लगातार 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' का विरोध करता आ रहा हूँ । जितना मेरा विरोध पाखंडियों द्वारा किया जा रहा है उतना ही एथीस्टवादियों द्वारा भी और कोई भी सच्चाई से साक्षात्कार करने को तैयार नहीं है। पूर्व में 24 दिसंबर 2011 को प्रकाशित इस लेख द्वारा मैंने हज़ारे के विरुद्ध चेतावनी दी थी लेकिन केजरीवाल के मोहपाश में फंसे वामपंथियों तक ने उसका समर्थन किया था जिसका नतीजा है RSS नियंत्रित केंद्र सरकार। अब भी जो लोग केजरीवाल भक्ति में लगे हैं निश्चित जानिए वे RSS की अर्द्ध-सैनिक तानाशाही की नींव ही मजबूत कर रहे हैं।
 06 dec.2014 :

 ---विजय राजबली माथुर ---07-12-2014 
****************************************************************
Facebook Comment :
 

3 comments:

अमरनाथ 'मधुर' said...

अखबारी आलेख पढने में नहीं आ रहा है |

मनोज कुमार said...

आलेख पढ़ा ... विचारों में मतभेद तो रहते ही हैं।

अब आपही बताइए कि अन्ना के पीछे लोग न भागें तो क्या हजारों करोड़ का घोटाला कर चुके स्टैंडिंग कमेटी के नेताओं को समर्थन दिया जाए।

Vijai Mathur said...

मनोज जी,
मैंने लगातार अनेक लेखों मे सप्रमाण सिद्ध किया है कि अन्ना आंदोलन को अमेरिकी प्रशासन/अमेरिकी कॉर्पोरेट/भारतीय कॉर्पोरेट घरानों और मनमोहन गुट का ठोस समर्थन इसलिए है कि वे सब कॉर्पोरेट घरानों के शोषण और भ्रष्टाचार तथा आई.ए.एस. अफसरों के भ्रष्टाचार को छिपा कर राजनेताओं को बदनाम कर के भारत के संसदीय लोकतन्त्र को नष्ट कर के यहाँ हिटलर टाइप अर्धसैनिक तानाशाही स्थापित कर सकें।
गांठ के पूरे और अक्ल के अधूरे लोग तो अन्ना के पीछे भागेंगे ही किन्तु विद्वान लोग जब राष्ट्र ध्वज का अपमान करने वाले का समर्थन करते हैं तो राष्ट्र व समाज के लिए बेहद दुखद स्थिति होती है।