सन १९३६ ई. में लखनऊ में आजादी के आंदोलन को गति प्रदान करने हेतु तीन संगठनों की स्थापना हुई थी.उनमें से दो के ७५ वर्ष पूर्ण हो चुके हैं और तीसरा संगठन भी अगस्त माह में ७५ वर्ष पूर्ण करने जा रहा है और इस उपलक्ष्य में उसका स्थापना समारोह भी लखनऊ में ही होने जा रहा है.१९३६ में वे लोग भाग्यशाली थे जिन्होंने इन संगठनों की स्थापना होते देखी और उसमें भाग लिया.उसी प्रकार अब वे लोग भी भाग्यशाली होंगें जो लखनऊ में हो रहे इस समारोह में भाग लेंगें या अपना योगदान देंगें.लखनऊ वासियों के लिए यह एक ऐतिहासिक और अमूल्य अवसर है कि वे इस कार्यक्रम में भाग लेकर अपने को धन्य कर सकते हैं.
१९३६ ई. की अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियाँ
स्पेन में जेनरल फ्रैंको के नेतृत्व में फासीवादियों ने बर्बर नर-संहार का तांडव रचा.जर्मनी और इटली में हिटलर और मुसोलिनी का ख़तरा आ गया.इन परिस्थितियों में १९३६ ई. में 'रोम्या रोला','इडम फास्टर','आंद्रे मालेरा','टामसमान ',वोल्ड फ्रैंक ''मैक्सिम गोर्की',हेनरी बार्बूज'आदि के आह्वान पर पेरिस में 'विश्व लेखक अधिवेंशन' नामक सम्मलेन हुआ.
भारतीय परिस्थितियाँ
इसी काल-खंड में भारत में चल रहे आजादी के आंदोलन को किसानों,लेखकों एवं छात्रों के शोषण-उत्पीडन का सामना करना पड़ रहा था.१९२०-३० के दशकों में कई किसान सम्मलेन तथा संगठन बने. स्वाधीनता आंदोलन का समर्थन करने के कारण १९३०-३४ के बीच ३८४ पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा 'वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट 'द्वारा रोक लगाई गई .
विश्व-व्यापी मंदी,ब्रिटिश शासकों की नृशंसता,जमींदारों,जागीरदारों का उत्पीडन और शोषण चरम पर था.कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर की पुस्तिका 'रूस से चिट्ठी'पर अंग्रेज सरकार ने प्रतिबन्ध लगा दिया.साहित्यकार 'सत्य जीवन वर्मा'ने 'हिन्दी लेखक संघ'बनाया और सितम्बर १९३४ में इसकी सदस्यता केलिए अपील की.'मुंशी प्रेम चंद'और रामचंद्र टंडन ने भी 'भारतीय साहित्य परिषद' और 'हिन्दुस्तानी एकेडमी' नामक सहकारी प्रकाशन संस्थान लेखकों के सहयोग से स्थापित किये जिनका उद्देश्य अभिव्यक्ति की रक्षा करना था.
१९३५ ई.में लन्दन स्थित क्रांतिकारी युवा भारतीय लेखकों ने प्रगतिशील लेखक संघ स्थापित करने के उद्देश्य से एक मसौदा तैयार किया.इस अभियान को लखनऊ के सज्जाद जहीर के अलावा मुल्क राज आनंद,प्रमोद सेनगुप्त,अहमद अली,हीरेंन मुखर्जी,ज्योति घोष,मह्म्दुज्जफर,डा. मोहमद दीन तासीर आदि ने भी बल दिया."हंस"पत्रिका की और से मुंशी प्रेमचंद ने भी पूरा समर्थन किया.
"प्रगतिशील लेखक संघ" की स्थापना
सामाजिक रूढीवाद के विरुद्ध और आजादी के संघर्ष हेतु लखनऊ के 'रफा-ए-आम' हाल में ०९ अप्रैल १९३६ से एक सम्मलेन हुआ जिसमें भारतीय भाषाओं के विश्व-स्तरीय २५० लेखकों ने भाग लिया.इनमें प्रमुख थे-
सुमित्रा नंदन पन्त,यशपाल,भीष्म साहनी,केदारनाथ अग्रवाल,उपेन्द्र नाथ अश्क,राम वृक्ष बेनीपुरी,बाल कृष्ण शर्मा नवीन,शमशेर बहादुर सिंह,नागार्जुन,रामधारी सिंह दिनकर,राहुल सांस्कृत्यायन,राम प्रसाद घिल्डियाल पहाड़ी,प्रकाश चन्द्र गुप्त,अमृत राय ,भैरव प्रसाद गुप्त,क्रिशन चंदर,राजेन्द्र सिंह बेदी,कुर्रतुल एन "हैदर",इस्मत चुगताई,देवेन्द्र सत्यार्थी,मखदूम,वामिक जौनपुरी,गोपाल सिंह नेपाली,सुदर्शन शील,विजन भाषचार्य,कैफी आजमी,सरदार जाफरी,मजरूह सुलतान पूरी,बलराज साहनी,सआदत हसन मंटो,डा.राम विलास शर्मा,शिवदान सिंह चौहान,ख्वाजा अहमद अब्बास,साहिर लुध्यानवी,हसरत मोहानी आदि.
१० अप्रैल १९३६ ई.को सम्मलेन में संगठन बन गया जिसके महामंत्री बने सज्जाद जहीर और अध्यक्ष मुंशी प्रेम चंद.इस संगठन के घोषणा पत्र में कहा गया था-"भारतीय समाज में बड़े-बड़े परिवर्तन हो रहे हैं.पुराने विचारोनौर विश्वासों की जड़ें हिलती जा रही हैं और एक नए समाज का जन्म हो रहा है.भारतीय लेखकों का धर्म है कि वे भारतीय जीवन में पैदा होने वाली 'क्रान्ति'को शब्द और रूप दें और राष्ट्र को उन्नति के मार्ग पर चलने में सहायक हों." मुंशी प्रेम चंद ने तब जो अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा था वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है-
"हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा,जिसमें उच्च चिंतन हो,स्वाधीनता का भाव हो,सौंदर्य का सार हो,सृजन की आत्मा हो,जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो जो हमें गति,संघर्ष और बेचैनी पैदा करे सुलाये नहीं क्यों अब और सोना मृत्यु का लक्षण है"
१९५३ ई.तक यह संगठन भारतीय साहित्यकारों के मध्य छाया रहा.'इप्टा' पहले इसी की एक शाखा था जो अब अलग संगठन है.राजनीतिक कारणों से इससे कुछ और संगठन अब अलग चल रहे हैं परन्तु भारत की आजादी के संघर्ष में इसके योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता.
"किसान सभा "की स्थापना
छिट-पुट रूप से किसान आंदोलन को गति देने हेतु संगठन बनते रहे.१८ जून १९३३ को बिहटा में 'बिहार प्रदेश किसान सभा'का पहला सम्मलेन हुआ और दूसरा सम्मलेन १९३५ ई. में हाजीपुर में हुआ.१५ जनवरी १९३६ को मेरठ (यूं.पी.)में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के अखिल भारतीय सम्मलेन में किसान नेताओं एवं कार्यकर्ताओं ने एक अखिल भारतीय किसान संगठन बनाने का निश्चय किया और प्रो.एन.जी.रंगा तथा जय प्रकाश नारायण के संयोजकत्व में एक समिति गठित कर दी.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अखिल भारतीय अधिवेशन के मध्य ११ अप्रैल १९३६ ई. को लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सम्मलेन आयोजित हुआ और स्वामी सहजानंद की अध्यक्षता में 'अखिल भारतीय किसान कांग्रेस'की स्थापना की गई ,कुछ ने इसे अखिल भारतीय किसान संघ भी कहा और आगे चल कर १४ जुलाई १९३७ को गया(बिहार)में इसका नाम "अखिल भारतीय किसान सभा"कर दिया गया.
स्थापना सम्मलेन में बिहार ,बंगाल,आंध्र,तामिलनाडू,मलाबार,मध्य प्रांत,पंजाब ,गुजरात,दिल्ली और यूं.पी.का प्रतिनिधित्व रहा. सम्मलेन को संबोधित करने वालों में प्रमुख नेता थे-सोहन सिंह जोश,राम मनोहर लोहिया,भाग लेने वालों में और प्रमुख लोग थे-इंदु लाल याग्निक,के.एम्.अशरफ,एन.जी.रंग,जय प्रकाश नारायण आदि.
"आल इंडिया स्टुडेंट्स फेडरेशन"- A.I.S.F.की स्थापना
१९३६ ई. में विश्व तथा अपने देश में भी परिस्थितियाँ बड़ी विकट थीं.विदेशी हुकूमत का जुल्म सबसे ज्यादा युवा वर्ग विशेषकर छात्रों को भुगतना पड़ रहा था.अतः स्वीधीनता संग्राम के अग्रणी नेताओं ने लेखकों तथा किसानों के समान ही छात्रों हेतु भी एक अखिल भारतीय संगठन बनाने हेतु लखनऊ में अमीनाबाद के 'गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल'में १२ अगस्त १९३६ को छात्रों का एक सम्मलेन बुलाया.ए .आई .एस.एफ.के प्रथम महामंत्री लखनऊ के ही प्रेम नारायण भार्गव चुने गए ,हजरत गंज में उनका भार्गव प्रेस आज भी कार्य रत है.अध्यक्ष पं.जवाहर लाल नेहरू चुने गए थे और मुख्य अतिथि थे मो.अली जिन्नाह.महात्मा गांधी तथा रवीन्द्र नाथ टैगोर ने अपने सन्देश भेज कर इसे आशीर्वाद दिया था.क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह,राजगुरु,सुखदेव भी इसके सदस्य रहे हैं.
ए.आई.एस.एफ ने आजादी की लड़ाई में सक्रीय रूप से भाग लिया था.आज हमारे सामने फिर वैसी ही समस्याएं मुंह बाएं सामने हैं.पूंजीवादी जनतंत्र की खर्चीली धोखाधड़ी ,लूटतंत्र का दमन जारी है.पंचायती राज की कपट पूर्ण सरकारी नौटंकी चल रही है.साम्राज्यवाद और पूंजीवाद की यह घुटन ,यह सडांध अब ज़िंदा आदमी के बर्दाश्त के काबिल नहीं है.
यूरोप में छात्र -युवा उठ खड़े हुए हैं.नवंबर २०१० में शिक्षा मदों में कटौती और फीसों को बढाए जाने की सरकार की योजना के खिलाफ ब्रिटेन के स्कूलों और विश्वविद्यालयों के छात्र बार-बार सड़कों पर उतरे और अपने गुस्से का भरपूर प्रदर्शन किया.सत्ताधारी कंजर्वेटिव पार्टी के दफ्तर पर हजारों छात्रों ने हमला बोल दिया था.२४ नवंबर २०१० के प्रदर्शनों में पूरे ब्रिटेन में १ लाख ३० हजार छात्रों ने भाग लिया.त्रैफल्गार चौराहे पर भारी तोड़-फोड की.
इससे पहले फ्रांस,जर्मनी,स्पेन,पुर्तगाल और यूनान में भी छात्र शिक्षा में किये जाने वाले सुधारों के खिलाफ झुझारू प्रदर्शन कर चुके थे.उनके यहाँ पूंजीवादी सरकारों ने अपने बजट घाटे को घटाने के नाम पर सार्वजनिक व्यय में कमी करना शुरू कर दिया है.ब्रिटेन,फ्रांस समेत यूरोपीय देशों की जनता अपनी हुकूमत से पूंछ रही है -सट्टेबाजी में लिप्त बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के जुए की कीमत हम क्यों अदा करें?
१९३० की मंदी के बाद अमेरिका में हाल में आई मंदी से वहाँ काफी झटका लगा है और अभी फिर लगने वाला है.हमारे देश में पढाई दिन दूनी रात चौगुनी मंहगी होती जा रही है.अभी बी.एड.कालेजों में यूं.पी.में फीस रु.५१०००/-निर्धारित कर दी गई है.हमारे यहाँ आज छात्र आंदोलन शून्य है.
आगामी १२ और १३ अगस्त को ए.आई.एस.एफ.के ७५ वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में पहले दिन का समारोह उसी ऐतिहासिक गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल में होने जा रहा है.इस सम्बन्ध में विगत १० जुलाई को एक आवश्यक बैठक जिसकी अध्यक्षता प्रो.डा.रमेश दीक्षित ने की थी द्वारा आगामी सम्मलेन हेतु एक 'स्वागत समिति'का गठन किया गया है जिसकी महामंत्री सुश्री निधि चौहान बनायी गई हैं.
यह लखनऊ वासियों के लिए गौरव की बात है कि उन्हें फिर एक बार ऐतिहासिक क्षण की मेजबानी मिली है.उनका कर्तव्य है कि ए.आई.एस.एफ के सम्मलेन को सफल बनाने हेतु अपना योगदान दें.संगठन मांग कर रहा है कि सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.)का ६ प्रतिशत तथा राज्य बजट का १० प्रतिशत भाग शिक्षा पर खर्च किया जाए.इससे अधिकाधिक मुफ्त शिक्षा का प्रबंध किया जा सकता है.शिक्षा के बाजारीकरण पर रोक लगाने तथा सारे देश में 'एक सामान शिक्षा प्रणाली'लागू करना भी प्रमुख मांग है.छात्रों की सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने तथा युवाओं की राज्नीतिक्भागीदारी बढ़ाना भी संगठन का उद्देश्य है.
आगामी पीढ़ियों का भविष्य संवारने हेतु लखनऊ में हो रहे इस ऐतिहासिक कार्यक्रम को सफल बनाना प्रत्येक लखनऊ वासी का धर्म होना चाहिए.
(संपर्क स्थल :- कार्यालय स्वागत समिति,ए.आई.एस.एफ.,२२ -कैसर बाग,लखनऊ)
Friday, July 15, 2011
Tuesday, July 12, 2011
समझदारों की नासमझी
इंटरनेट के माध्यम से ब्लॉग का प्रयोग करने वाले सभी लोग समझदार होते हैं.एक-दुसरे के विचारों को पढ़ने-समझने का बेहतरीन मौका इसके द्वारा मिलता है ,लेकिन यदि पढ़ कर भुला दिया जाए या उसकी उपेक्षा कर दी जाए तो उसे मेरी समझ से नासमझी मानना चाहिए.आज आप सब को ऐसी ही कुछ बातें बताना चाहता हूँ.
गुरु मेष राशी और शनि के कन्या राशी में होने से षडाष्टक योग बन रहा है जिसके परिणामस्वरूप शासन तंत्र को विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा ,श्रमिकों के कोप का सामना करना पड़ेगा.(पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ा कर सर्कार ने आग में घी झोंक ही दिया है).यान-खान दुर्घटनाओं के भी योग इससे उत्पन्न हो रहे हैं और स्वास्थ्य एवं राहत कार्यों हेतु विशेष व्यय करना पड़ेगा.
१० जुलाई को हुए हादसे से पूर्व ०२ जुलाई को ही 'कुछ इधर की कुछ उधर की' शीर्षक से लिखे लेख द्वारा इस प्रकार की दुर्घटनाओं की चेतावनी दी थी.परन्तु बुद्धिमान लोगों ने बचाव का कोई प्रबंध नहीं किया और अकाल मौत के मुंह में समां गए.अधिकृत रूप से कुल ७० मौतें बतायी जा रही हैं,यह कैसे संभव है?एक जेनरल कोच में सैंकडों यात्री सफर करते हैं और पूरा का पूरा कोच ध्वस्त हो जाए और एक भी मौत न हो? एस.-२ कोच भी चकनाचूर हो गया और तमाम कोच एक-दुसरे पर चढ गए और कुल मौतें हईं सिर्फ ७० यह बात बिलकुल अविश्वसनीय है.
'पं.बंगाल के बंधुओं से एक बेपर की उड़ान' शीर्षक से लिखे लेख में सुश्री ममता बैनर्जी से सावधान रह कर वोट देने की अपील की थी.परन्तु बंग-बंधुओं ने उपेक्षा की और ममता जी को सत्ता सौंप दी.हिंदुस्तान ,लखनऊ के १२ जुलाई के सम्पादकीय का अवलोकन करें (चित्र ऊपर)तो स्पष्ट होगा उनका ध्येय क्या था? इसी प्रकार पं.बंगाल का शासन अब चलेगा जैसा २२ जून को टाटा कारखाने में सरकारी संरक्षण में लूट से जाहिर भी हो जाता है.यह कह कर बच के नहीं भागा जा सकता ग्रहों के प्रकोप का मुकाबला कैसे करें? प्रत्येक बात का उपचार और उपाय होता है.यदि बचाव करेंगें तो बचेंगें नहीं तो पिसेंगे.मेरा इरादा तो सार्वजनिक रूप से कुछ स्तुतियों और प्रार्थनाओं को जो अर्वाचीन ऋषि-मुनियों द्वारा रचित हैं ब्लॉग पर देने का था.किन्तु ममता जी के पूर्व मंत्रालय के आधीन कार्य-रत भ्रष्ट सर्जन और 'गर्व से....'के प्रवक्ता द्वारा मेरे विचारों को 'मूर्खतापूर्ण कथा'कहने और उसका आर.एस.एस.के पिट्ठू ब्लागर्स द्वारा समर्थन करने के कारण उस प्रक्रिया को त्याग दिया.हालांकि उससे से असंख्य लोग लाभान्वित हो सकते थे.०२ जुलाई वाले लेख में आगे और भी कुछ चेतावनियाँ दी हैं.यदि समय रहते उपाय किये जाएँ तो घटनाओं को घटित होने से न रोक पाने के बावजूद जान-माल की सुरक्षा की जा सकती है.
ममता जी ने अपने दो वर्ष के रेल मंत्रित्व काल में रेलवे की सुरक्षा प्रणाली की और कतई ध्यान नहीं दिया.एक वर्ष से रेलवे बोर्ड में 'सदस्य यातायात' का पद खाली चला आ रहा है.यातायात की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करे?यदि ये उपाय किये जाते तो भी इतनी जन-हानि नहीं होती.लेकिन बात जब 'गर्व से....'एवं संकीर्ण साम्प्रदायिकता के निर्वहन की हो तो वैज्ञानिक उपायों को कौन महत्त्व देता है?यदि अन्ना,रामदेव,रवि शंकर या आशा राम कुछ भी बहका दें तो लोग लपक कर उसे अपना लेंगे भले ही काफी नुक्सान भी उठाना पड़े .वैज्ञानिक उपाय बताना तो मूर्खतापूर्ण कथा के रूप में उपहास का हेतु बन जाता है.
राहुल की कवायद मायावती को सत्ता में वापिस लाने हेतु
हिन्दुस्तान के प्रधान संपादक एवं आई.बी.एन.-७ के मेनेजिंग एडिटर महोदय अन्य गणमान्य लोगों की भाँती ही आज कल श्री राहुल गांधी के गुण-गान में लगे हुए हैं.पूरी की पूरी कारपोरेट लाबी राहुल को किसानों के मसीहा के रूप में पेश कर रही है.प्राचारित किया जा रहा है राहुल २०१२ के चुनावों में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत यूं.पी. में दिला देंगें.बिहार में उनका करिश्मा देखा ही जा चूका है अब यहाँ भी देख लीजियेगा. राहुल गांधी जी की कृपा से मायावती जी आसान जीत के साथ सत्ता में वापिस आ जायेंगीं.
मुलायम सिंह जी जो बसपा को सत्ता में साझीदार बनाने का सर्व-प्रथम श्रेय रखते हैं.अब भाजपा के पूरक के रूप में कार्य कर रहे हैं.इसी लिए आर.एस.एस. समर्थित रामदेव जी का समर्थन करने में उन्होंने पल भर की भी देर नहीं की.यह बात पढ़े-लिखे लोगों को भले ही न समझ आये,परन्तु भोली समझी जाने वाली ग्रामीण जनता को खूब समझ में आती है.बाद में भाजपा ने भी बसपा को खूब सत्ता सुख दिलाया है.अब राहुल साहब प्रदेश सरकार की मुखालफत के नाम पर गांव वालों को भरमा रहे हैं.ऐसे में कांग्रेस की जितनी भी ताकत बढ़ेगी विपक्ष के वोट उतने ही बतेंगें और भाजपा को स्पष्ट लाभ होगा.परन्तु प्रदेश का मुस्लिम वोटर यदि भाजपा को सत्ता में आने देना चाहेगा तभी कांग्रेस को वोट देगा अन्यथा उसका थोक वोट भाजपा को हराने हेतु बसपा को ही मिलेगा जिसकी संभावना अधिक है.जाहिर है मायावती जी को राहुल के अभियान से लाभ ही लाभ है.यही कारण है जबानी हल्ले के अलावा राहुल के विरुद्ध कोई कारवाई बसपा सरकार ने नहीं की है.
क्या बसपा,भाजपा,कांग्रेस को एक साथ पराजित किया जा सकता है?
जवाब हाँ में हो सकता है यदि समझदारी से काम लिया जाए और बेवजह का अहंकार पाल कर नासमझी न बरती जाए तो.परन्ति ऐसी संभावना कम ही है जो अहंकार का त्याग किया जा सके.बिहार में लालू जी ने और यूं.पी.में मुलायम जी ने कम्यूनिस्ट आंदोलन को भारी क्षति पहुंचाई है एवं दोनों के सामने उसका परिणाम भी भुगतने को मिला है.गरीब किसान-मजदूर के हिमायती विधायिकाओं में नहीं पहुँच सके और उनका उत्पीडन-शोषण व्यापक रूप से बढ़ गया है.किसानों की उपजाऊ भूमि हडप कर सरकारें बिल्डरों को सौंप रही हैं जो कुछ राहत मिली है वह न्यायालय के कारण ही.
यदि मुलायम सिंह जी की कथनी और करनी एक है और वह सच में साम्प्रदायिक भाजपा को हराना चाहते हैं तो उन्हें अपनी सरकार बनाने का दावा छोडना होगा.कम्यूनिस्ट एवं किसान नेता का.अतुल कुमार अनजान जिनकी छवि भी उज्जवल है और जो जुझारू नेता भी हैं उनके नेतृत्व में मुलायम सिंह जी एक नया मोर्चा बनाने का मार्ग प्रशस्त करें भले ही इसके लिए उन्हें पूर्व कृत्य के लिए पश्चाताप भी करना पड़े,तब यह संभावना बन सकती है -कांग्रेस,भाजपा और बसपा जो तीनों वर्ग-चरित्र में एक ही हैं एक साथ सत्ता से दूर हो जाएँ.प्रदेश की जनता ऐसा ही चाहती भी है.अभी समय भी पर्याप्त है प्रयास किया जा सकता है,समय बीतने के साथ-साथ परिस्थितियां हाथ से निकलती जायेंगीं.
मुझे लगता है इस आंकलन को समझदार लोग दिवा स्वप्न कह कर उपहास उड़ाएंगें और फिर एक बार नासमझी का परिचय देंगें.
१० जुलाई को हुए हादसे से पूर्व ०२ जुलाई को ही 'कुछ इधर की कुछ उधर की' शीर्षक से लिखे लेख द्वारा इस प्रकार की दुर्घटनाओं की चेतावनी दी थी.परन्तु बुद्धिमान लोगों ने बचाव का कोई प्रबंध नहीं किया और अकाल मौत के मुंह में समां गए.अधिकृत रूप से कुल ७० मौतें बतायी जा रही हैं,यह कैसे संभव है?एक जेनरल कोच में सैंकडों यात्री सफर करते हैं और पूरा का पूरा कोच ध्वस्त हो जाए और एक भी मौत न हो? एस.-२ कोच भी चकनाचूर हो गया और तमाम कोच एक-दुसरे पर चढ गए और कुल मौतें हईं सिर्फ ७० यह बात बिलकुल अविश्वसनीय है.
'पं.बंगाल के बंधुओं से एक बेपर की उड़ान' शीर्षक से लिखे लेख में सुश्री ममता बैनर्जी से सावधान रह कर वोट देने की अपील की थी.परन्तु बंग-बंधुओं ने उपेक्षा की और ममता जी को सत्ता सौंप दी.हिंदुस्तान ,लखनऊ के १२ जुलाई के सम्पादकीय का अवलोकन करें (चित्र ऊपर)तो स्पष्ट होगा उनका ध्येय क्या था? इसी प्रकार पं.बंगाल का शासन अब चलेगा जैसा २२ जून को टाटा कारखाने में सरकारी संरक्षण में लूट से जाहिर भी हो जाता है.यह कह कर बच के नहीं भागा जा सकता ग्रहों के प्रकोप का मुकाबला कैसे करें? प्रत्येक बात का उपचार और उपाय होता है.यदि बचाव करेंगें तो बचेंगें नहीं तो पिसेंगे.मेरा इरादा तो सार्वजनिक रूप से कुछ स्तुतियों और प्रार्थनाओं को जो अर्वाचीन ऋषि-मुनियों द्वारा रचित हैं ब्लॉग पर देने का था.किन्तु ममता जी के पूर्व मंत्रालय के आधीन कार्य-रत भ्रष्ट सर्जन और 'गर्व से....'के प्रवक्ता द्वारा मेरे विचारों को 'मूर्खतापूर्ण कथा'कहने और उसका आर.एस.एस.के पिट्ठू ब्लागर्स द्वारा समर्थन करने के कारण उस प्रक्रिया को त्याग दिया.हालांकि उससे से असंख्य लोग लाभान्वित हो सकते थे.०२ जुलाई वाले लेख में आगे और भी कुछ चेतावनियाँ दी हैं.यदि समय रहते उपाय किये जाएँ तो घटनाओं को घटित होने से न रोक पाने के बावजूद जान-माल की सुरक्षा की जा सकती है.
ममता जी ने अपने दो वर्ष के रेल मंत्रित्व काल में रेलवे की सुरक्षा प्रणाली की और कतई ध्यान नहीं दिया.एक वर्ष से रेलवे बोर्ड में 'सदस्य यातायात' का पद खाली चला आ रहा है.यातायात की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करे?यदि ये उपाय किये जाते तो भी इतनी जन-हानि नहीं होती.लेकिन बात जब 'गर्व से....'एवं संकीर्ण साम्प्रदायिकता के निर्वहन की हो तो वैज्ञानिक उपायों को कौन महत्त्व देता है?यदि अन्ना,रामदेव,रवि शंकर या आशा राम कुछ भी बहका दें तो लोग लपक कर उसे अपना लेंगे भले ही काफी नुक्सान भी उठाना पड़े .वैज्ञानिक उपाय बताना तो मूर्खतापूर्ण कथा के रूप में उपहास का हेतु बन जाता है.
राहुल की कवायद मायावती को सत्ता में वापिस लाने हेतु
हिन्दुस्तान के प्रधान संपादक एवं आई.बी.एन.-७ के मेनेजिंग एडिटर महोदय अन्य गणमान्य लोगों की भाँती ही आज कल श्री राहुल गांधी के गुण-गान में लगे हुए हैं.पूरी की पूरी कारपोरेट लाबी राहुल को किसानों के मसीहा के रूप में पेश कर रही है.प्राचारित किया जा रहा है राहुल २०१२ के चुनावों में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत यूं.पी. में दिला देंगें.बिहार में उनका करिश्मा देखा ही जा चूका है अब यहाँ भी देख लीजियेगा. राहुल गांधी जी की कृपा से मायावती जी आसान जीत के साथ सत्ता में वापिस आ जायेंगीं.
मुलायम सिंह जी जो बसपा को सत्ता में साझीदार बनाने का सर्व-प्रथम श्रेय रखते हैं.अब भाजपा के पूरक के रूप में कार्य कर रहे हैं.इसी लिए आर.एस.एस. समर्थित रामदेव जी का समर्थन करने में उन्होंने पल भर की भी देर नहीं की.यह बात पढ़े-लिखे लोगों को भले ही न समझ आये,परन्तु भोली समझी जाने वाली ग्रामीण जनता को खूब समझ में आती है.बाद में भाजपा ने भी बसपा को खूब सत्ता सुख दिलाया है.अब राहुल साहब प्रदेश सरकार की मुखालफत के नाम पर गांव वालों को भरमा रहे हैं.ऐसे में कांग्रेस की जितनी भी ताकत बढ़ेगी विपक्ष के वोट उतने ही बतेंगें और भाजपा को स्पष्ट लाभ होगा.परन्तु प्रदेश का मुस्लिम वोटर यदि भाजपा को सत्ता में आने देना चाहेगा तभी कांग्रेस को वोट देगा अन्यथा उसका थोक वोट भाजपा को हराने हेतु बसपा को ही मिलेगा जिसकी संभावना अधिक है.जाहिर है मायावती जी को राहुल के अभियान से लाभ ही लाभ है.यही कारण है जबानी हल्ले के अलावा राहुल के विरुद्ध कोई कारवाई बसपा सरकार ने नहीं की है.
क्या बसपा,भाजपा,कांग्रेस को एक साथ पराजित किया जा सकता है?
जवाब हाँ में हो सकता है यदि समझदारी से काम लिया जाए और बेवजह का अहंकार पाल कर नासमझी न बरती जाए तो.परन्ति ऐसी संभावना कम ही है जो अहंकार का त्याग किया जा सके.बिहार में लालू जी ने और यूं.पी.में मुलायम जी ने कम्यूनिस्ट आंदोलन को भारी क्षति पहुंचाई है एवं दोनों के सामने उसका परिणाम भी भुगतने को मिला है.गरीब किसान-मजदूर के हिमायती विधायिकाओं में नहीं पहुँच सके और उनका उत्पीडन-शोषण व्यापक रूप से बढ़ गया है.किसानों की उपजाऊ भूमि हडप कर सरकारें बिल्डरों को सौंप रही हैं जो कुछ राहत मिली है वह न्यायालय के कारण ही.
यदि मुलायम सिंह जी की कथनी और करनी एक है और वह सच में साम्प्रदायिक भाजपा को हराना चाहते हैं तो उन्हें अपनी सरकार बनाने का दावा छोडना होगा.कम्यूनिस्ट एवं किसान नेता का.अतुल कुमार अनजान जिनकी छवि भी उज्जवल है और जो जुझारू नेता भी हैं उनके नेतृत्व में मुलायम सिंह जी एक नया मोर्चा बनाने का मार्ग प्रशस्त करें भले ही इसके लिए उन्हें पूर्व कृत्य के लिए पश्चाताप भी करना पड़े,तब यह संभावना बन सकती है -कांग्रेस,भाजपा और बसपा जो तीनों वर्ग-चरित्र में एक ही हैं एक साथ सत्ता से दूर हो जाएँ.प्रदेश की जनता ऐसा ही चाहती भी है.अभी समय भी पर्याप्त है प्रयास किया जा सकता है,समय बीतने के साथ-साथ परिस्थितियां हाथ से निकलती जायेंगीं.
मुझे लगता है इस आंकलन को समझदार लोग दिवा स्वप्न कह कर उपहास उड़ाएंगें और फिर एक बार नासमझी का परिचय देंगें.
Friday, July 8, 2011
विकास या विनाश
१९४७ में जब हमारा देश औपनिवेशिक गुलामी से आजाद हुआ था तो हमारे यहाँ सुई तक नहीं बंनती थी और आज हमारे देश में राकेट ,मिसाईलें तक बनने लगी हैं.विकास तो हुआ है जो दीख रहा है उसे झुठलाया नहीं जा सकता.लेकिन यह सारा विकास ,सारी प्रगति,सम्पूर्ण समृद्धि कुछ खास लोगों के लिए है शेष जनता तो आज भी भुखमरी,बेरोजगारी,कुपोषण आदि का शिकार है.गरीब और गरीब तथा अमीर और अमीर हुआ है.आजादी का अर्थ यह नहीं था.इसके लिए सरदार भगत सिंह,चंद्रशेखर आजाद,रामप्रसाद बिस्मिल,अश्फाक उल्लाह खां,रोशन लाल लाहिरी आदि अनेकों क्रांतिकारियों ने कुर्बानी नहीं दी थी.यह मार्ग विकास का नहीं ,विनाश का है.
विकास का लाभ आम जन को मिले इस उद्देश्य से प्रेरित नौजवानों नें नक्सलवाद का मार्ग अपना लिया और छत्तीस गढ की भाजपा सरकार ने इन्हें कुचलने हेतु 'सलवा-जुडूम' तथा एस पी ओ का गठन स्थानीय युवकों को लेकर कर लिया था जिसे भंग करने का आदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि,"इस सशस्त्र विद्रोह के लिए सामजिक,आर्थिक विषमता,भ्रष्ट शासन तंत्र और 'विकास के आतंकवाद' हैं".
जस्टिस बी.सुदर्शन रेड्डी का मत है-"मिडिल क्लास की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए हो रहे औद्योगिकीकरण व् अंधाधुंध माइनिंग के कारण किसान जमीन-जंगल से लगातार बेदखल हो रहे हैं.नक्सल आंदोलन के पैदल सिपाही यही किसान और आदिवासी हैं"
कोरिया की पास्को कं.को उड़ीसा में ५० वर्ष तक लौह अयस्क ले जाने हेतु किसानों की उपजाऊ जमीन दे दी गयी है लेकिन किसान कब्ज़ा नहीं छोड़ रहे हैं और ऐसा करना उनका जायज हक है.२४ जून को सारे देश में किसानों के प्रति एकजुटता प्रदर्शित करने हेतु 'पास्को विरोधी दिवस' मनाया गया था (इस ब्लाग में इस आशय का एक लेख भी दिया था),किन्तु अधिकाँश लोग अपने-अपने में मस्त थे,उन्हें उड़ीसा के गरीब किसानों से कोई मतलब नहीं था .नंदीग्राम और सिंगूर में हल्ला बोलने वाली मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी भी चुप्पी साधे रहीं.
'नया जमाना',सहारनपुर के संस्थापक संपादक स्व.कन्हैया लाल मिश्र'प्रभाकर' ने आर.एस.एस.नेता लिमये जी से एक बार कहा था कि शीघ्र ही दिल्ली की सत्ता के लिए सड़कों पर संघियों-कम्यूनिस्टों के मध्य संघर्ष होगा.दिल्ली नहीं तो छत्तीस गढ़ में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पूर्व यह हो ही रहा था.१९२५ में आजादी के आंदोलन को गति प्रदान करने हेतु जब 'भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी' का गठन किया गया तो ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने अपने पृष्ठपोषक बुद्धिजीवियों को बटोर कर आर.एस.एस.का गठन करवा दिया जिसने साम्राज्यवाद की सहोदरी 'साम्प्रदायिकता' को पाला-पोसा और अंततः देश का विभाजन करा दिया.१९४७ में हुआ विभाजन १९७१ में एक और विभाजन लेकर आया जिसने दो राष्ट्रों की थ्योरी को ध्वस्त कर दिया.भारत के ये तीनों हिस्से भीषण असमानता के शिकार हैं.तीनों जगह सत्ताधीशों ने अवैध्य कमाई के जरिये जनता का खून चूसा है.तीनों जगह आम जनता का जीवन यापन करना बेहद मुश्किल हो रहा है.सरकारें साम्राज्यवाद के आधुनिक मसीहा अमेरिका के इशारे पर काम कर रही हैं न कि अपने-अपने देश की जनता के हित में.
तीनों देशों में फिरकापरस्त लोग अफरा-तफरी फैला कर जीवन की मूलभूत समस्याओं से ध्यान हटा रहे हैं.लोक-लुभावन नारे लगा कर पूंजीपतियों के पिट्ठू ही साधारण जन को ठग कर सत्ता में पहुँच जाते हैं.जाती,धर्म.सम्प्रदाय,गोत्र ,क्षेत्रवाद की आंधी चला कर सर्व-साधारण को गुमराह कर दिया जाता है.जो लोग गरीबों के रहनुमा हैं किसानों और मजदूरों के हक के लड़ाका हैं वे अपने अनुयाइयों के वोट हासिल नहीं कर पते हैं और सत्ता से वंचित रह जाते हैं.नतीजा साफ़ है जो प्रतिनिधि चुने जाते हैं वे अपने आकाओं को खुश करने की नीतियाँ और क़ानून बनाते हैं ,आम जन तो उनकी वरीयता में होता ही नहीं है.
क्या आम जनता इसके लिए उत्तरदायी है?कुछ हद तक तो है ही क्योंकि वही तो जाती,धर्म ,सप्रदाय के बहकावे में गलत लोगों को वोट देकर भेजती है.लेकिन इसके लिए जिम्मेदार मुख्य रूप से समाज में प्रचलित अवैज्ञानिक मान्यताएं और धर्म के नाम पर फैले अंध-विशवास एवं पाखण्ड ही हैं.विज्ञान के अनुयायी और साम्यवाद के पक्षधर सिरे से ही धर्म को नकार कर अधार्मिकों के लिए मैदान खुला छोड़ देते हैं जिससे उनकी लूट बदस्तूर जारी रहती है और कुल नुक्सान साम्यवादी-विचार धारा तथा वैज्ञानिक सोच को ही होता है.
धर्म=जो धारण करता है वही धर्म है -यह धारणा कैसे अवैज्ञानिक और मजदूर-किसान विरोधी हो गयी.लेकिन किसान-मजदूर विरोधी लोग जम कर धर्म की गलत व्याख्या प्रस्तुत करके किसान और मजदूर को उलटे उस्तरे से लूट ले जाते हैं क्योंकि हम सच्चाई बताते ही नहीं तो लोग झूठे भ्रम जाल में फंसते चले जाते हैं.
भगवान=भूमि का 'भ'+गगन का 'ग'+वायु का 'व्'+अनल(अग्नि)का अ ='I'+नीर(जल)का' न ' मिलकर ही भगवान शब्द बना है यह कैसे अवैज्ञानिक धारणा हुयी,किन्तु हम परिभाषित नहीं करते तो ठग तो भगवान के नाम पर ही जनता को लूटते जाते हैं.
मंदिरों से प्राप्त खजाने इस बात का गवाह हैं कि ये मंदिर बैंकों की भूमिका में थे जहाँ समाज का धन सुरक्षित रखा गया था लेकिन आज इसे 'ट्रस्ट'के हवाले करके समृद्ध लोगों की मौज मस्ती का उपाय मुकम्मिल करने की बातें हो रही हैं.१९६२ में गोला बाजार,बरेली में हम लाला धरम प्रकाश जी के मकान में किराए पर रहते थे.जो दीवार कच्ची अर्थात मिट्टी की बनी थी उसे ढहा कर उन्होंने पक्की ईंटों की दीवार बनवाई .कच्ची दीवार से गडा खजाना निकला तुरंत पुलिस पहुँच गयी क्योंकि कानूनन पुराना खजाना सर्कार या समाज की संपत्ति है.पुलिस को भेंट चढा कर उन्होंने रिपोर्ट लगवा दी खजाने की खबर झूठी थी.लेकिन मंदिरों से प्राप्त खजाने की खबर तो झूठी नहीं है फिर इसे किसी ट्रस्ट को क्यों सौंपने की बातें उठ रही हैं ,यह क्यों नहीं सीधे सरकारी खजाने में जमा किया जा रहा है?यदि यह धन सरकारी खजाने में पहुंचे तो गरीब तबके के विकास और रोजगार की अनेकों योजनाएं परिपूर्ण हो सकती हैं.जो करोड़ों लोग भूख से बेहाल हैं उन्हें दो वक्त का भोजन नसीब हो सकता है.
कहीं भी किसी भी उपासना स्थल से प्राप्त होने वाला खजाना राष्ट्रीय धरोहर घोषित होना चाहिए न कि किसी विशेष हित -साधना का माध्यम बनना चाहिए.चाहे संत कबीर हों ,चाहे स्वामी दयानंद अथवा स्वामी विवेकानंद और चाहे संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन डाक्टर अम्बेडकर सभी ने आम जन के हित पर बल दिया है न कि वर्ग विशेष के हित पर.अतः यदि समय रहते आम जन का समाज ने ख्याल नहीं किया तो आम जन बल प्रयोग द्वारा समाज से अपना हक हासिल कर ही लेगा.
विकास का लाभ आम जन को मिले इस उद्देश्य से प्रेरित नौजवानों नें नक्सलवाद का मार्ग अपना लिया और छत्तीस गढ की भाजपा सरकार ने इन्हें कुचलने हेतु 'सलवा-जुडूम' तथा एस पी ओ का गठन स्थानीय युवकों को लेकर कर लिया था जिसे भंग करने का आदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि,"इस सशस्त्र विद्रोह के लिए सामजिक,आर्थिक विषमता,भ्रष्ट शासन तंत्र और 'विकास के आतंकवाद' हैं".
जस्टिस बी.सुदर्शन रेड्डी का मत है-"मिडिल क्लास की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए हो रहे औद्योगिकीकरण व् अंधाधुंध माइनिंग के कारण किसान जमीन-जंगल से लगातार बेदखल हो रहे हैं.नक्सल आंदोलन के पैदल सिपाही यही किसान और आदिवासी हैं"
(Hindustan-08/07/2011-Lucknow-Page-16)
कोरिया की पास्को कं.को उड़ीसा में ५० वर्ष तक लौह अयस्क ले जाने हेतु किसानों की उपजाऊ जमीन दे दी गयी है लेकिन किसान कब्ज़ा नहीं छोड़ रहे हैं और ऐसा करना उनका जायज हक है.२४ जून को सारे देश में किसानों के प्रति एकजुटता प्रदर्शित करने हेतु 'पास्को विरोधी दिवस' मनाया गया था (इस ब्लाग में इस आशय का एक लेख भी दिया था),किन्तु अधिकाँश लोग अपने-अपने में मस्त थे,उन्हें उड़ीसा के गरीब किसानों से कोई मतलब नहीं था .नंदीग्राम और सिंगूर में हल्ला बोलने वाली मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी भी चुप्पी साधे रहीं.
'नया जमाना',सहारनपुर के संस्थापक संपादक स्व.कन्हैया लाल मिश्र'प्रभाकर' ने आर.एस.एस.नेता लिमये जी से एक बार कहा था कि शीघ्र ही दिल्ली की सत्ता के लिए सड़कों पर संघियों-कम्यूनिस्टों के मध्य संघर्ष होगा.दिल्ली नहीं तो छत्तीस गढ़ में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पूर्व यह हो ही रहा था.१९२५ में आजादी के आंदोलन को गति प्रदान करने हेतु जब 'भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी' का गठन किया गया तो ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने अपने पृष्ठपोषक बुद्धिजीवियों को बटोर कर आर.एस.एस.का गठन करवा दिया जिसने साम्राज्यवाद की सहोदरी 'साम्प्रदायिकता' को पाला-पोसा और अंततः देश का विभाजन करा दिया.१९४७ में हुआ विभाजन १९७१ में एक और विभाजन लेकर आया जिसने दो राष्ट्रों की थ्योरी को ध्वस्त कर दिया.भारत के ये तीनों हिस्से भीषण असमानता के शिकार हैं.तीनों जगह सत्ताधीशों ने अवैध्य कमाई के जरिये जनता का खून चूसा है.तीनों जगह आम जनता का जीवन यापन करना बेहद मुश्किल हो रहा है.सरकारें साम्राज्यवाद के आधुनिक मसीहा अमेरिका के इशारे पर काम कर रही हैं न कि अपने-अपने देश की जनता के हित में.
तीनों देशों में फिरकापरस्त लोग अफरा-तफरी फैला कर जीवन की मूलभूत समस्याओं से ध्यान हटा रहे हैं.लोक-लुभावन नारे लगा कर पूंजीपतियों के पिट्ठू ही साधारण जन को ठग कर सत्ता में पहुँच जाते हैं.जाती,धर्म.सम्प्रदाय,गोत्र ,क्षेत्रवाद की आंधी चला कर सर्व-साधारण को गुमराह कर दिया जाता है.जो लोग गरीबों के रहनुमा हैं किसानों और मजदूरों के हक के लड़ाका हैं वे अपने अनुयाइयों के वोट हासिल नहीं कर पते हैं और सत्ता से वंचित रह जाते हैं.नतीजा साफ़ है जो प्रतिनिधि चुने जाते हैं वे अपने आकाओं को खुश करने की नीतियाँ और क़ानून बनाते हैं ,आम जन तो उनकी वरीयता में होता ही नहीं है.
क्या आम जनता इसके लिए उत्तरदायी है?कुछ हद तक तो है ही क्योंकि वही तो जाती,धर्म ,सप्रदाय के बहकावे में गलत लोगों को वोट देकर भेजती है.लेकिन इसके लिए जिम्मेदार मुख्य रूप से समाज में प्रचलित अवैज्ञानिक मान्यताएं और धर्म के नाम पर फैले अंध-विशवास एवं पाखण्ड ही हैं.विज्ञान के अनुयायी और साम्यवाद के पक्षधर सिरे से ही धर्म को नकार कर अधार्मिकों के लिए मैदान खुला छोड़ देते हैं जिससे उनकी लूट बदस्तूर जारी रहती है और कुल नुक्सान साम्यवादी-विचार धारा तथा वैज्ञानिक सोच को ही होता है.
धर्म=जो धारण करता है वही धर्म है -यह धारणा कैसे अवैज्ञानिक और मजदूर-किसान विरोधी हो गयी.लेकिन किसान-मजदूर विरोधी लोग जम कर धर्म की गलत व्याख्या प्रस्तुत करके किसान और मजदूर को उलटे उस्तरे से लूट ले जाते हैं क्योंकि हम सच्चाई बताते ही नहीं तो लोग झूठे भ्रम जाल में फंसते चले जाते हैं.
भगवान=भूमि का 'भ'+गगन का 'ग'+वायु का 'व्'+अनल(अग्नि)का अ ='I'+नीर(जल)का' न ' मिलकर ही भगवान शब्द बना है यह कैसे अवैज्ञानिक धारणा हुयी,किन्तु हम परिभाषित नहीं करते तो ठग तो भगवान के नाम पर ही जनता को लूटते जाते हैं.
मंदिरों से प्राप्त खजाने इस बात का गवाह हैं कि ये मंदिर बैंकों की भूमिका में थे जहाँ समाज का धन सुरक्षित रखा गया था लेकिन आज इसे 'ट्रस्ट'के हवाले करके समृद्ध लोगों की मौज मस्ती का उपाय मुकम्मिल करने की बातें हो रही हैं.१९६२ में गोला बाजार,बरेली में हम लाला धरम प्रकाश जी के मकान में किराए पर रहते थे.जो दीवार कच्ची अर्थात मिट्टी की बनी थी उसे ढहा कर उन्होंने पक्की ईंटों की दीवार बनवाई .कच्ची दीवार से गडा खजाना निकला तुरंत पुलिस पहुँच गयी क्योंकि कानूनन पुराना खजाना सर्कार या समाज की संपत्ति है.पुलिस को भेंट चढा कर उन्होंने रिपोर्ट लगवा दी खजाने की खबर झूठी थी.लेकिन मंदिरों से प्राप्त खजाने की खबर तो झूठी नहीं है फिर इसे किसी ट्रस्ट को क्यों सौंपने की बातें उठ रही हैं ,यह क्यों नहीं सीधे सरकारी खजाने में जमा किया जा रहा है?यदि यह धन सरकारी खजाने में पहुंचे तो गरीब तबके के विकास और रोजगार की अनेकों योजनाएं परिपूर्ण हो सकती हैं.जो करोड़ों लोग भूख से बेहाल हैं उन्हें दो वक्त का भोजन नसीब हो सकता है.
कहीं भी किसी भी उपासना स्थल से प्राप्त होने वाला खजाना राष्ट्रीय धरोहर घोषित होना चाहिए न कि किसी विशेष हित -साधना का माध्यम बनना चाहिए.चाहे संत कबीर हों ,चाहे स्वामी दयानंद अथवा स्वामी विवेकानंद और चाहे संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन डाक्टर अम्बेडकर सभी ने आम जन के हित पर बल दिया है न कि वर्ग विशेष के हित पर.अतः यदि समय रहते आम जन का समाज ने ख्याल नहीं किया तो आम जन बल प्रयोग द्वारा समाज से अपना हक हासिल कर ही लेगा.
Tuesday, July 5, 2011
सदाचार ही भ्रष्टाचार दूर कर सकता है --- विजय राजबली माथुर
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| (हिन्दुस्तान-लखनऊ-05/07/2011) |
कल पूर्व प्रधानमंत्री स्व.गुलजारी लाल नंदा की ११३ वी जयंती 'नंदा स्मृति संस्थान'के तत्वाधान में गांधी भवन ,लखनऊ में मनाई गई,जिसमें विचारकों ने 'सदाचार'द्वारा भ्रष्टाचार दूर करने के नंदा जी के प्रयास को पुनर्जीवित किये जाने पर बल दिया.
गुलजारी लाल नंदा जी एक दबंग -ईमानदार व्यक्तित्व के धनी थे.सादगी पसंद नंदा जी को सितम्बर १९६३ में नेहरू जी ने गृह मंत्री बनाया था.उनके निजी सचिव रहे श्री राम प्यारे त्रिवेदी ने बताया कि,तब उन्होंने लोक-सभा में कहा था,-"दुसरे विश्व युद्ध के बाद भारत में जो भ्रष्टाचार बढ़ा है,वह अभी शुरुआती दौर में है किन्तु यदि इसे रोका न गया तो यह रेगिस्तान बन कर विकास की दरिया को आगे बढ़ने नहीं देगा.इसलिए मैं दो वर्षों में भ्रष्टाचार मिटा देने का संकल्प लेता हूँ".
नंदा जी ने काफी सख्ती की और अपने निवास पर रोजाना जनता से उसकी समस्याएं सुन कर उनका समाधान कराना शुरू किया.भ्रष्ट लोगों को काफी पीड़ा हुई.एक रोज निर्धारित समय समाप्त होने से थोडा पहले एक व्यक्ति आया और लाईन में लगे दुसरे व्यक्ति को रु.५००/-देकर अगले दिन आने के लिए घर भेज दिया और खुद उसकी जगह लग गया.न.आने पर नंदा जी ने उसकी समस्या पूँछी तो वह बोला कि,मैं आपको यह बताने आया हूँ कि आप कभी भ्रष्टाचार दूर नहीं कर सकेंगें क्योंकि मैं भ्रष्टाचार के जरिये ही आप तक पहुंचा हूँ.उसने स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति भ्रष्टाचार की शिकायत के लिए लाईन में खड़ा था उसे उसने रु.५००/-देकर भगा दिया और उन्हें सिर्फ यही बताने आया है.नंदा जी अपने निवास पर खेले गए भ्रष्टाचार के खेल से विस्मय में पड़ गए.वह उस व्यक्ति को कुछ जवाब देने में असमर्थ थे परन्तु उनको बोद्ध हो गया.
(शाहजहांपुर में 'नेशनल हेराल्ड'में यह समाचार तब पढ़ा था और याद है)
११ नवम्बर १९६६ को गृह मंत्री पद से त्याग-पत्र देने के बाद त्रिवेदी जी के अनुसार नंदा जी ने कहा-"मैं समझता था कि केंद्र सरकार में भ्रष्टाचार समाप्त कर देने की शक्ति है ,किन्तु वह शक्ति केवल समाज में है .इस दिशा में यदि मुझे एक अकेला सुझाव देने को कहा जाए तो मैं जनता से कहूंगा कि वह लोकपाल की नियुक्ति पर दबाव डाले ,जिसका कार्यक्षेत्र स्वतंत्र होगा".
अब से ४५ वर्ष पूर्व कार्यवाहक प्रधानमंत्री एवं गृह मंत्री रहे नंदा जी ने 'लोकपाल'नियुक्त किये जाने की बात कही थी और पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौडा जी के कार्यकाल में पहली बार लोकपाल बिल लोक सभा में पेश किया गया था जिसके पीछे भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के गृह मंत्री का.इन्द्रजीत गुप्त और कृषि मंत्री का.चतुरानन मिश्र जी का दबाव था.लेकिन अन्ना और रामदेव की सपोर्टर भाजपा ने तब कांग्रेस से मिल कर उस सर्कार को गिरवा दिया था और आज तक उस बिल को पास होने नहीं दिया है.
हरियाणा की एक याचिका के आधार पर अन्ना के विरुद्ध दो लाख रु.गबन करने का मुकदमा अदालत में विचाराधीन है और वह भ्रष्टाचार दूर करने के मसीहा माने जा रहे हैं.रामदेव करोड़ों के घपले में फंसे हैं और नादान लोग उन्हें भ्रष्टाचार विरोधी संत कह रहे हैं.कितना क्रूर मजाक चल रहा है इस देश में ,चोर को कोतवाल बनाने की मुहिम चल रही है.विस्तृत जानकारी के लिए प्रेम सिंह जी के लेख का अवलोकन करें.
१९६९-७१ में जब बी.ए.में मेरठ कालेज में पढ़ रहा था तो हमारे पोलिटिकल साईंस के प्रो.के.सी.गुप्त जी बताया करते थे कि,भ्रष्टाचार पानी की भांति ऊपर से नीचे की और चलता है और 'सदाचार' धुएं की तरह नीचे से ऊपर की और उठता है.नंदा जी ने इसी लिए 'सदाचार समितियों' का गठन कराया था.उनका जोर समाज में सदाचार फ़ैलाने पर था ,यदि सम्पूर्ण समाज सदाचारी हो जाए तो भ्रष्टाचार टिक ही नहीं सकता.अतः समाज को सदाचारी बनाए बगैर भ्रष्टाचार दूर कर देनें की बातें कोरा ढकोसला ही हैं.समाज को भ्रष्ट बनाने में तथा-कथित धार्मिक कुरीतियों का ही प्रबल योगदान है.इन पर कौन कुठाराघात कर रहा है? अन्ना या रामदेव? इन दोनों को आर.एस.एस.समर्थन दे रहा है जो एक अर्ध-सैनिक संगठन है और वर्ग-विशेष की तानाशाही स्थापित करना जिसका मूल लक्ष्य है.लोकतंत्र समर्थकों को इस साजिश को समझना चाहिए.
नंदा जी दो बार प्रधानमंत्री रहे ,गृह मंत्री रहे और एक बार इंदिराजी के संकट के समय उनके रेल मंत्री भी रहे.उन पर भ्रष्टाचार की एक उंगली भी नहीं उठायी जा सकती.बेहद सादगी से सरल जीवन व्यतीत करते थे ,वह जिस अपार्टमेन्ट में दिल्ली में रहते थे अधिकाँश को पता भी नहीं था कि एक महान व्यक्तित्व भी उन्हीं के अपार्टमेन्ट में रह कर समाज सेवा कर रहा है.एक बार आग के धुएं में घिर कर नंदा जी बेहोश हो कर गिर पड़े थे -साधारण इंसान समझ कर किसी ने भी उन्हें मदद करना मुनासिब नहीं समझा,इत्तिफाक से एक जानकार की निगाह उन पर चली गयी तब उसने उन्हें रहत प्रदान कराई और गुजरात में प्राईवेट सेवारत उनके पुत्र को सूचित किया जो आकर उन्हें अपने साथ लिवा ले गए.समाज अपने एक ईमानदार राज नेता के लिए कुछ नहीं कर सका.
आज समाज से यदि सच में भ्रष्टाचार को दूर करना है तो नंदा जी के बताये मार्ग पर चल कर 'सदाचार समितियां ' बनाई जाएँ और समाज को सुधारा जाए,कुरीतियों को मिटाया जाए,ढोंग-पाखण्ड को नष्ट किया जाए .इतना करने पर भ्रष्टाचार तो खुद-ब- खुद ख़त्म हो जाएगा.
Saturday, July 2, 2011
कुछ इधर की कुछ उधर की
आज ०२ जूलाई को हमारे नगर में होम्योपैथी के जनक डा.हैनीमेन का निर्वाण दिवस मनाया जा रहा है और ०४ जूलाई को स्वामी विवेकानंद का भी निर्वाण दिवस है,इधर ग्रहों की आकाशीय स्थिति में भी जो परिवर्तन हो रहा है उसका भी व्यापक प्रभाव होगा अतः आज कुछ इधर की कुछ उधर की ---
महात्मा हैनीमेन जर्मनी में उत्पन्न हुए थे और वहीं पर एलोपैथी प्रेक्टिस करते थे.काफी धन कमा चुकने के बाद उन्हें बोद्ध हुआ कि,वह तो माला-माल हो गए किन्तु सभी मरीजों को सम्पूर्ण लाभ इस चिकित्सा पद्धति से न हो सका.उन्होंने प्रेक्टिस बंद कर दी और अनुसंधान में लग गए.एक दिन अचानक 'सिनकोना'की पत्तियां चबा लेने पर उन्हें कंपकपी लगने लगी.रासायनिक विश्लेषण करने के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सादृश्य से सादृश्य का इलाज करने पर लाभ होता है क्योंकि 'सिनकोना'से बनी दवा 'कुनैन' मलेरिया के उपचार में काम आती थी और उसकी ताजी पत्तियां चबाने पर उसी के लक्षण उभरने लगे थे.
डा.हैनीमेन अब महात्मा हैनीमेन हो गए ,उन्होंने जन-कल्याण हेतु अनेक अनुसन्धान करके एक नयी चिकित्सा पद्धति का आविष्कार किया जो आज उन्हीं के नाम पर 'होम्योपैथी'कहलाती है.इस चिकित्सा पद्धति में लक्षणों के आधार पर दवा दी जाती है और व्यक्ति -विशेष पर आधारित होती है.अर्थात-स्त्री-पुरुष,मोटा-पतला,गोरा-काला,बच्चा-बड़ा के आधार पर एक ही बीमारी के लिए अलग-अलग दवा दी जाती है.ये दवाएं ज्यादातर 'शुगर आफ मिल्क'से बनी मीठी-मीठी गोलियों में दी जाती हैं,वैसे 'मदर टिन्चर' और 'रेकटी फाईड-स्प्रिट'द्वारा भी दवाओं का प्रयोग किया जाता है.
देश के ८ से १० प्रतिशत तथा यूं.पी. के १५ प्रतिशत बच्चों में पढाई सम्बंधित परेशानी आम हैं.चिकित्सा विज्ञान में इस रोग को 'लर्निंग डिसेबिलिटी'कहा जाता है.यों तो होम्योपैथी में अनेकों दवाएं इस रोग की हैं.परन्तु यदि याद-दाश्त कम हो तो परिक्षा से १० दिन पूर्व से 'एनाकार्डियम' ३० शक्ति में ४ टी.डी एस सेवन कराने से बच्चा परीक्षा में सुगमता से सफल हो जाता है उसे याद की बातें ध्यान में बनी रहती हैं.
इसी प्रकार आज 'सीजेरियन' एक विकट समस्या है ,एलोपैथी में इसका प्रचलन अत्यधिक है,जो लोग आर्थिक रूप से समृद्ध और उतावले नहीं हैं वे होम्योपैथी द्वारा सुरक्षित लाभ उठा सकते हैं.'कोलोफाइलम'की ३० शक्ति ४ टी डी एस मात्रा आनुमानित प्रसव तिथि से एक माह पूर्व देना प्रारम्भ किया जाए तो बिना आपरेशन के नार्मल डिलीवरी हो जायेगी.आर्य वैदिक पद्धति में तो इस हेतु छः विशेष मन्त्र भी हैं जिनके द्वारा हवन करके बिना किसी दवा प्रयोग के आपरेशन बगैर नार्मल डिलीवरी हो सकती है.(कृपया कर्मकांडियों के झूठ से सावधान रहें क्योंकि उनके पास ये मन्त्र नहीं होंगें,किसी भी पुजारी के पास भी ये मन्त्र नहीं होंगें ).
मांस-पेशियों में या किसी चोट के कारण बदन में दर्द हो तो बायोकेमिक 'मेग्नीशिया फास'६ शक्ति में ४ टी डी एस सेवन करें या शीघ्रता हेतु १०-१० -१० मिनट के अंतराल पर ३ मात्रा गोलियां चूसें या गर्म पानी में घोल कर लें तो तत्काल राहत मिल सकती है.
महात्मा हैनीमेन ने मानवता -हित में सस्ती,अचूक और निरापद चिकित्सा पद्धति उपलब्ध कराई है उनके आज निर्वाण दिवस पर हम उनका साभार स्मरण करते हैं.
विवेकानंद जी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है.उनके हाथ में हंस योग था और वे ३५ वर्ष की आयु पूर्ण करके इस संसार को छोड़ गए,किन्तु अत्यल्प समय में भी उन्होंने देश,समाज और सम्पूर्ण मानवता के लिए जो सन्देश दिया वह सदैव लागू किया जा सकता है.स्वामी जी पर साम्यवाद का पूरा प्रभाव था और इसी लिए उनका कहना था कि,जब तक सारे संसार में प्रत्येक गरीब की झोंपरी में दीपक नहीं जलता और प्रत्येक परिवार को रोटी नसीब नहीं होती संसार में खुश हाली नहीं आ सकती.
अफ़सोस की बात है कि साम्यवादियों के स्थान पर संघियों ने स्वामी विवेकानंद के विचारों को तोड़-मरोड़ कर साम्प्रदायिक रंग में रंग डाला है.'विवेकानंद विचार मंच'के माध्यम से संघ विवेका नन्द जी का साम्प्रदायिक प्रयोग कर रहा है जब कि स्वामी जी के विचार साम्यवाद का प्रचार-प्रसार करने में सहायक हैं.
श्री शेष नारायण सिंह जी ने अपने ब्लाग में पहले ही स्पष्ट किया था कि,अन्ना का भाजपा साम्प्रदायिक प्रयोग कर रही है,उसकी पुष्टि -हिंदुस्तान,लखनऊ के प्रथम पृष्ठ में छपे इस समाचार से होती है.
०४ जूलाई को स्वामी विवेकानंद जी की पुण्य-तिथि है ,इस अवसर पर हमें जनता को जाग्रत करना चाहिए कि स्वामी जी वस्तुतः क्या कहते थे,वह क्या चाहते थे.यह साम्यवादियों का कर्तव्य है कि स्वामी विवेकानंद के विचारों का साम्प्रदायिक दरुपयोग न होने दें.
वर्षा ऋतु में आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक नव-रात्र होते हैं जिन्हें अब गुप्त रखा गया है (कर्मकांडियों द्वारा)जबकि सभी को अपने स्वास्थ्य रक्षा हेतु इस अवधि में हवन करना चाहिए जिससे पर्यावरण भी शुद्ध रहता है कीटाणुओं से छुटकारा भी मिलता है.
इस अवसर पर इधर हो रहे ग्रहों के परिवर्तन का असर क्या-क्या हो सकता है,निर्णय सागर पंचांग के अनुसार कुछ का उल्लेख प्रस्तुत है-
राहू-मंगल एक-दुसरे से सप्तम अर्थात १८० डिग्री पर हैं जिनके प्रभाव से जन,धन की क्षति और प्रथ्वी पर उथल-पुथल होने की संभावना है.
सूर्य-शुक्र के एक ही राशि (मिथुन)में होने से वर्षा अच्छी हो ही रही है.कृषी को लाभ रहेगा.
गुरु मेष राशी और शनि के कन्या राशी में होने से षडाष्टक योग बन रहा है जिसके परिणामस्वरूप शासन तंत्र को विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा ,श्रमिकों के कोप का सामना करना पड़ेगा.(पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ा कर सर्कार ने आग में घी झोंक ही दिया है).यान-खान दुर्घटनाओं के भी योग इससे उत्पन्न हो रहे हैं और स्वास्थ्य एवं राहत कार्यों हेतु विशेष व्यय करना पड़ेगा.
२३ जूलाई से २६ सितम्बर २०११ तक शुक्र तारा अस्त रहेगा.इसके प्रभाव से व्यापारियों के प्रति शासन का कडा रुख रहेगा.मिथुन राशि वालों पर तथा मालवा,गुर्जर सौराष्ट्र भाग में आपदाएं असर डालेंगीं. पश्चिमी तट पर सागर में चक्रावात आदि आने से क्षति होगी.सेना और सेक्रेटरीज के लिए भारी रहेगा.
१३ अगस्त २०११ को रक्षाबंधन (श्रावणी पूर्णिमा)भी शनिवार को पड़ रही है जबकि ३० जून की अमावस्या भी शनिवार को थी.परिणामतः रोग-शोक की वृद्धि,निर्धन लोगों पर कष्ट,पशुओं तथा मनुष्यों के स्वास्थ्य में न्यूनता,रहने की संभावना है.लिहाजा सर्कार द्वारा विशेष व्यय भी संभावित है.अन्ना को खुला साम्प्रदायिक समर्थन मिलने से जनता के बीच सौहाद्र नष्ट होने की भी सम्भावना प्रबल है.१९७४ में लोकनायक जयप्रकाश के सप्तक्रांति आन्दोलन में घुस कर भ्रष्टाचार को आवरण बना कर जनसंघ ने अपनी ताकत बढ़ा ली थे,फिर १९८८-८९ में वी.पी.सिंह के बोफोर्स भ्रष्टाचार आन्दोलन में घुस कर उनकी सर्कार को नचाया -गिराया और अंततः १९९८-२००० तक खुद के नेत्रित्व में सरकार चलाई.आज फिर अन्ना -आन्दोलन में घुस कर भाजपा-संघ अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं न कि भ्रष्टाचार का खात्मा करना.बगैर धार्मिक भ्रष्टाचार दूर किये आर्थिक भ्रष्टाचार दूर करने की बातें केवल आकाश-कुसुम तोडना ही है.
इसी प्रकार आज 'सीजेरियन' एक विकट समस्या है ,एलोपैथी में इसका प्रचलन अत्यधिक है,जो लोग आर्थिक रूप से समृद्ध और उतावले नहीं हैं वे होम्योपैथी द्वारा सुरक्षित लाभ उठा सकते हैं.'कोलोफाइलम'की ३० शक्ति ४ टी डी एस मात्रा आनुमानित प्रसव तिथि से एक माह पूर्व देना प्रारम्भ किया जाए तो बिना आपरेशन के नार्मल डिलीवरी हो जायेगी.आर्य वैदिक पद्धति में तो इस हेतु छः विशेष मन्त्र भी हैं जिनके द्वारा हवन करके बिना किसी दवा प्रयोग के आपरेशन बगैर नार्मल डिलीवरी हो सकती है.(कृपया कर्मकांडियों के झूठ से सावधान रहें क्योंकि उनके पास ये मन्त्र नहीं होंगें,किसी भी पुजारी के पास भी ये मन्त्र नहीं होंगें ).
मांस-पेशियों में या किसी चोट के कारण बदन में दर्द हो तो बायोकेमिक 'मेग्नीशिया फास'६ शक्ति में ४ टी डी एस सेवन करें या शीघ्रता हेतु १०-१० -१० मिनट के अंतराल पर ३ मात्रा गोलियां चूसें या गर्म पानी में घोल कर लें तो तत्काल राहत मिल सकती है.
महात्मा हैनीमेन ने मानवता -हित में सस्ती,अचूक और निरापद चिकित्सा पद्धति उपलब्ध कराई है उनके आज निर्वाण दिवस पर हम उनका साभार स्मरण करते हैं.
स्वामी विवेकानंद
विवेकानंद जी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है.उनके हाथ में हंस योग था और वे ३५ वर्ष की आयु पूर्ण करके इस संसार को छोड़ गए,किन्तु अत्यल्प समय में भी उन्होंने देश,समाज और सम्पूर्ण मानवता के लिए जो सन्देश दिया वह सदैव लागू किया जा सकता है.स्वामी जी पर साम्यवाद का पूरा प्रभाव था और इसी लिए उनका कहना था कि,जब तक सारे संसार में प्रत्येक गरीब की झोंपरी में दीपक नहीं जलता और प्रत्येक परिवार को रोटी नसीब नहीं होती संसार में खुश हाली नहीं आ सकती.
अफ़सोस की बात है कि साम्यवादियों के स्थान पर संघियों ने स्वामी विवेकानंद के विचारों को तोड़-मरोड़ कर साम्प्रदायिक रंग में रंग डाला है.'विवेकानंद विचार मंच'के माध्यम से संघ विवेका नन्द जी का साम्प्रदायिक प्रयोग कर रहा है जब कि स्वामी जी के विचार साम्यवाद का प्रचार-प्रसार करने में सहायक हैं.
श्री शेष नारायण सिंह जी ने अपने ब्लाग में पहले ही स्पष्ट किया था कि,अन्ना का भाजपा साम्प्रदायिक प्रयोग कर रही है,उसकी पुष्टि -हिंदुस्तान,लखनऊ के प्रथम पृष्ठ में छपे इस समाचार से होती है.
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| Hindustan-Lucknow-02/07/2011 |
०४ जूलाई को स्वामी विवेकानंद जी की पुण्य-तिथि है ,इस अवसर पर हमें जनता को जाग्रत करना चाहिए कि स्वामी जी वस्तुतः क्या कहते थे,वह क्या चाहते थे.यह साम्यवादियों का कर्तव्य है कि स्वामी विवेकानंद के विचारों का साम्प्रदायिक दरुपयोग न होने दें.
गुप्त नवरात्र (०२ जूलाई-०९ जूलाई २०११)
वर्षा ऋतु में आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक नव-रात्र होते हैं जिन्हें अब गुप्त रखा गया है (कर्मकांडियों द्वारा)जबकि सभी को अपने स्वास्थ्य रक्षा हेतु इस अवधि में हवन करना चाहिए जिससे पर्यावरण भी शुद्ध रहता है कीटाणुओं से छुटकारा भी मिलता है.
इस अवसर पर इधर हो रहे ग्रहों के परिवर्तन का असर क्या-क्या हो सकता है,निर्णय सागर पंचांग के अनुसार कुछ का उल्लेख प्रस्तुत है-
राहू-मंगल एक-दुसरे से सप्तम अर्थात १८० डिग्री पर हैं जिनके प्रभाव से जन,धन की क्षति और प्रथ्वी पर उथल-पुथल होने की संभावना है.
सूर्य-शुक्र के एक ही राशि (मिथुन)में होने से वर्षा अच्छी हो ही रही है.कृषी को लाभ रहेगा.
गुरु मेष राशी और शनि के कन्या राशी में होने से षडाष्टक योग बन रहा है जिसके परिणामस्वरूप शासन तंत्र को विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा ,श्रमिकों के कोप का सामना करना पड़ेगा.(पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ा कर सर्कार ने आग में घी झोंक ही दिया है).यान-खान दुर्घटनाओं के भी योग इससे उत्पन्न हो रहे हैं और स्वास्थ्य एवं राहत कार्यों हेतु विशेष व्यय करना पड़ेगा.
२३ जूलाई से २६ सितम्बर २०११ तक शुक्र तारा अस्त रहेगा.इसके प्रभाव से व्यापारियों के प्रति शासन का कडा रुख रहेगा.मिथुन राशि वालों पर तथा मालवा,गुर्जर सौराष्ट्र भाग में आपदाएं असर डालेंगीं. पश्चिमी तट पर सागर में चक्रावात आदि आने से क्षति होगी.सेना और सेक्रेटरीज के लिए भारी रहेगा.
१३ अगस्त २०११ को रक्षाबंधन (श्रावणी पूर्णिमा)भी शनिवार को पड़ रही है जबकि ३० जून की अमावस्या भी शनिवार को थी.परिणामतः रोग-शोक की वृद्धि,निर्धन लोगों पर कष्ट,पशुओं तथा मनुष्यों के स्वास्थ्य में न्यूनता,रहने की संभावना है.लिहाजा सर्कार द्वारा विशेष व्यय भी संभावित है.अन्ना को खुला साम्प्रदायिक समर्थन मिलने से जनता के बीच सौहाद्र नष्ट होने की भी सम्भावना प्रबल है.१९७४ में लोकनायक जयप्रकाश के सप्तक्रांति आन्दोलन में घुस कर भ्रष्टाचार को आवरण बना कर जनसंघ ने अपनी ताकत बढ़ा ली थे,फिर १९८८-८९ में वी.पी.सिंह के बोफोर्स भ्रष्टाचार आन्दोलन में घुस कर उनकी सर्कार को नचाया -गिराया और अंततः १९९८-२००० तक खुद के नेत्रित्व में सरकार चलाई.आज फिर अन्ना -आन्दोलन में घुस कर भाजपा-संघ अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं न कि भ्रष्टाचार का खात्मा करना.बगैर धार्मिक भ्रष्टाचार दूर किये आर्थिक भ्रष्टाचार दूर करने की बातें केवल आकाश-कुसुम तोडना ही है.
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