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Wednesday, September 19, 2018

देवी - देवता , अहिल्या और दुर्गा पूजा ------ विजय राजबली माथुर

*** *** भारतवर्ष को श्रेष्ठ =आर्ष=आर्य होने के कारण आर्यावृत भी कहा जाता था फारसी आक्रांताओं ने इनको हेय और निकृष्ट मानते हुये अपनी भाषा की एक गंदी गाली ' हिन्दू ' से विभूषित किया था। बौद्ध ग्रन्थों में हिंसा देने वालों को हिन्दू कहने का उल्लेख है किन्तु विद्वजन ढोंग- पाखंड को हिन्दू के रूप में पूजने का उपक्रम करते रहते हैं उनको मालूम होना चाहिए था कि ' देवता ' वह होता है जो देता है और लेता नहीं है ; जैसे नदी, वृक्ष, अग्नि, जल,वायु, धरती व आकाश आदि ।***  ***

"आज   देश के हालात कुछ  वैसे हैं :-मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों -२ दवा की। करम खोटे हैं तो ईश्वर  के गुण गाने से क्या होगा ,किया  परहेज़ न कभी  तो दवा खाने से क्या होगा.. आज की युवा शक्ति को तो मानो सांप   सूंघ  गया है वह कोई जोखिम उठाने को तैयार नहीं है और हो भी क्यों ? इस  सब के पीछे कुत्सित मानसिकता वाले बुर्जुआ लोग ही हैं । वैसे तो वे बड़े सुधारवादी ,समन्वय वादी बने फिरते हैं,किन्तु यदि उनके ड्रामा को सच समझ कर उनसे मार्ग दर्शन माँगा जाये तो वे गुमनामी में चले जाते हैं,लेकिन चुप न बैठ कर युवा चेहरे को मोहरा बना कर अपनी खीझ उतार डालते हैं । 
ऐसा नहीं है कि यह सब आज हो रहा है.गोस्वामी तुलसीदास ,कबीर ,रैदास ,नानक ,स्वामी दयानंद ,स्वामी विवेकानंद जैसे महान विचारकों को अपने -२ समय में भारी विरोध का सामना करना पड़ा था .१३ अप्रैल २००८ के हिंदुस्तान ,आगरा के अंक में नवरात्र की देवियों के सम्बन्ध में किशोर चंद चौबे साहब का शोधपरक लेख प्रकाशित हुआ था ,आपकी सुविधा के लिए उसकी स्केन प्रस्तुत कर रहे हैं
चैत्र और शरद नव रात्रों मे ढ़ोंगी-पाखंडी ढ़ोल-नगाड़ों से खुराफात करते हैं और खुद को देवी-भक्त घोषित करते हैं। ये नौ देवियाँ क्या हैं?चौबे साहब ने अच्छे और सरल ढंग से समझाया है किन्तु आम जनता की कौन कहे ?हमारे इंटरनेटी विद्वान भी मानने को तैयार न होंगे।
इन बदलते मौसमो मे उपरोक्त वर्णित औषद्धियों के सेवन से मानव मात्र को स्वस्थ रखने की कल्पना की गई थी। इन औषद्धियों से नौ दिन तक विशेष रूप से हवन करते थे जो ' धूम्र चिकित्सा ' का वैज्ञानिक आधार है। लेकिन आज क्या हो रहा है? भगवान =GOD=खुदा के दलालों (पुरोहितवादियों) ने मानव-मानव को लड़ा कर अपनी-अपनी दुकाने चला रखी हैं और मानव 'उल्टे उस्तरे' से उनके द्वारा ठगा जा रहा है। 'साईं बाबा','संतोषी माता','वैभव लक्ष्मी' नामक ठगी के नए स्तम्भ और ईजाद कर लिए गए हैं। जितना विज्ञान तरक्की कर रहा बताया जा रहा है उतना ही ज्यादा ढोंग-पाखंड का प्रचार होता जा रहा है जो पूर्णतः'अवैज्ञानिक' है।
एलोपैथी तो सिर्फ इतना भर जानती और मानती है कि,रोग का कारण बेक्टीरिया होते हैं और उन्हें नष्ट करने से उपचार हो जाता है। अब इसी पद्धति के विशेषज्ञ मानने लगे हैं कि न तो सभी बेक्टीरिया को नष्ट करना चाहिए और न ही अब एंटी बायोटिक दवाओ का असर रह गया है। पंचम वेद -'आयुर्वेद' मे 'वात-कफ-पित्त' के बिगड़ने को सभी रोगों का मूल माना है और यह निष्कर्ष पूर्ण रूप से वैज्ञानिक है।


भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु)+I (अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)-इन पाँच तत्वों से मिल कर सम्पूर्ण सृष्टि बनती है जिसमे वनस्पतियाँ और प्राणी सभी शामिल हैं।


1-वात=आकाश +वायु
2-कफ=भूमि +जल
3-पित्त=अग्नि


'आयुर्वेद' मे पाँच तत्वों को उनके यौगिकों के आधार पर तीन तत्वों मे समायोजित कर लिया गया है। इसी लिए 'वैद्य' रोगी के हाथ की कलाई पर स्थित 'नाड़ी' पर अपने हाथ की तीन अंगुलियाँ रख कर इन तीन तत्वों की उसके शरीर मे स्थिति का आंकलन करते हैं। (1 )वात का प्रभाव 'तर्जनी',(2 )कफ का -'अनामिका',(3 )पित्त का 'मध्यमा' अंगुली पर ज्ञात किया जाता है।


 * अंगुष्ठ के तुरंत बाद वाली उंगली 'तर्जनी' है जो हाथ मे ब्रहस्पति -गुरु ग्रह का प्रतिनिधित्व करती है। 'गुरु'ग्रह गैसों का पिटारा है। वायु भी गैसों का संग्रह ही है।


 * तर्जनी के बाद की सबसे बड़ी उंगली ही 'मध्यमा' है जो शनि का प्रतिनिधित्व करती है। शनि को ज्योतिष मे 'आयु' का कारक ग्रह माना गया है और आयुर्वेद मे इसकी उंगली पित्त -ऊर्जा की स्थिति की सूचक है।


 * मध्यमा के तुरंत बाद की उंगली 'अनामिका' है जो हाथ मे सूर्य का प्रतिनिधित्व करती है। ज्योतिष मे सूर्य को 'आत्मा' का कारक मानते हैं और हाथ मे यह उंगली आयुर्वेद के अनुसार  कफ की द्योतक है।


इन तीन उँगलियों पर पड़ने वाली नाड़ी की धमक वैद्य को रोगी के शरीर मे न्यूनता अथवा अधिकता का भान करा देती है जिसके अनुसार उपचार किया जाता है। जिस तत्व की अधिकता रोग का कारक है उसके शमन हेतु उसके विपरीत गुण वाले तत्व की औषद्धिया दी जाती हैं। जिस तत्व की न्यूनता होती है उसकी वृद्धि हेतु उसी तत्व वाले गुण की औषद्धिया दी जाती हैं। हमारे आयुर्वेद मे 'बेक्टीरिया' से रोग की उत्पत्ति मानने की सनक नहीं होती है,यह विशुद्ध प्राकृतिक  और वैज्ञानिक रूप से रोग की खोज करके उपचार करता है इसी लिए इसे आयु का विज्ञान =आयुर्वेद कहते हैं। 'आयुर्वेद' मे 'शल्य'चिकत्सा =सर्जरी का व्यापक महत्व था। गौतम बुद्ध के समय तक 'मस्तिष्क' तक की शल्य चिकित्सा होती थी और सिर दर्द का इलाज भी इस विधि से संभव था। 'बौद्ध' मत के विरोध की आंधी मे पोंगा-पंथियों ने मूल पांडु लिपियों और अनेक ग्रन्थों को जला डाला जिसका परिणाम यह हुआ कि  आगे से  आयुर्वेद मे शोद्ध होना बंद हो गया। उसके बाद 1100 वर्षों की गुलामी मे 'पौराणिकों' ने और ज्यादा ढोंग-पाखंड का कहर बरपाया । संत कबीर आदि ने इस ढोंग-पाखंड का विरोध उस काल मे किया और आधुनिक काल मे स्वामी दयानंद,स्वामी विवेकानंद आदि ने। किन्तु आचार्य श्री राम शर्मा आदि ने इनके प्रयासों पर पानी फेर दिया और ढोंग-पाखंड का आज इतना बोल बाला है कि अनेकों ढोंगियों ने खुद को आज भगवान घोषित कर दिया है।
राजनेता जनता को जाग्रत करने के बजाए जनता को दिग्भ्रमित करने के प्रयासों में लुटेरे व शोषकों की मन - मुराद पूरी करने में लगे हुये हैं : 


जब अर्थ का अनर्थ किया जाएगा तब उसकी प्रतिक्रिया भी वैसी ही होगी : 




  





भारतवर्ष को श्रेष्ठ =आर्ष=आर्य होने के कारण आर्यावृत भी कहा जाता था फारसी आक्रांताओं ने इनको हेय और निकृष्ट मानते हुये अपनी भाषा की एक गंदी गाली ' हिन्दू ' से विभूषित किया था। बौद्ध ग्रन्थों में हिंसा देने वालों को हिन्दू कहने का उल्लेख है किन्तु विद्वजन ढोंग- पाखंड को हिन्दू के रूप में पूजने का उपक्रम करते रहते हैं उनको मालूम होना चाहिए था कि ' देवता ' वह होता है जो देता है और लेता नहीं है ; जैसे नदी, वृक्ष, अग्नि, जल,वायु, धरती व आकाश आदि ।  
~विजय राजबली माथुर ©

Monday, April 9, 2012

जन -चिकित्सा थी- होम्योपैथी ------ विजय राजबली माथुर

10 अप्रैल -महात्मा हैनीमेन जयंती पर विशेष : 

डॉ हैनीमेन का जन्म 10 अप्रैल सन 1755 ई .को जर्मन साम्राज्य के अंतर्गत सेकसनी प्रदेश के 'माइसेन 'नामक एक छोटे से गाँव मे हुआ था और 02 जूलाई सन 1843 ई .मे नवासी वर्ष की आयु मे उनका निधन हुआ। "कीर्तिर्यस्य स जीवति"= इस असार संसार को छोडने से पूर्व डॉ हैनीमेन 'चिकित्सा-विधान'मे एक अक्षय कीर्ति स्थापित कर गए। 

उपलब्ध जानकारी के अनुसार डॉ हैनीमेन जर्मनी के एक कीर्ति प्राप्त उच्च -पदवी धारी एलोपैथिक चिकित्सक थे। अनेकों बड़े-बड़े चिकित्सालयों मे बहुत से रोगियों का इलाज करते हुये उनके ध्यान मे यह बात आई कि अनुमान से रोग निर्वाचन (DIAGNOSIS) कर,और कितने ही बार अनुमान पर निर्भर रह कर दवा देने के कारण भयंकर हानियाँ होती हैं,यहाँ तक कि बहुत से रोगियों की मृत्यु तक हो जाया करती है। इन बातों से उन्हें बेहद वेदना हुई और अंततः उन्होने इस भ्रमपूर्ण चिकित्सा (एलोपैथी )द्वारा असत उपाय से धन-उपार्जन करने की लालसा ही त्याग दी एवं निश्चय किया कि अब वह पुस्तकों का अनुवाद करके अपना जीविकोपार्जन करेंगे। इसी क्रम मे एक दिन एक-'मेटिरिया मेडिका' का अनुवाद करते समय उन्होने देखा कि शरीर स्वस्थ रहने पर यदि सिनकोना की छाल सेवन की जाये तो 'कम्प-ज्वर'(जाड़ा-बुखार)पैदा हो जाता है और सिनकोना ही कम्प-ज्वर की प्रधान दवा है। यही बोद्ध डॉ हैनीमेन की नवीन चिकित्सा पद्धति के आविष्कार का मूल सूत्र हुआ। इसके बाद इसी सूत्र के अनुसार उन्होने अनेकों भेषज-द्रव्यों का स्वंय सेवन किया और उनसे जो -जो लक्षण पैदा हुये ,उनकी परीक्षा की । यदि किसी रोगी मे वे लक्षण दिखाई देते तो उसी भेषज-द्रव्य को देकर वह रोगी को 'रोग-मुक्त'भी करने लगे।


डॉ हैनीमेन अभी तक पहले की भांति एलोपैथिक अर्थात स्थूल मात्रा मे ही दवाओं का प्रयोग करते थे। परंतु उन्हे यह एहसास हुआ कि रोग,आरोग्य हो जाने पर भी कुछ दिन बाद रोगी मे दुबारा बहुत सारे अनेक लक्षण पैदा हो जाते हैं। जैसे किनाइन का सेवन करने पर ज्वर तो आरोग्य हो जाता है ,परंतु उसके बाद रोगी मे --रक्त हीनता,प्लीहा,यकृत,पिलई,शोथ (सूजन ),धीमा बुखार आदि अनेक नए-नए उपसर्ग पैदा होकर रोगी को एकदम जर्जर बना डालते हैं। बस उसी एहसास के बाद से उन्होने दवा की मात्रा घटानी आरम्भ कर दी। इससे उन्हें यह मालूम हुआ कि,परिमाण या मात्रा भले ही कम हो ,आरोग्य दायिनी शक्ति पहले की तरह ही मौजूद रहती है और दुष्परिणाम भी पैदा नहीं होते।

अन्त मे उन्होने दवा का परिमाण क्रमशः भग्नांश के आकार मे प्रयोग करना आरम्भ किया और वे भग्नांश दवाएं फ्रेंच स्प्रिट,दूध की चीनी (शुगर आफ मिल्क)और चुयाया हुआ पानी (डिस्टिल्ड वाटर)इत्यादि औषद्ध-गुण विहीन चीजों के साथ मिला कर प्रयोग करना शुरू किया। यही नियम इस समय -'सदृश्य-विधान' कहलाता है जिसे डॉ हैनीमेन के नाम पर 'होम्योपैथिक-चिकित्सा' कहा जाता है। 

होम्योपैथी का 'सदृश्य -विधान' हमारे देश के 'आयुर्वेद' के सदृश्य सिद्धान्त से मेल खाता है। होम्योपैथी दवाएं होती भी हैं बहुत कम कीमत की। पहले होम्योपैथी चिकितक कोई कनसलटेशन चार्ज या परामर्श शुल्क भी नहीं लेते थे। एलोपैथी चिकित्सकों की भांति होम्योपैथी चिकित्सक कोई गरूर या घमंड भी नहीं रखते थे। अधिकांश होम्योपैथी चिकित्सकों के पीछे यह स्लोगन लिखा होता था-I TREATS,HE CURES.तब यह चिकित्सा पद्धति जनता की प्रिय चिकित्सा पद्धति थी।

गत 4-5 वर्षों से एलोपैथी चिकित्सा क्षेत्र मे फैले कमीशन वाद ने इस जन-चिकत्सा पद्धति (होम्योपैथी )को भी अपनी गिरफ्त मे ले लिया है। अब डॉ को कमीशन की रकमे बढ़ा दी गई हैं और विदेश दौरे के पेकेज जैसे एलोपैथी डॉ को मिलते थे वैसे ही मिलने लगे हैं। बाजार वाद के प्रभाव ने इस चिकित्सा पद्धति को भी मंहगा बनाना प्रारम्भ कर दिया है। यह महात्मा हैनीमेन की सोच के विपरीत है। आज जब हम डॉ हैनीमेन की 258 वी जयंती मना रहे हैं तो एक बार इस बात का भी मनन करें कि जिस एलोपैथी चिकित्सा की बुराइयों से त्रस्त होकर डॉ हैनीमेन ने नई जनोपयोगी चिकित्सा पद्धति का सृजन किया था उसे पुनः एलोपैथी की बुराइयों मे फँसने से बचाया जाये। वही डॉ हैनीमेन को सच्ची श्रद्धांजली होगी।  

Thursday, March 22, 2012

संवत 2069 आप सब को मंगलमय हो

क्रांतिकारी भगत सिंह,राजगुरु और सुखदेव जी 






हिंदुस्तान-लखनऊ-19 मार्च 2012



क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु,सुखदेव जी का बलिदान दिवस 23 मार्च प्रत्येक भारतीय को 'कर्तव्य दिवस'के रूप मे मनाना चाहिए। इन नौजवानों ने हँसते-हँसते अपने जीवन को देश की आजादी के संघर्ष मे कुर्बान कर दिया था। आज हम आजाद देश के प्रति कितने निष्ठावान हैं यह खुद से सवाल उठाने की बात है न कि दूसरों के कर्तव्यों को याद दिलाने की। अपनी कर्तव्यहीनता को छिपाने के वास्ते लोग धूर्तता का सहारा लेते हैं कि राजनीति और राजनेताओ ने देश को रसातल मे डुबो दिया है। वस्तुतः ढ़ोंगी-पाखंडी अधार्मिक लोगों ने ही 'धर्म' के नाम पर इतना जबर्दस्त जहर बो दिया है जो देश और इसकी जनता के लिए कहर बन गया है। इस वर्ष
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ,शुक्रवार  23 मार्च ,2012 से विक्रमी संवत 2069 प्रारम्भ हो रहा है। इसी दिन से सार्वजनिक नव रात्र भी प्रारम्भ हो रहे हैं। आप देखेंगे कि लोग तरह तरह के ढोंग-पाखंड द्वारा नौ दिन स्वांग रचेंगे।14 अक्तूबर 2010 मे दिये विचारों को एक बार फिर दोहरा कर ही उपरोक्त सम्पाद्कीय के संबंध मे विचार दूंगा-

"आज   देश के हालात कुछ  वैसे हैं :-मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों -२ दवा की.करम खोटे हैं तो ईश्वर  के गुण गाने से क्या होगा ,किया  परहेज़ न कभी  तो दवा खाने से क्या होगा.. आज की युवा शक्ति को तो मानो सांप   सूंघ  गया है वह कोई जोखिम उठाने को तैयार नहीं है और हो भी क्यों ? जिधर देखो उधर ओसामा बिन लादेन बिखरे पड़े हैं, चाहें वह ब्लॉग जगत ही क्यों न हो जो हमारी युवा शक्ति को गुलामी की प्रवृत्तियों से चिपकाये रख कर अपने निहित स्वार्थों की पूर्ती करते रहते हैं.अफगानिस्तान हो ,कश्मीर हो ,देश भर में फैले नक्सलवादी हों या किसी भी तोड़ -फोड़ को अंजाम देने वाले आतंकवादी हों सब के पीछे कुत्सित मानसिकता वाले बुर्जुआ लोग ही हैं .वैसे तो वे बड़े सुधारवादी ,समन्वय वादी बने फिरते हैं,किन्तु यदि उनके ड्रामा को सच समझ कर उनसे मार्ग दर्शन माँगा जाये तो वे गुमनामी में चले जाते हैं,लेकिन चुप न बैठ कर युवा चेहरे को मोहरा बना कर अपनी खीझ उतार डालते हैं .
ऐसा नहीं है कि यह सब आज हो रहा है.गोस्वामी तुलसीदास ,कबीर ,रैदास ,नानक ,स्वामी दयानंद ,स्वामी विवेकानंद जैसे महान विचारकों को अपने -२ समय में भारी विरोध का सामना करना पड़ा था .१३ अप्रैल २००८ के हिंदुस्तान ,आगरा के अंक में नवरात्र की देवियों के सम्बन्ध में किशोर चंद चौबे साहब का शोधपरक लेख प्रकाशित हुआ था ,आपकी सुविधा के लिए उसकी स्केन प्रस्तुत कर रहे हैं :



बड़े सरल शब्दों में चौबेजी ने समझाया है कि ये नौ देवियाँ वस्तुतः नौ औषधियां  हैं जिनके प्राकृतिक संरक्षण तथा चिकित्सकीय प्रयोग हेतु ये नौ दिन निर्धारित किये गए हैं जो सूर्य के उत्तरायण और दक्षिणायन रहते दो बार सार्वजानिक रूप से पर्व या उत्सव के रूप में मनाये जाते हैंलेकिन हम देखते हैं कि ये पर्व अपनी उपादेयता खो चुके हैं क्योकि इन्हें मनाने के तौर -तरीके आज बिगड़ चुके हैं .दान ,गान ,शो ,दिखावा ,तड़क -भड़क ,कान -फोडू रात्रि जागरण यही सब हो रहा है जो नवरात्र पर्व के मूल उद्देश्य से हट कर है । "



जिस प्रकार रस्सी की रगड़ से कुएं की मन और घिर्री भी घिस जाती है उसी प्रकार एक ही बात को बार-बार दोहराते रहने से मानव मन भी शायद सच्ची बात से धंस ही जाये यही सोच कर प्रयास जारी रखे हुये हूँ। WHO-विश्व स्वास्थ्य संगठन के सर्वोच्च अधिकारी द्वारा व्यक्त विचारों के आधार पर हिंदुस्तान,लखनऊ के  सम्पादकीय मे उठाई  चिंता पर गंभीर चिंतन-मनन करने की आवश्यकता है। 


वस्तुतः एलोपैथी चिकित्सक अपने सम्पूर्ण घमंड के साथ भारतीय चिकित्सा पद्धततियों का घिनौना मखौल उड़ाते हैं।(मै अपनी तरफ से डॉ तारीफ साहब को अपवाद की श्रेणी मे रखता हूँ जैसे विचार उनके ब्लाग मे पढ़ने को मिलते हैं उनके आधार पर। )  एलोपैथी तो सिर्फ इतना भर जानती और मानती है कि,रोग का कारण बेक्टीरिया होते हैं और उन्हें नष्ट करने से उपचार हो जाता है। अब इसी पद्धति के विशेषज्ञ मानने लगे हैं कि न तो सभी बेक्टीरिया को नष्ट करना चाहिए और न ही अब एंटी बायोटिक दवाओ का असर रह गया है। पंचम वेद -'आयुर्वेद' मे 'वात-कफ-पित्त' के बिगड़ने को सभी रोगों का मूल माना है और यह निष्कर्ष पूर्ण रूप से वैज्ञानिक है। 


भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु)+I (अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)-इन पाँच तत्वों से मिल कर सम्पूर्ण सृष्टि बनती है जिसमे वनस्पतियाँ और प्राणी सभी शामिल हैं। 


1-वात=आकाश +वायु 
2-कफ=भूमि +जल 
3-पित्त=अग्नि 


'आयुर्वेद' मे पाँच तत्वों को उनके यौगिकों के आधार पर तीन तत्वों मे समायोजित कर लिया गया है। इसी लिए 'वैद्य' रोगी के हाथ की कलाई पर स्थित 'नाड़ी' पर अपने हाथ की तीन अंगुलियाँ रख कर इन तीन तत्वों की उसके शरीर मे स्थिति का आंकलन करते हैं। (1 )वात का प्रभाव 'तर्जनी',(2 )कफ का -'अनामिका',(3 )पित्त का 'मध्यमा' अंगुली पर ज्ञात किया जाता है। 


अंगुष्ठ के तुरंत बाद वाली उंगली 'तर्जनी' है जो हाथ मे ब्रहस्पति -गुरु ग्रह का प्रतिनिधित्व करती है। 'गुरु'ग्रह गैसों का पिटारा है। वायु भी गैसों का संग्रह ही है। 


तर्जनी के बाद की सबसे बड़ी उंगली ही 'मध्यमा' है जो शनि का प्रतिनिधित्व करती है। शनि को ज्योतिष मे 'आयु' का कारक ग्रह माना गया है और आयुर्वेद मे इसकी उंगली पित्त -ऊर्जा की स्थिति की सूचक है। 


मध्यमा के तुरंत बाद की उंगली 'अनामिका' है जो हाथ मे सूर्य का प्रतिनिधित्व करती है। ज्योतिष मे सूर्य को 'आत्मा' का कारक मानते हैं और हाथ मे यह उंगली आयुर्वेद के अनुसार  कफ की द्योतक है।


इन तीन उँगलियों पर पड़ने वाली नाड़ी की धमक वैद्य को रोगी के शरीर मे न्यूनता अथवा अधिकता का भान करा देती है जिसके अनुसार उपचार किया जाता है। जिस तत्व की अधिकता रोग का कारक है उसके शमन हेतु उसके विपरीत गुण वाले तत्व की औषद्धिया दी जाती हैं। जिस तत्व की न्यूनता होती है उसकी वृद्धि हेतु उसी तत्व वाले गुण की औषद्धिया दी जाती हैं। हमारे आयुर्वेद मे 'बेक्टीरिया' से रोग की उत्पत्ति मानने की सनक नहीं होती है,यह विशुद्ध प्राकृतिक  और वैज्ञानिक रूप से रोग की खोज करके उपचार करता है इसी लिए इसे आयु का विज्ञान =आयुर्वेद कहते हैं। 'आयुर्वेद' मे 'शल्य'चिकत्सा =सर्जरी का व्यापक महत्व था। गौतम बुद्ध के समय तक 'मस्तिष्क' तक की शल्य चिकित्सा होती थी और सिर दर्द का इलाज भी इस विधि से संभव था। 'बौद्ध' मत के विरोध की आंधी मे पोंगा-पंथियों ने मूल पांडु लिपियों और अनेक ग्रन्थों को जला डाला जिसका परिणाम यह हुआ कि  आगे से  आयुर्वेद मे शोद्ध होना बंद हो गया। उसके बाद 1100 वर्षों की गुलामी मे 'पौराणिकों' ने और ज्यादा ढोंग-पाखंड का कहर बरपाया । संत कबीर आदि ने इस ढोंग-पाखंड का विरोध उस काल मे किया और आधुनिक काल मे स्वामी दयानंद,स्वामी विवेकानंद आदि ने। किन्तु आचार्य श्री राम शर्मा आदि ने इनके प्रयासों पर पानी फेर दिया और ढोंग-पाखंड का आज इतना बोल बाला है कि अनेकों ढोंगियों ने खुद को आज भगवान घोषित कर दिया है। देखिये 21 मार्च को फेसबुक पर व्यक्त विद्वानो के विचार-



  • सुना तो होगा आप लोंगों ने भी .कोई रविशंकर महाराज कहलाते हैं .बोलते हैं तो आवाज स्त्री की लगती है .कल जय पुर में बयान दिया की सरकारी स्कूल बंद करदेने चाहिए सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे ही नक्सलबादी बनते हैं .अब लीजिये नया फंडा ,न जाने कौन संस्था रोज एक महाराज ,एक साधू पैदा करती है पहले चोरी चोरी धन कमाते हैं जब फ़ैल जाते हैं तो नाटक करते हैं .जितने इस प्रकार के लोग हैं उन्हें ,धर्मभीरु लोग ही बढ़ाते हैं ,रविशंकर .निर्मल बाबा ,आशा राम बापू ,मुरारी बापू,रामदेव .और पता नहीं कितने डेरा सच्चा सौदा आदि आदि .उसी में हजारे को भी जोड़ देना चाहिए .इन्ही को देश शौंप देना चाहिए ,संबिधान हटा देना चाहिए ,अन्यथा ऐसी ब्यवस्था हो की इनके चोंच बंद हों ,दुखदाई हैं
  • Ramji Tiwari ये अभी बलिया में भी आये थे ...देखकर और सुनकर मन क्षोभ से भर उठा ...ऐसे लोगों को कैसे समाज के दिग्दर्शक बनने का दावा करने लगते है , जिन्हें रत्ती भर भी समझ नहीं ...
  • Pankaj Chaturvedi फिर बाबाजी यह भी कहेंगे मंदिर अंधविश्वासी बनाते हें उनको गिरा दो और बाबाजी के ही मंदिर बनादो, साडी चदौत उनको ही दे दो



चैत्र और शरद नव रात्रों मे ढ़ोंगी-पाखंडी ढ़ोल-नगाड़ों से खुराफात करते हैं और खुद को देवी-भक्त घोषित करते हैं। ये नौ देवियाँ क्या हैं?चौबे साहब ने अच्छे और सरल ढंग से समझाया है किन्तु आम जनता की कौन कहे ?हमारे इंटरनेटी विद्वान भी मानने को तैयार न होंगे। 


इन बदलते मौसमो मे उपरोक्त वर्णित औषद्धियों के सेवन से मानव मात्र को स्वस्थ रखने की कल्पना की गई थी। इन औषद्धियों से नौ दिन तक विशेष रूप से हवन करते थे जो 'धूम्र चिकित्सा' का वैज्ञानिक आधार है। लेकिन आज क्या हो रहा है?भगवान =GOD=खुदा के दलालों (पुरोहितवादियों) ने मानव-मानव को लड़ा कर अपनी-अपनी दुकाने चला रखी हैं और मानव 'उल्टे उस्तरे' से उनके द्वारा ठगा जा रहा है। 'साईं बाबा','संतोषी माता','वैभव लक्ष्मी' नामक ठगी के नए स्तम्भ और ईजाद कर लिए गए हैं। जितना विज्ञान तरक्की कर रहा बताया जा रहा है उतना ही ज्यादा ढोंग-पाखंड का प्रचार होता जा रहा है जो पूर्णतः'अवैज्ञानिक' है। 'जनहित' मे मैंने प्रार्थना-स्तुति के द्वारा भी स्वास्थ्य-लाभ (उपचार) प्राप्त करने का मार्ग बताया है जिसे लोग अपनाना नहीं चाहते और मंहगे उपचार मे फंस कर अपना अहित करते रहते हैं। 


संवत 2069 सम्पूर्ण मानव जाति के लिए मंगलमय हो इस शुभकामना के साथ मै इस नारे को दोहराना चाहूँगा-


'धरती बांटी,अंबर बांटा ,बाँट दिया भगवान को । 
दुनिया की खुशहाली चाहो-अब न बांटो इंसान को । । '

Monday, February 28, 2011

चिकित्सा समाज सेवा है -व्यवसाय नहीं ------ विजय राजबली माथुर

 ब मैंने 'आयुर्वेदिक दयानंद मेडिकल कालेज,'मोहन नगर ,अर्थला,गाजियाबाद  से आयुर्वेद रत्न किया था तो प्रमाण-पत्र के साथ यह सन्देश भी प्राप्त हुआ था-"चिकित्सा समाज सेवा है-व्यवसाय नहीं".मैंने इस सन्देश को आज भी पूर्ण रूप से सिरोधार्य किया हुआ है और लोगों से इसी हेतु मूर्ख का ख़िताब प्राप्त किया हुआ है.वैसे हमारे नानाजी और बाबाजी भी लोगों को निशुल्क दवायें दिया करते थे.नानाजी ने तो अपने दफ्तर से अवैतनिक छुट्टी लेकर  बनारस जा कर होम्योपैथी की बाकायदा डिग्री हासिल की थी.हमारे बाबूजी भी जानने वालों को निशुल्क दवायें दे दिया करते थे.मैंने मेडिकल प्रेक्टिस न करके केवल परिचितों को परामर्श देने तक अपने को सीमित रखा है.इसी डिग्री को लेकर तमाम लोग एलोपैथी की प्रेक्टिस करके मालामाल हैं.एलोपैथी हमारे कोर्स में थी ,परन्तु इस पर मुझे भी विशवास नहीं है.अतः होम्योपैथी और आयुर्वेदिक तथा बायोकेमिक दवाओं का ही सुझाव देता हूँ.


एलोपैथी चिकित्सक अपने को वरिष्ठ मानते है और इसका बेहद अहंकार पाले रहते हैं.यदि सरकारी सेवा पा गये तो खुद को खुदा ही समझते हैं.जनता भी डा. को दूसरा भगवान् ही कहती है.आचार्य विश्वदेव जी कहा करते थे -'परहेज और परिश्रम' सिर्फ दो ही वैद्द्य है जो इन्हें मानेगा वह कभी रोगी नहीं होगा.उनके प्रवचनों से कुछ चुनी हुयी बातें यहाँ प्रस्तुत हैं-

उषापान-उषापान करके पेट के रोगों को दूर कर निरोग रहा जा जा सकता है.इसके लिए ताम्बे के पात्र में एक लीटर पानी को उबालें और ९९० मि.ली.रह जाने पर चार कपड़ों की तह बना कर छान कर ताम्बे के पात्र में रख लें इसी अनुपात में पानी उबालें.प्रातः काल में सूर्योदय से पहले एक ग्लास से प्रारम्भ कर चार ग्लास तक पियें.यही उषा पान है.

बवासीर-बवासीर रोग सूखा  हो या खूनी दस से सौ तक फिर सौ से दस तक पकी निम्बोली का छिलका उतार कर प्रातः काल निगलवा कर कल्प करायें,रोग सदा के लिए समाप्त होगा.

सांप का विष-सांप द्वारा काटने पर उस स्थान को कास कर बाँध दें,एक घंटे के भीतर नीला थोथा तवे पर भून कर चने के बराबर मात्रा में मुनक्का का बीज निकल कर उसमें रख कर निगलवा दें तो विष समाप्त हो जायेगा.
बिच्छू दंश-बिच्छू के काटने पर (पहले से यह दवा तैयार कर रखें) तुरंत लगायें ,तुरंत आराम होगा.दवा तैयार करने के लिये बिच्छुओं को चिमटी से जीवित पकड़ कर रेक्तीफायीड स्प्रिट में डाल दें.गलने पर फ़िल्टर से छान कर शीशी में रख लें.बिच्छू के काटने पर फुरहरी से काटे स्थान पर लगायें.

डायबिटीज-मधुमेह की बीमारी में नीम,जामुन,बेलपत्र की ग्यारह-ग्यारह कोपलें दिन में तीन बार सेवन करें अथवा कृष्ण गोपाल फार्मेसी ,अजमेर द्वारा निर्मित औषधियां  -(१)शिलाज्लादिव्री की दो-दो गोली प्रातः-सायं दूध के साथ तथा (२) दोपहर में गुद्च्छादिबूरीके अर्क के साथ सेवन करें.

थायराड-इस रोग में दही,खट्टे ,ठन्डे,फ्रिज के पदार्थों से परहेज करें.यकृतअदि लौह पानी के साथ तथा मंडूर भस्म शहद के सेवन करें.लाभ होगा.

श्वेत दाग-श्वेत्रादी रस एक-एक गोली सुबह -शाम बापुच्यादी चूर्ण पानी से सेवन करें.
(मेरी राय में इसके अतिरिक्त बायोकेमिक की साईलीशिया 6 X का 4 T D S  सेवन शीघ्र लाभ दिलाने में सहायक होगा)

आज रोग और प्रदूषण वृद्धि  क्यों?-आचार्य विश्वदेव जी का मत था कि नदियों में सिक्के डालने की प्रथा आज फिजूल और हानिप्रद है क्योंकि अब सिक्के एल्युमिनियम तथा स्टील के बनते हैं और ये धातुएं स्वास्थ्य के लिये हानिप्रद हैं.जब नदियों में सिक्के डालने की प्रथा का चलन हुआ था तो उसका उद्देश्य नदियों के जल को प्रदूषण-मुक्त करना था.उस समय सिक्के -स्वर्ण,चांदी और ताम्बे के बनते थे और ये धातुएं जल का शुद्धीकरण करती हैं.अब जब सिक्के इनके नहीं बनते हैं तो लकीर का फ़कीर बन कर विषाक्त धातुओं के सिक्के नदी में डाल कर प्रदूषण वृद्धी नहीं करनी चाहिए.

 नदी जल के प्रदूषित होने का एक बड़ा कारण आचार्य विश्वदेव जी मछली -शिकार को भी मानते थे.उनका दृष्टिकोण था कि कछुआ और मछली जल में पाए जाने वाले बैक्टीरिया और काई को खा जाते थे जिससे जल शुद्ध रहता था.परन्तु आज मानव इन  प्राणियों  का  शिकार कर लेता है जिस कारण नदियों का जल प्रदूषित रहने लगा है.

क्षय रोग की त्रासदी-आचार्य विश्वदेव जी का दृष्टिकोण था कि मुर्गा-मुर्गियों का इंसानी भोजन के लिये शिकार करने का ही परिणाम आज टी.बी.त्रासदी के रूप में सामने है.पहले मुर्गा-मुर्गी घूरे,कूड़े-करकट से चुन-चुन कर कीड़ों का सफाया करते रहते थे.टी.बी. के थूक,कफ़ आदि को मुर्गा-मुर्गी साफ़ कर डालता था तो इन रोगों का संक्रमण नहीं हो पाटा था.किन्तु आज इस प्राणी का स्वतंत्र घूमना संभव नहीं है -फैशनेबुल लोगों द्वारा इसका तुरंत शिकार कर लिया जाता है.इसी लिये आज टी. बी. के रोगी बढ़ते जा रहे हैं.

क्या सरकारी और क्या निजी चिकित्सक आज सभी चिकित्सा को एक व्यवसाय के रूप में चालक रहे हैं.आचार्य विश्वदेव जी समाज सेवा के रूप में अपने प्रवचनों में रोगों और उनके निदान पर प्रकाश डाल कर जन-सामान्य के कल्याण की कामना किया करते थे और काफी लोग उनके बताये नुस्खों से लाभ उठा कर धन की बचत करते हुए स्वास्थ्य लाभ करते थे जो आज उनके न रहने से अब असंभव सा हो गया है.


विश्व देव  के एक प्रशंसक के नाते मैं "टंकारा समाचार",७ अगस्त १९९८ में छपे मेथी के औषधीय गुणों को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ.अभी ताजी मेथी पत्तियां बाजार में उपलब्ध हैं आप उनका सेवन कर लाभ उठा सकते हैं.मेथी में प्रोटीन ,वसा,कार्बोहाईड्रेट ,कैल्शियम,फास्फोरस तथा लोहा प्रचुर मात्रा  में पाया जाता है.यह भूख जाग्रत करने वाली है.इसके लगातार सेवन से पित्त,वात,कफ और बुखार की शिकायत भी दूर होती है.
पित्त दोष में-मेथी की उबली हुयी पत्तियों को मक्खन में तल  कर खाने से लाभ होता है.

गठिया में-गुड,आटा और मेथी से बने लड्डुओं से सर्दी में लाभ होता है.


प्रसव के बाद-मेथी बीजों को भून कर बनाये लड्डुओं के सेवन से स्वास्थ्य-सुधार तथा स्तन में दूध की मात्र बढ़ती है.


कब्ज में-रात को सोते समय एक छोटा चम्मच मेथी के दाने निगल कर पानी पीने से लाभ होता है.यह
एसीडिटी ,अपच,कब्ज,गैस,दस्त,पेट-दर्द,पाचन-तंत्र की गड़बड़ी में लाभदायक है.

आँतों की सफाई के लिये-दो चम्मच मेथी के दानों को एक कप पानी में उबाल कर छानने के बाद चाय बना कर पीने से लाभ होता है.

पेट के छाले-दूर करने हेतु नियमित रूप से मेथी का काढ़ा पीना चाहिए.

बालों का गिरना-रोकने तथा बालों की लम्बाई बढ़ने के लिये दानों के चूर्ण का पेस्ट लगायें.

मधुमेह में-मेथी पाउडर का सेवन दूध के साथ करना चाहिए.
मुंह के छाले-दूर करने हेतु पत्ते के अर्क से कुल्ला करना चाहिए.

मुंह की दुर्गन्ध -दूर करने हेतु दानों को पानी में उबाल कर कुल्ला करना चाहिए.

आँखों के नीचे का कालापन -दूर करने के लिये दानों को पीस कर पेस्ट की तरह लगायें.

कान बहना-रोकने हेतु दानों को दूध में पीस कर छानने के बाद हल्का गर्म करके कान में डालें.

रक्त की कमी में-दाने एवं पत्तों का सेवन लाभकारी है.

गर्भ-निरोधक-मेथी के चूर्ण तथा काढ़े से स्नायु रोग,बहु-मूत्र ,पथरी,टांसिल्स,रक्त-चाप तथा मानसिक तनाव और सबसे बढ़ कर गर्भ-निरोधक के रूप में लाभ होता है.

आज के व्यवसायी करण के युग में निशुल्क सलाह देने को हिकारत की नजर से देखा जाता है.आप भी पढ़ कर नजर-अंदाज कर सकते हैं.