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Wednesday, August 2, 2017

नीतीश को दोबारा चुनाव लड़ कर लालू परिवार को मिटाने के लिए जनादेश लेना चाहिए ------ अनिल सिन्हा / नवेंदु कुमार

  भ्रष्टाचार के नाम पर लोकतंत्र से खिलवाड़ को रोकिए।नीतीश ने सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ वोट मांगा था। अब उन्हें दोबारा चुनाव लड़ कर लालू परिवार को मिटाने के लिए जनादेश लेना चाहिए। बिहार की बीमारी से लड़ने की जिम्मेदारी कोई और लेगा। यह नीतीश जी के वश का नहीं है।



Navendu Kumar
लालू परिवार को मिटाने का ही जनादेश तो ले लीजिए आदरणीय नरेन्द्र-नीतीश जी!
भ्रष्टाचार के साथ हो रहे और किये जा रहे भ्रष्टाचार को कौन रोकेगा? इस भ्रष्टाचार का क्या होगा मित्रों? ये किसी नीतीश कुमार के वश का नहीं। उनके नये सहयोगी कोई 'अपराजेय' नरेन्द्र मोदी के बूते का भी ये नहीं। क्योंकि देश ने बीते तीन सालों में देख लिया है। देख लिया है उन्हीं के अध्यक्ष की निजी संपत्ति में 300 प्रतिशत का इज़ाफ़ा होते हुए। देख लिया है लोकतांत्रिक तौर-तरीकों की सरेआम हत्या होते हुए। छोड़ भी दीजिये, बिहार की बीमारी से लड़ने का काम कोई और कर लेगा! मेरे दोस्त और वरिष्ठ पत्रकार  Anil Sinha  ने अपने लेख में उठाये हैं ऐसे ही कुछ बेहद ज़रूरी और मौजूं सवाल। आप भी पढिये~

।।भ्रष्टाचार बनाम लोकतंत्र।।
अब यह जरूरी हो गया है कि भारतीय लोकतंत्र में भ्रष्टाचार के हथियार की सखोल चर्चा की जाए। (पुणे में हूं और ‘व्यापक’ के बदले इस मराठी शब्द 'सखोल' को अभी ज्यादा सटीक पाता हूुं)। मुझे लगता है कि किसी लोकतंत्र में भ्रष्टाचार को भारतीय दंड संहिता के कुछ प्रावधानों के आधार पर परिभाषित नहीं किया जा सकता है। भ्रष्टाचार का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि किसी ने बेनामी संपत्ति खरीदी और सत्ता का इस्तेमाल अपनी आमदनी बढाने के लिए किया। लोकतंत्र के खिलाफ आपका कोई भी कदम भ्रष्ट है और अक्षम्य है। चुनाव में करोड़ों खर्च करने से लेकर हजारों का लिबास पहनना भी भ्रष्टाचार है। हमारा दिमाग इतना भ्रष्ट हो चुका है कि हम ने इस तरह के सवाल करना छोड़ दिया है। जवाहर लाल नेहरू से यह सवाल डा लोहिया ने पूछा था। लेकिन इसके लिए डा लोहिया जैसी सादगी चाहिए। 
देश की जनता के पैसे से खड़ी कंपनियों को व्यापारियों के हाथ बेचना भ्रष्टाचार है। बैंकों में जमा देशवासियों की मेहनत का पैसा डकारने का मौका उद्योगपतियों को देना भ्रष्टाचार है। जमीन, पानी, जंगल बड़ी कंपनियों को मुफ्त में देना भ्रष्टाचार है। देश का हजारों करोड़ खर्चने के बाद भी नौजवानों को रोजगार नहीं देना अपराध है। शिक्षा को व्यापार बनाना अपराध है। चिकित्सा को मुनाफाखोरी का साधन बनाना संगीन जुर्म है। गोरक्षा के नाम पर हो रही हत्याओं पर खामोश रहना भ्रष्टाचार है। किसानों की आत्महत्या को रोकने के लिए पैसा खर्च करने में आनाकानी करने वाली सरकार भ्रष्ट है। 
पार्टियों ने इन भ्रष्टाचारों के खिलाफ लड़ना बंद कर दिया है, इसलिए छोटे अपराधों, वह भी सिर्फ विरोधी नेताओं के अपराधों, के खिलाफ लड़ाई को ही वे बढा-चढा कर पेश करती हैं। नीतीश जी लालू परिवार के भ्रष्टाचार के खिलाफ तो कमर कस कर उतर जाते हैं, लेकिन अपने इतने लंबे कार्यकाल मेे भी किसी जनविरोधी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते दिखाई नहीं देते हैं। जमींदारों और जातिवादी नेताओं के सहारे राजनीति चलाने से वे परहेज नहीं करते। ये तो बता दीजिए कि यह क्या भ्रष्टाचार नहीं है? 
बिहार के लोग राज्य में रोजगार नहीं पाते हैं। सुशासन राज में भी नहीं पाये और देश के हर कोने में गालियां खाकर अपना जीवन चलाते हैं। राज्य के मुख्यमंत्री का इसके लिए कुछ नहीं करना भ्रष्टाचार नहीं तो और क्या है? 
अपना मन इतना छोटा नहीं करें कि लालू के बदले नीतीश और नीतीश के बदले लालू ही ढूंढें। हम जनता हैं। हमारे पास विकल्प ही विकल्प हैं। मन की गांठ खोलिए, भ्रष्टाचार के नाम पर लोकतंत्र से खिलवाड़ को रोकिए।

नीतीश ने सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ वोट मांगा था। अब उन्हें दोबारा चुनाव लड़ कर लालू परिवार को मिटाने के लिए जनादेश लेना चाहिए। बिहार की बीमारी से लड़ने की जिम्मेदारी कोई और लेगा। यह नीतीश जी के वश का नहीं है।

साभार : 
https://www.facebook.com/navendu.kumarsinha/posts/1180141798758493





~विजय राजबली माथुर ©

Friday, August 15, 2014

'हों योग-क्षेमकारी ,स्वाधीनता हमारी '---विजय राजबली माथुर



राजनीतिक रूप से 15 अगस्त स्वतन्त्रता दिवस है परंतु कुछ एथीस्टवादी और संघी लोग इसे आज़ादी का दिन नहीं मानते हैं और प्रश्न उठाते हैं कि किसकी स्वतन्त्रता?नरसिंघ राव जी भी पद-मुक्त होने के बाद THE INSIDER में लिख गए हैं कि हम "स्वतन्त्रता के भ्रमजाल में जी रहे हैं। " किसकी स्वतन्त्रता का जवाब प्रस्तुत  इस गीत में है।

यजुर्वेद के अध्याय 22 मन्त्र 22 मे "ओ 3 म आ---------------योगक्षेमों नः कल्पताम। ।" द्वारा स्वाधीनता की रक्षा हेतु 'राष्ट्रीय प्रार्थना' प्रस्तुत की गई है। किन्तु पाश्चात्य साम्राज्यवादी साहित्य एवं दृष्टिकोण के अनुगामी /विककी पीडिया विशेज्ञ हमारे देशीय विचारक मानते हैं कि राष्ट्रीयता की भावना का संचार अंग्रेज़ शासकों की नीतियों से हुआ है और यह आधुनिक धारणा है। मैं नहीं समझ सकता कि  यजुर्वेद के इस मन्त्र मे जो कहा गया है वह गलत कैसे माना जाता है? इस मन्त्र का भावानुवाद विद्वान कवि के अनुसार यह है-


ब्रहमन! सुराष्ट्र मे हों,द्विज ब्रहमतेजधारी।
क्षत्री महारथी हों अरी-दल -विनाशकारी। ।

होवे दुधारी गौवें,पशु अश्व आशुवाही।
आधार राष्ट्र की हों,नारी सुभग सदा ही। ।

बलवान सभ्य योद्धा,यजमान-पुत्र होवे।
इच्छानुसार वर्षे,पर्जन्य ताप धोवे । ।

फल फूल से लदी हो,औषद्ध अमोघ सारी।
हों योग-क्षेमकारी ,स्वाधीनता हमारी। ।

सृष्टि के प्रारम्भ मे ही मनुष्यों को अपने राष्ट्र के प्रति सदा सजग रहने का निर्देश दिया गया था जिसका उल्लंघन करके वेदों की मनगढ़ंत व्याख्या कर्मकांडी लोगों द्वारा खूब की गई और जनता को गुमराह किया गया परिणामस्वरूप हमारा देश 900 -1100 वर्ष से अधिक गुलाम रहा। गुलामी के दौरान सभी विदेशी शासकों ने इस देश की संस्कृति और सभ्यता को नष्ट किया तथा इसमे हमारे देश के स्वार्थी कर्मकांडी लोगों ने भरपूर उन शासकों की मदद  की। आज आजादी के 67  वर्ष व्यतीत होने के बावजूद उन लोगों ने अपने को अभी तक सुधारा नहीं है और देश की स्वाधीनता पर लगातार हो रहे आक्रमणों का यही सबसे बड़ा कारण है।

लोकसभा के महा सचिव रहे सुभाष कश्यप जी के इन विचारों को पढ़ें -



hindustan-lucknow-04/08/2011


एक तो वैसे ही संसद अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर रही है उसके बावजूद फासिस्ट प्रवृति के लोगों का संरक्षण प्राप्त कर तथाकथित समाज सुधारक अन्ना हज़ारे साहब संसद को पंगु करने हेतु अनशन की धमकी का सहारा ले रहे हैं। कारपोरेट घरानों का भरपूर समर्थन लेकर वह भ्रष्टाचार दूर करने का दिवा-स्वप्न दिखा रहे हैं। पूंजीवाद खुद ही भ्रष्टाचार की जड़ है और उसी पर आधारित कर्मकांडी पद्धति उसकी पोषक। इन दोनों का विरोध तो करना नहीं चाहते और भ्रष्टाचार दूर करने का खुद को ठेकेदार घोषित करते हैं। यह तानाशाही नहीं तो और क्या है?अन्ना ,रामदेव तो भ्रष्ट पूंजीवाद को बचाने के इंस्ट्रूमेंट हैं.भ्रष्टाचार तो पूंजीवाद का बाई-प्रोडक्ट है.देखिये 'आह्वान'का यह सम्पादकीय-(बड़ा देखने के लिए चित्र पर डबल  क्लिक करें)







आजाद हिन्द फौज ने 'एक चूहा हाथी का सरदार' शीर्षक से पर्चे छपवाकर तोप मे भर कर ब्रिटिश सेना मे भारतीय जवानों के समक्ष फिंकवाए थे यह बताने के लिए कि हम लोगों की कमजोरी से विदेशी संख्या मे कम होकर भी हम पर हावी हैं। वही स्थिति आज भी है। मुट्ठी भर पूंजीपति अपने विदेशी साम्राज्यवादी आकाओं के हितार्थ देश की बहुसंख्यक आबादी का शोषण कर रहे हैं। बाबा रामदेव और अन्ना हज़ारे दोनों ही घपलों मे फंस कर कोर्ट को चकमा दे रहे हैं और इतनी बड़ी आबादी को गुमराह करके ठग रहे हैं। दोनों के जैकारे लग रहे है। भ्रष्टाचार तो ये दूर कर सकते नहीं परन्तु त्याग और बलिदान से प्राप्त 'स्वाधीनता' को जरूर खतरे मे डाल देंगे।

आजादी के बाद से मिलेटरी शासन की एक तबका वकालत करता आ रहा है ,पाकिस्तान मे इसी प्रकार के शासन ने उस देश के अस्तित्व पर ही खतरा पैदा कर रखा है। भारत को लोकतान्त्रिक देश होने के कारण ही साम्राज्यवादी उस प्रकार दबोच नहीं पाये जिस प्रकार पाकिस्तान की 'संप्रभुता' को ठेंगा दिखा कर नग्न ताण्डव करते रहते हैं। अन्ना-रामदेव को समर्थन देने वाले यह तय कर लें कि क्या अब आजादी को बरकरार नहीं रखना चाहते? 06 अगस्त 2011 के हिंदुस्तान ,लखनऊ के पृष्ठ 14 पर छापे गए इस समाचार को कुछ लोग खुशी से सराहेंगे परंतु मुझे संदेह है कि यह भारत विशेषकर काश्मीर के अंदरूनी मामले मे साम्राज्यवादी हस्तक्षेप का मार्ग प्रशस्त करने की चाल है। आतंकवाद को क्या पाकिस्तान मे घुस कर ड्रोगन हमले की भांति ही भारत मे घुस कर समाप्त करने का इशारा तो नहीं है यह प्रस्ताव।


hindustan-lucknow-06/08/2011


अमेरिका की चाल अब पाकिस्तान को टुकड़ों मे बाँट कर कमजोर करने की है भारत मे एक तबका इस बात से बेहद खुश होगा। लेकिन गंभीरता से सोचे तो समझ आ जाएगा कि पाकिस्तान के संभावित छोटे-छोटे टुकड़े पूरी तरह अमेरिका के कब्जे मे होंगे जो भारत के लिए किसी भी तरह से हितकर नहीं होगा। जो संगठन ब्रिटिश साम्राज्यवाद की रक्षा हेतु अस्तित्व मे आया था वह आज पूरी तरह से अमेरिकी साम्राज्यवाद का भारत मे हितचिंतक बना हुआ है और धर्म की गलत व्याख्या एवं दुरुपयोग द्वारा जनता को अपने साथ बांध लेता है,उसके द्वारा ऐसे अमेरिकी प्रस्तावों पर खुश होना लाजिमी है ।

अमेरिकी कूटनीतिज्ञ लगातार अन्ना के आंदोलन का समर्थन करती रही हैं। अमेरिका से पूर्ण रूप से समर्थित अन्ना आंदोलन देश की जनता को सही मार्ग पर नहीं चलने देना चाहता है। आजादी के बाद जब तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज  के रूप मे फहरा दिया गया तो भी यूनियन जैक को उतारा नहीं गया था और वह संसद के गुंबद पर कई सप्ताह बाद तक फहराता रहा था। हिंदुस्तान,आगरा,16 अगस्त,2009 अंक मे प्रकाशित सत्येन महापात्र की दिल्ली से भेजी रिपोर्ट मे सप्रमाण इसका उल्लेख किया गया है। आप खुद ही इसकी स्कैन कापी का अध्ययन करें-


खेद और अफसोस की बात है कि जो बामपंथ भारत की एकता और  अखंडता का हामी है उसे जनता धर्म-विरोधी कह कर ठुकरा देती है। धर्म क्या है इसे बामपंथ ने अधार्मिकों के हवाले कर रखा है क्योंकि वह इसे मानता ही नहीं तो जनता को समझाये कैसे?अधार्मिक तत्व इस स्थिति का लाभ उठा कर धर्म की पूंजीवादी व्याख्या अपने हित मे प्रस्तुत कर देते हैं। कुल मिला कर हानि मजदूर और शोषित वर्ग की ही होती है और इजारेदार शोषक वर्ग दानी एवं धार्मिक कहलाकर उसी उत्पीड़ित वर्ग से ही पूजा जाता है। आजादी के आंदोलन मे त्याग और बलिदान का लम्बा अनुभव और इतिहास रखते हुये भी आज बामपंथ का जनता से जुड़ाव न हो पाना इसी धर्म-अधर्म का झंझट है।बामपंथ ने यदि धर्म को अधार्मिक और साम्राज्यवादी/सांप्रदायिक लोगों के लिए खुला न छोड़ा होता और जनता को धर्म का वास्तविक अर्थ समझाया होता तो आज देश की दिशा और दशा  कुछ और ही होती। जन्म से मृत्यु तक जीवन मे अनेक संस्कारों की आवश्यकता होती है जिन्हें मजबूरन पोंगा-पंथियों से ही लोग सम्पन्न कराते हैं और उनके प्रभाव मे आकर गलत दिशा मे वोटिंग कर जाते हैं। यह सब प्रशिक्षण के आभाव का ही दुष्परिणाम है।  आज आजादी के 68 वे सालगिरह को मनाते हुये प्रबुद्ध जनों का परम दायित्व है कि आगे इस आजादी को कैसे बचाए रखा जाये इस बात पर गंभीरता से विचार करें  जबकि पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंघा राव जी  बहुत पहले अपने -'The Insider' मे खुलासा कर गए हैं कि ,"हम स्वतन्त्रता के भ्रम जाल मे जी रहे हैं । "

उच्च वर्ग के लिए आजादी का कोई विशेष महत्व नहीं है। अतः मध्य वर्ग का ही यह दायित्व है कि वह आगे बढ़ कर जनता को राजनीतिक रूप से जागरूक करे और आजादी पर मंडरा रहे खतरे के प्रति आगाह करे एवं इसकी रक्षा हेतु आवश्यक कदम उठाए।
(मूल रूप से इसी ब्लाग में 15 अगस्त 2011 को यह लेख प्रकाशित हो चुका है जिसका यह पुनर्प्रकाशन है )

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Comments in 'Unify Communists in one party' group :
 

Thursday, March 1, 2012

भ्रष्टाचार और तानाशाही के मसीहा



27/02/2012 --हिंदुस्तान लखनऊ 


‎...... केजरिवाल का पुतला फुंका .......
भारत की सर्वोच्च शक्ति संसद कि गनिमापर किचड उछालकर केजरिवाल ने जो राष्टद्रोह किया, इसके खिलाप भिम-शक्ति व्दारा केजरिवाल पर राष्टद्रोह का मुकदमा चलाया जाय इस प्रमुख मांग के साथ केजरिवल का पुतला फुंका गया.....
(दि.२८.०२.२०१२, परभणी, महाराष्ट्र.)


अन्ना हज़ारे को अगुआ बना कर अरविंद केजरीवाल एक लंबे समय से शोषकों -उतपीडकों का बचाव करने हेतु भ्रष्टाचार का राग आलाप रहे है। पढे-लिखे मूरखों को अपना पिछलग्गू बनाने मे मिली कामयाबी के आधार पर वह फूले नहीं समा रहे हैं और जोश मे होश खो बैठे हैं। उन्होने अपने विभाग से हड़पे नौ लाख रुपए प्रधानमंत्री कार्यालय को लौटाए थे जो उनकी और प्रधानमंत्री जी की अंतरंगता का ज्वलंत प्रतीक है। अन्ना साहब को निजी अस्पताल मे पी एम साहब ने पुष्प गुच्छ भिजवा कर उनके आंदोलन को अपना मूक समर्थन प्रदान किया था।

इसी ब्लाग मे एक नहीं अनेक पोस्ट के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि अन्ना-आंदोलन को कांग्रेस के मनमोहन गुट/आर एस एस/देशी-विदेशी NGOs का भरपूर समर्थन था । रामदेव का आंदोलन आर एस एस /विदेशी समर्थन पर आधारित था। इसीलिए अन्ना-आंदोलन रामदेव के आंदोलन पर बढ़त कायम कर सका। परंतु दोनों का उद्देश्य एक ही था भारत मे संसदीय लोकतन्त्र को नष्ट करके 'अर्द्ध सैनिक तानाशाही' स्थापित करना।

1974 मे चिम्मन भाई पटेल की गुजरात सरकार के भ्रष्टाचार के विरोध मे लोकनायक जय प्रकाश नारायण के आंदोलन मे पहली बार नानाजी देशमुख की अगुआई मे आर एस एस ने घुसपैठ की थी और अपार सफलता प्राप्त  थी।1977 की जनता पार्टी सरकार मे अटल बिहारी बाजपाई ने विदेश विभाग मे तथा एल के आडवाणी ने सूचना एवं प्रसारण विभाग मे आर एस एस के लोगो की घुसपैठ करा दी थी। 1980 मे आर एस एस के सहयोग से इंदिरा गांधी की कांग्रेस पूर्ण बहुमत प्राप्त कर सकी थी। यह आर एस एस की बहुत बड़ी उपलब्धि थी। वी पी सिंह के 'बोफोर्स कमीशन विरोधी आंदोलन' मे घुस कर आर एस एस ने संतुलंनकारी भूमिका निभा कर अपनी शक्ति मे अपार वृद्धि कर ली थी और 'राम मंदिर आंदोलन' की आड़ मे पिछड़े वर्ग के हित मे लागू 'मण्डल कमीशन' रिपोर्ट की धज्जिये उड़ा दी थी। देश को साम्राज्यवादियों के अस्त्र 'सांप्रदायिकता' से दंगो मे फंसा कर अपार जन-धन की क्षति की गई थी।

1998  -2004 के राजग शासन काल मे गृह मंत्रालय और विशेष कर खुफिया विभागो मे आर एस एस की ज़बरदस्त पैठ बना दी गई। इनही तत्वो ने रामदेव को सहानुभूति दिलाने हेतु राम लीला मैदान कांड अंजाम दिलाया। लेकिन रामदेव की मूर्खताओ के कारण जनता मे उनकी कलई खुल गई। अतः अन्ना हज़ारे को आगे खड़ा किया गया। जो कुछ हुआ और हो रहा है सब की आँखों के सामने है। जो लोग व्यापारियों,उद्योगपतियों,ब्यूक्रेट्स के शोषण -उत्पीड़न को ढकने हेतु भ्रष्टाचार का जाप कर रहे थे और जनता को उल्टा भड़का रहे थे उनके मास्टर माइंड हीरो अरविंद केजरीवाल 'मतदान' ही नहीं करना चाहते थे और वह मतदाता तक न बने थे जो उनके 'लोकतन्त्र विरोधी' होने और 'तानाशाही समर्थक' होने का सबसे बड़ा प्रमाण है।

अभी अभी मनमोहन सरकार के वरिष्ठ मंत्री वीरप्पा मोइली ने खुलासा किया है कि मनमोहन सिंह ने हड़बड़ी मे 'उदारवाद' अर्थात आर्थिक सुधार लागू किए थे जिनसे 'भ्रष्टाचार' मे अपार वृद्धि हुई है। 

तो यह वजह है कि मनमोहन सिंह जी ने आर एस एस को ताकत पहुंचाने हेतु अन्ना हज़ारे के आंदोलन को बल प्रदान किया था। सिर्फ और सिर्फ तानाशाही ही भ्रष्टाचार को अनंत काल तक संरक्षण प्रदान कर सकती है और इसी लिए इन आंदोलनकारियों ने लोकतान्त्रिक मूल्यों को नष्ट करने का बीड़ा उठा रखा है। राजनीति और राजनीतिज्ञों के प्रति नफरत भर कर ये लोग जनता को लोकतन्त्र से दूर करना चाहते हैं।

देशभक्त जनता से विनम्र अपील है कि वह अन्ना/रामदेव/केजरीवाल सरीखे भ्रष्टाचारियों के संरक्षकों को कोई अहमियत न दे और 'लोकतन्त्र' तथा लोकतान्त्रिक मूल्यों की प्राण-पण से रक्षा करें।

पुनश्च :

डॉ डंडा लखनवी जी के विचारों पर ध्यान देने की सख्त ज़रूरत है-


 Danda Lakhnavi
दोहों के आगे दोहा
जनता के जो हितों, साथ करे खिलवाड़।
आरक्षित उसके लिए, रखिए जेल तिहाड़॥
संविधान से है नहीं, कोई ऊपर व्यक्ति।
इसमें सबकी भावना, इसमें सबकी शक्ति॥
एक अरब जन-मतों की, संसद है पहचान।
उसकी गरिमा ध्यान में, रख करें बयान॥
 ·  ·  · 13 hours ago · 
  • Danda Lakhnavi and 42 others like this.
    • Danda Lakhnavi दोहों के आगे दोहे
      =========
      कोतवाल खुद ही बने, खुद ही न्यायाधीश।
      बन करके जल्लाद खुद, चले उड़ाने शीश॥
      =========
      यह सारे अधिकार आपको दिए किसने हैं?
      11 hours ago ·  ·  2

Wednesday, October 19, 2011

भ्रष्टाचार मिटाने को भ्रष्टाचार का सहारा एक तरफ और जन-संघर्ष दूसरी तरफ

Hindustan-Lucknow-13/10/2011
रामदेव,अन्ना ट्रायल के बाद आडवाणी साहब( जो भारत की आजादी के पाँच साल बाद  मुंबई से कारांची पहुंचे जेड ए भुट्टो के बदले मे करांची से भारत एक गुप्त समझौते के तहत आए थे) 'भ्रष्टाचार'के विरोध मे और सुशासन के पक्ष मे एक माडर्न-रथ पर सवार होकर निकले जिसके पक्ष मे  सूचना देने के लिए मध्य -प्रदेश मे पत्रकारों को रु 500/-500/-की खुली रिश्वत दी गई जिसे आप ऊपर के स्कैन मे देख रहे हैं।

आडवाणी साहब खुद भी पत्रकार रहे हैं उनसे बेहतर पत्रकारों को कोई नहीं समझ सकता है। इस मामले मे प्रबन्धकों ने गोपनीयता का पालन क्यों नहीं किया ?आडवाणी साहब का भंडाफोड़ क्यों कर दिया?ये सब बातें भाजपा की अंदरूनी राजनीति से ताल्लुक रखती हैं ,हमारे चिंतन का विषय नहीं है। हम केवल यह बताना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार के तीरों से भ्रष्टाचार को समाप्त करने की कलाकारी क्या सिर्फ जनता को बेवकूफ बनाने के लिए नहीं है?

1974 मे भी लोकनायक जयप्रकाश नारायण के 'सप्तक्रांति'/सम्पूर्ण  क्रान्ति  आंदोलन मे नानाजी देशमुख को आगे करके संघ और जनसंघ ने अपनी घुसपैठ कर ली थी और उसी के परिणामस्वरूप मोरारजी देसाई की जनता सरकार मे अटल बिहारी बाजपेयी 'विदेश' तथा आडवाणी साहब 'सूचना व प्रसारण मंत्री' बन सके थे। इन लोगों ने अपने-अपने विभागों मे संघियों को नियुक्त कर लिया था। इनके द्वारा नियुक्त कर्मचारियों-अधिकारियों ने भविष्य मे आने वाली सरकारों को भी प्रभावित किया।

1975 की एमेर्जेंसी के दौरान सम्पन्न  'देवरस-इंदिरा' गुप्त  समझौते के अनुसार संघियों ने जनता सरकार को गिरा दिया और खुल कर संघ ने 1980 मे इंदिरा कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत दिला दिया । भाजपा ने इस चुनाव मे दो सीटें प्राप्त कीं और अटल जी भी हार गए किन्तु संघ को जो राजनीतिक लाभ मिला वह कहीं ज्यादा लाभप्रद था।

जयप्रकाश के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन,वी पी सिंह के बोफोर्स भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और अभी हाल ही मे अन्ना साहब के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन मे घुस कर संघ/भाजपा ने अपनी स्थिति सुदृढ़  कर ली है। इस स्थिति को आगामी चुनावों तक बरकरार रखने के लिए भाजपा ने अपने कई नेताओं को रथ-यात्राओं पर उतारा था उसी कड़ी मे खुद को सुपर लीडर बताने हेतु आडवाणी साहब भी कूद पड़े। उनको वहम  है कि 'जिन्ना' साहब की पाकिस्तान जाकर तारीफ करने से उन्हें दूसरे दलों का भी समर्थन मिल जा सकता है। ज्योतिषीय आधार पर वह उप-प्रधानमंत्री तक ही पहुँच सकते थे जो पहुँच चुके अब उनकी सारी कवायद व्यर्थ है बस उससे केवल वह भाजपा के भ्रष्टाचार को ढकने का ही कार्य कर पाएंगे।

आज पत्रकार बड़े-बड़े नेताओं को अपने इशारे पर नचा कर फोटो खींचते और उनकी रिपोर्ट छापते  हैं यही वजह है कि बड़े से बड़े पूंजीवादी  नेता उन्हें खुश करने हेतु आडवाणी साहब जैसा ही प्रयास करते हैं। पत्रकार दावा करते हैं कि वे चाहे जिस नेता को गिरा दें ,चाहे जिस नेता को उठा दें। एक छोटा सा उदाहरण देना चाहूँगा।

आगरा मे एक वर्ष सूखा पड़ने पर भाजपा ने प्रार्थना-प्रदर्शन की योजना बनाई थी ,दैनिक जागरण उन्हीं की विचार-धारा का अखबार होने के कारण उन्होने संबन्धित पत्रकार को मुंह-मांगी रकम देने से इंकार कर दिया। उस पत्रकार ने भाजपा का प्रदर्शन फ्लाप करने हेतु समाजवादी पार्टी की महिला विंग की नगर मंत्री से संपर्क साध कर उनके प्रदर्शन कार्यक्रम से एक दिन पूर्व विक्टोरिया पार्क मे 'समाजवादी महिला सभा' की कुछ महिलाओं को इस प्रकार के सिटिंग एरेञ्ज्मेंट्स से बैठा कर फोटो खींच कर अखबार मे खबर और फोटो सुर्खियों के साथ छाप दिये। प्रदर्शन काफी बड़ा नजर फोटो मे आ रहा था। ऐसे पत्रकारों को मेनेज किए बगैर भाजपा /आडवाणी रथ यात्रा सुर्खियां कैसे बटोर सकती थी?अतः यह धन-वितरण उसी का एक छोटा सा नमूना है।ये भी खबरें हैं कि यू पी से एम पी मे प्रवेश के समय 'टोल टैक्स'की भी चोरी की गई है तथा आडवाणी साहब की सभाओं हेतु माईक के लिए बिजली चोरी की स्तेमाल की गई है।

प्रगतिशील पत्रकार धन नहीं दूसरे तरीकों से लेखकों को अपने इशारे पर नचाने का प्रयास करते हैं। वे अपने ही राष्ट्रीय नेताओं के पक्ष की टिप्पणियों और लेखों को सेंसर करके रख देते हैं एवं ब्लाग्स तथा अखबार मे नहीं छापते हैं। उन्हें भय है कि कहीं नए लोग दूसरों की नजर मे न आ जाएँ ,इसलिए उन्हें दबा दो भले ही इससे उनके अपने  संगठन को क्षति होती है तो होती रहे उनका एक छत्र राज् तो कायम ही रहेगा। 

उन्होने 18 अक्तूबर 2011 के उपवास-धरना हेतु sms जारी किए जिनमे 'you have to' शब्दों का इस्तेमाल किया गया था जबकि वह खुद प्रदर्शन-स्थल पर 12 .14 pm पर पधारे और 01 .19 पर प्रस्थान कर गए जबकि उनके वरिष्ठ नेता ने 'please attend' शब्दावली का प्रयोग किया था और पूरे वक्त प्रदर्शन स्थल पर डटे रह कुशल संचालन किया।

(चार बामपंथी दलों के आह्वान पर पूरे प्रदेश से आए कार्यकताओं ने राजधानी के 'झूले लाल वाटिका' मे एक-दिवसीय 'उपवास'और धरना दिया जो साँय तक शांतिपूर्ण और पूर्ण अनुशासित रूप सम्पन्न हुआ। इसके उद्देश्यों को नीचे स्कैन को डबल क्लिक करके देख सकते हैं।)



सभा का संचालन भाकपा के राज्य सचिव डॉ गिरीश ने किया और उदघाटन भाषण दिया फारवर्ड ब्लाक के प्रदेश अध्यक्ष राम किशोर शर्मा जी ने। महिला फ़ेडरेशन की आशा मिश्रा जी,एडवा की मधु गर्ग जी, सी पी एम के प्रदेश सचिव डॉ श्री प्रकाश कश्यप,भकपा के वरिष्ठ नेता अशोक मिश्रा जी, डॉ अरविंद राज स्वरूप AISF की प्रदेश संयोजिका निधि चौहान,AIYF के प्रदेश संयोजक नीरज यादव ,पूर्व विधायक इम्तियाज़ अहमद आदि ने संबोधित किया। बामपंथी नेताओं के वक्तव्यों मे जनता  के हितों उसकी मूलभूत समस्याओं पर ज़ोर था। डॉ प्रो .रमेश दीक्षित ने भी सभा को संभोधित करते हुये बाम-पंथ का आह्वान किया की जनता उनकी ओर देख रही है और वे आगे आ कर उसका मार्ग-दर्शन व नेतृत्व करें। डॉ दीक्षित खुद बामपंथी नहीं हैं और उनका संबंध यू पी ए के एक घटक से है,परंतु वह जन-हितैषी हैं इसलिए AISF तथा प्रगतिशील लेखकों के सम्मेलन मे भी उपस्थित रहे थे। 

1991 के बाद से अपनाई 'उदारीकरण'की आर्थिक नीतियों को भ्रष्टाचार  के तीव्र प्रसार का कारक वक्ताओं ने बताया। 70 प्रतिशत 'काला धन'श्रमिकों की मजदूरी चुराने से सृजित होता है। अतः शोषण समाप्त किए बगैर भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं किया जा सकता। जो लोग लफ्फाजी करके जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ रहे हैं वे वस्तुतः 'कारपोरेट घरानों'का ही संरक्षण कर रहे हैं। इसी हेतु उनकी 'जन-लोकपाल' मे कारपोरेट घरानों को लाने की मुहिम नहीं है और इसलिए भी कि देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों से उनके एन जी ओज को भारी रकम चंदे के नाम पर रिश्वत स्वरूप मिलती है। 

2012 के यू पी के चुनावों मे चारों बामपंथी दलों ने मिल कर जनता को उसके वास्तविक शत्रुओं -जातिवाद,संप्रदाय वाद से परिचित कराने का संकल्प व्यक्त किया। किसानों के भूमि-अधिग्रहण,उनकी आत्म-हत्याओं ,मजदूरों के शोषण-उत्पीड़न,बेरोजगारी,मंहगाई आदि का सामाजिक जन-जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ता है अतः इंनका वास्तविक निदान कराने हेतु  जनता को बाम-पंथी मोर्चे के पीछे लामबंद करने की आवश्यकता बताई गई। डॉ ,सर्जन,प्रो ,आदि बुद्धिजीवी लोग लगातार भाकपा कार्यालय मे आकर उनसे ऐसा निवेदन कर रहे हैं।   

सभा के अंत मे लोक मंडली ने एक नाटक प्रस्तुत किया जिसकी मुख्य उल्लेखनीय बातों मे था-'जय हो जय हो भ्रष्टाचार विरोधी नारे की जय हो','आयेगा-आयेगा एन जी ओ वाला आयेगा -उल्टे उस्तरे से जनता को मूढ़ ले जाएगा'। 

भ्रष्टाचार सिर्फ आर्थिक ही नहीं होता है वह-सामाजिक,धार्मिक भी होता है। जब तक इस सामाजिक-धार्मिक भ्रष्टाचार का खात्मा नहीं होगा तब तक आर्थिक भ्रष्टाचार का भी खात्मा नहीं हो सकता। चाहे जितनी रथ-यात्राएं निकल जाएँ,जितने चाहे प्रदर्शन -अनशन हो जाएँ।

Monday, September 5, 2011

सत्ता-संघर्षों की दास्तान ------ विजय राजबली माथुर

आज भी मुझे याद है कि 05 सितंबर 1962 को कक्षा 06 मे रूक्स हायर सेकेन्डरी स्कूल (जो अब रवीन्द्र नाथ टैगोर इंटर कालेज हो गया है),बरेली कैंट मे कक्षाध्यापक दीना नाथ जी ने बताया था कि उस सुबह सर्व-प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने सर्व पल्ली डा राधाकृष्णन को माल्यार्पण कर अभिनंदन किया था। तब से उनका जन्मदिन प्रतिवर्ष 'शिक्षक दिवस ' के रूप मे मनाया जा रहा है। अब तो छात्रों से शिक्षकों हेतु चन्दा लिया जाता है लेकिन तब हम लोगों से नहीं लिया जाता था बल्कि शिक्षक गण बंद डिब्बे मे आम जनता से चन्दा एकत्र करते थे। दीना नाथ जी ने जिन 5 छात्रों को अपनी टीम मे साथ लिया था उनमे एक मुझे भी शामिल कर लिया था। लिहाजा छुट्टी हो जाने के बावजूद मुझे भी  उनके साथ बाजार-बाजार घूमना पड़ा। लौटते मे उन्होने बिस्कुट सब को खिलवा दिये थे। वह ही सब को उनके घर तक छोडने गए थे। एक सहपाठी के पिताजी और मेरे बाबूजी गोला बाजार मे खड़े थे हम लोगों की फिक्र मे,दीना नाथ जी ने उन दोनों को समझा दिया कि वह अपने साथ ले गए थे। तब के शिक्षकों मे आत्मीयता थी।

डा राधाकृष्णन जी को दार्शनिक राष्ट्रपति कहा गया है जबकि डा राजेन्द्र प्रसाद जी का चिंतन और लेखन भी दार्शनिक था । नेहरू जी ने उनसे मतभेद के चलते उन्हें तीसरा चांस नहीं दिया था। राधा कृष्णन जी 16 वर्ष लंदन मे अग्रेज़ी के अध्यापक रहे थे और नेहरू जी को बेहद प्रिय थे। 1962 मे चीनी आक्रमण मे भारत की फौजी पराजय के सदमे से नेहरू जी गंभीर रूप से बीमार पड़ गए तब 1963 मे राधाकृष्णन जी की महत्वाकांक्षा जाग्रत हो गई। के कामराज नाडार ,कांग्रेस अध्यक्ष जो उनके प्रांतीय भाषी थे से मिल कर उन्होने नेहरू जी को हटा कर खुद प्रधान मंत्री बनने और कामराज जी को राष्ट्रपति बनवाने की एक गुप्त स्कीम बनाई। परंतु उनका दुर्भाग्य था कि( वह नहीं जानते थे कि उनके एक बाड़ी गार्ड साहब जो तमिल भाषी न होते हुये भी अच्छी तरह तमिल समझते थे ) नेहरू जी तक उनकी पूरी स्कीम पहुँच गई जिसका खुलासा उस सैन्य अधिकारी ने अवकाश ग्रहण करने के पश्चात अपनी जीवनी मे किया है।

'कामराज प्लान' मे भ्रष्ट और वृद्ध लोगों को हटा कर नए लोगों को आगे लाने की बात थी। यू पी मे चंद्र भानू गुप्ता खुद हट गए और फैजाबाद से सांसद श्रीमती सुचेता कृपलानी को मुख्यमंत्री बनवा दिया। इसी प्रकार दूसरे प्रदेशों के मुख्यमंत्री भी बदल गए। पी एम नहरूजी ने भी हटने का प्रस्ताव इस प्रकार किया कि उसे कांग्रेस पार्टी ने रिजेक्ट कर दिया और कामराज जी मुंह देखते रह गए। यह गैर-राजनीतिक और दार्शनिक राधाकृष्णन जी की भी पराजय थी।

आज 48 वर्ष बाद कांग्रेस मे उस कहानी को दूसरे ढंग से दोहराया गया है। अब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया जी गंभीर बीमारी का इलाज करने जब अमेरिका चली गईं तो उनकी गैर हाजिरी मे उनके द्वारा नियुक्त 4 सदस्यीय कमेटी (राहुल गांधी जिसका महत्वपूर्ण अंग हैं)को नीचा दिखाने और सोनिया जी को चुनौती देने हेतु गैर राजनीतिक और अर्थशास्त्री प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह जी ने अपने पुराने संपर्कों(I M F एवं WORLD BANK) को भुनाते हुये फोर्ड फाउंडेशन से NGOs को भारी चन्दा दिला कर और बागी इन्कम टैक्स अधिकारी अरविंद केजरीवाल तथा किरण बेदी (असंतुष्ट रही पुलिस अधिकारी) के माध्यम से पूर्व सैनिक 'अन्ना हज़ारे' को मोहरा बना कर 'भ्रष्टाचार' विरोधी सघन आंदोलन खड़ा  करवा दिया।

सोनिया समर्थक कांग्रेसी इस चाल को समझ और देख रहे थे कि किस प्रकार सुषमा स्वराज (भाजपा नेता) प्रधानमंत्री को सहयोग कर रही हैं। चाहे का गुरुदास दास गुप्ता द्वारा प्रस्तुत 'निंदा' प्रस्ताव हो चाहे अन्ना का अनशन समाप्त कराने का प्रस्ताव भाजपा सरकार के साथ खड़ी थी।

1991 मे जब रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर मनमोहन सिंह जी वित्त मंत्री बने तब उनकी नीतियों को अमेरिका जाकर आडवाणी साहब ने भाजपा की नीतियों को चुराया जाना बता कर सराहा था। भाजपा/जनसंघ तो थे ही साम्राज्यवाद संरक्षक परंतु 1980 मे इंदिराजी ने जनता पार्टी को शिकस्त देने हेतु संघ के समर्थन से जो चुनाव जीता (जिसमे भाजपा को मात्र 02 सीटें मिलीं थीं और तमाम संघी कांग्रेस के बैनर पर जीते थे) उसी का परिणाम रहा श्रमिक विरोधी नीतियों का अपनाया जाना तथा निजीकरण की भूमिका बांधना। 1984 मे भी राजीव गांधी को संघ का समर्थन था जिसका परिणाम हुआ बाबरी मस्जिद/राम जन्म भूमि का ताला खुलना।

1989 मे 'मण्डल कमीशन' की सिफ़ारिशें लागू होने पर 'कमंडल' रथ यात्राओं से आडवाणी जी ने देश को सांप्रदायिक दंगों की भट्टी मे झोंक दिया। 1992 मे पूर्व संघी स्वंय सेवक नरसिंघा राव जी के प्रधान् मंत्रित्व  मे जब मनमोहन सिंह जी वित्त मंत्री थे अयोध्या का ढांचा गिरा दिया गया। धन-बल से राव सरकार अल्पमत होते हुये भी चलायी गई। कारपोरेट घरानों को अपनी राजनीतिक शक्ति पहचानने का भरपूर अवसर मिला।

1998 से 2004 तक 06 वर्ष प्रधान मंत्री रह कर बाजपेयी जी ने सत्ता मनमोहन जी को सौंप दी। अब इनकी नीतियों ने जम कर अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। बंगाल मे बाम-पंथ का शासन खत्म होने की खुशी मे पेट्रोल,डीजल,गैस,के दाम अनावश्यक रूप से बढ़ा कर रेकरिंग मंहगाई बढ़ा दी गई और जनाक्रोश को दूसरी तरफ मोड़ने हेतु कुशल अर्थशास्त्री जी ने अन्ना जी को संत बना कर प्रायोजित करा दिया। नारे उछाल दिये गए 'अन्ना नहीं आंधी है,दूसरा गांधी है'। गांधी के हत्यारे ही गांधी भक्त के चोले मे अन्ना -अनुयायी बन गए। 1977 मे भी नारे उछले थे- 'यह पवन नहीं आंधी है ,छत्तीस गढ़ का गांधी है।' युवा समाजवादी सन्यासी पवन दीवान एम पी मे शिक्षा मंत्री के रूप मे एयर कंडीशन कार से सफर करते-करते कांग्रेस मे शामिल होकर अब कहाँ हैं?

इंटरनेटी समृद्ध लोग अन्ना आंदोलन की मुख्य कड़ी रहे हैं जिंनका आचरण तानाशाहीपूर्ण ,असभ्य और बर्बर रहा है। फेस बुक पर विदेश स्थित अमीर ने 'बकवास' एवं दिल्ली स्थित इंजीनियर साहब ने 'वाहियात' लिख कर अन्ना साहब की पोल खोलने की आलोचना की है। नीचे विभिन्न ब्लाग्स से उनके रेफरेंस सहित विवरण दिया जा रहा है जो अन्ना आंदोलन के सत्य को स्पष्ट करने हेतु पर्याप्त है। अंत मे प्रमाण-स्वरूप अखबारों के स्कैन भी दिये जा रहे हैं। मणिपुर की मानवाधिकार आंदोलनकारी सुश्री इरोम शर्मीला का यह वक्तव्य भी ध्यान देने योग्य है-

"वह अन्ना हज़ारे नहीं हैं ,एक साधारण कार्यकर्ता हैं,इसलिए दस साल से भूख हड़ताल पर बैठी होने के बावजूद सरकार उनके प्रति संवेदनशीलता नहीं दिखा रही है। "

इरोम शर्मीला को कारपोरेट घरानों तथा विदेशी फाउंडेशनों एवं भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों का समर्थन प्राप्त  नहीं है इसी लिए सरकार उन्हें महत्वहीन मान रही और उनके जायज आंदोलन की उपेक्षा कर रही है। वह बाजपेयी जी के समय से अनशन पर हैं तब संघ/भाजपा कहाँ था?अन्ना जी संघ को इसलिए प्रिय हैं क्योंकि उन्होने भारतीय संविधान और संसद को चुनौती दी है और संघ इस संविधान को उखाड़ फेंकना चाहता है इसलिय उन्हें उछाल रहा है।

हमे सत्ता प्रतिष्ठानों के संघर्षों से कोई मतलब नहीं है कि मनमोहन जी सोनिया जी को उनकी अनुपस्थिति मे हिला पाये अथवा नहीं या कि 2014 मे पूर्ण बहुमत मिलने अथवा सरकार बनाने की दशा मे वह मनमोहन जी को हटा कर किसी दूसरे को  पी एम बनाना चाहेंगी तो मनमोहन जी भाजपा के समर्थन से पुनः सत्ता कब्जाना चाहेंगे अथवा नहीं। हमारी चिंता यह है कि किस प्रकार गरीब-किसान,मजदूर को न्याय मिलेगा?उनकी आवाज बुलंद करने को कोई आगे आयेगा अथवा नहीं?अन्ना जी के महाराष्ट्र मे किसान भूख से आत्म-हत्या कर रहे हैं तो करें अन्ना जी की बला से !अन्ना जी को किसान -मजदूर नहीं कारपोरेट घरानों से हमदर्दी है। 8-8 कमांडोज़ के घेरे मे चलने वाले वी वी आई पी अन्ना जी के इंटरनेटी भक्त बड़े खुश होंगे अपने गांधी की सरकारी आव-भगत से। मुझे तो इसमे आगे आने वाले समय मे नक्सल्वाद की मजबूती होती दीख रही है। जब लोकतान्त्रिक विकल्प गरीबों को न्याय नहीं दिला सकेंगे तो एकमात्र रास्ता सशस्त्र संघर्ष और हिंसा का ही बचेगा। अन्ना के पीछे लामबंद कारपोरेट जगत, इंटरनेटी उनके भ्रष्ट भक्त देश को गृह-युद्ध की ओर धकेलने की तैयारी कर रहे हैं जैसी की अमेरिकी योजना है।
22-06-2020 


'मेघनेट'मे भूषण जी के विचार-
"इन्होंने प्रत्यक्ष रूप से देश के लोकतंत्र, चुनाव प्रणाली और संविधान को ललकारा है. इन संगठनों को कई हज़ार करोड़ रुपयों की देशी-विदेशी वित्तीय सहायता शिक्षा, आदिवासी कल्याण, आदि के लिए मिलती है.
जिस प्रकार इन गैर सरकारी संगठनों ने अपने आंदोलन को धन बल से अग्रसर किया है उसे लेकर कई आशंकाएँ उत्पन्न होना स्वाभाविक है. तिस पर तुर्रा यह है कि ये स्वयं को लोकपाल के तहत लाने की बात को सिरे से नकार चुके हैं. तो क्या ऐसे संगठन केवल सिविल सोसाइटियाँ बना कर सांविधानिक ढाँचे को झटके देने का कार्य ही करेंगे. यह सर्वविदित है कि ये संगठन भ्रष्ट सरकारी तंत्र और विदेशों में काफी घुसपैठ रखते हैं. अभी तक ये किसी प्रभावी प्रशासनिक नियंत्रण में नहीं हैं. संगठन के तौर पर ये जनसाधारण के लिए किसी रहस्य से कम भी नहीं हैं.                             

'लोकसंघर्ष' मे सत्य नारायण  ठाकुर साहब कहते हैं-

"अरुंधती राय बताती हैं कि अन्ना ब्रांड को स्पोंसर करने वाली सब्सिडियरी कंपनियों (एन.जी.ओ) को कोका कोला, लेहमन ब्रदर्स जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ मुक्त हस्त से चंदा देती हैं। अन्ना टीम के संचालक अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसौदिया की संस्था 'कबीर' ने पिछले तीन सालों में फोर्ड फ़ाउंडेशन से चार लाख डालर अर्थात दो करोड़ रुपयों से ज्यादा दान प्राप्त किया है। इसी तरह अरुंधती ने अपने आलेख में बताया है कि इंडिया अगेंस्ट करप्सन को भारी रकम का दान देने वालों की सूची में भारत की अलुमिनियुम कम्पनियाँ, स्पेशल इकोनोमिक जोंस की दैत्याकार कंपनियों के अलावा रियल इस्टेट बिजनेस की कम्पनियाँ हैं जिन्होंने देश में विराट वित्तीय साम्राज्य खड़ा कर लिया है। इनमें से कुछ के खिलाफ जांच भी चल रही है। फिर अन्ना आन्दोलन में इनके उत्साह का क्या कारण है ?
कारण स्पष्ट है। इन्होने सरकारी भ्रष्टाचार का बड़ा हो हल्ला मचाया है और उस हो हल्ला में कार्पोरेट भ्रष्टाचार का मुद्दा दब गया है। यही इनका निहित स्वार्थी है। पानी, बिजली, स्वास्थ्य, सफाई, शिक्षा, यातायात, संचार आदि जनोपयोगी सेवाओं से सरकार अपना हाथ खींच रही है। इन सेवाओं को एन.जी.ओ और कार्पोरेट के हवाले किया जा रहा है। अन्ना सार्वजानिक सेवाओं के निजीकरण और उसके दुष्परिणामो के बारे में कुछ नहीं बोलते हैं। अरुंधती बताती हैं कि जाता लोकपाल के दायरे में एन.जी.ओ/कार्पोरेट द्वारा दिए जाने वाले घूस को 'लोबियिंग फीस' का नया नाम देकर विधि सम्मत बनाया जा सकेगा। "
"अरुंधती राय ने लोकपाल को सर्वोच्चाधिकार प्राप्त निकाय बनाने पर भी प्रश्न उठाया है। क्या वह किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं होगा ? लोकपाल को निश्चित ही उत्तरदायित्वपूर्ण होना चाहिए। अरुंधती की राय में भारतीय चुनाव पद्धति के दोषों के चलते भारत में अल्पतंत्र का राज है। अरुंधती की राय में जनलोकपाल का वर्तमान स्वरूप को स्वीकारने से भारत में अल्पतंत्र का दूसरा स्तम्भ खड़ा हो जायेगा।
इसी तरह अन्ना के विचारों को अरुंधती राय गाँधी विरोधी बताती हैं। इसके प्रमाण में वह अन्ना के गाँव रालेगांव सिद्धि की ग्राम पंचायत और सहयोग समिति को उध्रत करती हैं, जिनका चुनाव विगत 25 वर्षों में कभी नहीं हुआ। अन्ना से सम्बंधित संस्थाओं में रुपयों की हेराफेरी और गबन की भी शिकायतें हैं। अरुंधती ने अन्ना की मानसिकता को व्यक्त करने के लिये अन्ना की निम्नांकित पंक्ति को उध्रत किया है "यह महात्मा गाँधी की द्रष्टि थी कि प्रत्येक गाँव में एक चमार, एक सुनार, एक कुम्भार आदि होना चाहिए। उन लोगों को सभी काम अपने पेशे के मुताबिक करना चाहिए। इस तरह गाँव स्वावलंबी होगा। यह वह (गांधीवादी) प्रणाली है, जिसका आचरण हम अपने गाँव रालेगांव सिद्धि में करते हैं।" निश्चय ही अन्ना के इस विचार का सम्बन्ध गांधीवादी विचारों से दूर-दूर तक नहीं है।
जो भी हो, अन्ना ब्रांड टोपी बाजार में तेजी से चल पड़ा है मीडिया इसमी क्यों पीछे रहता। टी.वी चैनलों ने तो कमाल कर दिया। उसने अन्ना इंडिया और इंडिया अन्ना घोषित कर दिया। लेकिन क्या अन्ना इंडिया सचमुच भारत है ? 20 रुपये से गुजरा करने वाले 84 करोड़ गरीबों का सच्चा भारत 'अन्ना इंडिया' में शामिल नहीं है। क्या अन्ना टीम को विदर्भ में आत्महत्या करने वाले किसानो, सिंगुर, नंदीग्राम , लालगढ़, नोयडा के प्रताड़ित किसानो की चिंता है। क्या इस नये गाँधी के एजेंडा में 43 करोड़ असंगठित मजदूरों को निर्वाह योग्य न्यूनतम मजदूरी और इनकी सामाजिक सुरक्षा शामिल है ? पुराने गाँधी समाज के अंतिम आदमी की बात करते थे। वे अन्त्योदय का सपना देखते थे। गाँधी जी के इस नए अवतार को मध्य वर्ग के तामझाम ने घेर रखा है। जाहिर है, वाचाल मध्य वर्ग सड़कों पर ज्यादा थिरकता है। "सत्य नारायण ठाकुर


'जनपक्ष ' मे ए एस वर्मा जी का लेख दिया गया है-
" अण्णा ने सत्ताधारी वर्ग के लिए आक्सीजन का काम किया है और उस आक्सीजन सिलेंडर को ढोने के लिए उन्हीं लोगों के कंधों का इस्तेमाल किया है जो सत्ताधारी वर्ग के शोषण के शिकार हैं। उन्हें नहीं पता है कि वे उसी निजाम को बचाने की कवायद में तन-मन-धन  से जुट गये जिसने उनकी जिंदगी को बदहाल किया। देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे जुझारू संघर्षों की ताप से झुलस रहे सत्ताधारियों को अण्णा ने बहुत बड़ी राहत पहुंचाई है। 


अगर किसी चैनल का मालिक न चाहे तो उसके पत्रकार या कैमरामेन लगातार अण्णा का कवरेज कर सकते थे? क्या कारपोरेट घराने अपनी जड़ खोदने वाले किसी आंदोलन को इस तरह मदद करते या समर्थन का संदेश देते जैसा अण्णा के साथ हुआ? भारत सरकार के गृहमंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीन वर्षों में यहां के एनजीओ सेक्टर को 40 हजार करोड़ रुपये मिले हैं- उसी एनजीओ सेक्टर को जिससे टीम अन्ना के प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, किरन बेदी, संदीप पांडे, स्वामी अग्निवेश जैसे लोग घनिष्ठ/अघनिष्ठ रूप से जुड़े/बिछड़े रहे हैं। इस सारी जमात को उस व्यवस्था से ही यह लाभ मिल रहा है जिसमें सडांध फैलती जा रही है, जो मृत्यु का इंतजार कर रही है और जिसे दफनाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में उत्पीड़ित जनता संघर्षरत है। आज इस व्यवस्था का एक उद्धारक दिखायी दे रहा है। वह भले ही 74 साल का क्यों न हो, नायकविहीन दौर में उसे जिंदा रखना जरूरी है। 


अण्णा हजारे ने 28 अगस्त को दिन में साढ़े दस बजे अनशन तोड़ने के बाद रामलीला मैदान से जो भाषण दिया उससे आने वाले दिनों के उनके एजेंडा का पता चलता है। एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह उन्होंने उन सारे मुद्दों को भविष्य में उठाने की बात कही है जो सतही तौर पर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई का आभास देंगे लेकिन बुनियादी तौर पर वे लड़ाइयां शासन प्रणाली को और चुस्त-दुरुस्त करके इस व्यवस्था को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा टिकाऊ, दमनकारी और मजबूत बना सकेंगी। अण्णा का आंदोलन 28 अगस्त को समाप्त नहीं हुआ बल्कि उस दिन से ही इसकी शुरुआत हुई है। रामलीला मैदान से गुड़गांव के अस्पताल जाते समय उनकी एंबुलेंस के आगे सुरक्षा में लगी पुलिस और पीछे पल पल की रिपोर्टिंग के लिए बेताब कैमरों से दीवाल पर लिखी इबारत को पढ़ा जा सकता है। व्यवस्था के शस्त्रागार से यह एक नया हथियार सामने आया है जो व्यवस्था बदलने की लड़ाई में लगे लोगों के लिए आने वाले दिनों में एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी करेगा।"

जैसे-जैसे लोगों के कष्ट बढ़ेंगे और शांतिपूर्ण समाधान के द्वार बंद होते जाएँगे मैं पूर्ण आत्म-विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि अवश्य ही कोई न कोई क्रांतिकारी आगे आ कर साम्राज्यवाद/सांप्र्दायवाद को जन-सहयोग से उखाड़ फेंकेगा और यह रक्त-पात के बिना संभव न होगा ।
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Hindustan-lucknow 03/09/2011

Hindustan-lucknow 03/09/2011
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Hindustan-Lucknow-31/08/2011

Hindustan-Lucknow-31/08/2011

Hindustan-Lucknow-31/08/2011

Hindustan-Lucknow-31/08/2011

hindustan-lucknow-03/09/2011


Tuesday, July 5, 2011

सदाचार ही भ्रष्टाचार दूर कर सकता है --- विजय राजबली माथुर




(हिन्दुस्तान-लखनऊ-05/07/2011)

कल पूर्व प्रधानमंत्री स्व.गुलजारी लाल नंदा की ११३ वी जयंती 'नंदा स्मृति संस्थान'के तत्वाधान में गांधी भवन ,लखनऊ में मनाई गई,जिसमें विचारकों ने 'सदाचार'द्वारा भ्रष्टाचार दूर करने के नंदा जी के प्रयास को पुनर्जीवित किये जाने पर बल दिया.

गुलजारी लाल नंदा जी एक दबंग -ईमानदार व्यक्तित्व के धनी थे.सादगी पसंद नंदा जी को सितम्बर  १९६३ में नेहरू जी ने गृह मंत्री बनाया था.उनके निजी सचिव रहे श्री राम प्यारे त्रिवेदी ने बताया कि,तब उन्होंने लोक-सभा में कहा था,-"दुसरे विश्व युद्ध के बाद भारत में जो भ्रष्टाचार बढ़ा है,वह अभी शुरुआती दौर में है किन्तु यदि इसे रोका न गया तो यह रेगिस्तान बन कर विकास की दरिया को आगे बढ़ने नहीं देगा.इसलिए मैं दो वर्षों में भ्रष्टाचार मिटा देने का संकल्प लेता हूँ".

नंदा जी ने काफी सख्ती की और अपने निवास पर रोजाना जनता से उसकी समस्याएं सुन कर उनका समाधान कराना शुरू किया.भ्रष्ट लोगों को काफी पीड़ा हुई.एक रोज निर्धारित समय समाप्त होने से थोडा पहले एक व्यक्ति आया और लाईन में लगे दुसरे व्यक्ति को रु.५००/-देकर अगले दिन आने के लिए घर भेज दिया और खुद उसकी जगह लग गया.न.आने पर नंदा जी ने उसकी समस्या पूँछी तो वह बोला कि,मैं आपको यह बताने आया हूँ कि आप कभी भ्रष्टाचार दूर नहीं कर सकेंगें क्योंकि मैं भ्रष्टाचार के जरिये ही आप तक पहुंचा हूँ.उसने स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति भ्रष्टाचार की शिकायत के लिए लाईन में खड़ा था उसे उसने रु.५००/-देकर भगा दिया और उन्हें सिर्फ यही बताने आया है.नंदा जी अपने निवास पर खेले गए भ्रष्टाचार के खेल से विस्मय में पड़ गए.वह उस व्यक्ति को कुछ जवाब देने में असमर्थ थे परन्तु उनको बोद्ध हो गया.
(शाहजहांपुर में 'नेशनल हेराल्ड'में यह समाचार तब पढ़ा था और याद है)

११ नवम्बर १९६६ को गृह मंत्री पद से त्याग-पत्र देने के बाद त्रिवेदी जी के अनुसार नंदा जी ने कहा-"मैं समझता था कि केंद्र सरकार में भ्रष्टाचार समाप्त कर देने की शक्ति है ,किन्तु वह शक्ति केवल समाज में है .इस दिशा में यदि मुझे एक अकेला सुझाव देने को कहा जाए तो मैं जनता से कहूंगा कि वह लोकपाल की नियुक्ति पर दबाव डाले ,जिसका कार्यक्षेत्र स्वतंत्र होगा".

अब से ४५ वर्ष पूर्व कार्यवाहक प्रधानमंत्री एवं गृह मंत्री रहे नंदा जी ने 'लोकपाल'नियुक्त किये जाने की बात कही थी और पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौडा जी के कार्यकाल में पहली बार लोकपाल बिल लोक सभा में पेश किया गया था जिसके पीछे भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के गृह मंत्री का.इन्द्रजीत गुप्त और कृषि मंत्री का.चतुरानन मिश्र जी का दबाव था.लेकिन अन्ना और रामदेव की सपोर्टर भाजपा ने तब कांग्रेस से मिल कर उस सर्कार को गिरवा दिया था और आज तक उस बिल को पास होने नहीं दिया है.

हरियाणा की एक याचिका के आधार पर अन्ना के विरुद्ध दो लाख रु.गबन करने का मुकदमा अदालत में विचाराधीन है और वह भ्रष्टाचार दूर करने के मसीहा माने जा रहे हैं.रामदेव करोड़ों के घपले में फंसे हैं और नादान लोग उन्हें भ्रष्टाचार विरोधी संत कह रहे हैं.कितना क्रूर मजाक चल रहा है इस देश में ,चोर को कोतवाल बनाने की मुहिम चल रही है.विस्तृत जानकारी के लिए प्रेम सिंह जी के लेख का अवलोकन करें.

१९६९-७१ में जब बी.ए.में मेरठ कालेज में पढ़ रहा था तो हमारे पोलिटिकल साईंस के प्रो.के.सी.गुप्त जी बताया करते थे कि,भ्रष्टाचार पानी की भांति ऊपर से नीचे की और चलता है और 'सदाचार' धुएं की तरह नीचे से ऊपर की और उठता है.नंदा जी ने इसी लिए 'सदाचार समितियों' का गठन कराया था.उनका जोर समाज में सदाचार फ़ैलाने पर था ,यदि सम्पूर्ण समाज सदाचारी हो जाए तो भ्रष्टाचार टिक ही नहीं सकता.अतः समाज को सदाचारी बनाए बगैर भ्रष्टाचार दूर कर देनें की बातें कोरा ढकोसला ही हैं.समाज को भ्रष्ट बनाने में तथा-कथित धार्मिक कुरीतियों का ही प्रबल योगदान है.इन पर कौन कुठाराघात कर रहा है? अन्ना या रामदेव? इन दोनों को आर.एस.एस.समर्थन दे रहा है जो एक अर्ध-सैनिक संगठन है और वर्ग-विशेष की तानाशाही स्थापित करना जिसका मूल लक्ष्य है.लोकतंत्र समर्थकों को इस साजिश को समझना चाहिए.

नंदा जी दो बार प्रधानमंत्री रहे ,गृह मंत्री रहे और एक बार इंदिराजी के संकट के समय उनके रेल मंत्री भी रहे.उन पर भ्रष्टाचार की एक उंगली भी नहीं उठायी जा सकती.बेहद सादगी से सरल जीवन व्यतीत करते थे ,वह जिस अपार्टमेन्ट में दिल्ली में रहते थे अधिकाँश को पता भी नहीं था कि एक महान व्यक्तित्व भी उन्हीं के अपार्टमेन्ट में रह कर समाज सेवा कर रहा है.एक बार आग के धुएं में घिर कर नंदा जी बेहोश हो कर गिर पड़े थे -साधारण इंसान समझ कर किसी ने भी उन्हें मदद करना मुनासिब नहीं समझा,इत्तिफाक से एक जानकार की निगाह उन पर चली गयी तब उसने उन्हें रहत प्रदान कराई और गुजरात में प्राईवेट सेवारत उनके पुत्र को सूचित किया जो आकर उन्हें अपने साथ लिवा ले गए.समाज अपने एक ईमानदार राज नेता के लिए कुछ नहीं कर सका.

आज समाज से यदि सच में भ्रष्टाचार को दूर करना है तो नंदा जी के बताये मार्ग पर चल कर 'सदाचार समितियां ' बनाई जाएँ और समाज को सुधारा जाए,कुरीतियों को मिटाया जाए,ढोंग-पाखण्ड को नष्ट किया जाए .इतना करने पर भ्रष्टाचार तो खुद-ब- खुद ख़त्म हो जाएगा.