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Monday, June 1, 2020

हर मदद से दूर छोटे व्यापारी लॉकडाउन में लाचार जनता बेचारी ------ गोपाल अग्रवाल



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लॉकडाउन में हर मदद से दूर छोटे व्यापारी


 ------ गोपाल अग्रवाल

लॉकडाउन से पहले खरीदे गए माल के भुगतान के वादे बिक्री ना होने के कारण पूरे नहीं हो पा रहे हैं, जिसके चलते बैंकों में चेक बाउंस हो रहे हैं
अचानक लगे लॉकडाउन में श्रमिकों के ऊपर ही नहीं, देश के कोने-कोने में फैले दो करोड़ छोटे और मंझोले दुकानदारों पर भी पहाड़ टूटा है। इनकी दुकानों से करीब दस करोड़ लोगों के परिवार भी चलते हैं। लॉकडाउन के चलते इनके फाके करने की नौबत आ चुकी है। व्यापारियों के इस वर्ग में नुक्कड़ पर चलने वाली दुकानों से लेकर सालाना पांच करोड़ के टर्नओवर वाले व्यापारी हैं। इनके व्यापार का आधार रोजाना बिक्री के बदले चेक या कैश में मिले धन का सर्कुलेशन है, जिससे पुराना उधार चुकता होता है और नया माल आता है। आम तौर पर इनकी 20 से 40 फीसद पूंजी पर्सनल या बैंकों के लोन की होती है, जिस पर इन्हें 12 से 20 प्रतिशत तक का ब्याज देना होता है।

लॉकडाउन की घोषणा के बाद इन्हें अगर हफ्ते भर का भी वक्त मिल जाता तो जल्दी खराब होने वाली चीजों को या तो हटा लिया जाता या सस्ते में बेच दिया जाता। मगर ऐसा नहीं हुआ जिसके चलते पान-तंबाकू, बेकरी के सामान, ढाबे, मिठाइयां व नमकीन आदि की दुकानों का कच्चा-पक्का सब माल नष्ट हो गया। राष्ट्रीय स्तर पर कई हजार करोड़ की स्टॉक की बर्बादी हुई जो पूंजी की सीधी क्षति है। बंद पड़ी दुकानों में दीमक और फंगस से भी खूब स्टॉक बर्बाद हुआ। चूहों ने कपड़ों, किताबों व प्लास्टिक आदि के सामान को कुतर कर बेकार किया तो सूखे मेवे की दुकानों का तो सत्यानाश कर दिया। काजू को छोड़ बाकी सभी मेवे आजकल सिंथेटिक बैग में ही आते हैं। इसी तरह ऐसे खाद्य पदार्थ, जिनका भंडारण कम तापमान पर किया जाता है, वे तो पूरी तरह से नष्ट हो चुके हैं। लॉकडाउन में सरकार ने व्यापारियों की इस मांग को भी अनसुना कर दिया कि उन्हें हफ्ते में एक दिन दस मिनट के लिए दुकान खोल कर सफाई कर लेने दी जाए।

स्टॉक के सत्यानाश के बाद अगर प्रत्यक्ष लॉस को देखें तो दुकान के तमाम खर्चों में बिजली, दुकान-गोदाम किराया, कर्मचारी का वेतन, टेलिफोन व इंटरनेट आदि के मासिक भुगतान ऐसे खर्चे हैं, जो बिक्री हो या ना हो, व्यापारी को देने ही हैं। व्यापारियों को आशा थी कि सरकार बंदी अवधि का बिजली बिल माफ करेगी, लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ। व्यापारी सबसे अधिक निराश तो 20 लाख करोड़ के पैकेज से हुए, जिसमें वे कहीं भी नहीं हैं। व्यापारियों को आशा थी कि सहायता न सही, सरकार लॉकडाउन के वक्फे का ब्याज ही माफ करेगी, लेकिन सरकार ने ऐसी किसी घोषणा से उन्हें कोसों दूर रखा है। उधर एमएसएमई में सरकार ने हालांकि आशा के अनुकूल मदद नहीं की, फिर भी उनके उद्योगों में उनके बैंक लोनों की मर्यादित सीमा में 20 फीसद का इजाफा करने का बैंकों को निर्देश दिया है। व्यापारी-दुकानदार वर्ग तो इससे भी वंचित रह गया।

पिछले दस सालों में देखें तो हर राजनीतिक पार्टी ने अपने ध्रुवीकरण के लिए इन व्यापारियों का जमकर इस्तेमाल किया है, इसलिए व्यापारियों का बहुसंख्यक वर्ग यह मानकर चल रहा था कि उनको केंद्र सरकार उपेक्षित नहीं रखेगी।

दुकानें खुलने से पहले ही व्यापारी वर्ग नकदी के संकट से जूझ रहा है। व्यापारियों की यह मांग उचित है कि सरकार बिक्री के अनुपात में 20 प्रतिशत की तरल नगदी दो वर्ष के लिए ब्याज मुक्त कर्ज के रूप में दे। क्योंकि लॉकडाउन से पहले खरीदे गए माल के भुगतान के वादे बिक्री न होने के कारण पूरे नहीं हो पा रहे हैं, जिसके चलते बैंकों में चेक बाउंस हो रहे हैं। इसकी वजह से संभावना है कि बाजार खुलने पर उधार मिलना बंद हो सकता है क्योंकि चेक बाउंस होने पर अधिकांश कंपनियां उधार देना बंद कर देती हैं।

नुकसान का आकलन तो लॉकडाउन खोलने के बाद एक-दो माह तक आएगा, लेकिन यह निश्चित है कि दुकानों के दो माह से कोरे पड़े बही-खातों को अपनी गति पकड़ने में एक वर्ष लग जाएगा। दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि जीडीपी में 10 प्रतिशत का सहयोग करने वाला व्यापारी वर्ग इस बार यह मदद नहीं कर पाएगा क्योंकि वह खुद हेल्पलेस है।


(लेखक व्यापारी नेता हैं।)

http://epaper.navbharattimes.com/details/111114-82997-1.html






 ~विजय राजबली माथुर ©

Tuesday, September 3, 2019

रिजर्व बैंक ने दांव पर लगाया अपना भविष्य ------ भरत झुनझुनवाला




http://epaper.navbharattimes.com/details/57310-77040-2.html






  

संकटकालीन बचत का एक हिस्सा सरकार को देकर सरकार के बैंकर ने अपने हाथ बांध लिए हैं
व्यापारी अपने प्रॉफिट का एक हिस्सा ‘रिजर्व’ में डालता है, जैसे बैंक के फिक्स्ड डिपॉजिट में अथवा सोना खरीदने में। इस रकम का उपयोग वह संकट के समय करता है। प्रॉफिट के दूसरे हिस्से से व्यापारी अपने घर का खर्च चलाता है या दुकान को बढ़ाता है या किसी और काम में निवेश करता है। व्यापारी को तय करना होता है कि मुनाफे में से कितना अंश वह रिजर्व में रखेगा और कितना अंश वर्तमान में खपत अथवा निवेश के लिए उपयोग करेगा। इसी तरह रिजर्व बैंक को हर साल प्रॉफिट होता है। उस प्रॉफिट का एक हिस्सा रिजर्व बैंक रिजर्व में डाल देता है जैसे सोना, विदेशी बांड, सरकारी बांड अथवा अन्य निवेशों में। इस निवेश का उपयोग रिजर्व बैंक किसी भी संभावित संकट के समय कर सकता है। प्रॉफिट का शेष अंश वह भारत सरकार को लाभांश के रूप में दे सकता है।• तरल पूंजी नहीं 

संकट के समय यह प्रक्रिया पलट जाती है। रिजर्व बैंक पूर्व में बनाए गए रिजर्व से पैसा निकाल कर देश की अर्थव्यवस्था को संभालने में उसका उपयोग कर सकता है। जैसे बैंकों पर यदि संकट आया तो उन्हें मदद देने के लिए रिजर्व बैंक अपने रिजर्व का इस्तेमाल कर सकता है। पिछले पांच वर्षों में रिजर्व बैंक ने अपने रिजर्व में धन डालना बंद कर दिया है। वर्ष 2012 में रिजर्व बैंक ने 27,000 करोड़ रुपये रिजर्व में डाले, वर्ष 2013 में 28,000 करोड़ रुपये डाले लेकिन वर्ष 2014 के बाद रिजर्व बैंक ने अपने रिजर्व में रकम डालना पूर्णतया बंद कर दिया है। इतना ही नहीं, जो रिजर्व थे, उनमें से 52,000 करोड़ की रकम निकालकर भी इस वर्ष सरकार को दे दिया है। 

रिजर्व बैंक ने आकलन किया कि उसके पास जरूरत से अधिक रिजर्व उपलब्ध हैं और उस अनावश्यक रिजर्व को उसने भारत सरकार को दे दिया। भारत सरकार ने रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर बिमल जालान की अध्यक्षता में एक कमेटी बनायी थी, जिसने कहा था कि रिजर्व बैंक को अपनी कुल पूंजी का 24.5 से 20.0 प्रतिशत तक रिजर्व रखना चाहिए। वर्तमान में रिजर्व बैंक के रिजर्व 23.3 प्रतिशत थे। ये जालान समिति द्वारा बताए गए दायरे में थे लेकिन रिजर्व बैंक ने निर्णय किया कि इन्हें 23.3 प्रतिशत से घटाकर 20.0 प्रतिशत के न्यूनतम स्तर पर ले जाया जाए। ऐसा करने पर बची 52,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त रकम को रिजर्व बैंक ने इस वर्ष भारत सरकार को हस्तांतरित किया है। रिजर्व बैंक दवारा अपने रिजर्वों को पर्याप्त मानने के पीछे उसकी सोच में आया एक मौलिक परिवर्तन है। 

भारतीय रिजर्व बैंक के रिजर्व दो प्रकार के होते हैं। पहला सोना, अमेरिकी सरकार के बांड, विदेशी करेंसी इत्यादि हैं। दूसरी श्रेणी में भारत सरकार के बांड अथवा अन्य घरेलू निवेश आते है। इनमें पहले प्रकार के रिजर्व को वास्तविक रिजर्व मानने में संकट है क्योंकि इन्हें तात्कालिक आवश्यकता के अनुसार नगदी में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। जैसे भारी मात्रा में सोना बेचने से अंतराष्ट्रीय बाज़ार में सोने के दाम गिर जाएंगे। कुछ वर्ष पूर्व कई देशों ने अपने सोने का भंडार बेचा था और विश्व बाजार में सोने के दाम गिर गए थे। 

निकट भविष्य में अगर कभी ऐसी नौबत आई तो इन रिजर्व की वास्तविक कीमत आज से बहुत कम हो जाएगी। अमेरिकी सरकार के बांड बेचने से भारत और अमेरिका के सामरिक संबंधों पर प्रभाव पड़ेगा। इसलिए इन पूंजियों को तरल नहीं माना जा सकता है। पर इन्हें ही रिजर्व मानकर रिजर्व बैंक ने अपने रिजर्वों की मात्रा कम कर दी है जिससे कि वह सरकार को अधिक से अधिक रकम मुहैया करा सके। 

रिजर्व बैंक के इस कदम से कई प्रकार के संकट उत्पन्न हो गए हैं। पहली बात यह कि अब तक प्रॉफिट का एक हिस्सा भविष्य के संकटों को संभालने के लिए रिजर्व में डाला जाता रहा है। अब उस नीति को पलटकर पूर्व में अर्जित रिजर्व का उपयोग वर्तमान खर्चों को पोषित करने के लिए किया जाने लगा है। जैसे व्यापारी घर के सोने को बेच कर फाइव स्टार होटल में ऐयाशी करे। यह देश की अर्थव्यवस्था के संकट को इंगित करता है। 

दूसरे, पिछले पांच वर्षों में सरकार को रिजर्व बैंक से मिले लाभांश का उपयोग सराहनीय नहीं रहा है। सरकार ने अपने कुल घाटे यानी वित्तीय घाटे में सराहनीय कटौती हासिल की है। हमारा कुल घाटा जीडीपी का सात प्रतिशत था जो वर्तमान में लगभग तीन प्रतिशत हो गया है। लेकिन यह कमी मुख्यत: पूंजी खर्चों में कटौती करके हासिल की गई है। पूंजी खर्चों में कटौती से तीन प्रतिशत वित्तीय घाटा कम हुआ है जबकि चालू खर्चों में कटौती से केवल एक प्रतिशत कम हुआ है। 

यह बताता है कि सरकार अपने चालू खर्चों पर नियंत्रण करने में नाकाम है और इन्हें पोषित करने के लिए रिजर्व बैंक द्वारा वितरित लाभांश का उपयोग किया जाएगा।

 तीसरे, जालान कमिटी ने 24.5 से 20.0 प्रतिशत तक रिजर्व रखना उचित माना था, लेकिन रिजर्व बैंक ने इसको मध्य स्तर पर रखने के स्थान पर न्यून स्तर पर रखा है, यानी हमारा सुरक्षा कवच न्यून हो गया है।

 चौथे, रिजर्व का विदेशी हिस्सा त्वरित रूप से नगद में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है, इसलिए संकट के समय देश की परिस्थिति और गंभीर हो जाएगी।

 • क्षितिज पर संकट : 


पांचवें, वर्तमान अर्थव्यवस्था में कई प्रकार के संकट क्षितिज पर दिख रहे हैं। पकिस्तान से हमारे संबंध बिगड़ रहे हैं, ईरान से सस्ता तेल आयात करने में संकट है, बैंकों के खटाई में पड़े लोन बढ़ रहे हैं, अर्थव्यवस्था में मंदी बढ़ रही है, इत्यादि। इन परिस्थितियों से जूझने के लिए हमें रिजर्व की अधिक जरूरत पड़ेगी न कि कम। सरकार ने अपने तात्कालिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए रिजर्व बैंक को इस दिशा में प्रेरित किया है और सरकार के दबाव में रिजर्व बैंक ने देश के भविष्य को दांव पर लगाया है। 




~विजय राजबली माथुर ©