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Monday, October 23, 2023

बेपर्दा हो ही गया आखिरकार विषैला नाग



  सोमवार, 25 सितंबर 2023 को "घर, मकान और बदनीयतों की निगाहें" शीर्षक से जो आशंका व्यक्त की थी आखिरकार उसकी पुष्टि कल 22- 10 - 2023 को गोकागु की संलग्न टिप्पणी से स्पष्टता : हो जाती है। 


 दो वर्ष पूर्व  25 सितंबर 2021 को हम अपने वर्तमान मकान में रहने आए थे। यह मकान वृहत्तर लखनऊ की एक नव- विकसित कालोनी में है। यहाँ बहुत से लोग लखनऊ के बाहर से आकर बसे हैं जो लखनवी तहज़ीब से नावाकिफ हैं , पैसे वाले हैं और दूसरों की मेहनत की कमाई से अर्जित मकानों पर गिद्ध दृष्टि लगाए हुए हैं। ऐसे लोगों ने पहले तो ये अफवाहें उड़ाईं कि, कालोनी के कुछ मकान अवैध निर्मित हैं जिससे घबरा कर उनके मालिक हड़बड़ा कर सस्ते में बेच कर भाग जाएँ और ये भू - माफिया अपना धंधा करके अकूत कमाई कर सकें। हो सकता है इससे कुछ लाभ उनको मिला भी हो। 
इन लोगों का शिष्य गोकागू तमाम तांत्रिक प्रक्रियाओं का सहारा लेकर भी हमें परेशान करने के उपक्रम करता रहता  है। 26 अगस्त 2022 को एक वृद्ध पड़ोसी  ए  बी  प्रसाद साहब हमारे घर मिलने आए थे तो उनको ही गलत व्यक्ति साबित करने के लिए 27 अगस्त 2022 को अर्थात अगले ही दिन मुझे अपनी तांत्रिक प्रक्रिया से दुर्घटना - ग्रस्त कर दिया था जिसके कुछ जख्म मुंह पर अब भी बरकरार हैं । गोकागू को लगता है कि, चूंकि मेरी  पत्नी को ग्लूकोमा  और मोतियाबिंद की वजह से देखने और पहचानने में समस्या है  अतः मुझे मार कर वह आसानी से मेरे पुत्र को दबाव बना कर हमारे मकान पर बलात कब्जा कर लेगा और उन दोनों  को खदेड़ देगा। संलग्न फ़ोटो प्रति से उन लोगों की गिद्ध - दृष्टि की पुष्टि भी होती है। 
 स्पष्ट करना चाहता हूँ कि, हमारे परिवार के किसी भी सदस्य को किसी भी प्रकार की अनहोनी का सामना करना पड़ता है तो गोकागू , उसके बुलडोजर आका और उसके पीछे लामबंद होकर हमारे परिवार का बहिष्कार करने वाले सभी जनों  को ही उत्तरदाई समझा जाए।  

इस गोकागु की हमारे यहाँ आने के तुरंत बाद से हमारे यहाँ क्या हो रहा है, कौन  आया क्यों आया जानने और अनावश्यक दखलंदाज़ी करने की प्रवृत्ति पाए जाने पर हमने उसके परिवार से बोलचाल बंद कर दी  थी। इस कारण इस गोकागु ने आमने - सामने रहने वाले इस रो के सभी लोगों को हमारे प्रति घृणित दुष्प्रचार करके हमारा बहिष्कार करवा रखा है। लेकिन इसके समर्थक कभी किसी कागज पर हस्ताक्षर कराने की कोशिश करते हैं कभी किसी पाखंड कार्यक्रम के लिए चन्दा मांगने आते रहते हैं। पहले ये लोग सब्जी वाले चौराहे को रावण चौक कहते थे , अभी भी कुछ लोग ऐसा ही करते हैं। कुछ लोगों ने इसका नामकरण ' माँ  दुर्गा चौक ' कर दिया है और इस नाम के ग्रुप में हमें भी शामिल कर लिया है। 

मेकेनिकल इंजीनियर और ज्योतिष के विशेषज्ञ आचार्य राजीव नारायण शर्मा के विश्लेषण का वीडियो जिसमें नवरात्र और दशहरा के संबंध में धार्मिक विचार सम्मिलित हैं का लिंक इस ग्रुप में लगाने पर यह गोकागु जो खुद को शायद ग्रुप का डिक्टेटर समझता है मुझे आदेश देने की टिप्पणी जिसकी फ़ोटो प्रति ऊपर संलग्न है लगा गया था। वह समझता होगा जो मैं उससे बोलना पसंद नहीं करता उसको जवाब दूंगा तो यह उस बुद्धि के रासभ और अक्ल के खोते का खयाली पुलाव ही है। 

जो गोकागु दो वर्ष पूर्व कहता था कि उसने 10 वर्ष से अब तक 12 वर्ष हो गए लेखनी - पेन को हाथ नहीं लगाया है और वह अखबार भी नहीं पढ़ता। ऐसे कुपढ़ एजुकेटेड इललिट्रेट से हम लोग तो संपर्क रख ही नहीं सकते भले ही सारे कुपढ़ एजुकेटेड इलिट्रेट उसके पीछे लामबंद रहें तो रहें फिर उनको न तो हमसे कोई चन्दा मांगना चाहिए और न ही किसी सहयोग की अपेक्षा करनी चाहिए।। 

इस गोकागु ने कुपढ़ एजुकेटेड इललिट्रेट  को यह पट्टी पढ़ा रखी है कि मेरे मरने पर मेरे बेटे को मेरे लाश ठिकाने लगाने के लिए उस कमबख्त के आगे झुकना ही पड़ेगा परंतु  यह भी उसका दिवा स्वप्न ही होने वाला है। 

बहरहाल इस बार नवरात्र के दौरान गोकागु का बेनकाब होना हमारे लिए एक बड़ी उपलब्धि है। जो विषैला नाग छुप छुप कर फुफकारता था वह अब फन फैलाए खुद - ब - खुद नग्न हो ही गया। 




~विजय राजबली माथुर ©

Friday, January 24, 2020

घंटाघर लखनऊ के शाहीन बाग में रवायतों को तोड़ा बेटियों ने ------ सौरभ श्रीवास्तव / ज़ेबा हसन

  








Naish Hasan
· 
उजरियांव शाहीनबाग, क्या कहती है बहने सुनिए, ये समीना किदवई हैं।






~विजय राजबली माथुर ©

Saturday, May 11, 2019

सुनयना रावत का सपना सार्वजनिक किया ------ डॉ प्रणय रॉय ने


चुनावी राजनीति के शोर में हम अपने देश और समाज की मुश्किलों को, उसके संकटों को कैसे समझें? राजनीति की चालाक बयानबाज़ियों से दूर कोई मासूम आवाज़ ही यह सच कह सकती है. दिक्कत ये है कि हम उस तक पहुंचने की, उसकी बात सुनने की फ़ुरसत नहीं निकालते, इसके लिए ज़रूरी सब्र नहीं दिखाते. यूपी के अमरौली में एनडीटीवी के प्रमुख डॉ प्रणय रॉय को चुनावी दौरे के बीच एक छोटी सी बच्ची मिली- सुनयना रावत. सातवीं में पढ़ने वाली यह बच्ची डॉक्टर बनने का सपना देखती है, लेकिन इस बात से बेख़बर है कि उसके सपने की राह में किस तरह की सच्चाइयां खड़ी हैं.

https://khabar.ndtv.com/video/show/ndtv-special-ndtv-india/sunayna-shares-her-dream-with-dr-prannoy-roy-514480








सुनयना रावत का सपना सार्वजनिक करके  डॉ प्रणय रॉय ने देश में उपस्थित सामाजिक ,  आर्थिक , राजनीतिक , शिक्षा,चिकित्सा,जीवन चर्या आदि की विषमताओं पर जो प्रकाश डाला है वह चुनाव के दौरान सभी प्रत्याशियों और राजनीतिक दलों को झकझोरने के लिए काफी है लेकिन राजनीतिक क्षेत्रों से किसी त्वरित प्रतिक्रिया का न आना विस्मयकारी है। 


   ~विजय राजबली माथुर ©
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नई दिल्ली: चुनावी राजनीति के शोर में हम अपने देश और समाज की मुश्किलों को, उसके संकटों को कैसे समझें? राजनीति की चालाक बयानबाज़ियों से दूर कोई मासूम आवाज़ ही यह सच कह सकती है. दिक्कत ये है कि हम उस तक पहुंचने की, उसकी बात सुनने की फ़ुरसत नहीं निकालते, इसके लिए ज़रूरी सब्र नहीं दिखाते. यूपी के अमरौली में एनडीटीवी के प्रमुख डॉ प्रणय रॉय को चुनावी दौरे के बीच एक छोटी सी बच्ची मिली- सुनयना रावत. सातवीं में पढ़ने वाली यह बच्ची डॉक्टर बनने का सपना देखती है, लेकिन इस बात से बेख़बर है कि उसके सपने की राह में किस तरह की सच्चाइयां खड़ी हैं. उसके साथ हुई ये पूरी बातचीत दरअसल एक बच्ची का नहीं, ग्रामीण भारत में अपने हिस्से की उपेक्षा, अपने हिस्से का छल झेल रहे अनुसूचित समुदाय का दर्द बयान करती है. इस बच्ची की आवाज़ में कहीं से कातरता नहीं है, वह उम्मीद से भरी है- यह बात हौसला देती है, लेकिन यह सोचे बिना रहा नहीं जाता कि यह एक लड़की की नहीं, अपनी सारी उपेक्षा से बेख़बर एक देश की आवाज है. तो पढ़िये ये बातचीत- सच सपना और सुनयना. 
सवाल - काम मिल रहा है आजकल?
जवाब - रोजगार नहीं है, इसलिए खेत भी खाली है. रोजगारी नहीं ज्यादा होती, कैसे काम करेंगे? जब काम ही नहीं होगा यहां पर खेत सब खाली पड़े हैं खेत में जैसे धान लगी रहती है वहीं काट लो तो काम मिल जाता था क्या काम करें

सवाल - क्या काम पहले से कम हो गया है?
जवाब - पहले अपने लायक अनाज हो जाता था लेकिन अब खेत में अनाज हो ही नहीं पाता है. जो हम खेत में उगाते थे वही काट बांटते खाते थे. पहले खेत वेत वगैरह कुछ बोल देते थे, धान चावल जैसे वह उगते थी, खेत में हम लोग वहीं काट-काट के घर में लाते थे बेच भी देते थे,  खाते भी थे और जब खाने को नहीं मिलेगा तो बेचेंगे क्या?  वैसे अगर जानवर बन जाएं सब पूरे गांव के तो हम लोगों का बहुत फायदा रहेगा इतना ही कहना है.

सवाल - पहले और भी काम मिलता था कम हो गया क्या?
जवाब - पहले काफी काम मिल जाता था. बहुत काम मिलता था पहले जैसे नरेगा पहले चलता था लगता है बंद हो गया है. यहां पर नरेगा नहीं चल रहा है.

सवाल- नरेगा बंद हो गया क्या?
जवाब- पता नहीं लेकिन यहां पर नरेगा नहीं चल रहा है कहीं और होगा.

सवाल - पहले काम ज्यादा मिलता था?
जवाब - और क्या जैसे खेत में किसान अगर उग आते थे धान चावल को उसे बेच कर अपना घर भी बनवा देते. मतलब किसान लोग खेती से ही अपनी जिंदगी बिताते थे. आमदनी नहीं, खाने को क्या होगा?

सवाल- अभी रोज की आमदनी कितनी होती है. कुछ आईडिया ₹50 से ₹100 या कितनी आमदनी हो जाती है दिन की?
जवाब - आमदनी अब जब घर में खाने का ही नहीं तो आमदनी क्या? वैसे किसी समय कोई काम नहीं चलता है अभी 2-4 महीने बाद धान वान लगवाई शुरू होगा, तभी सबके काम लगेंगे खेत में धान वान लगाना होगा तभी काम मिलेगा सबको वही धनवान लगाएंगे. तभी पैसे आएंगे घर में ऐसे ऐसे कितने समय क्या करेंगे कुछ भी तो नहीं एक-दो लोगों के खेतों में वह गुण था.  वहीं काट रहे थे सब लोग तो हम लोगों को क्या देंगे काटने को अगर खेत पर भेज दो तो हम लोग उसे काटे नहीं अगर इसे थोड़ा बहुत खेद भी है.  

सवाल - अब क्या खाने को मिलता है अब क्या खाते हो रोज? जवाब - जो थोड़ा बहुत हो जाता है वही खाया जाता है, नहीं होता है तो खरीदा जाता है. जिसके पास ज्यादा हो जाता है उस से खरीद लेते हैं. 

सवाल -क्या आपके पास सिलेंडर है? 
जवाब- सिलेंडर तो है मायावती ने एक दिलवाया था और एक ऐसे ही घर से खरीदा गया था.  एक मोदी ने खरीदवाया था वह 'घर में गैस सिलिंडर खाली पड़ा है', हमारे पास सिलेंडर भरवाने के पैसे नहीं हैं.

सवाल - यह सिलेंडर बिल्कुल खाली है,  खाली क्यों है? 
जवाब - खाली इसलिए है क्योंकि अभी काम नहीं लग रहा है,  कौन काम करें हम लोगों के पास तो पैसे भी नहीं हैं घर में . क़रीब 900 का भरता होगा सिलिंडर.

सवाल - गैस का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं? 
जवाब - कितने समय से इस्तेमाल नहीं हो रहा है. हम तो खाना अपने चूल्हे पर ही पकाते हैं.

सवाल -तो किसी चीज से खाना बनाते हैं आप? 
जवाब - खाना चूल्हे में पकता है, चूल्हा इधर नहीं है, आंगन के बाहर बनता है. यह गैस सिलेंडर जहां पर खाली है ऐसे ही पड़ा रहता है. अभी यहां 10- 11 बीघा गेहूं जल रहा है. हम स्कूल जाते हैं स्कूल से आते हैं. मैं पढ़ने के लिए स्कूल जाती हूं.

सवाल - पढ़ाई होती है अच्छी?
जवाब - होती है पढ़ाई

सवाल - टीचर हैं?
जवाब- टीचर तो है

सवाल - आप पढ़ते हो कि नहीं पढ़ते हो स्कूल जाकर?
जवाब- पढ़ते हैं सेवंथ क्लास में. मुझे बड़ी होकर डॉक्टर बनना है. 

सवाल -- आप क्या चाहते हो कि आप क्या बना? 
जवाब - डॉक्टर

सवाल - डॉक्टर क्यों? 
जवाब - क्योंकि गांव में ज्यादा लोग बीमार होते हैं ना,  इसीलिए गांवों में बहुत सारे लोग बीमार होते हैं वैसे हम गांव के रहेंगे और डॉक्टर बनेंगे तो कैसे भी कम लेंगे, और ऐसे ही यहां के बाहर के डॉक्टर तो वैसे भी ज्यादा लेते हैं जब दवा देने जाओ. 'हम चार भाई, दो बहनें हैं'

सवाल -कितने भाई बहन हो आप? 
जवाब- आप चार भाई हैं दो बहने? 

सवाल -कल रात को क्या खाना खाया था? 
जवाब- कल दाल चावल रोटी बनी थी और तो कुछ नहीं.'पैसे होते तो हम कुछ अच्छा खाते'

सवाल - अगर आपके पास अभी पैसे होते तो आप क्या करते हो उसके साथ? 
जवाब - कुछ अच्छा खाते जैसे कि कुछ भी हर एक अच्छा खाना मिलता है? 

सवाल - मैक्रोनी अच्छा लगता है? 
जवाब - हां

सवाल - चाऊमीन?
जवाब- हां

सवाल - कितनी बार चाउमीन मिलता है
जवाब - बहुत बार मिले हैं पहले तो बहुत खाते थे. अब कम कर दिया है क्योंकि तबीयत खराब हो जाती है. ऐसे रोड में रखकर बनाते हैं मक्खी मक्खी सब बैठी रहती है. वही खा लेते हैं तो बीमार पड़ जाते हैं . इसीलिए गुरु जी कहते हैं अब मत खाया करो इसलिए नहीं खाते हैं. 

सवाल - आपके गुरु जी कौन है?
जवाब - हमारे गुरु जी हमारे स्कूल में पढ़ाते हैं वह मैम का नाम है रीता और गुरु जी का नाम है प्रीतम? बड़े गुरुजी रिटायर हो चुके हैं इसीलिए अब नहीं आते हैं.

सवाल - आप किस जाति से हैं? 
जवाब - रावत, हम लोग तो रावत हैं बस धन्यवाद अब हम लोग जा रहे हैं खेत में'खेत में पापा की मदद करते हैं'.

सवाल - आप भी जाते हैं खेत में? 
जवाब - पापा लोग के साथ काम करवाते हैं? 

सवाल - क्या क्या काम करवाते हैं? 
जवाब - गेहूं काटते हैं, गेहूं काट के फिर हम लोग गेहूं निकालते हैं बाहर. बोरी में भरते हैं फिर भूसा ढोते हैं. अभी भी हम भूसा लेकर आए हैं अब फिर से जा रहे हैं लेने. खेत में गाय हमारी फसल खा जाती है. एक साल से खेत में समस्या बढ़ी है. फसल काटने से पहले ही गाय खा लेती हैं तो हम लोगों को काटने के लिए अगर थोड़ा बहुत मिल भी जाता है तो वहीं काटते हैं. अभी 1 साल पहले से खुली है ज्यादा पहले नहीं खुली थी . ज्यादा पहले हमारे लोगों की बढ़िया लाइफ चल रही थी . अच्छे से चल रही थी . 

सवाल - हम लोग आएंगे आपके साथ,  देखते हैं खेत कितना दूर है आपका? 
जवाब- एक किलोमीटर दूर होगा. स्कूल से आने के बाद खेत जाते हैं.

सवाल - हर दिन आप जाते हैं खेत में? 
जवाब - हर दिन नहीं स्कूल में आने के बाद जाते हैं

सवाल - तुम स्कूल सुबह किस समय जाते हैं? 
जवाब - 7:00 बजे 7:30 बजे और वापस 1:00 बजे आते हैं


सवाल - उसके बाद?
जवाब- खेत का टाइम, उसके बाद खाना-वाना खाकर खेत में जाते हैं

सवाल - खेत में मतलब इसी टाइम पर?
जवाब - हां 1:00 बजे 

सवाल - और स्कूल में अंग्रेजी भी पढ़ते हैं? 
जवाब- स्कूल में अंग्रेजी चलती है पर हम सरकारी में पढ़ रहे थे तो हमें इंग्लिश विंगलिश बगैरा नहीं आती.  हिंदी- इंग्लिश तो ज्यादा चलती थी लेकिन हमें समझ में नहीं आती थी. वैसे अगर हम कोचिंग वोचिंग में जाएंगे तो ऐसे थोड़े कि घर में कोई पढ़ा बड़ा तो है नहीं, जब घर में कोई पढ़ा होगा तभी आएगी और जब भी हम जाते हैं दोनों लोग फिर आते हैं.  घर में पढ़ते हैं कोई बताने वाला हो तो फिर आ जाएगी.

सवाल - तो आप अभी प्राइवेट स्कूल में जाएंगे? 
जवाब- आप अभी नया नया एडमिशन हुआ है, अभी यूनिफॉर्म नहीं लिया है किताब नहीं ली है. खाली अभी अभी पैसे जमा नहीं हुए. 

सवाल - पैसे नहीं हैं? 
जवाब- अभी जमा नहीं हुए हैं प्राइवेट स्कूल के लिए, सरकारी स्कूल में होते तो जमा हो जाते. सॉरी सरकारी स्कूल में पैसा ही नहीं लगता वह फ्री है. प्राइवेट स्कूल में पढ़ना महंगा है.


सवाल - और प्राइवेट स्कूल में कितना लगता है? 
जवाब - प्राइवेट स्कूल में ₹300 बैंक आफ रिज अभी किताब नहीं ली है किताब के पड़ेंगे शायद दो ₹400 और,  जो फॉर्म देंगे उसके भी पैसे पड़ेंगे और फिर फीस देनी पड़ेगी जूते भी लेने पड़ेंगे सब लोग वहां जूते पहन कर आते हैं वह भी लेना पड़ेगा.  

सवाल - काफी महंगा है? 
जवाब-  और क्या. पापा चाहते हैं कि हम पढ़ें. पापा कह रहे थे कि पढ़ लो वैसे भी घर में लोग पढ़े नहीं हैं. इसलिए सोचते हैं तुम पढ़ लो. 



सवाल - लेकिन पैसा कहां से मिलेगा? 
जवाब- आप यही जो हम लोग खेत में थोड़ा बहुत काम करते हैं फिर पापा मजदूरी भी करते हैं. उसी के पैसे मिलेंगे तो होगा यह सब अभी तो नहीं हुआ है फिर भी हो जाएगा. 


डॉ. प्रणय रॉय ने सुनयना से बातचीत के बात कहा कि हमें आपसे बात करके अच्छा लगा. हम आपका धन्यवाद करते हैं कि आपने हमें अपने जीवन और परिवार से जुड़ी इतनी बारीक से बारीक जानकारी साझा की. 

https://khabar.ndtv.com/news/india/seven-year-old-sunayna-wants-to-become-a-doctor-read-what-she-shared-with-dr-prannoy-roy-2033854

Sunday, December 30, 2018

यशपाल को भूलने का खामियाजा लखनऊ भरेगा, यशपाल के वंशज नहीं ------ आनंद

 * एक वरिष्ठ साहित्यिक ने कहा: यशपाल का कर्मक्षेत्र लखनऊ था, उनके संपूर्ण साहित्य का रचनास्थल। यह भूलने का खामियाजा लखनऊ भरेगा, यशपाल के वंशज नहीं।
**  ‘यशपाल का कोई नाम न लेने वाला’ होने का प्रमाण यह दिया गया कि लखनऊ के अन्य दिवंगत साहित्यिकों की तरह उनकी जन्म या पुण्यतिथि पर उनका परिवार उन्हें स्मरण करने के लिए लोगों को जलपान नहीं कराता।
*** एक लेखक या कलाकार की स्मृति को जीवित रखना उसके पाठकों, प्रशंसकों और समाज का दायित्व है या लेखक के परिवार का। 
**** वर्तमान सरकार यशपाल जयंती की बात तो क्या, क्रांतिकारी-स्वतंत्रता सेनानी स्मृति समारोहों के समय दुर्गा भाभी तथा यशपाल के वंशजों को पूछती तक नहीं।
http://epaper.navbharattimes.com/details/6209-65069-1.html



प्रसिद्ध हिंदी उपन्यासकार यशपाल की 42वीं पुण्यतिथि (26 दिसंबर) को  उनके पुत्र आनंद जी ने अपने परिवार की ओर से पिछले दिनों आए एक अप्रिय प्रसंग पर अपना पक्ष नवभारत टाइम्स के माध्यम से प्रस्तुत किया है :

मेरे पिता क्रांतिकारी और लेखक यशपाल के 42वें निधन दिवस (26 दिसंबर) के संदर्भ में दो प्रश्न सामने आए: क्या किसी लेखक को ‘भुला दिया गया’ कहा जा सकता है जब न केवल वह चाव से पढ़ा जा रहा हो वरन उसकी पुस्तकों की खूब बिक्री भी हो रही हो। दूसरा यह कि एक लेखक या कलाकार की स्मृति को जीवित रखना उसके पाठकों, प्रशंसकों और समाज का दायित्व है या लेखक के परिवार का। 

प्रश्नों के मूल में इसी वर्ष हिंदी दिवस के अवसर पर लखनऊ के एक समाचारपत्र द्वारा नगर की प्रसिद्ध साहित्यकार त्रयी - भगवतीचरण वर्मा, अमृतलाल नागर और यशपाल - को याद करते हुए यशपाल के बारे में छापी गई यह टिप्पणी थी कि ‘...यशपाल का शहर में अब कोई नाम लेने वाला भी नहीं है।’ तथा ‘...बस एक घर की शक्ल में यशपाल की याद (क्योंकि) यशपाल का परिवार यहां रहता नहीं और बाकी किसी को उन्हें याद करने की फिक्र नहीं है।’ अपना अज्ञान छिपाने के लिए किसी बात को दावे या दुस्साहस के साथ कहने का चलन हिंदी में आम हो गया है, मगर ध्यान देने लायक है कि इस मामले में ‘यशपाल का कोई नाम न लेने वाला’ होने का प्रमाण यह दिया गया कि लखनऊ के अन्य दिवंगत साहित्यिकों की तरह उनकी जन्म या पुण्यतिथि पर उनका परिवार उन्हें स्मरण करने के लिए लोगों को जलपान नहीं कराता।

यशपाल के परिवार के सामने समस्या है कि उनकी जन्मतिथि पर हिमाचल प्रदेश में पिछले 35 वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार राज्य सरकार द्वारा प्रति वर्ष आयोजित दो-दिवसीय यशपाल जयंती - जिसमें प्रदेश भर के साहित्यिक भाग लेते हैं - में सम्मिलित हो या उनके अपने नगर में उन्हीं लोगों को बुलाकर यशपाल की प्रशस्ति में वही पुरानी घिसी-पिटी बातें सुन उन्हें जलपान कराए।  उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध साहित्यकार और भाषाविद् विष्णुकांत शास्त्री हिमाचल के राज्यपाल रहते यशपाल जयंती समारोहों में आते थे और उत्तर प्रदेश का राज्यपाल होने पर 2003 में उन्होंने यशपाल शताब्दी के समय यथासंभव सरकारी योगदान भी दिया। उसी प्रदेश में वर्तमान सरकार यशपाल जयंती की बात तो क्या, क्रांतिकारी-स्वतंत्रता सेनानी स्मृति समारोहों के समय दुर्गा भाभी तथा यशपाल के वंशजों को पूछती तक नहीं।

लखनऊ की महानगर कॉलोनी के उसी घर में जिसके बारे में कहा गया कि ‘...यशपाल का परिवार यहां रहता नहीं’, हमारी मां प्रकाशवती न केवल अपनी मृत्यु पर्यंत 2002 तक रहीं बल्कि मेरी पत्नी तथा पुत्र पिछले बीस वर्षों से लगातार निवास कर रहे हैं और मैं स्वयं हर वर्ष (उत्तरी अमेरिका में आठ मास पत्रकारिता करने के बाद) चार मास रहता हूं। पिछले वर्षों में इसी घर से संकलन-संपादन के बाद यशपाल की 15 अप्रकाशित-असंकलित तथा अनूदित नई पुस्तकें प्रकाशित हुईं। यहां रखी यशपाल द्वारा संपादित-प्रकाशित राजनीतिक मासिक ‘विप्लव’ की फाइलें पढ़ कर तीन (लखनऊ विश्वविद्यालय से दो) डॉक्टरेट प्राप्त की गईं तथा अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास का प्रतिनिधि आकर ऐतिहासिक महत्त्व की इन फाइलों को डिजिटलाइज करने के लिए ले जाकर लौटा गया।

यशपाल-प्रकाशवती को लखनऊ याद करे न करे, विश्व शायद करेगा। अनेक विदेशी विश्वविद्यालयों में दक्षिण एशिया साहित्य के पाठ्यक्रम में संस्मरणों की पठन सूची में यशपाल के संस्मरण ‘सिंहावलोकन’ तथा प्रकाशवती लिखित ‘लाहौर से लखनऊ तक’ साथ-साथ मिलेंगे। अक्टूबर 2018 में न्यू यॉर्क यूनिवर्सिटी में भारत विभाजन/लाहौर संबंधी एक कॉन्फ्रेंस के दोनों दिन केवल एक पुस्तक की चर्चा हुई: यशपाल के उपन्यास ‘झूठा सच’ का अंग्रेजी तथा उर्दू अनुवाद।


इसमें दो राय नहीं कि किसी लेखक या कलाकार की प्रतिष्ठा बैठक में सजे पुरस्कारों या प्रशस्तिपत्रों से नहीं, जनमानस पर उसकी छाप तथा आगामी पीढ़ी पर उसके प्रभाव से आंकी जानी चाहिए। जैसा हिंदी दिवस पर उक्त समाचारपत्र से उद्धृत पंक्तियां पढ़ने के बाद एक वरिष्ठ साहित्यिक ने कहा: यशपाल का कर्मक्षेत्र लखनऊ था, उनके संपूर्ण साहित्य का रचनास्थल। यह भूलने का खामियाजा लखनऊ भरेगा, यशपाल के वंशज नहीं।
http://epaper.navbharattimes.com/details/6209-65069-1.html

 ~विजय राजबली माथुर ©

Thursday, March 29, 2018

29 मार्च 1857: अदिति शर्मा / सुल्तानपुर में सफदरजंग की सुर्खरू बगावत ------ कृष्ण प्रताप सिंह





29 मार्च 1857: तस्वीरों में कैद भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम की कहानी
Aditi Sharma Updated On: Mar 29, 2018 10:47 AM IST



1857 वो साल था, जो आगे आने वाले 100 सालों के लिए हिन्दुस्तान की किस्मत तय तरने वाला था. यही वो साल था जो दुनिया के इतिहास को नया मोड़ देने वाला था और भारत में स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत करने वाला था. 1857 में जो विद्रोह हुआ उसकी शुरुआत आज यानी 29 मार्च को ही हुई थी. इसी दिन मंगल पांडे ने सार्जेंट-मेजर ह्यूसन और लेफ्टिनेंट बेंपदे बाग की हत्या कर दी थी जिसके बाद उन्हें फांसी दे दी गई.


भले ही मंगल पांडे का ये विद्रोह विफल रहा हो मगर इसके बाद क्रांति की जो ज्वाला भड़की उसने आने वाले समय में पूरे देश को जलाकर रख दिया. ये ज्वाला आगे जाकर इतना विकराल रूप लेगी शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा. मंगल पांडे के इसी विद्रोह के बाद क्रांतिकारियों ने अावाज उठाना शुरू कर दिया जो धीरे-धीरे समय के साथ बढ़ता गया. उस दौर मे भारत में कुछ फोटोग्राफर थे, जिन्होंने जगह-जगह हो रहे इस विद्रोह से जुड़ी तस्वीरें खींची थी. आइए आपको दिखाते हैं उस समय से जुड़ी कुछ दुर्लभ तस्वीरें और बतातें हैं उनके पीछे की कहानियां.

यही वो पेर्टन एंफील्ड पी-53 राइफल थी जिसका इस्तेमाल 1953 में शुरू हुआ. इसी बंदूक से मंगल पांडे ने 29 मार्च 1857 को अंग्रेजों पर हमला किया था. उस दौरान इस्तेमाल होने वाली इन बंदूकों में कारतूस भरा जाता था.  29 मार्च के विद्रोह की असल वजह भी यही कारतूस ही था. दरअसल जो एंफील्ड बंदूक सिपाहियों को इस्तेमाल करने के लिए दी गईं थी उन्हें भरने के लिए कारतूस को दांतों से काट कर खोलना पड़ता था और उसमे भरे हुए बारूद को बंदूक की नली में भर कर कारतूस को डालना पड़ता था.


कारतूस के बाहर चर्बी लगी होती थी जो कि उसे पानी की सीलन से बचाती थी. इसी को लेकर सिपाहियों के बीच अफवाह फैल गई थी कि कारतूस में लगी हुई चर्बी सुअर और गाय के मांस से बनाई जाती है . इससे सैनिकों को लगने लगा कि अंग्रेज उनका धर्म भ्रष्ट करवाना चाहते है. इसी वजह से कलकत्ता की बैरकपुर छावनी में मंगल पांडे ने अग्रेंजों के खिलाफ बिगुल बजा दिया. हालांकी अंग्रेजों के खिलाफ इस क्रांति के समय से पहले शुरू होने के कारण इसको हार का सामना करना पड़ा. इसी विद्रोह में मंगल पांडे ने खुद को गोली मारकर आत्महत्या करने की कोशिश भी की थी मगर इसमे वो केवल घायल ही हुए थे. इसके बाद 7 अप्रेल 1857 को मंगल पांडे को फांसी दे दी गई.
 लखनऊ (उस समय में अवध के नाम से जाना जाता था)  की सीमा पर स्थित सिकंदर बाग को अवध के नवाब वाजिद अली शाह ने बनाया था. इसका नाम उन्होंने अपनी बेगम सिकंदर महल बेगम के नाम पर दिया था. 1857 के विद्रोह से यह भी अछूता नहीं रहा था. विद्रोह के दौरान जब लखनऊ की घेराबंदी की गई तो सैकड़ों भारतीय सिपाहियों ने इसी बाग में शरण ली थी. मगर 16 नवंबर 1857 को अग्रेजों ने बाग पर चढ़ाई कर हमला बोल दिया और 2000 सैनिकों को मार दिया.


इस दौरान लड़ाई में मारे गए ब्रिटिश सैनिकों को तो गहरे गड्ढे में दफना दिया गया मगर भारतीय सिपाहियों के शवों को यू हीं बाहर फेंक दिया गया. जिसके बाद इस बाग का हाल कुछ यूं हुआ कि यहां केवल कंकाल और खोपड़ियां ही नजर आने लगीं. बाग की दिवारों पर आज भी इस लड़ाई के निशान देखे जा सकते हैं. 
ये तस्वीर 1857 में शुरू ही क्रांति के दौरान दिल्ली में डेरा डालते 34th सिख पायनियर जवानों की है. ये सिख रेजीमेंट था जो सेना की सबसे खास टुकड़ियों में से एक था. बंगाल के बाद मेरठ में शुरू हुआ विद्रोह दिल्ली तक जा पहुंचा था. 11 मई को विद्रोही सिपाही मेरठ के बाद  दिल्ली का रुख कर चुके थे. वहां भी विद्रोहियों की क्रांति शुरू हो गई. दिल्ली के पास बंगाल नेटिव ईंफैंट्री की तीन बटालियन थी जिनके कुछ दस्ते विद्रोहियों के साथ मिल गए. बाकी बचे दस्तों ने विद्रोहियों पर हमला करने से इनकार कर दिया था. इन घटनाओं का समाचार सुन कर शहर के बाहर तैनात सिपाहियों ने भी खुला विद्रोह कर दिया.


ब्रिटिश अधिकारी और सैनिक उत्तरी दिल्ली के पास फ़्लैग स्टाफ़ बुर्ज के पास इकट्ठा हुए. जब ये स्पष्ट हो गया कि कोई सहायता नहीं मिलेगी तो वे करनाल की ओर बढे़. अगले दिन बहादुर शाह ने कई सालों बाद अपना पहला आधिकारिक दरबार लगाया. बहुत से सिपाही इसमें शामिल हुए. बहादुर शाह इन घटनाओं से चिंता में थे पर अन्तत: उन्होने सिपाहियों को अपना समर्थन और नेतृत्व देने की घोषणा कर दी.
दिल्ली के इस गदर बहुत नुकसान हुआ. लोगों की जाने तो गई ही लेकिन उसके साथ-साथ जान-माल की बहुत हानि हुई. उसी दौरान बरबाद हो चुके एक बाजार की तस्वीर.
जब-जब 1857 के विद्रोह का नाम लिया जाता है तो उसमें लखनऊ रेसिडेंसी का नाम भी शामिल होता है. विद्रोह के इतिहास में ये रेसिडेंसी सबसे महत्वपूर्ण जगहों में से एक है. विद्रोह के दौरान जब लखनऊ में घेराबंदी हुई तब अंग्रेज इस रेसिडेंसी में 86 दिनों तक छिपे हुए थे. इसके बाद यहां भी विद्रोह का गदर मचा जहां भारी मात्रा में गोलीबारी हुई. इस लड़ाई में लखनऊ रेसिडेंसी का एक बड़ा हिस्सा बर्बाद हो गया था. यहां पर एक खंडहर चर्च है. इस चर्च में एक कब्रिस्तान हैं, जहां 2000 अंग्रेज सैनिकों सहित कई औरतों और बच्चों की कब्रें बनी हुई है.
तात्या टोपे का असली नाम रामचंद्र पाणडुंरग राव था. तात्या ने कुछ समय तक ईस्ट इंडिया कंपनी के बंगाल आर्मी की तोपखाना रेजीमेंट में भी काम किया था. मगर अंग्रेजों के बढ़ते अत्याचार को देख उन्होंने नौकरी छोड़ दी और बाजीराव की नौकरी पर वापस आ गए. 1857 का विद्रोह देश भर से होता हुआ कानपुर पहुंचा जिसमें तात्या टोपे ने अहम भूमिका निभाई थी. वो तात्या टोपे ही थे जिन्होंने केवल कुछ सिपाहियों के साथ ही एक साल तक अंग्रेजों की नाक में दम कर के रखा.

इस विद्रोह में तात्या टोपे के पकड़े जाने की वजह नरवर के राजा मानसिंह की गद्दारी बनी. मानसिंह अंग्रेजों से मिल गया था जिसकी वजह तात्या टोपे परोन के जंगल में सोते में पकड़ लिए गए. 15 अप्रैल 1859 को तात्या का कोर्ट मार्शल किया गया जहां उनको फांसी की सजा सुनाई गई. तात्या टोपे इस विद्रोह में सबसे आखिर में पकड़े गए थे.


इस विद्रोह का परिणाम था ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का खत्म होना, जिसके बाद भारत में ब्रिटिश राज शुरू हुआ जो अगले 90 सालों तक चलता रहा.
https://hindi.firstpost.com/special/first-ever-war-in-freedom-struggle-history-of-india-29-march-1857-mutiny-importance-mangal-pandey-rare-photos-of-1857-mutiny-as-100197.html
  ~विजय राजबली माथुर ©

Saturday, November 11, 2017

विरोध की आवाज़ को सुनने की जगह दबाना शासकों के लिए ही घातक होता रहा है ------ विजय राजबली माथुर

  आज फिर मोदी सरकार उसी किस्म की हेंकड़ी पर चलते हुये बिना सेंसरशिप के चापलूस प्रेस के जरिये जनता को अंधेरे में रखने का प्रयत्न कर रही है। फिर भी मुखर होने वाले  पत्रकारों, चिंतकों, लेखकों, नेताओं की हत्यायें सरकार समर्थकों द्वारा की जा रही हैं।

यू एस ए के प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रम्प साहब का कहना है भारत को मोदी साहब एक करने की कोशिश कर रहे हैं। 

असहमति की आवाज़ को कुचल कर दबा कर एक कैसे किया जा रहा है उसी का एक नमूना हि यु वाहिनी के लोगों ने तहज़ीब की नगरी लखनऊ में 10 नवंबर को छात्र नेता कन्हैया कुमार के साथ पेश किया। ------






देश के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू जी विरोध या असहमति का मान करते थे और इसे दबाने के प्रयासों को अच्छा नहीं मानते थे। डॉ राम मनोहर लोहिया को तो वह काफी ध्यान से सुनते ही थे। जनसंघ के  नए युवा सांसद ए बी बाजपेयी को भी उन्होने धैर्य पूर्वक सुना था।खुद बाजपेयी साहब ने इसका ज़िक्र किया था कि अपने जोरदार भाषण के जरिये उन्होने नेहरू जी व सरकार की कड़ी आलोचना लोकसभा में की थी और उसी रोज़ शाम को राष्ट्रपति भवन में भोज कार्यक्रम में वह नेहरू जी का सामना करने से बच रहे थे लेकिन नेहरू जी ने पास आ कर उनके कंधे पर हाथ रख कर कहा - ' शाबाश नौजवान इसी तरह जोश को कायम रखो तुम एक दिन ज़रूर देश के प्रधानमंत्री बनोगे। ' 
शुरू शुरू में इन्दिरा गांधी ने भी सब विपक्षी नेताओं को सुनने की परंपरा कायम रखी थी किन्तु 1975 में एमर्जेंसी लगाने के बाद उनके द्वारा प्रेस की स्वतन्त्रता का भी गला घोंट दिया गया। प्रमुख विपक्षी नेताओं यहाँ तक कि, डायलिसिस पर चल रहे जे पी को भी गिरफ्तार करवा लिया था। इंडियन एक्स्प्रेस की बिजली कटवाने पर तत्कालीन सूचना व प्रसारण मंत्री इंदर कुमार गुजराल द्वारा आपत्ति जतलाये जाने पर उनको मास्को राजदूत बना कर भेज दिया था। 
परिणाम यह हुआ कि, अखबारों के बजाए विरोध प्रचार के लिए साईकिलोस्टाईल पर्चों का इस्तेमाल होने लगा जिसकी भनक तक खुफिया विभागों को न लग सकी। सरकारी कर्मचारी और खुफिया विभाग के अधिकारी तक तानाशाही वाले फर्मानों से आजिज़ आ गए थे और वे भी सरकार तक सही सूचना नहीं पहुंचा रहे थे, अखबारों को तो खुद सरकार ने ही सेंसर कर रखा था। इन्दिरा जी अपनी ही धुन में मस्त थीं उन्होने लोकसभा के बढ़ाए हुये कार्यकाल के बावजूद एक वर्ष पूर्व ही चुनावों की घोषणा कर दी उनकी सोच थी कि वह पुनः भारी बहुमत से वापिस आ जाएंगी। 
उस वक्त मैं  निर्माणाधीन होटल मुगल,  आगरा के लेखा विभाग में कार्यरत था ।  हमारे सिक्यूरिटी आफिसर साहब रिटायर्ड DSP इंटेलिजेंस थे वह मुझसे मित्रवत व्यवहार रखते थे । क्यों ?  तो वही जानते होंगे मैं नहीं जान सका ।  उनके पास तत्कालीन इंटेलिजेंस इंस्पेक्टर्स मिलने आते रहते थे उनकी वजह से मेरी भी उन सबसे जान - पहचान हो गई थी। अतः हम लोगों को मालूम था कि, इन चुनावों में इन्दिरा जी अपनी पार्टी समेत बुरी तरह से हारने जा रही हैं और वही हुआ था। 
यदि प्रेस सेंसरशिप नहीं होती विपक्षी नेता गण जेल में न होते तो सारी गतिविधियों का सरकार को सही - सही पता रहता और वह अपना बचाव सुचारु रूप से कर सकती थी। 
आज फिर मोदी सरकार उसी किस्म की हेंकड़ी पर चलते हुये बिना सेंसरशिप के चापलूस प्रेस के जरिये जनता को अंधेरे में रखने का प्रयत्न कर रही है। फिर भी मुखर होने वाले  पत्रकारों, चिंतकों, लेखकों, नेताओं की हत्यायें सरकार समर्थकों द्वारा की जा रही हैं।कल 10 नवंबर को छात्र नेता कन्हैया कुमार के साथ सत्ताधीशों के चहेतों द्वारा जो बर्ताव किया गया और आगे का कार्यक्रम जिलाधिकारी द्वारा रद्द कर दिया गया वह सब 1975 वाली एमर्जेंसी की पुनरावृत्ति ही है। हो सकता है इस बार का गुजरात और फिर  2019 का  लोकसभा चुनाव सत्ताधारी गफलत से जीत भी लें  लेकिन तब जो जनाक्रोश पनपेगा उसका किंचित मात्र भी आभास सत्तारूढों को पहले से कतई नहीं लग सकेगा लेकिन वह इन  दमनकारियों  को भी रसातल में  पहुंचा ज़रूर देगा।  

~विजय राजबली माथुर ©

Friday, June 24, 2016

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर कीमत पर बचाने की जरूरत है ------ वीरेंद्र यादव

Virendra Yadav
मैसूर के दलित लेखक और पत्रकारिता के प्रोफ़ेसर बी.पी महेश चंद्र्गुरु को धार्मिक भावनाओं केआहत होने का आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया गया है. इस बीच एक खबर यह भी है कि लखनऊ के केन्द्रीय आंबेडकर विश्वविद्यालय में यह आदेश दिए गए हैं कि विश्वविद्यालय में आयोजित किये जाने वाले सेमिनारों और अन्य आयोजनों में ऐसे विद्वानों ,वक्ताओं और प्रतिभागियों को न आमंत्रित किया जाये जिनके विचारों व अभिव्यक्तियों से किसी कीधार्मिक या जातीय भावनाओं के आहत होने कीआशंका हो. ज्ञातव्य है कि विगत १४ अप्रैल को इस विश्वविद्यालय में दलित और हाशिये के समाज पर हस्तक्षेपकारी लेखन केलिए विख्यात प्रो. कांचा इलय्या द्वारा मांसाहार और हिंदुत्व के मुद्दे पर भाषण के दौरान और उसके बाद एबीवीपी तत्वों द्वारा कांचा इल्लय्या के विरुद्ध अभियान छेड़ा गया था. यह आदेश उसी का दुष्परिणाम है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगातार बढ़ता जा रहा है. इसे हर कीमत पर बचाने की जरूरत है.

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1152239334826764&set=a.165446513506056.56359.100001221268157&type=3

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 लेकिन 1986 से ही अपनी भाकपा - सपा -भाकपा में सक्रियता के आधार पर कुछ निष्कर्षों पर पहुंचा हूँ और समय -समय पर उनको अभिव्यक्त भी करता रहा हूँ। अपनी तमाम राजनीतिक ईमानदारी के बावजूद हम लोग अपनी प्रचलित प्रचार -शैली के चलते उस जनता को जिसके लिए जी - जान से संघर्ष करते हैं प्रभावित करने में विफल रहते हैं। हम लोगों के प्रति लोगों का नज़रिया संकुचित व कुछ हद तक कुत्सित भी रहता है। उदाहरणार्थ  : 





सांप्रदायिकता वस्तुतः साम्राज्यवाद की सहोदरी है। साम्राज्यवाद ने हमारे देश की जनता को भ्रमित करने हेतु 1857 की क्रांति की विफलता के बाद जो नीतियाँ अपनाईं वे ही सांप्रदायिकता का हेतु हैं। जाने या अनजाने हम लोग साम्राज्यवादियो की व्याख्या को ही ले कर चलते हैं जिसके चलते जनता हम लोगों को अधार्मिक मान कर चलती है और इसमें प्रबुद्ध साम्यवादी/ वाम पंथियों का प्रबल योगदान है जो 'एथीस्ट ' कहलाने में गर्व का अनुभव करते हैं। शहीद भगत सिंह और महर्षि कार्ल मार्क्स को हम लोग गलत संदर्भ के साथ उद्धृत करते है जिसका नतीजा सांप्रदायिक शक्तियों ने भर पूर उठाया है। व्यक्तिगत आधार पर अपने लेखों के माध्यम से स्थिति स्पष्ट करने की कोशिशों को अपने ही वरिष्ठों द्वारा किए तिरस्कार का सामना करना पड़ा है। ब्राह्मण वादी मानसिकता के कामरेड्स जान बूझ कर प्रचलित शैली से प्रचार करना चाहते हैं जिससे आगे भी सांप्रदायिक शक्तियाँ लाभ उठाती रहें। इस संदर्भ में एक कामरेड के इस सुझाव को भी नज़र अंदाज़ करना अपने लिए घातक है। 



जो वरिष्ठ  लोग यह कहते हों कि, ओ बी सी और एस सी कामरेड्स से सिर्फ काम लिया जाये और उनको कोई पद न दिया जाये वस्तुतः फासिस्टों का ही अप्रत्यक्ष सहयोग कर रहे हैं और वे ही लोग उत्तर प्रदेश में हावी हैं। ऐसी परिस्थितियों में   सारे संघर्ष पर पानी फिर जाता है। पहले अपने मोर्चे पर भी WAY OF PRESENTATION को बदलना होगा । थोड़ी सी  ही तबदीली करके हम जनता के बीच से फासिस्टों का आधार ही समाप्त करने में कामयाब हो जाएँगे। किन्तु इसके लिए पहले ब्राह्मण वादी कामरेड्स को काबू करना होगा। 

( विजय राजबली माथुर )

~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Saturday, December 20, 2014

काकोरी के विद्रोही शहीदों की याद में

शहीद भगत सिंह, शहीद चंद्रशेखर आजाद, शहीद राम प्रसाद बिस्मिल,
शहीद राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, शहीद रोशन सिंह, शहीद अशफाकुल्ला खां अमर रहंे! अमर रहें!


काकोरी के विद्रोही शहीदों की याद में :

जीपीओ हजरतगंज लखनऊ स्थित काकोरी शहीद स्तम्भ पर 
कल शुक्रवार 19 दिसंबर 2014 को 3 बजे से एक श्रद्धांजलि सभा  का आयोजन संयुक्त रूप से  नागरिक परिषद, जन कलाकार परिषद, महिला परिषद, जन संस्कृित मंच, जन जागरुकता अभियान द्वारा किया गया। 
प्रारम्भ में शहीदों की याद में क्रांतिकारी गीत प्रस्तुत किए गए । संचालन ओ पी सिन्हा साहब द्वारा किया गया। के के शुक्ल जी व अन्य लोगों के साथ-साथ वक्ताओं में IPTA के राकेश जी भी थे। कल्पना पांडे'दीपा' जी ने अपनी ओजस्वी कविता का पाठ किया। 
वक्ताओं ने कहा कि लखनऊ जीपीओ (अग्रेंजीकाल के रिंक थियेटर) में अग्रेजों ने अदालत लगाकार हमारे क्रांतिकारी शहीदों को सजाएं सुनाईं, उन्हें फांसी पर चढ़ाने के लिए यहीं पर अदालती नाटक खेला गया था। इसलिए यह स्थान आजादी के आंदोलन का स्मारक है। लखनऊ के नागरिक इस ऐतिहासिक इमारत को आजादी की लड़ाई का स्मारक, शहीद स्मृति लाइब्रेरी, शोध केन्द्र, सभा-सेमीनार-जनआंदोलन व सत्याग्रह केन्द्र के रुप में देखना चाहते हैं।
सभा में एक प्रस्ताव पास करके केंद्र सरकार से मांग की गई कि जी पी ओ को शहीदों की स्मृति में एक संरक्षित संग्रहालय बनाया जाये और यहाँ से जी पी ओ को अन्यत्र स्थानांतरित किया जाये और इसे खाली कर प्रदेश की जनता को सौंप  कर क्रांतिकारी शाहीदों की इस पावन स्थली को जन-प्रदर्शनों के लिए आरक्षित करने की भी मांग इस प्रस्ताव द्वारा की गई। 
जनता के मध्य जो पर्चा जारी किया गया वह इस प्रकार है :------
  देशभक्त साथियों

आजादी की लड़ाई के अपने शहीदों को याद करने के इस मौके पर हम आपको एक बार फिर काकोरी की घटना का इतिहास नहीं बताने जा रहे हैं। यदि हमारे भीतर थोड़ी भी गरिमा और मनुष्यता है तो हम आजादी के इतिहास की किताबों से इसे जान लेंगे। अपने शहीदों को जानना वास्तव में खुद को जानना है क्योंकि आज हम जो कुछ भी हैं उन्हीं की शहादत के बदौलत हैं। शहादत, किसी के भी जीवन की सबसे बड़ी राजनीतिक एंव मानवीय कार्रवाई है। इसके पीछे की सोच के साथ जुड़कर ही हम उस विरासत के सच्चे वारिस बनते हैं। आज सवाल यह नहीं है कि हम उनपर कितना फूल चढ़ाते हैं बल्कि सवाल यह है कि हमारे भीतर उनका वारिस बनने की तमन्ना है भी या नहीं। उनका वारिस बनकर ही हम आज देश और जनता के सामने खड़ी की गई चुनौतियों का सामना कर सकते हंै।

गैरबराबरी और अन्याय का सीधा रिश्ता सत्ता से है, हुकूमत से है, व्यवस्था से है। हुकूमत से टकराने का मकसद गैरबराबरी और अन्याय का खात्मा ही होना चाहिए। हुकूमत चाहे गोरे अंग्रेजों की हो या काले अंग्रेजों की यह हमेशा आम जनता के जुल्म व शोषण की बुनियाद पर खड़ी होती है। इसीलिए शहीद रामप्रसाद बिस्मिल का कहना था कि वे एक ऐसी समाज व्यवस्था चाहते हैं जहां पर कोई किसी पर हुकूमत नहीं करे, सब जगह लोगों के पंचायती राज कायम हों। शहीद अशफाकउल्ला खां ने अपने अंतिम संदेश में कहा था- ‘एक होकर देश की नौकरशाही का मुकाबला करो और अपने देश को आजाद कराओ।’ जाहिर है कि ये ‘वीर’ मनुष्य द्वारा मनुष्य के ऊपर किसी प्रकार की हुकूमत के विरोधी थे ताकि समाज की हर बुराई और जुल्म का अंत किया जा सके। इसी सिलसिले में शहीद भगत सिंह का कहना था- ’ज्यों-ज्यों कानून सख्त होते हैं त्यों-त्यों भ्रष्टाचार भी बढ़ता है।’ इसी मसले पर गांधी जी ने कहा था- ‘जिन्हें अपनी सत्ता कायम रखनी है, वे अदालतों के जरिए लोगों को वश में रखते हैं।   जब लोग खुद मार-पीट करके या रिश्तेदारों को पंच बनाकर अपना झगड़ा निपटा लेते थे तब वे बहादुर थे। अदालतें आईं और वे कायर बन गए।’

अंग्रेजों की गुलामी के दौर में यदि सभी सरकारी महकमें हम गुलामों पर हुकूमत करने के लिए बने थे तो बात समझ में आती है, लेकिन आजादी मिलने के बाद भी इन महकमों का अफसरशाही और न्यायपालिका का चरित्र हुक्मरानों, शहंशाहों सा क्यों बना रहा? पुलिस प्रशासन, न्यायपालिका आदि में से आज कोई भी ऐसी संस्था नहीं है जिसका व्यावहारिक रूप हुक्मरानों अंग्रेज शासकों जैसा न हो और जो आम नागरिक को, करदाता के साथ दुश्मनों सा सुलूक न करती हो। यही नहीं जिस भी अफसर के पास थोड़ा सरकारी-कानूनी अधिकार हो वह आम आदमी को अपनी दया पर पलने वाली रियाया से अधिक नहीं समझता। वास्तव में हमारी हुकूमतों की यही प्रकृति है। वर्तमान ढांचे में हुकूमत का काम है- मेहनतकश जनता की कमाई से कानून बनाकर संगठित तरीके से वसूली करना और सरकारी खजाने का आपस में बटवारा कर लेना। कानूनी-गैरकानूनी, नैतिक-अनैतिक दोनों तरीकों से।

यही हुकूमतें यादव सिंह, नीरा यादव, एपी सिंह, प्रदीप शुक्ला जैसे हजारों ‘जादूगरों’ और ‘कलाकारों’ को पैदा करती है, पालती-पोसती है। इन्हीं अपराधियों के बल पर ही ये देश पर अपना राज चलाते हैं। ऐसे ‘कारीगर’ और ‘जादूगर’ हर सरकारी दफ्तर में, हर शहर और हर गली में मिल जाएंगे। कभी-कभार आपसी बटवारे के झगड़े में एक-दो का भांडा फूट जाता है। लेकिन पूरी हुकूमत ऐसे ही लोगों की जमात है। ये आपस में कुर्सी बदलते रहते हैं। इन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के समय भी उनका राज चलाया और मौज किया, क्रांतिकारियों पर संगीनें चलवाईं और अब आजादी के बाद आज भी इनके वारिस पूरी विलासिता के साथ जी रहे हैं और लोकतंत्र-लोकशाही की बात करने वालों को यही न्यायाधीश बनकर देशद्रोही और आतंकी बता रहे हैं। आज भी यही कानून बनाते हैं और यही लागू करते हैं। हमारी संसद तो सिर्फ इनके किए पर, इनके इरादों पर अपनी मुहर लगाती रहती हैं। इनसे दुश्मनी मोल लेने की हिम्मत किसी जन-प्रतिनिधि, सांसद-विधायक में नहीं है। वास्तव में कानूनी तौर पर हमारे सांसदों-विधायकों की स्थिति एक दारोगा से भी नीचे होती है।
आज हमारे देश में ढेरों ऐसे कानून और नियम बने हैं जिनका मकसद आम लोगों को परेशान करना, उनकी राजनीतिक सक्रियता और स्वतंत्रता को बाधित करना है। यह सब इसलिए, ताकि लोग इसी में उलझे रहें, और लूट की व्यवस्था बदस्तूर जारी रहे।

आजादी के 66 वर्षों में भी हमें न तो गरीबी से आजादी मिली, न बेरोजगारी से, न महगाई से, न अशिक्षा से आम नागरिक आज भी न्याय और मानवीय गरिमा से वंचित है। हम अभी तक देश की पूरी आबादी को जीवन की न्यूनतम बुनियादी सुविधायें भी नहीं दिला पाये। हमने अपने श्रम से बेहिसाब दौलत पैदा की, लेकिन यह दौलत किसकी पेट में गयी, सबको मालूम है। जहां तक न्याय का सवाल है, तो हमारी पूरी कानून-न्यायिक प्रक्रिया एक चक्रव्यूह है, जहां पर अंत में अभिमन्यु ही मारा जाता है। हूकूमत या सत्ता के किसी न किसी रुप में बने रहते हम सच्ची आजादी और सच्चे न्याय की कल्पना ही नहीं कर सकते। दोनों का अस्तित्व एक साथ नहीं रह सकता। सच्चे लोकतंत्र का अर्थ ही यह है कि उसमें तंत्र लगातार कमजोर पड़ता जाए और लोक ताकतवर। आजादी के बाद से लगातार इसका उल्टा हुआ है। आज तंत्र इतना ताकतवर हो चुका है उसकी गिरफ्त में पूरे देश की सांस घुट रही है। तंत्र के मालिकान न्याय की राह में सबसे बड़ी रुकावट बन गए हैं। श्रमिक, किसान, व्यापारी, छोटे कारखानेदार, डाक्टर, इंजीनियर, कलाकार महिलायें अर्थात समाज का हर वर्ग समूह इनसे त्रस्त है। हमारे लोकतंत्र को इन्होंने अपाहिज और बंधक बना रखा है।
पूरी आजादी की लड़ाई के दौरान इस बात पर हमेशा जोर था, आम सहमति थी कि, आजादी मिलने पर ‘पूरा तंत्र’ बदल दिया जाएगा विशेष तौर पर क्रांतिकारियों और शहीदों का यह मत था। आजादी मिलते ही जिस तरह कुछ बड़े नेताओं ने तंत्र और नौकरशाही का पक्ष लिया, उससे देश की आम जनता के हाथ से राजनीति की बागडोर छूट गई, और आज उसे पूरी तरह एक वोट बैंक में तब्दील करके राजनीतिक रुप से शून्य व निष्क्रिय कर दिया गया है। आजादी के बाद की इस ऐतिहासिक गलती का खामियाजा पूरा देश भुगत रहा है। लुटेरे अग्रेजों की हुकूमत की जगह ऐसे देशी लुटेरों की हूकूमत कायम हुई, जो अग्रेंजों की तरह ही आज हमारे देश और पूरी दुनिया में लूट का कारोबार करते हैं और इन्हीं की तरह पूरी दुनिया पर हुकूमत करने का ख्वाब देखते हैं। देश के सस्ते श्रम और प्राकृतिक संपदा खेती-किसानी की लूट के बल पर ये दुनिया के सबसे अमीर जमात में शामिल होते जा रहे हैं। जबकि हमारे देश की आधे से अधिक आबादी दुनिया के सबसे दरिद्र अभावग्रस्त लोगों में शामिल है। इसी विरोधाभास का मूर्त रुप है देश की हुकूमत, चाहे वह विकास की माला जपे, चाहे सामाजिक न्याय की धर्म निरपेक्षता की या सांप्रदायिकता की माला जपती रहे।

सांप्रदायिकता या सामाजिक-धार्मिक विद्वेष, जिसके खिलाफ हमारे शहीद दृढ़ता से खड़े हुए, आजादी की लड़ाई के वास्तविक नेता जिसके खिलाफ लड़े, विवेकानन्द सहित तमाम समाज सुधारकों ने जिसका विरोध किया और कभी भी जो भारतीय चिंतन परंपरा व जनसंस्कृति का हिस्सा नहीं रहा आज इन्हीं के नाम पर इस नफरत को नए सिरे से फैलाया जा रहा है, ताकि आम जनता के अंसतोष को गलत दिशा देकर अपना उल्लू सीधा किया जा सके। केन्द्र में बैठे भारतीय संस्कृति के तथाकथित लंबरदार पूरे भारतीय समाज की एकता की जड़े खोद रहे हैं। आजादी की विरासत को मिटाकर उसे एक सांप्रदायिक रुप देने की कोशिश कर रहे हैं। ये एक तरफ काले धन को सफेद बनाने की सरकारी योजनाएं ला रहे हैं तो दूसरी तरफ ट्रैफिक सुरक्षा, वाहन-सड़क सुरक्षा, पर्यावरण सुरक्षा, नागरिक सुरक्षा के नाम पर ऐसे कानून ला रहे हैं, जिससे आम जनता से इनकी वसूली बढ़ जाएगी। आम आदमी का जीना मुहाल हो जाएगा, सड़क पर चलने वाला हर एक वाहन चालक, वाहन मालिक, कानून की नजर में अपराधी बन गया है और इनकी अगुवाई में पुलिस-कचहरी का नियंत्रण लोगों पर और बढ़ता जाएगा। हमारा लोकतंत्र धीरे-धीरे अघोषित तानाशाही की ओर बढ़ रहा है। अग्रेंजी हुकूमत से भी खतरनाक तानाशाही की ओर। इनकी लूट और लालच से पैदा हुए आर्थिक संकटों का इस हूकूमत के पास एक ही इलाज है- तानाशाही।

काकोरी दिवस के शहीदों को याद करते हुए हमें एक सच्चे लोकतंत्र के लिए नए सिरे से एकजुट होकर संघर्ष का संकल्प करना है। पिछले वर्षों देश में जो जनआंदोलन पैदा हुए, उसे और संगठित करते हुए आगे बढ़ने का सकल्प करना है। यह लोक के राज को मिटाने में लग गए हैं, हमे इनके तंत्र के राज को मिटाकर एक सच्ची पंचायती व्यवस्था और अवामी राज बनाने में लग जाना चाहिए। इस पंचायती राज की शुरुआत हमें अपने मुहल्ले और गांव से करनी है। इसी पंचायती व्यवस्था का सपना राम प्रसाद बिस्मिल समेत हमारे सभी विद्रोही देशभक्त शहीदों ने देखा था।


हमारे आंदोलन के शुरुआती मुद्दे-

1- लखनऊ जीपीओ (अग्रेंजीकाल के रिंक थियेटर) में अग्रेजों ने अदालत लगाकार हमारे क्रांतिकारी शहीदों को सजाएं सुनाईं, उन्हें फांसी पर चढ़ाने के लिए यहीं पर अदालती नाटक खेला गया था। इसलिए यह स्थान आजादी के आंदोलन का स्मारक है। लखनऊ के नागरिक इस ऐतिहासिक इमारत को आजादी की लड़ाई का स्मारक, शहीद स्मृति लाइब्रेरी, शोध केन्द्र, सभा-सेमीनार-जनआंदोलन व सत्याग्रह केन्द्र के रुप में देखना चाहते हैं। इसलिए हम मांग करते हैं कि केन्द्र सरकार इसे जल्द से जल्द खाली करवाते हुए इस इमारत को आजादी की लड़ाई का स्मारक घोषित करते हुए खाली कर इसे प्रदेश की जनता को सौंप दे।

2- देश में एक एकीकृत श्रम कानून, जो पूरी श्रमिक आबादी पर एक जैसा लागू हो और इसे श्रमिकों की निर्वाचित कमेटियों को लागू करने का अधिकार दिया जाए। ठेका-संविदा मजदूरी का खात्मा।

3- नगरपालिकाओं और ग्राम पंचायतों को अपने क्षेत्र की विकास योजनाएं बनाने का पूरा अधिकार, पूरा वित्तीय अधिकार एवं उस क्षेत्र की पुलिस न्यायालय, प्रशासन को इसके अधीन लाया जाए।

4- हर महिला का प्रसूति के समय एक साल तक भरण पोषण की पूरी जिम्मेदारी सरकार एवं समाज की।

5- दोहरी शिक्षा एवं चिकित्सा प्रणाली का अंत एवं इसे हर स्तर पर लोगों को निःशुल्क उपलब्ध कराया जाय।

6- खेती-किसानी के लिए आवश्यक सभी चीजों को पूरी तरह कर मुक्त किया जाए एवं किसान सहकारी समितियों का पुर्नगठन कर उन्हें किसानों की हित में नीतियां बनाने का अधिकार दिया जाए।

7- व्यापारियों एवं छोटे उद्यमियों को आसानी से ऋण उपलब्ध कराकर उन्हें परेशान करने वाले अधिकारियों को दंडित किया जाए।

8- देश के अपराध कानून में जमानत लेने के लिए धन-संपत्ति के आधार पर जमानत की बाध्यता समाप्त करके सिर्फ नागरिक पहचानपत्र के आधार पर लोगों को जमानत देने का कानून बनाया जाए।

9- सरकारी कर्ज को भूमि लगान की तरह वसूलने का कानून समाप्त किया जाए, यह कानून ईस्ट इंडिया कंपनी के राज में सन् 1793 में लार्ड कार्नवालिस ने आम किसानों, नागरिकों को लूटने के लिए बनाया था।

10- हर गांव, कस्बे और शहर में निर्वाचित न्याय पंचायतों का आम निर्वाचन द्वारा गठन करके लोगों के आपसी विवाद एवं संपत्ति विवाद को हल करने के लिए इसे सौंपा जाए।

11- बच्चों एवं बुजर्गों के अच्छे जीवन के लिए विशेष योजनाएं बनाईं जाएं।
मुद्दे और भी हो सकते हैं, लेकिन हमें अभी इन्हीं से शुरुआत करनी है, और धीरे-धीरे उन सवालों को उठाते हुए आगे बढ़ना है, जिससे हुकूमत की पकड़ आम जनता पर लगातार ढीली पड़ती जाय और आम नागरिक की पकड़ हुकूमत/नौकरशाही पर मजबूत हो ताकि लोकतंत्र वास्तविकता बने।

साभार :

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  ~विजय राजबली माथुर ©
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Wednesday, November 26, 2014

एक परिवार का प्रदर्शन बन कर रह गया पी पी पी सम्मेलन --- विजय राजबली माथुर



पूर्व घोषणा के अनुसार विगत 23 नवंबर 2014 को भाकपा, लखनऊ का 22 वां ज़िला सम्मेलन आयोजित हुआ। प्रारम्भ में प्रदेश की ओर से पर्यवेक्षक महोदय ने इसका उदघाटन उद्बोद्धन दिया। अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय, प्रांतीय परिस्थितियों का सवा घंटे उल्लेख कर जब वह ज़िले की परिस्थितियों पर आए तो उनके असंतोष व आक्रोश का प्रस्फुटन हुआ।खुद बारह वर्ष लखनऊ के ज़िला सचिव व आठ वर्ष प्रदेश के सचिव रह चुके पर्यवेक्षक महोदय  जिलामंत्री जी से काफी खिन्न थे और उनकी सांगठानिक कार्य प्राणाली की तीखी भर्त्सना कर डाली। उनके द्वारा इंगित किया गया कि यह ज़िला सम्मेलन बगैर शाखाओं व मध्यवर्ती कमेटियों के सम्मेलन करवाए हो रहा है। उनके द्वारा यह भी उद्घाटित किया गया कि वह लखनऊ के ही हैं और यहीं रहने के कारण यहाँ की हर गतिविधि से बखूबी वाकिफ भी हैं। इस क्रम में उनके द्वारा साफ शब्दों में कहा गया कि वह मलीहाबाद और लखनऊ पूर्व से रहे प्रत्याशियों से काफी असंतुष्ट हैं क्योंकि उन दोनों ने संगठन के विस्तार पर कोई ध्यान ही नहीं दिया है। अपने गुस्से को और आगे बढ़ाते हुये कठोर शब्दों में इन दोनों को चेतावनी देते हुये उन्होने कहा कि जिस प्रकार प्रदेश के किसान सभा नेता और खेत मजदूर यूनियन नेता कम्युनिस्ट पार्टी की रोटियाँ तोड़ रहे हैं वैसा ही ज़िले में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा भले ही ज़िले में ये संगठन बनें या न बनें। किन्तु उनके द्वारा महिला फेडरेशन के किए कार्यों का विशद गुण गान किया गया। उनके बाद बोलने आए इप्टा के राकेश जी व प्रलेस के शकील सिद्दीकी साहब उनके लंबे भाषण का ज़िक्र करना न भूले। अध्यक्ष मण्डल के सदस्य शिव प्रकाश तिवारी जी ने उनके विपरीत ज़िले से प्रत्याशी रहे दोनों युवा साथियों की भूरी-भूरी प्रशंसा की कि वे सुप्तप्राय पार्टी का झण्डा-बैनर लेकर जनता के बीच गए और उन दोनों ने पार्टी को पुनर्जीवित कर दिया। शिव प्रकाश जी ने किसान नेताओं की भी प्रशंसा करते हुये विशेष रूप से अतुल अंजान साहब के योगदान को याद दिलाया। जिला मंत्री की कमियों के बावजूद उनके धैर्य व संयम की भी शिव प्रकाश जी ने सराहना की।  

अन्य वक्ताओं ने तो अपनी-अपनी बात रखी परंतु उन्नाव के ज़िला मंत्री रह चुके कामरेड रामगोपाल शर्मा जी ने ज़िला मंत्री द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट की न केवल भाषाई अशुद्धियों की ओर सबका ध्यान खींचा बल्कि पार्टी संविधान के अनुसार कार्य न होने की ओर भी इंगित किया।राम गोपाल जी द्वारा कुल 168 सदस्यों  द्वारा पार्टी से अलग होने को सोचनीय करार दिया गया। रामगोपाल शर्मा जी ने यह भी याद दिलाया कि 30 दिसंबर 2013 को गठित 'नगर कमेटी' का उल्लेख तक इस रिपोर्ट में नहीं किया गया है।  आय-व्यय विवरण का उल्लेख व प्रस्तुतीकरण न होने को उनके द्वारा गंभीर चूक बताया गया फिर भी संशोधनों के किए जाने पर उन्होने रिपोर्ट का समर्थन किया। शर्मा जी के बयान की कान्ति मिश्रा जी ने हल्की व मधुकर मौर्या तथा ओ पी सिंह द्वारा कटु एवं गहन आलोचना की गई। 

संचालक महोदय ने ज़िला मंत्री की ओर से नई ज़िला काउंसिल हेतु 21 सदस्यीय कमेटी का प्रस्ताव व 20 नामों को पेश किया जिसे पर्यवेक्षक महोदय द्वारा 23 सदस्यीय काउंसिल में परिवर्तित कर दिया गया। दो सदस्यों के नाम बढ़ा कर कुल 22 नाम तय किए गए व एक स्थान 'रिक्त' रखा गया। 

10 बजे के स्थान पर 12 बजे शुरू हुआ सम्मेलन एक घंटे के भोजन-  अवकाश सहित साँय 05-45 पर अंधेरा हो चुकने के कारण अध्यक्ष मण्डल की सदस्या आशा मिश्रा जी द्वारा समाप्त घोषित कर दिया गया और पर्यवेक्षक महोदय के निर्देश पर वर्तमान ज़िला मंत्री को नई काउंसिल के साथ नए जिला मंत्री के निर्वाचन तक  यथावत कार्य  करते रहने को कहा गया।

सम्पूर्ण कार्यवाही के सम्पन्न होने के साथ ही यह भी उजागर हो गया कि पर्यवेक्षक महोदय का सारा असंतोष व आक्रोश प्रदीप प्रायोजित सुनियोजित रण-नीति का अहम हिस्सा था। पर्यवेक्षक महोदय राज्य की ओर से उनकी श्रीमती जी अध्यक्ष मण्डल की ओर से प्रभावी थे ही उनकी साली साहिबा को महिला फेडरेशन की ज़िला अध्यक्ष होने के नाते फेडरेशन की   ओर से बोलने का हक दिया गया जबकि फेडरेशन की जिलमंत्री को भी यह हक दिया जा सकता था। प्रदीप साहब का दावा रहा है कि वह ही अकेले दम पर प्रदेश पार्टी को चलाते हैं। अपने कद व रुतबे को बढ़ाने हेतु प्रदीप साहब  जो खुद लखनऊ के सदस्य होते हुये भी प्रदेश की ओर से ज़िला इंचार्ज भी हैं ने कोई तेरह वर्ष पूर्व इन पर्यवेक्षक महोदय के प्रदेश सचिव रहते हुये लखनऊ के तत्कालीन  जिलामंत्री (जो राष्ट्रवादी कम्युनिस्ट  पार्टी से होते हुये अब भाजपा सांसद हैं )  को उनसे भिड़वा कर पार्टी में विभाजन करा दिया था। उससे पूर्व भी 1994 में प्रदेश पार्टी विभाजित हो चुकी थी। 'राष्ट्रीय मान्यता' समाप्त होने के कगार पर पहुँचते ही पार्टी को और संकुचित करने के निर्णय की घोषणा पर्यवेक्षक महोदय द्वारा की गई। उनके द्वारा लखनऊ की सभी विधायिका सीटों पर चुनाव लड़ाने से साफ-साफ इंकार कर दिया गया। अपने परिवार को प्रदीप पाकेट पार्टी (पी पी पी ) से मिले सम्मान से पर्यवेक्षक महोदय गदगद नज़र आए। उनका ध्यान पार्टी संविधान के उल्लंघन की ओर गया ही नहीं। 2011 के सम्मेलन में जिला मंत्री महोदय द्वारा घोषित किया गया था कि छह वर्ष पूर्ण हो चुकने के कारण पार्टी संविधान के अनुसार उनका यह लगातार निर्वाचन का अंतिम कार्यकाल होगा। किन्तु इस सम्मेलन में संचालक महोदय ने इस वर्ष छह वर्षों को पूर्ण होना घोषित किया अर्थात एक और कार्यकाल का लाभ वर्तमान जिलामंत्री महोदय को देने की भूमिका प्रस्तुत कर दी।पर्यवेक्षक महोदय ने कार्यवाही रजिस्टर के पृष्ठ फाड़े जाने और उनको गोंद से चिपकाए जाने की ओर भी कोई ध्यान नहीं दिया। 

वर्तमान जिलामंत्री महोदय का इस बात के लिए आभार व्यक्त किया जा सकता है कि प्रदीप साहब के प्रबल विरोध के बावजूद अंततः सम्मेलन में मुझे प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित होने का अवसर प्रदान कर दिया। वैसे उनको इस बात के लिए भी धन्यवाद दिया जा सकता है कि उन्होने अपने दो विश्वस्त लोगों के माध्यम से यह संदेश बहुत पहले ही भिजवा दिया था कि प्रदीप साहब की कमियाँ उजागर करने के कारण नई काउंसिल में मुझे स्थान नहीं दिया जा सकता है। 

प्रदेश पार्टी के प्रमुख व उप प्रमुख कार्यकर्ताओं का ध्यान सम्मेलन की इन विसंगतियों से हटाने हेतु अनावश्यक अभियान चलाये हुये हैं जिससे जनता में पार्टी की दूरी और भी बढ़ेगी तथा उसका शोषण-उत्पीड़न चरम पर पहुँच जाएगा क्योंकि सत्तारूढ़ दल हमारी पार्टी के विरुद्ध इन बयान बाजियों का भरपूर लाभ उठाएगा। 'अनुशासन ' के डंडे से कार्यकर्ताओं को तो भयभीत किया जा सकता है परंतु जन-समर्थन नहीं हासिल किया जा सकता ।









ज़्यादा पुराना इतिहास नहीं है कि राजा राम मोहन राय ने भारत में अग्रेज़ी भाषा पढ़ाये जाने का इसलिए समर्थन किया था कि 'अग्रेज़ी साहित्य' के माध्यम से भारतवासी ब्रिटेन के आज़ादी के लिए किए गए संघर्षों की गाथा भी पढ़ेंगे और अपने देश की आज़ादी के लिए उठ खड़े होंगे और ऐसा ही हुआ भी।
अच्छा हो कि जन-जन को 'संस्कृत भाषा' का ज्ञान हो जाये जिससे प्रत्येक भारतवासी सुगमता से समझ सके कि हजारों-हज़ार वर्षों से पोंगापंडितों ने जो उलट बासियाँ चला रखी हैं उनका उल्लेख 'वेदों' में है ही नहीं वे पौराणिक दंतकथाएँ तो शोषकों-उतपीडकों के सहायक ब्राह्मण वादियों के द्वारा गढ़ी गई चालाकियाँ हैं।
एथीस्टवादी वस्तुतः पोंगापंथ,ढोंग-पाखंड-लूट को प्रश्रय देने के उद्देश्य से जनता को वस्तु-स्थिति से परिचित न होने देकर उनको शोषण के कुचक्र से बाहर ही नहीं आने देना चाहते हैं। एथीस्टवादी धर्म (सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। ) का तो विरोध करते हैं किन्तु ढोंगियों-पाखंडियों को साधू,महात्मा,बापू,संत की संज्ञा से नवाजते हैं। वे भगवान,खुदा,गाड का विरोध तो करते हैं परंतु जनता को यह नहीं समझाना चाहते कि -भगवान =भ (भूमि-ज़मीन )+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I(अनल-अग्नि)+न (जल-पानी)
चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इसलिए ये ही खुदा हैं।
इनका कार्य G(जेनरेट )+O(आपरेट )+D(डेसट्राय) है अतः यही GOD हैं।
सीधी बात है कि एथीस्टवादी संप्रदाय भी दूसरे संप्रदायों की तरह ही साधारण जनता को ज्ञान-विज्ञान से वंचित रख कर उसके शोषण-उत्पीड़न में सहायक बना हुआ है । यही वजह है कि 'साम्यवाद' जो वस्तुतः भारत के 'सर्वे भवन्तु सुखिन :' पर आधारित है भारतवासियों के लिए दूर की कौड़ी बना हुआ है और साम्राज्यवाद के सहायक सांप्रदायिक तत्व अपने लूट के खेल के लिए खुला मैदान पा कर खुश हैं।
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  ~विजय राजबली माथुर ©
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Monday, January 27, 2014

झंडेवाला पार्क लखनऊ की दुर्दशा :मध्यवर्गीय जनता की मनोदशा -सोचें देश की क्या हो दिशा?---विजय राजबली माथुर




यों तो उपरोक्त चित्र सुस्पष्ट हैं और किसी व्याख्या या स्पष्टीकरण के मोहताज नहीं हैं। किन्तु प्रथम चित्र में जो चिंता ज़ाहिर की गई है वह विचारणीय अवश्य है हालांकि उसका कारण द्वितीय चित्र से स्पष्ट समझा जा सकता है। 

ब्रिटिश दासता के समय लखनऊ स्थित 'अमीरुद्दौला पार्क' आज़ादी के आंदोलन की गतिविधियों का केंद्र बन गया था और उसका नाम झंडे वाला पार्क पड़ गया था। आज़ादी के बाद भी यह राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बना रहा है। 1991 में आए मनमोहनी उदारवाद के बढ़ते जाने से लोगों की राजनीतिक सोच कुंद पड़ गई और बाजारवाद का शिकार होकर मध्य वर्ग विलासिता की ओर आकृष्ट हुआ। इसका ज्वलंत उदाहरण है द्वितीय चित्र में दर्शाई गई भीड़ और पुलिस लाठी चार्ज। 

मजदूर-किसान के बढ़ते शोषण की प्रतिक्रिया स्वरूप होने वाले वर्ग-संघर्षों को जातीय-मजहबी संघर्षों की ओर मोड़ दिया गया तथा कारपोरेट भ्रष्टाचार -लूट-शोषण को छिपाने हेतु सरकारी भ्रष्टाचार का ढ़ोल हज़ारे/केजरीवाल आंदोलन के जरिये बजाया गया जिसका परिणाम है आ आ पा (AAP) और जिसके हीरो हैं दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जो पी एम मनमोहन सिंह जी के गुप्त आशीर्वाद व RSS के गुप्त सहयोग से 2014 के चुनावों के जरिये पी एम पद के लिए कारपोरेट की पहली पसंद बन कर उभरे हैं जैसा कि तीसरे चित्र से सिद्ध होता है । दुखद पहलू यह है कि साम्यवादी/वामपंथी विचारक इस AAP के झंडाबरदार बने घूम रहे हैं जिसका उदाहरण चौथा चित्र है। 

मेहनतकश जनता और उसके समर्थक विद्वानों के समक्ष कड़ी चुनौती है कि इस बार फिर भटक कर मतदान किया तो आने वाले समय में देश को गृह युद्ध का सामना अवश्य ही करना पड़ेगा। क्योंकि जिस केजरीवाल को मसीहा के रूप में पेश किया जा रहा है उनकी हकीकत प्रस्तुत उनका साक्षात्कार ही बता रहा है। 


कृपया गंभीरता के साथ सोचें कि देश की क्या हो दिशा?
  ~विजय राजबली माथुर ©
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Wednesday, July 31, 2013

"नशा"-- - मुंशी प्रेमचंद

31 जूलाई -मुंशी प्रेमचंद जी की जयंती पर उनकी कहानी 'नशा ' का प्रस्तुतीकरण:
ईश्वरी एक बड़े जमींदार का लड़का था और मैं एक गरीब क्लर्क का, जिसके पास मेहनत-मजूरी के सिवा और कोई जायदाद न थी। हम दोनों में परस्पर बहसें होती रहती थीं। मैं जमींदारी की बुराई करता, उन्हें हिंसक पशु और खून चूसने वाली जोंक और वृक्षों की चोटी पर फूलने वाला बंझा कहता। वह जमींदारों का पक्ष लेता, पर स्वभावत: उसका पहलू कुछ कमज़ोर होता था, क्योंकि उसके पास जमींदारों के अनुकूल कोई दलील न थी। वह कहता कि सभी मनुष्य बराबर नहीं होते, छोटे-बड़े हमेशा होते रहते हैं और होते रहेंगे, लचर दलील थी। किसी मनुषीय या नैतिक नियम से इस व्यवस्था का औचित्य सिद्ध करना कठिन था। मैं इस वाद-विवाद की गर्मा-गर्मी में अक्सर तेज हो जाता और लगने वाली बात कह जाता, लेकिन ईश्वरी हारकर भी मुस्कराता रहता था। मैंने उसे कभी गर्म होते नहीं देखा। शायद इसका कारण यह था कि वह अपने पक्ष की कमज़ोरी समझता था। नौकरों से वह सीधे मुँह बात नहीं करता था। अमीरों में जो एक बेदर्दी और उद्दण्डता होती है, इसमें उसे भी प्रचुर भाग मिला था। नौकर ने बिस्तर लगाने में जरा भी देर की, दूध जरूरत से ज़्यादा गर्म या ठंडा हुआ, साइकिल अच्छी तरह साफ़ नहीं हुई, तो वह आपे से बाहर हो जाता। सुस्ती या बदतमीजी उसे जरा भी बरदाश्त न थी, पर दोस्तों से और विशेषकर मुझसे उसका व्यवहार सौहार्द और नम्रता से भरा हुआ होता था। शायद उसकी जगह मैं होता, तो मुझमें भी वहीं कठोरताएँ पैदा हो जातीं, जो उसमें थीं, क्योंकि मेरा लोक-प्रेम सिद्धांतों पर नहीं, निजी दशाओं पर टिका हुआ था, लेकिन वह मेरी जगह होकर भी शायद अमीर ही रहता, क्योंकि वह प्रकृति से ही विलासी और ऐश्वर्य-प्रिय था।
अबकी दशहरे की छुट्टियों में मैंने निश्चय किया कि घर न जाऊँगा। मेरे पास किराये के लिए रुपये न थे और न घर वालों को तकलीफ देना चाहता था। मैं जानता हूँ, वे मुझे जो कुछ देते हैं, वह उनकी हैसियत से बहुत ज़्यादा है, उसके साथ ही परीक्षा का ख्याल था। अभी बहुत कुछ पढ़ना है, बोर्डिग हाउस में भूत की तरह अकेले पड़े रहने को भी जी न चाहता था। इसलिए जब ईश्वरी ने मुझे अपने घर का नेवता दिया, तो मैं बिना आग्रह के राजी हो गया। ईश्वरी के साथ परीक्षा की तैयारी खूब हो जायगी। वह अमीर होकर भी मेहनती और जहीन है।
उसने इसके साथ ही कहा- लेकिन भाई, एक बात का ख्याल रखना। वहाँ अगर जमींदारों की निंदा की, तो मुआमिला बिगड़ जायगा और मेरे घरवालों को बुरा लगेगा। वह लोग तो असामियों पर इसी दावे से शासन करते हैं कि ईश्वर ने असामियों को उनकी सेवा के लिए ही पैदा किया है। असामी भी यही समझता है। अगर उसे सुझा दिया जाय कि जमींदार और असामी में कोई मौलिक भेद नहीं है, तो जमींदारी का कहीं पता न लगे।
मैंने कहा- तो क्या तुम समझते हो कि मैं वहाँ जाकर कुछ और हो जाऊँगा?
‘हाँ, मैं तो यही समझता हूँ।’
‘तुम ग़लत समझते हो।‘
ईश्वरी ने इसका कोई जवाब न दिया। कदाचित् उसने इस मुआमले को मेरे विवेक पर छोड़ दिया। और बहुत अच्छा किया। अगर वह अपनी बात पर अड़ता, तो मैं भी ज़िद पकड़ लेता।


सेकेंड क्लास तो क्या , मैंने कभी इंटर क्लास में भी सफर न किया था। अबकी सेकेंड क्लास में सफर का सौभाग्य प्राप्त हुआ। गाड़ी तो नौ बजे रात को आती थी, पर यात्रा के हर्ष में हम शाम को स्टेशन जा पहुँचे। कुछ देर इधर-उधर सैर करने के बाद रिफ्रेशमेंट रूम में जाकर हम लोगों ने भोजन किया। मेरी वेश-भूषा और रंग-ढंग से पारखी खानसामों को यह पहचानने में देर न लगी कि मालिक कौन है और पिछलग्गू कौन; लेकिन न जाने क्यों मुझे उनकी गुस्ताखी बुरी लग रही थी। पैसे ईश्वरी की जेब से गये। शायद मेरे पिता को जो वेतन मिलता है, उससे ज़्यादा इन खानसामों को इनाम- इकराम में मिल जाता हो। एक अठन्नी तो चलते समय ईश्वरी ही ने दी। ‍फिर भी मैं उन सबों से उसी तत्परता और विनय की अपेक्षा करता था, जिससे वे ईश्वरी की सेवा कर रहे थे। ईश्वरी के हुक्म पर सब-के-सब दौडते हैं, लेकिन मैं कोई चीज़ माँगता हूँ, तो उतना उत्साह नहीं दिखाते! मुझे भोजन में कुछ स्वाद न मिला। यह भेद मेरे ध्यान को संपूर्ण रूप से अपनी ओर खींचे हुए था।
गाड़ी आयी, हम दोनों सवार हुए। खानसामों ने ईश्वेरी को सलाम किया। मेरी ओर देखा भी नहीं।
ईश्वरी ने कहा- कितने तमीजदार हैं ये सब। एक हमारे नौकर हैं कि कोई काम करने का ढंग नहीं।
मैंने खट्टे मन से कहा- इसी तरह अगर तुम अपने नौकरों को भी आठ आने रोज इनाम दिया करो, तो शायद इनसे ज़्यादा तमीजदार हो जायें।
‘तो क्या तुम समझते हो, यह सब केवल इनाम के लालच से इतना अदब करते हैं।’
‘जी नहीं, कदापि नहीं! तमीज और अदब तो इनके रक्त में मिल गया है।’
गाड़ी चली। डाक थी। प्रयाग से चली तो प्रतापगढ़ जाकर रूकी। एक आदमी ने हमारा कमरा खोला। मैं तुरंत चिल्ला उठा- दूसरा दरजा है- सेकेंड क्लास है।
उस मुसाफिर ने डिब्बे के अंदर आकर मेरी ओर एक विचित्र उपेक्षा की दृष्टि से देखकर कहा- जी हाँ, सेवक इतना समझता है, और बीच वाले बर्थ पर बैठ गया। मुझे कितनी लज्जा आयी, कह नहीं सकता।
भोर होते-होते हम लोग मुरादाबाद पहुँचे। स्टेशन पर कई आदमी हमारा स्वागत करने के लिए खड़े थे। दो भद्र पुरुष थे। पाँच बेगार। बेगारों ने हमारा लगेज उठाया। दोनों भद्र पुरूष पीछे-पीछे चले। एक मुसलमान था रियासत अली, दूसरा ब्राह्मण था रामहरख। दोनों ने मेरी ओर अपरिचित नेत्रों से देखा, मानो कह रहे हैं, तुम कौवे होकर हंस के साथ कैसे?
रियासत अली ने ईश्वरी से पूछा- यह बाबू साहब क्या आपके साथ पढ़ते हैं?
ईश्वरी ने जवाब दिया- हाँ, साथ पढ़ते भी हैं और साथ रहते भी हैं। यों कहिए कि आप ही की बदौलत मैं इलाहाबाद पड़ा हुआ हूँ, नहीं कब का लखनऊ चला आया होता। अबकी मैं इन्हें घसीट लाया। इनके घर से कई तार आ चुके थे, मगर मैंने इनकारी-जवाब दिलवा दिये। आखिरी तार तो अर्जेंट था, जिसकी फीस चार आने प्रति शब्द है, पर यहाँ से भी उसका जवाब इन्कारी ही गया।
दोनों सज्जनों ने मेरी ओर चकित नेत्रों से देखा। आतंकित हो जाने की चेष्टा करते जान पड़े।
रियासत अली ने अर्द्धशंका के स्वर में कहा- लेकिन आप बड़े सादे लिबास में रहते हैं।
ईश्वरी ने शंका निवारण की- महात्मा गाँधी के भक्त हैं साहब। खद्दर के सिवा कुछ पहनते ही नहीं। पुराने सारे कपड़े जला डाले। यों कहो कि राजा हैं। ढाई लाख सालाना की रियासत है, पर आपकी सूरत देखो तो मालूम होता है, अभी अनाथालय से पकड़कर आये हैं।
रामहरख बोले- अमीरों का ऐसा स्वभाव बहुत कम देखने में आता है। कोई भाँप ही नहीं सकता।
रियासत अली ने समर्थन किया- आपने महाराजा चाँगली को देखा होता तो दाँतों तले उंगली दबाते। एक गाढ़े की मिर्जई और चमरौधे जूते पहने बाज़ारों में घूमा करते थे। सुनते हैं, एक बार बेगार में पकड़े गये थे और उन्हीं ने दस लाख से कालेज खोल दिया।
मैं मन में कटा जा रहा था; पर न जाने क्या बात थी कि यह सफेद झूठ उस वक्त मुझे हास्यास्पद न जान पड़ा। उसके प्रत्येक वाक्य के साथ मानों मैं उस कल्पित वैभव के समीपतर आता जाता था।
मैं शहसवार नहीं हूँ। हाँ, लड़कपन में कई बार लद्दू घोड़ों पर सवार हुआ हूँ। यहाँ देखा तो दो कलाँ-रास घोड़े हमारे लिए तैयार खड़े थे। मेरी तो जान ही निकल गई। सवार तो हुआ, पर बोटियाँ काँप रही थीं। मैंने चेहरे पर शिकन न पड़ने दिया। घोड़े को ईश्वरी के पीछे डाल दिया। खैरियत यह हुई कि ईश्वरी ने घोड़े को तेज न किया, वरना शायद मैं हाथ-पैर तुड़वाकर लौटता। संभव है, ईश्व‍री ने समझ लिया हो कि यह कितने पानी में है।


ईश्वरी का घर क्या था, किला था। इमामबाड़े का-सा फाटक, द्वार पर पहरेदार टहलता हुआ, नौकरों का कोई हिसाब नहीं, एक हाथी बँधा हुआ। ईश्वरी ने अपने पिता, चाचा, ताऊ आदि सबसे मेरा परिचय कराया और उसी अतिश्योक्ति के साथ। ऐसी हवा बाँधी कि कुछ न पूछिए। नौकर- चाकर ही नहीं, घर के लोग भी मेरा सम्मान करने लगे। देहात के जमींदार, लाखों का मुनाफा, मगर पुलिस कान्सटेबिल को अफसर समझने वाले। कई महाशय तो मुझे हुज़ूर-हुज़ूर कहने लगे।
जब जरा एकांत हुआ, तो मैंने ईश्वरी से कहा- तुम बड़े शैतान हो यार, मेरी मिट्टी क्यों पलीद कर रहे हो?
ईश्वरी ने दृढ़ मुस्कान के साथ कहा- इन गधों के सामने यही चाल जरूरी थी, वरना सीधे मुँह बोलते भी नहीं।
जरा देर के बाद नाई हमारे पाँव दबाने आया। कुँवर लोग स्टेशन से आये हैं, थक गये होंगे। ईश्वरी ने मेरी ओर इशारा करके कहा- पहले कुँवर साहब के पाँव दबा।
मैं चारपाई पर लेटा हुआ था। मेरे जीवन में ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि किसी ने मेरे पाँव दबाये हों। मैं इसे अमीरों के चोचले, रईसों का गधापन और बड़े आदमियों की मुटमरदी और जाने क्या-क्या कहकर ईश्वरी का परिहास किया करता और आज मैं पोतड़ों का रईस बनने का स्वाँग भर रहा था।
इतने में दस बज गये। पुरानी सभ्यता के लोग थे। नयी रोशनी अभी केवल पहाड़ की चोटी तक पहुँच पायी थी। अंदर से भोजन का बुलावा आया। हम स्नान करने चले। मैं हमेशा अपनी धोती खुद छाँट लिया करता हूँ; मगर यहाँ मैंने ईश्वरी की ही भाँति अपनी धोती भी छोड़ दी। अपने हाथों अपनी धोती छाँटते शर्म आ रही थी। अंदर भोजन करने चले। होस्टल में जूते पहने  मेज पर जा डटते थे। यहाँ पाँव धोना आवश्ययक था। कहार पानी लिये खड़ा था। ईश्वरी ने पाँव बढ़ा दिये। कहार ने उसके पाँव धोये। मैंने भी पाँव बढ़ा दिये। कहार ने मेरे पाँव भी धोये। मेरा वह विचार न जाने कहाँ चला गया था।


सोचा था, वहाँ देहात में एकाग्र होकर खूब पढ़ेंगे, पर यहाँ सारा दिन सैर-सपाटे में कट जाता था। कहीं नदी में बजरे पर सैर कर रहे हैं, कहीं मछ‍लियों या चिड़ियों का शिकार खेल रहे हैं, कहीं पहलवानों की कुश्ती देख रहे हैं, कहीं शतरंज पर जमे हैं। ईश्वरी खूब अंडे मँगवाता और कमरे में ‘स्टोव’ पर आमलेट बनते। नौकरों का एक जत्था हमेशा घेरे रहता। अपने हाथ-पाँव हिलाने की कोई जरूरत नहीं। केवल जबान हिला देना काफ़ी है। नहाने बैठो तो आदमी नहलाने को हाजिर, लेटो तो आदमी पंखा झलने को खड़े। मैं महात्मा गाँधी का कुँवर चेला मशहूर था। भीतर से बाहर तक मेरी धाक थी। नाश्ते में जरा भी देर न होने पाये, कहीं कुँवर साहब नाराज़ न हो जायें; बिछावन ठीक समय पर लग जाय, कुँवर साहब के सोने का समय आ गया। मैं ईश्वरी से भी ज़्यादा नाजुक दिमाग बन गया था या बनने पर मजबूर किया गया था। ईश्वरी अपने हाथ से बिस्तर बिछाले लेकिन कुँवर मेहमान अपने हाथों से कैसे अपना बिछावन बिछा सकते हैं! उनकी महानता में बट्टा लग जायगा।
एक दिन सचमुच यही बात हो गयी। ईश्वरी घर में था। शायद अपनी माता से कुछ बातचीत करने में देर हो गयी। यहाँ दस बज गये। मेरी आँखें नींद से झपक रही थीं, मगर बिस्तर कैसे लगाऊँ? कुँवर जो ठहरा। कोई साढ़े ग्यारह बजे महरा आया। बड़ा मुँहलगा नौकर था। घर के धंधों में मेरा बिस्तर लगाने की उसे सुधि ही न रही। अब जो याद आयी, तो भागा हुआ आया। मैंने ऐसी डाँट बतायी कि उसने भी याद किया होगा।
ईश्वरी मेरी डाँट सुनकर बाहर निकल आया और बोला- तुमने बहुत अच्छा किया। यह सब हरामखोर इसी व्यवहार के योग्य हैं।
इसी तरह ईश्वरी एक दिन एक जगह दावत में गया हुआ था। शाम हो गयी, मगर लैम्प मेज पर रखा हुआ था। दियासलाई भी थी, लेकिन ईश्वरी खुद कभी लैम्प नहीं जलाता था। ‍‍फिर कुँवर साहब कैसे जलायें? मैं झुँझला रहा था। समाचार-पत्र आया रखा हुआ था। जी उधर लगा हुआ था, पर लैम्प नदारद। दैवयोग से उसी वक्त मुंशी रियासत अली आ निकले। मैं उन्हीं पर उबल पड़ा, ऐसी फटकार बतायी कि बेचारा उल्लू हो गया- तुम लोगों को इतनी फ़िक्र भी नहीं कि लैम्प तो जलवा दो! मालूम नहीं, ऐसे कामचोर आदमियों का यहाँ कैसे गुजर होता है। मेरे यहाँ घंटे-भर निर्वाह न हो। रियासत अली ने काँपते हुए हाथों से लैम्प जला दिया।
वहाँ एक ठाकुर अक्सर आया करता था। कुछ मनचला आदमी था, महात्मा गाँधी का परम भक्त। मुझे महात्मा जी का चेला समझकर मेरा बड़ा लिहाज़ करता था; पर मुझसे कुछ पूछते संकोच करता था। एक दिन मुझे अकेला देखकर आया और हाथ बाँधकर बोला- सरकार तो गाँधी बाबा के चेले हैं न? लोग कहते हैं कि यहाँ सुराज हो जायेगा तो जमींदार न रहेंगे।
मैंने शान जमायी- जमींदारों के रहने की जरूरत ही क्या। है? यह लोग गरीबों का खून चूसने के सिवा और क्या करते है?
ठाकुर ने ‍फिर पूछा- तो क्यों , सरकार, सब जमींदारों की ज़मीन छीन ली जाएगी। मैंनें कहा- बहुत-से लोग तो खुशी से दे देंगे। जो लोग खुशी से न देंगे, उनकी ज़मीन छीननी ही पड़ेगी। हम लोग तो तैयार बैठे हुए हैं। ज्यों ही स्वराज्य हुआ, अपने इलाके असामियों के नाम हिब्बा कर देंगे।
मैं कुरसी पर पाँव लटकाये बैठा था। ठाकुर मेरे पाँव दबाने लगा। फिर बोला- आजकल जमींदार लोग बड़ा जुलुम करते हैं सरकार! हमें भी हुज़ूर, अपने इलाके में थोड़ी-सी ज़मीन दे दें, तो चलकर वहीं आपकी सेवा में रहें।
मैंने कहा- अभी तो मेरा कोई अख्तियार नहीं है भाई; लेकिन ज्यों ही अख्तियार मिला, मैं सबसे पहले तुम्हें बुलाऊँगा। तुम्हें मोटर-ड़्राइवरी सिखा कर अपना ड्राइवर बना लूँगा।
सुना, उस दिन ठाकुर ने खूब भंग पी और अपनी स्त्री को खूब पीटा और गाँव के महाजन से लड़ने पर तैयार हो गया।


छुट्टी इस तरह तमाम हुई और हम फिर प्रयाग चले। गाँव के बहुत-से लोग हम लोगों को पहुँचाने आये। ठाकुर तो हमारे साथ स्टेशन तक आया। मैनें भी अपना पार्ट खूब सफाई से खेला और अपनी कुबेरोचित विनय और देवत्व की मुहर हरेक हृदय पर लगा दी। जी तो चाहता था, हरेक नौकर को अच्छा इनाम दूँ, लेकिन वह सामर्थ्य कहाँ थी? वापसी टिकट था ही, केवल गाड़ी में बैठना था; पर गाड़ी आयी तो ठसाठस भरी हुई। दुर्गापूजा की छुट्टियाँ भोगकर सभी लोग लौट रहे थे। सेकेंड क्लास में तिल रखने की जगह नहीं। इंटर क्लास की हालत उससे भी बदतर। यह आखिरी गाड़ी थी। किसी तरह रूक न सकते थे। बड़ी मुश्किल से तीसरे दरजे में जगह मिली। हमारे ऐश्वर्य ने वहाँ अपना रंग जमा लिया, मगर मुझे उसमें बैठना बुरा लग रहा था। आये थे आराम से लेटे-लेटे, जा रहे थे सिकुड़े हुए। पहलू बदलने की भी जगह न थी।
कई आदमी पढ़े-लिखे भी थे! वे आपस में अंग्रेजी राज्य की तारीफ करते जा रहे थे। एक महाशय बोले- ऐसा न्याय तो किसी राज्य में नहीं देखा। छोटे-बड़े सब बराबर। राजा भी किसी पर अन्याय करे, तो अदालत उसकी गर्दन दबा देती है।
दूसरे सज्जन ने समर्थन किया- अरे साहब, आप खुद बादशाह पर दावा कर सकते हैं। अदालत में बादशाह पर डिक्री हो जाती है।
एक आदमी, जिसकी पीठ पर बड़ा गट्ठर बँधा था, कलकत्ते जा रहा था। कहीं गठरी रखने की जगह न मिलती थी। पीठ पर बाँधे हुए था। इससे बेचैन होकर बार-बार द्वार पर खड़ा हो जाता। मैं द्वार के पास ही बैठा हुआ था। उसका बार-बार आकर मेरे मुँह को अपनी गठरी से रगड़ना मुझे बहुत बुरा लग रहा था। एक तो हवा यों ही कम थी, दूसरे उस गँवार का आकर मेरे मुँह पर खड़ा हो जाना, मानो मेरा गला दबाना था। मैं कुछ देर तक जब्त किये बैठा रहा। एकाएक मुझे क्रोध आ गया। मैंने उसे पकड़कर पीछे ठेल दिया और दो तमाचे जोर-जोर से लगाये।
उसनें आँखें निकालकर कहा- क्यों मारते हो बाबूजी, हमने भी किराया दिया है!
मैंने उठकर दो-तीन तमाचे और जड़ दिये।
गाड़ी में तूफ़ान आ गया। चारों ओर से मुझ पर बौछार पड़ने लगी।
‘अगर इतने नाजुक मिज़ाज हो, तो अव्वल दर्जे में क्यों नहीं बैठे।‘
‘कोई बड़ा आदमी होगा, तो अपने घर का होगा। मुझे इस तरह मारते तो दिखा देता।’
‘क्या कसूर किया था बेचारे ने। गाड़ी में साँस लेने की जगह नहीं, खिड़की पर जरा साँस लेने खड़ा हो गया, तो उस पर इतना क्रोध! अमीर होकर क्या आदमी अपनी इन्सानियत बिल्कुल खो देता है।
’यह भी अंग्रेजी राज है, जिसका आप बखान कर रहे थे।’
एक ग्रामीण बोला- दफ्तरन माँ घुसन तो पावत नहीं, उस पर इत्ता मिज़ाज!
ईश्वरी ने अंग्रेजी मे कहा- What an idiot you are, Bir! (बीर, तुम कितने मूर्ख हो !) और मेरा नशा अब कुछ-कुछ उतरता हुआ मालूम होता था।
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(मुंशी प्रेमचंद जी ने तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के मद्दे नज़र अपनी कहानी 'नशा' के माध्यम से इस तथ्य पर प्रकाश डाला है कि तमाम लोग मात्र परिस्थितियों वश ही महात्मा गांधी के स्वतन्त्रता आंदोलन का समर्थन  करते थे और मौका मिलते ही रंग बदल जाते थे। 
यह कहानी वर्तमान संदर्भों में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी तब थी। कम्युनिस्ट आंदोलनों में घुसे हुये पी टी सीतापुरिया जैसे लोग 'नशा' के  'बीर' का प्रतिनिधित्व करते हैं जो मौका मिलने पर अपने ही कार्यकर्ताओं का शोषण-उत्पीड़न करने से कतई नहीं चूकते। पता नहीं उनका नशा कब उतरेगा या उतरेगा ही नहीं?
---विजय राजबली माथुर ) 

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