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Tuesday, October 18, 2022

जनाधार की राजनीति ------ नवेंदू कुमार

With_u_Navendu

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◆ देख लीजिये...जनाधार की राजनीति क्या होती है, इस वीडियो रिपोर्ट से आपको पता चल जायेगा। जनता का मेला था- और जैसे उमड़ पड़ा हो कोई जनसमुद्र!
● मुलायम कोई प्रधानमंत्री तो नहीं थे। न नेहरू थे। न गांधी थे। न शहीदे-आज़म भगत सिंह। ना ही भारत को "दूसरी आज़ादी" दिलाने वाले लोकनायक जयप्रकाश। तो फिर क्यों मुलायम के निधन पर दलीय दीवार टूटती दिखाई दी। क्यों लालू प्रसाद की पार्टी राजद के राष्ट्रीय अधिवेशन में सपा नेता "मुलायम अमर रहें" के नारे हज़ारों-हज़ार लोग लगा रहे। क्यों पीएम मोदी हों या लालू प्रसाद अपनी सभा में मुलायम की गौरवगाथा सुना कर अपना शोक जगजाहिर कर रहे थे? 
● मुलायम- लालू को समझियेगा तो समझ में आएगी लेफ्ट और आरएसएस के कैडर आधारित राजनीतिक दलों की संरचना और दर्शन से इतर भारत में "जनाधार की राजनीति" की ताकत और उसका दर्शन। समाजवाद की कसौटी पर इसे शुध्द समाजवादी राजनीति न भी मानें तो इतना मानना तो पड़ेगा कि सत्ता-समाज-राजनीति में "संख्या भारी तो उतनी हिस्सेदारी" और "सामाजिक न्याय के साथ विकास" की भूख ही इस जनाधार की राजनीति का मूल आधार है। 
● बहुसंख्यक जनता की यही भूख मुलायम और लालू जैसे नेता और लोहिया के बुनियादी राजनीति को जन्म देती है। ऐसी राजनीति जो कैडर आधारित राजनीति के मुक़ाबिल एक ताक़त दिखती है। इसे "पिछड़ा उभार" कह कर भले अलगा दें पर है ये जनता के वंचित पीड़ित ज़मात की राजनीति का विस्फोटक व्याकरण। यही वज़ह है कि राजनीतिक सक्रियता के मामले में शिथिल निस्तेज हो चुके मुलायम सिंह यादव के देहावसान पर शोक विलाप भी किसी विस्फोटक जन आंदोलन के नारे के बतौर सुनाई और दिखाई देता लगता है।
● "धार्मिक उन्माद" और "हिंदुत्वा राष्ट्रवादी ब्रांड" की सत्ता-राजनीति के इस दौर में किसी "सेकुलर छवि" वाले नेता की मृत्यु पर जनता का हाहाकार और जुटान, राजनीति की कई समझ और संकेत देता है। इस संकेत को समझे बिना सत्ता को भले हांक ले कोई पार्टी या संगठन, सर्व समाज और सर्वजन को नहीं हांक सकता कोई महाबली या राष्ट्रबली!!



  ~विजय राजबली माथुर ©

Saturday, May 5, 2012

जन्म कुंडली मे 'राज राजेश्वर योग' ने मार्क्स को 'बेताज बादशाह' बनाया

(05 मई ,1818 को जर्मन मे जन्मे कार्ल मार्क्स की कुंडली मे -कुम्भ लग्न का शनि 'राज राजेश्वर योग' बना रहा है)



(जन्म-05-05-1818 एवं मृत्यु-14-03-1818 )



जन्म कुंडलियों मे विभिन्न योगों को दर्शाने वाली एक पुस्तक से महर्षि कार्ल मार्क्स की यह जन्म कुंडली उपलब्ध हुई है। उक्त पुस्तक मे मात्र इतना ही बताया गया है कि,धनु,मीन,तुला,मेष,मकर या कुम्भ लग्न मे 'शनि'स्थित हो तो 'राज राजेश्वर योग'होता है। इस प्रकार का योग कार्ल मार्क्स की कुंडली मे 'कुम्भ लग्न'मे शनि की स्थिति से बन रहा है। इस पर मंगल की पूर्ण-आठवीं दृष्टि भी पड़ रही है।


उक्त पुस्तक मार्क्स के बारे मे इससे अधिक प्रकाश नहीं डालती है। स्व्भाविक रूप से आप यह प्रश्न उठा सकते हैं कि,मार्क्स को इस राजयोग से कौन सी गद्दी मिली?मार्क्स की कुंडली मे तीसरे भाव मे उच्च का सूर्य उन्हें पराक्रमी,भाग्यशाली व विद्वान बना रहा है।राहू भी वहीं बैठ कर उनमे साहस व पराक्रम का संचार कर रहा है किन्तु उनके कुटुम्ब सुख को नष्ट कर रहा है। वहीं बैठा चंद्र राहू के साथ ग्रहण योग बनाते हुये कुटुम्ब सुख से उन्हें वंचित रखने मे योगदान कर रहा है। चतुर्थ भाव मे बैठे बुध और शुक्र उन्हें  कूटनीतिज्ञता से पूरित कर रहे हैं तथा मित्रों से लाभ के अवसर उत्पन्न कर रहे हैं साथ ही नवम  भाव मे उपस्थित 'केतू' भी मित्र लाभ प्रदान कर रहा है । 'एंजेल्स' का सहयोग एवं साहचर्य सर्व विदित ही है। एकादश भाव मे बैठा स्व-ग्रही ब्रहस्पति उन्हें यशस्वी बना रहा है। षष्ठम भाव मे बैठा नीच का मंगल उन्हें रोगी बना रहा है।


कार्ल मार्क्स का जो जीवन वृतांत उपलब्ध है वह इन ग्रहों के फल को ही स्पष्ट करता है। 'राज राजेश्वर योग' एक राज योग है। भले ही किसी देश की शासन व्यवस्था का संचालन मार्क्स ने नहीं किया किन्तु उन्होने शासन व्यवस्था का जो नया 'दर्शन'(फिलासफ़ी) प्रस्तुत किया उसके अनुसार कई देशों का संचालन हुआ और आज भी हो रहा है। आज भी कार्ल मार्क्स विश्व की कोटि-कोटि जनता के 'बेताज बादशाह 'हैं और जनता के दिलों पर उनका राज चल रहा है ।जनता आज भी कार्ल मार्क्स द्वारा दिखाये गए मार्ग से अपने कल्याण की उम्मीद लगाए है। 




पिछले वर्ष मार्क्स जयंती पर आगरा के एक साप्ताहिक अखबार मे पूर्व प्रकाशित अपने लेख को दिया था आज फिर उसी को उद्धृत कर रहा हूँ। ऊपर जो मार्क्स का ज्योतिषीय विश्लेषण दिया है  उससे प्रस्तुत लेख के संदर्भ समझने मे सहूलियत होगी।







बृहस्पतिवार, 5 मई 2011



समाजवाद और महर्षि कार्लमार्क्स

05  मई जयन्ति के अवसर पर १९९० में सप्तदिवा,आगरा में पूर्व प्रकाशित आलेख 




जब-जब धरा विकल होती,मुसीबत का समय आता.
किसी न किसी रूप में कोई न कोई महामानव चला आता ..


ये पंक्तियाँ महर्षि कार्ल मार्क्स पर पूरी तरह खरी उतरती हैं.मार्क्स का आविर्भाव एक ऐसे समय में हुआ जब मानव द्वारा मानव का शोषण अपने निकृष्टतम रूप में भयावह रूप धारण कर चुका था.औद्योगिक क्रान्ति के बाद जहाँ समाज का धन-कुबेर वर्ग समृद्धि की बुलंदियां छूता चला जा रहा था वहीं दूसरी ओर मेहनत करके जीवन निर्वाह करने वाला गरीब मजदूर और फटे हाल होता जा रहा था,यह परिस्थिति यूरोप में तब आ चुकी थी और भारत तब तक सामन्तवाद में पूरी तरह जकड चुका था.हमारे देश में जमींदार भूमिहीन किसानों पर बर्बर अत्याचार कर रहे थे.
Man is the product of his Environment .
मार्क्स का पितृ देश जर्मन था,परन्तु उन्हें निर्वासित होकर इंग्लैण्ड में अपना जीवन यापन करना पड़ा.जर्मन के लोग सदा से ही चिंतन-मनन में  अन्य यूरोपीय समाजों से आगे रहे हैं और उन पर भारतीय चिंतन का विशेष प्रभाव पड़ा है.मैक्समूलर सा :तीस वर्ष भारत में रहे और संस्कृत का अध्ययन करके वेद,वेदान्त,उपनिषद और पुरानों की तमाम पांडुलिपियाँ तक प्राप्त करके जर्मन वापिस लौटे.मार्क्स जन्म से ही मेधावी रहे उन्होंने मैक्समूलर के अध्ययन का भरपूर लाभ उठाया और समाज व्यवस्था के लिए नए सिद्धांतों का सृजन किया.
मार्क्स का तप और त्याग 
हालांकि एक गरीब परिवार में जन्में और कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा,परन्तु मार्क्स ने हार नहीं मानी,उन्होंने अपने कठोर तपी जीवन से गहन अध्ययन किया.समाज के विकास क्रम को समझा और भावी समाज निर्माण के लिए अपने निष्कर्षों को निर्भीकता के साथ समाज के सम्मुख रखा.व्यक्तिगत जीवन में अपने से सात वर्ष बड़ी प्रेमिका से विवाह करने के लिए भी उन्हें सात वर्ष तप-पूर्ण प्रतीक्षा करनी पडी.उनकी प्रेमिका के पिता जो धनवान थे मार्क्स को बेहद चाहते थे और अध्ययन में आर्थिक सहायता भी देते थे पर शायद अपनी पुत्री का विवाह गरीब मार्क्स से न करना चाहते थे.लेकिन मार्क्स का प्रेम क्षण-भंगुर नहीं था उनकी प्रेमिका ने भी मार्क्स की तपस्या में सहयोग दिया और विवाह तभी किया जब मार्क्स ने चाहा.विवाह के बाद भी उन्होंने एक आदर्श पत्नी के रूप में सदैव मार्क्स को सहारा दिया.जिस प्रकार हमारे यहाँ महाराणा प्रताप को उनकी रानी ने कठोर संघर्षों में अपनी भूखी बच्चीकी परवाह न कर प्रताप को झुकने नहीं दिया ठीक उसी प्रकार मार्क्स को भी उनकी पत्नी ने कभी निराश नहीं होने दिया.सात संतानों में से चार को खोकर और शेष तीनों बच्चियों को भूख से बिलखते पा कर भी दोनों पति-पत्नी कभी विचलित नहीं हुए और आने वाली पीढ़ियों की तपस्या में लीं रहे.देश छोड़ने पर ही मार्क्स की मुसीबतें कम नहीं हो गईं थीं,इंग्लैण्ड में भी उन्हें भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता था.लाईब्रेरी में अध्ययनरत मार्क्स को समय समाप्त हो जाने पर जबरन बाहर निकाला जाता था.
बेजोड़ मित्र 
इंग्लैण्ड के एक कारखानेदार एन्जेल्स ने मार्क्स की उसी प्रकार सहायता की जैसी सुग्रीव ने राम को की थी.एन्जेल्स धन और प्रोत्साहन देकर सदैव मार्क्स के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर खड़े रहे.मार्क्स का दर्शन इन्हीं दोनों के त्याग का प्रतिफल है.विपन्नता और संकटों से झूजते मार्क्स को सदैव एन्जेल्स ने आगे बढ़ते रहने में सहायता की और जिस प्रकार सुग्रीव के सैन्य बल से राम ने साम्राज्यवादी रावण पर विजय प्राप्त की थी.ठीक उसी प्रकार मार्क्स ने एन्जेल्स के सहयोग बल से शोषणकारी -उत्पीडनकारी साम्राज्यवाद पर अपने अमर सिद्धांतों से विजय का मार्ग प्रशस्त किया.गरीब और बेसहारा लोगों के मसीहा के रूप में मार्क्स और एन्जेल्स तब तक याद किये जाते रहेंगें जब तक आकाश में सूरज-चाँद और तारे दैदीप्यमान रहेंगें.
भारतीय संस्कृति और मार्क्सवाद 
हमारे प्राच्य ऋषि-मुनियों नें 'वसुधैव कुटुम्बकम'का नारा दिया था,वे समस्त मानवता में समानता के पक्षधर थे और मनुष्य द्वारा मनुष्य के उत्पीडन और शोषण के विरुद्ध.यही सब कुछ मार्क्स ने अपने देश -काल की परिस्थितियों के अनुरूप नए निराले ढंग से कहा है.कुछ विद्वान मार्क्स के दर्शन को भारतीय वांग्मयके अनुरूप मानते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि,मार्क्सवाद भारतीय संस्कृति में ही सही ढंग से लागू हो सकता है.यूरोप में मार्क्स के दर्शन पर क्रांतियाँ हुईं और मजदूर वर्ग की राजसत्ता स्थापित हुयी और वहां शोषण को समाप्त करके एक संता पर आधारित समाज संरचना हुयी,परन्तु इस प्रक्रिया में यूरोपीय संस्कृति के अनुरूप मार्क्स के अनुयाई शासकों से कुछ ऐसी गलतियां हुईं जो मार्क्स और एन्जेल्स के दर्शन से मेल नहीं खातीं थीं.रूसी राष्ट्रपति मिखाईल गोर्बाचोव ने इस कमी को महसूस किया और सुधारवादी कार्यक्रम लागू कर दिया जिससे समाज मार्क्स-दर्शन का वास्तविक लाभ उठा सके.यूरोप के ही कुछ शासकों ने सामंती तरीके से इसका विरोध किया,परिणामस्वरूप उन्हें जनता के कोप का भाजन बनना पडा.आज विश्व के आधे क्षेत्रफल और एक तिहाई आबादी में मार्क्सवादी शासन सत्ता विद्यमान है जो सतत प्रयास द्वारा जड़ता को समाप्त कर यथार्थ मार्क्सवाद की ओर बढ़ रही है.                                                                                                                                          
स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि,नास्तिक वह नहीं है जिसका ईश्वर पर विशवास नहीं है,बल्कि' नास्तिक वह है जिसका अपने ऊपर विशवास नहीं है' मार्क्सवाद बेसहारा गरीब मेहनतकश वर्ग को अपने ऊपर विशवास करने की प्रेरणा देता है.विवेकानंद ने यह भी कहा था जब तक संसार में झौंपडी में निवास करने वाला हर आदमी सुखी नहीं होता यह संसार कभी सुखी नहीं होगा.मार्क्स ने जिस समाज-व्यवस्था का खाका प्रस्तुत किया उसमें सब व्यक्ति सामान होंगें और प्रत्येक व्यक्ति से उसकी क्षमता व योग्यतानुसार काम लिया जाएगा और प्रत्येक व्यक्ति को उसकी आवश्यकतानुसार दिया जाएगा जिससे उसका बेहतर जीवन निर्वाह हो सके.श्री कृष्ण ने भी गीता में यही बताया कि,मनुष्य को लोभवश परिग्रह नहीं करना चाहिए,अर्थात किसी मनुष्य को अपनी आवश्यकता से अधिक कुछ नहीं रखना चाहिए.यह आवश्यकता से अधिक रखने की लालसा अर्थात कृष्ण के बताये गए अपरिग्रह मार्ग का अनुसरण न करना ही शोषण है.और इसी शोषण को समाप्त करने का मार्ग मार्क्स ने आधुनिक काल में हमें दिखाया है.
भारत में गलत धारणा 
हमारे देश में साधन सम्पन्न शोषक वर्ग ने धर्म की आड़ में मार्क्सवाद के प्रति विकृत धारणा का पोषण कर रखा है जब कि यह लोग स्वंय ही 'धर्म से अनभिग्य 'हैं.प्रसिद्ध संविधान शास्त्री  और महात्मा गांधी के अनुयाई डा. सम्पूर्णानन्द ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा है :-सत्य,अहिंसा,अस्तेय,अपरिग्रहऔर ब्रह्मचर्य के समुच्य का नाम है-धर्म.अब देखिये यह सोचने की बात है कि,धर्म की दुहाई देने वाले इन पर कितना आचरण करते हैं.यदि समाज में शोषण विहीन व्यवस्था ही स्थापित हो जाए जैसा कि ,मार्क्स की परिकल्पना में-

सत्य-पूंजीपति शोषक वर्ग सत्य बोल और उस पर चल कर समृद्धत्तर नहीं हो सकता .

अहिंसा-मनसा-वाचा-कर्मणा अहिंसा का पालन करने वाला शोषण कर ही नहीं सकता.
अस्तेय-अस्तेय का पालन करके पूंजीपति वर्ग अपनी पूंजी नष्ट कर देगा.गरीब का हक चुराकर ही धनवान की पूंजी सृजित होती है.
अपरिग्रह-जिस पर वेदों से लेकर श्रीकृष्ण और स्वामी विवेकानन्द सभी मनीषियों ने ज्यादाजोर दिया यदि समाज में अपना लिया जाए तो कोई किसी का हक छीने ही नहीं और स्वतः समानता स्थापित हो जाए.
ब्रह्मचर्य-जिसकी जितनी उपेक्षा पूंजीपति वर्ग में होती है ,गरीब तबके में यह संभव ही नहीं है.अपहरण,बलात्कार और वेश्यालय पूंजीपति समाज की संतुष्टि का माध्यम हैं.

आखिर फिर क्यों धर्म का आडम्बर दिखा कर पूंजीपति वर्ग जनता को गुमराह करता है?ज़ाहिर है कि,ऐसा गरीब और शोषित वर्ग को दिग्भ्रमित करने के लिए किया जाता है,जिससे धर्म की आड़ में शोषण निर्बाध गति से चलता रहे.

कसूरवार मार्क्सवादी भी हैं
हमारे देश में धर्म का अनर्थ करके जहां पूंजीपति वर्ग शोषण को मजबूत कर लेता है;वहीं साम्राज्यवादी  उसे इसके लिए प्रोत्साहित करते हैं जबकि मार्क्स के अनुयायी  अंधविश्वास में जकड कर और शब्द जाल में फंस कर भारतीय जनता को भारतीय संस्कृति और धर्म से परिचित नहीं कराते.ऐसा करना वे मार्क्सवाद के सिद्धांतों के विपरीत समझते हैं.और यही कारण है अपनी तमाम लगन और निष्ठा के बावजूद भारत में मार्क्सवाद को  विदेशी विचार-धारा समझा जाता है और यही दुष्प्रचार  करके साम्राज्यवादी-साम्प्रदायिक शक्तियां विभिन्न धर्मों के झण्डे उठा कर जनता को उलटे उस्तरे से मूढ़ती  चली जा रहीं हैं.इस परिस्थिति के लिए १९२५ से आज तक का हमारा मार्क्सवादी आन्दोलन स्वंय जिम्मेदार है.
अब समय आ गया है 
जब हम प्रति वर्ष २२अप्रैल से ०५ मई तक मार्क्सवाद-लेनिनवाद के सिद्धांतों को भारतीय संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में 'चेतना पक्ष' के रूप में मनाएं और स्वंय मार्क्स के अनुयाई भी भारतीय वांग्मय के अनुकूल भाषा-शैली अपना कर राष्ट्र को प्राचीन 'वसुधैव कुटुम्बकम'की भावना फैलाने के लिए महर्षि कार्ल मार्क्स की चेतना से अवगत कराएं,अन्यथा फिर वही 'ढ़ाक के तीन पात'.

Monday, January 23, 2012

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ------ विजय राजबली माथुर








भारतीय स्वाधीनता आंदोलन मे नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम अमर है। उन्होने आजादी दिलाने मे महत्वपूर्ण भूमिका कैसे निभाई देखें इस लिंक मे-


ऊपर के वीडियो मे आपने नेताजी के उद्गार सुने ,नीचे देखिये कुछ और जरूरी बातें-







(चित्र साभार के के यादव जी )

नेता जी ने सर्वप्रथम 1943 मे तिरंगा पोर्ट ब्लेयर मे फहराया था उसी की स्मृति मे भारत सरकार ने यह डाक टिकट जारी किया था।


नेताजी की अपील -

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस से अलग होकर 'अग्रगामी दल' अर्थात 'फारवर्ड ब्लाक' बनाते समय भारत मे आजादी के बाद 'समाजवादी व्यवस्था' स्थापित करने की कल्पना की थी। वह रूसी साम्यवादी क्रान्ति से बहुत प्रभावित थे। उनके सपनों का भारत अभी तक नहीं बन पाया है। नेताजी द्वारा स्थापित फारवर्ड ब्लाक उत्तर प्रदेश विधान सभा के इन चुनावों मे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के साथ बाम मोर्चा मे शामिल है। आज नेताजी के जन्म दिवस पर हम सब को यह संकल्प लेना चाहिए कि अपने अमूल्य वोट द्वारा हम बाम पंथ को मजबूत करेंगे जो नेताजी को सच्ची श्रधानजलि भी  होगी।

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23-01-2017 

Thursday, May 5, 2011

समाजवाद और महर्षि कार्लमार्क्स ------ विजय राजबली माथुर

05  मई जयन्ति के अवसर पर १९९० में सप्तदिवा,आगरा में पूर्व प्रकाशित आलेख 




जब-जब धरा विकल होती,मुसीबत का समय आता.
किसी न किसी रूप में कोई न कोई महामानव चला आता ..


ये पंक्तियाँ महर्षि कार्ल मार्क्स पर पूरी तरह खरी उतरती हैं.मार्क्स का आविर्भाव एक ऐसे समय में हुआ जब मानव द्वारा मानव का शोषण अपने निकृष्टतम रूप में भयावह रूप धारण कर चुका था.औद्योगिक क्रान्ति के बाद जहाँ समाज का धन-कुबेर वर्ग समृद्धि की बुलंदियां छूता चला जा रहा था वहीं दूसरी ओर मेहनत करके जीवन निर्वाह करने वाला गरीब मजदूर और फटे हाल होता जा रहा था,यह परिस्थिति यूरोप में तब आ चुकी थी और भारत तब तक सामन्तवाद में पूरी तरह जकड चुका था.हमारे देश में जमींदार भूमिहीन किसानों पर बर्बर अत्याचार कर रहे थे.
Man is the product of his Environment .
मार्क्स का पितृ देश जर्मन था,परन्तु उन्हें निर्वासित होकर इंग्लैण्ड में अपना जीवन यापन करना पड़ा.जर्मन के लोग सदा से ही चिंतन-मनन में  अन्य यूरोपीय समाजों से आगे रहे हैं और उन पर भारतीय चिंतन का विशेष प्रभाव पड़ा है.मैक्समूलर सा :तीस वर्ष भारत में रहे और संस्कृत का अध्ययन करके वेद,वेदान्त,उपनिषद और पुरानों की तमाम पांडुलिपियाँ तक प्राप्त करके जर्मन वापिस लौटे.मार्क्स जन्म से ही मेधावी रहे उन्होंने मैक्समूलर के अध्ययन का भरपूर लाभ उठाया और समाज व्यवस्था के लिए नए सिद्धांतों का सृजन किया.
मार्क्स का तप और त्याग 
हालांकि एक गरीब परिवार में जन्में और कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा,परन्तु मार्क्स ने हार नहीं मानी,उन्होंने अपने कठोर तपी जीवन से गहन अध्ययन किया.समाज के विकास क्रम को समझा और भावी समाज निर्माण के लिए अपने निष्कर्षों को निर्भीकता के साथ समाज के सम्मुख रखा.व्यक्तिगत जीवन में अपने से सात वर्ष बड़ी प्रेमिका से विवाह करने के लिए भी उन्हें सात वर्ष तप-पूर्ण प्रतीक्षा करनी पडी.उनकी प्रेमिका के पिता जो धनवान थे मार्क्स को बेहद चाहते थे और अध्ययन में आर्थिक सहायता भी देते थे पर शायद अपनी पुत्री का विवाह गरीब मार्क्स से न करना चाहते थे.लेकिन मार्क्स का प्रेम क्षण-भंगुर नहीं था उनकी प्रेमिका ने भी मार्क्स की तपस्या में सहयोग दिया और विवाह तभी किया जब मार्क्स ने चाहा.विवाह के बाद भी उन्होंने एक आदर्श पत्नी के रूप में सदैव मार्क्स को सहारा दिया.जिस प्रकार हमारे यहाँ महाराणा प्रताप को उनकी रानी ने कठोर संघर्षों में अपनी भूखी बच्चीकी परवाह न कर प्रताप को झुकने नहीं दिया ठीक उसी प्रकार मार्क्स को भी उनकी पत्नी ने कभी निराश नहीं होने दिया.सात संतानों में से चार को खोकर और शेष तीनों बच्चियों को भूख से बिलखते पा कर भी दोनों पति-पत्नी कभी विचलित नहीं हुए और आने वाली पीढ़ियों की तपस्या में लीं रहे.देश छोड़ने पर ही मार्क्स की मुसीबतें कम नहीं हो गईं थीं,इंग्लैण्ड में भी उन्हें भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता था.लाईब्रेरी में अध्ययनरत मार्क्स को समय समाप्त हो जाने पर जबरन बाहर निकाला जाता था.
बेजोड़ मित्र 
इंग्लैण्ड के एक कारखानेदार एन्जेल्स ने मार्क्स की उसी प्रकार सहायता की जैसी सुग्रीव ने राम को की थी.एन्जेल्स धन और प्रोत्साहन देकर सदैव मार्क्स के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर खड़े रहे.मार्क्स का दर्शन इन्हीं दोनों के त्याग का प्रतिफल है.विपन्नता और संकटों से झूजते मार्क्स को सदैव एन्जेल्स ने आगे बढ़ते रहने में सहायता की और जिस प्रकार सुग्रीव के सैन्य बल से राम ने साम्राज्यवादी रावण पर विजय प्राप्त की थी.ठीक उसी प्रकार मार्क्स ने एन्जेल्स के सहयोग बल से शोषणकारी -उत्पीडनकारी साम्राज्यवाद पर अपने अमर सिद्धांतों से विजय का मार्ग प्रशस्त किया.गरीब और बेसहारा लोगों के मसीहा के रूप में मार्क्स और एन्जेल्स तब तक याद किये जाते रहेंगें जब तक आकाश में सूरज-चाँद और तारे दैदीप्यमान रहेंगें.
भारतीय संस्कृति और मार्क्सवाद 
हमारे प्राच्य ऋषि-मुनियों नें 'वसुधैव कुटुम्बकम'का नारा दिया था,वे समस्त मानवता में समानता के पक्षधर थे और मनुष्य द्वारा मनुष्य के उत्पीडन और शोषण के विरुद्ध.यही सब कुछ मार्क्स ने अपने देश -काल की परिस्थितियों के अनुरूप नए निराले ढंग से कहा है.कुछ विद्वान मार्क्स के दर्शन को भारतीय वांग्मयके अनुरूप मानते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि,मार्क्सवाद भारतीय संस्कृति में ही सही ढंग से लागू हो सकता है.यूरोप में मार्क्स के दर्शन पर क्रांतियाँ हुईं और मजदूर वर्ग की राजसत्ता स्थापित हुयी और वहां शोषण को समाप्त करके एक संता पर आधारित समाज संरचना हुयी,परन्तु इस प्रक्रिया में यूरोपीय संस्कृति के अनुरूप मार्क्स के अनुयाई शासकों से कुछ ऐसी गलतियां हुईं जो मार्क्स और एन्जेल्स के दर्शन से मेल नहीं खातीं थीं.रूसी राष्ट्रपति मिखाईल गोर्बाचोव ने इस कमी को महसूस किया और सुधारवादी कार्यक्रम लागू कर दिया जिससे समाज मार्क्स-दर्शन का वास्तविक लाभ उठा सके.यूरोप के ही कुछ शासकों ने सामंती तरीके से इसका विरोध किया,परिणामस्वरूप उन्हें जनता के कोप का भाजन बनना पडा.आज विश्व के आधे क्षेत्रफल और एक तिहाई आबादी में मार्क्सवादी शासन सत्ता विद्यमान है जो सतत प्रयास द्वारा जड़ता को समाप्त कर यथार्थ मार्क्सवाद की ओर बढ़ रही है.                                                                                                                                          
स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि,नास्तिक वह नहीं है जिसका ईश्वर पर विशवास नहीं है,बल्कि' नास्तिक वह है जिसका अपने ऊपर विशवास नहीं है' मार्क्सवाद बेसहारा गरीब मेहनतकश वर्ग को अपने ऊपर विशवास करने की प्रेरणा देता है.विवेकानंद ने यह भी कहा था जब तक संसार में झौंपडी में निवास करने वाला हर आदमी सुखी नहीं होता यह संसार कभी सुखी नहीं होगा.मार्क्स ने जिस समाज-व्यवस्था का खाका प्रस्तुत किया उसमें सब व्यक्ति सामान होंगें और प्रत्येक व्यक्ति से उसकी क्षमता व योग्यतानुसार काम लिया जाएगा और प्रत्येक व्यक्ति को उसकी आवश्यकतानुसार दिया जाएगा जिससे उसका बेहतर जीवन निर्वाह हो सके.श्री कृष्ण ने भी गीता में यही बताया कि,मनुष्य को लोभवश परिग्रह नहीं करना चाहिए,अर्थात किसी मनुष्य को अपनी आवश्यकता से अधिक कुछ नहीं रखना चाहिए.यह आवश्यकता से अधिक रखने की लालसा अर्थात कृष्ण के बताये गए अपरिग्रह मार्ग का अनुसरण न करना ही शोषण है.और इसी शोषण को समाप्त करने का मार्ग मार्क्स ने आधुनिक काल में हमें दिखाया है.
भारत में गलत धारणा 
हमारे देश में साधन सम्पन्न शोषक वर्ग ने धर्म की आड़ में मार्क्सवाद के प्रति विकृत धारणा का पोषण कर रखा है जब कि यह लोग स्वंय ही 'धर्म से अनभिग्य 'हैं.प्रसिद्ध संविधान शास्त्री  और महात्मा गांधी के अनुयाई डा. सम्पूर्णानन्द ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा है :-सत्य,अहिंसा,अस्तेय,अपरिग्रहऔर ब्रह्मचर्य के समुच्य का नाम है-धर्म.अब देखिये यह सोचने की बात है कि,धर्म की दुहाई देने वाले इन पर कितना आचरण करते हैं.यदि समाज में शोषण विहीन व्यवस्था ही स्थापित हो जाए जैसा कि ,मार्क्स की परिकल्पना में-

सत्य-पूंजीपति शोषक वर्ग सत्य बोल और उस पर चल कर समृद्धत्तर नहीं हो सकता .
अहिंसा-मनसा-वाचा-कर्मणा अहिंसा का पालन करने वाला शोषण कर ही नहीं सकता.
अस्तेय-अस्तेय का पालन करके पूंजीपति वर्ग अपनी पूंजी नष्ट कर देगा.गरीब का हक चुराकर ही धनवान की पूंजी सृजित होती है.
अपरिग्रह-जिस पर वेदों से लेकर श्रीकृष्ण और स्वामी विवेकानन्द सभी मनीषियों ने ज्यादाजोर दिया यदि समाज में अपना लिया जाए तो कोई किसी का हक छीने ही नहीं और स्वतः समानता स्थापित हो जाए.
ब्रह्मचर्य-जिसकी जितनी उपेक्षा पूंजीपति वर्ग में होती है ,गरीब तबके में यह संभव ही नहीं है.अपहरण,बलात्कार और वेश्यालय पूंजीपति समाज की संतुष्टि का माध्यम हैं.

आखिर फिर क्यों धर्म का आडम्बर दिखा कर पूंजीपति वर्ग जनता को गुमराह करता है?ज़ाहिर है कि,ऐसा गरीब और शोषित वर्ग को दिग्भ्रमित करने के लिए किया जाता है,जिससे धर्म की आड़ में शोषण निर्बाध गति से चलता रहे.
कसूरवार मार्क्सवादी भी हैं
हमारे देश में धर्म का अनर्थ करके जहां पूंजीपति वर्ग शोषण को मजबूत कर लेता है;वहीं साम्राज्यवादी  उसे इसके लिए प्रोत्साहित करते हैं जबकि मार्क्स के अनुयायी  अंधविश्वास में जकड कर और शब्द जाल में फंस कर भारतीय जनता को भारतीय संस्कृति और धर्म से परिचित नहीं कराते.ऐसा करना वे मार्क्सवाद के सिद्धांतों के विपरीत समझते हैं.और यही कारण है अपनी तमाम लगन और निष्ठा के बावजूद भारत में मार्क्सवाद को  विदेशी विचार-धारा समझा जाता है और यही दुष्प्रचार  करके साम्राज्यवादी-साम्प्रदायिक शक्तियां विभिन्न धर्मों के झण्डे उठा कर जनता को उलटे उस्तरे से मूढ़ती  चली जा रहीं हैं.इस परिस्थिति के लिए १९२५ से आज तक का हमारा मार्क्सवादी आन्दोलन स्वंय जिम्मेदार है.
अब समय आ गया है 
जब हम प्रति वर्ष २२अप्रैल से ०५ मई तक मार्क्सवाद-लेनिनवाद के सिद्धांतों को भारतीय संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में 'चेतना पक्ष' के रूप में मनाएं और स्वंय मार्क्स के अनुयाई भी भारतीय वांग्मय के अनुकूल भाषा-शैली अपना कर राष्ट्र को प्राचीन 'वसुधैव कुटुम्बकम'की भावना फैलाने के लिए महर्षि कार्ल मार्क्स की चेतना से अवगत कराएं,अन्यथा फिर वही 'ढ़ाक के तीन पात'.
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फेसबुक पर प्राप्त कमेंट्स :
05-05-2016 
05-05-2016 

05-05-2016 
06-05-2016 

Thursday, October 21, 2010

"भ्रष्टाचार " ------ विजय राजबली माथुर

*इस प्रकार की परस्पर प्रतिद्वंदिता ने सम्प्रदायवाद ,जातिवाद और धार्मिक वितंडावाद  को जन्म दिया अतः ये सब भ्रष्टाचार की ही परिधि में आते हैं .हमने देखा कि समाज में धनवान बनने की होड़ आर्थिक ,राजनीतिक ,साम्प्रदायिक ,जातीय ,भाषाई -भ्रष्टाचार और भड़कते विग्रह की जड़ है .

*जब तक मंदिर में चढावा और मज़ार पर चादर चढाने की प्रवृत्तियाँ रहेंगी तब तक हर लेन -देन में काम के बदले धन देने को गलत सिद्ध करना मुश्किल रहेगा


[विशेष:यह आलेख 16 नवम्बर 1987   को पाक्षिक समाचारपत्र 'फीरोजाबाद केसरी' में प्रकाशित हो चुका है.]
गौतम बुद्ध ने कहा था -दुःख है ,दुःख का कारण है ,दुःख दूर हो सकता है ,दुःख दूर करने का उपाय है .आज हम निसंकोच कह सकते हैं भ्रष्टाचार है ,भ्रष्टाचार का कारण है ,भ्रष्टाचार दूर हो सकता है ,भ्रष्टाचार दूर करने का उपाय है .तो आईये पहले जानें भ्रष्टाचार है क्या बला .भ्रष्टाचार =भ्रष्ट +आचार .अर्थात गलत आचरण चाहे वह आर्थिक ,राजनीतिक क्षेत्र में हो या सामाजिक ,पारिवारिक क्षेत्र में चाहे वह धन से सम्बंधित हो चाहे मन से -भ्रष्टाचार है .आज भ्रष्टाचार सार्वभौम सत्य के रूप में अपनी बुलंदगी पर है ,बगैर धन दिए आप आज किसी से काम नहीं करा सकते .पहले भ्रष्टाचार नीचे बहता था तो ऊपर बैठे लोगों का डर भी था पर अब तो भ्रष्टाचार सिर पर चढ़ा है -यथा राजा तथा प्रजा .ईमानदारी आज सबसे बड़ा अपराध है और वह दण्डित हुए बगैर रह नहीं सकती .तो साहब भ्रष्टाचार तो है ---सर्वव्यापी उसका कारण क्या है ? यह भी जान लिया जाये .
              समयांतर के साथ आज हमारा समाज एक कलयुग अर्थात कळ (मेकेनिकल )+युग (एरा ) में चल रहा है . आज हर कार्य तीव्र गति से और अल्प -श्रम द्वारा किया जा सकता है .जब थोड़े श्रम से अत्यधिक उत्पादन होगा और उत्पादित माल के निष्पादन अर्थात बिक्री की समस्या होगी तो उत्पादक तरह -२ के प्रलोभन कमीशन डिस्काउंट  ,रिबेट -रिश्वत आदि का प्रयोग करता है .यह प्रयोग ही भ्रष्टाचार है .आज हर कार्य धन से संपन्न होता है और धनार्जन चाहे जिस स्त्रोत से हो इसकी बाबत ध्यान दिए बगैर ही आपको सम्मान आपके द्वारा अर्जित धन के अनुपात में ही आपको प्राप्त होगा . ऐसी स्थिति धन -संग्रह की प्रवृति को जन्म देती है और धन प्राप्ति के लिए नाना -विधियाँ विकसित होती जाती हैं .शीघ्रतिशीघ्र  धनवान बनने की लालसा में ही दहेज़ प्रणाली विकसित की गई क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है ? फिर दहेज़ के लिए वधु का दाह भीषण भ्रष्टाचार क्यों नहीं है ? आप एक डा . एक वकील या एक व्यापारी हैं ,आपको अपनी दुकान चलने के लिए ग्राहकों की आवश्यकता है आपने अपनी मेकेनिकल (कलयुगी )बुद्धी से अपनी जाति ,धर्म अथवा सम्प्रदाय के उत्थान का बीड़ा उठा लिया और आप उस सम्बंधित वर्ग के ग्राहकों के बलबूते अपने क्षेत्र में सफल हो गए .इस प्रकार की परस्पर प्रतिद्वंदिता ने सम्प्रदायवाद ,जातिवाद और धार्मिक वितंडावाद  को जन्म दिया अतः ये सब भ्रष्टाचार की ही परिधि में आते हैं .हमने देखा कि समाज में धनवान बनने की होड़ आर्थिक ,राजनीतिक ,साम्प्रदायिक ,जातीय ,भाषाई -भ्रष्टाचार और भड़कते विग्रह की जड़ है .

इससे नतीजा निकलता है कि जब तक समाज में धन का महत्त्व इसी प्रकार बना रहेगा तब तक भ्रष्टाचार भी बना रहेगा .धन के महत्त्व पर आधारित अर्थव्यवस्था और तदनुरूप राजनीतिक प्रणाली को बदले बगैर भ्रष्टाचार का खात्मा नहीं हो सकता .
जब तक मंदिर में चढावा और मज़ार पर चादर चढाने की प्रवृत्तियाँ रहेंगी तब तक हर लेन -देन में काम के बदले धन देने को गलत सिद्ध करना मुश्किल रहेगा क्योंकि जब विधाता ही बगैर किसी आश्वासन के कुछ करने को तैयार
नहीं तब मनुष्य तो मन का कलुष है ही .
जब भ्रष्टाचार दूर किया जा सकता है तो उसका उपाय भी मौजूद है ---धन आधारित समाज अर्थात पूंजीवाद का विनाश .पूंजीवाद को समाप्त कर जब श्रम के महत्त्व पर आधारित समाज व्यवस्था को स्थापित कर दिया जायेगा तो भ्रष्टाचार स्वतः ही समाप्त हो जायेगा .परन्तु समाजवाद पर आधारित व्यवस्था कौन स्थापित करेगा ,कैसे करेगा जब सभी राजनीतिक दल तो समाजवाद को अपना अभीष्ट लक्ष्य घोषित करते हैं .आज क्या इंदिरा (राजीव ) कांग्रेस क्या भा .ज .पा. और जन -मोर्चा सभी तो समाजवाद के अलमबरदार हैं फिर क्यों नहीं आया समजवादी समाज आजादी के चालीस वर्षों बाद भी .निश्चय ही प्रयास नहीं किया गया ,नहीं किया जा रहा और न ही किया जायेगा .कौन है जो प्राप्त सुविधा को स्वेच्छा  से छोड़  देगा ,इसलिए जनता को गुमराह करने के लिए समाजवाद  का नाम लेकर दरअसल पूंजीवाद को ही सबल किया गया है .तभी पनडुब्बी ,तोप आदि के भ्रष्टाचार चल सके हैं और कामयाब हो रहे हैं .
        यदि हम मनसा -वाचा -कर्मणा भ्रष्टाचार दूर करना चाहते हैं .तो हमें मन ,वचन और कर्म से ही उन समाजवादियों का साथ देना होगा जिन्होंने इस धरती के आधे भाग पर और आबादी के एक तिहाई भाग पर वास्तविक समाजवादी समाज की स्थापना की है .



 ( इस  ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)