आज जब तिरंगा आसमान में लहराता है, तो उसके साथ कुछ पंक्तियां अपने आप दिल में गूंजने लगती हैं—“विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा।” यह सिर्फ एक देशभक्ति गीत नहीं है। इसके पीछे स्वतंत्रता आंदोलन की वह कहानी छिपी है, जब भारत गुलाम था और देशभक्ति केवल भावना नहीं, बल्कि एक संघर्ष थी। इस गीत को शब्द देने वाले कवि थे श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’। उनका नाम शायद आज की पीढ़ी में उतना चर्चित न हो, लेकिन उनके लिखे शब्द स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय स्मृति का हिस्सा बन चुके हैं। शिक्षक रहे श्यामलाल गुप्त ने कविता को मनोरंजन का माध्यम नहीं माना। उनके लिए शब्द जनता में साहस जगाने और देश के लिए एकजुट करने का माध्यम थे। यही वजह है कि उनके लिखे गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में लोगों के बीच एक अलग ऊर्जा पैदा की।
एक व्यापारी परिवार का बेटा, जिसने कारोबार छोड़कर किताब और आंदोलन का रास्ता चुना
श्यामलाल गुप्त का जन्म 9 सितंबर 1896 को कानपुर के नरवल में हुआ था। उनके पिता विशेष्वर प्रसाद और माता कौशल्या देवी थीं। परिवार का संबंध दोसार वैश्य समुदाय से था और पारिवारिक व्यवसाय भी उनके सामने मौजूद था। लेकिन श्यामलाल का मन व्यापार में नहीं लगा। उन्होंने परिवार के पारंपरिक व्यवसाय में जाने के बजाय शिक्षा को अपना पेशा बनाया। कानपुर के अलग-अलग सरकारी स्कूलों में शिक्षक के रूप में काम करते हुए उनका जुड़ाव धीरे-धीरे स्वतंत्रता आंदोलन से गहरा होता गया। उस दौर में स्कूल की नौकरी और राजनीतिक गतिविधियों को साथ लेकर चलना आसान नहीं था। ब्रिटिश शासन की निगाहें उन लोगों पर रहती थीं, जो लोगों में राष्ट्रीय चेतना पैदा कर रहे थे। फिर भी श्यामलाल पीछे नहीं हटे। उनके लिए अध्यापन केवल नौकरी नहीं था। वह समाज और देश के भविष्य को तैयार करने का माध्यम भी था।
फिर हुई गणेश शंकर विद्यार्थी से मुलाकात, जिसने जिंदगी की दिशा बदल दी
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान श्यामलाल गुप्त की मुलाकात महान पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी से हुई। यह मुलाकात उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ बनी। कांग्रेस के एक अधिवेशन के दौरान हुए इस संपर्क के बाद उन्हें फतेहपुर क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े अभियान की जिम्मेदारी मिली। अब उनकी भूमिका केवल शिक्षक की नहीं रह गई थी। वह लोगों के बीच राष्ट्रीय भावना पहुंचाने वाले कार्यकर्ता भी बन चुके थे। इसी दौर में उनकी लेखनी भी अधिक मुखर हुई। वह जानते थे कि हर व्यक्ति भाषण सुनने नहीं आएगा, लेकिन एक गीत हजारों लोगों की जुबान पर चढ़ सकता है। इसलिए उनके शब्दों में सरलता, जोश और सामूहिक भावना दिखाई देती थी। आगे चलकर यही गुण “झंडा ऊंचा रहे हमारा” को एक व्यापक जनगीत बनाने में महत्वपूर्ण साबित हुए।
1921 में गिरफ्तारी, लेकिन क्या ब्रिटिश सरकार उनके शब्दों को रोक पाई?
साल 1921 में ब्रिटिश शासन ने श्यामलाल गुप्त को गिरफ्तार कर लिया। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय लोगों के लिए जेल जाना उस समय असामान्य बात नहीं थी। गिरफ्तारी के बाद भी उनका संकल्प कमजोर नहीं हुआ। जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने गुप्त रूप से आंदोलन से जुड़ा काम जारी रखा। इसके बाद 1930 और 1944 में भी उन्हें गिरफ्तार किया गया और दोनों अवसरों पर उन्हें कारावास भुगतना पड़ा। करीब 19 वर्षों तक वह फतेहपुर जिला कांग्रेस समिति के अध्यक्ष रहे। उनके जीवन में राजनीति सत्ता पाने का माध्यम नहीं थी। वह इसे स्वतंत्रता के संघर्ष का हिस्सा मानते थे। उनकी प्रतिबद्धता का एक और उल्लेखनीय पहलू था उनका व्यक्तिगत संकल्प। स्वतंत्रता मिलने तक उन्होंने जूते और छाता इस्तेमाल न करने का व्रत रखा था। यह छोटा-सा व्यक्तिगत निर्णय उनके भीतर मौजूद त्याग और अनुशासन की भावना को दर्शाता है।
वह कविता जिसने 1924 में लिखे जाने के बाद इतिहास का रास्ता पकड़ लिया
“झंडा ऊंचा रहे हमारा” की मूल रचना मार्च 1924 में एक देशभक्ति कविता के रूप में हुई थी। इसे कानपुर की खन्ना प्रेस ने प्रकाशित किया और इसकी पांच हजार से अधिक प्रतियां बिकने की बात दर्ज है। उस समय भारत स्वतंत्र नहीं था। इसलिए तिरंगे और स्वराज की बात करना अपने आप में राजनीतिक संदेश था। इसी वर्ष भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस रचना को आधिकारिक ध्वज गीत के रूप में अपनाया। 13 अप्रैल 1924 को कानपुर के फूलबाग में जलियांवाला बाग शहीद दिवस के अवसर पर इसे पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया गया। इस कार्यक्रम में जवाहरलाल नेहरू भी उपस्थित थे। एक कविता का इस तरह स्वतंत्रता आंदोलन के सार्वजनिक मंच तक पहुंचना उसके प्रभाव का संकेत था। गीत अब केवल कागज पर लिखे शब्द नहीं रह गया था। वह आंदोलन की सामूहिक आवाज बनने लगा था।
1938 में हरिपुरा अधिवेशन, और मंच पर मौजूद थे स्वतंत्रता आंदोलन के बड़े चेहरे
गीत की यात्रा यहीं नहीं रुकी। वर्ष 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में सरोजिनी नायडू ने इस गीत को प्रस्तुत किया। उस समय महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, गोविंद बल्लभ पंत, जमनालाल बजाज, महादेव देसाई और पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े प्रमुख नेता वहां मौजूद थे। कल्पना कीजिए उस दौर का दृश्य, जब एक देश गुलामी में था और हजारों लोग स्वराज की आकांक्षा के साथ एकत्रित थे। ऐसे वातावरण में जब तिरंगे को समर्पित गीत गूंजता होगा, तो उसके शब्द केवल संगीत नहीं रह जाते होंगे। वे सामूहिक संकल्प का रूप ले लेते होंगे। यही वह दौर था जब श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ की रचना स्वतंत्रता आंदोलन की सांस्कृतिक स्मृति में और गहराई से दर्ज होती चली गई।
आजादी के बाद भी गीत की यात्रा खत्म नहीं हुई, बल्कि एक फिल्म तक पहुंची
भारत को 1947 में स्वतंत्रता मिली, लेकिन इस गीत की लोकप्रियता बनी रही। वर्ष 1948 में यह गीत हिंदी फिल्म “आजादी की राह पर” में शामिल हुआ। फिल्म का निर्देशन ललित चंद्र मेहता ने किया था और इसमें पृथ्वीराज कपूर तथा वनमाला पवार प्रमुख भूमिकाओं में थे। गीत को शेखर कल्याण ने संगीतबद्ध किया और सरोजिनी नायडू की आवाज में इसे प्रस्तुत किए जाने का उल्लेख मिलता है। यह तथ्य इस गीत की यात्रा को विशेष बनाता है। जो रचना 1924 में स्वतंत्रता आंदोलन की भावना से लिखी गई थी, वह स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों में सिनेमा के माध्यम से भी लोगों तक पहुंची। यानी कविता ने आंदोलन के मंच से लेकर साहित्य, सार्वजनिक समारोह और सिनेमा तक अपना सफर तय किया।
1952 में वही कवि, अपने ही गीत के साथ राष्ट्रीय मंच पर
स्वतंत्रता के बाद श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ को उनके गीत के लिए सार्वजनिक सम्मान भी मिला। 15 अगस्त 1952 को स्वतंत्रता दिवस समारोह में उन्हें ध्वज गीत गाने के लिए चुना गया। जिस गीत को उन्होंने वर्षों पहले गुलाम भारत के दिनों में लिखा था, उसे स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय समारोह में स्वयं प्रस्तुत करना उनके जीवन का असाधारण क्षण रहा होगा। एक कवि के लिए इससे बड़ी विडंबना और उपलब्धि क्या हो सकती है कि जिस आजादी का सपना उसने शब्दों में लिखा था, उसी आजाद देश में वह अपने गीत को तिरंगे के सामने गा रहा था। उनकी रचना अब संघर्ष की स्मृति से आगे बढ़कर स्वतंत्र भारत के सार्वजनिक समारोहों का हिस्सा बन चुकी थी।
1972 में मिला सम्मान, फिर 1973 में पद्मश्री
समय आगे बढ़ा, लेकिन देश ने श्यामलाल गुप्त के योगदान को भुलाया नहीं। 1972 के गणतंत्र दिवस समारोह में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें सम्मान पत्र प्रदान किया। इसके अगले वर्ष, 1973 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। यह सम्मान उनकी साहित्यिक और देशभक्ति से जुड़ी भूमिका की राष्ट्रीय पहचान का प्रमाण था। हालांकि उनके जीवन की सबसे बड़ी पहचान किसी पुरस्कार से नहीं बनी। उनकी पहचान उस गीत से बनी, जो दशकों बाद भी भारत के राष्ट्रीय समारोहों में सुनाई देता रहा। एक कवि की रचना का इतने लंबे समय तक जीवित रहना केवल साहित्यिक उपलब्धि नहीं है। यह इस बात का प्रमाण भी है कि कुछ शब्द समय से आगे निकल जाते हैं।
1997 में डाक टिकट पर आया नाम, लेकिन असली स्मारक आज भी वही गीत है
श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ का निधन 10 अगस्त 1977 को 81 वर्ष की आयु में हुआ। लेकिन उनकी कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। उनके निधन के लगभग दो दशक बाद, 4 मार्च 1997 को तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया। यह सम्मान उनकी राष्ट्रीय पहचान को एक और स्थायी स्मृति देता है। फिर भी उनके जीवन का सबसे बड़ा स्मारक कोई इमारत, प्रतिमा या डाक टिकट नहीं है। उनका सबसे बड़ा स्मारक वह गीत है, जिसे भारत में स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के ध्वजारोहण समारोहों में आज भी गाया जाता है। हर बार जब तिरंगा ऊपर उठता है और ये शब्द गूंजते हैं, तब एक ऐसे कवि की याद भी जीवित हो जाती है, जिसने अपने शब्दों को देश की आवाज बना दिया।
लेकिन इस गीत की सबसे बड़ी ताकत आखिर क्या थी?
गीत की पंक्तियों में तिरंगे को शक्ति, प्रेम, वीरता और मातृभूमि की भावना से जोड़ा गया है। इसमें स्वतंत्रता के संघर्ष के दौरान भय को पीछे छोड़ने का आह्वान है। इसमें स्वराज को लक्ष्य बनाने और देशवासियों को एक साथ खड़े होने की प्रेरणा मिलती है। यही सरलता इसकी सबसे बड़ी ताकत बनी। कठिन राजनीतिक विचारों को एक ऐसे गीत में बदल देना, जिसे आम लोग आसानी से याद रख सकें, अपने आप में बड़ी रचनात्मक क्षमता थी। श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ ने कविता को किताबों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने उसे जनता की आवाज बनने दिया। इसलिए “झंडा ऊंचा रहे हमारा” केवल एक गीत के रूप में नहीं देखा जाता। यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की सांस्कृतिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज भी है।
“विजयी विश्व तिरंगा प्यारा…” की गूंज में आज भी छिपी है एक पूरी पीढ़ी की कहानी
जब आज हम कहते हैं—“विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा”, तो शायद हमें उन शब्दों के पीछे खड़े व्यक्ति की पूरी कहानी याद नहीं रहती। लेकिन उन पंक्तियों में उस पीढ़ी की आकांक्षाएं दर्ज हैं, जिसने गुलामी देखी, संघर्ष किया, जेल गई और स्वतंत्रता का सपना देखा। श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ ने अपने जीवन से दिखाया कि इतिहास केवल बड़े राजनीतिक नेताओं से नहीं बनता। इतिहास उन कवियों, शिक्षकों, लेखकों और सामान्य नागरिकों से भी बनता है, जिन्होंने अपने-अपने तरीके से देश की चेतना को मजबूत किया। यही कारण है कि उनका नाम भारतीय इतिहास और देशभक्ति साहित्य में एक विशेष स्थान रखता है। Old is Gold Films ऐसे ही भूले-बिसरे चेहरों और उनकी अनसुनी कहानियों को फिर से सामने लाने का प्रयास करता है। क्योंकि कुछ कहानियां पुरानी जरूर होती हैं, लेकिन उनकी आवाज कभी पुरानी नहीं होती।
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
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