बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि विवाद की उस रात का सच, जिसने मुल्क की सियासत की दिशा हमेशा के लिए बदल दी, एक बार फिर चर्चा में है। पॉडकास्ट व्हिट ज़ीनत में वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी ने 1949 के उस वाक़ये पर बेबाक खुलासे किए हैं, जब अचानक बाबरी मस्जिद के अंदर रामलला की मूर्तियां 'प्रकट' होने का दावा किया गया था।
जोशी ने साफ़ किया है कि यह कोई 'चमत्कार' नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साज़िश थी, जिसमें रात के अंधेरे में मूर्तियां रखी गईं और सुबह चमत्कार की अफ़वाह फैला दी गई। इसे सच साबित करने के लिए एक 'मुस्लिम सिपाही' की झूठी गवाही भी गढ़ी गई, जबकि हक़ीक़त में उस नाम का कोई सिपाही थाने में था ही नहीं।
इस पूरी साज़िश में तत्कालीन डीएम के.के. नायर की सीधी मिलीभगत थी। पत्रकार के मुताबिक़, जब यह ख़बर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तक पहुंची, तो उन्होंने लिखित में यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को फ़ौरन मूर्तियां हटाने का आदेश दिया। लेकिन 'अंदर के हिंदू' और डीएम की रिपोर्ट का बहाना बनाकर पंत ने नेहरू के आदेश को नज़रअंदाज़ कर दिया। डीएम ने दंगे और क़ानून-व्यवस्था बिगड़ने का डर दिखाया और मूर्तियां वहीं रह गईं। अयोध्या के पत्रकार शीतला सिंह की किताब के दस्तावेज़ों के हवाले से यह दावा मुल्क के उस स्याह इतिहास को नंगा करता है, जिसने दशकों तक भारत के साम्प्रदायिक ताने-बाने को तार-तार किया।
~विजय राजबली माथुर ©
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