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Tuesday, March 19, 2019

उग्र राष्ट्रवादी ताकतों के मुस्लिम विरोधी अभियान की उपज : न्यूजीलैंड हादसा ------





वर्चस्व का औजार बना इस्लामोफोबिया : शिवप्रसाद जोशी

क्राइस्टचर्च का हमलावर वही बोल रहा है जो यूरोप में पिछले कुछ सालों में उभरे राष्ट्रवादी कह रहे हैं और अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप दोहरा रहे हैं। 

न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च में पिछले दिनों हुए आतंकी हमले से जाहिर है कि यूरोप-अमेरिका में उभरे धुर दक्षिणपंथ का संक्रमण अब ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड तक हो चुका है। क्राइस्टचर्च की दो मस्जिदों पर हमला करने वाला मुख्य हमलावर 28 वर्षीय ब्रैंटन टैरेंट इस्लामोफोबिया का शिकार है और विशुद्ध श्वेतवाद को पु्नर्स्थापित करना चाहता है। उसका रास्ता भले ही आतंक का हो, पर वह वही सब बोल रहा है जो पिछले यूरोप में कुछ सालों में उभरे राष्ट्रवादी कह रहे हैं और अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप दोहरा रहे हैं। यह अकारण नहीं है कि टैरेंट अपना आदर्श ट्रंप को ही मानता है। ब्रैंटन टैरेंट जैसे युवा पश्चिम के नव वर्चस्ववादी अभियान की उपज हैं। आज तेल और खनिज को हड़पने वाली, वर्चस्व के उन्माद में धंसी इस्लामोफोबिक सोच ने पश्चिम एशिया और अफ्रीकी भूभाग को धूल, खून और चीखों से सना एक बवंडर बना छोड़ा है। दुनिया के परम प्रतापी देशों अमेरिका और रूस के अलावा आज के और भविष्य के अभियानों में फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देश भी शामिल हैं। हथियार लॉबियां अपने-अपने उत्पादन क्षेत्रों में मुस्तैदी से मुस्करा रही हैं। 
• भय का माहौल :
इस्लाम के डर को इतिहास के मलबों से ढूंढकर प्रचारित किया जा रहा है। लगातार बमबारी के शिकार सीरिया के आम जन धूल और बमों की आवाजों की तरह जहां-तहां बिखरे हुए हैं। जान बचाकर कुछ लोग भूमध्यसागर पार यूरोपीय देशों में अनिश्चित भविष्य और धुर राष्ट्रवादी खतरों के बीच शरणार्थी के रूप में झूल रहे हैं। शरणार्थियों के खिलाफ इन देशों में एक भयानक माहौल बन चुका है। नव-दक्षिणपंथी ताकतें सरसराने लगी हैं और उन्होंने आने वाले खतरों और दबावों के बारे में जनता को भ्रमित करना शुरू कर दिया है। जर्मनी, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, स्वीडन, इटली और यूरोप में हर जगह नव-फासीवादी धुआं फैल चुका है। सर्बिया से होते हुए जमीन के रास्ते हंगरी में दाखिल शरणार्थियों की शामत है। उनके खिलाफ तो बाकायदा एक तरह का जनमत बनाया गया है। हंगरी के संसदीय चुनावों में कट्टरपंथी नेता विक्टर ऑर्बन की जीत हुई है जो शरणार्थियों के खिलाफ रहे हैं। हालांकि यह भी सही है कि उनकी जीत से जनता का एक बड़ा हिस्सा खफा ही है, लेकिन ऑर्बन के रूप में जो एक लक्षण वहां पनप रहा है, उससे मुकाबले की चुनौती कड़ी है। 

पिछले दिनों जर्मनी में नई गठबंधन सरकार बनी तो उसके गृह मंत्री होर्स्ट सीहोफेर के बयानों में मुसलमानों के प्रति कड़वाहट ही नजर आई। उनका कहना है कि इस्लाम का जर्मनी से कोई ताल्लुक नहीं है। उन्होंने तो और आगे बढ़कर मुस्लिम देशों से आए शरणार्थियों को वापस भेजने की प्रक्रिया शुरू करने की बात तक कह दी। मर्केल जैसी उदारवादी और समतावादी नेता की सरकार का एक सीनियर मंत्री जब ऐसा बयान दे तो समझा जा सकता है कि एकीकृत यूरोप (यूरोपीय संघ) में राजनीतिक-सांस्कृतिक रूप से इस सबसे ताकतवर और प्रभावशाली देश में दक्षिणपंथ, नव-फासीवाद और धुर राष्ट्रवादियों की कितनी तीव्रता से ‘घर वापसी’ हो रही है। इन विचारों के विरोधी नेताओं को लगने लगा है कि इन पार्टियों की सफलता का रहस्य इनके पक्ष में बनाया जा रहा शरणार्थी विरोधी जनादेश है, और इस कथित जनादेश की अवज्ञा करना उनके अपने राजनीतिक भविष्य के लिए ठीक नहीं होगा। 

उधर चांसलर मर्केल ने सफाई दी कि ‘यूं तो हमारी विरासत ऐतिहासिक रूप से ईसाइयत वाली है लेकिन जर्मन मूल्यों और जर्मन वैधानिक ढांचे के मद्देनजर इस्लाम भी जर्मनी का हिस्सा है।’ जर्मनी में धुर दक्षिणपंथ का उभार पिछले करीब डेढ़ दशकों में हो चला था लेकिन उसकी उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष संरचना पर पहली बड़ी चोट पिछले साल ही पड़ी जब धुर दक्षिणपंथियों की पार्टी आल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (एएफडी), जर्मन संसद (बुंडेश्टाग) में दूसरे नंबर पर आ गई और इसी के चलते मर्केल अपने बूते सरकार नहीं बना पाईं। 

लंबी माथापच्ची और कड़े अवरोधों के बाद उनकी पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन और सोशल डेमोक्रेट्स का चिर-परिचित महागठबंधन फिर से अस्तित्व में आ गया लेकिन इससे कोई इनकार नहीं करेगा कि अंदर ही अंदर इसमें कुछ खालीपन और डर भी दिख रहा है और गठबंधन का मनोबल काफी गिरा हुआ लगता है। उधर इटली के चुनावों में एकीकृत यूरोप विरोधी दक्षिणपंथी दल ‘फाइव स्टार मूवमेंट (एम5एस) सबसे बड़ा राजनीतिक दल बनकर उभरा है। फ्रांस में धुर राष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी शक्तियां पहले से सक्रिय हैं और आतंकी हमलों के बाद से वह यूरोप में इस्लामोफोबिया का बड़ा केंद्र बन चुका है। ब्रिटेन तो यूरोप से खुद को अलग कर ही चुका है। अन्य समुदायों और शरणार्थियों के इंटीग्रेशन को लेकर सत्तारूढ़ कंजरवेटिव दल का नजरिया किसी से छिपा नहीं है। • नया विकल्प चाहिए :
दुर्भाग्य से वैश्विक इस्लामोफोबिया भारत में भी पैर पसार रहा है। दक्षिणपंथी-फासिस्ट ताकतें लगातार अल्पसंख्यकों के खिलाफ दुष्प्रचार में लगी हैं और समाज में भय का माहौल बना दिया गया है। आश्चर्य यह है कि अपने को प्रगतिशील-धर्मनिरपेक्ष कहने वाली पार्टियां भी उनका साथ छोड़ रही हैं। पिछले दिनों कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा कि बीजेपी ने यह भ्रम फैलाकर कि कांग्रेस मुस्लिम पार्टी है, बहुत नुकसान पहुंचाया। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी भी अपनी इस ‘पहचान’ से खासी परेशान रही हैं और अपनी लालसाओं के लिए इससे तौबा कर बैठी हैं। कौन कितना मुसलमान विरोधी हो सकता है, यह दिखाने की बेताबी है। सच कहा जाए तो मानवीय करुणा, गरिमा और आत्मसम्मान की लड़ाई को पीछे धकेलने की कोशिशों में सबके हाथ रंगे हैं। अल्पसंख्यक एक के बाद एक राजनीतिक दलों से झटका खा रहे हैं। ऐसे में एक नई वैकल्पिक राजनीतिक ताकत की जरूरत है जो मनुष्यता पर मंडरा रहे खतरे से निपटने के लिए प्रतिबद्ध हो।

न्यूजीलैंड का हादसा दुनिया भर में उग्र राष्ट्रवादी ताकतों के मुस्लिम विरोधी अभियान की ही उपज है। 

http://epaper.navbharattimes.com/details/23466-76779-2.html




 ~विजय राजबली माथुर ©