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Thursday, February 26, 2015

गहरी साज़िश पूंजीवादी व्यवस्था की --- Aquil Ahmed

https://www.facebook.com/aquil.ahmed.7927/posts/458395827647852


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अकील अहमद साहब की उपरोक्त पोस्ट व उस पर आई टिप्पणियों का संदर्भ हैं मेरे ये ताज़ातरीन पोस्ट्स :
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 ठीक ऐसा ही निष्कर्ष है अभिषेक श्रीवास्तव साहब का :



http://www.hastakshep.com/hindi-news/nation/2015/02/25/

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ऐसा नहीं है कि मैंने अचानक इस प्रकार की राय दी हो जिस पर अकील अहमद साहब को यह पोस्ट लिखनी पड़ी। 2011 में जबसे कारपोरेट भ्रष्टाचार के संरक्षण में RSS प्रेरित और मनमोहन सिंह जी के आशीर्वादयुक्त हज़ारे/केजरीवाल/रामदेव आंदोलन चला था मैं लगातार अपने ब्लाग के माध्यम से व फेसबुक पर भी उसके विरुद्ध राय देता आ रहा हूँ---http://krantiswar.blogspot.in/
एक लेख का यह फोटो और उसी से एक अनुच्छेद नीचे दिया जा रहा है जिससे स्पष्ट हो जाएगा कि 1990 में मेरा जो आंकलन था वह आज भी उतना ही सटीक है बल्कि उस पर जिस प्रकार अमल हो रहा है अपनी गफलत के कारण वामपंथ आज भी उसका मुक़ाबला करने में न केवल असमर्थ है वरन हज़ारे/केजरीवाल के RSS प्रेरित उस षड्यंत्र में फँसता नज़र आ रहा है जो कि देश के लिए सुखद स्थिति नहीं है।

http://krantiswar.blogspot.in/2011/09/blog-post_25.html

"संघ की तानाशाही:

डा सुब्रह्मण्यम स्वामी,चंद्रास्वामी और चंद्रशेखर जिस दिशा मे योजनाबद्ध ढंग से आगे बढ़ रहे हैं वह निकट भविष्य मे भारत मे संघ की तानाशाही स्थापित किए जाने का संकेत देते हैं। 'संघ विरोधी शक्तियाँ' अभी तक कागजी पुलाव ही पका रही हैं। शायद तानाशाही आने के बाद उनमे चेतना जाग्रत हो तब तक तो डा स्वामी अपना गुल खिलाते ही रहेंगे।"
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जिस प्रकार सम्पूर्ण वामपंथ हज़ारे/केजरीवाल से सम्मोहित है उसके मद्दे नज़र वह दिन दूर नहीं जब यह कहा जाएगा-'पाछे पछताए होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गईं खेत '। 
(विजय राजबली माथुर )

  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है। 

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Tuesday, October 4, 2011

दशहरा क्या है?

आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक शारदीय नवरात्रि तथा दशमी को दशहरा पर्व मनाए जाते हैं। ऋतु परिवर्तन के संक्रमण काल मे नवरात्रि मनाने का उद्देश्य मानव मात्र को स्वस्थ रखने हेतु हवन द्वारा पर्यावरण को शुद्ध करना था। किन्तु आज कल तथाकथित प्रगतिशीलता और विज्ञान के युज्ञ मे लोग अंधविश्वास से ग्रसित होकर अर्थ का अनर्थ करते हुयी और अधिक पर्यावरण प्रदूषित कर रहे हैं। पोंगावाद के चक्कर मे 'हेल्थ एंड हाईजीन 'के पर्व को ढोंग और पाखंड से जोड़ दिया गया है जिससे शोषण-प्रक्रिया को अधिक मजबूत किया जा सके और अफसोस कि जिंनका शोषण होता है वे ही ऐसे ढोंग -पाखंड को बढ़ाने मे अग्रणी रहते हैं। इसका एक कारण शोषितों के हमदर्दों-कम्यूनिस्टों  का धर्म के इस क्षेत्र को शोषकों(पूँजीपतियों,साम्राज्यवादियों) हेतु खुला छोड़ देना है। वे शोषकों(साम्राज्यवादियों) वारा निर्धारित मानदंडों के आधार पर धर्म को ही रद्द कर देते हैं। जबकि धर्म का अर्थ धारण करना है और प्रत्येक मनुष्य को शरीर धारण करने हेतु आवश्यक नियमों का पालन करना ही धर्म कहलाता है। पोंगापंथियों की व्याख्या धर्म नहीं अधर्म मे उलझाती है।

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अथक प्रयास द्वारा भारत मे व्याप्त कुरीतियों तथा पाखंड पर प्रहार करके जनता को जागरूक किया था किन्तु उन्ही के प्रचारक रहे आचार्य श्रीराम शर्मा ने विशुद्ध आर्थिक स्वार्थों के चलते स्वामी जी की मेहनत पर पानी फेर दिया, गायत्री परिवार द्वारा पुनः ढोंग-पाखंड को जबर्दस्त तरीके से भारत-भर मे फैला दिया गया। आज अनेकों पाखंडी संगठन धर्म के नाम पर जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ रहे हैं । जनता के हितैषी बजाए धर्म के मर्म को समझाने के धर्म को ही गलत ठहरा रहे हैं जबकि धर्म वह नहीं है जिसे पोंगापंथी बताते हैं। आज दुर्गा अष्टमी के अवसर पर प्रस्तुत है श्री गजाधर प्रसाद आर्य द्वारा प्रकाशित आँखें खोलने वाली यह रचना-

'जगदंबा बकरे नहीं खाती है '




आज से दो दिन बाद दशहरा मनाया जाएगा और लोग रावण के पुतले फूँक कर तमाशा मचाएंगे। किंवदंती फैला दी गई है कि इसी दिन राम ने रावण का वध किया था जो बिलकुल गलत है। रावण का संहार चैत्र मास की अमावस्या को हुआ था। आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी 'विजया दशमी' कहलाती है ज्योतिषीय गणना के आधार पर इस दिन किए गए कार्यों मे निश्चित सफलता मिलती है। इसीलिए श्री राम ने इस दिन किष्किंधा  की राजधानी 'पम्पापुर' से लंका की ओर प्रस्थान किया था। अंततः उन्हें अपने उद्देश्य मे पूर्ण सफलता मिली थी और वह साम्राज्यवादी रावण को जन-सहयोग से  परास्त करने मे सफल रहे थे ।

'विजया दशमी' को राम की सहायता मे सुग्रीव की सेना के प्रस्थान को यादगार बनाने हेतु प्रारम्भ मे इस दिन 'विजय जुलूस' निकालने की परिपाटी पड़ी थी। धीरे-धीरे लोग नाट्य कला के माध्यम से संघर्ष को इस दिन दिखाने लगे। फिर कई दिन तक नाट्य प्रदर्शन शुरू हुये  और विजया दशमी के दिन रावण का पुतला फूंका जाने लगा। ढोंग और दिखावे का बोल-बाला बढ़ता गया तथा नीति और आदर्श अदृश्य होते गए ,यही है आज की राम-लीला और दशहरा का सार।

आचार्य किशोरी दास बाजपेयी( जिन्हें हिन्दी का पाणिनी माना जाता है और जिन्हें डा रामधारी सिंह 'दिनकर' ने हिन्दी भाषा और साहित्य का डा राम मनोहर लोहिया कहा था ) ने भाषा-विज्ञान के आधार पर सिद्ध किया है कि 'राक्षस' शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के 'रक्षस' धातु से हुई है जिसका अर्थ है -रक्षा करना। 'रावण' आदि प्रवासी आर्य  अपने को 'राक्षस' अर्थात आर्य-सभ्यता और संस्कृति की रक्षा करने वाले कहते थे। राम और रावण दोनों ही आर्य थे और दोनों के मध्य मतभेद तथा टकराव साम्राज्यवाद के विरुद्ध राष्ट्रवाद के संघर्ष के रूप मे था। विदेशी इतिहासकारों ने इसे आर्य-द्रविड़ संघर्ष बता कर फूट डालने का कृत किया है। रावण एक महान आर्य विद्वान था ,वह दसों दिशाओं का ज्ञाता था।

दस दिशाएँ-

1-पूर्व,2-पश्चिम,3-उत्तर,4-दक्षिण,5-ईशान(उत्तर-पूर्व),6-आग्नेय(दक्षिण -पूर्व),7-ने ऋत्य(दक्षिण-पश्चिम),8-वावव्य (उत्तर-पश्चिम),9-आकाश और 10-पाताल(धरती के भीतर)।

एक महान विद्वान और प्रकांड ज्ञाता को दशानन इसी लिए कहा गया था और उसके पुतले पर गधे के सिर लगाना विद्वता को ठुकराना एवं कुचलना है जो निंदनीय होना चाहिए परंतु बड़ी ठसक से खुद को काबिल कहने वाले लोग भी ऐसी कुत्सित बातों पर इठलाते हैं। खुद राम ने लक्ष्मण को रावण के पास ज्ञान प्राप्त  करने भेजा था और अंत समय मे रावण ने लक्ष्मण के माध्यम से राम को ज्ञान प्रदान किया था।

हमारे देश मे एक बड़ा वर्ग पोंगापंथियों को बल प्रदान करता है और दूसरा खुद को काबिल समझने वाला वर्ग धर्म की अवधारणा को ठुकराता है। वास्तविक समस्या यह है जनता को समझाये कौन ?यदि कोई इस ओर प्रयास करे तो पोंगापंथी और प्रगतिशील दोनों मिल कर उस पर सामूहिक प्रहार करने लगते हैं। सत्य से आज किसी को कोई सरोकार नहीं है । ढोंग और पाखंड का पर्दाफाश करने की कड़ी मे एक छोटा सा प्रयास 'विजया दशमी' या दशहरा क्या है ?का रहस्य बताने की चेष्टा की है यह जानते हुये भी कि,आज भी लोग सत्य को स्वीकार नहीं करेंगे। 

Thursday, October 21, 2010

"भ्रष्टाचार " ------ विजय राजबली माथुर

*इस प्रकार की परस्पर प्रतिद्वंदिता ने सम्प्रदायवाद ,जातिवाद और धार्मिक वितंडावाद  को जन्म दिया अतः ये सब भ्रष्टाचार की ही परिधि में आते हैं .हमने देखा कि समाज में धनवान बनने की होड़ आर्थिक ,राजनीतिक ,साम्प्रदायिक ,जातीय ,भाषाई -भ्रष्टाचार और भड़कते विग्रह की जड़ है .

*जब तक मंदिर में चढावा और मज़ार पर चादर चढाने की प्रवृत्तियाँ रहेंगी तब तक हर लेन -देन में काम के बदले धन देने को गलत सिद्ध करना मुश्किल रहेगा


[विशेष:यह आलेख 16 नवम्बर 1987   को पाक्षिक समाचारपत्र 'फीरोजाबाद केसरी' में प्रकाशित हो चुका है.]
गौतम बुद्ध ने कहा था -दुःख है ,दुःख का कारण है ,दुःख दूर हो सकता है ,दुःख दूर करने का उपाय है .आज हम निसंकोच कह सकते हैं भ्रष्टाचार है ,भ्रष्टाचार का कारण है ,भ्रष्टाचार दूर हो सकता है ,भ्रष्टाचार दूर करने का उपाय है .तो आईये पहले जानें भ्रष्टाचार है क्या बला .भ्रष्टाचार =भ्रष्ट +आचार .अर्थात गलत आचरण चाहे वह आर्थिक ,राजनीतिक क्षेत्र में हो या सामाजिक ,पारिवारिक क्षेत्र में चाहे वह धन से सम्बंधित हो चाहे मन से -भ्रष्टाचार है .आज भ्रष्टाचार सार्वभौम सत्य के रूप में अपनी बुलंदगी पर है ,बगैर धन दिए आप आज किसी से काम नहीं करा सकते .पहले भ्रष्टाचार नीचे बहता था तो ऊपर बैठे लोगों का डर भी था पर अब तो भ्रष्टाचार सिर पर चढ़ा है -यथा राजा तथा प्रजा .ईमानदारी आज सबसे बड़ा अपराध है और वह दण्डित हुए बगैर रह नहीं सकती .तो साहब भ्रष्टाचार तो है ---सर्वव्यापी उसका कारण क्या है ? यह भी जान लिया जाये .
              समयांतर के साथ आज हमारा समाज एक कलयुग अर्थात कळ (मेकेनिकल )+युग (एरा ) में चल रहा है . आज हर कार्य तीव्र गति से और अल्प -श्रम द्वारा किया जा सकता है .जब थोड़े श्रम से अत्यधिक उत्पादन होगा और उत्पादित माल के निष्पादन अर्थात बिक्री की समस्या होगी तो उत्पादक तरह -२ के प्रलोभन कमीशन डिस्काउंट  ,रिबेट -रिश्वत आदि का प्रयोग करता है .यह प्रयोग ही भ्रष्टाचार है .आज हर कार्य धन से संपन्न होता है औरनार्जन चाहे जिस स्त्रोत से हो इसकी बाबत ध्यान दिए बगैर ही आपको सम्मान आपके द्वारा अर्जित धन के अनुपात में ही आपको प्राप्त होगा . ऐसी स्थिति धन -संग्रह की प्रवृति को जन्म देती है और धन प्राप्ति के लिए नाना -विधियाँ विकसित होती जाती हैं .शीघ्रतिशीघ्र  धनवान बनने की लालसा में ही दहेज़ प्रणाली विकसित की गई क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है ? फिर दहेज़ के लिए वधु का दाह भीषण भ्रष्टाचार क्यों नहीं है ? आप एक डा . एक वकील या एक व्यापारी हैं ,आपको अपनी दुकान चलने के लिए ग्राहकों की आवश्यकता है आपने अपनी मेकेनिकल (कलयुगी )बुद्धी से अपनी जाति ,धर्म अथवा सम्प्रदाय के उत्थान का बीड़ा उठा लिया और आप उस सम्बंधित वर्ग के ग्राहकों के बलबूते अपने क्षेत्र में सफल हो गए .इस प्रकार की परस्पर प्रतिद्वंदिता ने सम्प्रदायवाद ,जातिवाद और धार्मिक वितंडावाद  को जन्म दिया अतः ये सब भ्रष्टाचार की ही परिधि में आते हैं .हमने देखा कि समाज में धनवान बनने की होड़ आर्थिक ,राजनीतिक ,साम्प्रदायिक ,जातीय ,भाषाई -भ्रष्टाचार और भड़कते विग्रह की जड़ है .

इससे नतीजा निकलता है कि जब तक समाज में धन का महत्त्व इसी प्रकार बना रहेगा तब तक भ्रष्टाचार भी बना रहेगा .धन के महत्त्व पर आधारित अर्थव्यवस्था और तदनुरूप राजनीतिक प्रणाली को बदले बगैर भ्रष्टाचार का खात्मा नहीं हो सकता .
जब तक मंदिर में चढावा और मज़ार पर चादर चढाने की प्रवृत्तियाँ रहेंगी तब तक हर लेन -देन में काम के बदले धन देने को गलत सिद्ध करना मुश्किल रहेगा क्योंकि जब विधाता ही बगैर किसी आश्वासन के कुछ करने को तैयार
नहीं तब मनुष्य तो मन का कलुष है ही .
जब भ्रष्टाचार दूर किया जा सकता है तो उसका उपाय भी मौजूद है ---धन आधारित समाज अर्थात पूंजीवाद का विनाश .पूंजीवाद को समाप्त कर जब श्रम के महत्त्व पर आधारित समाज व्यवस्था को स्थापित कर दिया जायेगा तो भ्रष्टाचार स्वतः ही समाप्त हो जायेगा .परन्तु समाजवाद पर आधारित व्यवस्था कौन स्थापित करेगा ,कैसे करेगा जब सभी राजनीतिक दल तो समाजवाद को अपना अभीष्ट लक्ष्य घोषित करते हैं .आज क्या इंदिरा (राजीव ) कांग्रेस क्या भा .ज .पा. और जन -मोर्चा सभी तो समाजवाद के अलमबरदार हैं फिर क्यों नहीं आया समजवादी समाज आजादी के चालीस वर्षों बाद भी .निश्चय ही प्रयास नहीं किया गया ,नहीं किया जा रहा और न ही किया जायेगा .कौन है जो प्राप्त सुविधा को स्वेच्छा  से छोड़  देगा ,इसलिए जनता को गुमराह करने के लिए समाजवाद  का नाम लेकर दरअसल पूंजीवाद को ही सबल किया गया है .तभी पनडुब्बी ,तोप आदि के भ्रष्टाचार चल सके हैं और कामयाब हो रहे हैं .
        यदि हम मनसा -वाचा -कर्मणा भ्रष्टाचार दूर करना चाहते हैं .तो हमें मन ,वचन और कर्म से ही उन समाजवादियों का साथ देना होगा जिन्होंने इस धरती के आधे भाग पर और आबादी के एक तिहाई भाग पर वास्तविक समाजवादी समाज की स्थापना की है .



 ( इस  ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)