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Friday, September 21, 2012

ज्योतिष और अंधविश्वास (पुनर्प्रकाशन)



शनिवार, 4 दिसम्बर 2010

ज्योतिष और अंधविश्वास

पिछले कई अंकों में आपने जाना कि,ज्योतिष व्यक्ति क़े जन्मकालीन ग्रह -नक्षत्रों क़े आधार पर भविष्य कथन करने वाला विज्ञान है और यह कि ज्योतिष कर्मवादी बनाता  है -भाग्यवादी नहीं. इस अंक में आप जानेंगे कि ,अंधविश्वास ,ढोंग व पाखण्ड का ज्योतिष से कोई सरोकार नहीं है.

कुछ निहित स्वार्थी तत्वों ने ज्योतिष -विज्ञान का दुरूपयोग करते हुए इसे जनता को उलटे उस्तरे से मूढ्ने का साधन बना डाला है.वे लोग भोले -भाले एवं धर्म -भीरू लोगों को गुमराह करके उनका मनोवैज्ञानिक ढंग से दोहन करते हैं और उन्हें भटका देते हैं.इस प्रकार पीड़ित व्यक्ति ज्योतिष को अंधविश्वास मानने लगता है और इससे घृणा करनी शुरू कर देता है.ज्योतिष -ज्ञान क़े आधार पर होने वाले लाभों से वंचित रह कर ऐसा प्राणी घोर भाग्यवादी बन जाता है और कर्म विहीन रह कर भगवान् को कोसता रहता है.कभी -कभी कुछ लोग ऐसे गलत लोगों क़े चक्रव्यूह में फंस जाते हैं जिनके लिए ज्योतिष गम्भीर विषय न हो कर लोगों को मूढ्ने का साधन मात्र होता है.इसी प्रकार कुछ कर्मकांडी भी कभी -कभी ज्योतिष में दखल देते हुए लोगों को ठग लेते हैं.साधारण जनता एक ज्योतषीऔर ढोंगी कर्मकांडी में विभेद नहीं करती और दोनों को एक ही पलड़े पर रख देती है .इससे ज्योतिष विद्या क़े प्रति अनास्था और अश्रद्धा उत्पन्न होती है और गलतफहमी में लोग ज्योतिष को अंध -विश्वास फ़ैलाने का हथियार मान बैठते हैं .जब कि सच्चाई इसके विपरीत है.मानव जीवन को सुन्दर,सुखद और समृद्ध बनाना ही वस्तुतः ज्योतिष का अभीष्ट है

७ वर्ष पूर्व २००३ ई .क़े नवरात्रों में एक ढोंगी व पाखंडी कर्मकांडी द्वारा कमला नगर ,आगरा निवासी एक व्यवसायी की माता की निर्मम हत्या व लूट -पाट तथा उसकी पत्नी को घायल कर दिया गया.पुलिस प्रशासन द्वारा पाखंडी को बचाने हेतु नाटक रचा गया और पीड़ित परिवार का चरित्र हनन किया गया.इस हरकत की जनता में उग्र प्रतिक्रिया हुई .फलस्वरूप दो पुलिस अधिकारियों को निलंबित होना पड़ा.इतने वीभत्स और कारुणिक काण्ड पर एक प्रतिष्ठित मिशनरी विद्द्यालय क़े प्रतिष्ठित शिक्षक की प्रतिक्रिया थी कि,उस कर्मकांडी क़े बयान में कुछ सच्चाई है और कि पुलिस अधिकारी निष्पक्ष व ईमानदार हैं.क्या आप जानना चाहेंगे कि,एक तथा -कथित सभ्रांत शिक्षक क़े ऐसे उदगार क्यों हैं ?नितांत आर्थिक आधार.अतीत में कभी पीड़ित परिवार का कोई बच्चा उक्त शिक्षक से पंद्रह दिन ट्यूशन पढ़ा था और बाद में उनका पारिश्रमिक भुगतान इसलिए नहीं किया गया था कि,उस बच्चे पर कोई तवज्जो नहीं दी गई थी .बस इतने मात्र से उक्त पीडिता को दोषी कहने में इन शिक्क्षक महोदय ने कोई संकोच नहीं किया .
आइये ,इन शिक्षक महोदय की ऐसी सोच का ज्योतिषीय विश्लेषण करें.यह शिक्षक एक ऐसे सम्प्रदाय (गायत्री परिवार )क़े अनुयायी हैं जो ज्योतिष को अन्धविश्वासी मानता है और इसी कारण इन महोदय ने अपने आवास पर इस प्रकार निर्माण -परिवर्तन कराया है जो ज्योतिष और वास्तु क़े विपरीत है.वास्तु ज्योतिष का ही एक अंग है और ग्रह नक्षत्रों की स्थिति क़े आधार पर गृह -निर्माण की विधि बताता है.संदर्भित शिक्षक महोदय ने अपने आवास क़े ईशान में दोनों मंजिलों पर शौचालय निर्मित करा लिए;उत्तर दिशा में रसोई स्थानांतरित कर ली ,जो कि वास्तु -शास्त्र क़े अनुसार (दोनों कृत्य) बुद्धि -विपर्याय क़े सूचक हैं.ईशान दिशा बृहस्पति का क्षेत्र है जो कि ज्ञान -विज्ञान ,बुद्धि -प्रदाता ग्रह है.इस क्षेत्र को नियमानुसार खाली या हल्का रखते हैं अथवा पूजा -स्थल का वहां निर्माण कराते हैं.जिससे  बुद्धि व ज्ञान का संचार सुचारू रूप से होता रहे.प्रस्तुत उदाहरण में शिक्षक महोदय ने ज्ञान क़े देवता को (शौचालय निर्मित कर ) मल -मूत्र से आवृत करके अपनी बुद्धि पर कुठाराघात कर लिया और इस अंध विश्वास से ग्रस्त हैं कि ,ज्योतिष ही अंध विश्वास का वाहक है.इस निर्माण कार्य को ७ वर्ष पूर्ण हो चुके हैं और वहां बुद्धि -विभ्रम का बहुत कुछ खेल हो चुका है (जिसका वर्णन वास्तु दोष एक प्रेक्टिकल उदाहरण में भी हुआ है और "श्रधा ,विश्वास और ज्योतिष "में भी आगे होगा ).

अब आइये ,इन्हीं की तर्ज़ पर हू -ब -हू निर्मित एक पुलिस अधिकारी क़े आवास से इस वास्तु दोष को समझते हैं,जिनके निर्माण काल को अब ११ वर्ष पूर्ण हो चुके हैं और उस भवन क़े निवासियों पर समस्त वास्तु दोष सिर पर चढ़ कर बोल रहे हैं.उत्तर की रसोई और ईशान क़े दोनों मंजिलों वाले शौचालय युक्त आवास क़े निवासी पुलिस अधिकारी पब्लिक में तो सौम्य व विनम्र अधिकारी क़े रूप में जाने जाते हैं (अब रिटायर्ड ),परन्तु घर में अब उनका नियंत्रण समाप्त हो गया है.उनके बेटे -बेटियां पिता को कुछ समझते ही नहीं हैं और कहते हैं कि ,पुलिसिया डंडा घर में नहीं चलेगा. इनकी पत्नी इन्हें देखते ही गुर्राने लगती हैं.अधिकारी महोदय भी अपनी शिक्षिका पत्नी को कुछ महत्त्व नहीं देते हैं.फलतः इनका घर भानुमती का कुनबा बनकर रह गया है. इस ईशान -दोष ने बेटे -बेटियों क़े विवाह में अनावश्यक बाधाएं खडी कीं (गुण मिल जाने क़े बावजूद लड़के वाले बाद में बिदक जाते थे और कभी इन्ही क़े किसी रिश्तेदार की बेटी से विवाह करके इन अधिकारी महोदय को धोखा खिला देते थे;उपाए करने क़े बाद ही उन बच्चों का विवाह हो सका ).यही नहीं ,इस ईशान -दोष ने अधिकारी महोदय को रक्त -चाप का मरीज़ बना कर रख दिया है.घर में घुसते ही यह चिडचिडे बन जाते हैं.इनकी शिक्षिका पत्नी को गठिया रोग ने घेर लिया है और अब घर क़े कार्यों से भी लाचार हो गई हैं और पुत्रियों फिर बहुओं पर निर्भर होकर रह गई हैं.इस परिवार की बुद्धि इतनी विकृत हो गई है कि,किसी भी प्रकार का उपचार व निराकरण भी सम्यक रूप से करने को कोई तैयार नहीं है और अपनी अकर्मण्यता को छिपाने हेतु भगवान् की मर्जी को ढाल बना लेते हैं.

"अंधविश्वास "से ग्रस्त लोग ज्योतिष और वास्तु को ठुकरा कर किस प्रकार अपना अहित कर लेते हैं,इसका एक और उदाहरण उक्त शिक्षक महोदय क़े सलाहकारों पर एक नज़र डालने से मिल जाएगा .इनके एक सलाहकार बचपन क़े सहपाठी और
अब दूरसंचार अधिकारी कहते हैं कि,आज विज्ञान क़े युग में ज्योतिष को केवल मूर्ख -लोग ही मानते हैं.(उन्हीं महोदय को अपनी पुत्री नीलम क़े विवाह की अडचने दूर करने हेतु मेरा परामर्श मानने पर मजबूर होना पड़ा और समुचित उपाय  करने क़े बाद ही उसका विवाह सम्पन्न हो सका ).इनके दूसरे सलाहकार चुनावों में परास्त एक छुट -भैय्ये नेता का कहना है-भाग्य में जो होना है वह हो कर रहता है और ज्योतिष का कोई लाभ नहीं है.उनके अपने निवास में जो वास्तु दोष हैं उनका उपचार वह करना नहीं चाहते और बेटे -बेटियों की बढ़ती उम्र क़े बावजूद शादी न होने से हताश हैं और  भगवान् को कोसते रहते हैं. "ऐसे  अन्धविश्वासी लोगों क़े लिए बस यही कहा जा सकता है -जो होना है ,सो होना है.फिर  किस बात का रोना है.."

ज्योतिष को अंधविश्वास का प्रतीक मानने वाली एक महिला राजनेता का रसोई घर तो पहले से ही द.-प .(S .W .)में था जो कलह की जड़ था ही;अब उसी क्षेत्र में नल -कूप भी लगवा लिया है.परिणामस्वरूप पहली छमाही  क़े भीतर ही ज्येष्ठ पुत्र को आपरेशन का शिकार होना पड़ गया.

इसी प्रकार कान्वेंट शिक्षा प्राप्त लोग प्रतीक चिन्हों का उपहास उड़ाते हैं जबकि छोटा सा चिन्ह भी गूढ़ वैज्ञानिक रहस्यों को समेटे हुए है.उदाहरण स्वरूप इस स्वास्तिक चिन्ह को देखें और इस मन्त्र का अवलोकन करें :-
            (कृपया स्कैन को इनलार्ज कर पढ़ें इसी आलेख का भाग है )


१ .चित्रा-२७ नक्षत्रों में मध्यवर्ती तारा है जिसका स्वामी इंद्र है ,वही इस मन्त्र में प्रथम निर्दिष्ट है.
२ .रेवती -चित्रा क़े ठीक अर्ध समानांतर १८० डिग्री पर स्थित है जिसका देवता पूषा है.नक्षत्र विभाग में अंतिम नक्षत्र होने    क़े कारण इसे मन्त्र में विश्ववेदाः (सर्वज्ञान युक्त )कहा गया है.
३ .श्रवण -मध्य से प्रायः चतुर्थांश ९० डिग्री की दूरी पर तीन ताराओं से युक्त है.इसे इस मन्त्र में तार्क्ष्य (गरुण )है.
४ .पुष्य -इसके अर्धांतर पर तथा रेवती से चतुर्थांश ९० डिग्री की दूरी पर पुष्य नक्षत्र है जिसका स्वामी बृहस्पति है जो मन्त्र क़े पाद में निर्दिष्ट हुआ है.

इस प्रकार हम देखते हैं कि धार्मिक अनुष्ठानों में स्वास्तिक निर्माण व स्वस्ति मन्त्र का वाचन पूर्णतयः ज्योतिष -सम्मत है.धर्म का अर्थ ही धारण करना है अर्थात ज्ञान को धारण करने वाली प्रक्रिया ही धर्म है.इस छोटे से स्वस्ति -चिन्ह और छोटे से मन्त्र द्वारा सम्पूर्ण खगोल का खाका खींच दिया जाता है.  अब  जो लोग इन्हें अंधविश्वास कह कर इनका उपहास उड़ाते हैं वस्तुतः वे स्वंय ही अन्धविश्वासी लोग ही हैं जो ज्ञान (Knowledge ) को धारण नहीं करना चाहते.अविवेकी मनुष्य इस संसार में आकर स्वम्यवाद अर्थात अहंकार से ग्रस्त हो जाते हैं.अपने पूर्व -संचित संस्कारों अर्थात प्रारब्ध में मिले कर्मों क़े फलस्वरूप जो प्रगति प्राप्त कर लेते हैं उसे भाग्य का फल मान कर भाग्यवादी बन जाते हैं और अपने भाग्य क़े अहंकार से ग्रसित हो कर अंधविश्वास पाल लेते हैं.उन्हें यह अंधविश्वास हो जाता है कि वह जो कुछ हैं अपने भाग्य क़े बलबूते हैं और उन्हें अब किसी ज्ञान को धारण करने की आवश्यकता नहीं है.जबकि यह संसार एक पाठशाला है और यहाँ निरंतर ज्ञान की शिक्षा चलती ही रहती है.जो विपत्ति का सामना करके आगे बढ़ जाते हैं ,वे एक न एक दिन सफलता का वरन कर ही लेते हैं.जो अहंकार से ग्रसित होकर ज्ञान को ठुकरा देते हैं,अन्धविश्वासी रह जाते हैं.ज्योतिष वह विज्ञान है जो मनुष्य क़े अंधविश्वास रूपी अन्धकार का हरण करके ज्ञान का प्रकाश करता है.

शक  ओ  शुबहा -अब सवाल उस संदेह का है जो विद्व जन व्यक्त करते हैं ,उसके लिए वे स्वंय ज़िम्मेदार हैं कि वे अज्ञानी और ठग व लुटेरों क़े पास जाते ही क्यों हैं ? क्यों नहीं वे शुद्ध -वैज्ञानिक आधार पर चलने वाले ज्योत्षी से सम्पर्क करते? याद रखें ज्योतिष -कर्मकांड नहीं है,अतः कर्मकांडी से ज्योतिष संबंधी सलाह लेते ही क्यों है ? जो स्वंय भटकते हैं ,उन्हें ज्योतिष -विज्ञान की आलोचना करने का किसी भी प्रकार हक नहीं है. ज्योतिष भाग्य पर नहीं कर्म और केवल कर्म पर ही आधारित शास्त्र है.  




(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही तार्किक ढंग से आपने बात रखी है। अच्छी पोस्ट।
  2. बहुत ही अच्छी जानकारी मिली
  3. ज्योतिष के बारे में आपने बड़ी गूढ़ बातें बताई हैं ।
    इस निष्पक्ष लेखन के लिए बधाई ।
  4. बहुत पुख्ता जानकारी है .......शुक्रिया
  5. सार्थक एंव उपयोगी जानकारी,
    आपका आभार,

    नोट-

    ज्योतिष संबन्धित इन लेखों के पुनर्प्रकाशन की श्रंखला इसलिए शुरू की गई है क्योंकि 'रेखा' के राजनीति मे आने संबंधी मेरे विश्लेषण के 26 अप्रैल 2012 को सही सिद्ध होते ही 27-04-2012 को IBN 7 के एक कर्मचारी ब्लागर ने 'ज्योतिष' ,'हवन' आदि का मखौल उड़ाना और अपने पिछलग्गुओं से मेरे विरुद्ध प्रचार कराया जा रहा है। पढ़ने वाले ही यह निर्णय करें कि मेरा लेखन कितना गलत है?जैसा कि कारपोरेट पोंगापंथी कह रहे हैं।
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Monday, September 3, 2012

वास्तु दोष एक प्रेक्टिकल उदाहरण (पुनर्प्रकाशन)




मैंने ८ .११ .१० की पोस्ट -"तोड़ फोड़ और प्लास्टिक पिरामिड वास्तविक समाधान नहीं" द्वारा अपने पूर्व प्रकाशित लेख क़े माध्यम से बताया था की किस प्रकार हम अपने भवन क़े वास्तु दोषों से बच सकते हैं.कुछ पाठक ब्लागर्स ने जानकारी क़े प्रति कृतज्ञता  प्रकट की थी.उन सब की और अधिक जानकारी क़े लिए "अग्रमंत्र",आगरा में अगस्त ०४ से जन.०५ क़े दो त्रैमासिकों में प्रकाशित पूर्व  लेखों को पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ   वास्तु  शास्त्री पंकज अग्रवाल क़े विचार जो की राष्ट्रीय सहारा क़े २४ .८ .१९९९ क़े अंक में प्रकाशित हुए थे ,उनकी भी स्कैन कापी आप सब की जानकारी क़े लिए उपलब्ध करा रहा हूँ.:-

उत्तर की रसोई -गृहणी रोगिणी होई
सोई घर किसी भी भवन का मुख्य अंग है.यही वह स्थान है जहाँ से सम्पूर्ण परिवार का स्वास्थ्य सञ्चालन होता है.यह रसोई पकाने वाले पर निर्भर करता है कि वह सदस्यों को स्वस्थ एवं जीवंत रखने लायक भोजन उपलब्ध कराये.परन्तु रसोई की मालकिन गृहणी का स्वास्थ्य रसोई की दिशा  पर निर्भर करता है.वास्तु शास्त्र क़े अनुसार रसोई घर भवन की दक्षिण -पूर्व दिशा (S . E .) अर्थात आग्नेय कोण में स्थित होना चाहिए. ऐसे स्थान पर पकाया गया भोजन सुपाच्य और स्वास्थ्यवर्धक होता है तथा गृहणी का स्वास्थ्य भी उत्तम रखता है.आग्नेय कोण दिशा का स्वामी शुक्र ग्रह होता है और शुक्र स्त्रियों का कारक ग्रह है.आजकल लोग वास्तु शास्त्र क़े अज्ञान से तथा अन्य कारणों से मन चाहे  स्थानों पर रसोई निर्मित करा लेते हैं परिणाम स्वरूप गृहणी पर उसका दुष्प्रभाव भी पड़ सकता है.

उत्तर दिशा धन क़े देवता कुबेर की होती है.इस स्थान पर रसोई घर बनाने से धन का अपव्यय होता है.उत्तर दिशा पुरुष कारक वाली है अतः स्त्री का स्वास्थ्य क्षीण होता है.उत्तर दिशा की रसोई वाली गृहणियां अल्पायु में ही वीभत्स रोगों का शिकार हो जाती हैं.३० -३५ आयु वर्ग की गृहणियां गम्भीर ऑपरेशनों  का सामना कर चुकी हैं. प्रौढ़ महिलाएं ,अल्सर /कैसर से पीड़ित हैं.जिन लोगों ने बाद में उत्तर दिशा में रसोई स्थानांतरित कर दी है उनमे से एक गृहिणी  आये दिन अस्पताल क़े चक्कर काटने लगी है. एक साधन सम्पन्न परिवार की गृहिणी  जिनके घर क़े  ईशान कोण (N E ) में शौचालय क़े कारण पुरुष वर्ग प्रभावित था ही उत्तर में रसोई कर दिए जाने क़े बाद कमर व घुटनों क़े दर्द तथा मानसिक अवसाद से पीड़ित रहने लगी है.
सारांश यह कि उत्तर की रसोई न केवल गृहणी हेतु वरन सम्पूर्ण परिवार क़े लिए हानिदायक होती है.


उदाहरण  एक अहंकारी का
 मारे प्राचीन ऋषी -मुनियों ने अपने असीम ज्ञान से भवन -निर्माण कला को प्रस्तुत किया था जो वास्तु कला क़े नाम से जानी जाती है.लगभग एक हज़ार वर्षों की गुलामी ने हमारी इस प्राचीन विद्या को विलुप्तप्राय सा कर दिया है. इधर दस बारह (अब तक १५ -१७ ) वर्षों से चीन से आयातित फेंगशुई और उसी की तर्ज़ पर वास्तु -शास्त्र का प्रचलन  बढ़ा है.परन्तु पाश्चात्य आर्किटेक्चर तथा चीन की फेंगशुई हमारी प्राचीन वास्तु कला क़े पर्यायवाची नहीं हैं और इनसे मनुष्य की न तो भौतिक समस्यायों का हल  निकल पा रहा है और न ही यह मोक्ष -प्राप्ति क़े मार्ग में सहायक है.वास्तु शास्त्र क़े नियमों की अवहेलना अथवा अधूरे परिपालन से आज का मानव किस प्रकार दुखी है किसी से छिपी बात नहीं है और बाज़ार में उपलब्ध वास्तु -शास्त्र की पुस्तकें तथा समाधान मात्र व्यावसायिक हैं उनसे मानव -कल्याण संभव नहीं है .अतः सत्य घटनाओं एवं काल्पनिक नामों क़े द्वारा हम निम्न -लिखित उदाहरण प्रस्तुत कर अपने पाठकों को वास्तु -दोषों क़े दुष्परिणामों से सचेत करना चाहते हैं.:-

रूरी सिंह एक मकान में किरायेदार क़े रूप में वर्षों से निवास कर रहा था .मकान में कोई वास्तु दोष न था.अतः उसके परिवार ने अच्छी खासी तरक्की कर ली .उसके बच्चे भी पढ़ाई में होशियार निकले .परन्तु अपने मकान -मालिक को नाजायज दबा कर यह मकान बहुत सस्ता खरीद लिया .मकान अपना निज का हो जाने क़े बाद गरूरी ने उसमें कुछ अतिरिक्त निर्माण कार्य कराये .ईशान कोण में गरूरी ने शौचालयों का निर्माण करा लिया.बस,यहीं से इस परिवार की बुद्धि का विनाश होता चला गया.सर्वप्रथम तो स्वंय गरूरी को दिल का हल्का दौरा पड़ा.बुद्धि क्षय का परिणाम यह हुआ कि उसने रसोई -घर को उत्तर दिशा में परिवर्तित करा लिया .इस प्रकार उसकी पत्नी घमंडना को भी ब्लड -प्रेशर की शिकायत हो गई.घुटनों व कमर में दर्द रहना प्रारम्भ हो गया तथा क्रोध की मात्रा बढ़ गई.चूंकि ईशान का शौचालय पुरुष वर्ग पर भारी होता है ,अतः साथ रहने वाला गरूरी का अनुज -पुत्र भी लगातार दो वर्षों तक एक ही कक्षा में अनुत्तीर्ण होता रहा.बुद्धि -विपर्याय का ही यह परिणाम था कि,गरूरी ने एक बार जो निर्माण कराया था उसे तुड़वाकर पुनः नये -सिरे से बनवाया (लेकिन कोई दोष मिटाया नहीं बल्कि दोषों को और बढ़ाया ही ).इसमें उत्तर की रसोई -जो व्ययकारी होती है - का भी योगदान रहा.१६  सितम्बर २००३  को सांय गरूरी और घमंडना में ज़बरदस्त वाकयुद्ध हुआ और पहले शान्त रहने वाली गृहणी घमंडना उत्तर की रसोई क़े प्रभाव से अत्यंत उत्तेजित हुयी जो दूर -दूर तक चर्चा का विषय बना.ईशान क़े शौचालय ने गरूरी की बुद्धी को नष्ट कर चरित्र भी गिरा दिया.सड़क छाप लोगों से मित्रता करके गरूरी एक क़े बाद एक गलतियों पर गलतियाँ करता चला जा रहा हैऔर अपने सच्चे हितैषियों को खोता चला जा रहा है. कुछ उत्तर की रसोई का प्रभाव है और कुछ ईशान क़े शौचालय का बुद्धि -विकार घमंडना भी अपने परिवार का हित -अहित सोचना भूल गई है.अब यह परिवार शनै : शनै :अपने विनाश की ओर बढ़ रहा है.इस परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने पैरों पर स्वंय ही कुल्हाड़ी चलाने लगा है .कुछ ही वर्षों क़े अंतराल पर दुनिया इस परिवार का शीराज़ा बिखरते देखेगी .गलत आचरण क़े लोगों से मित्रता करके यह परिवार शीघ्र ही उलटे उस्तरे से मूढा जाने वाला है उस पर भी तुर्रा यह कि जो कोई भी उनके हित की बात कहता है उससे इस परिवार क़े सदस्य सम्बन्ध तोड़ लेते हैं.सर्वप्रथम अपने उत्तर दिशा क़े पडौसी जिसे स्वंय गरूरी ने ही अपने पडौस में बसाया था सम्बन्ध ख़राब कर लिए उसके पश्चात पूर्व दिशा क़े पडौसी से सम्बन्ध तोड़ लिए.दक्षिण दिशा क़े पडौसी से तो सम्बन्ध कभी ठीक थे ही नहीं.आग्नेय क़े कबाड़ी परिवार से आजकल गरूरी की खूब छन रही है.एक और महानुभाव जिनकी भूमिका अपने छोटे भाई को विधायकी क़े चुनाव में हरवाने में प्रमुख थी गरूरी क़े शुभचिंतक बने हुए हैं.यह नैरत्य (S W ) दिशा  क़े पडौसी कहे जा सकते हैं.



उपरोक्त लेख छपने क़े तीन वर्ष बाद २००८ ई .की जन . में गरूरी की इ .बेटी ने गरूरी पर दबाव बना कर दूसरी जाति क़े अपने सहपाठी रहे इ . से विवाह कर लिया. परन्तु इससे पूर्व पूरा परिवार तनाव -अशान्ति और बाहरी हस्तक्षेप से गुज़रा.घमंडना को सीवियर   बी .पी .अटैक पड़ा,गरूरी को इलाज क़े लिए उत्तर की पडौसी और अपनी पुरानी शिष्या गायनोलोजिस्ट को ही बुलाना पड़ा जिनसे सम्बन्ध बिगाड़ लिए थे.पुत्र -पुत्रवधु लन्दन छोड़ कर आ ही नहीं रहे,अब समाज में उनकी दबी -छिपी चर्चा खूब होने लगी है.
बेहतर है कि ,दूसरों की गलतियों से सबक लेकर औरों को अपना बचाव पहले ही कर लेना चाहिए.विशेषज्ञ वास्तु -शास्त्री श्री पंकज अग्रवाल क़े विचार इस स्कैन कापी में देखें.;-



दि तोड़ -फोड़ व्यवहारिक न हो तो हमारी प्राचीन वास्तु -शास्त्र विद्या में वास्तु दोषों क़े निवारणार्थ हवन की विधि उपलब्ध है. जिसका प्रति वर्ष वास्तु -हवन कराकर लाभ उठाया और दोषों का शमन किया जा सकता है.परन्तु जब बद्धि ही न काम करे तब ?


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(इस   ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)