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Monday, August 14, 2017

श्री कृष्ण और साम्यवाद ------ विजय राजबली माथुर

 
फोटो सौजन्य से डॉ सुजाता चौधरी 


 श्री कृष्ण का साम्यवाद विभेद नहीं करता । यह सभी को समान दृष्टि से देखता है। --- बृजेश शुक्ल 


Thursday, August 9, 2012
श्री कृष्ण -साम्यवाद और वेद विज्ञान ------ विजय राजबली माथुर
http://krantiswar.blogspot.in/2012/08/blog-post_9.html
ज़िला मंत्री-भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी,लखनऊ ने काउंसिल की एक बैठक मे श्री कृष्ण के बचपन की उस घटना का उल्लेख करते हुये कार्यकर्ताओं का आह्वान किया था कि हमे उनसे प्रेरणा लेकर संघर्ष पथ  पर बढ़ना चाहिए। कामरेड  जिलमंत्री ने स्पष्ट किया कि उस समय गावों का शहरों द्वारा शोषण चरम पर था और बालक श्री कृष्ण को यह गवारा न हुआ अतः उन्होने शहरों की ओर 'मक्खन' ले जाती ग्वालनों की मटकियाँ फोड़ने का कार्यक्रम अपने बाल साथियों के साथ चलाया था। 

योगीराज श्री कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन शोषण-उत्पीड़न और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करते हुये ही बीता किन्तु ढ़ोंगी-पोंगापंथी-पुरोहितवाद ने आज श्री कृष्ण के संघर्ष को 'विस्मृत' करने हेतु उनको अवतार घोषित करके उनकी पूजा शुरू करा दी। कितनी बड़ी विडम्बना है कि 'कर्म' पर ज़ोर देने वाले श्री कृष्ण के 'कर्मवाद' को भोथरा करने के लिए उनको अलौकिक बता कर उनकी शिक्षाओं को भुला दिया गया और यह सब किया गया है शासकों के शोषण-उत्पीड़न को मजबूत करने हेतु। अनपढ़ तो अनपढ़ ,पढे-लिखे मूर्ख ज़्यादा ढोंग-पाखंड मे उलझे हुये हैं।

तथा कथित प्रगतिशील साम्यवादी बुद्धिजीवी जिंनका नेतृत्व विदेश मे बैठे पंडित अरुण प्रकाश मिश्रा और देश मे उनके बड़े भाई पंडित ईश मिश्रा जी  करते हैं सांप्रदायिक तत्वों द्वारा निरूपित सिद्धांतों को धर्म मान कर धर्म को त्याज्य बताते हैं। जबकि धर्म=जो शरीर को धारण करने के लिए आवश्यक है वही 'धर्म' है;जैसे-सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य । अब यदि ढ़ोंगी प्रगतिशीलों की बात को सही मान कर धर्म का विरोध किया जाये तो हम लोगों से इन सद्गुणों को न अपनाने की बात करते हैं और यही कारण है कि सोवियत रूस मे साम्यवाद का पतन हो गया(सोवियत भ्रष्ट नेता ही आज वहाँ पूंजीपति-उद्योगपति हैं जो धन जनता और कार्यकर्ता का शोषण करके जमा किया गया था उसी के बल पर) एवं चीन मे जो है वह वस्तुतः पूंजीवाद ही है।दूसरी ओर थोड़े से  पोंगापंथी केवल 'गीता' को ही महत्व देते हैं उनके लिए भी 'वेदों' का कोई महत्व नहीं है। 'पदम्श्री 'डॉ कपिलदेव द्विवेदी जी कहते हैं कि,'भगवद  गीता' का मूल आधार है-'निष्काम कर्म योग'
"कर्मण्ये वाधिकारस्ते ....................... कर्मणि। । " (गीता-2-47)

इस श्लोक का आधार है यजुर्वेद का यह मंत्र-
"कुर्वन्नवेह कर्मा................... न कर्म लिपयाते नरो" (यजु.40-2 )

इसी प्रकार सम्पूर्ण बाईबिल का मूल मंत्र है 'प्रेम भाव और मैत्री' जो यजुर्वेद के इस मंत्र पर आधारित है-
"मित्रस्य मा....................... भूतानि समीक्षे।  ....... समीक्षा महे । । " (यजु .36-18)

एवं कुरान का मूल मंत्र है-एकेश्वरवाद-अल्लाह की एकता ,उसके गुण धर्मा सर्वज्ञ सर्व शक्तिमान,कर्त्ता-धर्त्तासंहर्त्ता,दयालु आदि(कुरान7-165,12-39,13-33,57-1-6,112-1-4,2-29,2-96,87-1-5,44-6-8,48-14,1-2,2-143 आदि )। 

इन सबके आधार मंत्र हैं-

1-"इंद्रम मित्रम....... मातरिश्चा नामाहू : । । " (ऋग-1-164-46)
2-"स एष एक एकवृद एक एव "। । (अथर्व 13-4-12)
3-"न द्वितीयों न तृतीयच्श्तुर्थी नाप्युच्येत। । " (अथर्व 13-5-16)


पहले के विदेशी शासकों ने हमारे महान नेताओं -राम,कृष्ण आदि को बदनाम करने हेतु तमाम मनगढ़ंत कहानियाँ यहीं के चाटुकार विद्वानों को सत्ता-सुख देकर लिखवाई जो 'पुराणों' के रूप मे आज तक पूजी जा रही हैं। बाद के अंग्रेज़ शासकों ने तो हमारे इतिहास को ही तोड़-मरोड़ दिया। यूरोपीय इतिहासकारों ने लिख दिया आर्य एक जाति-नस्ल थी जो मध्य यूरोप से भारत एक आक्रांता के रूप मे आई थी जिसने यहाँ के मूल निवासियों को गुलाम बनाया। इसी झूठ को ब्रह्म वाक्य मानते हुये 'मूल निवासियों भारत को आज़ाद करो' आंदोलन चला कर भारत को छिन्न-भिन्न करने का कुत्सित प्रयास चल रहा है। अंग्रेजों ने लिख दिया कि 'वेद गड़रियों के गीत हैं' और साम्राज्यवाद विरोधी होने का दंभ भरने वाले पंडित अरुण प्रकाश मिश्रा सरीखे उद्भट विद्वान उसी आधार पर वेदों को अवैज्ञानिक बताते नहीं थकते हैं।

जर्मनी के मैक्स मूलर साहब भारत आए और यहाँ 30 वर्षों तक रह कर 'संस्कृत' सीख कर वेदों को समझा एवं मूल पांडु लिपियाँ एकत्र कर चलते बने। जर्मन मे उनके अनुवाद किए गए फिर अङ्ग्रेज़ी आदि दूसरी भाषाओं मे जर्मन भाषा से अनुवाद हुये। हिटलर ने खुद को आर्य घोषित करते हुये दूसरों के प्रति नफरत फैलाई जो कि आर्यत्व के विपरीत है। 'आर्य'=श्रेष्ठ अर्थात वे स्त्री पुरुष जिनके आचरण और कार्य श्रेष्ठ हैं 'आर्य' है इसके विपरीत लोग अनार्य हैं। न यह कोई जाति थी न है।

'आर्य' सार्वभौम शब्द है और यह किसी देश-काल की सीमा मे बंधा हुआ नहीं है। आर्यत्व का मूल 'समष्टिवाद' अर्थात 'साम्यवाद' है। प्रकृति में संतुलन को बनाए रखने हेतु हमारे यहाँ यज्ञ -हवन किये जाते थे। अग्नि में डाले गए पदार्थ परमाणुओं में विभक्त हो कर वायु द्वारा प्रकृति में आनुपातिक रूप से संतुलन बनाए रखते थे.'भ'(भूमि)ग (गगन)व (वायु) ।(अनल-अग्नि)न (नीर-जल)को अपना समानुपातिक भाग प्राप्त होता रहता था.Generator,Operator ,Destroyer भी ये तत्व होने के कारण यही GOD है और किसी के द्वारा न बनाए जाने तथा खुद ही बने होने के कारण यही 'खुदा'भी है।  अब भगवान् का अर्थ मनुष्य की रचना -मूर्ती,चित्र आदि से पोंगा-पंथियों के स्वार्थ में कर दिया गया है और प्राकृतिक उपादानों को उपेक्षित छोड़ दिया गया है जिसका परिणाम है-सुनामी,अति-वृष्टि,अनावृष्टि,अकाल-सूखा,बाढ़ ,भू-स्खलन,परस्पर संघर्ष की भावना आदि-आदि.

एक विद्वान की इस प्रार्थना पर थोडा गौर करें -

ईश हमें देते हैं सब कुछ ,हम भी तो कुछ देना सीखें.
जो कुछ हमें मिला है प्रभु से,वितरण उसका करना सीखें..१ ..

हवा प्रकाश हमें मिलता है,मेघों से मिलता है पानी.
यदि बदले में कुछ नहीं देते,इसे कहेंगे बेईमानी..
इसी लिए दुःख भोग रहे हैं,दुःख को दूर भगाना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..२ ..

तपती धरती पर पथिकों को,पेड़ सदा देता है छाया.
अपना फल भी स्वंय न खाकर,जीवन उसने सफल बनाया..
सेवा पहले प्रभु को देकर,बाकी स्वंय बरतना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..३..

मानव जीवन दुर्लभ है हम,इसको मल से रहित बनायें.
खिले फूल खुशबू देते हैं,वैसे ही हम भी बन जाएँ..
जप-तप और सेवा से जीवन,प्रभु को अर्पित करना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..४..

असत नहीं यह प्रभुमय दुनिया,और नहीं है यह दुखदाई.
दिल-दिमाग को सही दिशा दें,तो बन सकती है सुखदाई ..
'जन'को प्रभु देते हैं सब कुछ,लेकिन 'जन'तो बनना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..५..

शीशे की तरह चमकता हुआ साफ़ है कि वैदिक संस्कृति हमें जन  पर आधारित अर्थात  समष्टिवादी बना रही है जबकि आज हमारे यहाँ व्यष्टिवाद हावी है जो पश्चिम के साम्राज्यवाद की  देन है। दलालों के माध्यम से मूर्ती पूजा करना कहीं से भी समष्टिवाद को सार्थक नहीं करता है,जबकि वैदिक हवन सामूहिक जन-कल्याण की भावना पर आधारित है। IBN 7 के पत्रकार हवन का विरोध पोंगापंथ को सबल बनाने हेतु करते है और दूसरे चेनल वाले भी। साम्राज्यवादी -विदेशी तो खुद को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए वेदों का विरोध करते ही हैं एवं उनके निष्कर्षों का लाभ लेकर उसे अपना आविष्कार बताते हैं।

ऋग्वेद के मंडल ५/सूक्त ५१ /मन्त्र १३ को देखें-

विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्निः स्वस्तये.
देवा अवन्त्वृभवः स्वस्तये स्वस्ति नो रुद्रः पात्व्हंससः ..

(जनता की कल्याण -कामना से यह यज्ञ  रचाया.
विश्वदेव के चरणों में अपना सर्वस्व चढ़ाया..)

जो लोग (अरुण प्रकाश मिश्रा -ईश मिश्रा जी और उनके चेले सरीखे )धर्म की वास्तविक व्याख्या को न समझ कर गलत  उपासना-पद्धतियों को ही धर्म मान कर चलते हैं वे अपनी इसी नासमझ के कारण ही  धर्म की आलोचना करते और खुद को प्रगतिशील समझते हैं जबकि वस्तुतः वे खुद भी उतने ही अन्धविश्वासी हुए जितने कि पोंगा-पंथी अधार्मिक होते हैं। 

ऋग्वेद के मंडल ७/सूक्त ३५/मन्त्र १ में कहा गया है-

शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शन्न इन्द्रावरुणा रातहव्या डे
शमिन्द्रासोमा सुविताय शंयो :शन्न इन्द्रा पूष्णा वाजसात..

(सूर्य,चन्द्र,विद्युत्,जल सारे सुख सौभाग्य बढावें.
रोग-शोक-भय-त्रास हमारे पास कदापि न आवें..)

वेदों में किसी व्यक्ति,जाति,क्षेत्र,सम्प्रदाय,देश-विशेष की बात नहीं कही गयी है.वेद सम्पूर्ण मानव -सृष्टि की रक्षा की बात करते हैं.इन्हीं तत्वों को जब मैक्समूलर साहब जर्मन ले गए तो वहां के विचारकों ने अपनी -अपनी पसंद के क्षेत्रों में उनसे ग्रहण सामग्री के आधार पर नई -नई खोजें प्रस्तुत कीं हैं.जैसे डा.हेनीमेन ने 'होम्योपैथी',डा.एस.एच.शुस्लर ने 'बायोकेमिक'  भौतिकी के वैज्ञानिकों ने 'परमाणु बम'एवं महर्षि कार्ल मार्क्स ने 'वैज्ञानिक समाजवाद'या 'साम्यवाद'की खोज की। 


दुर्भाग्य से महर्षि कार्ल मार्क्स ने भी अन्य विचारकों की भाँती ही गलत उपासना-पद्धतियों (ईसाइयत,इस्लाम और हिन्दू ) को ही धर्म मानते हुए धर्म की कड़ी आलोचना की है ,उन्होंने कहा है-"मैंन  हैज क्रियेटेड द गाड फार हिज मेंटल सिक्योरिटी ओनली".आज भी उनके अनुयाई एक अन्धविश्वासी की भांति इसे ब्रह्म-वाक्य मान कर यथावत चल रहे हैं.जबकि आवश्यकता है उनके कथन को गलत अधर्म के लिए कहा गया मानने की.'धर्म'तो वह है जो 'धारण'करता है ,उसे कैसे छोड़ कर जीवित रहा जा सकता है.कोई भी वैज्ञानिक या दूसरा विद्वान यह दावा नहीं कर सकता कि वह-भूमि,गगन,वायु,अनल और नीर (भगवान्,GODया खुदा जो ये पाँच-तत्व ही हैं )के बिना जीवित रह सकता है.हाँ ढोंग और पाखण्ड तथा पोंगा-पंथ का प्रबल विरोध करने की आवश्यकता मानव-मात्र के अस्तित्व की रक्षा हेतु जबरदस्त रूप से है।  
~विजय राजबली माथुर ©

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Thursday, December 17, 2015

यही वे लोग हैं जो साम्यवाद को जनता से काट कर साम्राज्यवाद को मजबूत कर रहे हैं ------ विजय राजबली माथुर

*आज से 10 लाख वर्ष पूर्व जब मानव अपने वर्तमान स्वरूप मे आया तो प्रकृति के अनुरूप समाज मे पालन करने हेतु जो नियम बनाए गए वे ही 'वेद' हैं। वेद सभी समय के सभी मनुष्यों के लिए देश-काल के भेदभाव के बिना समान व्यवहार का मार्ग बताते हैं। शासकों और व्यापारियों ने अपने निजी स्वार्थ वश 'कर्मगत' वर्ण व्यवस्था को 'जन्मगत' जाति-व्यवस्था मे परिवर्तित करके शासितों का उत्पीड़न-शोषण किया। वेदोक्त परम्पराएँ विलुप्त हो गईं और समाज मे विषमता की खाई उत्पन्न हो गई। भारत मे विदेशी शासकों के आगमन पर उनके द्वारा यहाँ की जनता को 'हिन्दू' कह कर पुकारा गया जो फारसी भाषा मे एक गंदी और भद्दी गाली है। कुछ लोग अरबी भाषा के 'स ' को 'ह ' उच्चारण से जोड़ कर हिन्दू शब्द की हिमायत करते हैं तब भी यह विदेशियों की ही देंन साबित होता है। कुछ 'कुतर्क करने वाले  लोग ' हिन्दू शब्द की प्राचीनता टटोलते फिरते हैं,किन्तु ईरानियों के आने से पूर्व बौद्ध मठों,विहारों को उजाड़ने वाले उनके ग्रन्थों को जलाने वाले हिंसक लोगों को बौद्धों ने 'हिन्दू' की संज्ञा दी थी। 'हिन्दू' शब्द विदेशी और पूरी तरह से अभारतीय है। 'कुरान' की तर्ज पर विदेशी शासकों ने यहाँ के विद्वानों को 'सत्ता' व 'धन' सुख देकर 'पुराण' लिखवाये जो वेद-विपरीत हैं। किन्तु तथाकथित गर्व से हिन्दू लोग वेद और पुराण को गड्म गड करके गुमराह करते हैं और दुखद है कि प्रगतिशील बामपंथी भी उसी झूठ को मान्यता देते हैं। 

*'आर्य' सार्वभौम शब्द है और यह किसी देश-काल की सीमा मे बंधा हुआ नहीं है। आर्यत्व का मूल 'समष्टिवाद' अर्थात 'साम्यवाद' है। प्रकृति में संतुलन को बनाए रखने हेतु हमारे यहाँ यज्ञ -हवन किये जाते थे। अग्नि में डाले गए पदार्थ परमाणुओं में विभक्त हो कर वायु द्वारा प्रकृति में आनुपातिक रूप से संतुलन बनाए रखते थे.'भ'(भूमि)ग (गगन)व (वायु) ।(अनल-अग्नि)न (नीर-जल)को अपना समानुपातिक भाग प्राप्त होता रहता था.Generator,Operator ,Destroyer भी ये तत्व होने के कारण यही GOD है और किसी के द्वारा न बनाए जाने तथा खुद ही बने होने के कारण यही 'खुदा'भी है।  अब भगवान् का अर्थ मनुष्य की रचना -मूर्ती,चित्र आदि से पोंगा-पंथियों के स्वार्थ में कर दिया गया है और प्राकृतिक उपादानों को उपेक्षित छोड़ दिया गया है जिसका परिणाम है-सुनामी,अति-वृष्टि,अनावृष्टि,अकाल-सूखा,बाढ़ ,भू-स्खलन,परस्पर संघर्ष की भावना आदि-आदि.
*शीशे की तरह चमकता हुआ साफ़ है कि वैदिक संस्कृति हमें जन  पर आधारित अर्थात  समष्टिवादी बना रही है जबकि आज हमारे यहाँ व्यष्टिवाद हावी है जो पश्चिम के साम्राज्यवाद की  देन है।
*'धर्म'तो वह है जो 'धारण'करता है ,उसे कैसे छोड़ कर जीवित रहा जा सकता है.कोई भी वैज्ञानिक या दूसरा विद्वान यह दावा नहीं कर सकता कि वह-भूमि,गगन,वायु,अनल और नीर (भगवान्,GODया खुदा जो ये पाँच-तत्व ही हैं )के बिना जीवित रह सकता है.हाँ ढोंग और पाखण्ड तथा पोंगा-पंथ का प्रबल विरोध करने की आवश्यकता मानव-मात्र के अस्तित्व की रक्षा हेतु जबरदस्त रूप से है।
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Monday, August 20, 2012

वैज्ञानिक परम्पराएँ-वेद और हवन

हमारे देश मे एक फैशन चलता है कि हमारा देश एक पिछड़ा हुआ देश है और यहाँ ज्ञान,विज्ञान जो आया वह पश्चिम की देंन है। आज़ादी के एक लंबे अरसे बाद भी गुलामी की बू लोगों के दिलों से अभी निकली नहीं है। ऊपर जो स्कैन आप देख रहे हैं उसमे आधुनिक अनुसंधान के आधार पर देश मे प्रचलित कुछ प्राचीन  परम्पराओं को विज्ञान -सम्मत बताया गया है।

मैक्स मूलर साहब जर्मनी से भारत आकर यहाँ 30 वर्ष रहे और संस्कृत सीख कर  मूल पांडुलिपियाँ लेकर जर्मनी रवाना हो गए। जर्मनी भाषा मे उनके अनुवादों को पढ़ कर वहाँ अनुसंधान हुये *-होमियोपैथी,बायोकेमिक चिकित्सा पद्धतियों को वहाँ ईजाद किया गया जो एलोपेथी  से श्रेष्ठ हैं। परमाणु तथा दूसरे आयुधों का आविष्कार भी वेदोक्त ज्ञान से वहाँ हुआ। जर्मनी की द्वितीय विश्व युद्ध मे पराजय के बाद अमेरिका और रूस ने इन परमाणु वैज्ञानिकों को अपने-अपने देश मे लगा लिया। अमेरिका ने सबसे पहले जापान की आत्म समपर्ण की घोषणा के बाद रूस को डराने के लिए 06 और 09 अगस्त को परमाणु बमो का प्रहार किया।

जर्मनी आदि पाश्चात्य देशों ने षड्यंत्र पूर्वक भारत मे यह प्रचार किया कि,'वेद गड़रियों के गीत 'के सिवा कुछ भी नहीं हैं (जबकि ये ही देश खुद वेद-ज्ञान का लाभ उठा कर खुद को विज्ञान का आविष्कारक बताते रहे)। हमारे देश के पाश्चात्य समर्थक विद्वान चाहे वे दक्षिण पंथी हों या प्रगतिशील बामपंथी दोनों ही साम्राज्यवादी इतिहासकारों के 'भटकाव' को ज्ञान-सूत्र मानते हैं जिसके अनुसार 'आर्य' मध्य यूरोप से घोड़ों पर सवार होकर भारत आए और यहाँ के 'मूल निवासियों' को दास बना लिया। इसी मान्यता के कारण देश मे आजकल एक साम्राज्यवाद पोषक आंदोलन 'मूल निवासियों देश को मुक्त करो' भी ज़ोर-शोर से चल रहा है। 

साम्राज्यवादी ब्रिटिश शासकों ने( जब सेफ़्टी वाल्व के रूप मे स्थापित कांग्रेस  आर्यसमाजियों के प्रभाव से 'राष्ट्र वादी आंदोलन चलाने लगी तब )अपने हितों की रक्षा हेतु RSS का गठन एक पूर्व क्रांतिकारी के माध्यम से कराया। RSS और मुस्लिम लीग ने देश को विभाजित करा दिया। आज भी नफरत की सांप्रदायिकता फैला कर साम्राज्यवादी अमेरिका को दोनों संप्रदायों के कुछ संगठन लाभ पहुंचा रहे हैं। RSS और इसके दूसरे सहायक संगठन 'गर्व से हिन्दू' की मुहिम चलाते हैं। प्रगतिशील-बामपंथी कहलाने वाले विद्वान भी हिन्दू,इस्लाम,ईसाइयत को ही धर्म मानते हैं और प्रकट मे धर्म की आलोचना तथा छिपे तौर पर उन सांप्रदायिक गतिविधियों का पालन करते हैं। 

धर्म =सत्य,अहिंसा (मनसा,वाचा,कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य के समुच्य को धर्म कहते हैं जो शरीर को धारण करने हेतु आवश्यक हैं। जो लोग 'धर्म' की आलोचना करते हैं वे इन सदगुणो का पालन न करने को प्रेरित करते हैं। इसी कारण 1917 मे सम्पन्न साम्यवादी क्रांति रूस मे विफल हो गई क्योंकि शासक पार्टी कार्यकर्ताओं और जनता का शोषण कर रहे थे। आज वहाँ समाज-सरकार द्वारा स्थापित उद्योग पूर्व शासकों ने अपने भ्रष्टाचार की कमाई से खरीद लिए हैं और पूंजीपति बन गए हैं। 

भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)। प्रकृति के ये पाँच तत्व ही संयुक्त रूप से 'भगवान' हैं चूंकि इनको किसी ने बनाया नहीं है और ये खुद ही बने हैं इसलिए ये ही 'खुदा' हैं।  इंनका कार्य G(जेनरेट)+O(आपरेट)+D(डेसट्राय) करना है इसलिए ये ही 'गाड ' हैं। जो भगवान=खुदा=गाड को दिमागी फितूर कहते हैं वे सच से आँखें मूँद लेने को ही कहते हैं। 

भगवान या खुदा या गाड =प्रकृति के पाँच तत्व । अतः इनकी पूजा का माध्यम केवल और केवल 'हवन' है। 'पदार्थ विज्ञान' =मेटेरियल साईन्स के मुताबिक अग्नि मे यह गुण है कि उसमे डाले गए पदार्थों को 'परमाणुओ' -'एटम्स' मे विभक्त कर देती है और वायु उन परमाणुओं को पर्यावरण मे प्रसारित कर देती है। अर्थात भगवान या खुदा या गाड को वे परमाणु प्राप्त हो जाते हैं क्योंकि ये तत्व सर्वत्र व्यापक हैं-घट-घट वासी हैं। इनके अतिरिक्त नदी,समुद्र,वृक्ष,पर्वत,आकाश,नक्षत्र,ग्रह आदि देवताओं को भी हवन द्वारा प्रसारित परमाणु प्राप्त हो जाते हैं। 'देवता' =जो देता है ,लेता नहीं है। अतः इन प्राकृतिक संसाधनो के अतिरिक्त और कोई देवता नहीं होता है। 

विवाद तभी शुरू होता है जब हिन्दू,इस्लाम,ईसाइयत  आदि के नाम पर 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' को धर्म की संज्ञा देकर पूजा जाता है। वस्तुतः व्यापारियों-उद्योगपतियों और शासकों ने मिल कर ये विभाजन अपने-अपने व्यापार को चमकाने हेतु समाज मे कर रखे हैं। प्रगतिशील-बामपंथी जनता को इन लुटेरे व्यापारियों के चंगुल से छुड़ाने हेतु 'धर्म' की वास्तविक व्याख्या प्रस्तुत करने के बजाए धर्म का विरोध करते हैं किन्तु पाखंड से उनको गुरेज नहीं है उसे वे भी धर्म ही पुकारते हैं। दमन जनता का होता है।

आज से 10 लाख वर्ष पूर्व जब मानव अपने वर्तमान स्वरूप मे आया तो प्रकृति के अनुरूप समाज मे पालन करने हेतु जो नियम बनाए गए वे ही 'वेद' हैं। वेद सभी समय के सभी मनुष्यों के लिए देश-काल के भेदभाव के बिना समान व्यवहार का मार्ग बताते हैं। शासकों और व्यापारियों ने अपने निजी स्वार्थ वश 'कर्मगत' वर्ण व्यवस्था को 'जन्मगत' जाति-व्यवस्था मे परिवर्तित करके शासितों का उत्पीड़न-शोषण किया। वेदोक्त परम्पराएँ विलुप्त हो गईं और समाज मे विषमता की खाई उत्पन्न हो गई। भारत मे विदेशी शासकों के आगमन पर उनके द्वारा यहाँ की जनता को 'हिन्दू' कह कर पुकारा गया जो फारसी भाषा मे एक गंदी और भद्दी गाली है। कुछ लोग अरबी भाषा के 'स ' को 'ह ' उच्चारण से जोड़ कर हिन्दू शब्द की हिमायत करते हैं तब भी यह विदेशियों की ही देंन साबित होता है। कुछ 'कुतर्क करने वाले  लोग ' हिन्दू शब्द की प्राचीनता टटोलते फिरते हैं,किन्तु ईरानियों के आने से पूर्व बौद्ध मठों,विहारों को उजाड़ने वाले उनके ग्रन्थों को जलाने वाले हिंसक लोगों को बौद्धों ने 'हिन्दू' की संज्ञा दी थी। 'हिन्दू' शब्द विदेशी और पूरी तरह से अभारतीय है। 'कुरान' की तर्ज पर विदेशी शासकों ने यहाँ के विद्वानों को 'सत्ता' व 'धन' सुख देकर 'पुराण' लिखवाये जो वेद-विपरीत हैं। किन्तु तथा कथित गर्व से हिन्दू लोग वेद और पुराण को गड्म गड करके गुमराह करते हैं और दुखद है कि प्रगतिशील बामपंथी भी उसी झूठ को मान्यता देते हैं। 

यू एस ए की राजधानी वाशिंगटन (DC) मे अग्निहोत्र यूनिवर्सिटी मे अनवरत 24 घंटे हवन चलता रहता है जिसके परिणामस्वरूप USA के क्ष्तिज पर बना ओज़ोन का छिद्र परिपूर्ण हो गया और वह सरक कर दक्षिण-पूर्व एशिया की तरफ आ गया है। इस क्षेत्र मे प्राकृतिक प्रकोपों का कारण यह ओज़ोन छिद्र ही है जो यू एस ए आदि पाश्चात्य देशों के कुकृत्य का कुफ़ल है। किन्तु हमारे बामपंथी भाई और प्रगतिशील पत्रकार जिनमे दैनिक जागरण के चेनल IBN 7वाले प्रमुख हैं 'हवन' का घोर विरोध करते हैं-व्यंग्य उड़ाते हैं। 

यदि हमे अपने देश 'भारत' को प्रकृतिक प्रकोपों से बचाना है,अपने नागरिकों को शुद्ध पर्यावरण उपलब्ध कराना है और परस्पर भाई-चारा उत्पन्न करना है तो 'वेदोक्त हवन' का सहारा लेना ही चाहिए। अन्यथा तो जो चल रहा है चलता रहेगा फिर रोना-झींकना क्यों?

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*वेदों के 'समष्टिवाद' का ही आधुनिक रूप है 'साम्यवाद' जिसका निरूपण किया जर्मनी के महर्षि कार्ल मार्क्स ने उन जर्मन ग्रन्थों के अवलोकन के पश्चात जो वेदों की मूल पांडु लिपियों से अनूदित थे। लेकिन भारतीय साम्यवादी विद्वान 'साम्यवाद' को पाश्चात्य विज्ञान मानते हैं और इसी मुगालते मे जनता से कटे रहते हैं। वस्तुतः 'साम्यवाद'='समष्टिवाद' मूल रूप से भारतीय अवधारणा है और इसे लागू भी तभी किया जा सकेगा जब हकीकत को समझ लिया जाएगा।
http://krantiswar.blogspot.in/2012/08/blog-post_3188.html

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योगीराज श्री कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन शोषण-उत्पीड़न और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करते हुये ही बीता किन्तु ढ़ोंगी-पोंगापंथी-पुरोहितवाद ने आज श्री कृष्ण के संघर्ष को 'विस्मृत' करने हेतु उनको अवतार घोषित करके उनकी पूजा शुरू करा दी। कितनी बड़ी विडम्बना है कि 'कर्म' पर ज़ोर देने वाले श्री कृष्ण के 'कर्मवाद' को भोथरा करने के लिए उनको अलौकिक बता कर उनकी शिक्षाओं को भुला दिया गया और यह सब किया गया है शासकों के शोषण-उत्पीड़न को मजबूत करने हेतु। अनपढ़ तो अनपढ़ ,पढे-लिखे मूर्ख ज़्यादा ढोंग-पाखंड मे उलझे हुये हैं।

तथा कथित प्रगतिशील साम्यवादी बुद्धिजीवी जिंनका नेतृत्व विदेश मे बैठे पंडित अरुण प्रकाश मिश्रा और देश मे उनके बड़े भाई पंडित ईश मिश्रा जी  करते हैं सांप्रदायिक तत्वों द्वारा निरूपित सिद्धांतों को धर्म मान कर धर्म को त्याज्य बताते हैं। जबकि धर्म=जो शरीर को धारण करने के लिए आवश्यक है वही 'धर्म' है;जैसे-सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य । अब यदि ढ़ोंगी प्रगतिशीलों की बात को सही मान कर धर्म का विरोध किया जाये तो हम लोगों से इन सद्गुणों को न अपनाने की बात करते हैं और यही कारण है कि सोवियत रूस मे साम्यवाद का पतन हो गया(सोवियत भ्रष्ट नेता ही आज वहाँ पूंजीपति-उद्योगपति हैं जो धन जनता और कार्यकर्ता का शोषण करके जमा किया गया था उसी के बल पर) एवं चीन मे जो है वह वस्तुतः पूंजीवाद ही है।दूसरी ओर थोड़े से  पोंगापंथी केवल 'गीता' को ही महत्व देते हैं उनके लिए भी 'वेदों' का कोई महत्व नहीं है। 'पदम्श्री 'डॉ कपिलदेव द्विवेदी जी कहते हैं कि,'भगवद  गीता' का मूल आधार है-'निष्काम कर्म योग'
"कर्मण्ये वाधिकारस्ते ....................... कर्मणि। । " (गीता-2-47)

इस श्लोक का आधार है यजुर्वेद का यह मंत्र-
"कुर्वन्नवेह कर्मा................... न कर्म लिपयाते नरो" (यजु.40-2 )

इसी प्रकार सम्पूर्ण बाईबिल का मूल मंत्र है 'प्रेम भाव और मैत्री' जो यजुर्वेद के इस मंत्र पर आधारित है-
"मित्रस्य मा....................... भूतानि समीक्षे।  ....... समीक्षा महे । । " (यजु .36-18)

एवं कुरान का मूल मंत्र है-एकेश्वरवाद-अल्लाह की एकता ,उसके गुण धर्मा सर्वज्ञ सर्व शक्तिमान,कर्त्ता-धर्त्तासंहर्त्ता,दयालु आदि(कुरान7-165,12-39,13-33,57-1-6,112-1-4,2-29,2-96,87-1-5,44-6-8,48-14,1-2,2-143 आदि )। 

इन सबके आधार मंत्र हैं-

1-"इंद्रम मित्रम....... मातरिश्चा नामाहू : । । " (ऋग-1-164-46)
2-"स एष एक एकवृद एक एव "। । (अथर्व 13-4-12)
3-"न द्वितीयों न तृतीयच्श्तुर्थी नाप्युच्येत। । " (अथर्व 13-5-16)
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 'आर्य'=श्रेष्ठ अर्थात वे स्त्री पुरुष जिनके आचरण और कार्य श्रेष्ठ हैं 'आर्य' है इसके विपरीत लोग अनार्य हैं। न यह कोई जाति थी न है।


'आर्य' सार्वभौम शब्द है और यह किसी देश-काल की सीमा मे बंधा हुआ नहीं है। आर्यत्व का मूल 'समष्टिवाद' अर्थात 'साम्यवाद' है। प्रकृति में संतुलन को बनाए रखने हेतु हमारे यहाँ यज्ञ -हवन किये जाते थे। अग्नि में डाले गए पदार्थ परमाणुओं में विभक्त हो कर वायु द्वारा प्रकृति में आनुपातिक रूप से संतुलन बनाए रखते थे.'भ'(भूमि)ग (गगन)व (वायु) ।(अनल-अग्नि)न (नीर-जल)को अपना समानुपातिक भाग प्राप्त होता रहता था.Generator,Operator ,Destroyer भी ये तत्व होने के कारण यही GOD है और किसी के द्वारा न बनाए जाने तथा खुद ही बने होने के कारण यही 'खुदा'भी है।  अब भगवान् का अर्थ मनुष्य की रचना -मूर्ती,चित्र आदि से पोंगा-पंथियों के स्वार्थ में कर दिया गया है और प्राकृतिक उपादानों को उपेक्षित छोड़ दिया गया है जिसका परिणाम है-सुनामी,अति-वृष्टि,अनावृष्टि,अकाल-सूखा,बाढ़ ,भू-स्खलन,परस्पर संघर्ष की भावना आदि-आदि.
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शीशे की तरह चमकता हुआ साफ़ है कि वैदिक संस्कृति हमें जन  पर आधारित अर्थात  समष्टिवादी बना रही है जबकि आज हमारे यहाँ व्यष्टिवाद हावी है जो पश्चिम के साम्राज्यवाद की  देन है। दलालों के माध्यम से मूर्ती पूजा करना कहीं से भी समष्टिवाद को सार्थक नहीं करता है,जबकि वैदिक हवन सामूहिक जन-कल्याण की भावना पर आधारित है। IBN 7 के पत्रकार हवन का विरोध पोंगापंथ को सबल बनाने हेतु करते है और दूसरे चेनल वाले भी। साम्राज्यवादी -विदेशी तो खुद को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए वेदों का विरोध करते ही हैं एवं उनके निष्कर्षों का लाभ लेकर उसे अपना आविष्कार बताते हैं।

ऋग्वेद के मंडल ५/सूक्त ५१ /मन्त्र १३ को देखें-

विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्निः स्वस्तये.
देवा अवन्त्वृभवः स्वस्तये स्वस्ति नो रुद्रः पात्व्हंससः ..

(जनता की कल्याण -कामना से यह यज्ञ  रचाया.
विश्वदेव के चरणों में अपना सर्वस्व चढ़ाया..)

जो लोग (अरुण प्रकाश मिश्रा -ईश मिश्रा जी और उनके चेले सरीखे )धर्म की वास्तविक व्याख्या को न समझ कर गलत  उपासना-पद्धतियों को ही धर्म मान कर चलते हैं वे अपनी इसी नासमझ के कारण ही  धर्म की आलोचना करते और खुद को प्रगतिशील समझते हैं जबकि वस्तुतः वे खुद भी उतने ही अन्धविश्वासी हुए जितने कि पोंगा-पंथी अधार्मिक होते हैं। 

ऋग्वेद के मंडल ७/सूक्त ३५/मन्त्र १ में कहा गया है-

शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शन्न इन्द्रावरुणा रातहव्या डे
शमिन्द्रासोमा सुविताय शंयो :शन्न इन्द्रा पूष्णा वाजसात..

(सूर्य,चन्द्र,विद्युत्,जल सारे सुख सौभाग्य बढावें.
रोग-शोक-भय-त्रास हमारे पास कदापि न आवें..)

वेदों में किसी व्यक्ति,जाति,क्षेत्र,सम्प्रदाय,देश-विशेष की बात नहीं कही गयी है.वेद सम्पूर्ण मानव -सृष्टि की रक्षा की बात करते हैं.इन्हीं तत्वों को जब मैक्समूलर साहब जर्मन ले गए तो वहां के विचारकों ने अपनी -अपनी पसंद के क्षेत्रों में उनसे ग्रहण सामग्री के आधार पर नई -नई खोजें प्रस्तुत कीं हैं.जैसे डा.हेनीमेन ने 'होम्योपैथी',डा.एस.एच.शुस्लर ने 'बायोकेमिक'  भौतिकी के वैज्ञानिकों ने 'परमाणु बम'एवं महर्षि कार्ल मार्क्स ने 'वैज्ञानिक समाजवाद'या 'साम्यवाद'की खोज की। 


दुर्भाग्य से महर्षि कार्ल मार्क्स ने भी अन्य विचारकों की भाँती ही गलत उपासना-पद्धतियों (ईसाइयत,इस्लाम और हिन्दू ) को ही धर्म मानते हुए धर्म की कड़ी आलोचना की है ,उन्होंने कहा है-"मैंन  हैज क्रियेटेड द गाड फार हिज मेंटल सिक्योरिटी ओनली".आज भी उनके अनुयाई एक अन्धविश्वासी की भांति इसे ब्रह्म-वाक्य मान कर यथावत चल रहे हैं.जबकि आवश्यकता है उनके कथन को गलत अधर्म के लिए कहा गया मानने की.'धर्म'तो वह है जो 'धारण'करता है ,उसे कैसे छोड़ कर जीवित रहा जा सकता है.कोई भी वैज्ञानिक या दूसरा विद्वान यह दावा नहीं कर सकता कि वह-भूमि,गगन,वायु,अनल और नीर (भगवान्,GODया खुदा जो ये पाँच-तत्व ही हैं )के बिना जीवित रह सकता है.हाँ ढोंग और पाखण्ड तथा पोंगा-पंथ का प्रबल विरोध करने की आवश्यकता मानव-मात्र के अस्तित्व की रक्षा हेतु जबरदस्त रूप से है।  
http://krantiswar.blogspot.in/2012/08/blog-post_9.html

~विजय राजबली माथुर ©
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Wednesday, December 31, 2014

वामपंथ फासिस्ट साजिश में उलझ कर पराजय पथ पर ----- विजय राजबली माथुर



राज्यसभा में 'रेखा' और 'सचिन तेंदुलकर' ये दो ऐसे  सदस्य हैं जिनको मनमोहन सरकार ने अप्रैल 2012 में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी से मनोनीत करवाया था। मोदी ने सफाई नवरत्नों में तेंदुलकर को शामिल किया था अब 'पेटा' के जरिये रेखा को अपने साथ नामित करवाया है ये सारी कोशिशें इन दोनों सांसदों का दिल जीत कर अपनी सरकार के समर्थन में खड़ा करने के लिए हैं। तेंदुलकर को ज़मीन का भी लाभ दिलाने की कोशिश इसी योजना का ही हिस्सा है। 




 सिर्फ सिन्धी होने के कारण ही आडवाणी ने हिरानी की फिल्म का समर्थन नहीं किया है बल्कि आमिर खान और मोदी की घनिष्ठता के कारण भी यह समर्थन आया है। फासिज़्म को मजबूत करने के लिए विपक्ष को समाप्त करना है उस दिशा में दो गुट बनाए गए हैं । एक गुट एक बात उठाता है दूसरा गुट उसका विरोध करता है। हिंदूमहासभा के बेनर पर गोडसे की मूर्ती लगाने की तैयारी और भाजपा के बेनर पर उसका विरोध। साधारण जनता व फासिस्ट विरोधी दलों को इस साजिश को समझते हुये ही अपनी नीतियाँ बनानी व अमल करना चाहिए। आमिर खान द्वारा मोदी के समर्थन से फिल्म बना कर जो विवाद उत्पन्न किया गया है उसका पूरा-पूरा लाभ केंद्र की फासिस्ट सरकार को ही मिलेगा। यह ध्यान में रख कर ही कदम उठाने चाहिए। आडवाणी का वक्तव्य आँखें खोलने के लिए काफी होना चाहिए।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=808278565900788&set=a.154096721318979.33270.100001559562380&type=1&theater


 मेरे उपरोक्त निष्कर्ष से सहमति व्यक्त करने वाले फिल्म निर्माता व समीक्षक सत्यप्रकाश गुप्ता जी ने खुद एक तथ्यात्मक सत्य - विश्लेषण प्रस्तुत किया है :

 https://www.facebook.com/groups/231887883638484/permalink/365350976958840/

 मोदी की यह सरकार एमर्जेंसी के दौरान गिरफ्तार मधुकर दत्तात्रेय देवरस और इन्दिरा गांधी के मध्य हुये गुप्त समझौते की ही परिणति है जिसके तहत RSS ने 1980 व 1984 के लोकसभा चुनावों में इन्दिरा कांग्रेस का समर्थन करके अपनी घुसपैठ बनाई थी।2011 से चले हज़ारे/केजरीवाल आंदोलन को RSS/मनमोहन सिंह व देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों का पूर्ण समर्थन था और उसी अनुरूप सौ से अधिक कांग्रेसियों ने भाजपा सांसद बन कर मोदी को स्पष्ट बहुमत प्रदान कर दिया। अब राज्यसभा तथा राज्यों की विधानसभाओं में समर्थन जुटाने की कवायद चल रही है और सफलता मिलते ही वर्तमान संविधान को ध्वस्त करके RSS की अर्द्ध-सैनिक तानाशाही को  संवैधानिक संरक्षण द्वारा स्थापित कर दिया जाएगा। साम्यवादी/वामपंथी विद्वान व नेता गण थोथी नास्तिकता या एथीस्टवाद में फंस कर ढोंग-पाखंड-आडंबर को मजबूत करते जा रहे हैं और अंततः फासिस्टों को सफलता दिलाते जाकर खुद को नष्ट करने की प्रक्रिया पर चल रहे हैं। तामिलनाडु में होने वाले वर्ष 2016 के चुनावों के लिए मोदी द्वारा रेखा को अपने पाले में खींचने का अभियान शुरू हो चुका है जिनका 29 जून 2017 तक का समय राजनीतिक रूप से उज्ज्वल है। क्यों नही तामिलनाडु से भाकपा के राज्यसभा सांसद कामरेड डी राजा साहब रेखा को वामपंथी खेमे में लाने का प्रयास करते ? क्योंकि एथीज़्म में ज्योतिष का कोई महत्व नहीं है भले ही फासिस्ट मोदी सरकार उनका लाभ उठा ले जाये। यदि रेखा को वामपंथी मोर्चे का नेता बना कर तामिलनाडु विधानसभा का चुनाव लड़ा जाये तो वहाँ यह मोर्चा सफलता प्राप्त कर सकता है। यदि फ़ासिज़्म को उखाड़ना है तो अभी से ही जुटना होगा और फ़ासिज़्म की चालों का शिकार बनने से बचना होगा। वामपंथी नेता गण बाजपेयी,केजरीवाल, pk फिल्म का समर्थन करके अपना जनाधार फासिस्टों को क्यों सौंपते जा रहे हैं? यह दुखद एवं सोचनीय विषय है। मनमोहन सिंह के फेर में फंस कर सोनिया कांग्रेस तो रेखा अथवा ममता बनर्जी के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव लड़ने से वंचित हो गई किन्तु वामपंथ के सामने 2016 के  तामिलनाडु विधानसभा चुनाव रेखा के नेतृत्व में लड़ने के प्रयास तो अभी से किए ही जा सकते हैं जिससे कि दक्षिण में मोदी के कदमों को थामा जा सके।

http://krantiswar.blogspot.in/2014/02/blog-post_11.html
  ~विजय राजबली माथुर ©
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Tuesday, November 11, 2014

जनता और जन कवियों के बिना ही 'भव्य जन -क्रांति ' का आह्वान ! ---विजय राजबली माथुर

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#Avadhnama कार्यक्रम के संचालक शहर के सम्मानित संस्कृतिकर्मी आदियोग ने शाद की नज्म से इस कार्यक्रम की शुरुआत की.


वहीं श्री वर्मा ने ‘कविता: 16 मई के बाद’ नामक आयोजन की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए बताया कि 16 मई 2014 को लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद जो फासीवादी निज़ाम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इस देश में आया है और उसके बाद इस देश में जैसी राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियां बनी हैं, उसमें एक अहम सांस्कृतिक हस्तक्षेप की ज़रूरत आन पड़ी है. ऐसे में ज़रूरी है कि कविता को राजनीतिक औज़ार बनाकर एक प्रतिपक्ष का निर्माण किया जाए.

कविताओं की शुरुआत करते हुए शहर के प्रतिष्ठित संपादक और कवि सुभाष राय ने अपनी एक लंबी कविता सुनाई. इसके बाद कवि अजय सिंह ने अपनी बहुचर्चित कविता ”राष्ट्रपति भवन में सुअर” का पाठ किया.

कवि चंद्रेश्वर ने अफ़वाहों के फैलने पर एक ज़रूरी कविता सुनाई. मंच पर मौजूद ब्रजेश नीरज, हरिओम, ईश मिश्र, किरन सिंह, नरेश सक्सेना, नवीन कुमार, प्रज्ञा पाण्डेय, पाणिनी आनंद, रंजीत वर्मा, राहुल देव, राजीव प्रकाश गर्ग ’साहिर’, संध्या सिंह, सैफ बाबर, शिवमंगल सिद्धान्तकर, तश्ना आलमी, उषा राय, अभिषेक श्रीवास्तव ने अपनी सशक्त कविताओं के माध्यम से अपना-अपना प्रतिरोध दर्ज करवाया. कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने की . 

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10-11-2014   :-

 
ये कलाकार साबित करता है कि बुद्धिजीवी होने का तमगा के लिए आपको अन्य सभी जगह शिक्षा की जरूरत हो सकती है मगर बिहार और पूर्वांचल का बच्चा बच्चा बुद्धिजीवी पैदा होता है, अशिक्षित मजदूर या फिर ट्रेन में मांगने वाला भिखाड़ी भी बौधिक रूप से कैसे समृद्ध होता है.

हमारा बिहारी लाल फतुहा का अनिल कुमार ट्रेन में गीत गा कर मांग कर जीवन यापन करता है और व्यंग्य की पराकाष्ठ का ये गीत खुद गढ़ता है, आँख से अँधा मगर आखं वाले के बौधिक ज्ञान पर भारी है इसका ज्ञान जो बिना पढ़े लिखे दुनिया समाज और राजनीति पर व्यंगात्मक गीत की ये लड़ी पिरो सकता है, आप इसे मांगने वाला कह सकते हैं मैं इसे अपने भिखाड़ी ठाकुर और बैद्यनाथ मिश्र यात्री जैसे लाल की कड़ी में एक मोती मानता हूँ,

पूरा गीत सुनिए शायद आप भी सहमत हों कि हमारे बिहार और पूर्वांचल में बौधिक खान के बीच कैसे कैसे और कहाँ कहाँ हीरा मिलता है !!!
जन कवि का वीडियो---

बड़े ज़ोर-शोर से प्रचारित किया गया कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यालय में "कविता को राजनीतिक औज़ार बनाकर एक प्रतिपक्ष का निर्माण  " करने  हेतु  कार्यक्रम होगा और हुआ भी। लेकिन भाकपा के साधारण सदस्यों तो क्या ज़िला काउंसिल सदस्यों तक को इस कार्यक्रम की पार्टी की ओर से कोई सूचना नहीं प्रसारित की गई थी। पूंजीवादी जर्मनी के रेडियो-'डायचेवेले' के पेंशनर  तथा वर्तमान साम्राज्यवाद के सरगना 'ओबामा' की तुलना नौ लाख वर्ष पूर्व साम्राज्यवाद के पुरोधा 'रावण' को परास्त करने वाले जन-नायक 'राम' के साथ करने वाले 'ईश मिश्रा' जैसे लोग भी काव्य पाठ करने वालों में शामिल थे। अपवाद स्वरूप एक-दो को छोड़ कर सभी काव्य पाठी  समृद्ध वर्ग से थे। 

कार्यक्रम सार्वजनिक स्थान पर नहीं था लेकिन जन-क्रांति का आह्वान किया जा रहा था । छोटे-छोटे बच्चों के दफ्ती की तलवारों पर सफ़ेद चमकीला कागज चिपका कर युद्ध का अभिनय करने जैसे ऐसे कार्यक्रम जनता को लामबंद कभी भी नहीं कर सकते हैं  बस केवल आभिजात्य वर्ग का क्षणिक मनोरंजन ही कर सकते हैं।  वामपंथ और साम्यवाद की जनता में एक विकृत छवी कौन बना रहा है? देखिये तो ज़रा :

फासीवादी सत्ता को मजबूती देने का पोंगा-पंडितवादी तरीका है यह न कि वामपंथी-साम्यवाद ---
"देश में बढ़ते पूंजीवाद, आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, फासीवाद, आतंकवाद, बेरोजगारी और महंगाई का नया वामपंथी इलाज - किस ऑफ़ लव ! अपने लोगों का मिज़ाज और सांस्कृतिक जड़ें समझे बगैर चीन और रूस का मॉडल लागू करने का सपना पालने वाले छद्म वामपंथ का अंततः यही हश्र होना था। देश में कभी भी कायदे का राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक प्रतिरोध खड़ा न कर सकने वाले इन हवा हवाई वामपंथी बुद्धीजीवियों ने पहले कविता और दूसरी कला विधाओं को लोहा, इस्पात और हथियार बनाने की जिद में कविता और कलाओं को मार डाला। अब ये प्रेम जैसी नितांत वैयक्तिक, निजी और कोमल भावना को सरेबाज़ार नीलाम करने की कोशिश में लगे हैं। उन्हें सार्वजनिक स्थानों पर मलमूत्र त्याग और प्रेम जैसी आंतरिक अनुभूति का सार्वजनिक प्रदर्शन बिल्कुल एक जैसा कृत्य लगता है। माना कि प्रेम के प्रति फासीवादी संघी और खाप विचारधारा के विरोध की सख्त ज़रुरत है, मगर यह विरोध अपनी सांस्कृतिक जड़ों को काटकर नहीं किया जा सकता। अगर इन वामपंथी युवाओं को चुंबन का घृणास्पद सार्वजनिक तमाशा जायज़ लगता है तो ये लोग अपनी बीवियों, बहनों, बेटियों को लेकर सड़को पर क्यों नहीं उतरते ? आखिर उन्हें भी तो 'मुक्ति' के मार्ग पर चल निकलने की छूट मिलनी चाहिए ! ज़ाहिर है, ये लोग विरोध के नाम पर सड़कों पर मौज-मजे की तलाश में निकले हुए यौन-विकृत लोग है।
वामपंथियों ने देश में अपनी कब्र तो कबकी खोद ली थी, अब इनका दफ़न होना भर बाकी है !"


यह सब और कुछ नहीं केवल और केवल 'एथीस्टवादी संप्रदाय'का फासीवाद को पुख्ता करने का खेल है। 

जब तक भारतीय संदर्भों व प्रतीकों द्वारा जनता को साम्यवाद के बारे में नहीं समझाया जाएगा वह अपने शोषकों के जाल में फँसती रहेगी। ईश मिश्रा व डायचेवेले के पेंशनर तथा प्रदीप तिवारी सरीखे लोग जनता को साम्यवाद से सदैव दूर ही रखेंगे तो फिर जनता के सहयोग के बगैर जन-क्रान्ति कैसे होगी। सशस्त्र क्रान्ति के समर्थक युवा साम्यवादी बेवजह फासीवादियों के सफाये का शिकार होते रहेंगे। 

 

जंन - तान्त्रिक पद्धति से तभी  संसद व सत्ता पर साम्यवादी विचार धारा बहुमत हासिल कर सकती है जबकि साम्यवाद  व वामपंथ को 'एथीस्टवादी संप्रदाय'के चंगुल से मुक्त कराकर जनोन्मुखी बना लिया जाये। 

  ~विजय राजबली माथुर ©
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Saturday, November 1, 2014

ऐसे लोगों के कारण ही साम्यवाद भारत में सफल नहीं हो पा रहा है ---विजय राजबली माथुर

 http://communistvijai.blogspot.in/2014/10/blog-post_31.html
PT-1:

 http://communistvijai.blogspot.in/2014/10/blog-post_8.html
PT-2 :

d g -p :


जिस रूप में मानव आज है वह 10 लाख वर्ष पूर्व अस्तित्व में आया है ऐसा वैज्ञानिक खोजों से सिद्ध हो चुका है। मतभेद केवल इस बात पर है और वह वैज्ञानिकों के मध्य भी है कि पहले 'नर ' की उत्पत्ति हुई या फिर 'मादा ' की। तथाकथित विभिन्न धर्म जो वस्तुतः संप्रदाय/मजहब/रिलीजन हैं 'धर्म' नहीं के द्वारा मनगढ़ंत और परस्पर विरोधी कहानियाँ प्रचलित है।
पृथिवी के निर्माण के बाद जब यह ठंडी हुई तो काफी समय तक यहाँ विभिन्न गैसों की बारिश होती रही और अंततः 'हाइड्रोजन '-2 भाग तथा 'आक्सीजन '-1 भाग के विलियन से 'जल ' की उत्पत्ति हुई जिससे बाद में वनस्पतियाँ अस्तित्व में आईं। सबसे पहले जल-जीव और कालांतर में अन्य जीवों की उत्पत्ति हुई। वैज्ञानिकों का एक वर्ग जल-जीव-मछली से मनुष्य तक की कल्पना करता है । इस सिद्धान्त को प्रिंस डि ले मार्क ने 'व्यवहार और अव्यवहार ' का संबोद्धन दिया है।  यदि इसी को सत्य मान भी लें तो भी पहले 'नर ' या 'मादा ' का प्रश्न अनुत्तरित रह जाएगा।
महर्षि कार्ल मार्क्स और शहीद सरदार भगत सिंह का नाम जप-जप कर साम्यवादी विद्वान भी पाश्चात्य वैज्ञानिकों के सुर में सुर मिला कर 'एथीस्ट वाद ' की आड़ में 'सत्य ' को स्वीकार नहीं करते हैं। जबकि दोनों महान विभूतियों ने प्रचलित मजहबों/संप्रदायों/रिलीजन को तथाकथित धर्म मानते हुये निष्कर्ष दिये थे और कभी भी उन दोनों ने वास्तविक धर्म का विरोध नहीं किया है। :



" वास्तविक धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।

भगवान =भ (भूमि-ज़मीन  )+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I(अनल-अग्नि)+न (जल-पानी)


चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इसलिए ये ही खुदा हैं। 


इनका कार्य G(जेनरेट )+O(आपरेट )+D(डेसट्राय) है अतः यही GOD हैं।"



युवा नर और युवा मादा की उत्पत्ति एक साथ :



वस्तुतः 'जल' और 'वनस्पतियों' की उत्पत्ति के बाद पहले अन्य जीवों की उत्पत्ति उनके युवा नर एवं युवा मादा के रूप में हुई है जिनसे उनकी वंश वृद्धि होती रही है और प्रिंस डि ले मार्क के  'व्यवहार और अव्यवहार ' सिद्धांतानुसार उनका विकास-क्रम चला है। अब से लगभग 10 लाख वर्ष पूर्व 'मनुष्य ' की उत्पत्ति भी 'युवा नर ' और 'युवा मादा ' के रूप में एक साथ हुई है जिसे न तो कोई एथीस्ट और न ही तथा-कथित आधुनिक वैज्ञानिक और न ही थोथे - धर्म (सप्रदाय/मजहब/रिलीजन ) स्वीकार करने को तैयार हैं । 
युवा 'नर ' और 'मादा ' मनुष्यों की उत्पत्ति एक साथ अफ्रीका,एशिया और यूरोप में कुल तीन स्थानों पर हुई है। भौगोलिक व पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप इन तीनों स्थानों के मानवों का विकास-क्रम चला है। 'एशिया' में मानव उद्भव जिस स्थान पर हुआ वह था-'त्रिवृष्टि ' अर्थात आज का 'तिब्बत' । परिस्थितिजन्य अनुकूलता के कारण यहाँ का मानव तीव्र विकास कर सका जबकि अफ्रीका व यूरोप का मानव पीछे रह गया था। यहाँ के मानव ने खुद को 'श्रेष्ठ '='आर्ष '='आर्य ' संबोद्धन दिया और सम्पूर्ण विश्व को 'आर्य' बनाने का बीड़ा उठाया । जनसंख्या वृद्धि के कारण यहाँ के आर्य दक्षिण में हिमालय पार कर के 'निर्जन' स्थान पर भी बसने लगे जिसे उन्होने 'आर्यावृत ' नाम दिया। लेकिन तथाकथित प्रगतिशील और आज  विकसित यूरोपीय लोगों ने प्रचारित कर दिया कि आर्यों ने भारत के मूल निवासियों को उजाड़ कर आक्रांता के रूप में  कब्जा किया था। जबकि वास्तविकता यह है कि भारत से आर्य पश्चिम में आर्यनगर-एरयान-ईरान होते हुये यूरोप और अफ्रीका गए थे। पूर्व में साईबेरिया के 'ब्लाडीवोस्टक ' से होते हुये अमरीका के 'अलास्का ' होकर  'तक्षक '-टेक्सास व मय'-मेक्सिको पहुंचे थे। 
दक्षिण दिशा से आस्ट्रेलिया  में पहुँचने वाले आर्य श्रेष्ठता के मार्ग से भटक गए थे और इनके वंशज रावण ने आज की श्री लंका को केंद्र बना कर विश्व-व्यापी साम्राज्य स्थापित कर लिया था । आज के यू एस ए (पाताल लोक ) का शासक एरावन तथा साईबेरिया का शासक कुंभकर्ण  रावण के सहयोगी थे। रावण ने जंबू द्वीप के प्रमुख व शक्तिशाली शासक बाली से अनाक्रमण संधि कर रखी थी । अतः अब से नौ लाख वर्ष पूर्व पृथ्वी पर प्रथम साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष हुआ था जिसमें साम्राज्यवादी परास्त हुये थे। किन्तु पाश्चात्य प्रभुत्व के कारण हमारे साम्यवादी विद्वान हकीकत को नकार देते हैं जिसका प्रतिफल यह है कि आज के साम्राज्यवादी उन्हीं राम का नाम लेकर जनता का दमन व शोषण कर रहे हैं जिनहोने सर्व-प्रथम साम्राज्यवाद को इस धरती पर परास्त किया था।
इसी प्रकार अब से लगभग पाँच हज़ार वर्ष पूर्व श्री कृष्ण ने समानता पर आधारित गण राज्य की स्थापना करके आदर्श प्रस्तुत किया था किन्तु प्रगतिशीलता व एथीज़्म के नाम पर इस तथ्य से आँखें फेर ली जाती हैं और बजाए कृष्ण का सहारा लेने के उनकी निंदा व आलोचना की जाती है जिसका लाभ पुनः सांप्रदायिक व साम्राज्यवाद समर्थक शक्तियाँ उठा लेती हैं। 
नानक,कबीर, रेदास,दयानन्द, विवेकानंद आदि के दृष्टिकोण साम्यवाद के निकट हैं किन्तु साम्यवादी विद्वान उसी एथीज़्म के वशीभूत होकर इनका सहारा लेने की जगह उनकी आलोचना करते हैं।

 PT-1 और PT-2 के खलनायक ने d g -p के नायक को भ्रमित कर रखा है जैसा कि उन टिप्पणियों से सिद्ध होता है। नायक साहब ने जिस पुलिस अधिकारी के बचाव में बयान जारी किया है उसे वकील कामरेड ने 'चोर' व 'उच्चका ' बताया है। नायक साहब के निर्णय 80 प्रतिशत खलनायक से प्रभावित रहते हैं। ऐसे में उत्तर-प्रदेश में भाकपा के सुदृढ़ होने का प्रश्न ही नहीं है। उत्तर-प्रदेश,बिहार समेत हिन्दी प्रदेशों में जब तक भाकपा या अन्य साम्यवादी दल जनता का विश्वास नहीं हासिल कर लेते  हैं  तब तक किताबी ज्ञान व इतिहास  के भरोसे लोकतन्त्र के जरिये सत्ता नहीं मिलने वाली है। 'सशस्त्र क्रांति' रूस में विफल हो चुकी है तो चीन में अपना अर्थ खो चुकी है। यदि साम्यवादी दल और वामपंथ राम के साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष को कोरी कल्पना कह कर उपहास उड़ाने की जगह उससे प्रेरणा लेकर तथा कृष्ण के उदाहरण सामने रख कर अपनी नीतियाँ निर्धारित करें तो जनता का विश्वास भी हासिल कर लेंगे और साम्राज्यवाद समर्थक सांप्रदायिक शक्तियों को भी बेनकाब कर के धराशायी कर सकेंगे। लेकिन खलनायक PT सरीखे  पोंगापंथी लोग क्या साम्यवाद को संकीर्ण जकड़न से निकल कर प्रगतिशील होने देंगे? जब तक ऐसा नहीं होता तब तक सारी कसरत व कवायद अपनी ही आँखों में धूल झोंकने वाली रहेगी। 
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