Wednesday, September 9, 2026

भारत को बर्बाद नेताओं ने नहीं, नौकरशाहों ने किया ------ राजेश आर सिंह




भारत को बर्बाद नेताओं ने नहीं, नौकरशाहों ने किया 
भारत की तबाही का असली चेहरा वो नहीं जो टीवी पर बहसों में दिखता है, असली चेहरा वो है जो फाइलों के पीछे छिपा बैठता है, फाइलों पर नोटिंग्स लिखता है, और चुने हुए जनप्रतिनिधियों के फैसलों को 'प्रक्रिया' के नाम पर रोकता है।  यह कोई संयोग नहीं कि भारत में अनपढ़, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले, या सिर्फ जाति-धर्म के नाम पर वोट पाने वाले नेताओं की भरमार है, यह 'बाई डिफाल्ट' नहीं, बल्कि 'बाई डिजाईन' है, क्योंकि नौकरशाहों का पूरा तंत्र ही इस बात पर टिका है कि पढ़े-लिखे, सक्षम, और जनता के मुद्दों पर बात करने वाले लोग राजनीति में न आएं। जब अरविंद केजरीवाल जैसे शिक्षित नेता दिल्ली में सत्ता में आए, तो उनके सामने सबसे बड़ी दीवार विधायिका या विपक्ष नहीं, बल्कि आईएएस अधिकारियों की 'फाइल वॉर' थी, जिसके चलते 2023 में सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा, और फिर भी केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर नौकरशाही को वापस पॉवर दे दी। पंजाब में भगवंत मान की सरकार ने दर्जनों आईएएस अधिकारियों को महीनों बिना पोस्टिंग के रखा, क्योंकि उन्होंने माइनिंग फाईलों पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया, यह कोई अलग अलग घटनाएं नहीं, बल्कि एक सिस्टमैटिक पैटर्न है, जहां ब्यूरोक्रेट्स चुने हुए जनप्रतिनिधियों को 'पनिस करते हैं, अगर वे उनके नियंत्रण को चैलेंज करें।  यह तंत्र औपनिवेशिक विरासत का हिस्सा है, जो कन्ट्रोल के लिए बना था, सर्विस के लिए नहीं, और आज भी यही तंत्र भारत की लोकतंत्र की रूह को खा रहा है।
1947 में आजादी मिली, लेकिन जो सिस्टम ब्रिटिशों ने बनाया था, वह कभी टूटा ही नहीं। भारतीय सिविल सेवा (ICS), जो बाद में IAS बना, उसका मकसद था 'कंट्रोल, राजस्व संग्रह, कानून एवं व्यवस्था, और साम्राज्यवादी हितों की संरक्षण। इस सिस्टम में 'सेवा' का कोई सवाल ही नहीं था, जनता तो सिर्फ 'subject' यानी प्रजा थी, 'citizen' यानी नागरिक नहीं। आजादी के बाद भी इसी सिस्टम को बरकरार रखा गया, क्योंकि नए नेताओं को लगा कि 'यही उपयुक्त व्यवस्था है'। लेकिन हकीकत यह है कि यह सिस्टम 'निपुणता' के लिए नहीं, 'इन्सुलेशन' के लिए बना था, ताकि ब्यूरोक्रेट्स किसी भी राजनैतिक दबाव से आजाद रहें, और व्यवस्था को अपनी मर्जी चलाएं। भर्ती की आयु सीमा, सामान्यवादी संवर्ग का प्रभाव, लैटरल एंट्री पर प्रतिरोध, सब कुछ इस बात को सुनिश्चित करता है कि 'बाहर से' कोई शिक्षित व्यक्ति सीधे पॉवर में न आए। जब एक आईएएस अधिकारी 22-23 साल की उम्र में परीक्षा पास करके सीधे जिला अधिकारी बन जाता है, तो उसके पास न तो जमीनी अनुभव होता है, न ही जनता की समस्याओं की समझ, लेकिन फिर भी वही अधिकारी एक चुने हुए विधायक या मंत्री को 'रूल' बताता है। यह कोई 'प्रतिभा' नहीं, बल्कि एक 'इलीट क्लब' है, जो अपने आप को संरक्षित करती है, और बाहर के लोगों को अलग करती है।
भारत में 'Transaction of Business Rules' और 'Allocation of Business Rules' ये वो कार्यकारी दस्तावेज़ हैं, जो तय करते हैं कि कौन सा फाईल किसके पास जाएगा, कौन निर्णय ले सकता है, और कौन सिर्फ 'औपचारिक प्रमुख' रहेगा। ये रूल 1950-1960 में बने थे, और आज भी वही रूल चल रहे हैं, जिनके तहत ब्यूरोक्रेट्स को इतना पॉवर मिला है कि वे कैबिनेट मंत्री को भी 'औपचारिक प्रमुख' बना सकते हैं। जब एक मंत्री कोई पॉलिसी लांच करता है, तो कार्यान्वयन ब्यूरोक्रेट्स के हाथ में होता है, और अगर वे चाहें, तो 'फाईल नोटिंग, 'प्रक्रियात्मक देरी', या 'क़ानूनी सलाह' के नाम पर उस पॉलिसी को महीनों-सालों तक रोक सकते हैं। मुंबई मैट्रो प्रोजेक्ट 10 साल से देरी से है, क्यों? ब्यूरोक्रेट्स की लालफीताशाही, कानूनी अड़चन, और समन्वय की कमी। मनरेगा, पीएम-किसान, या किसी भी कल्याणकारी योजना में लीकेज और देरी होती हैं, क्यों? नौकरशाही स्तर पर अकुशल कार्यान्वयन।  COVID-19 के दौरान ऑक्सीजन और वैक्सीन की वितरण में देरी, क्यों? नौकरशाही अक्षमता ने सक्रिय राजनीतिक पहल को भी फेल कर दिया।  यह कोई 'दुर्घटना' नहीं, बल्कि एक 'डिजाइन' है, जहां ब्यूरोक्रेट्स को इतना स्वायत्तता मिली कि वे चुने हुए जनप्रतिनिधियों को बाइपास कर सकते हैं, और जनता को कष्ट में डाल सकते हैं।
2019 में केंद्र सरकार ने 'लैटरल एंट्री' की शुरुआत की, ताकि निजी क्षेत्र, शिक्षा जगत, और सिविल सोसायटी के एक्सपर्ट को सीधे सीनियर ब्यूरोक्रेट्स के पोस्ट पर लाया जा सके। लेकिन इसका विरोध सबसे ज्यादा ब्यूरोक्रेट्स ने ही किया, क्योंकि यह उनके 'मोनोपोली' को चैलेंज करता था। IAS कैडर, जो सामान्यवादी है वे क्षेत्रीय ज्ञान को वैल्यू नहीं देते सीनियरिटी और 'नौकरशाही अनुभव' को प्राथमिकता देता है।  जब एक एक्सपर्ट, जो 20 साल से हेल्थ केयर या शिक्षा क्षेत्र में काम कर रहा हो और सीधे सेक्रेटरी लेवल पर आता है, तो वह 'पुराने समूह' को टेंशन देता है, क्योंकि वह 'रूल्स से नहीं, 'रिज़ल्ट से बात करता है। यही कारण है कि लैटरल एंट्री प्रोग्राम आज भी सीमित है, और ब्यूरोक्रेट्स का प्रतिरोध जारी है। यह सिर्फ नौकरशाही पदों तक सीमित नहीं, यह मानसिकता पूरे राजनीतिक प्रणाली में फैली हुई है। जब एक शिक्षित, पेशेवर व्यक्ति राजनीति में आता है, तो ब्यूरोक्रेट्स उसे 'आउट साइडर मानते हैं और उसे 'समायोजित' करने के लिए मजबूर करते हैं। अगर वह 'समायोजित' नहीं करता, तो उसके सामने 'फाईल वार, 'ट्रांसफर थ्रेट, या 'मीडिया लीक' की दीवार खड़ी कर दी जाती है।  यही कारण है कि भारत में आज भी 'वंशवाद की राजनीति', 'अपराधी राजनीतिज्ञों', या 'जाति-आधारित नेताओं' की भरमार है, क्योंकि वे ब्यूरोक्रेट्स के 'कंट्रोल' में रहते हैं, और उनके 'रूल्स' के हिसाब से चलते हैं।
दिल्ली में AAP सरकार के आने के बाद, सबसे बड़ा संघर्ष ब्यूरोक्रेट्स के साथ हुआ। IAS अधिकारियों ने फाईलों पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया, ट्रांसफर की मांग की, और मीडिया में लीक किए, ताकि सरकार की इमेज खराब हो।  2023 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली गवर्नमेंट को ऑफिसर के ट्रांसफर/पोस्टिंग का पॉवर दिया लेकिन केंद्र सरकार ने तुरंत अध्यादेश लाकर उस पॉवर को वापस ब्यूरोक्रेट्स को दे दिया।  यह कोई 'क़ानूनी मुद्दा' नहीं था, यह एक 'राजनैतिक संदेश था, कि 'शिक्षित नेता को कंट्रोल में रखा जाएगा।  पंजाब में भगवंत मान की सरकार ने दर्जनों आईएएस अधिकारियों को महीनों बिना पोस्टिंग के रखा, क्योंकि उन्होंने माइनिंग फाईल्स पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था।  गुरकीरत कृपाल सिंह, एक 2001- बैच के अधिकारी, को होम सेक्रेटरी के पद से हटाया गया और 8 महीने बाद भी उसे कोई पोस्टिंग नहीं मिली। कंवल प्रीत बरार, एक 2007- बैच के अधिकारी, को भी महीनों से इंतजार करना पड़ रहा है।  यह 'पनिसमेंट नहीं, बल्कि एक 'वार्निंग है कि अगर तुम चयनित जनप्रतिनिधि के हिसाब से नहीं चलोगे, तो तुम्हें 'किनारे' कर दिया जाएगा। यह पैटर्न सिर्फ दिल्ली या पंजाब तक सीमित नहीं, यह पूरे भारत में है, जहां ब्यूरोक्रेट्स चुने हुए जनप्रतिनिधि को 'सबक सिखाते' हैं, अगर वे उनके कन्ट्रोल को चैलेंज करें।
लोकतंत्र में जनता 'सार्वभौम' होती है और जनता के प्रतिनिधि, यानी चुने हुए नेता, वो होते हैं जो पॉलिसी बनाते हैं। ब्यूरोक्रेट्स का रोल होता है उसे 'लागू करना, लेकिन भारत में यह रोल उलट गया है। आज ब्यूरोक्रेट्स 'पॉलिसी' बनाते हैं, चुने हुए जनप्रतिनिधि मंजूरी देते हैं और जनता 'तकलीफ झेलती है। यह कोई 'थ्योरी नहीं, यह ग्राउंड रियलिटी है। एक IAS अधिकारी, जो कभी जनता के बीच नहीं रहा, वो तय करता है कि एक गांव को रोड मिलेगी या नहीं। एक ब्यूरोक्रेट्स, जो कभी अस्पताल या स्कूल नहीं गया, वो तय करता है कि हेल्थ केयर या एजुकेशन पॉलिसी कैसे लागू होगी। यह 'लोकतंत्र नहीं, बल्कि 'ब्यूरोक्रेटिक डिक्टेटरशीप है, जहां ' सेलेक्टेड' लोग 'इलेक्टेड लोगों को कन्ट्रोल करते हैं। और इसका सबसे बड़ा नुकसान जनता को होता है, क्योंकि जब एकाउंटबिलिटी नहीं होती, तो भ्रष्टाचार, अकुशलता, और देरी बढ़ती हैं।
यह लेख सिर्फ एक 'आलोचना' नहीं, बल्कि एक 'कार्रवाई के लिए आह्वान' है। अगर भारत को सच्चाई में 'विकसित' बनाना है, तो सिर्फ रोड्स, ब्रिज, या GDP ग्रोथ से नहीं होगा, यह होगा ब्यूरोक्रेटिक सिस्टम को रिफॉर्म करके। लैटरल एंट्री को बढ़ाकर करना होगा, ताकि विशेषज्ञ सीधे वरिष्ठ पदों पर आ सकें। ब्यूरोक्रेट्स की जवाबदेही बढ़ानी होगी, ताकि वे चुने हुए जनप्रतिनिधियों के कंट्रोल में रहें, न कि उनके ऊपर।  'Transaction of Business Rules' को रिफॉर्म करना होगा, ताकि मंत्री को असली शक्ति मिले, न कि सिर्फ ''औपचारिक' स्टेटस। और सबसे जरूरी जनता को जागना होगा, और सवाल उठाना होगा कि 'कौन चला रहा है देश को चुनें हुए जनप्रतिनिधि या सिलेक्टेड ब्यूरोक्रेट्स?'  नहीं तो, यह 'ब्यूरोक्रेटिक डिक्टेटरशीप' जारी रहेगा और भारत का 'लोकतंत्र' सिर्फ एक 'शो पीस' बनकर रह जाएगा।
Rajesh R. Singh 




  ~विजय राजबली माथुर ©

 

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