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Sunday, June 24, 2018

विपक्ष में फूट डालने के लिए अखिलेश यादव को मोहरा बनाने की कोशिश ------ विजय राजबली माथुर

  

2014 में जिस प्रकार केजरीवाल बनारस में मोदी के खिलाफ चुनाव में सिर्फ इसलिए खड़े हो गए थे कि, विपक्ष को बाँट कर मोदी को बहुत आसान जीत दिला सकें उसी प्रकार 2019 में विपक्ष को झांसा देकर मोदी को जीत दिलाने के लिए वह सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को फुसलाने में लगे हैं। केजारीवाल के मकड़जाल में फँसने से बचने के लिए अखिलेश जी को इन कुछ बातों पर गंभीरता से मनन करना चाहिए। :
( 1 ) जंगल में धुआँ  देख कर यह अनुमान लगा लिया जाता है कि, आग लगी है। 
( 2 ) किसी गर्भिणी को देख कर यह अनुमान लगा लिया जाता है कि, संभोग हुआ है। 
जबकि आधिकारिक रूप से कहने के लिए कोई प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं होता है किन्तु ये अनुमान बिलकुल सटीक होते हैं। 
 साम्यवादी और समाजवादी विचारधारा के स्वार्थ लोलुप लोग आसानी से आर एस एस की चाल का शिकार खुद - ब - खुद बन चुके हैं । ऐसे लोग न घर के होते हैं न घाट के।
 सन 2011 में जब राष्ट्रपति चुनावों की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी  और मनमोहन सिंह जी को राष्ट्रपति बना कर प्रणव मुखर्जी साहब को पी एम बनाने की कवायद शुरू हुई तब जापान की यात्रा से लौटते में विमान में सिंह साहब ने पत्रकारों से कहा था कि , वह जहां हैं वहीं ठीक हैं बल्कि , तीसरी बार भी पी एम बनने के लिए प्रस्तुत है। जब सोनिया जी इलाज के वास्ते विदेश गईं तब सिंह साहब की प्रेरणा से हज़ारे / रामदेव आदि ने कारपोरेट भ्रष्टाचार के संरक्षण में जनलोकपाल आंदोलन खड़ा कर दिया जिसका उद्देश्य संघ / भाजपा / कारपोरेट जगत को लाभ पहुंचाना था। आज की एन डी ए  सरकार के गठन में सौ से भी अधिक भाजपाई बने कांग्रेसियों का प्रबल योगदान है। 
जनसंघ युग में ब्रिटेन व यू एस ए की तरह दो पार्टी शासन की वकालत उनका उद्देश्य था। उस पर अमल करने का मौका उनको अब मिला है जब भाजपा केंद्र की सत्ता में और आ आ पा उसके विरोध की मुखर पार्टी के रूप में सामने है। 
आ आ पा का उद्देश्य कांग्रेस, कम्युनिस्ट, समाजवादी,अंबेडकरवादी आदि समेत सम्पूर्ण विपक्ष को ध्वस्त कर खुद को स्थापित करना है। भाजपा के विपक्ष में आ आ पा और आ आ पा के विपक्ष में भाजपा को दिखाना आर एस एस की रणनीति है। बनारस में मोदी साहब को आसान जीत दिलाने के लिए केजरीवाल साहब ने वहाँ पहुँच कर भाजपा विरोधियों को ध्वस्त कर दिया था और पुरस्कार स्वरूप दिल्ली में थमपिंग मेजारिटी से उनकी सरकार का गठन हो गया तथा कांग्रेस समेत सम्पूर्ण विपक्ष ध्वस्त हो गया। 

अभी भी जो लोग आ आ पा में विश्वास बनाए रखते हैं वे वस्तुतः अप्रत्यक्ष रूप से मोदी और भाजपा को ही मजबूत बनाने में लगे हुये हैं। यदि अखिलेश जी भी केजरीवाल के मददगार बनते हैं तो स्पष्ट है कि , वह अप्रत्यक्ष रूप से मोदी को  ही लाभ पहुंचाने में सहायता कर रहे हैं उस स्थिति में मोदी / भाजपा / आर एस एस विरोधी दलों को सपा से दूरी बना कर चलना चाहिए। 


~विजय राजबली माथुर ©

Sunday, December 7, 2014

जिन्ना की नहीं ब्रिटिश साम्राज्यवाद की चाल थी :सच्चाई से साक्षात्कार ----- विजय राजबली माथुर

हिंदुस्तान,लखनऊ के 19 दिसंबर 2011 के अंक मे प्रकाशित समपादकीय और इतिहासकार रामचन्द्र गुहा जी के लेख (जिनकी स्कैन कपियाँ नीचे दी हैं) सच्चाई को उजागर करती हैं।
(फोटो पर डबल क्लिक करके स्पष्ट पढ़ा जा सकता है)

19/12/2011,hindustan LUCKNOW

19/12/2011,hindustan LUCKNOW
मैंने अपने लेखों के माध्यम से पहले ही यह बताने का प्रयत्न किया था कि आर्य भारत के पश्चिम मे आर्यनगर-ऐरयान-ईरान होते हुये मध्य एशिया तथा यूरोप गए थे ,उधर से इधर नहीं आए थे जैसा कि मैक्समूलर ने गलत बताया है। इस तथ्य की पुष्टि नई वैज्ञानिक खोजों से भी हुई है जिंनका जिक्र इस समपादकीय मे किया गया है। 

उस समय जिसे 'त्रेता'युग कहा जाता है मे  भी रावण ने अपना आर्थिक साम्राज्य विस्तारित कर रखा था । वर्तमान यू एस ए का शासक तब एरावण और साईबेरिया का शासक कुंभकरण लंका के शासक रावण के सहयोगी थे। भारत के युवा राजकुमार राम जो मर्यादा पुरोशत्तम के रूप मे इतिहास प्रसिद्ध हैं ने अपनी 'कूटनीति' द्वारा अपनी पत्नी सीता को साम्राज्यवादी  लंका मे प्रविष्ट करवाकर और 'सीता की कूटनीति' का लाभ उठा कर अंतर-राष्ट्रीय 'साम्राज्यवाद' का विध्वंस किया था। दिये गए लिंक्स पर इस संबंध मे इसी ब्लाग मे अपने पूर्व प्रकाशित लेखों मे मैंने स्पष्ट किया था।

आज हमारे देश मे उल्टा हो रहा है। आज यू स ए का साम्राज्यवाद हमारे देश की 'अर्थ नीति' और 'राजनीति' दोनों को प्रभावित कर रहा है। और 'गर्व से ..... 'का नारा लगा कर उनही राम को पूजने वाले बड़े गर्व से साम्राज्यवादी अमेरिका की चालों को सफल बना रहे हैं। गुहा साहब का लेख जिन्ना के दो राष्ट्रों के सिद्धान्त की पोल खोल रहा है ,वस्तुतः यह जिन्ना की नहीं ब्रिटिश साम्राज्यवाद की चाल थी और उसी के तहत बाद मे गांधी जी की हत्या भी कारवाई गई थी। 

पूरे देश की जनता को क्या कहें जबकि हमारे ब्लाग जगत के विद्वान ही इन तथ्यात्मक बातों की परवाह नहीं करते। ये सब खाते-पीते समृद्ध लोग हैं। इन्टरनेट इनके मनोरंजन का साधन है और वे सुविधा के अनुसार भरपूर मौज -ब्लाग्स तथा फेसबुक के माध्यम से करते रहते हैं। फैशन के मुताबिक एक-दूसरे की प्रशंसा करके छुट्टी कर लेते हैं। देश-समाज के बारे मे वे क्यों सोचें?उन्हें क्या दिक्कत है?

एक लंबे अरसे से अमेरिकी साम्राज्यवाद ने 'अन्ना टीम' के माध्यम से हमारी संसद,संसदीय निकायों ,न्यायपालिका,कार्यपालिका सभी पर हमला बोल रखा है और यह हमला 2001 के शस्त्रों से हुये हमले से ज्यादा घातक  है। लेकिन अफसोस कि अनपढ़ जनता को तो छोड़ ही दीजिये पढे-लिखे इंटरनेटी विद्वान अन्ना के पीछे अंधों की तरह दौड़ लगा रहे हैं। जो व्यक्ति राष्ट्रध्वज तक का बेरहमी से अपमान कर रहा है उसका महिमा मंडन किया जाना इस बात का सुबूत है कि हमारा विद्वान आज मानसिक रूप से पूरा दिवालिया हो चुका है। ये लक्षण समाज और राष्ट्र के भविष्य के लिए सुखद नहीं हैं। 
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उस समय भी समृद्ध लोग हज़ारे के पीछे भाग रहे थे और आज भी केजरीवाल को महान बता रहे हैं साथ ही साथ विलाप भी कर रहे हैं:
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मैं अपने ब्लाग्स के माध्यम से लगातार 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' का विरोध करता आ रहा हूँ । जितना मेरा विरोध पाखंडियों द्वारा किया जा रहा है उतना ही एथीस्टवादियों द्वारा भी और कोई भी सच्चाई से साक्षात्कार करने को तैयार नहीं है। पूर्व में 24 दिसंबर 2011 को प्रकाशित इस लेख द्वारा मैंने हज़ारे के विरुद्ध चेतावनी दी थी लेकिन केजरीवाल के मोहपाश में फंसे वामपंथियों तक ने उसका समर्थन किया था जिसका नतीजा है RSS नियंत्रित केंद्र सरकार। अब भी जो लोग केजरीवाल भक्ति में लगे हैं निश्चित जानिए वे RSS की अर्द्ध-सैनिक तानाशाही की नींव ही मजबूत कर रहे हैं।
 06 dec.2014 :

 ---विजय राजबली माथुर ---07-12-2014 
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Monday, January 27, 2014

झंडेवाला पार्क लखनऊ की दुर्दशा :मध्यवर्गीय जनता की मनोदशा -सोचें देश की क्या हो दिशा?---विजय राजबली माथुर




यों तो उपरोक्त चित्र सुस्पष्ट हैं और किसी व्याख्या या स्पष्टीकरण के मोहताज नहीं हैं। किन्तु प्रथम चित्र में जो चिंता ज़ाहिर की गई है वह विचारणीय अवश्य है हालांकि उसका कारण द्वितीय चित्र से स्पष्ट समझा जा सकता है। 

ब्रिटिश दासता के समय लखनऊ स्थित 'अमीरुद्दौला पार्क' आज़ादी के आंदोलन की गतिविधियों का केंद्र बन गया था और उसका नाम झंडे वाला पार्क पड़ गया था। आज़ादी के बाद भी यह राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बना रहा है। 1991 में आए मनमोहनी उदारवाद के बढ़ते जाने से लोगों की राजनीतिक सोच कुंद पड़ गई और बाजारवाद का शिकार होकर मध्य वर्ग विलासिता की ओर आकृष्ट हुआ। इसका ज्वलंत उदाहरण है द्वितीय चित्र में दर्शाई गई भीड़ और पुलिस लाठी चार्ज। 

मजदूर-किसान के बढ़ते शोषण की प्रतिक्रिया स्वरूप होने वाले वर्ग-संघर्षों को जातीय-मजहबी संघर्षों की ओर मोड़ दिया गया तथा कारपोरेट भ्रष्टाचार -लूट-शोषण को छिपाने हेतु सरकारी भ्रष्टाचार का ढ़ोल हज़ारे/केजरीवाल आंदोलन के जरिये बजाया गया जिसका परिणाम है आ आ पा (AAP) और जिसके हीरो हैं दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जो पी एम मनमोहन सिंह जी के गुप्त आशीर्वाद व RSS के गुप्त सहयोग से 2014 के चुनावों के जरिये पी एम पद के लिए कारपोरेट की पहली पसंद बन कर उभरे हैं जैसा कि तीसरे चित्र से सिद्ध होता है । दुखद पहलू यह है कि साम्यवादी/वामपंथी विचारक इस AAP के झंडाबरदार बने घूम रहे हैं जिसका उदाहरण चौथा चित्र है। 

मेहनतकश जनता और उसके समर्थक विद्वानों के समक्ष कड़ी चुनौती है कि इस बार फिर भटक कर मतदान किया तो आने वाले समय में देश को गृह युद्ध का सामना अवश्य ही करना पड़ेगा। क्योंकि जिस केजरीवाल को मसीहा के रूप में पेश किया जा रहा है उनकी हकीकत प्रस्तुत उनका साक्षात्कार ही बता रहा है। 


कृपया गंभीरता के साथ सोचें कि देश की क्या हो दिशा?
  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।