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Thursday, August 30, 2012

सीमा आज़ाद ,जनता और सच्चाई

            हिंदुस्तान ,लखनऊ,29 अगस्त 2002,पृष्ठ-08

"हमे पकड़ने के बाद तत्कालीन प्रदेश सरकार ने कथित माओवादी खात्मे के नाम पर आठ हजार करोड़ 

का पेकेज लिया "---सीमा आज़ाद 

"एक दो नहीं हमे लगता है कि सारे कानून काले हैं"---विश्वविजय (मानवाधिकार कार्यकर्ता और सीमा आज़ाद के पति)

"अनेक राज्यों मे आंदोलनों को कुचलने के लिए सेना का इस्तेमाल किया जाता है। सेना के  साथ  अगर हैं तो देश भक्त हैं ... अगर नहीं हैं तो राष्ट्र द्रोही । "---आलोचक वीरेंद्र यादव 

एक साक्षात्कार मे सीमा आज़ाद ने यह भी बताया -सरकारें जल-जंगल-जमीन हड़पने के लिए कानून बना रही हैं ,जिसका लोग कडा विरोध कर रहे हैं। उनका साथ हमारे जैसे सामाजिक कार्यकर्ता दे रहे हैं । ऐसे मे राज्य के खिलाफ माहौल बन रहा है। उस पर काउंटर करने के लिए राज्य आक्रामक हो रहा है और लोकतन्त्र की धज्जियां उड़ा रहा है। उन्होने यह भी बताया कि पहले राज्य आम लोगों के लिए कार्य करता था । अब उसकी पहली प्राथमिकता मे प्राकृतिक संसाधनों की लूट करने वाले कारपोरेट घराने हैं। इसमे रोड़ा बनने वालों को दबाने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं।

भुक्तभोगी जुझारू कार्यकर्ताओं एवं आलोचक-विश्लेषक विद्वान के उपरोक्त कथनों के संबंध मे यदि ऐतिहासिक विवेचन किया जाये तो हम पाते हैं कि 65 वर्ष पूर्व जब भारत वर्ष स्वाधीन हुआ था तो यहाँ सुई भी नहीं बनती थी और आज हमारे यहाँ वायु यान ही नही,अस्त्र-शस्त्र ही नहीं राकेट,मिसाईल,परमाणु बम तक बन रहे हैं। आज़ादी के बाद कल-कारखानों का विकास हुआ है। किन्तु जनता की सुख-सुविधाएं पहले से भी ज़्यादा घटी हैं।'आसमान से टपका -खजूर मे अटका' की तर्ज पर सम्पूर्ण विकास का लाभ कुछ चुनिन्दा लोगों तक ही सिमट कर रह गया है और शेष जनता वैसे ही त्राही-माम,त्राही-माम करने को विवश है। हमारी शासन व्यवस्था राजनीतिक रूप से लोकतान्त्रिक है परंतु जब शोषित -दमित जनता एक जुट होकर अपने अधिकारों की रक्षा की बात करती है तब चुनी हुई सरकारें ही भ्रष्ट-व्यापारियों,उद्योगपतियों,देशी-विदेशी निवेशकों,कारपोरेट घरानों के इशारे पर आम जनता का दमन करने हेतु पुलिस और सेना का सहारा लेती हैं। एक बहाना गढ़ लिया गया है माओवादी आतंकवाद का। सच्चाई यह है कि CIA अमेरिकी कारपोरेट हितों की रक्षा के लिए कुछ प्रशिक्षित आतंकवादियों को धन व शस्त्र मुहैया कराकर पुलिस व सेना पर आघात कराती है जिससे सरकारों को उनके सफाये के नाम पर गरीब असहाय जनता का दमन करने हेतु पुलिस व सेना का प्रयोग करना जायज ठहराया जा सके।

शोषक कारपोरेट घरानों का विरोध करने के कारण ही सीमा आज़ाद और उनके पति को ढाई वर्ष तक जेल मे बंद रखा गया और उनको आजीवन कैद की सजा सुना दी गई परंतु अलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसी माह की छह तारीख को निर्णय दिया कि विपरीत विचार रखने के कारण किसी को जेल मे नहीं रखा जा सकता और दोनों को जमानत पर रिहा कर दिया। ऐसे लगभग दस हजार कार्यकर्ता पूरे देश मे जेलों मे बंद हैं। क़ानूनों का खुला दुरुपयोग किया गया है और सभी मुकदमा लड़ते हुये हाई कोर्ट तक नहीं पहुँच पाते उनकी जिंदगी जेलों मे सड़ जाती है। बाकी लोग भय से चुप रह जाते हैं।

जल-जंगल-ज़मीनों की लूट मे एक दूसरा पहलू पर्यावरण का भी है उसकी भी अनदेखी की जा रही है। प्रकृति की निर्मम लूट का दुष्परिणाम मौसम पर भी पड़ता है जिससे फसलों को क्षति पहुँचती है। खाद्यान का आभाव हो जाता है और मुनाफाखोर व्यापारी जनता का और अधिक शोषण करते हैं। मुश्किल और मुसीबत यह है कि जनता को यह सब समझाये कौन?

जो लोग और पार्टियां जन-हितैषी हैं उनको एक भूत सवार है कि वे 'नास्तिक' हैं और 'धर्म' तथा 'भगवान' को नहीं मानते। दूसरी ओर सांप्रदायिक लोग (सांप्रदायिकता और साम्राज्यवाद सहोदरी हैं) धर्म की व्याख्या व्यापारियों -लुटेरों के हित मे प्रस्तुत करके उसी गरीब-शोषित जनता को उनके विरुद्ध कर देते हैं जो उनके हकों की लड़ाई लड़ रहे होते हैं। इसलिए भी माओवाद के नाम का सहारा लिया जाता है। 

फिर क्या हो?

होना यह चाहिए कि जनवादी शक्तियों को एकजुट होकर आम जनता को यह समझाना चाहिए कि 'धर्म' वह नही है जो ढ़ोंगी पोंगा-पंथी बता रहे हैं। बल्कि धर्म वह है जो शरीर को धारण करने हेतु आवश्यक है,जैसे-'सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।

भगवान कभी भी नस और नाड़ी के बंधन मे नहीं बधता है इसलिए वह भगवान या उसका अवतार नही है जिसे  पोंगापंथी लुटेरे बताते हैं। भ (भूमि-प्रथिवी )+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल) का समुच्य ही भगवान है और चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं किसी ने बनाए नहीं हैं इसलिए ये ही खुदा हैं। इंका काम प्राणी मात्र का सृजन,पालन  और संहार है =G(जेनरेट)+O (आपरेट)+D(डेसट्राय)  अतः ये ही GOD हैं।

समस्या की जड़ यहीं है कि 'मार्क्स भगवान' कह गए हैं कि man has created the GOD for his mental security only तब उनके अंध-भक्त मार्क्सवादी-साम्यवादी कैसे जनता को 'धर्म' और 'भगवान' की वास्तविकता समझाएँ?

जनता लुटती-पिटती रहेगी ,सीमा आज़ाद उनके पति विश्वविजय और हजारों निरीह कार्यकर्ता बेकसूर जेलों मे बंद किए जाते रहेंगे। सांप्रदायिक तत्व धर्म के नाम पर धोखा परोस कर व्यापारियों,उद्योगपतियों और कारपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाते रहेंगे। काश जनवादी-साम्यवादी-बामपंथी समय की पुकार को समझ सकें?

Monday, August 20, 2012

वैज्ञानिक परम्पराएँ-वेद और हवन ------ विजय राजबली माथुर

हमारे देश मे एक फैशन चलता है कि हमारा देश एक पिछड़ा हुआ देश है और यहाँ ज्ञान,विज्ञान जो आया वह पश्चिम की देंन है। आज़ादी के एक लंबे अरसे बाद भी गुलामी की बू लोगों के दिलों से अभी निकली नहीं है। प्रस्तुत स्कैन आप देख रहे हैं उसमे आधुनिक अनुसंधान के आधार पर देश मे प्रचलित कुछ प्राचीन  परम्पराओं को विज्ञान -सम्मत बताया गया है।

मैक्स मूलर साहब जर्मनी से भारत आकर यहाँ 30 वर्ष रहे और संस्कृत सीख कर  मूल पांडुलिपियाँ लेकर जर्मनी रवाना हो गए। जर्मनी भाषा मे उनके अनुवादों को पढ़ कर वहाँ अनुसंधान हुये *-होमियोपैथी,बायोकेमिक चिकित्सा पद्धतियों को वहाँ ईजाद किया गया जो एलोपेथी  से श्रेष्ठ हैं। परमाणु तथा दूसरे आयुधों का आविष्कार भी वेदोक्त ज्ञान से वहाँ हुआ। जर्मनी की द्वितीय विश्व युद्ध मे पराजय के बाद अमेरिका और रूस ने इन परमाणु वैज्ञानिकों को अपने-अपने देश मे लगा लिया। अमेरिका ने सबसे पहले जापान की आत्म समपर्ण की घोषणा के बाद रूस को डराने के लिए 06 और 09 अगस्त को परमाणु बमो का प्रहार किया।

जर्मनी आदि पाश्चात्य देशों ने षड्यंत्र पूर्वक भारत मे यह प्रचार किया कि,'वेद गड़रियों के गीत 'के सिवा कुछ भी नहीं हैं (जबकि ये ही देश खुद वेद-ज्ञान का लाभ उठा कर खुद को विज्ञान का आविष्कारक बताते रहे)। हमारे देश के पाश्चात्य समर्थक विद्वान चाहे वे दक्षिण पंथी हों या प्रगतिशील बामपंथी दोनों ही साम्राज्यवादी इतिहासकारों के 'भटकाव' को ज्ञान-सूत्र मानते हैं जिसके अनुसार 'आर्य' मध्य यूरोप से घोड़ों पर सवार होकर भारत आए और यहाँ के 'मूल निवासियों' को दास बना लिया। इसी मान्यता के कारण देश मे आजकल एक साम्राज्यवाद पोषक आंदोलन 'मूल निवासियों देश को मुक्त करो' भी ज़ोर-शोर से चल रहा है। 

साम्राज्यवादी ब्रिटिश शासकों ने( जब सेफ़्टी वाल्व के रूप मे स्थापित कांग्रेस  आर्यसमाजियों के प्रभाव से 'राष्ट्र वादी आंदोलन चलाने लगी तब )अपने हितों की रक्षा हेतु RSS का गठन एक पूर्व क्रांतिकारी के माध्यम से कराया। RSS और मुस्लिम लीग ने देश को विभाजित करा दिया। आज भी नफरत की सांप्रदायिकता फैला कर साम्राज्यवादी अमेरिका को दोनों संप्रदायों के कुछ संगठन लाभ पहुंचा रहे हैं। RSS और इसके दूसरे सहायक संगठन 'गर्व से हिन्दू' की मुहिम चलाते हैं। प्रगतिशील-बामपंथी कहलाने वाले विद्वान भी हिन्दू,इस्लाम,ईसाइयत को ही धर्म मानते हैं और प्रकट मे धर्म की आलोचना तथा छिपे तौर पर उन सांप्रदायिक गतिविधियों का पालन करते हैं। 

धर्म =सत्य,अहिंसा (मनसा,वाचा,कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य के समुच्य को धर्म कहते हैं जो शरीर को धारण करने हेतु आवश्यक हैं। जो लोग 'धर्म' की आलोचना करते हैं वे इन सदगुणो का पालन न करने को प्रेरित करते हैं। इसी कारण 1917 मे सम्पन्न साम्यवादी क्रांति रूस मे विफल हो गई क्योंकि शासक पार्टी कार्यकर्ताओं और जनता का शोषण कर रहे थे। आज वहाँ समाज-सरकार द्वारा स्थापित उद्योग पूर्व शासकों ने अपने भ्रष्टाचार की कमाई से खरीद लिए हैं और पूंजीपति बन गए हैं। 

भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)। प्रकृति के ये पाँच तत्व ही संयुक्त रूप से 'भगवान' हैं चूंकि इनको किसी ने बनाया नहीं है और ये खुद ही बने हैं इसलिए ये ही 'खुदा' हैं।  इंनका कार्य G(जेनरेट)+O(आपरेट)+D(डेसट्राय) करना है इसलिए ये ही 'गाड ' हैं। जो भगवान=खुदा=गाड को दिमागी फितूर कहते हैं वे सच से आँखें मूँद लेने को ही कहते हैं। 

भगवान या खुदा या गाड =प्रकृति के पाँच तत्व । अतः इनकी पूजा का माध्यम केवल और केवल 'हवन' है। 'पदार्थ विज्ञान' =मेटेरियल साईन्स के मुताबिक अग्नि मे यह गुण है कि उसमे डाले गए पदार्थों को 'परमाणुओ' -'एटम्स' मे विभक्त कर देती है और वायु उन परमाणुओं को पर्यावरण मे प्रसारित कर देती है। अर्थात भगवान या खुदा या गाड को वे परमाणु प्राप्त हो जाते हैं क्योंकि ये तत्व सर्वत्र व्यापक हैं-घट-घट वासी हैं। इनके अतिरिक्त नदी,समुद्र,वृक्ष,पर्वत,आकाश,नक्षत्र,ग्रह आदि देवताओं को भी हवन द्वारा प्रसारित परमाणु प्राप्त हो जाते हैं। 'देवता' =जो देता है ,लेता नहीं है। अतः इन प्राकृतिक संसाधनो के अतिरिक्त और कोई देवता नहीं होता है। 

विवाद तभी शुरू होता है जब हिन्दू,इस्लाम,ईसाइयत  आदि के नाम पर 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' को धर्म की संज्ञा देकर पूजा जाता है। वस्तुतः व्यापारियों-उद्योगपतियों और शासकों ने मिल कर ये विभाजन अपने-अपने व्यापार को चमकाने हेतु समाज मे कर रखे हैं। प्रगतिशील-बामपंथी जनता को इन लुटेरे व्यापारियों के चंगुल से छुड़ाने हेतु 'धर्म' की वास्तविक व्याख्या प्रस्तुत करने के बजाए धर्म का विरोध करते हैं किन्तु पाखंड से उनको गुरेज नहीं है उसे वे भी धर्म ही पुकारते हैं। दमन जनता का होता है।

आज से 10 लाख वर्ष पूर्व जब मानव अपने वर्तमान स्वरूप मे आया तो प्रकृति के अनुरूप समाज मे पालन करने हेतु जो नियम बनाए गए वे ही 'वेद' हैं। वेद सभी समय के सभी मनुष्यों के लिए देश-काल के भेदभाव के बिना समान व्यवहार का मार्ग बताते हैं। शासकों और व्यापारियों ने अपने निजी स्वार्थ वश 'कर्मगत' वर्ण व्यवस्था को 'जन्मगत' जाति-व्यवस्था मे परिवर्तित करके शासितों का उत्पीड़न-शोषण किया। वेदोक्त परम्पराएँ विलुप्त हो गईं और समाज मे विषमता की खाई उत्पन्न हो गई। भारत मे विदेशी शासकों के आगमन पर उनके द्वारा यहाँ की जनता को 'हिन्दू' कह कर पुकारा गया जो फारसी भाषा मे एक गंदी और भद्दी गाली है। कुछ लोग अरबी भाषा के 'स ' को 'ह ' उच्चारण से जोड़ कर हिन्दू शब्द की हिमायत करते हैं तब भी यह विदेशियों की ही देंन साबित होता है। कुछ 'कुतर्क करने वाले  लोग ' हिन्दू शब्द की प्राचीनता टटोलते फिरते हैं,किन्तु ईरानियों के आने से पूर्व बौद्ध मठों,विहारों को उजाड़ने वाले उनके ग्रन्थों को जलाने वाले हिंसक लोगों को बौद्धों ने 'हिन्दू' की संज्ञा दी थी। 'हिन्दू' शब्द विदेशी और पूरी तरह से अभारतीय है। 'कुरान' की तर्ज पर विदेशी शासकों ने यहाँ के विद्वानों को 'सत्ता' व 'धन' सुख देकर 'पुराण' लिखवाये जो वेद-विपरीत हैं। किन्तु तथा कथित गर्व से हिन्दू लोग वेद और पुराण को गड्म गड करके गुमराह करते हैं और दुखद है कि प्रगतिशील बामपंथी भी उसी झूठ को मान्यता देते हैं। 

यू एस ए की राजधानी वाशिंगटन (DC) मे अग्निहोत्र यूनिवर्सिटी मे अनवरत 24 घंटे हवन चलता रहता है जिसके परिणामस्वरूप USA के क्ष्तिज पर बना ओज़ोन का छिद्र परिपूर्ण हो गया और वह सरक कर दक्षिण-पूर्व एशिया की तरफ आ गया है। इस क्षेत्र मे प्राकृतिक प्रकोपों का कारण यह ओज़ोन छिद्र ही है जो यू एस ए आदि पाश्चात्य देशों के कुकृत्य का कुफ़ल है। किन्तु हमारे बामपंथी भाई और प्रगतिशील पत्रकार जिनमे दैनिक जागरण के चेनल IBN 7वाले प्रमुख हैं 'हवन' का घोर विरोध करते हैं-व्यंग्य उड़ाते हैं। 

यदि हमे अपने देश 'भारत' को प्रकृतिक प्रकोपों से बचाना है,अपने नागरिकों को शुद्ध पर्यावरण उपलब्ध कराना है और परस्पर भाई-चारा उत्पन्न करना है तो 'वेदोक्त हवन' का सहारा लेना ही चाहिए। अन्यथा तो जो चल रहा है चलता रहेगा फिर रोना-झींकना क्यों?

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*वेदों के 'समष्टिवाद' का ही आधुनिक रूप है 'साम्यवाद' जिसका निरूपण किया जर्मनी के महर्षि कार्ल मार्क्स ने उन जर्मन ग्रन्थों के अवलोकन के पश्चात जो वेदों की मूल पांडु लिपियों से अनूदित थे। लेकिन भारतीय साम्यवादी विद्वान 'साम्यवाद' को पाश्चात्य विज्ञान मानते हैं और इसी मुगालते मे जनता से कटे रहते हैं। वस्तुतः 'साम्यवाद'='समष्टिवाद' मूल रूप से भारतीय अवधारणा है और इसे लागू भी तभी किया जा सकेगा जब हकीकत को समझ लिया जाएगा।

Thursday, January 26, 2012

गणतन्त्र कैसा?

Hindustan-Lucknow-24/01/2012

Hindustan-Lucknow-24/01/2012
उपरोक्त स्कैन कापियों को चित्र पर डबल क्लिक करके अवलोकन करें और दोनों मे समानता समझने का कष्ट करें। स्वाधीनता के 64 वर्ष और गणतन्त्र लागू हुये 62 वर्ष पूर्ण होने के बाद भी हमारे देश मे गुलामी की प्रतीक-प्रथा 'भ्रष्टाचार' इतना तीव्र है कि जिसके सामने 'आदमी' की जिंदगी के कोई माने नहीं हैं। क्या सिर्फ 'राजनीतिज्ञों का ही क़ुसूर है इस दुर्व्यवस्था के लिए जैसा कि कारपोरेट दलाल अन्ना/रामदेव का इल्जाम है?

तमाम धार्मिक कहे जाने वाले उत्सवों मे भगदड़ से असंख्य लोगों की जाने जाती रहती है उनको कौन प्रोत्साहित करता है?धर्म के ठेकेदार दलाल जो पुरोहित कहलाते हैं या 'राजनीतिज्ञ'?

मेरा यह सुदृढ़ अभिमत है कि भ्रष्टाचार चाहे वह धार्मिक है या आर्थिक-सामाजिक,जातीय या सांप्रदायिक सबके पीछे इन पुरोहितवादी दलालों की भूमिका है जो 'जोंक' और 'खटमल' की भांति परोपजीवी होते हैं। ऐसे ढ़ोंगी-पाखंडी जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ कर साम्राज्यवादी लुटेरों का खजाना भरते और खुद मौज उड़ाते हैं। जब तक इन परोपजीवी दलालों का आतंक रहेगा न आप भ्रष्टाचार दूर कर सकते हैं न ही निरपराध लोगों की जिंदगियों की रक्षा कर सकते हैं।

आज इस गणतन्त्र दिवस पर यह संकल्प लिए जाने की आवश्यकता है कि आसन्न विधानसभा चुनावों मे साम्राज्यवादियों-शोषकों,उतपीडकों को शिकस्त देने हेतु जहां भी बमपंथी/भाकपा प्रत्याशी हैं उन्हें प्रचंड बहुमत से विजयी बना कर विधानसभाओं मे भेजा जाए तभी 'भ्रष्टाचार' पर भी अंकुश लगाया जा सकेगा और बेगुनाहों को मौत के मुंह मे जाने से भी रोका जा सकेगा।







आपने देखा 15 अगस्त 2011 को ब्लैक आउट करने का आह्वान करके और राष्ट्रीय झंडे को कारपोरेट दलालों के बचाव मे बाजारू बना कर अन्ना और उसकी टीम ने कितना बड़ा राष्ट्रीय अपराध किया था-शहीदों की कुर्बानियों का उपहास स उड़ाया था । आज इस गणतन्त्र पर उसका हिसाब लेने की सख्त जरूरत है। भविष्य मे कोई सिर-फिरा फिर से राष्ट्रध्वज का अपमान न कर सके यह सुनिश्चित करना आम जनता का दायित्व है।


Monday, January 23, 2012

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ------ विजय राजबली माथुर








भारतीय स्वाधीनता आंदोलन मे नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम अमर है। उन्होने आजादी दिलाने मे महत्वपूर्ण भूमिका कैसे निभाई देखें इस लिंक मे-


ऊपर के वीडियो मे आपने नेताजी के उद्गार सुने ,नीचे देखिये कुछ और जरूरी बातें-







(चित्र साभार के के यादव जी )

नेता जी ने सर्वप्रथम 1943 मे तिरंगा पोर्ट ब्लेयर मे फहराया था उसी की स्मृति मे भारत सरकार ने यह डाक टिकट जारी किया था।


नेताजी की अपील -

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस से अलग होकर 'अग्रगामी दल' अर्थात 'फारवर्ड ब्लाक' बनाते समय भारत मे आजादी के बाद 'समाजवादी व्यवस्था' स्थापित करने की कल्पना की थी। वह रूसी साम्यवादी क्रान्ति से बहुत प्रभावित थे। उनके सपनों का भारत अभी तक नहीं बन पाया है। नेताजी द्वारा स्थापित फारवर्ड ब्लाक उत्तर प्रदेश विधान सभा के इन चुनावों मे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के साथ बाम मोर्चा मे शामिल है। आज नेताजी के जन्म दिवस पर हम सब को यह संकल्प लेना चाहिए कि अपने अमूल्य वोट द्वारा हम बाम पंथ को मजबूत करेंगे जो नेताजी को सच्ची श्रधानजलि भी  होगी।

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23-01-2017