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अकबर इलाहाबादी का कथन है ------
" न खींचो तीर कमानों को , न तलवार निकालो ।
जब तोप मुकाबिल हो , तो अखबार निकालो।। "
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भी कहा है कि, जो शक्ति साहित्य में छिपी रहती है वह तोप, तलवार और बम के गोलों में भी नहीं पाई जाती।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अखबार साहित्य का भी प्रतिविम्ब होते थे। साहित्य समाज का भी दर्पण होता है।
आज क्या अखबार क्या दृश्य चेनल्स सभी शोषकों - उत्पीड़कों का गुण - गान करने में व्यस्त हैं तब दीपक शर्मा , पल्लवी राय और मनोरमा सिंह सरीखे पत्रकार निर्भीकता - पूर्वक समाज और साहित्य का दर्पण बन कर जनता को जागरूक और देश को गौरान्वित कर रहे हैं , हम उनके साहस और निर्भीकता की सराहना करते और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए मंगलकामनाए करते हैं।
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~विजय राजबली माथुर ©

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