Saturday, November 20, 2010

तुलसी की महत्ता---विजय राजबली माथुर

कार्तिक मास की पूर्णिमा को तुलसी का जन्म -दिवस और कार्तिक शुक्ल एकादशी को तुलसी-शालिग्राम विवाह क़े रूप में पुराणों द्वारा प्रचारित किया गया है तथा अंध -विश्वास क़े कारण जनता द्वारा भी ऐसे ही मनाया जाता है.लेकिन वास्तविकता क्या है यही बताने का प्रयास इस आलेख क़े माध्यम से किया जा रहा है,यह जानते हुए भी कि ,सच्चाई को बहुत कम लोग ही स्वीकार करेंगे और मानेंगे तो बिलकुल ही नहीं.    ब्रज  की पहचान वृन्दावन से होती है और वृंदा तुलसी को कहते हैं.इस क्षेत्र में तुलसी की अधिकता क़े कारण ही योगीराज श्री कृष्ण की कर्मस्थली का नाम वृन्दावन पड़ गया है. हम जब  आगरा में थे ,हमारे घर क़े खाली क्षेत्र में तुलसी क़े अनेक पौधे थे.आगरा ब्रज -क्षेत्र में होने क़े कारण वहां की जल -वायु तुलसी क़े अनुकूल है. तुलसी क़े पौधों की देख -भाल मेरी पत्नी पूनम करती थीं :
(यह फोटो जब आगरा में थे तब का है)
 जिस कारण आस -पास जब गर्मी या सर्दी क़े प्रकोप से तुलसी का क्षय  हो जाता था ;सिर्फ हमारे यहाँ ही तुलसी उपलब्ध रहती थी.वैज्ञानिक विश्लेषणों क़े अनुसार हमारे देश में पायी जाने वाली तुलसी की प्रजातियाँ इस प्रकार हैं:-

  • आसीमम अमेरिकेनम -इसे काली तुलसी,गंभीरा या भामरी कहते हैं.
  •  आसीमम वेसोलिकम -मरुआ तुलसी,मुजरिकी या सुरसा भी कहते हैं.
  •  आसीमम ग्रेटिसिकम -राम तुलसी ,वन तुलसी भी कहलाती है.
  •  आसीमम किलिमंडचर्रिकम-कर्पूर तुलसी कहलाती है.
  • आसीमम सैंटकम  -यह प्रधान या पवित्र तुलसी है .इसकी भी दो प्रधान जातियां हैं -(अ )श्री तुलसी जिसकी पत्तियां हरी होती हैं तथा (ब )कृष्णा तुलसी जिसकी पत्तियां निलाभ कुछ बैंगनी रंग लिए हुए होती हैं.इसे श्यामा  तुलसी भी कहते हैं.
  • असीमम विरीडि -यह थोडा कम  मात्रा में पायी जाती है.
रासायनिक विश्लेषणों -से ज्ञात हुआ है कि तुलसी क़े पत्तों में एक पीलापन लिए हुए हरे  रंग का तेल होता है,जो हवा में उड़ता है.कुछ देर रखने पर उसमे दानेदार रवे से जम जाते हैं जिसे तुलसी कपूर की संज्ञा दी जाती है.छाया में पैदा होने वाली तुलसी में यह तेल अधिक होता है.श्री तुलसी में श्यामा की अपेक्षा कुछ अधिक तेल होता है तथा इस तेल का सापेक्षित घनत्व भी कुछ अधिक होता है. तेल क़े अतिरिक्त पत्तियों में लगभग ८३ मि.ग्रा .विटामिन "सी "एवं २ .५ मि .ग्रा .प्रतिशत केरोटिन होता है.
(फोटो साभार:गूगल इमेज सर्च)
                    
 तुलसी एक गुण अनेक

शरीर की विद्युतीय संरचना -को तुलसी सीधे प्रभावित करती है .तुलसी काष्ठ क़े दानों की माला गले में पहनने से शरीर में विद्युत्  शक्ति का प्रभाव बढ़ता है तथा जीवकोषों द्वारा उनको धारण करने की सामर्थ्य में वृद्धि होती है.इसके प्रभाव से अनेकों रोग आक्रमण करने से पूर्व ही समाप्त हो जाते हैं और आयु में वृद्धि होती है.फिर भी यदि कोई माला न धारण कर सके तो तुलसी क़े निम्न -लिखित प्रयोगों द्वारा व्याधियों का शमन तो कर ही सकता है:-
चंद्रोदय ग्रन्थ क़े अनुसार
आँतों क़े अन्दर तुलसी पत्र स्वरस का प्रभाव कृमिनाशक एवं वातनाशक होता है.इसके प्रयोग से वमन(उल्टी )बंद होता है और पुराना कब्ज दूर होता है.दाद पर रस चुपड़ने से ठीक हो जाता है.वृणों (फोड़ों )पर स्वरस से मर्जित करने पर उनमे संक्रमण नहीं बढ़ता तथा वे जल्दी ठीक हो जाते हैं.
तुलसी बीज का चूर्ण - मूत्र दाह व विसर्जन में कठिनाई होने तथा ब्लड प्रेशर की सूजन होने व पथरी में तुरन्त लाभ करता है.
राजयक्ष्मा (T .B .)-में तुलसी जीवनी शक्ति बढ़ा कर T .B .क़े जीवाणुओं को पलने नहीं देती.
मलेरिया -तुलसी एन्टी मलेरिया है.घर क़े आस -पास लगाने से मच्छर समीप नहीं आते .इसके स्वरस का लेप करने से वे काटते नहीं तथा मुख द्वारा ग्रहण किये जाने पर उन्हें इसके सक्रिय संघटक नष्ट कर देते हैं.परन्तु याद रखें तुलसी पत्र दांतों से न चबाएं क्योंकि तुलसी में पारा (MERCURRY )होता है जो दांतों की पालिश को नष्ट कर डालता है.तुलसी पत्र स देव निगलें या जल में लें.
गर्भ -निरोधक -तुलसी पत्र क़े क्वाथ (काढ़े )की यदि एक प्याली प्रतिमास रजोदर्शन क़े बाद तीन दिन तक नियमित रूप से सेवन कराएं तो गर्भ की स्थापना नहीं होती .
बालकों क़े रोग -श्वेत तुलसी उष्ण व पाचक होने क़े कारण बालकों क़े रोगों में प्रयुक्त करते हैं.
कफ़ ज्वर -काली तुलसी ,काली मिर्च और अदरक का काढ़ा बना कर सोते समय पिलाने से कफ़ व ज्वर का नाश होता है.
काढ़ा बनाने क़े लिए तुलसी पत्र ३ ,५ ,७ , ९ ,११ आदि विषम क्रम में लें और छोटे टुकड़े कर लें व   ऐसे ही काली मिर्च लें तथा अंदाज़ से अदरक लेकर साथ में  कूट लें -इस सब को एक कप पानी में भिगोएँ और सोते समय पकाकर जब शश चौथाई कप रह जाये तो मीठा मिलाकर पिलायें.
सईनोसाईटिस -पीनस रोग में तुलसी क़े सूखे पत्तों का चूर्ण प्रयोग किया जाता है.
कर्ण शूल -तुलसी से सिद्ध किया हुआ तेल कान -दर्द में डालें तो तुरन्त आराम होता है.
कमजोरी -तुलसी की जड़ का चूर्ण प्रातः -साँय घी क़े साथ लें तो ओज व बल बढ़ता है.
प्रवाही पदार्थों में तुलसी पत्र डालकर पीने से उनकी जीवनी शक्ति में विशेष वृद्धि हो जाती हैऔर हानिप्रद कीटाणु नष्ट हो जाते हैं. इसी लिए शास्त्रों में विधान बनाया गया है कि ,पंचामृत ,चरणामृत में तुलसी दल अवश्य डालें और इसी लिए कार्तिक मास में तुलसी क़े पुष्पित होने पर इसकी पूजा ,अनुष्ठान,उदयापन,अर्चन किया जाता है.तुलसी मानव जीवन क़े लिए अमृत है.
हमारे ऋषी -मुनियों का आशय तुलसी पूजा से यह था कि हम मनुष्य अपनी मानव -जाति क़े लिए बहुउपयोगी इस औषद्धि का संरक्षण,संवर्धन करें न कि आज प्रचलित ढोंग -पाखण्ड से  था;कि वृक्ष  का पत्थर से विवाह कराकर व्यर्थ पैसा और समय बर्बाद करके फिर उसे सड़ने ,पाले में गलने क़े लिए खुले आसमान में छोड़ दें.तुलसी को कपडे से ढक कर पाले से उसकी रक्षा  करना था न कि चुनरी किसी ढोंगी को दान करके नाहक भक्त कहलाना था.काश हम अपने पूर्वजों की भावना को समझ कर अपना कल्याण कर सकें ?
मैं जानता हूँ अधार्मिक लोग इस सच्चाई का मखौल उड़ायेंगे और ढोंग व पाखण्ड को तिलांजली नहीं देंगे.फिर भी अपना कर्त्तव्य पूर्ण किया.


(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)
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Sunday, November 14, 2010

लखनऊ क़े अपने मकान में एक वर्ष

हालाँकि २३ सित.०९ को आगरा क़े अपने मकान की रजिस्ट्री क्रेता क़े पक्ष में करा दी  थी परन्तु १५ दिन अधिक रह कर ०८ अक्तू .को वहां से प्रस्थान करके ०९ अक्तू .को लखनऊ पहुँच गए थे और ०९ .१० २०१० को लिखी पोस्ट में बहुत सी बातों का विवरण दे दिया था .०४ .११ ०९ को अपने मकान की लखनऊ में रजिस्ट्री करने क़े बाद १४ .११ ० ९ को गृह-प्रवेश करके रहने आ गए थे और आज इस मकान में रहते हुए एक वर्ष पूर्ण हो गया है .


(गृह प्रवेश क़े वक़्त)



इस एक वर्ष में तमाम संघर्षों में उलझे रहने क़े बावजूद  दो उपलब्धियां भी हासिल हुईं -एक तो "क्रांति -स्वर" व " विद्रोही स्व स्वर में "ब्लाग्स क़े माध्यम से कई विद्व -जनों से संपर्क .दूसरी और सबसे बड़ी बात यह रही है कि जिस मकान क़े लिए भस्मासुर इ .सा :ने हमारा रु .एडवांस करा क़े फंसवा दिया था उसके असली मालिक की कानूनी जीत में हमारी ज्योतिषीय राय का भी योगदान रहा .जिस व्यक्ति की वह जायदाद थी उसी क़े पास रही ,हमारा एडवांस वापिस मिल गया और हम एक अलग कालोनी में एक अलग मकान में रहने लगे .उस मकान की सं .भी वही थी जो हमारे इस मकान की है ,वहां भी सामने पार्क था -यहाँ भी सामने पार्क है ;ये समानताएं देख कर उस मकान क़े वास्तविक मालिक हैरान थे .लेकिन यह सब तो गृहों का तमाशा है.

भुना चना -परमल खा -खा कर आगरा वाले मकान की किश्तें पूरी की थीं क्योंकि मुझे जाब-विहीन कर दिया गया था .दुकान -दुकान नौकरी करके गुजारा कर रहे थे .इस तरह हासिल उस बड़े मकान को बेच कर यहाँ छोटा मकान लेना भी हमारे निकटतम व घनिष्ठतम रिश्तेदारों को बुरा लगा है .ज्यादातर को हमारा वापिस लखनऊ आना ही नहीं सुहाया है .पहले मेरी पत्नी पूनम पर शक किया गया कि उनके रिश्तेदार यहाँ होंगे इस लिए लखनऊ पसंद किया होगा .हकीकत यह है कि पूनम पटना क़े श्रीवास्तव परिवार की हैं जिनका कोई रिश्तेदार न आगरा में था न लखनऊ में है .जब यह लगा कि यशवन्त की ख्वाहिश लखनऊ आने की थी तो उसके विरुद्ध हो गए -यहाँ तक कि गत वर्ष जब वह कानपुर   में जाब कर रहा था और वहां अकेला था उसको जनम -दिन की बधाई नहीं दी गई उन लोगों द्वारा भी जिनके खुद क़े ही नहीं उनके बच्चों और बच्चों क़े भी बच्चों क़े जनम -दिन पर हम बिला नागा मुबारकवाद देते हैं .मेरे लिए तो इस बात का कोई महत्त्व नहीं था परन्तु खुद यशवन्त को थोडा अटपटा लगा ;अब वह इस वर्ष हम लोगों क़े साथ है और उसका कहना है कि यदि इस बार वे जनम -दिन पर संपर्क करेंगे तो उस पर मैं उन लोगों से बात करने का दबाव न डालूं क्योंकि पूरे एक वर्ष उन लोगों ने उसका हाल-चाल तक न पूंछा है .हमारी बउआ की एक रिश्तेदार जिन्होंने १९७३ में मुझे अपने माता -पिता से अलग होने को कहा था और मैंने उन्हें ससम्मान ऐसा करने से इनकार कर दिया था . (१९७८ से मृत्यु पर्यंत १९९५ तक बउआ -बाबूजी मेरे साथ ही रहे )संभवतः उन्ही ने अपने न्यू हैदराबाद क़े संपर्कों क़े आधार पर एक ब्लागर को भरमाकर यशवन्त को मेरे विरुद्ध करने का प्रयास किया ;उन्हें कामयाबी मिली या नाकामयाबी इसे वे लोग ही जाने .मै इतना ही बताना चाहता हूँ कि हमारी  माँ क़े विरुद्ध अभियान चलाने वाली और हमारे भाई को हमारे विरुद्ध करने वाली उन रिश्तेदार की अपनी छोटी पुत्र -वधु उनके पौत्र को लेकर अलग हो गई है और उन पर मुकदमा चला दिया है ; उन्ही क़े एक देवर ने बताया था .परमात्मा और पृकृति क़े न्याय का ढंग बेहद अनूठा होता है जिसे "मानव " प्राणी समझ ही नहीं पाता है और ठोकरें खा कर भी गलती पर गलती करता जाता है क्योंकि वह अहंकार में अपने को सदा सही ही समझता रहता है .खैर गलतियां करना और गालियाँ देना तो आज क़े बड़े (समृद्ध )लोगों का दस्तूर है.

हमारे इर्द -गिर्द भस्मासुर इ .सा :की मेहरबानी से मेरे ही नहीं मेरे पुत्र क़े भी पोफेशन क़े विरुद्ध दुष्प्रचार करने वालों की कमी नहीं है.मेरी श्रीमती जी को यह सब बहुत कचोटता है .मुझे फर्क इसलिए नहीं पड़ता क्योंकि मैं इस सब क़े होने वाले अंजाम का अंदाजा रखता हूँ .लखनऊ नगर क़े ही एक और अच्छे ब्लागर सा :से सपर्क हुआ और फोन वार्ता भी लेकिन अब नाम सार्वजनिक नहीं कर रहा हूँ .स्थानीय लोग हमें मूर्ख समझते हैं जबकि ब्लाग -जगत में यशवन्त को तथा कुछ हद तक मुझे भी विद्वजनो की प्रशंसा व समर्थन मिल रहा है. पत्रकार स्व .शारदा पाठक ने स्वंय अपने लिए जो पंक्तियाँ लिखी थीं ,मैं भी अपने ऊपर लागू समझता हूँ :-


लोग कहते हम हैं काठ क़े उल्लू ,हम कहते हम हैं सोने क़े .
इस दुनिया में बड़े मजे हैं  उल्लू   होने   क़े ..


ऐसा इसलिए समझता हूँ जैसा कि सरदार पटेल क़े बारदौली वाले किसान आन्दोलन क़े दौरान बिजौली में क्रांतिकारी स्व .विजय सिंह 'पथिक 'अपने लिए कहते थे मैं उसे ही अपने लिए दोहराता रहता हूँ :-

यश ,वैभव ,सुख की चाह नहीं ,परवाह नहीं जीवन न रहे .
इच्छा है ,यह है ,जग में स्वेच्छाचार  औ दमन न रहे ..

अपनी क्षमता व सामर्थ्य क़े अनुसार अपने ब्लाग क़े माध्य्यम से लोगों को जागरूक करने और पाखण्ड से हटाने का प्रयास करता रहता हूँ .यदि कोई एक भी इनसे लाभ उठा सका तो वह मेरे लिए बोनस है ;वर्ना मै तो अपना कर्त्तव्य समझ कर लिखता जा रहा हूँ ,उसका फल तो उसे ही मिलेगा जो उसका पालन करेगा ,मुझे तो उतना ही फल मिलेगा जितने का मै पालन करता हूँ .दीपावली पर कुछ अन्य ब्लागर्स ने भी पटाखा,कृत्रिम रोशनी आदि आडम्बरों क़े विरुद्ध अपने आलेख लिखे जिन्हें पढ़ कर खुशी हुयी और यह एहसास भी हुआ कि सिर्फ मै ही अकेला नहीं हूँ .मैंने पटाखों को मानवीय क्रूरता का द्योतक बताया था तो उसकी पुष्टी एक अन्य ब्लागर क़े आलेख से हो जाती है जिसमे उन्होंने बताया है कि ,सिवाकासी में लगभग एक लाख बच्चे आतिशबाजी क़े धंधे में लगे हैं और अक्सर दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं.विदेशियों ने उन पर फीचर फिल्म तैयार की है और हमारे देशवासी उनकी ओर से मुंह मोड़े हुए हैं .ऐसे ब्लागर्स का समर्थन करना मेरा फ़र्ज़ था अतः मैंने उनके यहाँ अपनी अनुकूल टिप्पणियाँ दीं हैं .जैसा कुछ ब्लागर्स ने लिखा है कि टिपणी लिखना लेन -देन है (एक अच्छे ब्लागर सा :ने दीवाली गिफ्ट से तुलनात्मक व्यंग्य किया वह अलग बात है )मैं उनसे सहमत नहीं हो सकता  . ठीक बात है तो हमारा नैतिक दायित्व है कि हम उनका समर्थन करें और यह उम्मीद मैं नहीं करता हूँ कि बदले में वे भी आकर मेरे ब्लाग पर जवाबी टिप्पणी करें .मैं तो स्वान्तः सुखाय ,सर्वजन -हिताय लिखता हूँ और लिखता रहूँगा .मेरी तो ख्वाहिश यह है कि पाठक ब्लॉगर बजाये मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी करने क़े अपने जीवन में उन बातों से जो लाभ उठा सकते हैं -अवश्य उठायें .



(दीवाली हवन क़े फोटो)
 हम तो अक्सर ही हवन करते हैं .समस्त शुभ कार्यों ,जनम -दिवस ,शादी की सालगिरह आदि (बहन ,भाई ,भांजियों व उनके बच्चों ,भतीजी तथा श्रीमतीजी क़े भी निकटतम घनिष्ठ्त्तम लोगों क़े )हम हवन ही करते हैं.हमने चाहा था कि कालोनी क़े लोगों को "हवन -विज्ञान "की ओर मोड़ा जाये लेकिन ज्यादा पढ़े -लिखे ,समृद्ध -पैसे वालों को ढोंग -पाखण्ड से कैसे दूर किया जाये इसकी कला न जानने क़े कारण असफल रहे.वे लोग कान -फोडू भोंपू बजा -बजा कर भगवद ,रामायण का तमाशा करते हैं और राम व कृष्ण क़े जो हवन क़े अनुगामी थे का अनुसरण नहीं करते .हम बेबस होकर देखते रह जाते हैं और ब्लाग पर लिख कर तसल्ली कर लेते हैं क्योकि अकबर इलाहाबादी ने कहा है :-
न खींचो तीर -कमानों को न तलवार निकालो
जब तोप मुक़ाबिल हो तो अखबार निकालो .

"क्रांति -स्वर " व "विद्रोही स्व -स्वर में" दो अखबार निकालना चाहते थे ,आर्थिक व व्यवसायिक क्षमता नहीं थी इसलिए बेटे क़े व्यवसाय का इस्तेमाल कर इसी नाम क़े दो ब्लॉग आप लोगों की सेवा में प्रस्तुत किये हैं .आप लोगों का यदि कुछ भी भला हो सके तो वही मेरी सफलता है.मैं तो नन्द लाल जी द्वारा बताई आत्मिक -शक्ति का पालन करता हूँ ,आप भी चाहें तो सुन सकते हैं. :-





(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

Monday, November 8, 2010

तोड़-फोड़ और प्लास्टिक पिरामिड वास्तविक समाधान नहीं

भारतीय भवन की निर्माण विधि ही वास्तु -कला है जो संसार -प्रसिद्द रही है .लेकिन चीन  की फेंगशुई से प्रभावित वर्तमान वास्तु -शास्त्र महज एक पाखण्ड क़े रूप में सामने आया है .आज क़े वास्तु -शास्त्री या तो तोड़ -फोड़ का सहारा ले रहे हैं या समाधान क़े रूप में प्लास्टिक क़े बने पिरामिडों या विशेष मिरर का प्रयोग करवा कर लोगों को उलटे उस्तरे से मूढ़ रहे हैं.आधुनिकता की अंधी दौड़ में लोग भी ऐसे ही पम्प एन्ड शो वैज्ञानिकों क़े द्वार खटखटाते हैं फिर चाहे वे ऊंची दुकानऔर फीका पकवान ही क्यों न निकलें .याद रखिये मानव जीवन अमूल्य है और यह ५० प्रतिशत भाग्य अर्थात प्रारब्ध तथा ५० प्रतिशत वास्तु पर निर्भर करता है.यदि भवन -कला में वास्तु का ध्यान न रक्खा जाये तो वह शून्य होती है और आज की सिविल इंजीनियरिंग तथा आर्किटेक्ट ऐसी ही विधाएं हैं.वास्तु -शास्त्र में धर्म तथा ज्योतिष का ध्यान रक्खा जाता है जबकि इंजीनियरिंग व आर्किटेक्ट में इन दोनों को  कोई स्थान नहीं दिया जाता है .आज की इंजीनियरिंग ,आर्किटेक्ट और फेंगशुई विधाएं विदेशों से आयी हैं और इनके प्रति लोगों में तीव्र ललक है .अपने देश की गरिमामय और श्रेष्ठत्तम वास्तु कला को बहुत कम लोग जानते व महत्त्व देते हैं .पंजाब की एक प्रसिद्द लोक कहावत है -
ने ड़ो तीर्थ गाँव गुरु ,गलियों हंदा देव .
इत्तरा ही महिमा नहीं ,संत भाखै सहदेव ..

अर्थात अपने गाँव क़े नजदीकी तीर्थ का गाँव में कोई महत्त्व नहीं होता.अपनी जाति एवं गाँव क़े विद्वान का उसकी जाति एवं उसके गाँव में कोई महत्त्व नहीं होता .बहुत सटीक है यह पंजाबी कहावत जो मेरे निजी अनुभव में पूरी खरी उतरती है .मुझे -केमिस्ट्री में पी .एच .डी.किये हुए डा .उपाध्याय ,जूलाजी में पी .एच .डी .किये हुए डा .तिवारी ,मर्चेंट नेवी क़े अधिकारी श्री पालीवाल ,शिक्षक नेता और पी .सी .सी .सदस्य श्री द्विवेदी  क़े घरों पर हवन कराने का अवसर प्राप्त हुआ है जो उनकी पूर्ण संतुष्टि क़े साथ संपन्न हुए हैं और उन लोगों ने उनका भरपूर लाभ उठाया है जबकि अपनों क़े बीच स्थिति एक बेगाने जैसी है .
संक्षेप में वास्तु शास्त्र से सम्बंधित कुछ सूत्र बताना अपना फ़र्ज़ समझता हूँ यदि जिनका पालन किया जाये तो लाभ प्राप्त हो सकता है ;जैसे -
जल -बोरिंग ईशान (N .E .),उत्तर (N .) ,पूर्व (E .),पश्चिम (W .) में तो कराना ठीक है .इसी प्रकार जल का कनेक्शन इन दिशाओं में ठीक है .आग्नेय (S .)में पत्नी का नाश ,वावव्य  (S .W .)में शत्रु द्वारा पीड़ा तथा घर क़े मध्य में कराने पर सग्रहित धन का नाश करता है .
पाट ,गाडर बीम -क़े नीचे बैठना मृत्यु को दावत देना ,आयु को क्षीण करना एवं अशुभ को आमंत्रित करना है.
मुख्य द्वार -यदि मुख्य द्वार सही है तो घर में ऋद्धी-सिद्धी सब प्रकार क़े मंगल कार्यों की वृद्धी होती है .घर क़े सदस्यों की रक्षा होती है एवं वंश बेल आगे बढ़ती है .निम्नलिखित तथ्य द्वार -वेध की श्रेणी क़े हैं जो विपरीत फल देते हैं ,यथा मुख्य द्वार खोलते ,बंद करते समय किसी प्रकार की अप्रिय आवाज़ का आना ,किसी पेड़ या पौधे का होना ,दीवार का कोना ,खम्बा ,खाई ,कुआँ ,कीचड ,गली ,मंदिर की छाया ,पीपल की छाया ,कब्र ,लम्बोतर गली ,किसी प्रकार का बंद होना द्वार वेध है .

आज कल बाज़ार में उपलब्ध वास्तु विद्या  क़े ग्रन्थ एवं उनके अनुसार लोगों को दिशा देने वाले लब्ध -प्रतिष्ठित  वास्तु वैज्ञानिक भारतीय वास्तु -शास्त्र क़े ज्ञान से अनभिज्ञ होने क़े कारण अथवा धन क़े लोभ में लोगों को भ्रमित कर रहे हैं.भारतीय वैदिक वास्तु -विज्ञान की कसौटी पर वही जीवन श्रेष्ठ होता है जो ग्रह स्वामी हेतु किसी भी परिस्थिति में अधिक सुरक्षा ,अधिक स्वस्थ वातावरण तथा अधिक सुविधा प्रदान करता है .ऐसे भवन में निवास करने वाले व्यक्ति सभी विपदाओं से मुक्त रहते हुए ,सुक्ख -पूर्वक शीघ्र ही जीवन क़े मुख्य उद्देश्य धर्म ,अर्थ ,काम एवं मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं .परन्तु इसके विपरीत इन तीनो गुणों  से विहीन व्यक्ति को शारीरिक ,मानसिक तथा प्राकृतिक पीडाओं से दुखी रहना पड़ता है .प्राचीन वास्तु विज्ञान क़े स्थान पर वर्तमान में प्रचलित पाखंडपूर्ण वास्तु विद्या  से ऐसी ही दुर्गति हो रही है .आज क़े वास्तु -विशेषज्ञ या तो तोड़ -फोड़ को वरीयता देते हैं अर्थात रसोई ,शौचालय आदि को तोड़ कर बदलने का सुझाव देते हैं अथवा प्लास्टिक क़े पिरामिड या विशेष मिरर लगाने को कहते हैं .तोड़ -फोड़ किसी समस्या का समाधान नहीं है .प्लास्टिक एक ताप कुचालक (Bad conductor of heat )है जो ग्रह -नक्षत्रों से आने वाली रश्मियों (Rays )को परावर्तित कर देता है अतः उसका प्रयोग करना अथवा न करना एक बराबर है .यदि आपके भवन में दोष है और उनका आसान विकल्प तोड़ -फोड़ नहीं है तो आप वास्तु दोष निवारणार्थ वास्तु यन्त्र  तथा वास्तु हवन का सहारा ले सकते हैं .हवन पूर्ण वैज्ञानिक पद्धति है जिसमे डाले गए पदार्थों को अग्नि परमाणुओं (Atoms ) में विभक्त कर देती है और वायु उन परमाणुओं को बोले गए मन्त्रों की शक्ति से सम्बंधित ग्रह -नक्षत्रों तथा देवताओं तक पहुंचा देती है जो आपके वास्तु -दोषों का शमन कर आपको राहत देते हैं.अतएव हवन -पद्धति अपना कर आप तोड़ -फोड़ व कृत्रिम उपाय क़े निष्फल से बच सकते हैं.


नोट -यह लेख अग्र मन्त्र ,फरवरी २००४ में आगरा में छप  चुका है ,इसे ब्लॉग जगत क़े बुद्धिमान लोगों क़े भले हेतु पुनः प्रकाशित किया जा रहा है.


 (इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

Friday, November 5, 2010

भारत की भाग्य लक्ष्मी क्यों रूठी ?



इसी शीर्षक से २२ -२३ वर्ष पूर्व नवभारत टाईम्स ,नयी दिल्ली क़े दीपावली अंक में वित्त -वार्ता पृष्ठ  पर श्री ललितेश्वर श्रीवास्तव का एक लेख छपा था जिसमे उन्होंने भारत की आर्थिक समस्यायों का विश्लेषण किया था .परन्तु यहाँ इस आलेख द्वारा प्रतिष्ठित ब्लॉगर श्री ब्रिज मोहन श्रीवास्तव सा :द्वारा मेरी पोस्ट "पूजा क्या ,क्यों और कैसे ?"पर की गई टिप्पणी क़े अंतर्गत हवन क़े सम्बन्ध में व्यक्त आशंका को आधार बना कर भारत क़े उज्जवल भविष्य हेतु कुछ प्रकाश डालने का प्रयास किया जा रहा है .

सबसे पहली बात

उक्त ब्लागर सा: ने जिन आचार्यजी का उल्लेख किया है उनकी उपलब्धि भारत में पाखण्ड और ढोंग की पुनर्स्थापना करना ही है .१८५७ की क्रान्ति में सक्रिय भाग लेने क़े १७ -१८ वर्ष बाद महर्षि दयानंद सरस्वती ने १८७५ ई .में आर्य समाज की स्थापना कर पाखण्ड -खंड्नी पताका फहरा दी थी .लोग जागरूक होने लगे थे और दस वर्ष बाद स्थापित इंडियन नेशनल कांग्रेस क़े इतिहास क़े लेखक डा .पट्टाभीसीतारमैय्या ने लिखा है कि आज़ादी क़े आन्दोलन में भाग लेने वाले कांग्रेसियों में ९० प्रतिशत आर्य समाजी थे .उक्त आचार्यजी ने आर्य समाज की रीढ़ तोड़ दी ,उन्होंने गायत्री मन्त्र को मूर्ती में बदल डाला ;उनके अनुयाइयों  ने वेदों की भी मूर्तियाँ बना डालीं .उन आचार्यजी और उनकी श्रीमतीजी की समाधि पर क़े चढ़ावे को लेकर उनके पुत्र और दामाद में घमासान चल रहा है .उनका संगठन प्रारंभिक हवन समिधाएँ ४ रखता है -धर्म ,अर्थ ,काम ,मोक्ष  हेतु .जबकि परमात्मा ,आत्मा और प्रकृति क़े निमित्त तीन ही खडी समिधाएँ लगाई जाती हैं और तीन ही समिधाओं की प्रारम्भिक आहुतियाँ दी जाती हैं .जब आप नियमानुसार हवन कर ही नहीं रहे तब परिणाम क़े अनुकूल होने की अपेक्षा  क्यों ?
                         दूसरी बात यह है

योगीराज श्री कृष्ण ने गीता में १६ वें अध्याय क़े १७ वें श्लोक में कहा है -

"आत्मसम्भावितः स्तब्धा धन मान मदान्वितः .
यजन्ते नाम यज्ञेस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम."

अर्थात अपनी स्तुति आप करने वाले ,अकड्बाज़ ,हठी, दुराग्रही ,धन तथा मान क़े मद में मस्त होकर ये पाखण्ड क़े लिए शास्त्र की विधि को छोड़ कर अपने नाम क़े लिए यज्ञ (हवन )किया करते हैं .
स्वभाविक है कि जो हवन अवैज्ञानिक होंगे उनका कोई प्रभाव नहीं हो सकता .अतः आवश्यकता है सही वैज्ञानिक विधि से हवन करने की न कि व्यर्थ भटक कर हवन को कोसने की या मखौल उड़ाने की .

तीसरी बात फिर विदेशियों से

"परोपकारी" पत्रिका क़े अनुसार भोपाल क़े उपनगर (१५ कि .मी .दूर )बेरागढ़ क़े समीप माधव आश्रम में अमेरिकी मनोवैज्ञानिक मिसेज पेट्रिसिया हेमिल्टन ने बताया कि "होम -चिकित्सा " अमेरिका ,चिली ,और पोलैंड में प्रासंगिक हो रही है .राजधानी वाशिंगटन में "अग्निहोत्र -विश्वविद्यालय "की स्थापना हो चुकी है .
बाल्टीमोर में ४ सित .१९७८ से अखंड अग्निहोत्र चल रहा है .जर्मनी की एक कंपनी ने अग्निहोत्र की भस्म से सिर -दर्द ,जुकाम ,दस्त ,पेट की बीमारियाँ ,पुराने ज़ख्म व आँखों की बीमारियाँ दूर करने की दवाईंया बनाना प्रारम्भ कर दिया है .

चौथी बात यह 

इस ब्लाग में पिछली कई पोस्ट्स क़े माध्यम से वैज्ञानिक हवन पद्धति पर विस्तार से लिख चुका हूँ अतः यहाँ अब और दोहराव नहीं किया जा रहा है .मुख्य प्रश्न यह है कि हमारा देश जब पहले समृद्ध था -सोने की चिड़िया कहलाता था तो फिर क्या हुआ कि आज हम I .M .F  और World Bank क़े कर्जदार हो गए हैं .विकास -दर की ऊंची -ऊंची बातें करने क़े बावजूद अभी यह दावा नहीं किया जा सकता कि हमने अपने पुराने गौरव को पुनः हासिल कर लिया है.
        पांचवीं बात वास्तु की

हमारा भारतवर्ष वास्तु शास्त्र क़े नियमों क़े विपरीत प्राकृतिक संरचना वाला देश है .वास्तु क़े अनुसार पश्चिम और दक्षिण ऊंचा एवं भारी होना चाहिए तथा पूर्व व उत्तर हल्का व नीचा होना चाहिए .हमारे देश क़े उत्तर से पूर्व तक हिमालय पर्वत है तथा दक्षिण एवं पश्चिम में गहरा समुद्र है .लेकिन प्राकृतिक प्रतिकूल परिस्थितियों क़े बावजूद आदि -काल से हमारे यहाँ वैदिक (वैज्ञानिक )पद्धति से हवन होते थे .न तो लोग हवन का मखौल उड़ाते थे न ही ढोंग -पाखण्ड चलता था;जैसा कि आज हवन क़े साथ हो रहा है और यह सब वे कर रहे हैं जो कि स्वयंभू ठेकेदार हैं भारतीय -संस्कृति क़े और जो दूसरों को भारतीय -संस्कृति का पाठ पढ़ा रहे हैं .
प्रत्येक शुभ कार्य से पहले सर्वप्रथम वास्तु -हवन होता था (१५ संस्कारों में ) सिर्फ अंतिम संस्कार को छोड़ कर ;उसके बाद फिर सामान्य -होम होता था .संस्कार विधि में महर्षि  स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी वास्तु- हवन का विस्तृत वर्णन किया है .लेकिन महाभारत -काल क़े बाद जब वैदिक -संस्कृति का पतन हुआ तब हवन पद्धति को विस्मृत किया जाने लगा उसी का यह नतीजा रहा कि हम हज़ार साल से ज्यादा गुलाम रहे और आज ६३ वर्ष की आज़ादी क़े बाद भी हमारे बुधीजीवी तक गुलामी क़े प्रतीकों से चिपके रहने में खुद को गौरान्वित महसूस करते हैं .यही कारण है कि भारत की भाग्य लक्ष्मी रूठी है और तब तक रूठी ही रहेगी जब तक कि हम भारतवासी पुनः  अपने वैदिक -विज्ञान को अंगीकार नहीं कर लेते .
 
लेकिन एक और दुखद पहलू है कि महर्षि द्वारा स्थापित संगठन "आर्य -समाज " में आज रियुमर स्पिच्युटेड सोसाईटी की घुसपैठ हो गई है और वह इस संगठन को अन्दर से खोखला कर रही है ताकि ढोंग और पाखण्ड का निष्कंटक राज कायम रह सके.आज दीपावली का पावन पर्व है और महर्षि का निर्वाण -दिवस भी.आइये एक बार फिर इस महान आत्मा द्वारा किये कार्यों को याद कर लें और उनकी सीख को मान कर भारत की रूठी भाग्य -लक्ष्मी को साधने का प्रयास करें .

कविवर "शंकर"जी ने मूल -शंकर अर्थात स्वामी दयानंद जी क़े बारे में जो रचना की उसे सुनने का कष्ट करें :-


स्वामी जी कैसा भारत चाहते थे ,भजनोपदेशक "विजय सिंह " जी की रचना से जानिये :-



हमारे उपरोक्त विचारों की पुष्टि -"हिंदुस्तान" लखनऊ क़े आज सम्पादकीय में व्यक्त विचारों से भी होती है.आप स्वयं देखें-

Tuesday, November 2, 2010

धन तेरस ---धन्वन्तरी जयंती


 दीपावली पर्व धन तेरस से शुरू होकर भाई दूज तक पाँच दिन मनाया जाता है .इस पर्व को मनाने क़े बहुत से कारण एवं मत हैं .जैन मतावलम्बी महावीर जिन क़े परिनिर्वाण तथा आर्य समाजी महर्षि दयानंद सरस्वती क़े परिनिर्वाण दिवस क़े रूप में दीपावली की अमावस्या को दीप रोशन करते हैं .शेष अवधारणा यह है कि चौदह वर्षों क़े वनवास क़े बाद श्री राम अयोध्या इसी दिन लौटे थे ,इसलिए दीपोत्सव करते हैं .

हमारा भारत वर्ष कृषि -प्रधान था और अब भी है .हमारे यहाँ दो मुख्य फसलों रबी व खरीफ क़े काटने पर होली व दीपावली पर्व रखे गए .मौसम क़े अनुसार इन्हें मनाने की विधि में अंतर रखा गया परन्तु होली व दीवाली हेतु वैदिक आहुतियों में ३१ मन्त्र एक ही हैं .दोनों में नए पके अन्न शामिल किये जाते हैं .होली क़े हवन में गेहूं ,जौ,चना आदि की बालियों को आधा पका कर सेवन करने से आगे गर्मियों में लू से बचाव हो जाता है .दीपावली पर मुख्य रूप से धान और उससे बने पदार्थ खील आदि नये गन्ने क़े रस से बने गुड खांड ,शक्कर आदि क़े बने बताशे -खिलौने आदि हवन में शामिल करने का विधान था .इनके सेवन से आगे सर्दियों में कफ़ आदि से बचाव हो जाता है .


आज भौतिक प्रगति और आध्यात्मिक अवनति  क़े युग में होली और दीवाली दोनों पर्व वैज्ञानिक पद्धति से हट कर मनाये जा रहे हैं .होली पर अबीर ,गुलाल और टेसू क़े फूलों का स्थान रासायनिक रंगों ने ले लिया है जिसने इस पर्व को विकृत कर दिया है .दीपावली पर पटाखे -धमाके किये जाने लगे हैं जो आज क़े मनुष्य की क्रूरता को उजागर करते हैं .मूल पर्व की अवधारणा सौम्य और सामूहिक थी .अब ये दोनों पर्व व्यक्ति की सनक ,अविद्या ,आडम्बर आदि क़े प्रतीक बन गए हैं .इन्हें मनाने क़े पीछे अब समाज और राष्ट्र की उन्नति या मानव -कल्याण उद्देश्य नहीं रह गया है.

दीपावली का प्रथम दिन अब धन -तेरस क़े रूप में मनाते हैं जिसमे  नया बर्तन खरीदना अनिवार्य बताया जाता है और भी बहुत सी खरीददारियां की जाती हैं .एक वर्ग -विशेष को तो लाभ हो जाता है शेष सम्पूर्ण जनता ठगी जाती है. आयुर्वेद जगत क़े आदि -आचार्य धन्वन्तरी का यह जनम -दिन है जिसे धन -तेरस में बदल कर विकृत कर दिया गया है .इस बार उदय तिथि की त्य्रोदाशी गुरूवार ४ नव .को पड़ रही है .अतः धन्वन्तरी जयंती ४ नोव . को ही मनाई जायेगी परन्तु एक दिन पूर्व ही धनतेरस माना ली जायेगी क्योंकि उसका ताल्लुक मानव -स्वास्थ्य क़े कल्याण से नहीं चमक -दमक ,खरीद्दारीसे है.


मानव स्वास्थ्य क़े चिन्तक ४ नव .की प्रातः हवनादि द्वारा आचार्य -धन्वन्तरी की जयंती मनाएंगे .उस दिन त्रियोदशी तिथि दोप .०३ :५७ तक ही है और उसके बाद भद्रा लग रही है तथा दोप .०१ :३० से ०३ : ०० तक राहू काल भी होगा अतः हवन दोप .०१ .३० से पूर्व ही करना चाहिए .
आचार्य -धन्वन्तरी आयुर्वेद क़े जनक थे .आयुर्वेद अथर्ववेद का उपवेद है .इस चिकित्सा -पद्धति में प्रकृति क़े पञ्च -तत्वों क़े आधार पर आरोग्य किया जाता है .
भूमि +जल =कफ़
वायु +आकाश = वात
अग्नि  = पित्त

पञ्च -तत्वों को आयुर्वेद में वात ,पित्त ,कफ़ तीन वर्गों में गिना जाता है .जब तक ये तत्व शरीर को धारण करते हैं धातु कहलाते हैं ,जब शरीर को दूषित करने लगते हैं तब दोष और जब शरीर को मलिन करने लगते हैं तब मल कहलाते हैं .कलाई -स्थित नाडी पर तर्जनी ,मध्यमा और अनामिका उँगलियों को रख कर अनुमान लगा लिया जाता है कि शरीर में किस तत्व की प्रधानता या न्यूनता चल रही है और उसी क़े अनुरूप रोगी का उपचार किया जाता है .(अ )तर्जनी से वात ,(ब )मध्यमा से पित्त तथा (स )अनामिका से कफ़ का ज्ञान किया जाता है .

ज्योतिष में हम सम्बंधित तत्व क़े अधिपति ग्रह क़े मन्त्रों का प्रयोग करके तथा उनके अनुसार हवन में आहुतियाँ दिलवा कर उपचार करते हैं .साधारण स्वास्थ्य -रक्षा हेतु सात मन्त्र उपलब्ध हैं और आज की गंभीर समस्या सीजेरियन से बचने क़े लिए छै विशिष्ट मन्त्र उपलब्ध हैं जिनके प्रयोग से सम्यक उपचार संभव है .एक प्रख्यात आयुर्वेदाचार्य (और ज्योतिषी  ) जी ने पंजाब -केसरी में जनता की सुविधा क़े लिए बारह बायोकेमिक दवाईओं को बारह राशियों क़े अनुसार प्रयोगार्थ एक सूची लगभग तेईस वर्ष पूर्व दी थी उसे आपकी जानकारी क़े लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ .सूर्या की चाल पर आधारित इस राशि क्रम  में बायोकेमिक औशाद्धि का प्रयोग करके स्वस्थ रहा जा सकता है और रोग होने पर उस रोग की दवाई क़े साथ इस अतिरिक्त दवाई का प्रयोग जरनल टॉनिक क़े रूप में किया जा सकता है :-
       
बायोकेमिक दवाईयां होम्योपैथिक स्टोर्स पर ही मिलती हैं और इनमे कोई साईड इफेक्ट  या रिएक्शन नहीं होता है ,इसलिए स्वस्थ व्यक्ति भी इनका सेवन कर सकते हैं .इन्हें 6 x  शक्ति में 4 T D S ले सकते हैं .
अंग्रेजी  कहावत है -A healthy  mind  in  a healthy body  लेकिन मेरा मानना है कि "Only  the healthy  mind will keep the body healthy ."मेरे विचार की पुष्टि यजुर्वेद क़े अध्याय ३४ क़े (मन्त्र १ से ६) इन छः  वैदिक मन्त्रों से भी होती है . इन मन्त्रों का पद्यात्माक भावानुवाद  श्री ''मराल'' जी ने किया है आप भी सुनिये और अमल कीजिए :-
     

आप क़े मानसिक -शारीरिक स्वास्थ्य की खुशहाली ही हमारी दीवाली है .आप को सपरिवार दीपावली की शुभकामनाएं .


(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)