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Monday, November 6, 2017

स्त्री सत्तात्मक से पुरुष सत्तात्मक समाज का विकास कैसे हुआ ? ------ विजय राजबली माथुर




आजकल विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं, फेसबुक, ब्लाग वगैरह पर कुछ महिला और कुछ पुरुष लेखकों द्वारा भी समाज के पितृ  सत्तात्मक होने व महिलाओं के दोयम दर्जे की बातें बहुतायत से देखने - पढ़ने को मिल जाती हैं। लेकिन ऐसा हुआ क्यों ? और कैसे ? इस पर कोई चर्चा नहीं मिलती है। अतः यहाँ इसी का विश्लेषण किया जा रहा है जो कि,  समाजशास्त्रीय विधि पर आधारित है । समाजशास्त्रीय विश्लेषण अनुमान विधि को अपनाता है क्योंकि प्राचीन काल के कोई भी प्रमाण आज उपलब्ध नहीं हैं। इस पद्धति में जिस प्रकार 'धुआँ देख कर आग लगने '  का अनुमान   और ' किसी गर्भिणी को देख कर संभोग होने ' का अनुमान किया जाता है  जो कि, पूर्णतया सही निकलते हैं उसी प्रकार प्राप्त संकेतों के अनुसार समाज के विकास - क्रम का अनुमान किया जाता है ।  
"अपने विकास के प्रारंभिक चरण में मानव समूहबद्ध अथवा झुंडों में ही रहता था.इस समय मनुष्य प्रायः नग्न ही रहता था,भूख लगने पर कच्चे फल फूल या पशुओं का कच्चा मांस खा कर ही जीवन निर्वाह करता था.कोई किसी की संपति (asset) न थी,समूहों का नेत्रत्व मातृसत्तात्मक  (mother oriented) था.इस अवस्था को सतयुग पूर्व पाषाण काल (stone age) तथा आदिम साम्यवाद का युग भी कहा जाता है.परिवार के सम्बन्ध में यह ‘अरस्तु’ के अनुसार ‘communism of wives’ का काल था (संभवतः इसीलिए मातृ सत्तामक समूह रहे हों).इस समय मानव को प्रकृति से कठोर संघर्ष करना पड़ता था.मानव के ह्रास –विकास की कहानी सतत संघर्षों को कहानी है......................................... महाभारत काल के बाद समाज में स्थिति बिगड़ने लगी और पौराणिक काल में ब्राह्मणों का प्रभुत्व बढ्ने के साथ - साथ नारियों की स्थिति निम्न से निम्नतर होती गई किन्तु आज स्त्रियाँ संघर्ष के जरिये  समाज में अपना खोया सम्मान प्राप्त करने में सफल हो रही हैं और विवेकवान पुरुष भी इस बात का समर्थन करने लगे हैं। आदिम अवस्था तो वापिस नहीं लौट पाएगी किन्तु केकेयी व सीता के युग को तो पुनः स्थापित किया ही जा सकता है।  "

पृथ्वी की उत्पति और जीवन - विकास : 
आज से दो अरब वर्ष पूर्व हमारी पृथ्वी और सूर्य एक थे.एस्त्रोनोमिक युग में सर्पिल,निहारिका,एवं नक्षत्रों का सूर्य से पृथक विकास हुआ.इस विकास से सूर्य के ऊपर उनका आकर्षण बल आने लगा .नक्षत्र और सूर्य अपने अपने कक्षों में रहते थे तथा ग्रह एवं नक्षत्र    सूर्य की परिक्रमा किया करते थे.एक बार पुछल तारा अपने कक्ष से सरक गया और सूर्य के आकर्षण बल से उससे टकरा गया,परिणामतः सूर्य के और दो टुकड़े चंद्रमा और पृथ्वी उससे अलग हो गए और सूर्य  की परिक्रमा करने लगे.यह सब हुआ कास्मिक युग में.ऐजोइक युग में वाह्य सतह पिघली अवस्था में,पृथ्वी का ठोस और गोला रूप विकसित होने लगा,किन्तु उसकी बाहरी सतह अर्ध ठोस थी.अब भारी वायु –मंडल बना अतः पृथ्वी की आंच –ताप कम हुई और राख जम गयी.जिससे पृथ्वी के पपडे  का निर्माण हुआ.महासमुद्रों व महाद्वीपों  की तलहटी का निर्माण तथा पर्वतों का विकास हुआ,ज्वालामुखी के विस्फोट हुए और उससे ओक्सिजन निकल कर वायुमंडल में HYDROGEN से प्रतिकृत हुई जिससे करोड़ों वर्षों तक पर्वतीय चट्टानों पर वर्षा हुई तथा जल का उदभव हुआ;जल समुद्रों व झीलों के गड्ढों में भर गया.उस समय दक्षिण भारत एक द्वीप  था तथा अरब सागर –मालाबार तट तक विस्तृत समुद्र उत्तरी भारत को ढके हुए था;लंका एक पृथक द्वीप था.किन्तु जब नागराज हिमालय पर्वत की सृष्टि हुई तब इयोजोइक युग में वर्षा के वेग के कारण  उससे ऊपर मिटटी पिघली बर्फ के साथ समुद्र तल  में एकत्र हुई और उसे पीछे हट जाना पड़ा तथा उत्तरी भारत का विकास हुआ.इसी युग में अब से लगभग तीस करोड़ वर्ष पूर्व एक कोशीय  वनस्पतियों व बीस करोड़ वर्ष पूर्व एक कोशीय  का उदभव हुआ.एक कोशिकाएं ही भ्रूण विकास के साथ समय प्रत्येक जंतु विकास की सभी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं.सबसे प्राचीन चट्टानों में जीवाश्म नहीं पाए जाते,अस्तु उस समय लार्वा थे,जीवोत्पत्ति नहीं हुई थी.उसके बाद वाली चट्टानों में (लगभग बीस करोड़ वर्ष पूर्व)प्रत्जीवों (protojoa) के अवशेष मिलते हैं अथार्त सर्व प्रथम जंतु ये ही हैं.जंतु आकस्मिक ढंग से कूद कर(ईश्वरीय प्रेरणा के कारण ) बड़े जंतु नहीं हो गए,बल्कि सरलतम रूपों का प्रादुर्भाव हुआ है जिन के मध्य हजारों माध्यमिक तिरोहित कड़ियाँ हैं.मछलियों से उभय जीवी (AMFIBIAN) उभय जीवी से सर्पक (reptile) तथा सर्पकों से पक्षी (birds) और स्तनधारी (mamals) धीरे-धीरे विकास कर सके हैं.तब कहीं जा कर सैकोजोइक युग में मानव उत्पत्ति हुई। 
(यह उपरोक्त गणना आधुनिक विज्ञान क़े आधार पर है,परतु  वस्तुतः अब से दस लाख वर्ष पूर्व मानव की उत्पत्ति तिब्बत ,मध्य एशिया और अफ्रीका में एक साथ युवा पुरुष - युवा महिला क़े रूप में हुई)। आधुनिक विज्ञान के दृष्टिकोण में   पहला अंडा या पहले मुर्गी  वाला विवाद  मनुष्यों के संबंध में भी अनसुलझा है। आर्य = आर्ष = श्रेष्ठ  गणना  के अनुसार पहले -पहल  युवा 'पुरुष ' और 'युवा स्त्री ' की सृष्टि की बात युक्तिसंगत है क्योंकि युवा नर - नारी ही प्रजनन करने में सक्षम हो सकते हैं। इसी प्रकार अन्य पशु , पक्षी आदि प्राण धारियों की भी पहले - पहल युवा रूप में ही सृष्टि हुई होगी। इन आदि युवाओं की ही सन्तानें हैं आज का यह संसार। 

अपने विकास के प्रारंभिक चरण में मानव समूहबद्ध अथवा झुंडों में ही रहता था.इस समय मनुष्य प्रायः नग्न ही रहता था,भूख लगने पर कच्चे फल फूल या पशुओं का कच्चा मांस खा कर ही जीवन निर्वाह करता था.कोई किसी की संपति (asset) न थी,समूहों का नेत्रत्व मातृसत्तात्मक  (mother oriented) था. संतति की पहचान  सिर्फ माता से होती थी । किस संतान का पिता कौन है इस तथ्य को केवल माता ही जानती थी। उस समय जनसंख्या वृद्धि ही लक्ष्य था अतः स्त्री इस प्रजनन संबंध में ही पूर्ण स्वतंत्र न थी बल्कि परिवार व समाज पर भी स्त्रियॉं ही का नियंत्रण था।  इस अवस्था को सतयुग पूर्व पाषाण काल (stone age) तथा आदिम साम्यवाद का युग भी कहा जाता है.परिवार के सम्बन्ध में यह ‘अरस्तु’ के अनुसार ‘communism of wives’ का काल था (संभवतः इसीलिए मातृ सत्तामक समूह रहे हों).इस समय मानव को प्रकृति से कठोर संघर्ष करना पड़ता था.मानव के ह्रास –विकास की कहानी सतत संघर्षों की  कहानी है.malthas - माल्थस  के अनुसार उत्पन्न संतानों में आहार ,आवास,तथा प्रजनन के अवसरों के लिए –‘जीवन के लिए संघर्ष’ हुआ करता है जिसमे प्रिंस डी लेमार्क के अनुसार ‘व्यवहार तथा अव्यवहार’ के सिद्दंतानुसार ‘योग्यता ही जीवित रहती है’.अथार्त जहाँ प्रकृति ने उसे राह दी वहीँ वह आगे बढ़ गया और जहाँ प्रकृति की विषमताओं ने रोका वहीँ रुक गया.कालांतर में तेज बुद्धि मनुष्य ने पत्थर और काष्ठ के उपकरणों तथा शस्त्रों का अविष्कार किया तथा जीवन पद्धति को और सरल बना लिया.इसे ‘उत्तर पाषाण काल’ की संज्ञा दी गयी.पत्थरों के घर्षण से अग्नि का अविष्कार हुआ और मांस को भून कर खाया जाने लगा. शिकार की तलाश और जल की उपलब्धता के आधार पर इन समूहों को परिभ्रमण करना होता था जिस क्रम में एक स्थान या जलाशय पर नियंत्रण हेतु इन समूहों में परस्पर संघर्ष होने लगे। अपनी शारीरिक संरचना के कारण संघर्ष - युद्धों में स्त्री- नारी - महिला कमजोर पड़ने लगी और बलिष्ठ होने के कारण पुरुषों का प्रभुत्व बढ्ने लगा। अब धीरे - धीरे परिवार व समाज में भी पुरुष वर्चस्व स्थापित होता गया और परिस्थितियों के चलते स्त्री ने भी इसे स्वेच्छा से स्वीकार कर लिया। अब परिवार की पहचान स्त्री के बजाए पुरुष से होने के कारण संतान की पहचान भी माँ के बजाए पिता से होने लगी। इसी अवस्था से समाज पुरुष - प्रधान होता चला गया है। 
धीरे धीरे मनुष्य ने देखा की फल खा कर फेके गए बीज किस प्रकार अंकुरित होकर विशाल वृक्ष का आकार ग्रहण कर लेते हैं.एतदर्थ उपयोगी पशुओं को अपना दास बनाकर मनुष्य कृषि करने लगा. कृषि के आविष्कार के कारण स्थाई रूप से निवास भी करने लगा।उत्पादित फसलों के आदान - प्रदान से समाज का निर्वहन होने लगा।  
यहाँ विशेष स्मरणीय तथ्य यह है की जहाँ कृषि उपयोगी सुविधाओं का आभाव रहा वहां का जीवन पूर्ववत ही था यत्र - तत्र पाये जाने वाले आदिवासी समाज इसका उदाहरण हैं परंतु उनमें से भी अधिकांश आज पुरुष - प्रधान हो गए हैं।  इस दृष्टि से गंगा-यमुना का दोआबा विशेष लाभदायक रहा और यहाँ उच्च कोटि की सभ्यता का विकास हुआ जो आर्य सभ्यता कहलाती है और यह क्षेत्र आर्यावर्त.कालांतर में यह समूह  सभ्य,सुसंगठित व सुशिक्षित होता  गया . व्यापर कला-कौशल और दर्शन में भी ये सभ्य थे । इनकी सभ्यता और संस्कृति तथा नागरिक जीवन एक उच्च कोटि के आदर्श थे.भारतीय इतिहास में यह काल ‘त्रेता युग’ कें नाम से जाना जाता है और इस का समय ६५०० इ. पू.  आँका गया है(यह गणना आधुनिक गणकों की है,परन्तु अब से लगभग नौ लाख वर्ष पूर्व राम का काल आंका गया है तो त्रेता युग  भी उतना ही पुराना होगा) .आर्यजन काफी विद्वान थे.उन्होंने अपनी आर्य सभ्यता और संस्कृति का व्यापक प्रसार किया.इस प्रकार आर्य अर्थात  भारतीय सभ्यता संस्कृति गंगा-सरस्वती के तट से पश्चिम की और फैली. आर्यों ने सिन्धु नदी की घाटी में एक सुद्रढ़ एवं सुगठित सभ्यता का विकास किया.यही नहीं आर्य भूमि से स्वाहा और स्वधा के मन्त्र पूर्व की और भी फैले तथा आर्यों के संस्कृतिक प्रभाव से ही इसी समय नील और हवांग हो की घाटियों में भी समरूप सभ्यताओं का विकास हो सका.
भारत से आर्यों की एक शाखा पूर्व में कोहिमा के मार्ग से चीन,जापान होते हुए अलास्का के रास्ते  राकी पर्वत श्रेणियों में पहुच कर पाताल लोक(वर्तमान अमेरिका महाद्वीपों ) में अपनी संस्कृति एवं साम्राज्य बनाने में समर्थ हुई.मय ऋषि के नेत्रतव में मयक्षिको (मेक्सिको) तथा तक्षक ऋषि के नेत्रत्व में तकसास  (टेक्सास) के आर्य उपनिवेश विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं कालांतर में कोलंबस द्वारा नयी दुनिया की खोज के बाद इन के वंशजों को red indians  - रेड इंडियंस कहकर निर्ममता से नष्ट किया गया.

पश्चिम की ओर  हिन्दुकुश पर्वतमाला को पार कर आर्य जाति  आर्य नगर (ऐर्यान-ईरान) में प्रविष्ट हुई.कालांतर में यहाँ के प्रवासी आर्य,अ-सुर (सुरा न पीने के कारण) कहलाये.दुर्गम मार्ग की कठिनाइयों के कारण  इनका अपनी मातृ भूमि  आर्यावर्त से संचार –संपर्क टूट सा गया,यही हाल धुर-पश्चिम -जर्मनी आदि में गए प्रवासी आर्यों का हुआ.एतदर्थ प्रभुसत्ता को लेकर निकटवर्ती  प्रवासी-अ-सुर आर्यों से गंगा-सिन्धु के मूल आर्यों का दीर्घकालीन भीषण देवासुर संग्राम हुआ.हिन्दुकुश से सिन्धु तक भारतीय आर्यों का  नेतृत्व  एक कुशल सेनानी इंद्र कर रहा था.यह विद्युत्  शास्त्र का प्रकांड विद्वान और हाईड्रोजन  बम का अविष्कारक था.इसके पास बर्फीली गैसें थीं.इसने युद्ध में सिन्धु-क्षेत्र  में असुरों को परास्त  किया,नदियों के बांध तोड़ दिए,निरीह गाँव में आग लगा दी और समस्त प्रदेश को पुरंदर (लूट) लिया.यद्यपि इस युद्ध में अंतिम विजय मूल भारतीय आर्यों की ही हुई और सभी प्रवासी(अ-सुर) आर्य  परांग्मुख हुए.परन्तु सिन्धु घाटी के आर्यों को भी भीषण नुकसान हुआ।


आर्यों ने दक्षिण और सुदूर दक्षिण पूर्व की अनार्य जातियों में भी सांस्कृतिक  प्रसार किया.आस्ट्रेलिया (मूल द्रविड़ प्रदेश) में जाने वाले सांस्कृतिक  दल का नेतृत्व  पुलस्त्य मुनि कर रहे थे.उन्होंने आस्ट्रेलिया में एक राज्य की स्थापना की (आस्ट्रेलिया की मूल जाति  द्रविड़ उखड कर पश्चिम की और अग्रसर हुई तथा भारत के दक्षिणी -समुद्र तटीय निर्जन भाग पर बस गयी.समुद्र तटीय जाति  होने के कारण ये-निषाद जल मार्ग से व्यापार  करने लगे,पश्चिम के सिन्धी आर्यों से इनके घनिष्ठ व्यापारिक सम्बन्ध हो गए.) तथा लंका आदि द्वीपों से अच्छे व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित कर लिए उनकी मृत्यु के पश्चात् राजा  बनने  पर उन के पुत्र विश्र्व मुनि की गिद्ध दृष्टि लंका के वैभव की ओर गयी.उसने लंका पर आक्रमण किया और राजा  सोमाली को हराकर भगा दिया(सोमाली भागकर आस्ट्रेलिया के निकट एक निर्जन  द्वीप पर बस गया जो  उसी के नाम पर सोमालिया कहलाता है.)इस साम्राज्यवादी लंकेश्वर के तीन पुत्र थे-कुबेर,रावण,और विभीषण -ये तीनों परस्पर सौतेले भाई थे.पिता की म्रत्यु के पश्चात् तीनों में गद्दी के लिए संघर्ष हुआ.अंत में रावण को सफलता मिली.(आर्यावर्त से परे दक्षिण के ये आर्य स्वयं को रक्षस - राक्षस अथार्त आर्यावर्त और आर्य संस्कृति की रक्षा करने वाले ,कहते थे;परन्तु रावण मूल आर्यों की भांति सुरा न पीकर मदिरा का सेवन करता था इसलिए  वह भी अ-सुर अथार्त सुरा  न पीने वाला कहलाया)। 

लंका के रावण ने  पाताल ( वर्तमान यू एस ए ) के ऐरावण और  साईबेरिया के कुंभकरण के साथ मिल कर सम्पूर्ण विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित करने के  बाद आर्यावृत को भी अपने आधिपत्य में लेना चाहा।किन्तु राष्ट्र वादी केकेयी कूटनीतिज्ञ सीता जैसी विदुषी नारियों की सूझ  - बूझ व सहयोग से राम ने रावण के साम्राज्य को ध्वस्त कर दिया था। तब तक समाज में नारियों का मान - सम्मान कायम था। महाभारत काल के बाद समाज में स्थिति बिगड़ने लगी और पौराणिक काल में ब्राह्मणों का प्रभुत्व बढ्ने के साथ - साथ नारियों की स्थिति निम्न से निम्नतर होती गई किन्तु आज स्त्रियाँ संघर्ष के जरिये  समाज में अपना खोया सम्मान प्राप्त करने में सफल हो रही हैं और विवेकवान पुरुष भी इस बात का समर्थन करने लगे हैं। आदिम अवस्था तो वापिस नहीं लौट पाएगी किन्तु केकेयी व सीता के युग को तो पुनः स्थापित किया ही जा सकता है।  









~विजय राजबली माथुर ©

Friday, December 5, 2014

साम्राज्यवाद हितैषी सांप्रदायिकता पर इस तरह फतह कैसे हासिल करेंगे? --- विजय राजबली माथुर

वास्तविकता तो यह है कि 'आर्य ' न तो कोई जाति है न ही नस्ल या धर्म। आर्य शब्द 'आर्ष' का पर्यायवाची है जिसका अर्थ है-'श्रेष्ठ' अर्थात 'श्रेष्ठ कर्म' करने वाले सभी मनुष्य आर्य हैं चाहें वे जिस भी क्षेत्र के हों ,नस्ल के हों या मजहब/संप्रदाय/रिलीजन को मानते हों। यह तो पाश्चात्य साम्राज्यवादियो का षड्यंत्र है कि आर्य को एक नस्ल या जाति और मध्य यूरोप का वासी तथा भारत पर आक्रांता घोषित कर दिया और इसी धारणा को ही सही मानते हुये ' मूलनिवासी आंदोलन' चल पड़ा है। कंवल भारती जी का यह निष्कर्ष सही है कि सभी मनुष्य एक ही जैसे हैं।





 https://www.facebook.com/kanwal.bharti/posts/4283947354149

फिरकापरस्तों के हवाले वतन साथियो
(कँवल भारती)
मुरादाबाद के कांठ में जनता और पुलिस के संघर्ष से बचा जा सकता था. किन्तु, जिला प्रशासन ने मुजफ्फरनगर के दंगों से भी कोई सबक नहीं लिया और सरकार की मंशा के अनुरूप एक गुट को खुश करने के लिए दूसरे गुट के खिलाफ कार्यवाही करके पूरी फिजा बिगाड़ दी. प्रशासन को तब तो और भी सावधानी बरतनी चाहिए थी, जब उसे पता था कि हिन्दू-मुस्लिम की दृष्टि से मुरादाबाद एक संवेदनशील जिला है, जहाँ पहले भी कई सांप्रदायिक संघर्ष हो चुके हैं. क्या जरूरत थी जिला प्रशासन को अकबरपुर चैदरी गाँव में मन्दिर से लाउडस्पीकर उतारने की? क्या लाउडस्पीकर उतारने का यह काम पुलिस ने मुस्लिम गुट को खुश करने के लिए नहीं किया था? प्रशासन के इसी कारनामे ने कांठ में भाजपा के नेतृत्व वाले हिन्दू संगठनों को उत्तेजित-आन्दोलित करने का काम किया. जब संविधान ने सेकुलरिज्म के अंतर्गत हर धर्म के समुदाय को अपनी आस्था के अनुसार पूजा-उपासना करने का अधिकार दिया है, तो प्रशासन इसके खिलाफ क्यों गया? चैदरी गाँव में मन्दिर पर लगाया लाउडस्पीकर कोई अनोखी घटना नहीं थी, बल्कि यह बहुप्रचलित परम्परा है. भारत में कौन सा धार्मिक स्थल ऐसा है, जिस पर लाउडस्पीकर न लगा हो? यह वह देश है, जहाँ लाउडस्पीकर के बिना न मन्दिर में आरती होती है, न मस्जिद में अजान और न गुरूद्वारे में पाठ. रात-रात भर चलने वाले देवी-जागरण और मजलिशों पर क्या लाउडस्पीकर की पाबन्दी आयद होती है? क्या ये लाउडस्पीकर दूसरे गुटों के लिए परेशानी पैदा नहीं करते हैं? लेकिन न कोई शिकायत करता है और न प्रशासन उन्हें उतारता है, क्योंकि मामला धर्म से जुड़ा होता है और संवेदनशील होता है. पर जिस तरह जिला प्रशासन ने अकबरपुर चैदरी गाँव में मन्दिर से लाउडस्पीकर उतारने में दिलचस्पी दिखाई, वह मुझे कहीं से भी प्रशासनिक कार्यवाही नहीं लगती. उसके पीछे जरूर कोई सियासी मकसद नजर आता है. कहा जा रहा है कि इसके पीछे सपा विधायक का दलित-द्वेष था. वह दलितों का मन्दिर था, जिससे लाउडस्पीकर उतारा गया था. और सुना है कि चैदरी गाँव के दलित लोकसभा के चुनावों में सपा के पक्ष में नहीं थे. सपा विधायक ने सोचा होगा कि दलितों में कहाँ इतनी हिम्मत है कि वे सपा-सरकार से टक्कर लेंगे, सो उन्होंने अपने दबाव से दलित-मन्दिर से लाउडस्पीकर उतरवा दिया. पर वे यह भूल गये कि ऐसे ही मामलों में भाजपा की हिन्दू-अस्मिता जागृत हो जाती है. जो दलित उसके सामाजिक अजेंडे में नहीं होते, वे उसके राजनीतिक अजेंडे में सबसे ऊपर होते हैं. इसलिए यह समझने की जरूरत है कि भले ही सपा-सरकार में दलितों की लड़ने की हिम्मत नहीं है, पर जिस तरह धर्म के सवाल पर हिन्दू संगठनों ने उन्हें हिन्दू चेतना से जोड़ने में जरा भी देर नहीं लगायी, उससे यह जरूर साबित हो गया है कि दलित हिंदुत्व के नाम पर भाजपा के साथ खड़े हो गये हैं. अत: कहना न होगा कि प्रशासन की एक गलती से एक ही झटके में दो काम हो गये—(1) भाजपा की हिन्दू राजनीति को दलितों का साथ मिल गया और (2) भाजपा यह सन्देश देने में कामयाब हो गयी कि सपा-सरकार हिन्दू-विरोधी है, जो मुसलमानों को खुश करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है. क्या मुरादाबाद का सपा-नेतृत्व भी यही चाहता था कि राजनीति हिन्दू-मुस्लिम के बीच (दूसरे शब्दों में फिरकापरस्त ताकतों के बीच) में विभाजित हो जाये, ताकि सपा को लाभ मिले? इस सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि लोकसभा के नतीजों के बाद सपा हाई कमान को मुसलमानों का ही एकमात्र सहारा रह गया है, हिन्दू वोट तो उससे अलग हो ही गया है, उसका अपना पिछड़ा वोट भी खिसक गया है.
आज सपा और भाजपा भले ही कांठ के संघर्ष में अपने राजनीतिक फायदे देख रही हों, पर यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है कि मुरादाबाद में फिरकापरस्त ताकतें फिर से जिंदा हो रही हैं.
(5 जुलाई 2014)
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 वस्तुतः 'शिव धनुष' वह मिसाईल था जो कि धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पर आधारित था और इसीलिए कोई भी उसे बिना चुम्बकीय चाबी (मेग्नेटिक रिंग) के हिला तक नहीं सकता था जिसे ऋषियों ने सिर्फ सीता को ही सौंपा था और उसे सीता ने 'पुष्प वाटिका' में राम को हस्तांतरित कर दिया था जिसके जरिये राम ने उस शिव-धनुष अर्थात मेग्नेटिक मिसाईल को उठा कर डिफ्यूज - निष्क्रिय कर दिया था। ढ़ोंगी-पाखंडी-पोंगापंथियों ने विदेशी शासकों को खुश करने के लिए सीता द्वारा झाड़ू लगाने की मनगढ़ंत बात लिख दी तो क्या हमें मान लेना चाहिए कि एक राजकुमारी झाड़ू लगाती थी? हम 'मनुष्य ' हैं अतः 'मनन' द्वारा हमें सच्चाई ज्ञात करके सबको बताना ही चाहिए। लेकिन हो क्या रहा है:
04 Dec. 2014 :


'शास्त्रों' से यदि अभिप्राय 'पुराणों ' से है तो वे शोषकों/उतपीडकों के हित मे सत्ताधीशों द्वारा विद्वानों को खरीद कर लिखवाये गए हैं अतः उन में जन-विरोधी बातें होना स्वभाविक है। उन पर विश्वास करना घातक है। साम्राज्यवाद हितैषी सांप्रदायिकता पर इस तरीके से फतह नहीं हासिल हो पाएगी। उसके लिए विषद विवेचन व अध्यन का आश्रय लेकर ही मुक़ाबला किया जा सकता है 'हास्य तीरों' से नहीं। ढोंगवाद से जनता को 'मुक्त' करने के लिए जनता को समझाना होगा कि लुटेरे पोंगा-पंडित जनता को गुमराह कर रहे हैं और जनता को 'रामायण पाठ',भागवत पाठ,देवी जागरण आदि में भाग न लेने के लिए तैयार करना होगा जिसके लिए वैज्ञानिक व्याख्या समझाना होगा । 'व्यंग्य' का सहारा लेकर  अथवा विवेक हीन  विरोध कर आप जनता को अपने पीछे लामबंद नहीं कर सकते।

'एकला चलो रे' के सिद्धान्त पर मैंने पूर्व लेखों द्वारा वैज्ञानिक विश्लेषण उपलब्ध कराये हैं जिनको विद्वजन इसलिए नहीं स्वीकार कर सकते क्योंकि मैं कोई मशहूर हस्ती नहीं हूँ।  

Monday, August 20, 2012

वैज्ञानिक परम्पराएँ-वेद और हवन

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Monday, August 20, 2012

वैज्ञानिक परम्पराएँ-वेद और हवन

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  ~विजय राजबली माथुर ©
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Saturday, April 30, 2011

सीता की कूटनीति का कमाल ------ विजय राजबली माथुर

रामभक्त भटक गए हैं 

स्वाधीनता पूर्व जब महात्मा गांधी ने रामराज्य का स्वप्न देखा था तो देश में साम्राज्यवाद विरोधी लहर चल रही थी और विदेशी साम्राज्यवादियों से टक्कर लेने के संघर्ष में बापू को राम एक 'आदर्श क्रांतिकारी' के रूप में दिखाई दिए थे.इसीलिये उन्होंने स्वाधीन भारत में राम के शासन जैसी जनवादी व्यवस्था की कल्पना की थी.लेकिन यह दुर्भाग्य ही है कि,स्वाधीनता के तुरन्त बाद साम्राज्यवादियों के पिट्ठू नाथूराम गोडसे द्वारा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को हमसे छीन लिया गया और इसी के साथ ही बापू के रामराज्य का स्वप्न मात्र स्वप्न ही रह गया.आज आजादी के ६३ वर्ष बाद भी साम्राज्यवादी शक्तियां अपने प्रतिनिधियों (आर.एस.एस.,वि.हि.प.-जिसे फोर्ड फौन्डेशन ने अपनी बैलेंस शीट में दिखाते हुए भारी चन्दा दिया है और उनके सहयोगी संगठन)के माध्यम से राम के नाम पर अपना शोषण-कारी खेल खेल रही हैं.जाने या अनजाने भारत की धर्म-प्राण जनता 'राम के साम्राज्यवाद विरोधी क्रांतिकारिता 'को भुला कर राम के नाम का साम्राज्यवादियों के हितचिंतकों द्वारा दुरूपयोग होना बर्दाश्त कर रही है.यह हमारे देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है कि,भारत को एकता के सूत्र में आबद्ध करने वाले राम का नाम भारत को तोड़ने की साजिश में घसीटा जा रहा है.

आज के बदले हुए विश्व में साम्राज्यवादी शक्तियां भारत को प्रत्यक्ष रूप से अपने प्रभाव में नहीं ला सकतीं  ,इसीलिये ये ताकतें हमारे देश की विभाजनकारी एवं विखंडनकारी शक्तियों को जिन्होंने रामजन्म भूमि का थोथा शिगूफा छोड़ रखा है,को मोहरा बना कर भारत की एकता व अखंडता पर कुठारा घात कर रही हैं.अतः हमारा राष्ट्र-हित में कर्तव्य है कि हम आप को राम की सहयोगी और अर्धांग्नी सीता जी द्वारा राष्ट्र-हित में किये गए त्याग,बलिदान और तप से परिचित कराएं और यह अपेक्षा करते हैं कि आज फिर उसी जोशो-खरोश से साम्राज्यवादी शक्तियों को शिकस्त दें जैसे सीता जी ने रावण को परास्त करने में राम के कंधे से कंधा मिलाकर किया था.

सीता -संक्षिप्त परिचय 

जैसा कि 'रावण वध एक पूर्व निर्धारित योजना' में पहले ही उल्लेख हो चुका है-राम के आविर्भाव के समय भारत-भू छोटे -छोटे राज्यों में विभक्त होकर परस्पर संघर्ष शील शासकों का अखाड़ा बनी हुयी थी.दूसरी और  रावण के नेतृत्व में साम्राज्यवादी शक्तियां भारत को दबोचने के प्रयास में संलग्न थीं.अवकाश प्राप्त शासक मुनि विश्वमित्र जी जो महान वैज्ञानिक भी थे और जो अपनी प्रयोग शाला में 'त्रिशंकू' नामक कृत्रिम उपग्रह (सेटेलाईट)को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित  कर चुके थे जो कि आज भी अपनी कक्षा (ऑर्बिट) में ज्यों का त्यों परिक्रमा कर रहा है जिससे  हम 'त्रिशंकू तारा' के नाम से परिचित हैं. विश्वमित्र जी केवल ब्रह्माण्ड (खगोल) विशेषज्ञ ही नहीं थे वह जीव-विज्ञानी भी थे.उनकी प्रयोगशाला में गोरैया चिड़िया -चिरौंटा  तथा नारियल वृक्ष का कृत्रिम रूप से सृजन करके इस धरती पर सफल   परीक्षण किया जा चुका था .ऐसे ब्रह्मर्षि विश्वमित्र ने विद्वान का वीर्य और विदुषी का रज (ऋषियों का रक्त)लेकर परखनली (टेस्ट ट्यूब) के माध्यम से एक कन्या को अपनी प्रयोगशाला में उत्पन्न किया जोकि,'सीता'नाम से जनक की दत्तक पुत्री बनवा दी गयीं.

वीरांगना-विदुषी सीता 

जनक जो एक सफल वैज्ञानिक भी थे सीता को भी उतना ही वैज्ञानिक और वीर बनाना चाहते थे और इस उद्देश्य में पूर्ण सफल भी रहे.सीता ने यथोचित रूप से सम्पूर्ण शिक्षा ग्रहण की तथा उसे आत्मसात भी किया.उनके वयस्क होने पर मैग्नेटिक मिसाईल (शिव-धनुष) की मैग्नेटिक चाभी एक अंगूठी में मड़वा कर उन्हें दे दी गयी जिसे उन्होंने ऋषियों की योजनानुसार पुष्पवाटिका में विश्वमित्र के शिष्य के रूप में पधारे दशरथ-पुत्र राम को सप्रेम -भेंट कर दिया और जिसके प्रयोग से राम ने उस मैग्नेटिक मिसाईल उर्फ़ शिव-धनुष को उठा कर नष्ट (डिफ्यूज ) कर दिया ,जिससे कि इस भारत की धरती पर उसके युद्धक प्रयोग से होने वाले विनाश से बचा जा सका.इस प्रकार हुआ सीता और राम का विवाह उत्तरी भारत के दो दुश्मनों को सगी रिश्तेदारी में बदल कर जनता के लिए  वरदान के रूप में आया क्योंकि अब संघर्ष प्रेम में बदल दिया गया था.

दूरदर्शी कूटनीतिज्ञ सीता 

सीता एक योग्य पुत्री,पत्नी,भाभी आदि होने के साथ-साथ जबरदस्त कूट्नीतिग्य भी थीं.इसलिए जब राष्ट्र -हित में राम-वनवास हुआ तो वह भी राम के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चल दीं.वस्तुतः साम्राज्यवाद को अस्त्र-शस्त्र की ताकत से नहीं कूट-नीति के कमाल से परास्त किया जा सकता था और यही कार्य सीता ने किया.सीता वन में रह कर आमजनों के बीच घुल मिल कर तथ्यों का पता लगातीं थीं और राम  के  साथ  मिल  कर  आगे  की नीति निर्धारित करने में पूर्ण सहयोग देतीं थीं.रावण के बाणिज्य-दूतों (खर-दूषण ) द्वारा खुफिया जानकारियाँ हासिल करने के प्रयासों के कारण सीता जी ने उनका संहार करवाया.रावण की बहन-सम प्रिय जासूस स्वर्ण-नखा (जिसे विकृत रूप में सूपनखा कहा जाता है ) को अपमानित करवाने में सीता जी की ही उक्ति काम कर रही थी .इसी घटना को सूपनखा की नाक  काटना एक मुहावरे के रूप में कहा जाता है.स्वर्ण-नखा का अपमान करने का उद्देश्य रावण को सामने लाना और बदले की कारवाई के लिए उकसाना था जिसमें सीता जी सफल रहीं.रावण अपने गुप्तचर मुखिया मारीची पर बहुत नाज करता था और मान-सम्मान भी देता था  इसी लिए उसे रावण का मामा कहा जाता है.मारीची और रावण दोनों वेश बदल कर यह पता लगाने आये कि,राम कौन हैं ,उनका उद्देश्य क्या है?वह वनवास में हैं तो रावण  के गुप्तचरों का संहार क्यों कर रहे हैं ?वह वन में क्या कर रहे हैं?.

राम और सीता ने रावण के सामने आने पर एक गंभीर व्यूह -रचना की और उसमें रावण को फंसना ही पडा.वेश बदले रावण के ख़ुफ़िया -मुखिया मारीची को काफी दूर दौड़ा कर और रावण की पहुँच से बाहर हो जाने पर मार डाला और लक्ष्मण को भी वहीं सीता जी द्वारा भेज दिया गया.निराश और हताश रावण ने राम को अपने सामने लाने हेतु छल से सीता को अपने साथ लंका ले जाने का उपक्रम किया लेकिन वह अनभिग्य था कि,यही तो राम खुद चाहते थे कि वह सीता को लंका ले जाए तो सीता वहां से अपने वायरलेस (जो उनकी अंगूठी में फिट था) से लंका की गोपनीय जानकारियाँ जुटा -जुटा कर राम को भेजती रहें.

सीता जी ने रावण को गुमराह करने एवं राम को गमन-मार्ग का संकेत देने हेतु प्रतीक रूप में कुछ गहने विमान से गिरा दिए थे.बाली के अवकाश प्राप्त एयर मार्शल जटायु ने रावण के विमान पर इसलिए प्रहार करना चाहा होगा कि वह किस महिला को बगैर किसी सूचना के अपने साथ ले जा रहा है.चूंकि वह रावण के मित्र बाली की वायु सेना से सम्बंधित था अतः रावण ने केवल उसके विमान को क्षति पहुंचाई और उसे घायलावस्था में छोड़ कर चला गया.जटायु से सम्पूर्ण वृत्तांत सुन कर राम ने सुग्रीव से मित्रता कर ली और उद्भट विद्वान एवं उपेक्षित वायु-सेना अधिकारी हनुमान  को पूर्ण मान -सम्मान दिया.दोनों ने राम को सहायता एवं समर्थन का ठोस आश्वासन दिया जिसे समय के साथ -साथ पूर्ण भी किया.राम ने भी रावण के सन्धि- मित्र बाली का संहार कर सुग्रीव को सत्तासीन करा दिया. हनुमान अब प्रधान वायु सेनापति (चीफ एयर मार्शल) बना दिए गए जो कि कूटनीति के भी विशेषज्ञ थे.

सीता द्वारा भेजी लंका की गुप्त सूचनाओं के आधार पर राम ने हनुमान को पूर्ण विशवास में लेकर लंका के गुप्त मिशन पर भेजा.हनुमान जी ने लंका की सीमा में प्रवेश अपने विमान को इतना नीचे उड़ा कर किया जिससे वह समुद्र में लगे राडार 'सुरसा'कीपकड़ से बचे रहे ,इतना ही नहीं उन्होंने 'सुरसा'राडार को नष्ट भी कर दिया जिससे आने वाले समय में हमलावर विमानों की खबर तक रावण को न मिल सके.

लंका में प्रवेश करके हनुमान जी ने सबसे पहले सीता जी से भेंट की तथा गोपनीय सूचनाओं का आदान-प्रदान किया और सीता जी के परामर्श पर रावण के सबसे छोटे भाई विभीषण जो उससे असंतुष्ट था ही से संपर्क साधा और राम की तरफ से उसे पूर्ण सहायता तथा समर्थन का ठोस आश्वासन भी प्रदान कर दिया.अपने उद्देश्य में सफल होकर उन्होंने सीता जी को सम्पूर्ण वृत्तांत की सूचना दे दी.सीता जी से अनुमति लेकर हनुमान जी ने रावण के कोषागारों एवं शस्त्रागारों पर अग्नि-बमों (नेपाम बम) की वर्षा कर डाली.खजाना और हथियार नष्ट कर के गूढ़ कूटनीति के तहत और सीता जी के आशीर्वाद से उन्होंने अपने को रावण की सेना द्वारा गिरफ्तार करा लिया और दरबार में रावण के समक्ष पेश होने पर खुद को शांति-दूत बताया जिसका विभीषण ने भी समर्थन किया और उन्हें अंतरष्ट्रीय  कूटनीति के तहत छोड़ने का प्रस्ताव रखा.अंततः रावण को मानना ही पडा. परन्तु लौटते हुए हनुमान के विमान  की पूँछ पर संघातक प्रहार भी करवा दिया.हनुमान जी तो साथ लाये गए स्टैंड बाई छोटे विमान से वापिस लौट आये और बदली हुयी परिस्थितियों में सीता जी से उनकी अंगूठी में जडित वायरलेस भी वापिस लेते गए.

विभीषण ने शांति-दूत हनुमान के विमान पर प्रहार को मुद्दा बना कर रावण के विदेश मंत्री पद को त्याग दिया और खुल कर राम के साथ आ गया.सीता जी का लंका प्रवास सफल रहा -अब रावण की फ़ौज और खजाना दोनों खोखले  हो चुके थे,उसका भाई अपने समर्थकों के साथ उसके विरुद्ध राम के साथ आ चुका था.अब लंका पर राम का आक्रमण एक औपचारिकता मात्र रह गया था फिर भी शांति के अंतिम प्रयास के रूप में रावण के मित्र बाली के पुत्र अंगद को दूत बना कर भेजा गया. रावण ने समपर्ण की अपेक्षा वीर-गति प्राप्त करना उपयुक्त समझा और युद्ध में तय पराजय का वरण किया.

इस प्रकार महान कूटनीतिज्ञ सीता जी के कमाल की सूझ-बूझ ने राम को साम्राज्यवादी रावण के गढ़ में ही उसे परास्त करने का मार्ग प्रशस्त किया. आज फिर आवश्यकता है एक और सीता एवं एक और राम की जो साम्राज्यवाद के जाल को काट कर विश्व की कोटि-कोटि जनता को शोषण तथा उत्पीडन से मुक्त करा सकें.जब तक राम की वीर गाथा रहेगी सीता जी की कूटनीति को भुलाया नहीं जा सकेगा.
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Saturday, October 16, 2010

क्रांतिकारी राम- (अंतिम भाग) ---विजय राजबली माथुर

पिछली पोस्ट से आगे.....
(फोटो साभार:गूगल)
साम्राज्यवादी -विस्तारवादी रावण के परम मित्र  बाली को उसके विद्रोही भाई  सुग्रीव की मदद से समाप्त  कर के राम ने अप्रत्यक्ष रूप से साम्राज्यवादियों की शक्ति को कमजोर कर दिया.इसी प्रकार रावण के विद्रोही भाई विभीषण से भी मित्रता स्थापित कर के और एयर मार्शल (वायुनर उर्फ़ वानर) हनुमान के माध्यम से साम्राज्यवादी रावण की सेना व खजाना अग्निबमों से नष्ट करा दिया.अंत में जब राम के नेतृत्व में राष्ट्रवादी शक्तियों और रावण की साम्राज्यवाद समर्थक शक्तियों में खुला युद्ध हुआ तो साम्राज्यवादियों की करारी हार हुई क्योंकि,कूटनीतिक चतुराई से साम्राज्यवादियों को पहले ही खोखला किया जा चुका था.जहाँ तक नैतिक दृष्टिकोण का सवाल है सूपर्णखा का अंग भंग कराना,बाली की विधवा का अपने देवर सुग्रीव से और रावण की विधवा का विभीषण से विवाह कराना* तर्कसंगत नहीं दीखता.परन्तु चूँकि ऐसा करना साम्राज्यवाद का सफाया कराने के लिए वांछित था अतः राम के इन कृत्यों पर उंगली नहीं उठायी जा सकती है.

अयोध्या लौटकर राम ने भारी प्रशासनिक फेरबदल करते हुए पुराने प्रधानमंत्री वशिष्ठ ,विदेश मंत्री सुमंत आदि जो काफी कुशल और योग्य थे और जिनका जनता में काफी सम्मान था अपने अपने पदों से हटा दिया गया.इनके स्थान पर भरत को प्रधान मंत्री,शत्रुहन को विदेश मंत्री,लक्ष्मण को रक्षा मंत्री और हनुमान को प्रधान सेनापति नियुक्त किया गया.ये सभी योग्य होते हुए भी राम के प्रति व्यक्तिगत रूप से वफादार थे इसलिए राम शासन में निरंतर निरंकुश होते चले गए.अब एक बार फिर अपदस्थ वशिष्ठ आदि गणमान्य नेताओं ने वाल्मीकि के नेतृत्व में योजनाबद्ध तरीके से सीता को निष्कासित करा दिया जो कि उस समय   गर्भिणी थीं और जिन्होंने बाद में वाल्मीकि के आश्रम में आश्रय ले कर लव और कुश नामक दो जुड़वाँ पुत्रों को जन्म दिया.राम के ही दोनों बालक राजसी वैभव से दूर उन्मुक्त वातावरण में पले,बढे और प्रशिक्षित हुए.वाल्मीकि ने लव एवं कुश को लोकतांत्रिक शासन की दीक्षा प्रदान की और उनकी भावनाओं को जनवादी धारा  में मोड़ दिया.राम के असंतुष्ट विदेश मंत्री शत्रुहन लव और कुश से सहानुभूति रखते थे और वह यदा कदा वाल्मीकि के आश्रम में उन से बिना किसी परिचय को बताये मिलते रहते थे.वाल्मीकि,वशिष्ठ आदि के परामर्श पर शत्रुहन ने पद त्याग करने की इच्छा को दबा दिया और राम को अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति से अनभिज्ञ रखा.इसी लिए राम ने जब अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया तो उन्हें लव-कुश के नेतृत्व में भारी जन आक्रोश का सामना करना पडा और युद्ध में भीषण पराजय के बाद जब राम,भारत और शत्रुहन बंदी बनाये जा कर सीता के सम्मुख पेश किये गए तो सीता को जहाँ साम्राज्यवादी -विस्तारवादी राम की पराजय की तथा लव-कुश द्वारा नीत लोकतांत्रिक शक्तियों की जीत पर खुशी हुई वहीं मानसिक विषाद भी कि,जब राम को स्वयं विस्तारवादी के रूप में देखा.भारी मानसिक आघात के कारण सीता का ब्रेन हैमरेज से प्राणांत हो गया.वाल्मीकि,वशिष्ठ आदि के हस्तक्षेप से लव-कुश ने राम आदि को मुक्त कर दिया.यद्यपि शासन के पदों पर राम आदि बने रहे तथापि देश का का आंतरिक प्रशासन लव और कुश के नेतृत्व में पुनः लोकतांत्रिक पद्धति पर चल निकला और इस प्रकार राम की छाप जन-नायक के रूप में बनी रही और आज भी उन्हें इसी रूप में जाना जाता है.

(विशेष-पाठकों की सुविधा के लिए इस आलेख को यहाँ दो भागों में प्रस्तुत किया गया है यद्यपि यह सम्पूर्ण आलेख एक पूर्ण किश्त में 1 फरवरी 1988 को पाक्षिक समाचार पत्र  'फीरोजाबाद केसरी'  में प्रकाशित हो चुका है.)

* 'सत्यार्थ प्रकाश' में दे वर विवाह पद्धति का उल्लेख मिलता है -प्रतीत होता है राम ने इसी वैदिक प्रक्रिया का पालन किया था.





(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)