सूर्यकांत क्यों ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कुछ नहीं बोलेंगे. ये विश्लेषण पढ़ें. एडवोकेट अरुण अग्रवाल के एक बयान से लिया है ....
• ज्ञानेश कुमार की भूमिका और प्रभाव (2016 से): ज्ञानेश कुमार वर्ष 2016 में गृह मंत्रालय में जॉइंट सेक्रेटरी के पद पर रहते हुए भी इतने प्रभावशाली थे कि उन्होंने केरल के तत्कालीन चीफ सेक्रेटरी (जी. थॉमसन) को बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए राजी कर लिया था, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वे राजनीतिक रूप से जुड़े हुए थे।
• जस्टिस सूर्यकांत के प्रमोशन की क्रोनोलॉजी: जस्टिस सूर्यकांत को हिमाचल प्रदेश का चीफ जस्टिस बनाने की सिफारिश 10 जनवरी 2018 से करीब 10 महीने तक लंबित थी। 17 सितंबर 2018 को ज्ञानेश कुमार गृह मंत्रालय में एडिशनल सेक्रेटरी (इंटरनल सिक्योरिटी) बने (जिसके तहत आईबी रिपोर्ट करती है)। इसके ठीक बाद, रंजन गोगोई के चीफ जस्टिस बनते ही महज 15-20 दिनों के भीतर जस्टिस सूर्यकांत की फाइल क्लियर हो गई।
• आईबी (IB) रिपोर्ट को दबाने का संदेह: सतीश जैन और सुप्रीम कोर्ट के जज ए.के. गोयल की चिट्ठियों में जस्टिस सूर्यकांत के खिलाफ जो गंभीर आरोप थे (जो 'द कारवां' मैगजीन में भी छपे), उनके आधार पर आईबी की रिपोर्ट प्रतिकूल (adverse) होनी तय थी। आरोप है कि ज्ञानेश कुमार ने गृह मंत्रालय और आईबी के स्तर पर साठगांठ करके इस रिपोर्ट को आगे नहीं बढ़ने दिया।
• इंटरनल सिक्योरिटी का अन्य मामलों में इस्तेमाल: तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के यौन उत्पीड़न मामले (sexual harassment scandal) में भी इंटरनल सिक्योरिटी का इस्तेमाल करके पुलिस के माध्यम से सहयोग दिया गया और शिकायतकर्ता महिला के पति व देवर को सस्पेंड/बर्खास्त कराया गया।
• सुप्रीम कोर्ट में त्वरित एलिवेशन: 8 मई को जब दोबारा सिफारिश भेजी गई, तो जो फाइल पहले 10 महीने तक रुकी रही, वह ज्ञानेश कुमार के प्रभाव के कारण सिर्फ 15 दिनों में क्लियर हो गई और जस्टिस सूर्यकांत सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए।
• चुनाव आयुक्त मामले में फाइल रोकना: जब चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित था, तब जस्टिस सूर्यकांत ने साल भर तक उस पर कोई सुनवाई नहीं की। चीफ जस्टिस की बेंच में आने के बाद भी उन्होंने 4 महीने तक फाइल अपने पास रखी और अंत में यह कहकर केस दूसरी बेंच को सौंप दिया कि नए कानून के तहत वे खुद चयन समिति के सदस्य हैं।
• सरकार को पूर्ण संरक्षण (Cast-Iron Protection): ज्ञानेश कुमार को सरकार और अदालत से अभेद्य सुरक्षा कवच मिला हुआ है क्योंकि उन्होंने अनुच्छेद 370, राम मंदिर और रंजन गोगोई को संरक्षण देने जैसे मामलों में एक महत्वपूर्ण सूत्रधार (instrumental role) की भूमिका निभाई है।
• अदालत का सरकार के प्रति झुकाव: जस्टिस सूर्यकांत की अदालत में एक भी ऐसा मामला नहीं आया जिससे सरकार को किसी तरह की शर्मिंदगी उठानी पड़ी हो। जब भी सरकार संकट में फंसती है, उसे तुरंत राहत दे दी जाती है।
• संवैधानिक शक्तियों (Article 142) का दुरुपयोग: चुनाव प्रक्रियाओं और वेरिफिकेशन (SIR) के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत मिली शक्तियों का दुरुपयोग करके 'कम्प्लीट जस्टिस' (पूर्ण न्याय) के बजाय 'कम्प्लीट इनजस्टिस' (पूर्ण अन्याय) किया है। अदालत ने ट्रिब्यूनल बनाकर और एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जजों (ADJs) को लगाकर चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित किया।
• प्रक्रिया को लटकाना और अवैधता को वैध बनाना: जो मामला (SIR की वैधता) जस्टिस धुलिया ने एक घंटे की सुनवाई में स्पष्ट कर दिया था, उसे जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने डेढ़ साल तक खींचकर अंतरिम आदेशों के जरिए पूरा होने दिया। इसके कारण पश्चिम बंगाल की सरकार प्रभावित हुई और लाखों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से कट गए, जिसे बाद में पोस्ट-फेक्टो (बाद की तारीख से) वैध ठहरा दिया गया।
• कॉलेजियम सिस्टम में पारदर्शिता का अभाव: वर्तमान में कॉलेजियम के प्रस्तावों पर जजों के हस्ताक्षर तक नहीं होते और न ही चयन का कोई ठोस कारण बताया जाता है। व्यवस्था पूरी तरह "राजा की मर्जी" से चल रही है।
• निजी संपत्ति और पैन (PAN) नंबर का विसंगतिपूर्ण मामला: ग्रेटर कैलाश की एक संपत्ति (4500 वर्ग फीट का आधा बंगला), जिसकी कागजी कीमत 1.5 करोड़ दिखाई गई जबकि शिकायतकर्ता के अनुसार 3 करोड़ नकद दिए गए थे, उसके दस्तावेजों में पैन नंबर 'सूर्यकांत शर्मा' के नाम पर दर्ज है, लेकिन संपत्ति का रजिस्ट्रेशन 'सूर्यकांत' के नाम से हुआ है।
