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देश में नई मीडिया क्रांति के अंकुर फूट रहे हैं जिन्हें सींचने की जरूरत है:
पिछले कुछ दशकों में मीडिया का स्वरूप बदल गया और ये कॉरपोरेट और सामंती समाज के चंगुल में बुरी तरह फंस गया.
अखबारों के मल्टी एडिशंस ने छोटे शहरों के अखबारों और मैग्जींस को खत्म कर दिया और ब्रॉडकास्ट मीडिया ने पब्लिक ओपनियन पर ऐसा कब्जा किया कि समाज के वैल्यू सिस्टम को बीमार कर दिया. नफ़रत और दंगाई मानसिकता को बढ़ावा दिया. संविधान के रास्ते समाज में जो समावेशी बदलाव आने चाहिये थे उनकी गति को धीमा या लगभग रोक ही दिया.
यूट्यूब मीडिया:
सोशल मीडिया के परिपक्व होने के बाद ब्रॉडकास्ट मीडिया से रवीश कुमार, अजीत अंजुम, अभिसार शर्मा, पुण्य प्रसून, साक्षी जोशी जैसे कुछ पत्रकार निकले जिन्होंने यूट्यूब के ज़रिये ब्रॉडकास्ट मीडिया के आधिपत्य को चुनौती दी. जिन सरोकारों को ब्रॉडकास्ट मीडिया (गोदी मीडिया) छोड़ चुका था इन्होंने अपने प्लेटफॉर्म में जगह दी.
ये सब ब्रॉडकास्ट मीडिया में नाम कमा चुके थे और अपना एक मजबूत ऑडियंस लेकर यूटयूब में आये और जल्द ही स्थापित हो गये.
एक और डिजिटल मीडिया आया जिन्होंने अपना ऑर्गेनिक ऑडियंस बनाया और गोदी मीडिया को ज़्यादा बड़ी चुनौती दी. इनमें डीबी लाइव प्रमुख है जो ब्रॉडकास्ट मीडिया जैसा लाइव कंटेंट और पॉलिटिकल एनालिसिस के शो लेकर आया. इसी श्रेणी में पब्लिक इंडिया, सत्य हिंदी, 4 पीएम जैसे कई चैनलों ने वैकल्पिक विमर्श के लिये बड़ी जगह बनाई.
तीसरा एक और ग्रुप है जिसमें सुमित चौहान के The Shudra, नवीन कुमार के Article 19, National Dastak और Mook Nayak को रख सकते हैं. इन्होंने समाज के वंचित वर्गों की आवाज़ उठाई जो लिगेसी और नया मीडिया नहीं कर रहा था. इनकी शब्दावली, तेवर, मुद्दे और तस्वीरें बिलकुल अलग हैं. बाकी लोगों ने अगर कॉरपोरेट मोनोपली को चुनौती दी तो इन लोगों ने कंटेंट और भाषा के स्तर पर मीडिया में मजबूत सामंती पकड़ को ढीला किया और एक बिलकुल नया एजेंडा रखा.
मौजूदा क्रांति:
जंतर मंतर आंदोलन के बाद एक जेन ज़ी मीडिया तेजी से उभर कर आया. सबसे अच्छी बात ये है कि इसमें लड़कियां आगे हैं. ये कंटेंट क्रिएटर और इंफ्लूएंसर से होते हुये न्यूज मीडिया में आयें हैं. इस मीडिया में पूजा माथुर, शाहीन, नफीसा, माहिम खान जैसी शानदार और साहसी लड़कियां हैं. पुलिस के दमन के खिलाफ ये डट कर खड़ी हैं. सेल्फी स्टिक, गिन्बल में मोबाइल लगा कर ये हर जगह हैं. इनके पास संसाधन बहुत कम हैं लेकिन ऊर्जा, हिम्मत और कमिटमेंट बहुत ज्यादा है.
पुलिस, सरकार और चीफ जस्टिस सूर्यकांत इन्हीं से परेशान हैं. इन्हें रोकने के उपाय निकाल रहे हैं.
ये भविष्य का मीडिया हैं और किसी भी प्रकार की सत्ता को यही चुनौती देने जा रहे हैं.
हम सबकी जिम्मेदारी है कि इस नये उभरते जेन ज़ी मीडिया के साथ खड़े हों.
(उदारहण के तौर पर कुछ ही नाम दिये हैं, हर श्रेणी में बहुत और भी लोग हैं जो बेहतर काम कर रहे हैं)
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~विजय राजबली माथुर ©
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