Sunday, September 15, 2013

भारत के राजनीतिक दल (भाग-1)---विजय राजबली माथुर

राजनीतिक दलों में चाहे जो दोष हों और चाहें अनेक विचारक उनसे घृणा करते हों,उनका लोकतन्त्र में होना अत्यावश्यक है। वे ही राजनीति को गतिशील बनाते हैं और वे ही निर्णयों पर पहुँचने की प्रक्रिया  के साधन हैं। सार्वजनिक मामलों के वे मुख्य प्रतिनिधि होते हैं। वे वास्तव में संसदात्मक शासन के भारी भवन के स्तम्भ हैं। एम दुवरगर ने अपनी पुस्तक 'पोलिटिकल पार्टीज़' में लिखा है-"संसदात्मक  ढंग के  लोकतन्त्र में तो उनकी आवश्यकता कहीं अधिक है। "

वस्तुतः राजनीतिक दल ही लोकतन्त्र का जीवन-रक्त होते हैं। उनके बिना लोकतन्त्र 'सर्वाधिकारवाद (Totalitarianism)'की ओर बढ़ता है।

विरोधी दल का महत्व:
फरवरी 1956 में नई दिल्ली में 'संसदात्मक लोकतन्त्र' पर एक सेमिनार आयोजित किया गया था जिसमें बोलते हुये भारत स्थित ब्रिटेन के हाई कमिश्नर मेलकाम मैकडोनाल्ड  ने कहा था-"इस प्रकार के लोकतन्त्र का निचोड़ इस बात में है कि कार्यपालिका की विधान मण्डल के भीतर और बाहर वर्ष के प्रतिदिन आलोचना की जा सके । ऐसा न होने पर सरकार लोकतंत्रात्मक न रहेगी ,वह शीघ्र ही मनचाही करने लगेगी और आगे चल कर अत्याचारी शासन का रूप ले लेगी। यह जो बात अपने हित में समझेगी वैसा ही दूसरों के हितों अथवा राष्ट्र हित का ध्यान न करते हुये करने लगेगी।' जनता का शासन जनता के लिए और जनता द्वारा 'महान सिद्धान्त का स्थान 'जनता का शासन 'कुछ थोड़े से व्यक्तियों द्वारा कुछ व्यक्तियों के लिए' का सिद्धान्त ले लेगा "

लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने अपने एक वक्तव्य में कभी इंगित किया था- "संसदीय पद्धति के भी अपने नियम हैं। उनमें सबसे अधिक आधारभूत नियम यह है कि यह पद्धति प्रभावशाली विरोध के बिना नहीं चल सकती। ....... अच्छे से अच्छे इरादे वाले व्यक्ति भी यदि उन पर सदैव ही विरोध का तेज प्रकाश न पड़ता रहे ,शक्ति पाने पर गलत मार्ग पर चले जाएँगे। यह भी प्रश्न नहीं है कि विरोधी दल सत्तारूढ़ दल से अच्छे हैं या बुरे। यह यथार्थ में बुरे हो सकते हैं। परंतु यही बात कि वह निरंतर 'सतर्कता' का प्रयोग करते हैं ,सत्तारूढ़ दल को ठीक मार्ग पर रखती है। "

आज़ादी से पहले कांग्रेस के झंडे के नीचे विदेशी शासन का अंत करने के लिए एक राष्ट्रीय आंदोलन चला था। लेकिन 1920 के बाद 'उदारवादी दल (Liberal  Party) ने एक संसादात्मक दल के रूप में कार्य किया और 1935 के भारत शासन अधिनियम के अंतर्गत प्रांतीय विधान मंडलों में कांग्रेस ने भी ऐसा ही किया था। शुरू में दो प्रकार के राजनीतिक दल थे:
1 )-वे जिंनका आधार राजनीतिक तथा आर्थिक कार्यक्रम हैं और,
2 )-वे जो सांप्रदायिक भावना व मनोवृत्ति से प्रेरित होकर राजनीति में घुस आए हैं।

सन 1953 में जवाहर लाल नेहरू ने कहा था (जिसका उल्लेख डी एन पामर ने अपनी पुस्तक 'इंडियन पोलिटिकल सिस्टम'के पृष्ठ-186 पर किया है)-"भारत में वर्तमान दलों को चार समूहों में रखा जा सकता है। कुछ दल ऐसे हैं जिनकी विचार धारा आर्थिक है (यथा-कांग्रेस,समाजवादी दल,साम्यवादी दल और उससे संबन्धित संगठन हैं)। कई सांप्रदायिक दल हैं जिनके नाम भिन्न-भिन्न हैं ,किन्तु वे सभी संकुचित सांप्रदायिक विचार धाराओं पर चल रहे हैं। और कई प्रांतीय अथवा प्रादेशिक दल हैं ,जिनके कार्यों का क्षेत्र उनके अपने प्रदेश हैं। "

1964 में अजित प्रसाद जैन की अध्यक्षता वाली कांग्रेस की एक संसदीय समिति ने सुझाव दिया था कि, सांप्रदायिक दलों के बनने पर रोक लगा देनी चाहिए।

12 फरवरी 1957 को 'इंडियन एक्स्प्रेस'में प्रकाशित एक समाचार में कहा गया था कि कुछ उच्च कांग्रेसी नेताओं ने विरोधी दलों पर यह आरोप लगाया कि वे विदेशों से आर्थिक सहायता पा रहे हैं। दूसरी ओर विरोधी दलों के नेताओं का यह आरोप था कि कांग्रेस को पूंजीवादी खूब धन दे रहे हैं।

कांग्रेस :
वस्तुतः 1857 की क्रांति की विफलता के बाद उसमे सक्रिय भाग ले चुके स्वामी दयानन्द सरस्वती ने 1875 में 'आर्यसमाज' की स्थापना जनता को संगठित कर स्वतन्त्रता प्राप्ति के उद्देश्य से की थी और उसकी प्रारम्भिक  शाखाएँ ब्रिटिश छावनी वाले  शहरों में ही खोली थीं।ब्रिटिश सरकार ने उनको Revolutionary Saint की संज्ञा दी थी और उनके प्रभाव को क्षीण करने हेतु रिटायर्ड ICS एलेन  आक्टावियन (AO) हयूम का प्रयोग लार्ड डफरिन ने इंडियन नेशनल कान्फरेंस के नेता सुरेन्द्र नाथ बनर्जी को मिला कर एक सेफ़्टी वाल्व संस्था 'इंडियन नेशनल कांग्रेस' की स्थापना WC(वोमेश चंद्र) बनर्जी की अध्यक्षता में करवाई थी।इसके शुरुआती नेता कहते थे-'हम नस-नस में राजभक्त हैं।'ये लोग मामूली सुविधाओं की ही मांग सरकार से करते थे। 

स्वामी दयानन्द सरस्वती के निर्देश पर आर्यसमाजी लोग इस कांग्रेस में प्रवेश कर गए जिनके प्रभाव से 1906 में कांग्रेस के कुछ नेता 'स्वराज्य' की मांग उठाने लगे। आगे जाकर गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन में आर्यसमाजियों ने बढ़ -चढ़ कर भाग लिया। ' कांग्रेस का इतिहास' के लेखक  डॉ पट्टाभि सीतारमइय्या ने लिखा है कि आज़ादी के आंदोलन में जेल जाने वाले सत्याग्रहियों में 85 प्रतिशत आर्यसमाजी थे। 

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद कांग्रेस 

1948 में 'सहकारी कामनवेल्थ' (Co-operative Commonwealth)का ध्येय अपनाया जिसे 1955 के अवदी अधिवेशन द्वारा 'समाजवादी ढंग के समाज'(Socialist Pattern of society) के लक्ष्य में परिवर्तित किया गया एवं जनवरी 1964 में 'लोकतान्त्रिक समाजवाद '(Democratic Socialism) का ध्येय अपनाया गया। 

नेहरू जी के बाद पूंजीवादी तबका निंरकुश होने लगा और कांग्रेस को ठेठ दक्षिण-पंथ की ओर धकेलने लगा अतः 1969 में राष्ट्रपति चुनाव की आड़ में 'कांग्रेस संगठन'(Congres-O) एवं 'सत्ता कांग्रेस' (Congres-R) के रूप में इसमें विभाजन हो गया। सत्ता कांग्रेस बाद में 'कांग्रेस- आई' अर्थात इन्दिरा कांग्रेस के रूप में जानी गई और संगठन कांग्रेस (जो कि मूल कांग्रेस थी ) का विलय 1977 में जनता पार्टी में हो गया । इस प्रकार स्वाधीनता आंदोलन वाली कांग्रेस का अब 'अस्तित्व' ही नहीं है और सोनिया जी की अध्यक्षता वाली कांग्रेस वस्तुतः 'कांग्रेस -आई' है। 

साम्यवादी दल : 

मूलतः 1924 में इस दल की नींव विदेश में रखी गई तथा दिसंबर 1925 में कानपुर में विधिवत स्थापना हुई। कांग्रेस में शामिल क्रांतिकारी आर्यसमाजी अब इस दल में प्रविष्ट हो गए एवं स्वाधीनता आंदोलन को तीव्र गति प्रदान की जाने लगी। 
(इसका विस्तृत वर्णन अगले  किसी अंक में )

समाजवादी दल :
1)-1930 में डॉ राम मनोहर लोहिया की प्रेरणा पर 'कांग्रेस समाजवादी दल'(Congres Sociolist party) की स्थापना का विचार मूल रूप से 'साम्यवादी दल' के प्रभाव को क्षीण करने हेतु आया जिसे 1934 में 'नासिक जेल' में अमल में लाया गया। डॉ लोहिया ने 'लोकतान्त्रिक समाजवाद' एवं 'सर्वाधिकारवादी साम्यवाद' के अंतर पर विशेष ज़ोर दिया। 
2)-आज़ादी के बाद आचार्य जे बी कृपलानी ने कांग्रेस से हट कर 'कृषक मजदूर प्रजा पार्टी' बना ली एवं 1952 के प्रथम आम चुनाव 'समाजवादी दल' के साथ मिल कर लड़े एवं लोकसभा के लिए कुल पड़े मतों का 10 .4 प्रतिशत प्राप्त करके 12 सांसदों को निर्वाचित करा लिया। सितंबर 1952 में दोनों दलों का विलय हो गया और इसे 'प्रजा सोशलिस्ट पार्टी '(प्रसोपा) के नाम से जाना गया। 

3)-जनवरी 1956 में हैदराबाद में डॉ लोहिया ने प्रसोपा से अलग 'समाजवादी पार्टी' की स्थापना कर ली थी। 

21 अक्तूबर 1959 को टाईम्स आफ इंडिया में बी जी वर्घीज ने लिखा था कि,'कांग्रेस और प्रसोपा को मिल कर संगठित हो जाना चाहिए जिससे 'प्रतिक्रियावादी' एवं 'साम्यवादी' तत्वों का संगठन अवश्य ही कमजोर होगा। '

4)-दिसंबर 1962 में उत्तर-प्रदेश विधानमंडल के 'समाजवादी दल' व 'प्रजा समाजवादी दल' ने मिल कर 'संयुक्त समाजवादी दल' बनाया उसके बाद राजस्थान में भी इसे दोहराया गया। 1964 में अशोक मेहता को जवाहर लाल नेहरू द्वारा 'प्रसोपा' से तोड़ लेने के बाद श्रीधर महादेव जोशी  और डॉ लोहिया ने मिल कर 'संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी' (संसोपा) का गठन किया। किन्तु कुछ ही समय बाद आचार्य कृपलानी फिर से 'प्रसोपा' के झंडे तले चले गए और इस प्रकार 'संसोपा''प्रसोपा'दो समाजवादी दल चलते रहे। 

1977 में ये सभी दल 'जनता पार्टी' में विलय कर समाप्त हो गए थे। 

समाजवादी जनता पार्टी : 

जनता पार्टी से अलग होकर पूर्व पी एम चंद्रशेखर ने 'सजपा'  का गठन कर लिया था जिसके उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव द्वारा अपने चचेरे भाई राम गोपाल सिंह यादव को राज्यसभा के लिए उनसे पूछे बगैर टिकट देने से वह रुष्ट हो गए थे। 
समाजवादी पार्टी : 
मुलायम सिंह ने अलग 'समाजवादी पार्टी' (सपा) का गठन कर लिया और कई बार उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई अब भी उनके पुत्र अखिलेश सपा की ओर से मुख्यमंत्री हैं। 
चंद्रशेखर जी के पुत्र नीरज शेखर ने अब 'सजपा' का विलय 'सपा' में कर लिया है। 
यह समाजवादी पार्टी सिर्फ एक उद्देश्य 'साम्यवादी दल' को क्षति पहुंचाने के मामले में 1930 वाली CSP के नक्शे-कदम चल रही है बाकी के डॉ लोहिया के उद्देश्य नाम लेने मात्र के लिए प्रयुक्त होते हैं।

स्वतंत्र पार्टी : 

अगस्त 1959 में स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ,के एम मुंशी,प्रोफेसर एन जी रंगा,मीनू मसानी और पीलू मोदी आदि द्वारा इस दल की स्थापना बड़े जमींदारों,पूँजीपतियों के हितार्थ की गई थी। 1977 में इस दल का  विलय जनता पार्टी में होने पर यह समाप्त हो गया है।


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Saturday, September 14, 2013

Revolt of the people ......... can only usher in a blooming future---Gurudas Dasgupta




It is sad day for the nation Mr. Narendra Modi has been nominated as the candidate of BJP for the post of Prime Minister. A man who had played on communal passions that led to unprecedented killings, loot and destruction of Gujarat, a man who always speaks on fundamentalism, who is close to the corporate world and has no eye for the distress of the masses has been set up. I have great faith in the wisdom of the Indian electorate who surely will not hand over the rein of the country to a man having such blemished black track record. While saying so it is also imperative to note that the UPA government and the Prime Minister and the would-be Prime Minister as has been talked about are totally non performing, corrupt and anti-people. India is in a crossfire. the country must find out a different social and political combination which will not only be secular but must be free from corruption and performance based to bring relief to the distressed humanities of the country suffering from inflation, unemployment, poverty and destitution. The shadow of corporate giants over Indian political life must be ended. However long may be the destination, it is only working for such a perspective that the country can get rid of such a non-performing governance and highly tainted fundamentalist political forces. it is the revolt of the people against these two principal political forces that can only usher in a blooming future.

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Wednesday, August 21, 2013

आज जब देश कम्युनिस्टो की ओर आशा भरी नजर से देख रहा है ,ये पीठ करके खड़े हो रहे हैं--रईस अहमद सिद्दीकी

  -कम्युनिस्ट आंदोलन -विफल क्यों?---मनीषा पांडे
Manisha Pandey's status.

एक पुरानी एफबी पोस्‍ट, जो अचानक रेलेवेंट हो उठी है -

21 साल की उम्र में जब मैंने पहली बार इलाहाबाद छोड़ा, तो शहर के क्रांतिकारियों ने मुझे एक तमगे से नवाजा था - कॅरियरिस्ट । मनीषा अपना कॅरियर बनाने जा रही है। बेशक, मैं अपनी जिंदगी, अपना कॅरियर बनाने ही जा रही थी। और क्यों न बनाऊं कॅरियर। मैं आपकी पार्टी मीटिंगों और कार्यक्रमों में जाती थी, इसका मतलब ये नहीं कि अपना पूरा जीवन समर्पित करने के मूड में थी। और आखिर वो कौन लोग थे और क्यों उन्हेंी मेरे कॅरियर बनाने से तकलीफ हो रही थी। व्हाेय।
जो लोग इस सुगंधित मुगालते में हैं कि पार्टी के भीतर सब सुंदर और आदर्श दुनिया होती है तो या तो वो अज्ञानी हैं या महामूर्ख।
जैसे समाज में गरीबों की और औरतों की कोई औकात नहीं होती, वो सबसे ज्या दा लात खाए हुए होते हैं, वही क्ला स और जेंडर गैप पार्टी के भीतर भी है। जैसे मेरे घर में खाना बनाने वाली औरत और मुझमें फर्क साफ नजर आता है, उसी तरह मेरे पापा की पार्टी के ऊंचे लीडरानों के बच्चोंन और मुझमें फर्क साफ नजर आता था।
बड़े होने के बाद मैंने कम से कम सौ बड़े पार्टी नेताओं से सुना कि एक बड़े मकसद के लिए अपना जीवन समर्पित कर दो। क्रांति का काम करना है तो नौकरी करने की क्याच जरूरत। मूंगफली का ठेला लगाकर भी जिया जा सकता है। पार्टी होलटाइमर बन जाओ।
पता है, इन बातों का सबसे रोचक पहलू क्याच था।
ये कहने वाले वो लोग थे जो खुद अच्छे पदों पर बैठे हुए थे। जिनके बच्चेग प्रेस की हुई यूनीफॉर्म पहनकर शहर के महंगे अंग्रेजी स्कू लों में पढ़ने जाते थे। जो बड़े होकर फोटोग्राफी का कोर्स करने पेरिस गए। जो अमेरिका से ऊंची डिग्रियां लेकर लौटे। जिन्हों ने कैंब्रिज और हार्वर्ड में पढ़ाई की। जिनके बच्चोंि के लिए पार्टी का काम सिर्फ एक फैशन की तरह था। कभी-कभी आ जाया करते थे।
पार्टी की कमान भी कौन संभालता था। जिसके गांव में 200 बीघा जमीन है, जिसे रोटी जुगाड़ने का टेंशन नहीं, जिसका परिवार से मजे से चल रहा है, वो पार्टी में डिसिजन मेकर बना हुआ है। और गरीब होलटाइमरों के बच्चों को ज्ञान दे रहा है कि होलटाइमर बन जाओ।
मेरे होलटाइमर न बनने की दो वजहें थीं। एक तो मैं गरीब थी, दूसरे लड़की थी। पार्टी के अंदर भी मुझे दोनों तरफ से जूते पड़ते। एंड आय एम सॉरी, मैं जूते खाने के लिए नहीं पैदा हुई।
यकीन मानिए, होलटाइमरी और समर्पण का सारा ज्ञान पार्टी वाले मामूली घरों के लाचार बच्चों को ही देते हैं। जिनकी उम्र निकल गई इसी आदर्श के चक्कलर में।
जब से दिल्ली आई हूं, पापा कई बार पूछ चुके हैं, "तुम प्रकाश करात से मिली।"
मैं कहती हूं, "नहीं। आय एम नॉट इंटरेस्‍टेड। आय एम नॉट इंटरेस्टेपड इन पार्टीवालाजएट
ऑल।"

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03-08-2013 

कुछ लोग जवानी के जोश में ईमानदारी, प्रगतिशीलता,धर्मनिरपेक्षता और कम्युनिज्म की बातें करते हैं .उम्र ढलने पर दकियानूसी बातें करने लगते है और घोर प्रतिक्रियावादी हो जाते हैं .मैं समझता हूँ वे कभी क्रान्तिकारी थे ही नहीं.ऐसे लोगो की हमारे देश में कमी नहीं है ,हाँ एक बात और अपनी जवानी के दिनों में इन्होंने धर्म और मज़हब की इतनी बुराई की ,,कि लोगो को लगा कि कम्युनिज्म का मतलब धर्म को डंडा मारो है और लोग कम्युनिज्म से दूर हो गये.कल भी ऐसे लोगो की कमी नहीं थी और आज भी भरमार है.
चीन में महज एक करोड़ डालर की रिश्वत लेने वाले रेल मंत्री को मौत की सजा सुनाई है|आप कहते है कि चीन ने तरक्की की है,क्या खाक तरक्की की है,तरक्की तो हमारे देश ने की है जहाँ एक अदना सा अस्पताल का कर्मचारी या फिर किसी कार्यालय का चपरासी हजारों करोड़ की चपत लगाने की क्षमता रखता है,मंत्री के तो कहने की क्या.मंत्री तो हमारे देश के है जो हजारों हजार करोड़ डकार जाते है और सांस भी नहीं लेते .शान से रहते है कोई उँगली उठाने की भी हिम्मत नहीं कर सकता.लानत है ऐसे विकास पर कि रेल मंत्री महज एक करोड़ की रिश्वत ले और मौत की सजा पाये.


  • Rajesh Tyagi लाल झंडे की आड़ में चीन ने एक ऐसे सैनिक पूंजीवाद की रचना कर ली है, जो भारत या अमेरिका के पूंजीपतियों के बस की बात नहीं है. यह लौह-राज्य मजदूरों किसानो के उस भयंकर दमन पर आधारित है जिसकी परिणति हम तिएनान्मेन चौक पर देख चुके हैं. मंत्री को सजा किसी जनपक्षीय उद्देश्य से नहीं, बल्कि पूंजीवाद के नियमों का उल्लंघन करने के लिए, चीनी लौह-पूंजीवाद की सुरक्षा के लिए दी गई है...
कांग्रेस तो देश की आजादी के लिये लड़ने वालों का एक समूह था ,जिसमें तमाम विचारधाराऑ के लोग शामिल थे.आजादी के बाद देश की सबसे बड़ी और अनुशासित राजनैतिक पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी थी ,फिर चूक कहाँ हुई कि कम्युनिस्ट आन्दोलन कमज़ोर हुआ.
 

Kalpesh Dobariya ये ज़रूरी मुद्दा उठाया है आपने , Rais जी , ये लोग धर्म को लेकर कुछ ज़्यादा ही हाइपर रहते है , और मूल शत्रु पूंजीवाद पर इनका ध्यान कभिकभार ही जाता है , फ़ेसबुक पे भी ये देख सकते है हम , भारत जैसे धर्मभीरू देश मे इन्ही लोगो की बदौलत मार्क्सवाद बदनाम है , बेशक ये क्रिया क्रांतिविरोधी है....आप Vijai RajBali Mathur का ब्लॉग क्रानतीस्वर देखिए , इस विषय पर उन्होने बहूत अच्छे लेख लिखे है
 
  • Rupesh Kumar Singh CPI ne 1947 ke bad se hi ek awsarwadi politics ka parichay diya aur congress se aar par ki larai kabhi nahi kiya ....telangana movement ko fail karne me CPI netaon ki bhi ek bari bhumika rahi....

  • Rais Ahmad Siddiqui सही फरमाया रूपेश सिंह जी आपने,काश उस वक्त कांग्रेस से आर पार की लड़ाई लड़ी होती तो आज देश की तस्वीर एकदम अलग होती|
  • Rupesh Kumar Singh Rais Ahmad Siddiqui ji, aaj bhi mukhydhara ki communist partiyon ne in sabse sabak nahi sikha hai, aaj bhi congress ke pichhe chalne ko utaru rahte hain.....inhi karano se ab logon ko communist party se vishwash uthta ja raha hai .....

  • Rais Ahmad Siddiqui रूपेश सिंह जी इन पार्टियों के अन्दर जो बुर्जुआ लोग घुसे बैठे है,वे आन्दोलन की धार कुंद कर रहे है .पार्टी कैडर आज भी ईमानदार है और किसी भी तरह के समझौते के खिलाफ है,आखिर कब तक साम्प्रदायिक पार्टियों के डर से कांग्रेस का साथ देंगे ये ,और कांग्रेस क्या कम साम्प्रदायिकता फैलाती है|
  • Rupesh Kumar Singh Rais Ahmad Siddiqui ji, in CPI-CPI(M) se ab india ke communist aandolan ko ummid bhi nahi rakhna chahiye, hame ek naya vikalp dena hoga....jan sangharsh- jan vikalp !

  • Rais Ahmad Siddiqui बिल्कुल सही फरमाया आपने,अगर कम्युनिस्ट आन्दोलन को इनके भरोसे छोड़ा गया तो और एक शताब्दी बीत जायेगी.आज जब देश कम्युनिस्टो की ओर आशा भरी नजर से देख रहा है ,ये पीठ करके खड़े हो रहे हैं|
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उपरोक्त फेसबुक स्टेटस यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि आज भी कम्युनिस्ट पार्टियां और वामपंथ जनता की नब्ज को पहचान कर चलने को तैयार नहीं हैं ,केवल कोरे 'नास्तिकवाद' के सहारे जनता को अपने पक्ष  में खड़ा नहीं किया जा सकता और जन-समर्थन के बगैर संसद में बहुमत कैसे हासिल किया जा सकता है। रूस में रक्तरंजित क्रान्ति के बाद स्थापित साम्यवादी शासन इसीलिए उखड़ गया कि वह 'धर्म' के विरुद्ध था। यह समझने की नितांत ज़रूरत है कि पोंगापंथ-ढोंग-पाखंड-आडंबर धर्म नहीं हैं। धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा -वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य है। इसे ठुकरा कर आप 'साम्यवाद' नहीं स्थापित कर सकते। रूस में इसका पालन न होने के कारण ही साम्यवाद उखड़ा है। तो भारत में बेवजह की ज़िद्द क्यों?---विजय राजबली माथुर
 






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Sunday, August 11, 2013

स्वतन्त्रता आंदोलन मे युवा/छात्रों का योगदान(पुनर्प्रकाशन)---विजय राजबली माथुर


(Shaheed Smarak-Patna)
 1922 ई .मे गांधी जी द्वारा चौरी-चौरा कांड के नाम पर असहयोग आंदोलन वापिस लेने पर युवा/छात्र क्रान्ति की ओर मुड़े । क्रांतिकारी आंदोलन को चलाने और बम आदि बनाने हेतु काफी धन की आवश्यकता थी। अतः राम प्रसाद 'बिस्मिल'/चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व मे क्रांतिकारियों ने सरकारी खजाना कब्जे मे लेने की योजना बनाई। 09 अगस्त 1925 की रात्रि लखनऊ के 'काकोरी'रेलवे स्टेशन पर पेसेंजर गाड़ी के गार्ड से खजाने को हस्तगत किया गया। आज इस घटना को हुये 88 वर्ष पूर्ण हो गए हैं।
इस क्रांतिकारी घटना मे भाग लेने वाले स्वातंत्र्य योद्धाओं मे राम प्रसाद 'बिस्मिल',अशफाक़ उल्ला खान ,रोशन सिंह तथा राजेन्द्र सिंह लाहिड़ी को 17 एवं 19 दिसंबर 1927 को ब्रिटिश सरकार ने फांसी दे दी। बिस्मिल उस समय शाहजहाँपुर के मिशन स्कूल मे नौवी कक्षा के छात्र थे। वह पढ़ाई कम और आंदोलनों मे अधिक भाग लेते थे। गोरा ईसाई हेड मास्टर भी उनका बचाव करता था। एक बार जब वह कक्षा मे थे तो ब्रिटिश पुलिस उन्हें पकड़ने पहुँच गई। उस हेड मास्टर ने पुलिस को उलझा कर कक्षा अध्यापक से राम प्रसाद''बिस्मिल' को रेजिस्टर  मे गैर-हाजिर करवाया और भागने का संदेश दिया। बिस्मिल दूसरी मंजिल से खिड़की के सहारे कूद कर भाग गए और पुलिस चेकिंग करके बैरंग लौट गई। लेकिन खजाना कांड मे फांसी की सजा ने हमारा यह होनहार क्रांतिकारी छीन लिया। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क मे पुलिस से घिरने पर चंद्रशेखर 'आजाद'ने भी खुद कोअपनी ही पिस्तौल की गोली से  शहीद कर लिया। 

 होनहार युवा/छात्रों ने आजादी की मशाल को थामे रखा जब 08 अगस्त 1942 को गांधी जी के आह्वान पर 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' का प्रस्ताव पास किया गया था। लगभग सभी बड़े नेता ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए थे। इस दशा मे सम्पूर्ण आंदोलन युवाओं और छात्रों द्वारा संचालित किया गया था। 11 अगस्त 1942 को पटना सचिवालय से यूनियन जेक को उतार कर तिरंगा छात्रों ने फहरा दिया था किन्तु सभी सातों छात्र ब्रिटिश पुलिस की गोलियों से शहीद हो गए थे। उनकी स्मृति मे वहाँ उनकी प्रतिमाएँ स्थापित की गई हैं। इस अभियान का नेतृत्व राजेन्द्र सिंह जी ने किया था और सबसे आगे उन्हीं की मूर्ती है। इस अभियान के संबंध मे श्री अजय प्रकाश ने एक लेख  लिखा था जो 18 जनवरी 1987 को प्रकाशित -'पटना हाईस्कूल भूतपूर्व छात्र संघ' की 'स्मारिका' मे छ्पा था ,आप भी उसकी स्कैन कापी देख सकते हैं-
(बड़े अक्षरों मे पढ़ने हेतु डबल क्लिक करें) 


उसी स्मारिका मे छपा यह लेख आज भी छात्रों/युवाओं के महत्व को रेखांकित करता है-

'लोकसंघर्ष' मे प्रकाशित महेश राठी साहब के एक महत्वपूर्ण लेख द्वारा बताया गया है कि,"आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन का बेहद गौरवमयी और प्रेरणापरद हिस्सा है। ए .आई .एस .एफ .भारतीय स्वाधीनता संग्राम का वह भाग है जिसके माध्यम से देश के छात्र समुदाय ने आजादी की लड़ाई मे अपने संघर्षों और योगदान की अविस्मरणीय कथा लिखी"। 


राठी साहब ने बताया है कि,भारतीय छात्र आंदोलन का संगठित रूप 1828 मे सबसे पहले कलकत्ता मे 'एकेडेमिक एसोसिएशन'के नाम से दिखाई दिया जिसकी स्थापना एक पुर्तगाली छात्र विवियन डेरोजियो द्वारा की गई । 1840 से 1860 के मध्य 'यंग बंगाल मूवमेंट'के रूप मे दूसरा संगठित प्रयास हुआ। 1848 मे दादा भाई नौरोजी की पहल पर मुंबई मे 'स्टूडेंट्स लिटरेरी और सायींटिफ़िक सोसाइटी '
की स्थापना हुयी। कलकत्ता के आनंद मोहन बॉस और सुरेन्द्र नाथ बनर्जी द्वारा 1876 मे 'स्टूडेंट्स एसोसिएशन'की स्थापना हुयी जिसने 1885 मे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना मे महती भूमिका अदा की। 16 अक्तूबर 1905 मे बंगाल विभाजन के बाद छात्रों एवं युवाओं ने जबर्दस्त आंदोलन चलाया जिसमे आम जनता का भी सहयोग रहा।


1906 मे राजेन्द्र प्रसाद जी (जो पहले राष्ट्रपति बने थे) की पहल पर 'बिहारी स्टूडेंट्स सेंट्रल एसोसिएशन'की स्थापना हुयी जिसने बनारस से कलकत्ता तक अपनी शाखाएँ खोली और 1908 मे बिहार मे इसी संगठन के बल पर कांग्रेस की स्थापना हुयी। श्रीमती एनी बेसेंट ने 1908 मे 'सेंट्रल हिन्दू कालेज'नामक पत्रिका मे एक अखिल भारतीय छात्र संगठन बनाने का विचार प्रस्तुत किया।


25-12-1920 को नागपूर मे आल इंडिया कालेज स्टूडेंट्स कान्फरेंस का आरंभ हुआ जिसकी स्वागत समिति के अध्यक्ष आर .जे .गोखले थे। इसका उदघाटन लाला लाजपत राय ने किया था। 1920 से 1935 तक देश मे बड़े स्तर पर विद्यालयों  और महा विद्यालयों की स्थापना हुयी। आजादी के संघर्ष मे छात्रों की महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई दे रही थी।


26 मार्च 1931 को कराची मे जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता मे एक अखिल भारतीय छात्र सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसमे देश भर से 700 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। 23 जनवरी 1936 को यू .पी .विश्वविद्यालय छात्र फेडरेशन ने अपनी कार्यकारिणी मे अखिल भारतीय छात्र सम्मेलन बुलाने का निर्णय लिया। पी .एन .भार्गव की अध्यक्षता मे एक स्वागत समिति का गठन किया गया जिसने देश के सभी छात्र संगठनों तथा कांग्रेस,सोशलिस्ट पार्टी और भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी सहित सभी राजनीतिक धड़ों से संपर्क बनाया।


12-13 अगस्त 1936 को लखनऊ मे -सर गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल मे A I S F का स्थापना सम्मेलन सम्पन्न हुआ जिसमे 936 प्रतिनिधियों ने भाग लिया जिसमे से 200 स्थानीय और शेष 11 प्रांतीय संगठनों के प्रतिनिधि थे। सम्मेलन मे महात्मा गांधी,रवीन्द्रनाथ टैगोर,सर तेज बहादुर सप्रू और श्री निवास शास्त्री सरीखे गणमान्य व्यक्तियों के बधाई संदेश भी प्राप्त हुये। सम्मेलन का उदघाटन जवाहर लाल नेहरू ने किया।


A I S F के स्थापना सम्मेलन मे पी .एन .भार्गव पहले महा सचिव निर्वाचित हुये । 'स्टूडेंट्स ट्रिब्यून'इसका पहला आधिकारिक मुख पत्र था। 22-11-1936 को लाहौर मे दूसरा सम्मेलन हुआ जिसकी अध्यक्षता शरत चंद बॉस ने की और उसमे 150 लोगों ने भाग लिया। इसमे छात्रों का एक मांग पत्र भी तैयार हुआ।



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Thursday, August 8, 2013

ममता बनर्जी की आसान डगर ---विजय राजबली माथुर

हिंदुस्तान,लखनऊ  -31 जुलाई -पेज 16


शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2012

ममता बनर्जी के प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं ? http://krantiswar.blogspot.in/2012/10/blog-post_19.html

पुराने अखबारों का अवलोकन करते समय सुश्री ममता बनर्जी की यह जन्मपत्री दिखाई दे गई जिसमे सन 2002 तक का उनका भविष्य लेखक ने अपनी थ्यौरी से दिया था। उसके सही-गलत होने की विवेचना मैं नहीं कर रहा हूँ। मैंने विगत विधानसभा चुनावों से पूर्व अपने एक लेख द्वारा ममता जी की कटु राजनीतिक आलोचना भी की थी और पश्चिम बंगाल की जनता से आह्वान भी किया था कि वह ममता जी को सत्तारूढ़ न होने दे। परंतु ममता जी मुख्यमंत्री बनी और बड़ी शान से बनीं। इसलिए भी कौतूहल था उनका भविष्य जानने का और इसलिए भी कि दार्जिलिंग ज़िले के सिलीगुड़ी मे 8वी कक्षा से 10वी बोर्ड की परीक्षा पास करने तक रहने के कारण बंगाल की राजनीति मे दिलचस्पी सदा ही रही है। वहाँ से 10-15 किलोमीटर दूर ही है नक्सल बाड़ी जहां 1967 मे 'नक्सल बाड़ी से नल बाड़ी तक' आंदोलन हमारे रहते ही शुरू हुआ था। इस आंदोलन का सम्पूर्ण लाभ राजस्थान के मारवाड़ियों को हुआ था जिनको इंश्योरेंस क्लेम नुकसान से कहीं बहुत ज़्यादा मिला था। अपनी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर आज भी मैं ममता जी का समर्थक नहीं हूँ,परंतु उनके ग्रह-नक्षत्र जो बोल रहे हैं उनको झुठलाया भी तो नहीं जा सकता। misuse of knowledge भी मैं नहीं कर सकता। अतः ममता जी की कुंडली का वैज्ञानिक निष्पक्ष  विश्लेषण प्रस्तुत करने मे कोई पूर्वाग्रह(IBN7 के प्रतिनिधि ब्लागर एवं उनकी  सहयोगी पूना प्रवासी ब्लागर की भांति जो ज्योतिष को मीठा जहर कहते हैं ) भी नहीं है। 

ममता जी की प्रस्तुत जन्मपत्री के अनुसार उनका जन्म लग्न-मकर है और---

द्वितीय भाव मे कुम्भ का 'मंगल'

पंचम भाव मे वृष का 'चंद्रमा'

षष्ठम भाव मे मिथुन का 'केतू'

सप्तम भाव मे कर्क का 'ब्रहस्पति'

दशम भाव मे तुला का 'शनि'

एकादश भाव मे वृश्चिक का 'शुक्र'

द्वादश भाव मे धनु के 'सूर्य','बुध' और 'राहू'

अखबारी विश्लेषण से अलग मेरा विश्लेषण यह है कि जन्म के बाद ममता जी की 'चंद्र महादशा' 07 वर्ष 08 आठ माह एवं 07 दिन शेष बची थी। इसके अनुसार 03 जूलाई 2010 से वह 'शनि'महादशांतर्गत 'शुक्र' की अंतर्दशा मे 03 सितंबर 2013 तक चलेंगी। यह उनका श्रेष्ठत्तम समय है। इसी मे वह मुख्य मंत्री बनी हैं। 34 वर्ष के मजबूत बामपंथी शासन को उखाड़ने मे वह सफल रही हैं तो यह उनके अपने ग्रह-नक्षत्रों का ही स्पष्ट प्रभाव है। 

इसके बाद पुनः 'सूर्य' की शनि मे  अंतर्दशा 15 अगस्त 2014 तक  उनके लिए अनुकूल रहने वाली है और लोकसभा के चुनाव इसी अवधि के  मध्य होंगे। केंद्र (दशम भाव मे )'शनि' उनको 'शश योग' प्रदान कर रहा है   
जो 'राज योग' है।

ममता जी को समयानुकूल सही बात कहने व उठाने का विलक्षण लाभ भी   उनके ग्रह प्रदान कर रहे हैं और इसी लिए FDI को मुद्दा बना कर उन्होने 'संप्रग-2' से अलगाव कर लिया है। उससे पूर्व राष्ट्रपति चुनावों के दौरान  प्रकट मे मुखर्जी साहब का विरोध करके उनको बामपंथियों के एक गुट -CPM का समर्थन दिला दिया फिर खुद भी उनका समर्थन कर दिया। मुखर्जी साहब ने मुलायम सिंह जी व ममता जी को वेंकट रमन साहब सरीखा आश्वासन दे रखा है जिसके अनुसार कांग्रेस का स्पष्ट बहुमत न आने पर वह 'तीसरे मोर्चे' को अवसर देंगे।देखें---


शनिवार, 28 जुलाई 2012


नए महामहिम ---केंद्र मे गैर कांग्रेस/भाजपा सरकार का रास्ता साफ

महामहिम प्रणब मुखर्जी साहब की शपथ कुंडली का विश्लेषण भी। 

http://krantiswar.blogspot.in/2012/07/blog-post_28.html 




ममता जी की कुंडली मे 'बुध-आदित्य'योग भी है वह भी 'राज योग' है। षष्ठम भाव का 'केतू' उनके शत्रुओं का संहार करने मे सक्षम है। सप्तम मे उच्च के 'ब्रहस्पति' ने जहां उनको अविवाहित रखा वहीं वह उनकी लग्न को पूर्ण दृष्टि से देखने के कारण 'बुद्धि चातुर्य'प्रदान करते हुये सफलता कारक है। जहां दशम मे उच्च का शनि उनको राजनीति मे सफलता प्रदान कर रहा है वहीं यही शनि पूर्ण दृष्टि से उनके सुख भाव को देखने के कारण सुख मे क्षीणता प्रदान कर रहा है। द्वितीय भाव मे शनि क्षेत्रीय 'मंगल' होने के कारण ही उनकी बात का प्रभाव उनके विरोधियों के लिए 'आग' का काम करता है जबकि यही जनता को उनके पक्ष मे खड़ा कर देता है। 

ममता जी की जन्म कुंडली के मुताबिक उनको निम्न-लिखित पदार्थों का 'दान भूल कर भी नहीं' करना चाहिए। इंनका दान करने पर उनको हानि व पीड़ा ही मिलेगी --

1-  चांदी,मोती,चावल,दही,दूध,घी,शंख,मिश्री,चीनी,कपूर,बांस की बनी चीजें जैसे टोकरी-टोकरा,सफ़ेद स्फटिक,सफ़ेद चन्दन,सफ़ेद वस्त्र,सफ़ेद फूल,मछली आदि।
2-सोना,पुखराज,शहद,चीनी,घी,हल्दी,चने की दाल,धार्मिक पुस्तकें,केसर,नमक,पीला चावल,पीतल और इससे बने बर्तन,पीले वस्त्र,पीले फूल,मोहर-पीतल की,भूमि,छाता आदि। कूवारी कन्याओं को भोजन न कराएं और वृद्ध-जन की सेवा न करें (जिनसे कोई रक्त संबंध न हो उनकी )।किसी भी मंदिर मे और मंदिर के पुजारी को दान नहीं देना चाहिए।


3-सोना,नीलम,उड़द,तिल,सभी प्रकार के तेल विशेष रूप से सरसों का तेल,भैंस,लोहा और स्टील तथा इनसे बने पदार्थ,चमड़ा और इनसे बने पदार्थ जैसे पर्स,चप्पल-जूते,बेल्ट,काली गाय,कुलथी, कंबल,अंडा,मांस,शराब आदि।

अगले माह ममता जी यू पी मे अपनी रैली करने जा रही हैं *और संभावना है कि वह इंदिराजी जैसा आक्रामक रुख अख़्तियार करके जनता को (खास कर जो पहले कांग्रेस समर्थक रही है)  अपने पक्ष मे मोड ले जाएंगी इसका भी लाभ तीसरे मोर्चे को ही मिलेगा क्योंकि मंहगाई से त्रस्त जो जनता कांग्रेस छोड़ कर भाजपा की ओर मुड़ती उसे ममता जी अपने साथ कर लेंगी। चुनाव बाद तीसरे मोर्चे की सरकार बनने की दशा मे मुलायम सिंह जी व ममता जी मे जिनके ग्रह-नक्षत्र प्रबल होंगे वही अगले प्रधानमंत्री होंगे। फिलहाल ममता जी की कुंडली मे राज योग और उनके अनुकूल समय को देखते हुये उनके प्रधानमंत्री बनने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता है। ज्योतिष को मीठा जहर बताने वाले IBN7 के कार्पोरेटी दलाल अवश्य ही ममता जी को पी एम बनने से रोकने की गंभीर साजिश करेंगे ,अब देखना है कि वे अपने मीठे जहर का प्रयोग कितना और कैसे करते हैं?



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* परंतु मुलायम सिंह जी ने पश्चिम बंगाल के पूर्व मंत्री किरमय नंदा जी के द्वारा ममता जी को रैली रद्द करने पर राजी कर लिया था और वह रैली न हो सकी। इधर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के निर्णयों के कारण उनकी पार्टी का जन-समर्थन निरंतर ह्रासवान है जबकि पूर्व में दिये गए विश्लेषण के अनुसार ममता जी को जनता का भरपूर समर्थन आज भी प्राप्त है। आज भी वा-पंथ ममता जी को समर्थन देने की बजाए मुलायम सिंह जी के प्रति झुकाव रखता दीख रहा है। इस प्रकार वाम-पंथ जनता का समर्थन एक बार फिर प्राप्त करने से वंचित हो जाएगा। ममता जी के अनुकूल ग्रह उनका मार्ग सुगम कर देंगे। चूंकि ममता जी उत्तर प्रदेश की जनता से संपर्क बनाने से वंचित कर दी गई हैं तो उसका सीधा-सीधा लाभ सोनिया जी की कांग्रेस को मिल जाएगा और वह भी परिस्थितियों के अनुरूप ममता जी का समर्थन करने पर विवश हो सकती है।

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