Monday, September 5, 2011

सत्ता-संघर्षों की दास्तान ------ विजय राजबली माथुर

आज भी मुझे याद है कि 05 सितंबर 1962 को कक्षा 06 मे रूक्स हायर सेकेन्डरी स्कूल (जो अब रवीन्द्र नाथ टैगोर इंटर कालेज हो गया है),बरेली कैंट मे कक्षाध्यापक दीना नाथ जी ने बताया था कि उस सुबह सर्व-प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने सर्व पल्ली डा राधाकृष्णन को माल्यार्पण कर अभिनंदन किया था। तब से उनका जन्मदिन प्रतिवर्ष 'शिक्षक दिवस ' के रूप मे मनाया जा रहा है। अब तो छात्रों से शिक्षकों हेतु चन्दा लिया जाता है लेकिन तब हम लोगों से नहीं लिया जाता था बल्कि शिक्षक गण बंद डिब्बे मे आम जनता से चन्दा एकत्र करते थे। दीना नाथ जी ने जिन 5 छात्रों को अपनी टीम मे साथ लिया था उनमे एक मुझे भी शामिल कर लिया था। लिहाजा छुट्टी हो जाने के बावजूद मुझे भी  उनके साथ बाजार-बाजार घूमना पड़ा। लौटते मे उन्होने बिस्कुट सब को खिलवा दिये थे। वह ही सब को उनके घर तक छोडने गए थे। एक सहपाठी के पिताजी और मेरे बाबूजी गोला बाजार मे खड़े थे हम लोगों की फिक्र मे,दीना नाथ जी ने उन दोनों को समझा दिया कि वह अपने साथ ले गए थे। तब के शिक्षकों मे आत्मीयता थी।

डा राधाकृष्णन जी को दार्शनिक राष्ट्रपति कहा गया है जबकि डा राजेन्द्र प्रसाद जी का चिंतन और लेखन भी दार्शनिक था । नेहरू जी ने उनसे मतभेद के चलते उन्हें तीसरा चांस नहीं दिया था। राधा कृष्णन जी 16 वर्ष लंदन मे अग्रेज़ी के अध्यापक रहे थे और नेहरू जी को बेहद प्रिय थे। 1962 मे चीनी आक्रमण मे भारत की फौजी पराजय के सदमे से नेहरू जी गंभीर रूप से बीमार पड़ गए तब 1963 मे राधाकृष्णन जी की महत्वाकांक्षा जाग्रत हो गई। के कामराज नाडार ,कांग्रेस अध्यक्ष जो उनके प्रांतीय भाषी थे से मिल कर उन्होने नेहरू जी को हटा कर खुद प्रधान मंत्री बनने और कामराज जी को राष्ट्रपति बनवाने की एक गुप्त स्कीम बनाई। परंतु उनका दुर्भाग्य था कि( वह नहीं जानते थे कि उनके एक बाड़ी गार्ड साहब जो तमिल भाषी न होते हुये भी अच्छी तरह तमिल समझते थे ) नेहरू जी तक उनकी पूरी स्कीम पहुँच गई जिसका खुलासा उस सैन्य अधिकारी ने अवकाश ग्रहण करने के पश्चात अपनी जीवनी मे किया है।

'कामराज प्लान' मे भ्रष्ट और वृद्ध लोगों को हटा कर नए लोगों को आगे लाने की बात थी। यू पी मे चंद्र भानू गुप्ता खुद हट गए और फैजाबाद से सांसद श्रीमती सुचेता कृपलानी को मुख्यमंत्री बनवा दिया। इसी प्रकार दूसरे प्रदेशों के मुख्यमंत्री भी बदल गए। पी एम नहरूजी ने भी हटने का प्रस्ताव इस प्रकार किया कि उसे कांग्रेस पार्टी ने रिजेक्ट कर दिया और कामराज जी मुंह देखते रह गए। यह गैर-राजनीतिक और दार्शनिक राधाकृष्णन जी की भी पराजय थी।

आज 48 वर्ष बाद कांग्रेस मे उस कहानी को दूसरे ढंग से दोहराया गया है। अब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया जी गंभीर बीमारी का इलाज करने जब अमेरिका चली गईं तो उनकी गैर हाजिरी मे उनके द्वारा नियुक्त 4 सदस्यीय कमेटी (राहुल गांधी जिसका महत्वपूर्ण अंग हैं)को नीचा दिखाने और सोनिया जी को चुनौती देने हेतु गैर राजनीतिक और अर्थशास्त्री प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह जी ने अपने पुराने संपर्कों(I M F एवं WORLD BANK) को भुनाते हुये फोर्ड फाउंडेशन से NGOs को भारी चन्दा दिला कर और बागी इन्कम टैक्स अधिकारी अरविंद केजरीवाल तथा किरण बेदी (असंतुष्ट रही पुलिस अधिकारी) के माध्यम से पूर्व सैनिक 'अन्ना हज़ारे' को मोहरा बना कर 'भ्रष्टाचार' विरोधी सघन आंदोलन खड़ा  करवा दिया।

सोनिया समर्थक कांग्रेसी इस चाल को समझ और देख रहे थे कि किस प्रकार सुषमा स्वराज (भाजपा नेता) प्रधानमंत्री को सहयोग कर रही हैं। चाहे का गुरुदास दास गुप्ता द्वारा प्रस्तुत 'निंदा' प्रस्ताव हो चाहे अन्ना का अनशन समाप्त कराने का प्रस्ताव भाजपा सरकार के साथ खड़ी थी।

1991 मे जब रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर मनमोहन सिंह जी वित्त मंत्री बने तब उनकी नीतियों को अमेरिका जाकर आडवाणी साहब ने भाजपा की नीतियों को चुराया जाना बता कर सराहा था। भाजपा/जनसंघ तो थे ही साम्राज्यवाद संरक्षक परंतु 1980 मे इंदिराजी ने जनता पार्टी को शिकस्त देने हेतु संघ के समर्थन से जो चुनाव जीता (जिसमे भाजपा को मात्र 02 सीटें मिलीं थीं और तमाम संघी कांग्रेस के बैनर पर जीते थे) उसी का परिणाम रहा श्रमिक विरोधी नीतियों का अपनाया जाना तथा निजीकरण की भूमिका बांधना। 1984 मे भी राजीव गांधी को संघ का समर्थन था जिसका परिणाम हुआ बाबरी मस्जिद/राम जन्म भूमि का ताला खुलना।

1989 मे 'मण्डल कमीशन' की सिफ़ारिशें लागू होने पर 'कमंडल' रथ यात्राओं से आडवाणी जी ने देश को सांप्रदायिक दंगों की भट्टी मे झोंक दिया। 1992 मे पूर्व संघी स्वंय सेवक नरसिंघा राव जी के प्रधान् मंत्रित्व  मे जब मनमोहन सिंह जी वित्त मंत्री थे अयोध्या का ढांचा गिरा दिया गया। धन-बल से राव सरकार अल्पमत होते हुये भी चलायी गई। कारपोरेट घरानों को अपनी राजनीतिक शक्ति पहचानने का भरपूर अवसर मिला।

1998 से 2004 तक 06 वर्ष प्रधान मंत्री रह कर बाजपेयी जी ने सत्ता मनमोहन जी को सौंप दी। अब इनकी नीतियों ने जम कर अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। बंगाल मे बाम-पंथ का शासन खत्म होने की खुशी मे पेट्रोल,डीजल,गैस,के दाम अनावश्यक रूप से बढ़ा कर रेकरिंग मंहगाई बढ़ा दी गई और जनाक्रोश को दूसरी तरफ मोड़ने हेतु कुशल अर्थशास्त्री जी ने अन्ना जी को संत बना कर प्रायोजित करा दिया। नारे उछाल दिये गए 'अन्ना नहीं आंधी है,दूसरा गांधी है'। गांधी के हत्यारे ही गांधी भक्त के चोले मे अन्ना -अनुयायी बन गए। 1977 मे भी नारे उछले थे- 'यह पवन नहीं आंधी है ,छत्तीस गढ़ का गांधी है।' युवा समाजवादी सन्यासी पवन दीवान एम पी मे शिक्षा मंत्री के रूप मे एयर कंडीशन कार से सफर करते-करते कांग्रेस मे शामिल होकर अब कहाँ हैं?

इंटरनेटी समृद्ध लोग अन्ना आंदोलन की मुख्य कड़ी रहे हैं जिंनका आचरण तानाशाहीपूर्ण ,असभ्य और बर्बर रहा है। फेस बुक पर विदेश स्थित अमीर ने 'बकवास' एवं दिल्ली स्थित इंजीनियर साहब ने 'वाहियात' लिख कर अन्ना साहब की पोल खोलने की आलोचना की है। नीचे विभिन्न ब्लाग्स से उनके रेफरेंस सहित विवरण दिया जा रहा है जो अन्ना आंदोलन के सत्य को स्पष्ट करने हेतु पर्याप्त है। अंत मे प्रमाण-स्वरूप अखबारों के स्कैन भी दिये जा रहे हैं। मणिपुर की मानवाधिकार आंदोलनकारी सुश्री इरोम शर्मीला का यह वक्तव्य भी ध्यान देने योग्य है-

"वह अन्ना हज़ारे नहीं हैं ,एक साधारण कार्यकर्ता हैं,इसलिए दस साल से भूख हड़ताल पर बैठी होने के बावजूद सरकार उनके प्रति संवेदनशीलता नहीं दिखा रही है। "

इरोम शर्मीला को कारपोरेट घरानों तथा विदेशी फाउंडेशनों एवं भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों का समर्थन प्राप्त  नहीं है इसी लिए सरकार उन्हें महत्वहीन मान रही और उनके जायज आंदोलन की उपेक्षा कर रही है। वह बाजपेयी जी के समय से अनशन पर हैं तब संघ/भाजपा कहाँ था?अन्ना जी संघ को इसलिए प्रिय हैं क्योंकि उन्होने भारतीय संविधान और संसद को चुनौती दी है और संघ इस संविधान को उखाड़ फेंकना चाहता है इसलिय उन्हें उछाल रहा है।

हमे सत्ता प्रतिष्ठानों के संघर्षों से कोई मतलब नहीं है कि मनमोहन जी सोनिया जी को उनकी अनुपस्थिति मे हिला पाये अथवा नहीं या कि 2014 मे पूर्ण बहुमत मिलने अथवा सरकार बनाने की दशा मे वह मनमोहन जी को हटा कर किसी दूसरे को  पी एम बनाना चाहेंगी तो मनमोहन जी भाजपा के समर्थन से पुनः सत्ता कब्जाना चाहेंगे अथवा नहीं। हमारी चिंता यह है कि किस प्रकार गरीब-किसान,मजदूर को न्याय मिलेगा?उनकी आवाज बुलंद करने को कोई आगे आयेगा अथवा नहीं?अन्ना जी के महाराष्ट्र मे किसान भूख से आत्म-हत्या कर रहे हैं तो करें अन्ना जी की बला से !अन्ना जी को किसान -मजदूर नहीं कारपोरेट घरानों से हमदर्दी है। 8-8 कमांडोज़ के घेरे मे चलने वाले वी वी आई पी अन्ना जी के इंटरनेटी भक्त बड़े खुश होंगे अपने गांधी की सरकारी आव-भगत से। मुझे तो इसमे आगे आने वाले समय मे नक्सल्वाद की मजबूती होती दीख रही है। जब लोकतान्त्रिक विकल्प गरीबों को न्याय नहीं दिला सकेंगे तो एकमात्र रास्ता सशस्त्र संघर्ष और हिंसा का ही बचेगा। अन्ना के पीछे लामबंद कारपोरेट जगत, इंटरनेटी उनके भ्रष्ट भक्त देश को गृह-युद्ध की ओर धकेलने की तैयारी कर रहे हैं जैसी की अमेरिकी योजना है।
22-06-2020 


'मेघनेट'मे भूषण जी के विचार-
"इन्होंने प्रत्यक्ष रूप से देश के लोकतंत्र, चुनाव प्रणाली और संविधान को ललकारा है. इन संगठनों को कई हज़ार करोड़ रुपयों की देशी-विदेशी वित्तीय सहायता शिक्षा, आदिवासी कल्याण, आदि के लिए मिलती है.
जिस प्रकार इन गैर सरकारी संगठनों ने अपने आंदोलन को धन बल से अग्रसर किया है उसे लेकर कई आशंकाएँ उत्पन्न होना स्वाभाविक है. तिस पर तुर्रा यह है कि ये स्वयं को लोकपाल के तहत लाने की बात को सिरे से नकार चुके हैं. तो क्या ऐसे संगठन केवल सिविल सोसाइटियाँ बना कर सांविधानिक ढाँचे को झटके देने का कार्य ही करेंगे. यह सर्वविदित है कि ये संगठन भ्रष्ट सरकारी तंत्र और विदेशों में काफी घुसपैठ रखते हैं. अभी तक ये किसी प्रभावी प्रशासनिक नियंत्रण में नहीं हैं. संगठन के तौर पर ये जनसाधारण के लिए किसी रहस्य से कम भी नहीं हैं.                             

'लोकसंघर्ष' मे सत्य नारायण  ठाकुर साहब कहते हैं-

"अरुंधती राय बताती हैं कि अन्ना ब्रांड को स्पोंसर करने वाली सब्सिडियरी कंपनियों (एन.जी.ओ) को कोका कोला, लेहमन ब्रदर्स जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ मुक्त हस्त से चंदा देती हैं। अन्ना टीम के संचालक अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसौदिया की संस्था 'कबीर' ने पिछले तीन सालों में फोर्ड फ़ाउंडेशन से चार लाख डालर अर्थात दो करोड़ रुपयों से ज्यादा दान प्राप्त किया है। इसी तरह अरुंधती ने अपने आलेख में बताया है कि इंडिया अगेंस्ट करप्सन को भारी रकम का दान देने वालों की सूची में भारत की अलुमिनियुम कम्पनियाँ, स्पेशल इकोनोमिक जोंस की दैत्याकार कंपनियों के अलावा रियल इस्टेट बिजनेस की कम्पनियाँ हैं जिन्होंने देश में विराट वित्तीय साम्राज्य खड़ा कर लिया है। इनमें से कुछ के खिलाफ जांच भी चल रही है। फिर अन्ना आन्दोलन में इनके उत्साह का क्या कारण है ?
कारण स्पष्ट है। इन्होने सरकारी भ्रष्टाचार का बड़ा हो हल्ला मचाया है और उस हो हल्ला में कार्पोरेट भ्रष्टाचार का मुद्दा दब गया है। यही इनका निहित स्वार्थी है। पानी, बिजली, स्वास्थ्य, सफाई, शिक्षा, यातायात, संचार आदि जनोपयोगी सेवाओं से सरकार अपना हाथ खींच रही है। इन सेवाओं को एन.जी.ओ और कार्पोरेट के हवाले किया जा रहा है। अन्ना सार्वजानिक सेवाओं के निजीकरण और उसके दुष्परिणामो के बारे में कुछ नहीं बोलते हैं। अरुंधती बताती हैं कि जाता लोकपाल के दायरे में एन.जी.ओ/कार्पोरेट द्वारा दिए जाने वाले घूस को 'लोबियिंग फीस' का नया नाम देकर विधि सम्मत बनाया जा सकेगा। "
"अरुंधती राय ने लोकपाल को सर्वोच्चाधिकार प्राप्त निकाय बनाने पर भी प्रश्न उठाया है। क्या वह किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं होगा ? लोकपाल को निश्चित ही उत्तरदायित्वपूर्ण होना चाहिए। अरुंधती की राय में भारतीय चुनाव पद्धति के दोषों के चलते भारत में अल्पतंत्र का राज है। अरुंधती की राय में जनलोकपाल का वर्तमान स्वरूप को स्वीकारने से भारत में अल्पतंत्र का दूसरा स्तम्भ खड़ा हो जायेगा।
इसी तरह अन्ना के विचारों को अरुंधती राय गाँधी विरोधी बताती हैं। इसके प्रमाण में वह अन्ना के गाँव रालेगांव सिद्धि की ग्राम पंचायत और सहयोग समिति को उध्रत करती हैं, जिनका चुनाव विगत 25 वर्षों में कभी नहीं हुआ। अन्ना से सम्बंधित संस्थाओं में रुपयों की हेराफेरी और गबन की भी शिकायतें हैं। अरुंधती ने अन्ना की मानसिकता को व्यक्त करने के लिये अन्ना की निम्नांकित पंक्ति को उध्रत किया है "यह महात्मा गाँधी की द्रष्टि थी कि प्रत्येक गाँव में एक चमार, एक सुनार, एक कुम्भार आदि होना चाहिए। उन लोगों को सभी काम अपने पेशे के मुताबिक करना चाहिए। इस तरह गाँव स्वावलंबी होगा। यह वह (गांधीवादी) प्रणाली है, जिसका आचरण हम अपने गाँव रालेगांव सिद्धि में करते हैं।" निश्चय ही अन्ना के इस विचार का सम्बन्ध गांधीवादी विचारों से दूर-दूर तक नहीं है।
जो भी हो, अन्ना ब्रांड टोपी बाजार में तेजी से चल पड़ा है मीडिया इसमी क्यों पीछे रहता। टी.वी चैनलों ने तो कमाल कर दिया। उसने अन्ना इंडिया और इंडिया अन्ना घोषित कर दिया। लेकिन क्या अन्ना इंडिया सचमुच भारत है ? 20 रुपये से गुजरा करने वाले 84 करोड़ गरीबों का सच्चा भारत 'अन्ना इंडिया' में शामिल नहीं है। क्या अन्ना टीम को विदर्भ में आत्महत्या करने वाले किसानो, सिंगुर, नंदीग्राम , लालगढ़, नोयडा के प्रताड़ित किसानो की चिंता है। क्या इस नये गाँधी के एजेंडा में 43 करोड़ असंगठित मजदूरों को निर्वाह योग्य न्यूनतम मजदूरी और इनकी सामाजिक सुरक्षा शामिल है ? पुराने गाँधी समाज के अंतिम आदमी की बात करते थे। वे अन्त्योदय का सपना देखते थे। गाँधी जी के इस नए अवतार को मध्य वर्ग के तामझाम ने घेर रखा है। जाहिर है, वाचाल मध्य वर्ग सड़कों पर ज्यादा थिरकता है। "सत्य नारायण ठाकुर


'जनपक्ष ' मे ए एस वर्मा जी का लेख दिया गया है-
" अण्णा ने सत्ताधारी वर्ग के लिए आक्सीजन का काम किया है और उस आक्सीजन सिलेंडर को ढोने के लिए उन्हीं लोगों के कंधों का इस्तेमाल किया है जो सत्ताधारी वर्ग के शोषण के शिकार हैं। उन्हें नहीं पता है कि वे उसी निजाम को बचाने की कवायद में तन-मन-धन  से जुट गये जिसने उनकी जिंदगी को बदहाल किया। देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे जुझारू संघर्षों की ताप से झुलस रहे सत्ताधारियों को अण्णा ने बहुत बड़ी राहत पहुंचाई है। 


अगर किसी चैनल का मालिक न चाहे तो उसके पत्रकार या कैमरामेन लगातार अण्णा का कवरेज कर सकते थे? क्या कारपोरेट घराने अपनी जड़ खोदने वाले किसी आंदोलन को इस तरह मदद करते या समर्थन का संदेश देते जैसा अण्णा के साथ हुआ? भारत सरकार के गृहमंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीन वर्षों में यहां के एनजीओ सेक्टर को 40 हजार करोड़ रुपये मिले हैं- उसी एनजीओ सेक्टर को जिससे टीम अन्ना के प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, किरन बेदी, संदीप पांडे, स्वामी अग्निवेश जैसे लोग घनिष्ठ/अघनिष्ठ रूप से जुड़े/बिछड़े रहे हैं। इस सारी जमात को उस व्यवस्था से ही यह लाभ मिल रहा है जिसमें सडांध फैलती जा रही है, जो मृत्यु का इंतजार कर रही है और जिसे दफनाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में उत्पीड़ित जनता संघर्षरत है। आज इस व्यवस्था का एक उद्धारक दिखायी दे रहा है। वह भले ही 74 साल का क्यों न हो, नायकविहीन दौर में उसे जिंदा रखना जरूरी है। 


अण्णा हजारे ने 28 अगस्त को दिन में साढ़े दस बजे अनशन तोड़ने के बाद रामलीला मैदान से जो भाषण दिया उससे आने वाले दिनों के उनके एजेंडा का पता चलता है। एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह उन्होंने उन सारे मुद्दों को भविष्य में उठाने की बात कही है जो सतही तौर पर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई का आभास देंगे लेकिन बुनियादी तौर पर वे लड़ाइयां शासन प्रणाली को और चुस्त-दुरुस्त करके इस व्यवस्था को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा टिकाऊ, दमनकारी और मजबूत बना सकेंगी। अण्णा का आंदोलन 28 अगस्त को समाप्त नहीं हुआ बल्कि उस दिन से ही इसकी शुरुआत हुई है। रामलीला मैदान से गुड़गांव के अस्पताल जाते समय उनकी एंबुलेंस के आगे सुरक्षा में लगी पुलिस और पीछे पल पल की रिपोर्टिंग के लिए बेताब कैमरों से दीवाल पर लिखी इबारत को पढ़ा जा सकता है। व्यवस्था के शस्त्रागार से यह एक नया हथियार सामने आया है जो व्यवस्था बदलने की लड़ाई में लगे लोगों के लिए आने वाले दिनों में एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी करेगा।"

जैसे-जैसे लोगों के कष्ट बढ़ेंगे और शांतिपूर्ण समाधान के द्वार बंद होते जाएँगे मैं पूर्ण आत्म-विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि अवश्य ही कोई न कोई क्रांतिकारी आगे आ कर साम्राज्यवाद/सांप्र्दायवाद को जन-सहयोग से उखाड़ फेंकेगा और यह रक्त-पात के बिना संभव न होगा ।
 ------------------------------------
Hindustan-lucknow 03/09/2011

Hindustan-lucknow 03/09/2011
---------------------------------------------
Hindustan-Lucknow-31/08/2011

Hindustan-Lucknow-31/08/2011

Hindustan-Lucknow-31/08/2011

Hindustan-Lucknow-31/08/2011

hindustan-lucknow-03/09/2011


Tuesday, August 30, 2011

हम कौन थे, क्या हो गए हैं, और क्या होंगे अभी---विजय राजबली माथुर



हम कौन थे,क्या हो गए हैं,और क्या होंगे अभी।

आओ विचारें आज मिल कर,यह समस्याएँ सभी। । 


राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त जी की ये काव्य पंक्तियाँ आज बेहद उपयोगी लग रही हैं,इसी कारण शीर्षक मे लिया है। सन 1857 ई .मे पहली बार राष्ट्र व्यापी  रूप मे हमारे देश की जनता ने अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के नेतृत्व मे जिसमे मराठाओ का सम्पूर्ण सहयोग था  ईस्ट इंडिया क के साम्राज्यवादी -शोषणवादी शासन के विरुद्ध 'क्रान्ति' की थी जो हमारे अपने ही लोगो द्वारा विश्वासघात किए जाने के कारण विफल हो गई थी। इससे पूर्व भी और बाद मे भी 'स्वातंत्र्य आंदोलन' चलते रहे। क्रांतिकारी धारा के श्यामजी कृष्ण वर्मा, शिव वर्मा,  लाला हरदयाल,सरदार भगत सिंह,राम प्रसाद'बिस्मिल',लाहिड़ी बंधु,बटुकेश्वर दत्त,चंद्रशेखर 'आजाद',अशफाक़ उल्लाह खान,राजगुरु,सुखदेव  सरदार ऊधम सिंह आदि-आदि एवं उदार धारा के गोपाल कृष्ण गोखले, महात्मा गांधी,डा राजेन्द्र प्रसाद,जवाहर लाल नेहरू,डा भीम राव अंबेडकर,सरोजनी नायडू,विजय लक्ष्मी पंडित,एनी बेसेंट,सी एफ एन्द्र्यूज,मौलाना अबुल कलाम आजाद,खान अब्दुल गफ्फार खान, आदि-आदि एवं अग्रगामी विचार-धारा के लाल-बाल-पाल,नेताजी सुभाष चंद्र बॉस आदि-आदि के असीम त्याग एवं बलिदान के बाद हम यह आजादी 15 अगस्त 1947 को प्राप्त कर सके हैं ।

आजादी के पूर्व का काल नेताओ एवं जनता के त्याग -तपस्या का काल था। आजादी के बाद त्याग-तपस्या का स्थान लूट,अफरा-तफरी,शोषण-अत्याचार ,उत्पीड़न,स्वार्थन्ध्ता ,देश और राष्ट्र से दुराव आदि लेते चले गए। ये भ्रष्ट आचरण भौतिक प्रगति के साथ-साथ बढ़ते रहे। नैतिकता,चारित्रिकता ,ईमानदारी,सर्व-हित की भावना का निरंतर लोप होता गया।

जिस प्रकार मानव शरीर मे हृदय का कार्य सम्पूर्ण अवयवो का समुचित विकास होता है और किसी अवयव मे टूट-फूट या कमी होने पर हृदय उस अंग की ओर विशेष ध्यान देते हुये उसे अतिरिक्त रक्त प्रदान करता और ऊतकों की मरम्मत करता है.उसी प्रकार 'राज्य'-स्टेट का कार्य सभी नागरिकों का समान रूप से विकास करना होता है.यदि किसी क्षेत्र-विशेष या वर्ग -विशेष की स्थिति अत्यधिक कमजोर है तो यह राज्य का कर्तव्य है कि उसे अतिरिक्त सहायता मुहैया कराये. इसी उद्देश्य से संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की गयी है.अन्ना-आन्दोलन का एक लक्ष्य इस आरक्षण की धारणा को पंगु करना भी था.

१९६२,१९६५,१९७१ के युद्धों ने हमारे देश की जितनी क्षति की उससे कहीं अधिक क्षति २०११ में अन्ना औरउनकी टीम द्वारा संविधान एवं संसद की सार्वभौमिकता को नग्न चुनौती देने से हो चुकी है जिसके दुष्परिणाम हमें निकट भविष्य में दुरूह रूप में देखने को मिलेंगे. 


राज्यसभा सांसद-शोभना भरतिया कहती हैं "रामलीला मैदान का दबाव विधेयक पर नहीं होना चाहिए."

Hindustan-Lucknow-28/08/2011

उन्हीं के अखबार -हिन्दुस्तान के प्रधान सम्पादक शशि शेखर साहब कहते हैं-"हमारे माननीय सांसदों में से कुछ यदा-कदा राजनीतिक तहजीब का उल्लघन करते रहे हैं. उनकी वजह से इस वक्त समूचा सिस्टम सवालों के घेरे में कैद हो गया है. सवाल उठता है कि क्या कोई भी १२१ करोड़ की आबादी वाले इस ताकतवर देश की संस्थाओं को अपने इशारों पर इस तरह नचा सकता है?"


जिस व्यक्ति ने देश के संविधान और संसद को बेशर्म चुनौती दी है उसके अपने गृह प्रदेश का हाल देखें-
Hindustan-Lucknow-28/08/2011


Hindustan-Lucknow-28/08/2011


Hindustan-Lucknow-28/08/2011
.

Hindustan-Lucknow-28/08/2011

कैसे अन्ना और उनकी टीम की हिम्मत हुयी कि वे संविधान और संसद को चुनौती दे सके और सरकार ने उनके विरुद्ध कारवाई क्यों नहीं की? इस बाबत जागरूक पत्रकार महेंद्र श्रीवास्तव साहब ने अपने ब्लॉग में यह स्पष्ट किया है-

"सोनिया गांधी गंभीर रुप से बीमार हैं और अमेरिका में इलाज करा रही हैं। जानकार कहते हैं कि तीन चार महीने वो पार्टी के काम में सक्रिय नहीं रह सकती। अपनी अनुपस्थिति में पार्टी का कामकाज चलाने के लिए उन्होंने एक चार सदस्यीय कमेटी बनाई। इसमे राहुल गांधी, जनार्दन द्विवेदी, अहमद पटेल और ए के एंटोनी को शामिल किया है। इस टीम को लेकर सरकार और पार्टी में शामिल तमाम नेता पार्टी से सख्त नाराज हैं।
अन्ना ने जब आंदोलन की धमकी दी तो पहले ही बातचीत करके मसले का कुछ हल निकाला जा सकता था। लेकिन सोनिया की बनाई टीम को लोग उसकी औकात बताना चाहते थे, लिहाजा किसी ने कोई पहल ही नहीं की। जो कोई आगे आया भी तो वो बाबा रामदेव के तर्ज पर अन्ना से भी निपटने का सुझाव देते रहे। वो ऐसे सुझाव देते रहे, जिससे सरकार की किरकिरी हो। इसी के तहत पहले अन्ना को गिरफ्तार कराया गया, सरकार की किरकिरी हुई, फिर अन्ना को छोडने का फरमान सुनाया गया तो सरकार की किरकिरी हुई, अन्ना ने जेल से बाहर आने से इनकार कर दिया, फिर सरकार की किरकिरी हुई। अनशन के लिए जगह देने में जिस तरह का ड्राम सरकार की ओर से किया गया, उससे भी सरकार की किरकिरी हुई। अब सरकार ने संसद में इस मामले में पूरे दिन चर्चा की, लेकिन बिना किसी नियम के हुई इस चर्चा से वो किसे बेवकूफ बना रहे हैं। ये समझ से परे है। सरकार में तो आपस में मतभेद और संवादहीनता रही है है, टीम अन्ना सही तरह से आंदोलन चलाने में नाकाम रही है।


बेचारे अन्ना की अंग्रेजी जानते नहीं और हिंदी कम समझते हैं। टीम अन्ना के सदस्य उन्हें जिस तरह से बात समझाते हैं, वो उन्हें समझ में ही नहीं आती। कई बार देखा गया है कि मंत्रियों से बात कुछ हुई और रामलीला मैदान तक पहुंचते पहुंचते बात कुछ और हो जाती है। हालत ये हुई कि सरकार को अन्ना के नुमाइंदों से किनारा करना पडा और एक ऐसे मंत्री को अन्ना से बात करने की जिम्मेदारी दी गई जो महाराष्ट्र से आते हैं। जिससे अन्ना से सीधे मराठी में बात करके उन्हें समझाया जा सके और उनके चंगू मंगू को दूर किया जा सके। "


मुझे लगता है कि पी एम् मनमोहन सिंह जी ,अरविन्द केजरीवाल जी,किरण बेदी जी ने मिल कर एक योजनाबद्ध तरीके से अन्ना हजारे साहब को मोहरा बना कर 'भ्रष्टाचार' के नाम पर यह बखेड़ा इसलिए खडा कराया था कि आम -गरीब-मेहनतकश जनता का ध्यान पेट्रोल,डीजल,गैस में हुयी मूल्य-वृद्धि से फ़ैली मंहगाई ,घपलो-घोटालो की और से हटाया जा सके.अपने मिशन में वे कामयाब रहे. यही कारण है कि स्वाधीनता दिवस पर रात्रि-ब्लैकाउट ,राष्ट्र ध्वज का रात्रि में फहराया जाना और राष्ट्र ध्वज के साथ अन्ना-आन्दोलन चलने पर सरकार ने उनके विरुद्ध कोई कारवाई नहीं की.


मेरे विचारों का आज निश्चय ही मखौल बनाया जाएगा.परन्तु मुझे विशवास है और में पहले भी लिख चुका हूँ कि मेरा लेखन आज के लिए नहीं आज से पचास वर्ष आगे के लिए है.ऐसा ही सोचना महान साहित्यकार श्रद्धेय स्व .भगवती चरण वर्मा जी (जिनकी आज जयंती है )का भी था जैसा कि,उनके पुत्र श्री धीरेन्द्र वर्मा,साहित्यकार ने उनके हवाले से बताया-"लेखन का महत्त्व १०० साल बाद पता चलता है. हमारा मूल्यांकन समकालीन आलोचक नहीं करेंगे.वे मूल्यांकन पूर्वाग्रह से करते हैं."(हिन्दुस्तान,लखनऊ,२९ अगस्त २०११,प्र.०७ )


अफ़सोस और दुःख के साथ कहना पड़ता है कि पत्रकार-शेष नारायण सिंह जी,अमलेंदु उपाध्याय जी,महेंद्र श्रीवास्तव जी तथा वकील रंधीर सिंह'सुमन' जी को छोड़ कर बाकी सभी ब्लागर्स के विचारों से में पूर्णतयः असहमत हूँजिन्होंने राष्ट्रद्रोही अन्ना आन्दोलन के गीत गाये हैं



Thursday, August 25, 2011

संविधान और संसद को चुनौती-अधिनायकवाद की आहट

ढाई हजार वर्ष पूर्व 'अर्थशास्त्र' मे कौटिल्य-चाणक्य ने कहा था-" जिस तरह जीभ पर रखे शहद या जहर को चखे बिना रह सकना असंभव है,उसी तरह सरकारी कर्मचारी भी राजा के राजस्व का कम से कम एक अंश न खाएं ,ऐसा होना भी असंभव है। जैसे यह जानना संभव नहीं है कि जल मे तैरती मछली कब पानी पीती है,वैसे ही यह पता करना भी मुमकिन नहीं है कि सरकारी कार्य मे लगे कर्मचारी कब और कितना धन चुराते हैं। "


मुगलों ने यहाँ रिश्वत के दम पर सत्ता स्थापित की और अंग्रेजों ने भी। 1991 से उदार आर्थिक नीतियों के नाम पर जो व्यवस्था स्थापित हुई उसने भ्रष्टाचार को द्रुत गति से बढ़ा दिया है। कारपोरेट जगत ने इन नीतियों के आधार पर काफी लाभ उठाया है और फँसने पर राजनेताओं पर इल्जाम लगाया है। कुछ नेताओं को सजा मिली भी है और कुछ सजा पाने की कतार मे खड़े हैं। नंबर इन कारपोरेट घराने वालों का भी लग सकता है। उनके बड़े अधिकारी तो जेल मे पहुँच भी गए हैं। अपनी सुरक्षा हेतु इन कारपोरेट धुरंधरों ने N G O कर्ताओं को जिन्हें वे धन देकर ओबलाइज करते थे ,भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाने का आग्रह किया। इन लोगों ने महाराष्ट्र के पूर्व फौजी जो अन्ना हज़ारे के नाम से वहाँ लोकप्रिय थे,अपना मोहरा बना कर आगे खड़ा कर दिया ताकि जनता को गुमराह किया जा सके।

(19/08/2011 "हिंदुस्तान-लखनऊ)

(25/08/20111,हिंदुस्तान-लखनऊ )

(25/08/2011,हिंदुस्तान लखनऊ)

(अमलेंदु उपाध्याय जी का आज का फेसबुक स्टेटस )


इसी बीच अमेरिका की ऋण-व्यवस्था चक्रव्यूह मे फंस गई कहीं भारत भी अपना दिया ऋण वापिस न मांगने लगे अतः यहाँ की अर्थव्यवस्था को दूरगामी चोट पहुंचाने हेतु एन जी ओज द्वारा नियंत्रित अन्ना आंदोलन कर्ताओं को वहाँ की 'फोर्ड फाउंडेशन',ओर फाउंडेशन आदि ने भी प्रचुर धन मुहैया करा दिया। जो भाजपा और शिव सेना आज अन्ना हज़ारे का समर्थन कर रहे हैं उन्हीं की सरकार ने महाराष्ट्र मे इन्हीं हज़ारे साहब को तीन माह की जेल कारवाई थी। यह हज़ारे साहब की बुद्धि का ही कमाल है कि आज उन्हीं भाजपा और शिव सेना के जाल मे फंस कर देश-हित को भुला बैठे हैं।

जहां इलेक्ट्रानिक मेडिया और अखबार कारपोरेट घरानों के इशारे पर अन्नावाद से पीड़ित हैं एक जागरूक और देशभक्त पत्रकार महेन्द्र श्रीवास्तव जी  अपने ब्लाग  मे लिखते हैं-(उनके ब्लॉग से लिया गया मैटर उनकी पोस्ट से लिंक किया गया है)


"आज 10 साल बाद एक बार फिर संसद पर हमला हो रहा है। आप भले कहें कि ये कोई आतंकी हमला नहीं है। लेकिन मित्रों मैं बताऊं ये उससे भी बड़ा और खतरनाक हमला है। इस हमले में किसी एक व्यक्ति या नेता की हत्या करना मकसद नहीं है। बल्कि इनका मकसद संसदीय परंपराओं और मान्यताओं की हत्या करना है। आज तमाम लोग भावनाओं में बहकर शायद उन पांच आतंकियों को ज्यादा खतरनाक कहें तो हथियार के साथ संसद भवन में घुसे थे, लेकिन मैं उनके मुकाबले सिविल सोसाइटी के पांच लोगों को उनसे ज्यादा खतरनाक मानता हूं। बस दुख तो ये है कि ये सीमापार से नहीं आए हैं, हमारे ही भाई है। लोकतांत्रिक व्यवस्था से भली भांति परिचित भी हैं, फिर भी देश के लोकतंत्र को कमजोर और खत्म करने .... "


अब तो और लोग भी साहस करके देश-हित की बात लिखने लगे हैं ,देखिये हिंदुस्तान,लखनऊ 25 अगस्त मे छ्पे ये आलेख -














आज गली-गली ,चौराहे-चौराहे लाउडस्पीकरों से अन्ना  भक्तों द्वारा बिजली की कटिया डाल कर जो शोर मचाया जाता है वह भ्रष्टाचार की श्रेणी मे क्यों नहीं है? N G O क्यों नहीं लोकपाल के आधीन होने चाहिए? क्योंकि इन  N G O को धन विदेशी फाउंडेशनों से मिलता है,कारपोरेट घरानों से मिलता है। उनके भ्रष्टाचार का पर्दाफाश इसलिए ही नहीं होना चाहिए। महेन्द्र श्रीवास्तव जी ने इन पाँच तथाकथित  सिविल सोसाइटी के लोगों को ज्यादा खतरनाक माना है क्योंकि वे जान-बूझ कर भारतीय संविधान और संसद की सार्वभौमिकता को चुनौती दे रहे हैं। इनके पीछे फासिस्ट आर एस एस का खुला हाथ है। 1992 मे इसी संगठन ने अपने सहयोगी संगठनों के साथ विदेशी फाउंडेशनों के धन-बल से संविधान निर्मात्री समिति के चेयरमेन डा  भीम राव अंबेडकर के परी निर्वाण दिवस 06 दिसंबर को अयोध्या का कोर्ट मे विवादित ढांचा गिरा दिया था मानो वे संविधान को गिराने पूर्वाभ्यास कर रहे थे। आज संवैधानिक नियमों को परे रख कर संसद को बंधुआ बना कर अपना कारपोरेट घरानों के बचाव वाला लोकपाल बिल पास कराना चाहते हैं। 


15 अगस्त -स्वाधीनता दिवस की रात्रि 08-09 ब्लैक आउट करने का आह्वान किया गया,रात के समय राष्ट्र ध्वज फहराया गया,
(19/08/2011,हिंदुस्तान लखनऊ )


राष्ट्र ध्वज लेकर अन्ना-भक्तों  जुलूस निकाल रहे हैं और प्रदर्शन हो रहे हैं जो कि सरासर राष्ट्रीय ध्वज का लगातार अपमान किया जा रहा है क्योंकि, 15 अगस्त,26 जनवरी,02 अक्तूबर को छोड़ कर राष्ट्रीय ध्वज सरकारी भवनों को छोड़ कर अन्यत्र प्रयोग नहीं किया जा सकता है। मैंने अपने 'कलम और कुदाल' पर राष्ट्रद्रोह के आरोप मे अन्ना की गिरफ्तारी की मांग की थी। यदि तभी कारवाई हुयी होती तो आज अन्ना आंदोलन का उग्र-राष्ट्र -विरोधी रूप सामने नहीं आ पाता। 


तमाम भ्रष्ट सरकारी अधिकारी और कर्मचारी आज अन्ना -आंदोलन मे शामिल होकर उसके उद्देश्य को स्पष्ट कर रहे हैं। आज की युवा पीढ़ी जब अपने वरिष्ठ होने पर इतिहास का मूल्यांकन करेगी तब उसे पछतावा ही होगा। यह युवा शक्ति का भ्रष्ट तंत्र द्वारा गलत शोषण है। सरकार का विरोध करने की खातिर अपने देश ,अपने संविधान,अपने राष्ट्र-ध्वज और अपनी संसद को इस प्रकार कमजोर करने का कोई भी प्रयास 'राष्ट्रद्रोह' ही है। 


आर एस एस जो लगातार अपनी अर्ध-सैनिक तानाशाही स्थापित करने के प्रयासों मे लगा रहता है इस राष्ट्र-द्रोही अन्ना आंदोलन को खूब हवा दे रहा है। गोलवालकर साहब का कहना था- यदि गांवो  के 3 प्रतिशत और शहर के 2  प्रतिशत लोग आर एस एस के समर्थक हो जाएँ तो उनकी तानाशाही स्थापित हो सकती है। सहारनपुर से प्रकाशित 'नया जमाना' के संस्थापक संपादक -कन्हैया लाल मिश्र 'प्रभाकर' ने इस बाबत संघ के एक तगड़े नेता लिंम्ये  जी को आगाह किया था कि ऐसा होने पर दिल्ली की सड़कों पर कम्यूनिस्टों और संघियों के मध्य निर्णायक  रक्त-रंजित सत्ता - संघर्ष होगा। विदेशी शक्तियाँ और आर एस एस आदि संगठन मिल कर भी इतनी आसानी से केंद्र की सत्ता को अपनी कैद मे नहीं ले सकेंगे। 


बहरहाल आज का अन्ना आंदोलन और इसके संचालकों के हालात तो यही बता रहे हैं कि वे देश को अशांति की भट्टी मे झोंकने को तैयार बैठे हैं। आम जनता का ही यह दायित्व है कि वह इस कारपोरेट चाल को समझे एवं अपनी रोजी,रोटी,शोषण,उत्पीड़न की समस्याओं के निराकरण की मांग तीव्र करे न कि इस राष्ट्रद्रोही आंदोलन मे भाग लेकर पाप की भागीदार बने। 

Saturday, August 20, 2011

श्री कृष्ण और स्वाधीन भारत---विजय राजबली माथुर


21 अगस्त 2011 को दोपहर 2-25 से अष्टमी प्रारम्भ हो रही है जो 22 अगस्त को साँय 4-14 तक रहेगी। पौराणिक लोग उदय तिथि के कारण 22 को उपवास रख कर रात्री मे नवमी के समय श्री कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाएंगे।( जबकि श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद की अष्टमी की अर्द्ध रात्रि मे होने के कारण 21 को मनाना चाहिए,परंतु पोंगा-पंथ जैसे कहेगा वे वैसा ही मानेंगे) वे सदियों से ऐसा ही करते आ रहे है-राम और कृष्ण के जन्म दिन धूम-धाम से मनाते हैं फिर उनके आदर्शों के विपरीत आचरण करते और अपनी दिनचर्या चलाते हैं। लेकिन राम और कृष्ण के नाम पर मार-काट करने को सदैव तैयार रहते है,उन्हें यही धर्म सिखाया गया है। 

वस्तुतः आवश्यकता है राम और कृष्ण के आदर्शों को अपने चरित्र मे उतारने की उन्हें हृदयंगम करने की,परंतु वह कोई नहीं करेगा। और क्यों नहीं करेगा?क्योंकि वे भगवान का अवतार थे हम मनुष्य हैं इसलिए नहीं कर सकते ,यह दलील पेश की जाती है। भगवान की परिभाषा क्या है कोई समझना ही नहीं चाहता है। इसी ब्लाग मे  तथा 'जनहित  मे' भी कई बार स्पष्ट किया है। यहाँ उसे न दोहरा कर ज्योतिषीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करना चाहता हूँ। 

प्रत्येक मनुष्य जीवन मे उत्तरोत्तर सुख की कामना करता है और कोई भी प्राणि स्वतः दुख नहीं उठाना चाहता,परंतु फिर भी संसार मे दुख है और यह सर्वव्यापक है। यदि यह आपको मालूम हो जाये कि आपके जीवन मे कितना दुख है और कब तक है तो आप उसका निराकरण करके सुख की प्राप्ति कर सकते हैं। राम और कृष्ण ने ऐसा ही किया था तो उन्हें दुख -दुख लगा ही नहीं। 

प्रतिवर्ष श्री कृष्ण जन्माष्टमी को भारत तथा अन्यत्र भी धूम-धाम से मनाने वाले लोग यदि बुद्धि-विवेक का प्रयोग करते हुये ज्योतिष की दृष्टि से देखें तो श्री कृष्ण के चतुर्थ भाव पर 'मंगल'अपनी दशम दृष्टि डाल रहा है जिस कारण उन्हें जन्मते ही माता देवकी के सुख से वंचित होना पड़ा। बचपन से ही गोकुल मे कठोर श्रम करना पड़ा। लेकिन इसी मंगल के प्रभाव से उन्होने पिता वासुदेव व पिता कुल का नाम रोशन किया कंस,शिशुपाल आदि का संहार कर जनता को त्रास से मुक्ति दिलाकर। 

ज्योतिष के ग्रन्थों मे बताया गया है कि यदि 'मंगल' चतुर्थ भाव को देख रहा हो तो यह शुभ नहीं रहता,भाग्य साथ नहीं देता ,कठोर श्रम करना पड़ता है,बचपन मे ही मात्र सुख से वंचित रहना पड़ता है। 

इस सबके बावजूद जातक अपने पिता और अपने कुल का नाम रोशन करता है तथा समाज को ऊंचा उठाता है। 

 श्री कृष्ण के साथ बिलकुल ऐसा ही तो हुआ। 

ज्योतिष के ही अनुसार यदि चतुर्थ भाव पर 'चंद्र' की दृष्टि हो तो जातक सौम्य ,सरल एवं उन्नत्त विचारों का होता है  उसका घरेलू जीवन सुखद और सानन्द व्यतीत होता है। यदि चंद्रमा के साथ गुरु भी हो तो जातक के गजेटेड अधिकारी बनने के योग रहते हैं। यदि 'मंगल' एवं 'चंद्र' दोनों एक साथ चतुर्थ भाव को देखते हो  तो जातक को जीवन मे किसी भी प्रकार धन का आभाव नहीं रहता है। 

श्री कृष्ण की जन्म कुंडली मे 'चंद्रमा' अपनी चतुर्थ दृष्टि से उनके चतुर्थ भाव को देख रहा है है जिस कारण श्री कृष्ण का स्वभाव सौम्य,सरल व उन्नत्त विचारों वाला रहा। उनका घरेलू जीवन सुखी व सानन्द रहा। पत्नी रुक्मणी उनकी सहायिका रहीं तो पुत्र प्रद्युम्न तो उनकी छाया कृति ही कहे जा सकते हैं। 

'मंगल' और 'चंद्र' दोनों ही ग्रहों का श्री कृष्ण की कुंडली के चतुर्थ भाव को देखने का ही परिणाम था कि श्री कृष्ण सर्व ऐश्वर्य सम्पन्न द्वारिकापुरी की स्थापना कर सके। 

स्वाधीन भारत 

15 अगस्त 2011 को हम अपनी स्वाधीनता की 65वी वर्षगांठ मना चुके हैं। आजादी के 64 वर्षों बाद भी हमारा देश समृद्ध नहीं हो सका तो इसका कारण है कि हमारे देश की स्वाधीनता की कुंडली के चतुर्थ भाव पर 'मंगल' की तृतीय दृष्ट जिसने आजादी की शैशवावस्था मे ही आर्थिक व सामाजिक क्षेत्र मे देश को रुग्ण बना दिया। साथ ही चतुर्थ भाव पर 'केतू' की भी दशम दृष्टि पड़ रही है पुनः यह आजादी की शैशवावस्था मे  रुग्णता को ही बढ़ा रही है।पडौसी राष्ट्रों का असहयोग तथा राष्ट्र को बाधाओं का सामना भी चतुर्थ भाव पर इसी केतू की दृष्टि का परिणाम रहा। 

इसी केतू की दृष्टि का प्रभाव है कि आज भी हमारा देश ऋण जाल मे फंसा हुआ है । भारत के मित्र समझे जाने वाले राष्ट्र भी इसका हित सम्पादन नहीं करते हैं। 'केतू' की चतुर्थ भाव पर  दृष्टि का ही परिणाम है कि भारत के मस्तक भाग 'कश्मीर' पर गहरी चोट पड़ी है। और वह आज भी समस्याग्रस्त है। 

ज्योतिष के अनुसार कुंडली के चतुर्थ भाव को  केतू देख रहा हो तो वह बचपन से ही बीमार रहता है। स्वभाव मे झल्लाहट व चिड़चिड़ापन रहता है,बाधाओं का सामना करना पड़ता है। धन की चिंता मे कठोर श्रम करना पड़ता है। 

इस प्रकार हम देखते हैं कि कुंडली का चतुर्थ भाव  जो सुख भाव है न केवल सामान्य मनुष्य वरन योगीराज 'श्री कृष्ण' तथा  ‘स्वाधीन भारत’ राष्ट्र पर भी ग्रहों का भरपूर प्रभाव पड़ा है। देश की प्रगति व विकास हेतु और स्वाधीन भारत की कुंडली के आधार पर ‘मंगल’ व ‘केतू’ ग्रहों के दुष्प्रभाव से बचाव के वैज्ञानिक (पोंगापंथ के अनुसार नहीं) उपाए हमारे शासकों को करने ही पड़ेंगे तभी हम अपने देश को ऋण जाल से मुक्त कराने तथा ‘कश्मीर’ समस्या का समाधान कराने मे सफल हो सकेंगे अन्यथा जो जैसे चल रहा है,चलता ही रहेगा। ग्रहों का प्रभाव अमिट है और उनकी शांति ही एकमात्र उपाय है।

“१३ अगस्त २०११ को  रक्षाबंधन (श्रावणी पूर्णिमा) भी शनिवार को पड़ रही है जबकि ३० जून की अमावस्या भी शनिवार को थी.परिणामतः रोग-शोक की वृद्धि,निर्धन लोगों पर कष्ट,पशुओं तथा मनुष्यों के स्वास्थ्य में न्यूनता,रहने की संभावना है.लिहाजा सरकार द्वारा विशेष व्यय भी संभावित है.अन्ना को खुला साम्प्रदायिक समर्थन मिलने से जनता के बीच सौहाद्र नष्ट होने की भी सम्भावना प्रबल है.१९७४ में लोकनायक जयप्रकाश के सप्तक्रांति आन्दोलन में घुस कर भ्रष्टाचार को आवरण बना कर जनसंघ ने अपनी ताकत बढ़ा ली थी ,फिर १९८८-८९ में वी.पी.सिंह के बोफोर्स भ्रष्टाचार आन्दोलन में घुस कर उनकी सरकार को नचाया -गिराया और अंततः १९९८-२००० तक खुद के नेत्रित्व में सरकार चलाई.आज फिर अन्ना -आन्दोलन में घुस कर भाजपा-संघ अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं न कि भ्रष्टाचार का खात्मा करना.बगैर धार्मिक भ्रष्टाचार दूर किये आर्थिक भ्रष्टाचार दूर करने की बातें केवल आकाश-कुसुम तोडना ही है.”

यह उद्धरण है मेरे 02 जूलाई 2011 को लिखे पोस्ट से । उसमे और भी आशंकाए प्रकट की थीं जो सत्य निकल चुकी हैं या चल रही हैं। ठीक स्वाधीनता दिवस की रात्री पर ब्लैक आउट की घोषणा के साथ अन्ना साहब झंजावात लेकर मैदान मे कूद पड़े।

हमारा देश पहले सोने की चिड़िया कहलाता था। तब भी इसका भूगोल वास्तु दोष पर आधारित था। किन्तु हमारे देशवासी वैज्ञानिक वेदिक मतानुसार हवन पद्धति जो पूर्ण रूप से मेटेरियल साईंस पर अवलंबित है का अनुपालन करते थे। आज पौराणिकों (जिन्हें विदेशी शासकों के हितार्थ ढाला गया) के बहकावे मे इस वेदिक पद्धति का परित्याग कर दिया गया है और परिणाम सबके सामने हैं। अन्ना का ढ़ोल-तमाशा उसी कहानी का हिस्सा है।

यदि वस्तुतः जनता देश का कल्याण चाहती है तो ईश आराधना कैसे की जाये इसे देखें ‘जनहित’ पर। 

Wednesday, August 17, 2011

राष्ट्र की सार्वभौमिकता सर्वोपरि है

I N DIA   IS   SOVEREIGN DEMOCRATIC SOCIALIST REPUBLIC-ये संविधान के शब्द हैं। 15 अगस्त 2011 की रात 8-9 के मध्य रोशनी बन्द करने का आह्वान है उस शख्स का जिसका इस संविधान मे विश्वास बिलकुल भी नहीं है। उस शख्स के अभियान को खुला समर्थन दिया है अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता विक्टोरिया नूलैंड ने । वाशिंगटन D C मे संवाददाताओं से उन्होने कहा-वह लोकतान्त्रिक भारत से उम्मीद करती हैं कि वह शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनकारियों के खिलाफ संयम बरतेगा। इस शख्स के वकील और सहयोगी का कहना है-“अमेरिकी टिप्पणी मे गलत क्या है”। देखिये हिंदुस्तान,लखनऊ (14-8-2011)प्र-12 पर छपे समाचार की स्कैन-

अब देखिये उसी अखबार के 12-8-2011 के प्र 16 पर छ्पे इस स्कैन कापी को-



जिस सरकार से उसके अपने देश के नागरिक असंतुष्ट हैं उसके विदेश विभाग की अधिकारी भारत सरकार को निर्देश जारी करें और भारत के सर्वोच्च न्यायालय के वकील साहब उसका समर्थन करें ,यह सब किस तथ्य का द्योतक है?

यह सब इसलिए है क्योंकि जब पाकिस्तान मे घुस कर वहाँ की सरकार की इजाजत लिए बगैर ओसामा बिन लादेन को अमेरिकी सेना ने मार डाला तो उसका प्रतिवाद करने की बजाए हमारे देशवासियों ने समर्थन किया था। अमेरिका ने दिखा दिया कि वह न पाकिस्तान की न भारत की ‘सार्वभौमिकता’की परवाह करता है। सरदार भगत सिंह ,चंद्रशेखर आजाद ,बटुकेश्वर दत्त ,अशफाक़ उल्लाह खान ,लाहिड़ी बंधुओं,रामप्रसाद ‘बिस्मिल’आदि अनगिनत क्रांतिकारियों की शहादत तथा राजेन्द्र प्रसाद, महात्मा गांधी,जवाहर लाल नेहरू,लाला लाजपतराय ,बिपिन चंद्र पाल,बाल गंगा धर ‘तिलक’ नेताजी सुभाष चंद्र बॉस आदि असंख्य नेताओं के त्याग एवं बलिदान से प्राप्त आजादी के दिन-15 अगस्त 2011 को सजावट-रोशनी करने की बजाए अंधकार-शोक-ब्लैक आउट करने का आह्वान करके अन्ना हज़ारे ने ‘राष्ट्रद्रोह’का परिचय दिया था अतः सरकार को चाहिए था कि उन्हें ‘राष्ट्रद्रोह’के आरोप मे गिरफ्तार करके मुकदमा चलाती। लेकिन वर्ल्ड बैंक और I M  F के चहेते प्रधानमंत्री की सरकार ने अन्ना साहब को गिरफ्तार किया सरकारी आदेश न मानने की धारा 65 मे जो असंवैधानिक ठहराई जा सकती थी अतः उन्हें उन्हीं की शर्तों पर छोड़ दिया गया ,यह प्रमाण है सरकार और अन्ना की मिलीभगत का जिसे पूर्ण अमेरिकी शह प्राप्त है।

बेहद दुख की बात है कि हमारे देश मे भेड़-चाल के चलते पढे-लिखे,समझदार लोगों ने भी साजिश को अनदेखा करके ‘अन्ना-पूजा’ चालू कर दी। आज अपने देश की सार्वभौमिकता की परवाह किसी को भी नहीं है न ही आज की सरकार को और न ही जनता को। लेकिन जागरूक लोगों ने अपने कर्तव्य का पालन जरूर किया है,देखिये पार्टी जीवन से साभार लिए इन लेखों की स्कैन कापियाँ-
(बड़ा करने हेतु डबल क्लिक करें)



Hindustan-Lucknow-18/08/2011-Page-13