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Tuesday, October 4, 2011

दशहरा क्या है?

आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक शारदीय नवरात्रि तथा दशमी को दशहरा पर्व मनाए जाते हैं। ऋतु परिवर्तन के संक्रमण काल मे नवरात्रि मनाने का उद्देश्य मानव मात्र को स्वस्थ रखने हेतु हवन द्वारा पर्यावरण को शुद्ध करना था। किन्तु आज कल तथाकथित प्रगतिशीलता और विज्ञान के युज्ञ मे लोग अंधविश्वास से ग्रसित होकर अर्थ का अनर्थ करते हुयी और अधिक पर्यावरण प्रदूषित कर रहे हैं। पोंगावाद के चक्कर मे 'हेल्थ एंड हाईजीन 'के पर्व को ढोंग और पाखंड से जोड़ दिया गया है जिससे शोषण-प्रक्रिया को अधिक मजबूत किया जा सके और अफसोस कि जिंनका शोषण होता है वे ही ऐसे ढोंग -पाखंड को बढ़ाने मे अग्रणी रहते हैं। इसका एक कारण शोषितों के हमदर्दों-कम्यूनिस्टों  का धर्म के इस क्षेत्र को शोषकों(पूँजीपतियों,साम्राज्यवादियों) हेतु खुला छोड़ देना है। वे शोषकों(साम्राज्यवादियों) वारा निर्धारित मानदंडों के आधार पर धर्म को ही रद्द कर देते हैं। जबकि धर्म का अर्थ धारण करना है और प्रत्येक मनुष्य को शरीर धारण करने हेतु आवश्यक नियमों का पालन करना ही धर्म कहलाता है। पोंगापंथियों की व्याख्या धर्म नहीं अधर्म मे उलझाती है।

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अथक प्रयास द्वारा भारत मे व्याप्त कुरीतियों तथा पाखंड पर प्रहार करके जनता को जागरूक किया था किन्तु उन्ही के प्रचारक रहे आचार्य श्रीराम शर्मा ने विशुद्ध आर्थिक स्वार्थों के चलते स्वामी जी की मेहनत पर पानी फेर दिया, गायत्री परिवार द्वारा पुनः ढोंग-पाखंड को जबर्दस्त तरीके से भारत-भर मे फैला दिया गया। आज अनेकों पाखंडी संगठन धर्म के नाम पर जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ रहे हैं । जनता के हितैषी बजाए धर्म के मर्म को समझाने के धर्म को ही गलत ठहरा रहे हैं जबकि धर्म वह नहीं है जिसे पोंगापंथी बताते हैं। आज दुर्गा अष्टमी के अवसर पर प्रस्तुत है श्री गजाधर प्रसाद आर्य द्वारा प्रकाशित आँखें खोलने वाली यह रचना-

'जगदंबा बकरे नहीं खाती है '




आज से दो दिन बाद दशहरा मनाया जाएगा और लोग रावण के पुतले फूँक कर तमाशा मचाएंगे। किंवदंती फैला दी गई है कि इसी दिन राम ने रावण का वध किया था जो बिलकुल गलत है। रावण का संहार चैत्र मास की अमावस्या को हुआ था। आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी 'विजया दशमी' कहलाती है ज्योतिषीय गणना के आधार पर इस दिन किए गए कार्यों मे निश्चित सफलता मिलती है। इसीलिए श्री राम ने इस दिन किष्किंधा  की राजधानी 'पम्पापुर' से लंका की ओर प्रस्थान किया था। अंततः उन्हें अपने उद्देश्य मे पूर्ण सफलता मिली थी और वह साम्राज्यवादी रावण को जन-सहयोग से  परास्त करने मे सफल रहे थे ।

'विजया दशमी' को राम की सहायता मे सुग्रीव की सेना के प्रस्थान को यादगार बनाने हेतु प्रारम्भ मे इस दिन 'विजय जुलूस' निकालने की परिपाटी पड़ी थी। धीरे-धीरे लोग नाट्य कला के माध्यम से संघर्ष को इस दिन दिखाने लगे। फिर कई दिन तक नाट्य प्रदर्शन शुरू हुये  और विजया दशमी के दिन रावण का पुतला फूंका जाने लगा। ढोंग और दिखावे का बोल-बाला बढ़ता गया तथा नीति और आदर्श अदृश्य होते गए ,यही है आज की राम-लीला और दशहरा का सार।

आचार्य किशोरी दास बाजपेयी( जिन्हें हिन्दी का पाणिनी माना जाता है और जिन्हें डा रामधारी सिंह 'दिनकर' ने हिन्दी भाषा और साहित्य का डा राम मनोहर लोहिया कहा था ) ने भाषा-विज्ञान के आधार पर सिद्ध किया है कि 'राक्षस' शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के 'रक्षस' धातु से हुई है जिसका अर्थ है -रक्षा करना। 'रावण' आदि प्रवासी आर्य  अपने को 'राक्षस' अर्थात आर्य-सभ्यता और संस्कृति की रक्षा करने वाले कहते थे। राम और रावण दोनों ही आर्य थे और दोनों के मध्य मतभेद तथा टकराव साम्राज्यवाद के विरुद्ध राष्ट्रवाद के संघर्ष के रूप मे था। विदेशी इतिहासकारों ने इसे आर्य-द्रविड़ संघर्ष बता कर फूट डालने का कृत किया है। रावण एक महान आर्य विद्वान था ,वह दसों दिशाओं का ज्ञाता था।

दस दिशाएँ-

1-पूर्व,2-पश्चिम,3-उत्तर,4-दक्षिण,5-ईशान(उत्तर-पूर्व),6-आग्नेय(दक्षिण -पूर्व),7-ने ऋत्य(दक्षिण-पश्चिम),8-वावव्य (उत्तर-पश्चिम),9-आकाश और 10-पाताल(धरती के भीतर)।

एक महान विद्वान और प्रकांड ज्ञाता को दशानन इसी लिए कहा गया था और उसके पुतले पर गधे के सिर लगाना विद्वता को ठुकराना एवं कुचलना है जो निंदनीय होना चाहिए परंतु बड़ी ठसक से खुद को काबिल कहने वाले लोग भी ऐसी कुत्सित बातों पर इठलाते हैं। खुद राम ने लक्ष्मण को रावण के पास ज्ञान प्राप्त  करने भेजा था और अंत समय मे रावण ने लक्ष्मण के माध्यम से राम को ज्ञान प्रदान किया था।

हमारे देश मे एक बड़ा वर्ग पोंगापंथियों को बल प्रदान करता है और दूसरा खुद को काबिल समझने वाला वर्ग धर्म की अवधारणा को ठुकराता है। वास्तविक समस्या यह है जनता को समझाये कौन ?यदि कोई इस ओर प्रयास करे तो पोंगापंथी और प्रगतिशील दोनों मिल कर उस पर सामूहिक प्रहार करने लगते हैं। सत्य से आज किसी को कोई सरोकार नहीं है । ढोंग और पाखंड का पर्दाफाश करने की कड़ी मे एक छोटा सा प्रयास 'विजया दशमी' या दशहरा क्या है ?का रहस्य बताने की चेष्टा की है यह जानते हुये भी कि,आज भी लोग सत्य को स्वीकार नहीं करेंगे। 

Saturday, April 30, 2011

सीता की कूटनीति का कमाल ------ विजय राजबली माथुर

रामभक्त भटक गए हैं 

स्वाधीनता पूर्व जब महात्मा गांधी ने रामराज्य का स्वप्न देखा था तो देश में साम्राज्यवाद विरोधी लहर चल रही थी और विदेशी साम्राज्यवादियों से टक्कर लेने के संघर्ष में बापू को राम एक 'आदर्श क्रांतिकारी' के रूप में दिखाई दिए थे.इसीलिये उन्होंने स्वाधीन भारत में राम के शासन जैसी जनवादी व्यवस्था की कल्पना की थी.लेकिन यह दुर्भाग्य ही है कि,स्वाधीनता के तुरन्त बाद साम्राज्यवादियों के पिट्ठू नाथूराम गोडसे द्वारा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को हमसे छीन लिया गया और इसी के साथ ही बापू के रामराज्य का स्वप्न मात्र स्वप्न ही रह गया.आज आजादी के ६३ वर्ष बाद भी साम्राज्यवादी शक्तियां अपने प्रतिनिधियों (आर.एस.एस.,वि.हि.प.-जिसे फोर्ड फौन्डेशन ने अपनी बैलेंस शीट में दिखाते हुए भारी चन्दा दिया है और उनके सहयोगी संगठन)के माध्यम से राम के नाम पर अपना शोषण-कारी खेल खेल रही हैं.जाने या अनजाने भारत की धर्म-प्राण जनता 'राम के साम्राज्यवाद विरोधी क्रांतिकारिता 'को भुला कर राम के नाम का साम्राज्यवादियों के हितचिंतकों द्वारा दुरूपयोग होना बर्दाश्त कर रही है.यह हमारे देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है कि,भारत को एकता के सूत्र में आबद्ध करने वाले राम का नाम भारत को तोड़ने की साजिश में घसीटा जा रहा है.

आज के बदले हुए विश्व में साम्राज्यवादी शक्तियां भारत को प्रत्यक्ष रूप से अपने प्रभाव में नहीं ला सकतीं  ,इसीलिये ये ताकतें हमारे देश की विभाजनकारी एवं विखंडनकारी शक्तियों को जिन्होंने रामजन्म भूमि का थोथा शिगूफा छोड़ रखा है,को मोहरा बना कर भारत की एकता व अखंडता पर कुठारा घात कर रही हैं.अतः हमारा राष्ट्र-हित में कर्तव्य है कि हम आप को राम की सहयोगी और अर्धांग्नी सीता जी द्वारा राष्ट्र-हित में किये गए त्याग,बलिदान और तप से परिचित कराएं और यह अपेक्षा करते हैं कि आज फिर उसी जोशो-खरोश से साम्राज्यवादी शक्तियों को शिकस्त दें जैसे सीता जी ने रावण को परास्त करने में राम के कंधे से कंधा मिलाकर किया था.

सीता -संक्षिप्त परिचय 

जैसा कि 'रावण वध एक पूर्व निर्धारित योजना' में पहले ही उल्लेख हो चुका है-राम के आविर्भाव के समय भारत-भू छोटे -छोटे राज्यों में विभक्त होकर परस्पर संघर्ष शील शासकों का अखाड़ा बनी हुयी थी.दूसरी और  रावण के नेतृत्व में साम्राज्यवादी शक्तियां भारत को दबोचने के प्रयास में संलग्न थीं.अवकाश प्राप्त शासक मुनि विश्वमित्र जी जो महान वैज्ञानिक भी थे और जो अपनी प्रयोग शाला में 'त्रिशंकू' नामक कृत्रिम उपग्रह (सेटेलाईट)को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित  कर चुके थे जो कि आज भी अपनी कक्षा (ऑर्बिट) में ज्यों का त्यों परिक्रमा कर रहा है जिससे  हम 'त्रिशंकू तारा' के नाम से परिचित हैं. विश्वमित्र जी केवल ब्रह्माण्ड (खगोल) विशेषज्ञ ही नहीं थे वह जीव-विज्ञानी भी थे.उनकी प्रयोगशाला में गोरैया चिड़िया -चिरौंटा  तथा नारियल वृक्ष का कृत्रिम रूप से सृजन करके इस धरती पर सफल   परीक्षण किया जा चुका था .ऐसे ब्रह्मर्षि विश्वमित्र ने विद्वान का वीर्य और विदुषी का रज (ऋषियों का रक्त)लेकर परखनली (टेस्ट ट्यूब) के माध्यम से एक कन्या को अपनी प्रयोगशाला में उत्पन्न किया जोकि,'सीता'नाम से जनक की दत्तक पुत्री बनवा दी गयीं.

वीरांगना-विदुषी सीता 

जनक जो एक सफल वैज्ञानिक भी थे सीता को भी उतना ही वैज्ञानिक और वीर बनाना चाहते थे और इस उद्देश्य में पूर्ण सफल भी रहे.सीता ने यथोचित रूप से सम्पूर्ण शिक्षा ग्रहण की तथा उसे आत्मसात भी किया.उनके वयस्क होने पर मैग्नेटिक मिसाईल (शिव-धनुष) की मैग्नेटिक चाभी एक अंगूठी में मड़वा कर उन्हें दे दी गयी जिसे उन्होंने ऋषियों की योजनानुसार पुष्पवाटिका में विश्वमित्र के शिष्य के रूप में पधारे दशरथ-पुत्र राम को सप्रेम -भेंट कर दिया और जिसके प्रयोग से राम ने उस मैग्नेटिक मिसाईल उर्फ़ शिव-धनुष को उठा कर नष्ट (डिफ्यूज ) कर दिया ,जिससे कि इस भारत की धरती पर उसके युद्धक प्रयोग से होने वाले विनाश से बचा जा सका.इस प्रकार हुआ सीता और राम का विवाह उत्तरी भारत के दो दुश्मनों को सगी रिश्तेदारी में बदल कर जनता के लिए  वरदान के रूप में आया क्योंकि अब संघर्ष प्रेम में बदल दिया गया था.

दूरदर्शी कूटनीतिज्ञ सीता 

सीता एक योग्य पुत्री,पत्नी,भाभी आदि होने के साथ-साथ जबरदस्त कूट्नीतिग्य भी थीं.इसलिए जब राष्ट्र -हित में राम-वनवास हुआ तो वह भी राम के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चल दीं.वस्तुतः साम्राज्यवाद को अस्त्र-शस्त्र की ताकत से नहीं कूट-नीति के कमाल से परास्त किया जा सकता था और यही कार्य सीता ने किया.सीता वन में रह कर आमजनों के बीच घुल मिल कर तथ्यों का पता लगातीं थीं और राम  के  साथ  मिल  कर  आगे  की नीति निर्धारित करने में पूर्ण सहयोग देतीं थीं.रावण के बाणिज्य-दूतों (खर-दूषण ) द्वारा खुफिया जानकारियाँ हासिल करने के प्रयासों के कारण सीता जी ने उनका संहार करवाया.रावण की बहन-सम प्रिय जासूस स्वर्ण-नखा (जिसे विकृत रूप में सूपनखा कहा जाता है ) को अपमानित करवाने में सीता जी की ही उक्ति काम कर रही थी .इसी घटना को सूपनखा की नाक  काटना एक मुहावरे के रूप में कहा जाता है.स्वर्ण-नखा का अपमान करने का उद्देश्य रावण को सामने लाना और बदले की कारवाई के लिए उकसाना था जिसमें सीता जी सफल रहीं.रावण अपने गुप्तचर मुखिया मारीची पर बहुत नाज करता था और मान-सम्मान भी देता था  इसी लिए उसे रावण का मामा कहा जाता है.मारीची और रावण दोनों वेश बदल कर यह पता लगाने आये कि,राम कौन हैं ,उनका उद्देश्य क्या है?वह वनवास में हैं तो रावण  के गुप्तचरों का संहार क्यों कर रहे हैं ?वह वन में क्या कर रहे हैं?.

राम और सीता ने रावण के सामने आने पर एक गंभीर व्यूह -रचना की और उसमें रावण को फंसना ही पडा.वेश बदले रावण के ख़ुफ़िया -मुखिया मारीची को काफी दूर दौड़ा कर और रावण की पहुँच से बाहर हो जाने पर मार डाला और लक्ष्मण को भी वहीं सीता जी द्वारा भेज दिया गया.निराश और हताश रावण ने राम को अपने सामने लाने हेतु छल से सीता को अपने साथ लंका ले जाने का उपक्रम किया लेकिन वह अनभिग्य था कि,यही तो राम खुद चाहते थे कि वह सीता को लंका ले जाए तो सीता वहां से अपने वायरलेस (जो उनकी अंगूठी में फिट था) से लंका की गोपनीय जानकारियाँ जुटा -जुटा कर राम को भेजती रहें.

सीता जी ने रावण को गुमराह करने एवं राम को गमन-मार्ग का संकेत देने हेतु प्रतीक रूप में कुछ गहने विमान से गिरा दिए थे.बाली के अवकाश प्राप्त एयर मार्शल जटायु ने रावण के विमान पर इसलिए प्रहार करना चाहा होगा कि वह किस महिला को बगैर किसी सूचना के अपने साथ ले जा रहा है.चूंकि वह रावण के मित्र बाली की वायु सेना से सम्बंधित था अतः रावण ने केवल उसके विमान को क्षति पहुंचाई और उसे घायलावस्था में छोड़ कर चला गया.जटायु से सम्पूर्ण वृत्तांत सुन कर राम ने सुग्रीव से मित्रता कर ली और उद्भट विद्वान एवं उपेक्षित वायु-सेना अधिकारी हनुमान  को पूर्ण मान -सम्मान दिया.दोनों ने राम को सहायता एवं समर्थन का ठोस आश्वासन दिया जिसे समय के साथ -साथ पूर्ण भी किया.राम ने भी रावण के सन्धि- मित्र बाली का संहार कर सुग्रीव को सत्तासीन करा दिया. हनुमान अब प्रधान वायु सेनापति (चीफ एयर मार्शल) बना दिए गए जो कि कूटनीति के भी विशेषज्ञ थे.

सीता द्वारा भेजी लंका की गुप्त सूचनाओं के आधार पर राम ने हनुमान को पूर्ण विशवास में लेकर लंका के गुप्त मिशन पर भेजा.हनुमान जी ने लंका की सीमा में प्रवेश अपने विमान को इतना नीचे उड़ा कर किया जिससे वह समुद्र में लगे राडार 'सुरसा'कीपकड़ से बचे रहे ,इतना ही नहीं उन्होंने 'सुरसा'राडार को नष्ट भी कर दिया जिससे आने वाले समय में हमलावर विमानों की खबर तक रावण को न मिल सके.

लंका में प्रवेश करके हनुमान जी ने सबसे पहले सीता जी से भेंट की तथा गोपनीय सूचनाओं का आदान-प्रदान किया और सीता जी के परामर्श पर रावण के सबसे छोटे भाई विभीषण जो उससे असंतुष्ट था ही से संपर्क साधा और राम की तरफ से उसे पूर्ण सहायता तथा समर्थन का ठोस आश्वासन भी प्रदान कर दिया.अपने उद्देश्य में सफल होकर उन्होंने सीता जी को सम्पूर्ण वृत्तांत की सूचना दे दी.सीता जी से अनुमति लेकर हनुमान जी ने रावण के कोषागारों एवं शस्त्रागारों पर अग्नि-बमों (नेपाम बम) की वर्षा कर डाली.खजाना और हथियार नष्ट कर के गूढ़ कूटनीति के तहत और सीता जी के आशीर्वाद से उन्होंने अपने को रावण की सेना द्वारा गिरफ्तार करा लिया और दरबार में रावण के समक्ष पेश होने पर खुद को शांति-दूत बताया जिसका विभीषण ने भी समर्थन किया और उन्हें अंतरष्ट्रीय  कूटनीति के तहत छोड़ने का प्रस्ताव रखा.अंततः रावण को मानना ही पडा. परन्तु लौटते हुए हनुमान के विमान  की पूँछ पर संघातक प्रहार भी करवा दिया.हनुमान जी तो साथ लाये गए स्टैंड बाई छोटे विमान से वापिस लौट आये और बदली हुयी परिस्थितियों में सीता जी से उनकी अंगूठी में जडित वायरलेस भी वापिस लेते गए.

विभीषण ने शांति-दूत हनुमान के विमान पर प्रहार को मुद्दा बना कर रावण के विदेश मंत्री पद को त्याग दिया और खुल कर राम के साथ आ गया.सीता जी का लंका प्रवास सफल रहा -अब रावण की फ़ौज और खजाना दोनों खोखले  हो चुके थे,उसका भाई अपने समर्थकों के साथ उसके विरुद्ध राम के साथ आ चुका था.अब लंका पर राम का आक्रमण एक औपचारिकता मात्र रह गया था फिर भी शांति के अंतिम प्रयास के रूप में रावण के मित्र बाली के पुत्र अंगद को दूत बना कर भेजा गया. रावण ने समपर्ण की अपेक्षा वीर-गति प्राप्त करना उपयुक्त समझा और युद्ध में तय पराजय का वरण किया.

इस प्रकार महान कूटनीतिज्ञ सीता जी के कमाल की सूझ-बूझ ने राम को साम्राज्यवादी रावण के गढ़ में ही उसे परास्त करने का मार्ग प्रशस्त किया. आज फिर आवश्यकता है एक और सीता एवं एक और राम की जो साम्राज्यवाद के जाल को काट कर विश्व की कोटि-कोटि जनता को शोषण तथा उत्पीडन से मुक्त करा सकें.जब तक राम की वीर गाथा रहेगी सीता जी की कूटनीति को भुलाया नहीं जा सकेगा.
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Saturday, October 16, 2010

क्रांतिकारी राम- (अंतिम भाग) ---विजय राजबली माथुर

पिछली पोस्ट से आगे.....
(फोटो साभार:गूगल)
साम्राज्यवादी -विस्तारवादी रावण के परम मित्र  बाली को उसके विद्रोही भाई  सुग्रीव की मदद से समाप्त  कर के राम ने अप्रत्यक्ष रूप से साम्राज्यवादियों की शक्ति को कमजोर कर दिया.इसी प्रकार रावण के विद्रोही भाई विभीषण से भी मित्रता स्थापित कर के और एयर मार्शल (वायुनर उर्फ़ वानर) हनुमान के माध्यम से साम्राज्यवादी रावण की सेना व खजाना अग्निबमों से नष्ट करा दिया.अंत में जब राम के नेतृत्व में राष्ट्रवादी शक्तियों और रावण की साम्राज्यवाद समर्थक शक्तियों में खुला युद्ध हुआ तो साम्राज्यवादियों की करारी हार हुई क्योंकि,कूटनीतिक चतुराई से साम्राज्यवादियों को पहले ही खोखला किया जा चुका था.जहाँ तक नैतिक दृष्टिकोण का सवाल है सूपर्णखा का अंग भंग कराना,बाली की विधवा का अपने देवर सुग्रीव से और रावण की विधवा का विभीषण से विवाह कराना* तर्कसंगत नहीं दीखता.परन्तु चूँकि ऐसा करना साम्राज्यवाद का सफाया कराने के लिए वांछित था अतः राम के इन कृत्यों पर उंगली नहीं उठायी जा सकती है.

अयोध्या लौटकर राम ने भारी प्रशासनिक फेरबदल करते हुए पुराने प्रधानमंत्री वशिष्ठ ,विदेश मंत्री सुमंत आदि जो काफी कुशल और योग्य थे और जिनका जनता में काफी सम्मान था अपने अपने पदों से हटा दिया गया.इनके स्थान पर भरत को प्रधान मंत्री,शत्रुहन को विदेश मंत्री,लक्ष्मण को रक्षा मंत्री और हनुमान को प्रधान सेनापति नियुक्त किया गया.ये सभी योग्य होते हुए भी राम के प्रति व्यक्तिगत रूप से वफादार थे इसलिए राम शासन में निरंतर निरंकुश होते चले गए.अब एक बार फिर अपदस्थ वशिष्ठ आदि गणमान्य नेताओं ने वाल्मीकि के नेतृत्व में योजनाबद्ध तरीके से सीता को निष्कासित करा दिया जो कि उस समय   गर्भिणी थीं और जिन्होंने बाद में वाल्मीकि के आश्रम में आश्रय ले कर लव और कुश नामक दो जुड़वाँ पुत्रों को जन्म दिया.राम के ही दोनों बालक राजसी वैभव से दूर उन्मुक्त वातावरण में पले,बढे और प्रशिक्षित हुए.वाल्मीकि ने लव एवं कुश को लोकतांत्रिक शासन की दीक्षा प्रदान की और उनकी भावनाओं को जनवादी धारा  में मोड़ दिया.राम के असंतुष्ट विदेश मंत्री शत्रुहन लव और कुश से सहानुभूति रखते थे और वह यदा कदा वाल्मीकि के आश्रम में उन से बिना किसी परिचय को बताये मिलते रहते थे.वाल्मीकि,वशिष्ठ आदि के परामर्श पर शत्रुहन ने पद त्याग करने की इच्छा को दबा दिया और राम को अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति से अनभिज्ञ रखा.इसी लिए राम ने जब अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया तो उन्हें लव-कुश के नेतृत्व में भारी जन आक्रोश का सामना करना पडा और युद्ध में भीषण पराजय के बाद जब राम,भारत और शत्रुहन बंदी बनाये जा कर सीता के सम्मुख पेश किये गए तो सीता को जहाँ साम्राज्यवादी -विस्तारवादी राम की पराजय की तथा लव-कुश द्वारा नीत लोकतांत्रिक शक्तियों की जीत पर खुशी हुई वहीं मानसिक विषाद भी कि,जब राम को स्वयं विस्तारवादी के रूप में देखा.भारी मानसिक आघात के कारण सीता का ब्रेन हैमरेज से प्राणांत हो गया.वाल्मीकि,वशिष्ठ आदि के हस्तक्षेप से लव-कुश ने राम आदि को मुक्त कर दिया.यद्यपि शासन के पदों पर राम आदि बने रहे तथापि देश का का आंतरिक प्रशासन लव और कुश के नेतृत्व में पुनः लोकतांत्रिक पद्धति पर चल निकला और इस प्रकार राम की छाप जन-नायक के रूप में बनी रही और आज भी उन्हें इसी रूप में जाना जाता है.

(विशेष-पाठकों की सुविधा के लिए इस आलेख को यहाँ दो भागों में प्रस्तुत किया गया है यद्यपि यह सम्पूर्ण आलेख एक पूर्ण किश्त में 1 फरवरी 1988 को पाक्षिक समाचार पत्र  'फीरोजाबाद केसरी'  में प्रकाशित हो चुका है.)

* 'सत्यार्थ प्रकाश' में दे वर विवाह पद्धति का उल्लेख मिलता है -प्रतीत होता है राम ने इसी वैदिक प्रक्रिया का पालन किया था.





(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

Friday, October 15, 2010

क्रांतिकारी राम --(भाग:1)---विजय राजबली माथुर

(चित्र साभार:गूगल)

महात्मा गांधी ने भारत में राम राज्य का स्वप्न देखा था.राम कोटि-कोटि जनता के आराध्य हैं.प्रतिवर्ष दशहरा और दीपावली पर्व राम कथा से जोड़ कर ही मनाये जाते हैं.परन्तु क्या भारत में राम राज्य आ सका या आ सकेगा राम के चरित्र को सही अर्थों में समझे बगैर?जिस समय राम का जन्म हुआ भारत भूमि छोटे छोटे राज तंत्रों में बंटी हुई थी और ये राजा परस्पर प्रभुत्व के लिए आपस में लड़ते थे.उदहारण के लिए कैकेय (वर्तमान अफगानिस्तान) प्रदेश के राजा और जनक (वर्तमान बिहार के शासक) के राज्य मिथिला से अयोध्या के राजा दशरथ का टकराव था.इसी प्रकार कामरूप (आसाम),ऋक्ष प्रदेश (महाराष्ट्र),वानर प्रदेश (आंध्र)के शासक परस्पर कबीलाई आधार पर बंटे हुए थे.वानरों के शासक बाली ने तो विशेष तौर पर रावण जो दूसरे देश का शासक था,से संधि कर रखी  थी कि वे परस्पर एक दूसरे की रक्षा करेंगे.ऎसी स्थिति में आवश्यकता थी सम्पूर्ण भारत को एकता के सूत्र में पिरोकर साम्राज्यवादी ताकतों जो रावण के नेतृत्व में दुनिया भर  का शोषण कर रही थीं का सफाया करने की.लंका का शासक रावण,पाताल लोक (वर्तमान U S A ) का शासक ऐरावन और साईबेरिया (जहाँ छः माह की रात होती थी)का शासक कुंभकर्ण  सारी दुनिया को घेर कर उसका शोषण कर रहे थे उनमे आपस में भाई चारा था. 

भारतीय राजनीति के तत्कालीन विचारकों ने बड़ी चतुराई के साथ कैकेय प्रदेश की राजकुमारी कैकयी के साथ अयोध्या के राजा दशरथ का विवाह करवाकर दुश्मनी को समाप्त करवाया.समय बीतने के साथ साथ अयोध्या और मिथिला के राज्यों में भी विवाह सम्बन्ध करवाकर सम्पूर्ण उत्तरी भारत की आपसी फूट को दूर कर लिया गया.चूँकि जनक और दशरथ के राज्यों की सीमा नज़दीक होने के कारण दोनों की दुश्मनी भी उतनी ही ज्यादा थी अतः इस बार निराली चतुराई का प्रयोग किया गया.अवकाश प्राप्त राजा विश्वमित्र जो ब्रह्मांड (खगोल) शास्त्र के ज्ञाता और जीव वैज्ञानिक थे और जिनकी  प्रयोगशाला में गौरय्या चिड़िया तथा नारियल वृक्ष का कृत्रिम रूप से उत्पादन करके इस धरती  पर सफल परीक्षण किया जा चुका था,जो त्रिशंकु नामक कृत्रिम उपग्रह (सेटेलाइट) को अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित कर चुके थे जो कि आज भी आकाश में ज्यों का त्यों परिक्रमा कर रहा है,ने विद्वानों का वीर्य एवं रज (ऋषियों का रक्त)ले कर परखनली के माध्यम से एक कन्या को अपनी प्रयोगशाला में उत्पन्न किया जोकि,सीता नाम से जनक की दत्तक पुत्री बनवा दी गयी. वयस्क होने पर इन्हीं सीता को मैग्नेटिक मिसाइल (शिव धनुष) की मैग्नेटिक चाभी एक अंगूठी में मढवा कर दे दी गयी जिसे उन्होंने पुष्पवाटिका में विश्वामित्र के शिष्य के रूप में आये दशरथ पुत्र राम को सप्रेम भेंट कर दिया और जिसके प्रयोग से राम ने उस मैग्नेटिक मिसाइल उर्फ़ शिव धनुष को उठाकर नष्ट कर दिया जिससे  कि इस भारत की धरती पर उसके प्रयोग से होने वाले विनाश से बचा जा सका.इस प्रकार सीता और राम का विवाह उत्तरी भारत के दो दुश्मनों को सगे दोस्तों में बदल कर जनता के लिए वरदान के रूप में आया क्योंकि अब संघर्ष प्रेम में बदल दिया गया था.

कैकेयी के माध्यम से राम को चौदह  वर्ष का वनवास दिलाना राजनीतिक विद्वानों का वह करिश्मा था जिससे साम्राज्यवाद के शत्रु   को साम्राज्यवादी धरती पर सुगमता से पहुंचा कर धीरे धीरे सारे देश में युद्ध की चुपचाप तय्यारी की जा सके और इसकी गोपनीयता भी बनी रह सके.इस दृष्टि से कैकेयी का साहसी कार्य राष्ट्रभक्ति में राम के संघर्ष से भी श्रेष्ठ है क्योंकि कैकेयी ने स्वयं विधवा बन कर जनता की प्रकट नज़रों में गिरकर अपने व्यक्तिगत स्वार्थों की बलि चढ़ा कर राष्ट्रहित में कठोर निर्णय लिया.निश्चय ही जब राम के क्रांतिकारी क़दमों की वास्तविक गाथा लिखी जायेगी कैकेयी का नाम साम्राज्यवाद के संहारक और राष्ट्रवाद की सजग प्रहरी के रूप में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा.

अगली पोस्ट में जारी.........http://krantiswar.blogspot.in/2010/10/blog-post_16.html

Typist -यश(वन्त)


(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

Wednesday, June 30, 2010

रावण वध एक पूर्वनिर्धारित योजना ------ विजय राजबली माथुर

आज से दो अरब वर्ष पूर्व हमारी पृथ्वी और सूर्य एक थे.अस्त्रोनोमिक युग में सर्पिल,निहारिका,एवं नक्षत्रों का सूर्य से पृथक विकास हुआ.इस विकास से सूर्य के ऊपर उनका आकर्षण बल आने लगा .नक्षत्र और सूर्य अपने अपने कक्षों में रहते थे तथा ग्रह एवं नक्षत्र सूर्य की परिक्रमा किया करते थे.एक बार पुछल तारा अपने कक्ष से सरक गया और सूर्य के आकर्षण बल से उससे टकरा गया,परिणामतः सूर्य के और दो टुकड़े चंद्रमा और पृथ्वी उससे अलग हो गए और सूर्या की परिक्रमा करने लगे.यह सब हुआ कास्मिक युग में.ऐजोइक युग में वाह्य सतह छिछली अवस्था में,पृथ्वी का ठोस और गोला रूप विकसित होने लगा,किन्तु उसकी बहरी सतह अर्ध ठोस थी.अब भरी वायु –मंडल बना अतः पृथ्वी की आंच –ताप कम हुई और राख जम गयी.जिससे पृथ्वी के पप्ड़े का निर्माण हुआ.महासमुद्रों व महादीपों की तलहटी का निर्माण तथा पर्वतों का विकास हुआ,ज्वालामुखी के विस्फोट हुए और उससे ओक्सिजन निकल कर वायुमंडल में HYDROGEN से प्रतिकृत हुई जिससे करोड़ों वर्षों तक पर्वतीय चट्टानों पर वर्षा हुई तथा जल का उद्भव हुआ;जल समुद्रों व झीलों के गड्ढों में भर गया.उस समय दक्षिण भारत एक दीप था तथा अरब सागर –मालाबार तट तक विस्तृत समुद्र उत्तरी भारत को ढके हुए था;लंका एक पृथक द्वीप था.किन्तु जब नागराज हिमालय पर्वत की सृष्टि हुई तब इयोजोइक युग में वर्षा के वेग के कारन उससे अपर मिटटी पिघली बर्फ के साथ समुद्र ताल में एकत्र हुई और उसे पीछे हट जाना पड़ा तथा उत्तरी भारत का विकास हुआ.इसी युग में अब से लगभग तीस करोड़ वर्ष पूर्व एक कोशिए वनस्पतियों व बीस करोड़ वर्ष पूर्व एक कोशिए का उद्भव हुआ.एक कोशिकाएं ही भ्रूण विकास के साथ समय प्रत्येक जंतु विकास की सभी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं.सबसे प्राचीन चट्टानों में जीवाश्म नहीं पाए जाते,अस्तु उस समय लार्वा थे,जीवोत्पत्ति नहीं हुई थी.उसके बाद वाली चट्टानों में (लगभग बीस करोड़ वर्ष पूर्व)प्रत्जीवों (protojoa) के अवशेष मिलते हैं अथार्त सर्व प्रथम जंतु ये ही हैं.जंतु आकस्मिक ढंग से कूद कर(ईश्वरीय प्रेरणा के कारन)बड़े जंतु नहीं हो गए,बल्कि सरलतम रूपों का प्रादुर्भाव हुआ है जिन के मध्य हजारों माध्यमिक तिरोहित कड़ियाँ हैं.मछलियों से उभय जीवी (AMFIBIAN) उभय जीवी से सर्पाक (reptile) तथा सर्पकों से पक्षी (birds) और स्तनधारी (mamals) धीरे-धीरे विकास कर सके हैं.तब कहीं जा कर सैकोजोइक युग में मानव उत्पत्ति हुई।


अपने विकास के प्रारंभिक चरण में मानव समूहबद्ध अथवा झुंडों में ही रहता था.इस समय मनुष्य प्रायः नग्न ही रहता था,भूख लगने पर कच्चे फल फूल या पशुओं का कच्चा मांस खा कर ही जीवन निर्वाह करता था.कोई किसी की समपत्ति(asset) न थी,समूहों का नेत्रत्व मात्रसत्तात्मक (mother oriented) था.इस अवस्था को सतयुग पूर्व पाशान काल (stone age) तथा आदिम साम्यवाद का युग भी कहा जाता है.परिवार के सम्बन्ध में यह ‘अरस्तु’ के अनुसार ‘communism of wives’ का काल था (संभवतः इसीलिए मात्र सत्तामक समूह रहे हों).इस समय मानव को प्रकृति से कठोर संघर्ष करना पड़ता था.मानव के ह्रास –विकास की कहानी सतत संघर्षों को कहानी है.malthas के अनुसार उत्पन्न संतानों में आहार ,आवास,तथा प्रजनन के अवसरों के लिए –‘जीवन के लिए संघर्ष’ हुआ करता है जिसमे लेमार्क के अनुसार ‘व्यवहार तथा अव्यवहार’ के सिद्दंतानुसार ‘योग्यता ही जीवित रहती है’.अथार्त जहाँ प्रकृति ने उसे राह दी वहीँ वह आगे बढ़ गया और जहाँ प्रकृति की विषमताओं ने रोका वहीँ रुक गया.कालांतर में तेज बुद्धि मनुष्य ने पत्थर और काष्ठ के उपकरणों तथा शस्त्रों का अविष्कार किया तथा जीवन पद्धति को और सरल बना लिया.इसे ‘उत्तर पाशान काल’ की संज्ञा दी गयी.पत्थारोंके घर्षण से अग्नि का अविष्कार हुआ और मांस को भून कर खाया जाने लगा.धीरे धीरे मनुष्य ने देखा की फल खा कर फेके गए बीज किस प्रकार अंकुरित होकर विशाल वृक्ष का आकर ग्रहण कर लेते हैं.एतदर्थ उपयोगी पशुओं को अपना दास बनाकर मनुष्य कृषि करने लगा.यहाँ विशेष स्मरणीय तथ्य यह है की जहाँ कृषि उपयोगी सुविधाओं का आभाव रहा वहां का जीवन पूर्ववत ही था.इस दृष्टि से गंगा-यमुना का दोआबा विशेष लाभदायक रहा और यहाँ उच्च कोटि की सभ्यता का विकास हुआ जो आर्य सभ्यता कहलाती है और यह छेत्र आर्यावर्त.कालांतर में यह जाती सभ्य,सुसंगठित व सुशिक्षित होती गयी.व्यापर कला-कौशल और दर्शन में भी यह जाती सभ्य थी.इसकी सभ्यता और संस्कृति तथा नागरिक जीवन एक उच्च कोटि के आदर्श थे.भारतीय इतिहास में यह कल ‘त्रेता युग’ कें नाम से जाना जाता है और इस का समय ६५०० इ. पू. आँका गया है.आर्यजन काफी विद्वान थे.उन्होंने अपनी आर्य सभ्यता और संस्कृति का व्यापक प्रसार किया.इस प्रकार आर्य जाती और भारतीय सभ्यता संस्कृति गंगा-सरस्वती के तट से पशिम की और फैली.लगभग चार हजार वर्ष पश्चात् २५०० इ.पू.आर्यों ने सिन्धु नदी की घटी में एक सुद्द्रण एवं सुगठित सभ्यता का विकास किया.यही नहीं आर्य भूमि से स्वाहा और स्वधा के मन्त्र पूर्व की और भी फैले तथा आर्यों के संस्कृतिक प्रभाव से ही इसी समय नील और हवांग हो की घाटियों में भी समरूप सभ्यताओं का विकास हो सका.भारत से आर्यों किएक शाखा पूर्व में कोहिमा के मार्ग से चीन,जापान होते हुए अलास्का के रस्ते राकी पर्वत श्रेणियों में पहुच कर पाताल लोक(वर्तमान अमेरिका महाद्वीपों) में अपनी संस्कृति एवं साम्राज्य बनाने में समर्थ हुई.माय ऋषि के नेत्रतव में मायाक्षिको (मेक्सिको) तथा तक्षक ऋषि के नेत्रत्व में तक्शाज़ (टेक्सास) के आर्य उपनिवेश विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं कालांतर में कोलंबस द्वारा नयी दुनिया की खोज के बाद इन के वंशजों को red indians कहकर निर्ममता से नष्ट किया गया.


पशिम की और हिन्दुकुश पर्वतमाला को पार कर आर्य जाती आर्य नगर (ऐर्यान-ईरान)में प्रविष्ट हुई.कालांतर में यहाँ के प्रवासी आर्य,अ-सुर (सूरा न पीने के कारन)कहलाये.दुर्गम मार्ग की कठिनाइयों के कारन इनका अपनी मात्रभूमि आर्यावर्त से संचार –संपर्क टूट सा गया,यही हाल धुर-पशिम-जर्मनी आदि में गए प्रवासी आर्यों का हुआ.एतदर्थ प्रभुसत्ता को लेकर निकत्वर्ती प्रवासी-अ-सुर आर्यों से गंगा-सिन्धु के मूल आर्यों का दीर्घकालीन भीषण देवासुर संग्राम हुआ.हिन्दुकुश से सिन्धु तक भारतीय आर्यों के नेत्रत्व एक कुशल सेनानी इंद्र कर रहा था.यह विधुत शास्त्र का प्रकांड विद्वान और hydrojan बम का अविष्कारक था.इसके पास बर्फीली गैसें थीं.इसने युद्ध में सिन्धु-छेत्र में असुरों को परस्त किया,नदियों के बांध तोड़ दिए,निरीह गाँव में आग लगा दी और समस्त प्रदेश को पुरंदर (लूट) लिया.यद्यपि इस युद्ध में अंतिम विजय मूल भारतीय आर्यों की ही हुई और सभी प्रवासी(अ-सुर) आर्य परंग्मुख हुए.परन्तु सिन्धु घटी के आर्यों को भी भीषण नुकसान हुआ।


आर्यों ने दक्षिण और सुदूर दक्षिण पूर्व की अनार्य जातियों में भी संस्कृतिक प्रसार किया.आस्ट्रेलिया (मूल द्रविड़ प्रदेश)में जाने वाले संस्कृतिक दल का नेत्रत्व पुलस्त्य मुनि कर रहे थे.उन्होंने आस्ट्रेलिया में एक राज्य की स्थापना की (आस्ट्रेलिया की मूल जाती द्रविड़ उखड कर पशिम की और अग्रसर हुई तथा भारत के दक्षिणी -समुद्र तटीय निर्जन भाग पर बस गयी.समुद्र तटीय जाती होने के कारन ये-निषाद जल मार्ग से व्यापर करने लगे,पशिम के सिन्धी आर्यों से इनके घनिष्ठ व्यापारिक सम्बन्ध हो गए.) तथा लंका आदि द्वीपों से अच्छे व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित कर लिए उनकी मृत्यु के पश्चात् रजा बन्ने पर उन के पुत्र विश्र्व मुनि की गिद्ध दृष्टि लंका के वैभव की ओरे गयी.उसने लंका पर आक्रमण किया और रजा सोमाली को हराकर भगा दिया(सोमाली भागकर आस्ट्रेलिया के निकट एक द्वीप 'पोस्ट नेक्स्ट इन कोन्तिनुएद बे' उसी के नाम पर सोमालिया कहलाता है.)इस साम्राज्यवादी लंकेश्वर के तीन पुत्र थे-कुबेर,रावण,और विभीषण -ये तीनों परस्पर सौतेले भाई थे.पिता की म्रत्यु के पश्चात् तीनों में गद्दी के लिए संघर्ष हुआ.अंत में रावण को सफलता मिली.(आर्यावर्त से परे दक्षिण के ये आर्य स्वयं को रक्षस - राक्षस आर्यावर्त और आर्य संस्कृति की रक्षा करने वाले ,कहते थे;परन्तु रावण मूल आर्यों की भांति सूरा न पीकर मदिरा का सेवन करता था इसिलए वह भी अ-सुर अथार्त सूरा न पीने वाला कहलाया)विभीषण ने धैर्य पूर्वक रावण की प्रभुसत्ता को स्वीकार किया तथा उस का विदेश मंत्री बना और कुबेर अपने पुष्पक विमान द्वारा भागकर आर्यावर्त चला आया.प्रयाग के भरद्वाज मुनि उसके नाना थे.उनकी सहायता से वेह स्वर्गलोक (वर्तमान हिमांचल प्रदेश) में एक राज्य स्थापित करने में सफल हुआ.किन्तु रावण ने चैन की साँस न ली,वह कुबेर के पीछे हाथ धो कर पढ़ गया था.उसने दक्षिण भारत पर आक्रमण किया अनेक छोटे छोटे राजाओं को परस्त करता हुआ वह राम को भेंट किया राम सेता.और लक्ष्मण को गनगा पर राज्य कि सीमा तक चोदने मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्य सुमंत विदेश मंत्री को भेजा गया अब राम के राष्ट्रीय कार्य कलापों का श्री गणेश हुआ सर्वप्रथम तो आर्यावर्त के प्रथम डिफेंस सन्तेरे प्रयाग.में भरद्वाज ऋषि के आश्रम पर राम ने उस राष्ट्रीय योजना का अध्ययन किया जिसके अनुसार उन्हें रावन.का वध करना था भरद्वाज,ऋषि,आदि १६ प्रमुख जनपद थे.कहा जाता है की एक बार रावण ईरान,कंधार आदि को जीतता हुआ पात्र राज्य वर्तमान गंधार प्रदेश(रावलपिंडी के निकट जो अब पाकिस्तान में है) तक पहुच गया.यही राज्य स्वर्गलोक (हिमाचल प्रदेश) अंतिम सीढ़ी (आर्य राज्य) था.किन्तु रावण इस सीढ़ी को बनवा (जीत) न सका.कैकेय राज्य को सभी शक्तिशाली राज्यों से सहायता मिल रही थी.उधर का के प्रवासी अ-सुर आर्यों से आर्यावर्त के आर्यों का वनवास चल ही रहा था राम रावण को उनका समर्थन प्राप्त कर सहज और स्वाभाविक था.अतः दे भू पर ही खूब जम कर देवासुर संग्राम हुआ.इस संघर्ष में कोशल नरेश दशरथ ने अमित योग दिया.उन्हीं का सीम शौर्य पराक्रम से किका राज्य की स्वतंत्रता मोहर रही और अंतिम को वापस लौटना पड़ा जिसका उसे म्रत्यु पर्यंत खेद राज्य वरदानों में आस्तःगित अवसर पर प्रथम तो भारत के लिए राज्य व द्वितीय राम के लिए;को १४ वर्ष कि अवधि के लिए दिलाने के लिए भड़काया जिसमे उन्हें सफलता मिल कैकयी इसप्रकार दशरथ कि मौन स्वीक्रति दिलाकर।


बस यहीं से रावण के वध के निमित्त योजना तैयार की जाने लगी.कुबेर के नाना भरद्वाज ऋषि ने आर्यावर्त के समस्त ऋषियों की एक आपातकालीन बैठक प्रयाग में बुलाई.दशरथ के प्रधान मंत्र वशिष्ठ मुनि भी विशेष आमंत्रण से इस सभा में भाग लेने गए थे.ऋषियों ने एक सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया जिसके अनुसार जो दशरथ का प्रथम पुत्र उत्पन्न हो उसका नामकरण ‘राम’हो तथा उसे राष्ट्र रक्षा के लिए १४ वर्ष का वनवास करके रावण के साम्राज्यवादी इरादों को नेस्तनाबूत करना था.इस योजना को आदि कवी वाल्मीकि ने जो इस सभा राम के विवाह,के दो वर्ष पश्चात् प्रधानमंत्री वशिष्ठ ने दरबार.संसद में रजा को उनकी वृद्धावस्था का आभास कराया और राम को उत्तराधिकार सौपकर अवकाश प्राप्त करने कि ओरे संकेत दिया रजा ने संसद के इस प्रस्ताव ग्रहण स्वागत.किया सहर्ष ही दो दिवस कि अल्पावधि में पद त्याग करने कि घोषणा कि एक ओरे तो राम के.राज्याभिषेक शपथ ग्रहण समारोह कि जोर शोरे.से तैय्यारियाँ आरंभ हो गयीं तो दूसरी (ओरे-प्रधान-मंत्र)ने राम को सत्ता से प्रथक रखने कि साजिश शुरू कि मंत्र को माध्यम बना कर।


सौभाग्यवश दशरथ के चार पुत्र हुए जिनके नाम क्रमशः राम,भारत,लक्ष्मण,शत्रुहन ऋषियों की योजना के अनुरूप ही वशिष्ठ ने रखे.राम और लक्ष्मण को कुछ बड़े होने पर युद्ध,दर्शन,और राष्ट्रवादी धार्मिकता की की दीक्षा देन एके लिए विश्वामित्र अपने आश्रम ले गए.उन्होंने राम को उन के निमित्त तैयार ऋषियों की राष्ट्रिय योजना का परिज्ञान कराया तथा युद्ध एवं दर्शन की शिक्षा दी.आर्यावर्त की यौर्वात्य और पाश्चात्य दो महान शक्तियों में चली आरही कुल्गत शत्रुता का अंत करने के उद्देश्य से विश्वमित्र राम और लक्ष्मण को अपने साथ जनक की पुत्री sita के स्वयंवर में मिथिला ले गए.उन्होंने राम को ऋषि योज्नानुकूल जनक का धनुष तोड़ेने की प्रतिज्ञ का परिज्ञान कराकर उसे तोड़ेने की तकनिकी कला समझा दी.इस प्रकार राम-सीता के विवाह द्वारासमास्त आर्यावर्त एकता के सूत्र में आबद्ध हो गया।
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राम के विवाह के दो वर्ष पश्चात् प्रधानमंत्री वशिष्ठ ने दरबार (संसद) में राजा को उनकी वृद्धावस्था का आभास कराया और राम को उत्तराधिकार सौपकर अवकाश प्राप्त करने कि ओर संकेत दिया.राजा ने संसद के इस प्रस्ताव का स्वागत किया;सहर्ष ही दो दिवस की अल्पावधि में पद त्याग करने कि घोषणा कि.एक ओर तो राम के राज्याभिषेक (शपथ ग्रहण समारोह) कि जोर शोर से तैय्यारियाँ आरंभ हो गयीं तो दूसरी ओर प्रधान मंत्री ने राम को सत्ता से प्रथक रखने कि साजिश शुरू की.मन्थरा को माध्यम बना कर कैकयी को आस्थगित वरदानों में इस अवसर पर प्रथम तो भरत के लिए राज्य व द्वितीय राम के लिए वनवास १४ वर्ष कि अवधि के लिए,दिलाने के लिए भड़काया,जिसमे उन्हें सफलता मिल गयी.इसप्रकार दशरथ की मौन स्वीक्रति दिलाकर राज्य की अंतिम मोहर दे कर राम-वनवास का घोषणा पात्र राम को भेंट किया.राम,सेता और लक्ष्मण को गनगा पर (राज्य कि सीमा तक) छोड़ने मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्य सुमंत (विदेश मंत्री) को भेजा गया. अब राम के राष्ट्रीय कार्य-कलापों का श्री गणेश हुआ.सर्वप्रथम तो आर्यावर्त के प्रथम डिफेंस सेण्टर प्रयाग में भरद्वाज ऋषि के आश्रम पर राम ने उस राष्ट्रीय योजना का अध्ययन किया जिसके अनुसार उन्हें रावन का वध करना था.भरद्वाज ऋषि ने राम को कूटनिति की प्रबल शिक्षा दी.क्रमशः अग्रिम डिफेंस सेंटरों (विभिन्न ऋषियों के आश्रमों) का निरिक्षण करते हुए राम ने पंचवटी में अपना दूसरा शिविर डाला जो आर्यावर्त से बाहर व-नर प्रदेश में था जिस पर रावण के मित्र बाली का प्रभाव था.चित्रकूट में राम को अंतिम सलूट दे कर पुनीत कार्य के लिए विदा दे दी गयी थी.अतः अब राम ने अस्त्र (शस्त्र भी) धारण कर लिया था .पंचवटी में रहकर उन का कार्य प्रतिपक्षी को युद्ध के लिए विवश करना था.यहाँ रहकर उन्होंने लंका के विभिन्न गुप्तचरों तथा एजेंटों का वध किया.इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर राष्ट्रद्रोही जयंत का गर्व चूर किया खर-दूषण नमक रावन के दो बंधुओं का सर्वनाश किया.सतत अपमान के समाचारों कोप प्राप्त करते-करते रावण का खून खोलने लगा उसने अपने मामा को (जो भांजे के प्रति भक्ति न रखकर स्वर्थान्ध्तावश विदेशियों के प्रति लोभ्पूर्ण आस्था रखता था) राम के पास जाने का आदेश दिया और स्वयं वायुयान द्वारा गुप्तरूप से पहुँच गया.राम को मारीच की लोभ-लोलुपता तथा षड्यंत्र की सूचना लंका स्थित उनके गुप्तचर ने बे-तार के तार से दे दी थी अतः उन्होंने मारीच को दंड देने का निश्चय किया.वह उन्हें युद्ध में काफी दूर ले गया तथा छल से लक्ष्मण को भी संग्राम में भाग लेने को विवश किया.अब रावन ने भिक्छुक के रूप में जा कर सीता को लक्ष्मण द्वारा की गयी इलेक्ट्रिक वायरिंग (लक्ष्मण रेखा) से बहार आकर दान देने के लिए विवश किया और उनका अपहरण कर विमान द्वारा लंका ले गया ।
जब राम लक्ष्मण के साथ मारीच का वध कर के लौटे तो सीता को न पाकर और संवाददाता से पूर्ण समाचार पाकर राम ने अपने को भावी लक्ष्य की पूर्ती में सफल समझा.अब उन्हें उप्निवेशाकंक्षी रावन के साम्राज्यवादी समझबूझ के विरुद्ध युद्ध छेड़ने का मार्ग तो मिल गया था,किन्तु जब तक बाली- रावण friendly aliance था लंका पर आक्रमण करना एक बड़ी मूर्खता थी,यद्ध्यापी अयोध्या में शत्रुहन के नेत्रत्व में समस्त आर्यावर्त की सेना उन की सहायता के लिए तैयार कड़ी थी.अतः बाली का पतन करना अवश्यम्भावी था.उसका अनुज सुग्रीव राज्याधिकार हस्तगत करने को लालायित था.इसलिए उसने सत्ता प्राप्त करने के पश्चात् रावन वध में सहायता करने का वचन दिया.राम ने सुग्रीव का पक्ष ले कर बाली को द्वन्द युद्ध में मार डाला क्योंकि यदि राम (अवध से सेना बुलाकर उसके राज्य पर)प्रत्यक्ष आक्रमण करते तो बाली का बल दो-गुना हो जाता.(बाली रावण friendly allaince के अनुसार केवल बाली ही नहीं,बल्कि रावण की सेना से भी भारत भू पर ही युद्ध करना पड़ता) जो किसीभी हालत में भारत के हित में न था.यह आर्यावर्त की सुरक्षा के लिए संघातक सिद्ध होता.राम को तो साम्राज्यवादियों के घर में ही उन को नष्ट करना था.उनका उद्देश्य लंका को आर्यावर्त में मिलाना नहीं था.अपितु भारतीय राष्ट्रीयता को एकता के सूत्र में आबद्ध करने के पश्चात् राम का अभीष्ट लंका में ही लंका वालों का ऐसा मंत्रिमंडल बनाना था जो आर्यावर्त के साथ  सहयोग कर सके.विभीषण तो रावन का प्रतिद्वंदी था ही,अतः राम ने उसे अपनी ओर तोड़ेने के लिए Airmarshal(पवन-सूत) हनुमान को अपना दूत बनाकर गुप्त रूप से लंका भेजा.उन्हें यह निर्देश था की यदि समझौता हो जाता है तो वह रावण के सामने अपने को अवश्य प्रकट कर देना .किन्तु हनुमान की Diplomacy यह है की उन्होंने रावण दरबार में बंदी के रूप में उपस्थित होने पर स्वयं को राम का शांती दूत बताया.इसी आधार पर विभीषण ने (जो सत्ता पिपासु हो कर भाई के प्रति विश्वासघात कर रहा था) अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक नियमों की आड़ में हनुमान को मुक्त करा दिया.परन्तु रावण के निर्देशानुसार लंका की वायु सेना ने लौट ते हुए हनुमान के यान की पूँछ पर प्रहार किया.कुशलता पूर्वक अत्मरक्षित हो कर हनुमान ने लंका में अग्नि बमों (नेयाम बमों) की वर्षा कर सेना का विध्वंस किया जिससे लंका का वैभव नष्ट हो गया तथा सैन्य शक्ति जर्जर हो गयी.रावन ने संसद ( दरबार) में विभीषण पर राजद्रोह का अभियोग लगाकर मंत्रिमंडल से निष्कासित कर दिया।
लंका को जर्जर और खोखला बनाकर राम ने जब आक्रमण किया तो इसकी घोषणा सुनते ही मौके पर विभीषण अपने समर्थकों सहित राम की शरण में चला आया.राम ने उसी समय उसे रावण का उत्तराधिकारी घोषित किया और राज्याभिषेक भी कर दिया.इस प्रकार पारस्परिक द्वेष और फूट - मतता  के कारन वैभवशाली एवं सम्रद्ध लंका साम्राज्य का पतन और रावण का अंत हुआ.लंका में विभीषण की सरकार स्थापित हुई जिसने आर्यावर्त की अधीनता तथा राम को कर देना विवशता पूर्वक स्वीकार किया.लंका को आर्यावर्त के अधीन करदाता राज्य बनाकर राम ने किसी साम्राज्य की स्थापना नहीं की बल्कि उन्होंने राष्ट्रवाद की स्थापना कर आर्यावर्त में अखिल भारतीय राष्ट्रीय एकता की सुद्द्रण नींव डाली.
सीता लंका से मुक्त हो कर स्वदेश लौटीं.इस पारकर रावण वध का एकमात्र कारन सीता हरण नहीं कहा जा सकता,बल्कि ‘रावन वध’भारतीय ऋषियों द्वारा नियोजित एवं पूर्व निर्धारित योजना थी;उसका सञ्चालन राष्ट्र के योग्य,कर्मठ एवं राजनीती निपुण कर्णधारों के हाथ में था जिसकी बागडोर कौशल-नरेश राम ने संभाली.राम के असीम त्याग,राष्ट्र-भक्ति और उच्चादर्शों के कारन ही आज हम उनका गुण गान करते हैं-मानो ईश्वर इस देश की रक्षा के लिए स्वयं ही अवतरित हुए थे।
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