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Monday, August 20, 2012

वैज्ञानिक परम्पराएँ-वेद और हवन ------ विजय राजबली माथुर

हमारे देश मे एक फैशन चलता है कि हमारा देश एक पिछड़ा हुआ देश है और यहाँ ज्ञान,विज्ञान जो आया वह पश्चिम की देंन है। आज़ादी के एक लंबे अरसे बाद भी गुलामी की बू लोगों के दिलों से अभी निकली नहीं है। प्रस्तुत स्कैन आप देख रहे हैं उसमे आधुनिक अनुसंधान के आधार पर देश मे प्रचलित कुछ प्राचीन  परम्पराओं को विज्ञान -सम्मत बताया गया है।

मैक्स मूलर साहब जर्मनी से भारत आकर यहाँ 30 वर्ष रहे और संस्कृत सीख कर  मूल पांडुलिपियाँ लेकर जर्मनी रवाना हो गए। जर्मनी भाषा मे उनके अनुवादों को पढ़ कर वहाँ अनुसंधान हुये *-होमियोपैथी,बायोकेमिक चिकित्सा पद्धतियों को वहाँ ईजाद किया गया जो एलोपेथी  से श्रेष्ठ हैं। परमाणु तथा दूसरे आयुधों का आविष्कार भी वेदोक्त ज्ञान से वहाँ हुआ। जर्मनी की द्वितीय विश्व युद्ध मे पराजय के बाद अमेरिका और रूस ने इन परमाणु वैज्ञानिकों को अपने-अपने देश मे लगा लिया। अमेरिका ने सबसे पहले जापान की आत्म समपर्ण की घोषणा के बाद रूस को डराने के लिए 06 और 09 अगस्त को परमाणु बमो का प्रहार किया।

जर्मनी आदि पाश्चात्य देशों ने षड्यंत्र पूर्वक भारत मे यह प्रचार किया कि,'वेद गड़रियों के गीत 'के सिवा कुछ भी नहीं हैं (जबकि ये ही देश खुद वेद-ज्ञान का लाभ उठा कर खुद को विज्ञान का आविष्कारक बताते रहे)। हमारे देश के पाश्चात्य समर्थक विद्वान चाहे वे दक्षिण पंथी हों या प्रगतिशील बामपंथी दोनों ही साम्राज्यवादी इतिहासकारों के 'भटकाव' को ज्ञान-सूत्र मानते हैं जिसके अनुसार 'आर्य' मध्य यूरोप से घोड़ों पर सवार होकर भारत आए और यहाँ के 'मूल निवासियों' को दास बना लिया। इसी मान्यता के कारण देश मे आजकल एक साम्राज्यवाद पोषक आंदोलन 'मूल निवासियों देश को मुक्त करो' भी ज़ोर-शोर से चल रहा है। 

साम्राज्यवादी ब्रिटिश शासकों ने( जब सेफ़्टी वाल्व के रूप मे स्थापित कांग्रेस  आर्यसमाजियों के प्रभाव से 'राष्ट्र वादी आंदोलन चलाने लगी तब )अपने हितों की रक्षा हेतु RSS का गठन एक पूर्व क्रांतिकारी के माध्यम से कराया। RSS और मुस्लिम लीग ने देश को विभाजित करा दिया। आज भी नफरत की सांप्रदायिकता फैला कर साम्राज्यवादी अमेरिका को दोनों संप्रदायों के कुछ संगठन लाभ पहुंचा रहे हैं। RSS और इसके दूसरे सहायक संगठन 'गर्व से हिन्दू' की मुहिम चलाते हैं। प्रगतिशील-बामपंथी कहलाने वाले विद्वान भी हिन्दू,इस्लाम,ईसाइयत को ही धर्म मानते हैं और प्रकट मे धर्म की आलोचना तथा छिपे तौर पर उन सांप्रदायिक गतिविधियों का पालन करते हैं। 

धर्म =सत्य,अहिंसा (मनसा,वाचा,कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य के समुच्य को धर्म कहते हैं जो शरीर को धारण करने हेतु आवश्यक हैं। जो लोग 'धर्म' की आलोचना करते हैं वे इन सदगुणो का पालन न करने को प्रेरित करते हैं। इसी कारण 1917 मे सम्पन्न साम्यवादी क्रांति रूस मे विफल हो गई क्योंकि शासक पार्टी कार्यकर्ताओं और जनता का शोषण कर रहे थे। आज वहाँ समाज-सरकार द्वारा स्थापित उद्योग पूर्व शासकों ने अपने भ्रष्टाचार की कमाई से खरीद लिए हैं और पूंजीपति बन गए हैं। 

भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)। प्रकृति के ये पाँच तत्व ही संयुक्त रूप से 'भगवान' हैं चूंकि इनको किसी ने बनाया नहीं है और ये खुद ही बने हैं इसलिए ये ही 'खुदा' हैं।  इंनका कार्य G(जेनरेट)+O(आपरेट)+D(डेसट्राय) करना है इसलिए ये ही 'गाड ' हैं। जो भगवान=खुदा=गाड को दिमागी फितूर कहते हैं वे सच से आँखें मूँद लेने को ही कहते हैं। 

भगवान या खुदा या गाड =प्रकृति के पाँच तत्व । अतः इनकी पूजा का माध्यम केवल और केवल 'हवन' है। 'पदार्थ विज्ञान' =मेटेरियल साईन्स के मुताबिक अग्नि मे यह गुण है कि उसमे डाले गए पदार्थों को 'परमाणुओ' -'एटम्स' मे विभक्त कर देती है और वायु उन परमाणुओं को पर्यावरण मे प्रसारित कर देती है। अर्थात भगवान या खुदा या गाड को वे परमाणु प्राप्त हो जाते हैं क्योंकि ये तत्व सर्वत्र व्यापक हैं-घट-घट वासी हैं। इनके अतिरिक्त नदी,समुद्र,वृक्ष,पर्वत,आकाश,नक्षत्र,ग्रह आदि देवताओं को भी हवन द्वारा प्रसारित परमाणु प्राप्त हो जाते हैं। 'देवता' =जो देता है ,लेता नहीं है। अतः इन प्राकृतिक संसाधनो के अतिरिक्त और कोई देवता नहीं होता है। 

विवाद तभी शुरू होता है जब हिन्दू,इस्लाम,ईसाइयत  आदि के नाम पर 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' को धर्म की संज्ञा देकर पूजा जाता है। वस्तुतः व्यापारियों-उद्योगपतियों और शासकों ने मिल कर ये विभाजन अपने-अपने व्यापार को चमकाने हेतु समाज मे कर रखे हैं। प्रगतिशील-बामपंथी जनता को इन लुटेरे व्यापारियों के चंगुल से छुड़ाने हेतु 'धर्म' की वास्तविक व्याख्या प्रस्तुत करने के बजाए धर्म का विरोध करते हैं किन्तु पाखंड से उनको गुरेज नहीं है उसे वे भी धर्म ही पुकारते हैं। दमन जनता का होता है।

आज से 10 लाख वर्ष पूर्व जब मानव अपने वर्तमान स्वरूप मे आया तो प्रकृति के अनुरूप समाज मे पालन करने हेतु जो नियम बनाए गए वे ही 'वेद' हैं। वेद सभी समय के सभी मनुष्यों के लिए देश-काल के भेदभाव के बिना समान व्यवहार का मार्ग बताते हैं। शासकों और व्यापारियों ने अपने निजी स्वार्थ वश 'कर्मगत' वर्ण व्यवस्था को 'जन्मगत' जाति-व्यवस्था मे परिवर्तित करके शासितों का उत्पीड़न-शोषण किया। वेदोक्त परम्पराएँ विलुप्त हो गईं और समाज मे विषमता की खाई उत्पन्न हो गई। भारत मे विदेशी शासकों के आगमन पर उनके द्वारा यहाँ की जनता को 'हिन्दू' कह कर पुकारा गया जो फारसी भाषा मे एक गंदी और भद्दी गाली है। कुछ लोग अरबी भाषा के 'स ' को 'ह ' उच्चारण से जोड़ कर हिन्दू शब्द की हिमायत करते हैं तब भी यह विदेशियों की ही देंन साबित होता है। कुछ 'कुतर्क करने वाले  लोग ' हिन्दू शब्द की प्राचीनता टटोलते फिरते हैं,किन्तु ईरानियों के आने से पूर्व बौद्ध मठों,विहारों को उजाड़ने वाले उनके ग्रन्थों को जलाने वाले हिंसक लोगों को बौद्धों ने 'हिन्दू' की संज्ञा दी थी। 'हिन्दू' शब्द विदेशी और पूरी तरह से अभारतीय है। 'कुरान' की तर्ज पर विदेशी शासकों ने यहाँ के विद्वानों को 'सत्ता' व 'धन' सुख देकर 'पुराण' लिखवाये जो वेद-विपरीत हैं। किन्तु तथा कथित गर्व से हिन्दू लोग वेद और पुराण को गड्म गड करके गुमराह करते हैं और दुखद है कि प्रगतिशील बामपंथी भी उसी झूठ को मान्यता देते हैं। 

यू एस ए की राजधानी वाशिंगटन (DC) मे अग्निहोत्र यूनिवर्सिटी मे अनवरत 24 घंटे हवन चलता रहता है जिसके परिणामस्वरूप USA के क्ष्तिज पर बना ओज़ोन का छिद्र परिपूर्ण हो गया और वह सरक कर दक्षिण-पूर्व एशिया की तरफ आ गया है। इस क्षेत्र मे प्राकृतिक प्रकोपों का कारण यह ओज़ोन छिद्र ही है जो यू एस ए आदि पाश्चात्य देशों के कुकृत्य का कुफ़ल है। किन्तु हमारे बामपंथी भाई और प्रगतिशील पत्रकार जिनमे दैनिक जागरण के चेनल IBN 7वाले प्रमुख हैं 'हवन' का घोर विरोध करते हैं-व्यंग्य उड़ाते हैं। 

यदि हमे अपने देश 'भारत' को प्रकृतिक प्रकोपों से बचाना है,अपने नागरिकों को शुद्ध पर्यावरण उपलब्ध कराना है और परस्पर भाई-चारा उत्पन्न करना है तो 'वेदोक्त हवन' का सहारा लेना ही चाहिए। अन्यथा तो जो चल रहा है चलता रहेगा फिर रोना-झींकना क्यों?

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*वेदों के 'समष्टिवाद' का ही आधुनिक रूप है 'साम्यवाद' जिसका निरूपण किया जर्मनी के महर्षि कार्ल मार्क्स ने उन जर्मन ग्रन्थों के अवलोकन के पश्चात जो वेदों की मूल पांडु लिपियों से अनूदित थे। लेकिन भारतीय साम्यवादी विद्वान 'साम्यवाद' को पाश्चात्य विज्ञान मानते हैं और इसी मुगालते मे जनता से कटे रहते हैं। वस्तुतः 'साम्यवाद'='समष्टिवाद' मूल रूप से भारतीय अवधारणा है और इसे लागू भी तभी किया जा सकेगा जब हकीकत को समझ लिया जाएगा।

Thursday, August 9, 2012

श्री कृष्ण -साम्यवाद और वेद विज्ञान ------ विजय राजबली माथुर

ज़िला मंत्री-भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी,लखनऊ ने काउंसिल की एक बैठक मे श्री कृष्ण के बचपन की उस घटना का उल्लेख करते हुये कार्यकर्ताओं का आह्वान किया था कि हमे उनसे प्रेरणा लेकर संघर्ष पथ  पर बढ़ना चाहिए। कामरेड  जिलमंत्री ने स्पष्ट किया कि उस समय गावों का शहरों द्वारा शोषण चरम पर था और बालक श्री कृष्ण को यह गवारा न हुआ अतः उन्होने शहरों की ओर 'मक्खन' ले जाती ग्वालनों की मटकियाँ फोड़ने का कार्यक्रम अपने बाल साथियों के साथ चलाया था।

योगीराज श्री कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन शोषण-उत्पीड़न और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करते हुये ही बीता किन्तु ढ़ोंगी-पोंगापंथी-पुरोहितवाद ने आज श्री कृष्ण के संघर्ष को 'विस्मृत' करने हेतु उनको अवतार घोषित करके उनकी पूजा शुरू करा दी। कितनी बड़ी विडम्बना है कि 'कर्म' पर ज़ोर देने वाले श्री कृष्ण के 'कर्मवाद' को भोथरा करने के लिए उनको अलौकिक बता कर उनकी शिक्षाओं को भुला दिया गया और यह सब किया गया है शासकों के शोषण-उत्पीड़न को मजबूत करने हेतु। अनपढ़ तो अनपढ़ ,पढे-लिखे मूर्ख ज़्यादा ढोंग-पाखंड मे उलझे हुये हैं।


तथा कथित प्रगतिशील साम्यवादी बुद्धिजीवी जिंनका नेतृत्व विदेश मे बैठे पंडित अरुण प्रकाश मिश्रा और देश मे उनके बड़े भाई पंडित ईश मिश्रा जी  करते हैं सांप्रदायिक तत्वों द्वारा निरूपित सिद्धांतों को धर्म मान कर धर्म को त्याज्य बताते हैं। जबकि धर्म=जो शरीर को धारण करने के लिए आवश्यक है वही 'धर्म' है;जैसे-सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य । अब यदि ढ़ोंगी प्रगतिशीलों की बात को सही मान कर धर्म का विरोध किया जाये तो हम लोगों से इन सद्गुणों को न अपनाने की बात करते हैं और यही कारण है कि सोवियत रूस मे साम्यवाद का पतन हो गया(सोवियत भ्रष्ट नेता ही आज वहाँ पूंजीपति-उद्योगपति हैं जो धन जनता और कार्यकर्ता का शोषण करके जमा किया गया था उसी के बल पर) एवं चीन मे जो है वह वस्तुतः पूंजीवाद ही है।दूसरी ओर थोड़े से  पोंगापंथी केवल 'गीता' को ही महत्व देते हैं उनके लिए भी 'वेदों' का कोई महत्व नहीं है। 'पदम्श्री 'डॉ कपिलदेव द्विवेदी जी कहते हैं कि,'भगवद  गीता' का मूल आधार है-'निष्काम कर्म योग'

"कर्मण्ये वाधिकारस्ते ....................... कर्मणि। । " (गीता-2-47)

इस श्लोक का आधार है यजुर्वेद का यह मंत्र-

"कुर्वन्नवेह कर्मा................... न कर्म लिपयाते नरो" (यजु.40-2 )

इसी प्रकार सम्पूर्ण बाईबिल का मूल मंत्र है 'प्रेम भाव और मैत्री' जो यजुर्वेद के इस मंत्र पर आधारित है-

"मित्रस्य मा....................... भूतानि समीक्षे।  ....... समीक्षा महे । । " (यजु .36-18)

एवं कुरान का मूल मंत्र है-एकेश्वरवाद-अल्लाह की एकता ,उसके गुण धर्मा सर्वज्ञ सर्व शक्तिमान,कर्त्ता-धर्त्तासंहर्त्ता,दयालु आदि(कुरान7-165,12-39,13-33,57-1-6,112-1-4,2-29,2-96,87-1-5,44-6-8,48-14,1-2,2-143 आदि )। 


इन सबके आधार मंत्र हैं-


1-"इंद्रम मित्रम....... मातरिश्चा नामाहू : । । " (ऋग-1-164-46)

2-"स एष एक एकवृद एक एव "। । (अथर्व 13-4-12)
3-"न द्वितीयों न तृतीयच्श्तुर्थी नाप्युच्येत। । " (अथर्व 13-5-16)


पहले के विदेशी शासकों ने हमारे महान नेताओं -राम,कृष्ण आदि को बदनाम करने हेतु तमाम मनगढ़ंत कहानियाँ यहीं के चाटुकार विद्वानों को सत्ता-सुख देकर लिखवाई जो 'पुराणों' के रूप मे आज तक पूजी जा रही हैं। बाद के अंग्रेज़ शासकों ने तो हमारे इतिहास को ही तोड़-मरोड़ दिया। यूरोपीय इतिहासकारों ने लिख दिया आर्य एक जाति-नस्ल थी जो मध्य यूरोप से भारत एक आक्रांता के रूप मे आई थी जिसने यहाँ के मूल निवासियों को गुलाम बनाया। इसी झूठ को ब्रह्म वाक्य मानते हुये 'मूल निवासियों भारत को आज़ाद करो' आंदोलन चला कर भारत को छिन्न-भिन्न करने का कुत्सित प्रयास चल रहा है। अंग्रेजों ने लिख दिया कि 'वेद गड़रियों के गीत हैं' और साम्राज्यवाद विरोधी होने का दंभ भरने वाले पंडित अरुण प्रकाश मिश्रा सरीखे उद्भट विद्वान उसी आधार पर वेदों को अवैज्ञानिक बताते नहीं थकते हैं।


जर्मनी के मैक्स मूलर साहब भारत आए और यहाँ 30 वर्षों तक रह कर 'संस्कृत' सीख कर वेदों को समझा एवं मूल पांडु लिपियाँ एकत्र कर चलते बने। जर्मन मे उनके अनुवाद किए गए फिर अङ्ग्रेज़ी आदि दूसरी भाषाओं मे जर्मन भाषा से अनुवाद हुये। हिटलर ने खुद को आर्य घोषित करते हुये दूसरों के प्रति नफरत फैलाई जो कि आर्यत्व के विपरीत है। 'आर्य'=श्रेष्ठ अर्थात वे स्त्री पुरुष जिनके आचरण और कार्य श्रेष्ठ हैं 'आर्य' है इसके विपरीत लोग अनार्य हैं। न यह कोई जाति थी न है।


'आर्य' सार्वभौम शब्द है और यह किसी देश-काल की सीमा मे बंधा हुआ नहीं है। आर्यत्व का मूल 'समष्टिवाद' अर्थात 'साम्यवाद' है। प्रकृति में संतुलन को बनाए रखने हेतु हमारे यहाँ यज्ञ -हवन किये जाते थे। अग्नि में डाले गए पदार्थ परमाणुओं में विभक्त हो कर वायु द्वारा प्रकृति में आनुपातिक रूप से संतुलन बनाए रखते थे.'भ'(भूमि)ग (गगन)व (वायु) ।(अनल-अग्नि)न (नीर-जल)को अपना समानुपातिक भाग प्राप्त होता रहता था.Generator,Operator ,Destroyer भी ये तत्व होने के कारण यही GOD है और किसी के द्वारा न बनाए जाने तथा खुद ही बने होने के कारण यही 'खुदा'भी है।  अब भगवान् का अर्थ मनुष्य की रचना -मूर्ती,चित्र आदि से पोंगा-पंथियों के स्वार्थ में कर दिया गया है और प्राकृतिक उपादानों को उपेक्षित छोड़ दिया गया है जिसका परिणाम है-सुनामी,अति-वृष्टि,अनावृष्टि,अकाल-सूखा,बाढ़ ,भू-स्खलन,परस्पर संघर्ष की भावना आदि-आदि.


एक विद्वान की इस प्रार्थना पर थोडा गौर करें -

ईश हमें देते हैं सब कुछ ,हम भी तो कुछ देना सीखें.
जो कुछ हमें मिला है प्रभु से,वितरण उसका करना सीखें..१ ..

हवा प्रकाश हमें मिलता है,मेघों से मिलता है पानी.
यदि बदले में कुछ नहीं देते,इसे कहेंगे बेईमानी..
इसी लिए दुःख भोग रहे हैं,दुःख को दूर भगाना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..२ ..

तपती धरती पर पथिकों को,पेड़ सदा देता है छाया.
अपना फल भी स्वंय न खाकर,जीवन उसने सफल बनाया..
सेवा पहले प्रभु को देकर,बाकी स्वंय बरतना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..३..

मानव जीवन दुर्लभ है हम,इसको मल से रहित बनायें.
खिले फूल खुशबू देते हैं,वैसे ही हम भी बन जाएँ..
जप-तप और सेवा से जीवन,प्रभु को अर्पित करना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..४..

असत नहीं यह प्रभुमय दुनिया,और नहीं है यह दुखदाई.
दिल-दिमाग को सही दिशा दें,तो बन सकती है सुखदाई ..
'जन'को प्रभु देते हैं सब कुछ,लेकिन 'जन'तो बनना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..५..

शीशे की तरह चमकता हुआ साफ़ है कि वैदिक संस्कृति हमें जन  पर आधारित अर्थात  समष्टिवादी बना रही है जबकि आज हमारे यहाँ व्यष्टिवाद हावी है जो पश्चिम के साम्राज्यवाद की  देन है। दलालों के माध्यम से मूर्ती पूजा करना कहीं से भी समष्टिवाद को सार्थक नहीं करता है,जबकि वैदिक हवन सामूहिक जन-कल्याण की भावना पर आधारित है। IBN 7 के पत्रकार हवन का विरोध पोंगापंथ को सबल बनाने हेतु करते है और दूसरे चेनल वाले भी। साम्राज्यवादी -विदेशी तो खुद को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए वेदों का विरोध करते ही हैं एवं उनके निष्कर्षों का लाभ लेकर उसे अपना आविष्कार बताते हैं।

ऋग्वेद के मंडल ५/सूक्त ५१ /मन्त्र १३ को देखें-

विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्निः स्वस्तये.
देवा अवन्त्वृभवः स्वस्तये स्वस्ति नो रुद्रः पात्व्हंससः ..

(जनता की कल्याण -कामना से यह यज्ञ  रचाया.
विश्वदेव के चरणों में अपना सर्वस्व चढ़ाया..)

जो लोग (अरुण प्रकाश मिश्रा -ईश मिश्रा जी और उनके चेले सरीखे )धर्म की वास्तविक व्याख्या को न समझ कर गलत  उपासना-पद्धतियों को ही धर्म मान कर चलते हैं वे अपनी इसी नासमझ के कारण ही  धर्म की आलोचना करते और खुद को प्रगतिशील समझते हैं जबकि वस्तुतः वे खुद भी उतने ही अन्धविश्वासी हुए जितने कि पोंगा-पंथी अधार्मिक होते हैं। 

ऋग्वेद के मंडल ७/सूक्त ३५/मन्त्र १ में कहा गया है-

शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शन्न इन्द्रावरुणा रातहव्या डे
शमिन्द्रासोमा सुविताय शंयो :शन्न इन्द्रा पूष्णा वाजसात..

(सूर्य,चन्द्र,विद्युत्,जल सारे सुख सौभाग्य बढावें.
रोग-शोक-भय-त्रास हमारे पास कदापि न आवें..)

वेदों में किसी व्यक्ति,जाति,क्षेत्र,सम्प्रदाय,देश-विशेष की बात नहीं कही गयी है.वेद सम्पूर्ण मानव -सृष्टि की रक्षा की बात करते हैं.इन्हीं तत्वों को जब मैक्समूलर साहब जर्मन ले गए तो वहां के विचारकों ने अपनी -अपनी पसंद के क्षेत्रों में उनसे ग्रहण सामग्री के आधार पर नई -नई खोजें प्रस्तुत कीं हैं.जैसे डा.हेनीमेन ने 'होम्योपैथी',डा.एस.एच.शुस्लर ने 'बायोकेमिक'  भौतिकी के वैज्ञानिकों ने 'परमाणु बम'एवं महर्षि कार्ल मार्क्स ने 'वैज्ञानिक समाजवाद'या 'साम्यवाद'की खोज की। 

दुर्भाग्य से महर्षि कार्ल मार्क्स ने भी अन्य विचारकों की भाँती ही गलत उपासना-पद्धतियों (ईसाइयत,इस्लाम और हिन्दू ) को ही धर्म मानते हुए धर्म की कड़ी आलोचना की है ,उन्होंने कहा है-"मैंन  हैज क्रियेटेड द गाड फार हिज मेंटल सिक्योरिटी ओनली".आज भी उनके अनुयाई एक अन्धविश्वासी की भांति इसे ब्रह्म-वाक्य मान कर यथावत चल रहे हैं.जबकि आवश्यकता है उनके कथन को गलत अधर्म के लिए कहा गया मानने की.'धर्म'तो वह है जो 'धारण'करता है ,उसे कैसे छोड़ कर जीवित रहा जा सकता है.कोई भी वैज्ञानिक या दूसरा विद्वान यह दावा नहीं कर सकता कि वह-भूमि,गगन,वायु,अनल और नीर (भगवान्,GODया खुदा जो ये पाँच-तत्व ही हैं )के बिना जीवित रह सकता है.हाँ ढोंग और पाखण्ड तथा पोंगा-पंथ का प्रबल विरोध करने की आवश्यकता मानव-मात्र के अस्तित्व की रक्षा हेतु जबरदस्त रूप से है। 

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05-09-2015 ---
25-08-16 

Wednesday, June 13, 2012

बाबूजी एक स्मरण -13 जून पुण्य तिथि पर

स्व.ताज राज बली माथुर (चित्र महायुद्ध से लौटने के बाद )
1939-45 द्वितीय विश्व युद्ध मे प्राप्त बाबूजी का मेडल जिसके निचले किनारे पर उनका नाम -T.B.Mathur  एङ्ग्रेव किया हुआ है। 

द्वितीय विश्व युद्ध का ही एक और मेडल 



बाबूजी (निधन-13 जून 1995 )और बउआ(निधन-25 जून 1995) चित्र 1978 मे रिटायरमेंट से पूर्व  लिया गया



जब बाबूजी लखनऊ मे रह कर अपनी पढ़ाई कर रहे थे और इंटर मीडिएट का फर्स्ट ईयर ही पास कर पाये थे कि 1939 मे द्वितीय विश्व महायुद्ध छिड़ गया । अपने कुछ सहपाठियों के साथ बाबूजी ने भी सेना मे भर्ती होने का आवेदन कर दिया और चुन लिए गए। खेल-कूद मे उनके पास काफी सर्टिफिकेट थे जिनके आधार पर सिलेक्शन आसानी से हो गया था। दरियाबाद जाकर बाबूजी ने बाबाजी को यह सूचना दी तो उन्होने कहा कि फिर यहाँ क्यों आए हो?बाबूजी ने इसे उनकी सहमति माना और न भी मानते तब भी नियुक्ति के बाद जाने से इंकार करना संभव न था। उनको यूनिट मे स्टोर का चार्ज मिला। इम्फाल ,चटगांव आदि मे उनकी यूनिट रही। जब अंडमान की तरफ उनकी यूनिट जा रही थी तो साथ का राशन खत्म हो जाने पर एक बार उन्होने भी दूसरों की तरह उबले अंडे खाने को खरीद लिए परंतु खा न सके और भूखे रह कर ही वक्त गुजारा। बीच मे ही खबर मिली कि अंडमान पर नेताजी सुभाष चंद्र बॉस की 'आज़ाद हिन्द फौज'का कब्जा हो गया है और उनकी यूनिट को वापिस कलकत्ता लौटने का आदेश मिला। वह बताते थे कि यदि खबर देर से पहुँचती तो उनकी यूनिट अंडमान पहुँच कर INA मे शामिल हो जाती। एक ऐतिहासिक अवसर से बाबूजी और उनके साथी वंचित रह गए। ऊपर चित्र मे दिखाये मेडल और बैज वगैरह अपने खेल के सर्टिफिकेट समेत उन्होने खेलने को यशवन्त को दे दिये थे। यशवन्त ने ही उनको बताया कि मेडल पर बाबाजी आपका नाम खुदा हुआ है। इससे पूर्व उन्होने कभी खुद इस ओर ध्यान ही नहीं दिया था।

सात साल सेना की नौकरी करके सात साल बाबूजी दरियाबाद मे रहे उनका इरादा खेती देखने का था। किन्तु अपने बड़े भाई के व्यवहार से खिन्न होकर अपनी यूनिट के आफ़ीसर कमांडिंग रहे अधिकारी जो बाद मे लखनऊ मे CWE की पोस्ट पर थे की मदद से पुनः MES मे नौकरी कर ली। सात साल लखनऊ,डेढ़ साल बरेली,पाँच साल सिलीगुड़ी,सात साल मेरठ और चार साल आगरा मे पोस्ट रह कर नौकरी की। 1978 मे रिटायर होकर 1995  मे मृत्यु तक मेरे पास आगरा मे ही रहे। बीच-बीच मे कुछ समय के लिए अजय के पास फरीदाबाद भी गए।

खेलों के प्रति लगाव के ही कारण बाबूजी का सुप्रसिद्ध  साहित्यकार स्व.अमृत लाल नागर जी और नवभारत टाइम्स के संपादक रहे ठाकुर स्व .राम पाल सिंह  जी से संपर्क था। अमृत लाल जी बाबूजी से सीनियर थे और वह ओल्ड ब्वायज एसोसिएशन की ओर से खेलने आते थे जबकि राम पाल सिंह जी बाबू जी से जूनियर थे और स्कूल की टीम मे साथ-साथ खेलते थे।  उत्तर प्रदेश भाकपा के सचिव रहे कामरेड भीखा लाल जी तो बाबूजी के क्लास मे ही पढ़ते भी थे और एक ही हास्टल रूम मे रहते भी थे। किन्तु फौज मे जाने के बाद इन सबसे बाबूजी का संपर्क टूट गया था। कामरेड भीखा लाल जी ने मुझे आगरा से एक प्रदर्शन मे लखनऊ भाग लेने के अवसर पर आने पर बताया था जिसकी बाद मे बाबूजी ने भी पुष्टि की कि उन्होने PCS मे जाने और तहसीलदार बनने के बाद भी कई बार बाबूजी को बुलाया था और बाद मे MLA बनने पर भी किन्तु वह उनसे नहीं मिले। बाबूजी ने मुझे बताया कि वह पहले बड़े अफसर थे फिर बड़े नेता और हम उनकी टक्कर मे कुछ नहीं थे इसलिए मिलने नहीं गए। शायद यही कारण होगा कि उन्होने लखनऊ मे ही रहते हुये भी अमृत लाल नागर जी से भी संपर्क फिर नहीं बनाया होगा। कामरेड भीखा लाल जी ने मुझे आदेश दिया था कि अगली बार जब लखनऊ आना तो अपने बाबूजी को भी साथ लाना किन्तु उसके कुछ समय बाद  उनका निधन हो गया था हालांकि बाबूजी ने उनसे मिलने की बात स्वीकार कर ली थी।

लखनऊ मे बाबूजी हास्टल के अलावा अपनी भुआ के घर निवाजगंज मे भी काफी रहे थे। उनके फुफेरे भाई स्व.रामेश्वर दयाल माथुर के पुत्र ने बताया है कि हमारे बाबूजी और ताऊजी भाई होने के साथ-साथ मित्र भी थे तथा उनके निवाज गंज के और साथी थे-स्व.हरनाम सक्सेना जो दरोगा बने,स्व.देवकी प्रसाद सक्सेना,स्व.देवी शरण सक्सेना,स्व.देवी शंकर सक्सेना.इनमें से दरोगा जी को १९६४ में रायपुर में बाबाजी से मिलने आने पर व्यक्तिगत रूप से देखा था बाकी की जानकारी पहली बार पिछले वर्ष ही  प्राप्त हुई। बाबूजी की भुआ उनका ख्याल रखती थीं। लेकिन बाबूजी की बहन कैलाश किशोरी ने न केवल अपने एक भाई को मुकदमे मे छल से हराया वरन  कुछ भतीजों के प्रति भी उनका व्यवहार विद्वेषात्मक रहा। उनकी नकल कर रही हैं उनकी भतीजी डॉ शोभा जो बाबूजी की ही इकलौती बेटी हैं। डॉ शोभा अपनी भुआ को फालों करते हुये अजय की पुत्री और मेरे पुत्र से विद्वेषात्मक व्यवहार रख रही हैं,उनकी छोटी बेटी पूना के अपने संपर्कों से कुछ ब्लागर्स को भी गुमराह कर रही है। लेकिन तब बाबूजी की फुफेरी भाभी जी ने बचपन मे मेरी भी देख-रेख की और अस्पताल ज़रूरत पड़ने पर लेकर गईं। तब रिश्ते चलते थे अब पैसा । अमीर-गरीब मे रिश्ता नहीं निभता।

13 जून 1995 को दो दिन के मामूली बुखार के बाद बाबूजी का भी निधन हो गया था। आज उनको यह संसार छोड़े हुये 17 वर्ष हो रहे हैं। मैं केवल 'वेदिक' हवन द्वारा विशेष सात आहुतियाँ देकर उनकी आत्मा की शांति हेतु प्रार्थना करता हूँ। मैं किसी प्रकार का ढोंग (कनागत) आदि नही करता हूँ। जब तक वह जीवित रहे जिस प्रकार संतुष्ट हो सकते थे अपनी ओर से संतुष्ट रखने का प्रयास किया। उनके नाम पर अब कोई दिखावा या आडंबर करना मैं उचित नहीं समझता हूँ।

आज ही 'विद्रोही स्व-स्वर मे'उनके जीवन का ज्योतिषयात्मक विश्लेषण भी दिया है जो लोग ग्रहों की चालों का व्यक्तिगत जीवन पर प्रभाव जानने को उत्सुक हों ,वे इसी ब्लाग के सहारे से वहाँ पहुँच सकते हैं। 

Thursday, April 5, 2012

संसदीय लोकतन्त्र और साम्यवाद


कल 06 अप्रैल - दंतेवाड़ा त्रासदी की वर्षगांठ के अवसर पर हम आज  यह बताना चाहते हैं कि 'हिंसा' को छोड़ कर अपने संसदीय लोकतन्त्र के माध्यम से ही हम 'मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध' बनाने हेतु प्रयास करके सफल हो सकते हैं। दो वर्ष पूर्व इस त्रासदी पर मैंने समाधान हेतु विचार प्रस्तुत किए थे ,पहले उनमे से कुछ का अवलोकन करें जो इस प्रकार हैं-

दंतेवाडा आदि नक्सली आन्दोलनों का समाधान हो सकता है सर्वप्रथम दोनों और की हिंसा को विराम देना होगा फिर वास्तविक धर्म अथार्त सत्य,अहिंसा,अस्तेय,अपरिग्रह,ब्रहम्चर्य का वस्तुतः पालन करना होगा.

सत्य-सत्य यह है कि गरीब मजदूर-किसान का शोषण व्यापारी,उद्योगपति,साम्राज्यवादी सब मिलकर कर रहे हैं.यह शोषण अविलम्ब समाप्त किया जाये.
अहिंसा-अहिंसा मनसा,वाचा,कर्मणा होनी चाहिए.शक्तिशाली व सम्रद्द वर्ग तत्काल प्रभाव से गरीब किसान-मजदूर का शोषण और उत्पीडन बंद करें.
अस्तेय-अस्तेय अथार्त चोरी न करना,गरीबों के हकों पर डाका डालना व उन के निमित्त सहयोग –निधियों को चुराया जाना तत्काल  प्रभाव से बंद किया जाये.कर-अप्बंचना समाप्त की जाये.
अपरिग्रह-जमाखोरों,सटोरियों,जुअरियों,हवाला व्यापारियों,पर तत्काल प्रभाव से लगाम कसी जाये और बाज़ार में मूल्यों को उचित स्तर पर आने दिया जाये.कहीं नोटों को बोरों में भर कर रखने कि भी जगह नहीं है तो अधिकांश गरीब जनता भूख से त्राहि त्राहि कर रही है इस विषमता को तत्काल दूर किया जाये.
ब्रह्मचर्य -धन का असमान और अन्यायी वितरण ब्रहाम्चर्य व्यवस्था को खोखला कर रहा हैऔर इंदिरा नगर लखनऊ के कल्याण अपार्टमेन्ट जैसे अनैतिक व्यवहारों को प्रचलित कर रहा है.अतः आर्थिक विषमता को अविलम्ब दूर किया जाये.चूँकि हम देखते हैं कि व्यवहार में धर्मं का कहीं भी पालन नहीं किया जा रहा है इसीलिए तो आन्दोलनों का बोल बाला हो रहा है. दंतेवाडा त्रासदी खेदजनक है किन्तु इसकी प्रेरणा स्त्रोत वह सामाजिक दुर्व्यवस्था है जिसके तहत गरीब और गरीब तथा अमीर और अमीर होता जा रहा है.कहाँ हैं धर्मं का पालन कराने वाले?पाखंड और ढोंग तो धर्मं नहीं है,बल्कि यह ढोंग और पाखण्ड का ही दुष्परिणाम है  कि शोषण और उत्पीडन की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं.जब क्रिया होगी तो प्रतिक्रिया होगी ही.


शुद्द रहे व्यवहार नहीं,अच्छे आचार नहीं.
इसीलिए तो आज ,सुखी कोई परिवार नहीं.


उत्तर प्रदेश और पंजाब के पिछले विधान सभा चुनावों मे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने बाम-पंथी मोर्चा बना कर चुनाव लड़े थे किन्तु जनता का समर्थन न मिल सका। अब पटना सम्मेलन के बाद यू पी मे सत्तारूढ़ सपा को लेकर तीसरा मोर्चा बनाने का प्रयास भाकपा द्वारा किया जा रहा है। संसदीय लोकतन्त्र मे ऐसे प्रयास ठीक हैं। परंतु बाम-पंथी और साम्यवादी सपनों का देश बनाने मे इन प्रयासों से कुछ भी भला न हो सकेगा,उल्टे साम्यवादी दल एवं बाम-पंथ भी बदनाम होगा जिससे अब तक बचा हुआ है। 

जातिगत,सांप्रदायिक आधार लेकर कारपोरेट जगत के सहारे से सत्तारूढ़ सपा व्यवहारिक सोच मे 'समाजवादी' नहीं है। 
न तो सपा डॉ लोहिया के आदर्शों पर ही चल रही है और न ही डॉ लोहिया के विचार साम्यवाद के लिए सहायक हैं जैसा कि सत्यनारायन ठाकुर साहब ने अपने लेखों की श्रंखला मे स्पष्ट किया था। उस पर मैंने यह टिप्पणी दी थी-

"सत्य नारायण ठाकुर साहब ने डा. लोहिया के विचारों के विरोधाभास को उजागर करते हुए तीन कड़ियों में विस्तार से बताया है उस पर ध्यान देने की पर्मावाश्यक्ता है.
वस्तुतः डा.लोहिया ने १९३० में 'कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी'की स्थापना १९२५ में स्थापित भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी'और इसके आंदोलन को विफल करने हेतु की थी.
स्वामी दयानंद के नेतृत्व में 'आर्य समाज'के माध्यम से देश की आजादी की जो मांग १८७५ में उठी थी उसे दबाने हेतु १८८५ में कांग्रेस की स्थापना रिटायर्ड आयी.सी.एस.श्री ह्यूम द्वारा वोमेश बेनर्जी की अध्यक्षता में हुयी थी जिसमें आर्य समाजियों ने घुस कर आजादी की मांग उठाना शुरू कर दिया था.बाद में कम्यूनिस्ट भी कांग्रेस में घुस कर ही स्वाधीनता आंदोलन चला रहे थे.
१९२० में स्थापित हिन्दू महासभा के विफल रहने पर १९२५ में आर.एस.एस. की स्थापना अंग्रेजों के समर्थन और प्रेरणा से हुयी जिसने आर्य समाज को दयानंद के बाद मुट्ठी में कर लिया तब स्वामी सहजानंद एवं गेंदा लाल दीक्षित सरीखे आर्य समाजी कम्यूनिस्ट आंदोलन में शामिल हो गए थे.
सी.एस. पी की वजह से जनता भ्रमित रही और क्रांतिकारी ही कम्यूनिस्ट हो सके.
डा.लोहिया ने अपनी पुस्तक'इतिहास चक्र'में साफ़ लिखा है 'साम्यवाद' और पूंजीवाद'सरीखा कोई भी वाद भारत के लिए उपयोगी नहीं है .
हम कम्यूनिस्ट जनता को यह नहीं समझाते थे -कम्यूनिज्म भारतीय अवधारणा है जिसे मैक्समूलर साहब की मार्फ़त महर्षि मार्क्स ने ग्रहण करके 'दास केपिटल'लिखा था.हमने धर्म को अधर्मियों के लिए खुला छोड़ दिया और कहते रहे-'मैन हेज क्रियेटेड गाड फार हिज मेंटल सिक्यूरिटी आनली'.हम जनता को यह नहीं समझा सके -जो शरीर को धारण करे वह धर्म है.नतीजा यह रहा जनता को भटका कर धर्म के नाम पर शोषण को मजबूत किया गया. डा.लोहिया भी रामायण मेला आदि शुरू कराकर जनता को जागृत करने के मार्ग में बाधक रहे.

आज यदि हम धर्म की वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करके जनता को स्वामी दयानद,विवेकानंद,कबीर और कुछ हद तक गौतम बुद्ध का भी सहारा लेकर समझा सकें तो मार्क्सवाद को भारत में सफल कर सकते हैं जो यहीं सफल हो सकता है.यूरोपीय दर्शन जो रूस में लागू हुआ विफल हो चुका है.केवल और केवल भारतीय दर्शन ही मार्क्सवाद को उर्वर भूमि प्रदान करता है,यदि हम उसका लाभ उठा सकें तो जनता को राहत मिल सके.व्यक्तिगत स्तर पर मैं अपने 'क्रांतिस्वर' के  माध्यम से ऐसा ही कर रहा हूँ.परन्तु यदि सांगठनिक-तौर पर  किया जा सके तभी सफलता मिल सकती है।" 



हमारे कामरेड्स के बीच यह बड़ी गलतफहमी है कि धर्म कम्यूनिज़्म का विरोधी है। चूंकि वे पोंगा-पंथियों के प्रलाप को ही धर्म मानते हैं इसलिए ऐसा सोचते हैं। बात-बात मे चीन का उदाहरण देने वाले हमारे कामरेड्स बंधु इस समाचार पर गौर करके अमल करें तो लाभान्वित हो सकते हैं-


हिंदुस्तान,आगरा,23 फरवरी,2007
इसी ब्लाग के माध्यम से व्यक्तिगत-स्तर पर मै तो  'धर्म' की वास्तविक व्याख्या बार-बार समझाने का प्रयास करता रहूँगा तथा ढोंग-पाखंड का प्रबल विरोध करता रहूँगा किन्तु दुख और खेद के साथ कहना चाहता हूँ कि हमारे कामरेड साथी ही जो धर्म को सिरे से ही खारिज करते हैं अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन मे धर्म के नाम पर प्रदूषित पोंगा-पंथ का खूब अनुसरण करते है-मंदिर,मस्जिद और मजारों,चर्च और गुरुद्वारों  तक जाते हैं। जबकि मै केवल वैज्ञानिक 'हवन' ही करता हूँ और किसी भी प्रकार के  ढ़ोंगी स्थानो  पर जाने से परहेज करता हूँ। 


भारत मे लोकतान्त्रिक रूप से साम्यवादी -सत्ता स्थापित करने हेतु जनता को वास्तविक -वैज्ञानिक 'धर्म' से परिचय कराना ही होगा -आज नहीं तो कल। अन्यथा तीसरे-चौथे मोर्चे के नाम पर फिर वही लुटेरे राज करते रहेंगे।सी पी आई और सी पी एम के विलय के प्रयास भी हो रहे हैं केवल इतने मात्र से साम्यवादी विचार -धारा को 'हिन्दी क्षेत्र' मे समर्थन नहीं हासिल हो सकेगा। डॉ राम मनोहर लोहिया,राजर्षि पुरुषोत्तम दास  टंडन,सरदार पटेल,लाल बहादुर शास्त्री जी,चौ.चरण सिंह  आदि ऐसे ख्याति प्राप्त राष्ट्रीय नेता रहे हैं जिनहोने बड़े ही सुनियोजित ढंग से हिन्दी क्षेत्र मे साम्यवादी आंदोलन को कुचला और दबाया था। जब हम हिन्दी क्षेत्र मे साम्यवादी आंदोलन की पुनः प्रतिष्ठा करने का प्रयास करेंगे तो हमे जनता को यह भी समझाना पड़ेगा कि इन प्रसिद्ध नेताओ ने 'धर्म की गलत व्याख्या' को समर्थन देने के कारण साम्यवाद का विरोध किया था। ऐसा करने से ही हम जनता का समर्थन सत्ता हेतु प्राप्त कर सकेंगे। अन्यथा जनता अपनी मूलभूत समस्याओ का निराकरण साम्यवादियों से कराती रहेगी और चुनावो मे वोट जातीय और धार्मिक आधार पर देती रहेगी। आखिर क्या वजह है कि हम जनता को 'धर्म' के वास्तविक अर्थ समझा कर उसका ठोस समर्थन हासिल नहीं कर सकते?

Sunday, April 1, 2012

सार्वजनिक चिन्ता-गोपनीय समाधान



बिहारी बाबू-सलिल वर्मा 
21 मार्च 2012 को फेस बुक पर बिहारी बाबू -सलिल वर्मा जी ने निम्नलिखित चिंता व्यक्त की थी। उनकी यह रचना और चिन्ता मुझे सर्वोत्कृष्ट प्रतीत हुई किन्तु इसका समाधान मै उनको गोपनीय रूप मे  नीचे दे रहा हूँ वह चाहें तो इसे सार्वजनिक कर सकते हैं। ( is not a First April joke) ?

घूम रहे ब्रह्माण्ड में कितने तारे, ग्रह, नक्षत्र
किंतु प्रकृति ने बस हमको ही दी है
मीठे पानी की नदियाँ, सुंदर झरने और हरे भरे वन.
लेकिन हमने प्रकृति के उपहार का बस उपहास बनाया
जैसे चाहा वैसे इसको रौंदा, कुचला, दास बनाया.
धरती की छाती पर हमने, गाड़ के खूंटे, बाँट ली धरती,
जब कराह से काँपी धरती, हम बोले भूचाल है आया.
नदियों को मैला करके, हालत कर दी नाले से बदतर,
नदियाँ तट को तोड़ चलीं, तो हम बोले कि बाढ़ है आई.
काट दिए सब जंगल, वन और पर्वत को नंगा कर डाला,
बारिश रस्ता भूल गई और हम बोले सूखा है आया.
जाने क्या क्या बहा दिया जब हमने सागर के पानी में,
सागर ने प्रतिकार किया तो हमने कहा सूनामी आई.
.
प्रकृति माँ है, हमने प्रकृति का कितना अपमान किया
माँ के जब आँसू निकले, प्राकृतिक आपदा नाम दिया.
बात याद रखनी थी जो वह भूल गया क्यों अपना मन
प्रकृति ने बस हमको दी है, मीठे पानी की नदियाँ,
सुंदर झरने और हरे भरे वन!!




आपको जन्मदिन की बधाई कहने का दुस्साहस नहीं कर सकता मैं.. बस अही स्वार्थपूर्ण कामना कर सकता हूँ कि आपका आशीष भरा हाथ हमारे सिर पर आने वाली सदियों तक बना रहे!!
 ·  · See Friendship · February 4 at 11:17pm · 
  • You and Yashwant Mathur like this.
    • Vijai RajBali Mathur धन्यवाद।निश्चय ही आपकी मनोकामना पूर्ण हो ,हमारी सद्भावनाएं सदा आपके साथ हैं।
      February 5 at 8:16am ·  · 


आपने खुद ही मुझे यह अधिकार दिया है कि आप पर आशीष बनाए रखूँ अतः यह मेरा कर्तव्य बन जाता है कि आपके द्वारा व्यक्त इस प्राकृतिक चिंता का प्राकृतिक समाधान आपको प्रस्तुत करूँ। नीचे 'आर्यसमाज' द्वारा दिये गए कुछ समाधान आपकी खिदमत मे पेश हैं-

                                        यज्ञ  माहात्म्य

लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की।
जो वस्तु अग्नि मे जलाई,हल्की होकर वो ऊपर उड़ाई।
करे वायु से मिलान,जाती है रस्ता गगन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 1 । ।

फिर आकाश मण्डल मे भाई,पानी की होत सफाई।
वृष्टि होय अमृत समान,वृद्धि होय अन्न और धन की।
लिखा वेदों मे विधान,अद्भुत है महिमा हवन की। । 2 । ।

जब अन्न की वृद्धि होती है,सब प्रजा सुखी होती है।
न रहता दु : ख का निशान ,आ जाती है लहर अमन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 3 । ।

जब से यह कर्म छुटा है,भारत का भाग्य लुटा है।
'सुशर्मा'करते बयान सहते हैं मार दु :खन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 4 । ।

जनाब 'हवन' एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। कैसे? Material  Science (पदार्थ विज्ञान ) के अनुसार अग्नि मे जो भी चीजें डाली जाती हैं उन्हे अग्नि परमाणुओ (Atoms) मे विभक्त कर देती है और वायु उन परमाणुओ को बोले गए मंत्रों की शक्ति से संबन्धित ग्रह अथवा देवता तक पहुंचा देती है।

देवता=जो देता है और लेता नहीं है जैसे-अग्नि,वायु,आकाश,समुद्र,नदी,वृक्ष,पृथ्वी,ग्रह-नक्षत्र आदि।(पत्थर के टुकड़ों तथा कागज पर उत्कीर्ण चित्र वाले नहीं )। 

मंत्र शक्ति=सस्वर मंत्र पाठ करने पर जो तरंगें (Vibrations) उठती हैं वे मंत्र के अनुसार संबन्धित देवता तक डाले गए पदार्थों के परमाणुओ को पहुंचा देती हैं।

अतः हवन और मात्र हवन (यज्ञ ) ही वह पूजा या उपासना पद्धति है जो कि पूर्ण रूप से वैज्ञानिक सत्य पर आधारित है। बाकी सभी पुरोहितों द्वारा गढ़ी गई उपासना पद्धतियेँ मात्र छ्ल हैं-ढोंग व पाखंड के सिवा कुछ भी नहीं हैं। चाहे उनकी वकालत प्रो . जैन अर्थात 'ओशो-रजनीश' करें या आशा राम बापू,मुरारी बापू,अन्ना/रामदेव,बाल योगेश्वर,आनंद मूर्ती,रवी शंकर जैसे ढ़ोंगी साधू-सन्यासी। 'राम' और 'कृष्ण' की पूजा करने वाले राम और कृष्ण के शत्रु हैं क्योंकि वे उनके बताए मार्ग का पालन न करके ढ़ोंगी-स्वांग रच रहे हैं। राम को तो विश्वमित्र जी 'हवन'-'यज्ञ 'की रक्षा हेतु बाल काल मे ही ले गए थे। कृष्ण भी महाभारत के युद्ध काल मे भी हवन करना बिलकुल नहीं भूले। जो लोग उनके द्वारा प्रदर्शित मार्ग -हवन करना छोड़ कर उन्हीं की पूजा कर डालते हैं वे जान बूझ कर उनके कर्मों का उपहास उड़ाते हैं। राम और कृष्ण को 'भगवान' या भगवान का अवतार बताने वाले इस वैज्ञानिक 'सत्य ' को स्वीकार नहीं करते कि 'भगवान' न कभी जन्म लेता है न उसकी मृत्यु होती है। अर्थात भगवान कभी भी 'नस' और 'नाड़ी' के बंधन मे नहीं बंधता है क्योंकि,-

भ=भूमि अर्थात पृथ्वी।
ग=गगन अर्थात आकाश।
व=वायु।
I=अनल अर्थात अग्नि (ऊर्जा )।
न=नीर अर्थात जल।

प्रकृति के ये पाँच तत्व ही 'भगवान' हैं और चूंकि इन्हें किसी ने बनाया नहीं है ये खुद ही बने हैं इसी लिए ये 'खुदा' हैं। ये पांचों तत्व ही प्राणियों और वनस्पतियों तथा दूसरे पदार्थों की 'उत्पत्ति'(GENERATE),'स्थिति'(OPERATE),'संहार'(DESTROY) के लिए उत्तरदाई हैं इसलिए ये ही GOD हैं। पुरोहितों ने अपनी-अपनी दुकान चमकाने के लिए इन को तीन अलग-अलग नाम से गढ़ लिया है और जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ रहे हैं। इनकी पूजा का एकमात्र उपाय 'हवन' अर्थात 'यज्ञ' ही है और कुछ भी कोरा पाखंड एवं ढोंग।

                                         यज्ञ महिमा

होता है सारे विश्व का कल्याण यज्ञ से।
जल्दी प्रसन्न होते हैं भगवान यज्ञ से। ।

1-ऋषियों ने ऊंचा माना है स्थान यज्ञ का।
करते हैं दुनिया वाले सब सम्मान यज्ञ का।
दर्जा है तीन लोक मे-महान यज्ञ का।
भगवान का है यज्ञ और भगवान यज्ञ का।
जाता है देव लोक मे इंसान यज्ञ से। होता है ...........

2-करना हो यज्ञ प्रकट हो जाते हैं अग्नि देव।
डालो विहित पदार्थ शुद्ध खाते हैं अग्नि देव।
सब को प्रसाद यज्ञ का पहुंचाते हैं अग्नि देव।
बादल बना के भूमि पर बरसाते हैं अग्निदेव।
बदले मे एक के अनेक दे जाते अग्नि देव।
पैदा अनाज होता है-भगवान यज्ञ से।
होता है सार्थक वेद का विज्ञान यज्ञ से। होता है ......

3-शक्ति और तेज यश भरा इस शुद्ध नाम मे ।
 साक्षी यही है विश्व के हर नेक काम मे।
 पूजा है इसको श्री कृष्ण-भगवान राम ने।
होता है कन्या दान भी इसी के सामने।
मिलता है राज्य,कीर्ति,संतान यज्ञ से।
सुख शान्तिदायक मानते हैं सब मुनि इसे। होता है .....

4-वशिष्ठ विश्वमित्र   और नारद मुनि इसे।
इसका पुजारी कोई पराजित नहीं होता।
भय यज्ञ कर्ता को कभी किंचित नहीं होता।
होती हैं सारी मुश्किलें आसान यज्ञ से। होता है ......

5-चाहे अमीर है कोई चाहे गरीब है।
 जो नित्य यज्ञ करता है वह खुश नसीब है।
हम सब मे आए यज्ञ के अर्थों की भावना।
'जख्मी'के सच्चे दिल से है यह श्रेष्ठ कामना।
होती हैं पूर्ण कामना--महान यज्ञ से । होता है ....  



हम जानते हैं कि आपके इर्द-गिर्द छाए अन्ना  हज़ारे और सुबरमनियम स्वामी के चेले-चपाटे  आपको हकीकत  स्वीकारने नहीं देंगे। नीचे स्कैन मे आप ओज़ोन पर्त की जो समस्या देख रहे हैं वह भी 'हवन'पद्धती को त्यागने का ही परणाम है। -


Hindustan-Lucknow-30/03/2012



भोपाल गैस कांड के बाद यूनियन कारबाईड ने खोज करवाई थी कि तीन परिवार सकुशल कैसे बचे? निष्कर्ष मे ज्ञात हुआ कि वे परिवार घर के भीतर हवन कर रहे थे और दरवाजों व खिड़कियों पर कंबल पानी मे भिगो कर डाले हुये थे। ट्रायल के लिए गुजरात मे अमेरिकी वैज्ञानिकों ने 'प्लेग' के कीटाणु छोड़ दिये। इसका प्रतिकार करने हेतु सरकार ने हवन के पैकेट बँटवाए थे और 'हवन' के माध्यम से उस प्लेग से छुटकारा मिला था।अमेरिकी मनोवैज्ञानिक मिसेज पेट्रिसिया हेमिल्टन ने भोपाल के उप नगर (15 किलो मीटर दूर ) बेरागढ़ के समीप माधव आश्रम मे स्वीकार किया था कि'होम -चिकित्सा'अमेरिका,चिली और पोलैंड मे प्रासंगिक हो रही है। राजधानी वाशिंगटन (डी सी ) मे "अग्निहोत्र विश्वविद्यालय"की स्थापना हो चुकी है ।   बाल्टीमोर मे तो 04 सितंबर 1978 से ही लगातार  'अखंड हवन' चल रहा है और जो ओजोन का छिद्र अमेरिका के ऊपर था वह खिसक कर दक्षिण-पूर्व एशिया की तरफ आ गया है। लेकिन भारत के लोग ओशो,मुरारी और आशाराम बापू ,रामदेव,अन्ना हज़ारे,गायत्री परिवार जैसे ढोंगियों के दीवाने बन कर अपना अनिष्ट कर रहे हैं । परिणाम क्या है  एक विद्वान ने यह बताया है-


परम पिता से प्यार नहीं,शुद्ध रहे व्यवहार नहीं। 
इसी लिए तो आज देख लो ,सुखी कोई परिवार नहीं। । परम ... । । 

फल और फूल अन्य इत्यादि,समय समय पर देता है। 
लेकिन है अफसोस यही ,बदले मे कुछ नहीं लेता है। । 
करता है इंकार नहीं,भेद -भाव तकरार  नहीं। 
ऐसे दानी का ओ बंदे,करो जरा विचार नहीं। । परम ....। । 1 ।  ।

मानव चोले मे ना जाने कितने यंत्र लगाए हैं। 
कीमत कोई माप सका नहीं,ऐसे अमूल्य बनाए हैं। । 
कोई चीज बेकार नहीं,पा सकता कोई पार नहीं । 
ऐसे कारीगर का बंदे ,माने तू उपकार नहीं। । परम ... । । 2 । । 

जल,वायु और अग्नि का,वो लेता नहीं सहारा है। 
सर्दी,गर्मी,वर्षा का अति सुंदर चक्र चलाया है। । 
लगा कहीं दरबार नहीं ,कोई सिपाह -सलारनहीं। 
कर्मों का फल दे सभी को ,रिश्वत की सरकार नहीं। । परम ... । । 3 । । 

सूर्य,चाँद-सितारों का,जानें कहाँ बिजली घर बना हुआ। 
पल भर को नहीं धोखा देता,कहाँ कनेकशन लगा हुआ। । 
खंभा और कोई तार नहीं,खड़ी कोई दीवार नहीं। 
ऐसे शिल्पकार का करता,जो 'नरदेव'विचार नहीं। । परम .... । । 4 । ।  

आज राम नवमी के इस शुभ अवसर पर इस पाखंडी नारे का परित्याग करने कि-सीता राम,सीता राम कहिए जाहि विधि राखे राम ताही विधि रहिए-और वास्तविकता को स्वीकारते हुये इस तथ्य का पालन करने का संकल्प लेना चाहिए तभी 'राम नवमी'मनाने की सार्थकता है कि,"सीता-राम,सीता-राम कहिए ---जाहि विधि रहे राम ताही विधि रहिए।"-यह निष्कर्ष 35 वर्ष आर एस एस मे रह कर और उससे दुखी होकर अलग होने वाले  सोरो निवासी आचार्य राम किशोर जी(पूर्व प्राचार्य ,संस्कृत महाविद्यालय,हापुड़)का है।  

आलसी और अकर्मण्य लोग राम को दोष दे कर बच निकलना चाहते हैं।  राम ने जो त्याग किया  और कष्ट देश तथा देशवासियों के लिए खुद व पत्नी सीता सहित सहा उसका अनुसरण करने -पालन करने की जरूरत है । राम के नाम पर आज देश को तोड़ने और बांटने की साजिशे हो रही हैं जबकि राम ने पूरे 'आर्यावृत ' और 'जंबू द्वीप'को एकता के सूत्र मे आबद्ध किया था और रावण के 'साम्राज्य' का विध्वंस किया था । राम के नाम पर क़त्लो गारत करने वाले राम के पुजारी नहीं राम के दुश्मन हैं जो साम्राज्यवादियो के मंसूबे पूरे करने मे लगे हुये हैं । जिन वेदिक नियमों का राम ने आजीवन पालन किया आज भी उन्हीं को अपनाए जाने की नितांत आवश्यकता है।

पुनश्चा : सलिल जी ने इस पर फेसबुक मे जो प्रतिक्रिया दी है ,उसे यही कह सकते हैं कि वह  तो हुये -

काँटों के बीच गुलाब 

आपके आशीष से अभिभूत हूँऔर चकित हूँ आपके इस ज्ञान से!कैसे मैं आभार भी मुख से कहूँ,व्यक्त यह होता नहीं सम्मान से!!... प्रणाम स्वीकारें!!

21 minutes ago ·  ·  1
01 अप्रैल 2012 का कमेन्ट 

Tuesday, February 28, 2012

जब दिल ही टूट गया तो ...............







27/02/2012 हिंदुस्तान लखनऊ
मानव शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है -दिल-हृदय -हार्ट। दिल का मुख्य कार्य है सम्पूर्ण शरीर मे शुद्ध रक्त का संचरण बनाए रखना। यह बहुत ही नाजुक अंग है और बड़ी जल्दी इस पर दुष्प्रभाव पड़ जाता है। दिल बड़ा ही दयालू होता है जिस पर रहम आ जाये उस पर जान भी न्योछावर कर सकता है। यदि दिल कठोर हो जाये तो किसी की जान भी ले सकता है। यदि शरीर का कोई अंग क्षतिग्रस्त हो जाये या रुग्ण हो जाये तो दिल उस अंग को अतिरिक्त रक्त-आपूर्ती करता है और उसे स्वस्थ बनाता है।

मशहूर गायक कुन्दन लाल सहगल जी का संलग्न गीत दिल की नाजुकता का वर्णन करता है तो हिंदुस्तान,लखनऊ द्वारा 27 फरवरी 2012 को प्रकाशित यह विशेषज्ञ रिपोर्ट दिल की बीमारियों का बखान करती है। इस रिपोर्ट से काफी ख़र्चीले उपचार का पता चलता है जिसे प्राप्त करना सबके बूते की बात नहीं है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान 'दिल' की बीमारी  फैलने व बढ्ने की वजह 'डायबिटीज़' को बताता है। हम यहाँ 'डायबिटीज़' और 'दिल' की बीमारी का ऐसा उपचार प्रस्तुत करना चाहते हैं जिसके द्वारा कोई खर्च किए बगैर ही इन रोगों से निजात पाई जा सकती है। -

डायबिटीज़ के रोगी यदि शीघ्र स्वास्थ्य लाभ चाहते हैं तो उन्हें चिकित्सा के साथ-साथ यह उपचार भी करना चाहिए-

ॐ ...... भू ....... भुवाः ...... स्वः.... तत्स्वितुर्वरेनियम भर्गों देवस्य धीमहि। ....... धियों यो नः प्रचोदयात। ।

इन खाली स्थान पर 3 या 5 या 7 या 9 अर्थात  विषम संख्या के क्रम मे तालियाँ बजाना है। ये तालियाँ एक्यू प्रेशर का काम करती हैं जिनसे डायबिटीज़ के प्वाइंट्स दबने के कारण शीघ्र स्वास्थ्य लाभ होता है और दवा का सेवन  भी समाप्त हो जाता है।

मंत्र को कुल 9,18,27 या 108 के क्रम मे पश्चिम दिशा की ओर मुंह करके किसी ऊनी या लकड़ी के आसन या पोलीथीन शीट पर बैठ कर करें ,नंगी धरती पर नहीं अन्यथा 'अर्थ'-earth होने के कारण ऊर्जा -energy नष्ट हो जाएगी और मंत्र जाप व्यर्थ चला जाएगा।

हृदय रोग मे -

इसी प्रकार हार्ट के मरीज हृदय रोग के उपचार मे खाली स्थानों पर तालियाँ बजाने के बजाए ॐ शब्द का उच्चारण करें। कुल 5 ॐ उच्चारण करने होंगे और इन्हें अतिरिक्त ज़ोर लगा कर बोलना  होगा।

हाई ब्लड प्रेशर,लो ब्लड प्रेशर,हार्ट आदि की तकलीफ मे 5 अतिरिक्त ॐ लगा कर गायत्री मंत्र के सेवन से शीघ्र लाभ होता है। एलोपैथी के साइड इफ़ेक्ट्स और रिएक्शन से बचने हेतु बायोकेमिक KALI PHOS 6 X का 4 tds सेवन करना चाहिए। ज्यादा तकलीफ मे इस दवा का 10-10-10 मिनट के अंतर से सेवन करना जादू सा असर देता है। गुंनगुने पानी मे घोल कर सेवन करें तो और जल्दी लाभ होता है।अर्जुन वृक्ष की छाल से बना आयुर्वेदिक 'अर्जुनासव' और 'अर्जुनारिष्ट' भी दिल की अचूक और हानि - रहित दवा हैं। 'मृग श्रंग भस्म' भी सुरक्षित आयुर्वेदिक औषद्धि है परंतु यह काफी मंहगी है।

भोजन करने के बीच मे पानी का सेवन न करें और भोजन करने के तुरंत बाद मूत्र विसर्जन करें तो हार्ट -हृदय मजबूत होता है।

अस्थमा-दमा की बीमारी मे तथा मानसिक चिंता होने पर भी यह 5 अतिरिक्त ॐ वाला गायत्री मंत्र ही 'राम बाण औषधि' है। 



ॐ का प्रयोग क्यों?


ॐ= अ+उ +म ---उच्चारण ध्वनिपूर्वक करने से शरीर का मध्य भाग (center point of the body) जिसकी न कोई कसरत होती है और न ही जिसकी कोई मालिश हो सकती है की वर्जिश हो जाती है। इस वर्जिश से धमनियों मे रक्त संवहन सुचारू और सुव्यवस्थित हो जाता है। फलतः धमनियों मे वसा या कोलस्ट्रेल का जमाव नहीं हो पाता यदि हो तो साफ हो जाता है। अतः ॐ का उच्चारण नियमित करते रहने से 'बैलूनिंग' की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। 


इस सन्दर्भ मे एक व्यक्तिगत उदाहरण दूँ तो अन्यथा नहीं लिया जाना चाहिए। लगभग आठ वर्ष पूर्व मुझे अक्सर सीने मे दर्द रहने लगा और ज्योतिष के आधार पर भी यह 'हृदय रोग' का ही लक्षण सिद्ध हो रहा था । अपने एक फुफेरे भाई डॉ भगवान माथुर जो पास की ही कालोनी बलकेश्वर,आगरा मे प्रेक्टिस करते थे को दिखाया तो उन्होने भी हार्ट प्राब्लम बताते हुये 'कार्डियोग्राम' कराने का सुझाव दिया। हालांकि एक हार्ट स्पेशलिस्ट डॉ अजीत माथुर जिनसे संपर्क करना था रिश्ते मे हमारे भाञ्जे थे और 'माथुर सभा,आगरा' के अध्यक्ष भी रह चुके थे। काफी सौम्य,मिलनसार और रिश्तेदार चिकित्सक होने के बावजूद मैंने एलोपैथी इलाज न करने का फैसला किया। मैंने 5 ॐ वाला गायत्री मंत्र 108 की संख्या  मे प्रतिदिन सस्वर  करना प्रारम्भ किया जिसमे डेढ़ घंटे का कुल समय लगता था। kali Phos 6 X का 4 tds सेवन भी करता था। भोजनोपरांत पहले मूत्र विसर्जन की प्रक्रिया का नियमित पालन किया।  कुल एक माह मे 'दिल' को मजबूती मिल गई और रोग का उपचार बिना झंझट और परेशानी के स्वतः ही हो गया। तमाम झंजावातो और परेशानियों,दिमागी तनावों से गुजरने के बावजूद दोबारा दिल की तकलीफ नहीं हुई क्योंकि अब प्रतिदिन 9-9 बार 5 ॐ वाला गायत्री मंत्र प्रयोग करता हू। मुझे दीपक जलाने,धूप जलाने या जल रखने की जहमत नहीं करना होता है क्योंकि मै ढोंग व पाखंड को मानता ही नहीं हू। जब तब वैज्ञानिक विधि से हवन अवश्य हमारे यहाँ होता रहता है। 


मै जानता हू की प्रस्तुत जानकारी का सिर्फ एलोपैथी चिकित्सक ही नही तथाकथित प्रगतशील और वैज्ञानिक विशेज्ञ भी मखौल उड़ाएंगे। फिर भी 'जनहित' मे इसे देना मुनासिब समझा।