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Friday, January 25, 2019

हर औरत को अप्सरा दिखना ही क्यों जरूरी है ? ------ नमिता जोशी




औरत यानी उसे सुंदर ही होना चाहिए और सुंदर औरत यानी 34/26/34 फिगर, रंग गोरा, लंबे बाल, गुलाबी या कजरारी आंखें, मोरनी जैसी चाल और खूबसूरत आवाज। 

अब सवाल और वह भी सिर्फ महिलाओं से। ये ऊपर जो हमने खूबसूरती का पैमाना दिया है, इस पर सभी महिलाएं तो खरी नहीं उतरती होंगी/ नहीं न/ किसी न किसी पॉइंट पर ऊपर नीचे होंगी। रंग कुछ सांवला हो सकता है, बाल छोटे हो सकते हैं, वजन बढ़ा हुआ हो सकता है। तो क्या ऐसी महिलाएं सुंदर नहीं मानती खुद को/ मानती हैं न/ तो फिर ये पैमाना किसने बनाया उनके लिए/ पुरुषों ने। 

अब दूसरा सवाल। ऑफिस में आपके काम को क्या आपकी खूबसूरती से तोला जाता है/ आपकी कामयाबी क्या इस बात पर निर्भर करती है कि आप ऊपर दिए गए पैमाने पर कितनी फिट बैठती हैं/ क्या इतनी खूबसूरत दिखने पर आपको पुरुषों के मुकाबले बेहतर पोजिशन या सैलरी देती है कंपनी/ नहीं न/ आपके टैलंट, आपकी मेहनत पर जब आपका प्रोफेशन निर्भर करता है तो उसमें आपके लुक्स मायने नहीं रखते। कितनी मोटी लड़कियां कंपनी में ऊंचे पदों पर हैं, कितनी सावंली लड़कियों के पास पूरी की पूरी टीम है बॉस के तौर पर। फिर एक महिला होकर बीजेपी की साधना सिंह ने यह कहने की हिमाकत कैसे की होगी कि मायावती न तो पुरुष जैसी दिखती हैं न महिला जैसी/ क्या मायावती बॉलिवुड में काम करती हैं, जो उनके लुक्स की वजह से उनके काम को तोला जाएगा। बल्कि अब तो बॉलिवुड भी इतना मैच्योर हो चुका है कि लुक्स की बजाय टैलंट को महत्व मिलने लगा है। तो ऐसे में अपनी मेहनत के बल पर राजनीति के क्षेत्र में अपना दबदबा बनाने वाली मायावती को उनकी नीतियों की बजाय उनके लुक्स के लिए टोकना, उन पर हंसना कितना सही है ? 

दरअसल, हम सब जानते हैं कि चुनावी माहौल गर्म है और हर ओर से नेता अपने वोट बैंक को रिझाने और सामने वाले नेता को नीचा दिखाने के लिए लांछन लगाने में जुट गए हैं। लेकिन पिछले दिनों बीजेपी की एक महिला नेता साधना सिंह ने जिस तरह की बात बीएसपी सुप्रीमो मायावती के खिलाफ की, वह एक अलग ही लेवल है। उनके बयान पर काफी विवाद भी हुआ और माफी भी मांगी गई। लेकिन यह बयान जिस सोच को दर्शाता है वह राजनीतिक आरोप की लिस्ट में तो नहीं आता। आमतौर पर राजनीतिक लोगों पर उनकी नीतियों से सहमत न होने की बात की जाती है या फिर उनके काम करने तरीके पर उंगली उठाई जा सकती है, लेकिन अफसोस की बात है कि मायावती एक एेसी महिला नेता हैं, जो जातिगत, राजनैतिक और अपने लुक्स यानी तीन बातों को लेकर हमेशा से अपने विरोधियों के निशाने पर रही हैं। हैरानी की बात यह है कि इस तरह के बयान न सिर्फ पुरुष बल्कि उनकी महिला विरोधियों की तरफ से भी हमेशा आते रहे हैं। और तो और इंटरनेट और मोबाइल पर हजारों वॉट्सऐप जोक्स और मीम्स आपको मिल जाएंगे, जिसमें मायावती के लुक्स पर कॉमेंट कर हास्य पैदा करने की कोशिश की जाती है। इस सोच का नजारा हम अक्सर डीयू के चुनाव के दौरान देखते हैं जब पार्टियां एक से एक खूबसूरत दिखने वाली लड़कियों को चुनाव लड़ने के लिए टिकट देती हैं और शहरों की दीवारें उन खूबसूरत लड़कियों के फोटोज से भर जाती हैं। दुख तब होता है जब महिलाएं भी इस तरह की सोच रखती हैं, जो कि जाने अनजाने उनके जेहन में पुरुषों द्वारा थोपी गई है। 

मामला यहीं पर नहीं रुकता। इससे पहले भी मायावती के खिलाफ मुलायम सिंह की तरफ से इस तरह के बयान आ चुके हैं कि उनका तो कोई रेप भी ना करे। यह डबल विडंबना है कि नहीं। एक तो आप उस महिला को सुंदर नहीं मानते ऊपर से आप एक सुंदर महिला को रेप के लायक समझते हैं। बीजेपी की ही महिला नेता शायना एन सी ने पिछले चुनावों के दौरान कह दिया कि उन्हें यह समझ नहीं आता कि मायावती ही हैं या शी। इसके अलावा मायावती को परकटी कहना, तेल लगाने वाली और पसीने की बदबू के लिए भी मजाक का विषय बनाया जाता रहा है। 


ऐसे और इससे भद्दे न जाने कितने मजाक मायावती के खिलाफ किए गए। सवाल यह है कि चुनावी माहौल में राजनीतिक तंज कसना अलग बात है, जातिगत टिप्पणियों के कोढ़ ने भी अपने देश के लोगों की मानसिकता को बीमार किया हुआ है, ये लुक्स को लेकर छोटी सोच का नया चलन महिलाओं के खिलाफ कितना सही है/ आम तौर पर साधारण दिखने वाले नेताओं या पुरुषों को अपने यहां रफ एंड टफ, सिंपल और जमीन से जुड़ा कहा जाता है। औरतों के लिए हर वक्त, हर जगह अप्सरा जैसा दिखना क्यों जरूरी है ? 
http://epaper.navbharattimes.com/details/12114-26128-2.html


Namita.Joshi@timesgroup.com





 ~विजय राजबली माथुर ©

Wednesday, January 16, 2019

बसपा - सपा गठबंधन से डरी भाजपा के काँपते कदम ------ अभिसार शर्मा

  
12-01-2019 


Published on Jan 15, 2019


2019 लोक सभा चुनाव के लिये BSP और समाजवादी पार्टी के बीच ऐतिहासिक गठबंधन हुआ है। बीजेपी इस कदर डरी हुई है के उसके अध्यक्ष को पानीपत की तीसरी लड़ाई और अत्याचारी हमलावर अहमद शाह अब्दाली की याद आ रही है। गोदी मीडिया यानी सरकार का चाटुकार मीडिया गठबंधन को बदनाम करने के रोज कोई ना कोई नये शिगूफे गढ़ रहा है। न्यूज़ चक्र मे अभिसार शर्मा इस साजिश का ज़बरदस्त पर्दाफाश कर रहे हैं ।
****** VDO ******






~विजय राजबली माथुर ©

Wednesday, December 12, 2018

बीजेपी के लिए आगे का रास्ता आसान नहीं ------ अंबरीष कुमार

बिहार में बीजेपी लगातार कमजोर हो रही है, जबकि उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था का मुद्दा उसके लिए सिरदर्द बनता जा रहा है। दूसरे, बीएसपी और एसपी के बीच गठजोड़ होना तय है। ऐसे में बीजेपी को सबसे बड़ी चुनौती यूपी से ही मिलेगी। इस प्रदेश से बीजेपी ने सबसे ज्यादा सीटें जीती हैं। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के चुनावी नतीजों का असर उत्तर प्रदेश की राजनीति पर भी पड़ना तय है। हालांकि दिल्ली में विपक्ष की राजनीति से समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने जिस तरह दूरी बना रखी है, वह समझ से बाहर है। क्षेत्रीय दल अब धीरे-धीरे सीबीआई के खौफ से मुक्त होते जा रहे हैं। ऐसे में बीजेपी के लिए आगे का रास्ता आसान नहीं होगा।

http://epaper.navbharattimes.com/details/2412-76946-1.html

~विजय राजबली माथुर ©

Monday, March 27, 2017

जमाना योगीयुग : योगी का योगफल ------ K Vikram Rao

 "नतीजन योगी की समता पिछले मुख्यमंत्रियों से नही की जा सकती है। कुछ मायनों में तीसरे मुख्यमंत्री चन्दुभानु गुप्त से संभव है। प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष की अनिच्छा के बावजूद भी गुप्ताजी मुख्यमंत्री बन गये थे। हालांकि लखनऊ पूर्व तथा मोदहा (महोबा) से विधानसभा चुनाव लगातार हार गये थे। पार्टी के भीतरी शत्रुओं तथा खुद मुख्यमंत्री संपूर्णानन्द कारक बने थे। फिर भी अपने आत्मबल से गुप्ताजी 1960 में सीधे शीर्षपद पर जा पहुंचे बिना विधानसभा पहुंचे। फिर उन्हें हटाने के लिए कामराज योजना नेहरू लाये। पार्टी काम हेतु गुप्ताजी को सरकार छोड़ना पड़ा।
योगी जी का भी सत्ता तक सफर सरल नही था। भाजपायी महाबलियों को ठेलकर वे रेस जीते। ऐसा उदाहरण कुछ मायनो में मौर्यराज में विप्र सेनापति पुष्यमित्र शुंग का मिलता है जिसने शासकीय अहिंसा के कारण हिन्दुओं पर हो रहे म्लेच्छ हमले का खात्मा किया था।
अब विश्लेषण कर लें कि योगी क्या कर रहें हैं और क्या करेंगे ?" --- के  विक्रम राव 
****** वरिष्ठ  पत्रकार  के विक्रम राव  साहब लिखते हैं कि, यू पी के तत्कालीन सी एम चंद्र भानु गुप्त को हटाने के लिए नेहरू 'कामराज प्लान ' लाये थे। लेकिन हकीकत यह नहीं है। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राधा कृष्णन  के एक अंगरक्षक रहे एक मेजर साहब ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि, राधाकृष्णन जी खुद पी एम बनना चाहते थे अतः तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष के कामराज नाडार  से तमिल भाषा में वार्ता कर उन्होने  ही  1963 में ' कामराज  प्लान ' बनवाया था जो कि, नेहरू जी को पी एम पद से हटाने के लिए था न कि, यू पी के सी एम  चंद्रभानु  गुप्त को क्योंकि उस प्लान के अंतर्गत तमाम सी एम और कुछ मंत्री सरकार से बाहर हुये और संगठन में लगाए गए। जबकि, नेहरू जी को उन मेजर साहब ने आगाह कर दिया था अतः दिखावे में तो उन्होने पद- त्याग की इच्छा की किन्तु समर्थकों के जरिये अपने पद - त्याग प्रस्ताव को रद्द करा दिया। चन्द्र्भाणु गुप्त जी ने फैजाबाद की तत्कालीन सांसद सुचेता कृपलानी जी को सी एम बनवा दिया और पहले के किसी मंत्री व विधायक को मौका नहीं मिलने दिया था। अतः 'कामराज प्लान  सी बी गुप्ता को हटाने के लिए नेहरू जी का नहीं था बल्कि नेहरू जी को हटाने के लिए डॉ राधाकृष्णन जी का था जो विफल हो गया था।
(विजय राजबली माथुर ) 

K Vikram Rao
योगी का योगफल
Yogi Adityanath
विगत सत्तर वर्षों में बीसियों मुख्यमंत्री यूपी में आये-गये। मगर उनके नाम से उनका दौर जुड़ नहीं पाया। महंत आदित्यनाथ योगी का जुदा हैं, वे निराले भी। इसीलिए उनका जमाना योगीयुग कहलाने लगा है। जुमा जुमा पखवाडे भर में ही। कारण तलाशने के लिए गहनशोध की दरकार नहीं है। पहचान अलग हो तो विशिष्ट आ ही जाती है। मात्र परिधान, ललाट, गात्रक इत्यादि से ही नहीं। बात अंदर की है। वैचारिक, अतः मस्तिष्कीय है। नतीजन योगी की समता पिछले मुख्यमंत्रियों से नही की जा सकती है। कुछ मायनों में तीसरे मुख्यमंत्री चन्दुभानु गुप्त से संभव है। प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष की अनिच्छा के बावजूद भी गुप्ताजी मुख्यमंत्री बन गये थे। हालांकि लखनऊ पूर्व तथा मोदहा (महोबा) से विधानसभा चुनाव लगातार हार गये थे। पार्टी के भीतरी शत्रुओं तथा खुद मुख्यमंत्री संपूर्णानन्द कारक बने थे। फिर भी अपने आत्मबल से गुप्ताजी 1960 में सीधे शीर्षपद पर जा पहुंचे बिना विधानसभा पहुंचे। फिर उन्हें हटाने के लिए कामराज योजना नेहरू लाये। पार्टी काम हेतु गुप्ताजी को सरकार छोड़ना पड़ा।******
योगी जी का भी सत्ता तक सफर सरल नही था। भाजपायी महाबलियों को ठेलकर वे रेस जीते। ऐसा उदाहरण कुछ मायनो में मौर्यराज में विप्र सेनापति पुष्यमित्र शुंग का मिलता है जिसने शासकीय अहिंसा के कारण हिन्दुओं पर हो रहे म्लेच्छ हमले का खात्मा किया था।
अब विश्लेषण कर लें कि योगी क्या कर रहें हैं और क्या करेंगे ? पदारूढ़ होते ही योगी ने गाय को अहमियत दी। सही भी हैं। गोरक्षधाम के मुखिया रहें हैं, तो यह स्वाभाविक है। यूं भी जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी गाय के नाम पर सत्ता पाने की राजनीति करती रही। ठोस कुछ किया नहीं। लखनऊ की सड़कों पर 1953 में युवा अटल बिहारी वाजपेयी नारा लगाते रहे ”कटती गौयें करे पुकार, बन्द करो यह अत्याचार।“ अटलजी सत्ता के सोपान का आरोहित होते रहे। उधर गायें भी कटती रहीं। गोरक्षा पर राष्ट्रीय कदम नहीं उठा सके। सत्ता के केन्द्र लोकभवन में प्रवेश करते ही योगी ने गोकशी कानून पर सख्ती की। बूचडखानों पर ताला डलवा दिया। सवा सौ साल पुराने टुण्डे कवाब की दुकान के मालिक मोहम्मद उस्मान ने कहा कि वे गोश्त अन्य जिलों से आयात करेंगे क्योंकि लखनऊ में एक भी वैघ वघशाला नहीं है। सोचें जरा इतने वर्षों से राजधानी में अलग रंग की सरकारें आई और बूचड़खाने बिना लाइसेंस के पनपते रहे। मायावती राज में कानून बना था कि सचिवालय में पान और गुटखा प्रतिबंधित हो। मनभावन कदम था। संगमरमर से निर्मित फर्श और चमकती दीवारें चन्द महीनों बाद इतनी विकृत हो गई कि मानो पीक नहीं पेंट हो और कलाकृतियां चित्रित हो रहीं थें। अब वे चित्रकारी घिसकर, रगड़कर मिटाई जा रही है।
कुछ ज्यादा पढे़ लिखे लोगों को ये कार्य छोटा लगेगा। वही आरोप कि प्रधानमंत्री अब वैश्विक समस्याओं पर ध्यान न देकर स्वच्छ भारत पर केंद्रित है। झाडू थामे है। सत्ता मोह से कभी भी न अघानेवाले सोनिया कांग्रेसियों ने कोयला, रेत का खनन, टूजी ठेका, बैंक से उधारी, हेलिकाप्टर खरीदी आदि को प्राथमिक योजनाएं बनाईं थीं। इधर यूपी में मायावती द्वारा राजकोष की लूट पहला कार्यक्रम रहा। उनके मुख्यमंत्री काल में वर्तनी ही बदल गयी थी दौलत तथा दलित के बीच।
अगर मोदी Narendra Modi शासन की तर्ज पर योगी ने भी स्वच्छ प्रदेश का संकल्प लिया है वो यह सीख महात्मा गांधी से ही मिली है। बापू ने नेहरू, पटेल, मौलाना आजाद आदि से सेवाग्राम आश्रम में पहले संडास साफ करवाया था। घमण्ड तोड़ने का यह रामबाण है। बापू भारत की आत्मा को भलीभांति पहचानते थे। गुजराती का प्रभाव मोदी पर पड़ना तार्किक रहा। ठीक भी। अर्थात योगी के गुटखामुक्त सचिवालय की योजना को इसी नजरिये से देखना चाहिए।
बड़ी बड़ी विकास योजनाओं का दम भरनेवाले जब आमजन की दैनिक आवश्यकताओं और समस्याओं को टाल देते हैं, तो वही हश्र होता है जो काम बोलनेवालों का हुआ। काम उनका “टें” बोल गया।
मसलन योगी ने सरकारी नौकरों को साढ़े नौ बजे कार्यस्थल में आने का आदेश दिया है। अब दूरदराज गांव से देहातीजन लखनऊ सचिवालय आयें और बडे़ साहब मीटिंग में, पूजा में, बाथरूम में आदि जगहों पर व्यस्त रहें तो वही संदेश जायेगा कि 27 साल से बेहाल यूपी। इसीलिए योगी ने सुशासन की शुरूआत पुलिस थानों से की है। प्रधानमंत्री कहते रहे कि थाने सभी सपा कार्यालय हो गये हैं। जिला प्रशासन ही पूर्णतया यादवमय हो गया था। गोरक्षक योगी अब इन यदुवंशियों को हटा रहे हैं। उनका पहला आदेश तो था कि सैफई गांव में चार घंटे बिजली सप्लाई कम कर दी गई। सैफई समानान्तर राजधानी थी। अगले माह नवरात्रि पर बिजली पूरी आयेगी अर्थात भेदभाव की नीति नकार दी जायेगी। कुछ शमशान-कब्रिस्तान की तर्ज पर।
भेदभाव तो कम होता खूब दिख रहा है। हद पार कर गया था जब अखिलेश यादव Akhilesh Yadav का राज होता था। उदाहरणार्थ उर्दू को तरजीह और संस्कृत अध्यापकों को वेतन न मिलना। गोरखधाम में वेद शिक्षा के प्रबंधक योगी ने विकृति खत्म कर दी है। सरकारी वाहनों पर से हूटर हटवाया है। कारण है कि ध्वनि प्रदूशण दूर करे। मगर इससे राजमद भी टूटेगा।
तीन तलाक से मुक्ति दिलाने के आश्वासन पर त्रस्त मुस्लिम महिलाओं का बहुमत पाने वाले योगी अब मनचलों से बेटियों को निजात दिलाने के लिए क्रियाशील हो गये है। हिरासत में रोमियों की संख्या बढ़ रही है।
खनन माफिया तो सपा सरकार में सत्ता पर सवार थे, सुरक्षित थे। योगी ने एक महिला Archana Pandey को खनन राज्य मंत्री नियुक्त किया है। खुद मंत्री हैं। नदियों का संरक्षण (बालू अब चोरी नहीं किया जायेगा)।
ये सब तो अल्पकालीन काम योगी ने एक आंचलिक पद्धति पर किया है। उनका सबसे बड़ा काम, यदि सफल हुआ तो, है “जाति तोड़ो”।
वही नारा जो राममनोहर लोहिया तथा दीनदयाल उपाध्याय ने दिया था। लोहिया के नारे को सपाइयों ने घुमाफिरा कर एक ही जाति के लिए प्रगति का मार्ग बना दिया। योगी ने इसे सुधारने का वादा किया है। इसका आधारभूत कारण भी है। यादव और जाटव के अलावा यूपी में मानों कोई पिछड़ा और दलित है ही नहीं। ये दोनों जातिवाले कुलश्रेष्ठ बना दिये गये थे। उन्हें समतल बनाकर जाति तोड़ो के अभियान की दिशा में एक सम्यक शुरूआत होगी। याद कीजिए जब 1963 के लोकसभाई उपचुनाव के जौनपुर से जनसंघ पण्डित दीनदयाल उपाध्याय हार गये थे क्योंकि उन्होंने विप्रसभा को संबोधित करने से इंकार कर दिया था। यही उपाध्याय जी आज योगी के प्रथम मार्गदर्षक है। उनका एकात्म मानववाद चिन्तन हैं, प्रकाश स्तंभ है।
पड़ोसी बिहार के पुरोधाओं से वैचारिक मतविशमता भले ही हो पर योगी प्रदेश में भी शराबंदी के इच्छुक हैं। यूं भी अखिलेश यादव सरकार ने अत्यंत अनैतिक कार्य किया। शराब व्यापारियों को अगले वर्ष तक ठेका दे डाला जो गैरकानूनी है। संसाधन के नाम पर खुली लूट हुई है। शराब माफिया, दिवंगत पोन्टी चड्डा के मायावती और अखिलेश यादव खास मित्र रहे। नियम ताक पर थे। सिद्धांतों का तो सवाल ही नही उठता था। उनपर अब योगी की कोपदृष्टि पड़ने की प्रतीक्षा है।
लेकिन योगी पर अभी राजनीतिक कठिनाई आशांकित है। करीब छह मंत्री है जिन्हें विधानमंडल का सदस्य बनना है। किस क्षेत्र से भेजेंगे ? स्वयं भी चुनाव लडेंगे। फिर दो लोकसभाई उपचुनाव होंगे। अपना गोरखपुर से तथा केशव मौर्य का फूलपुर से। दोनों सीटों पर प्रधानमंत्री की साख दांव पर लगी होगी। योगी की प्रथम छमाई की भी परीक्षा होगी।
लेकिन सबसे बड़ा वही प्रश्न होगा मुसलमानों का मिजाज दुरूस्त रखने का। विगत तीन दशकों से मुस्लिमपरस्त, तुष्टिकरण वाली राजनीति से मुसलमान वोट बैंक बड़ा सौदागर बन गया है। मगर मोदी ने साबित कर दिया कि बिना मुस्लिम वोट के भी सत्ता जीती जा सकती है। मोदी की इसी अद्भुत सफलता को योगी को बलवती बनाना होगा ताकि मजहब के नाम पर लामबंदी और सियासत खत्म हो। फिलहाल किसानों का कर्जा माफ करना तथा गोरखपुर से सटे हुये नेपाल की नदियों से पूर्वांचल में आनेवाले बाढ़ से त्रस्त क्षेत्र का परित्राण करना नये मुख्यमंत्री की तात्कालिक चुनौती है। तब योगी का योगफल दिखेगा।
के विक्रम राव
पत्रकार
9415000909
k.vikramrao@gmail.com
https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=1396463457083951&id=100001609306781 ************************************************************************

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 क्या ऐसा होगा?  
09/08/2016 03:02
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अयोध्या के बाबरी प्रकरण के बाद उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन की सरकार का अस्तित्व आया था। काशीराम जी को अपने गृह जनपद इटावा से मुलायम सिंह जी ने सांसद तक बनवाया था। यदि यह गठबंधन कायम रहता तो सदा-सर्वदा के लिए उत्तर प्रदेश से भाजपा का अस्तित्व समाप्त हो जाता। अतः संघप्रिय गौतम के माध्यम से मायावती जी को मुलायम सिंह जी के विरुद्ध करके वह सरकार गिरा दी गई। भाजपा के समर्थन से कई बार मायावती जी मुख्यमंत्री बनीं किन्तु उनकी सरकार भाजपा द्वारा ही हर बार गिरा दी गई। इसके बावजूद गुजरात नर-संहार के बाद 2002 में मायावती जी ने अटल व मोदी के साथ भाजपा का वहाँ प्रचार किया था।
2014 के लोकसभा चुनावों से काफी पहले  व्हाईट हाउस में बराक हुसैन ओबामा द्वारा एक अंतर्राष्ट्रीय गोपनीय बैठक की गई थी जिसमें भारत से भी कई दलित कहे जाने वाले चिंतक शामिल हुये थे जिनमें से एक लखनऊ के विद्वान भी थे। वहीं पर मुस्लिमों के विरुद्ध विश्व व्यापी मुहिम चलाये जाने और उसमें प्रत्येक देश के दलित माने जाने वाले लोगों का सहयोग लेने की रूप रेखा तय की गई थी। उसी अनुसार 2014 के लोकसभा चुनावों में समस्त दलित कहे जाने वाले वर्ग का वोट बसपा के बजाए भाजपा को गया था और बसपा का एक भी सांसद न जीत सका था। उसी मुहिम का परिणाम है बसपा से हाल ही में हुई टूटन। मायावती जी को उनके खास लोगों ने उसी अंदाज़ में उनको झटका दिया है जिस अंदाज़ में 1995 में उन्होने खुद मुलायम सिंह जी को झटका दिया था तब उनको भी भाजपा का समर्थन हासिल था जिस प्रकार अब उनको झटका देने वालों को हासिल हुआ है।
2017 के आसन्न चुनावों में यदि बसपा-सपा गठबंधन बना कर चुनाव लड़ा जाये तो अब भी भाजपा के मंसूबों को ध्वस्त किया जा सकता है वरना अभी तो भाजपा बसपा को ध्वस्त करने के लिए गोपनीय समर्थन देकर सपा सरकार फिर से बनवा देगी लेकिन उसके बाद सपा को उसी प्रकार तोड़ेगी जिस प्रकार अभी बसपा को तोड़ा है। मायावती जी व मुलायम सिंह जी दूरदर्शिता का परिचय दें तो दीर्घकालीन मजबूत गठबंधन बना कर न केवल उत्तर प्रदेश में वरन सम्पूर्ण देश में भाजपा को परास्त कर सकते हैं। लेकिन क्या ऐसा होगा?
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/1137504919644816

ज़ाहिर है ऐसा नहीं हुआ और इसी लिए भाजपा का सत्तारोहण हुआ । 
****** वरिष्ठ  पत्रकार  के विक्रम राव  साहब लिखते हैं कि, यू पी के तत्कालीन सी एम चंद्र भानु गुप्त को हटाने के लिए नेहरू 'कामराज प्लान ' लाये थे। लेकिन हकीकत यह नहीं है। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राधा कृष्णन  के एक अंगरक्षक रहे एक मेजर साहब ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि, राधाकृष्णन जी खुद पी एम बनना चाहते थे अतः तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष के कामराज नाडार  से तमिल भाषा में वार्ता कर उन्होने  ही  1963 में ' कामराज  प्लान ' बनवाया था जो कि, नेहरू जी को पी एम पद से हटाने के लिए था न कि, यू पी के सी एम  चंद्रभानु  गुप्त को क्योंकि उस प्लान के अंतर्गत तमाम सी एम और कुछ मंत्री सरकार से बाहर हुये और संगठन में लगाए गए। जबकि, नेहरू जी को उन मेजर साहब ने आगाह कर दिया था अतः दिखावे में तो उन्होने पद- त्याग की इच्छा की किन्तु समर्थकों के जरिये अपने पद - त्याग प्रस्ताव को रद्द करा दिया। चन्द्र्भाणु गुप्त जी ने फैजाबाद की तत्कालीन सांसद सुचेता कृपलानी जी को सी एम बनवा दिया और पहले के किसी मंत्री व विधायक को मौका नहीं मिलने दिया था। अतः 'कामराज प्लान  सी बी गुप्ता को हटाने के लिए नेहरू जी का नहीं था बल्कि नेहरू जी को हटाने के लिए डॉ राधाकृष्णन जी का था जो विफल हो गया था। 
(विजय राजबली माथुर )

  ~विजय राजबली माथुर ©

Sunday, February 23, 2014

चुनावी परिदृश्य में तृणमूल कॉंग्रेस व ममता बनर्जी की स्थिति ---विजय राजबली माथुर


'रेखा जी' के अतिरिक्त एक और महिला( जिनसे वांम मोर्चा नफरत रख रहा है ) ममता बनर्जी का समय भी उनके अनुकूल चल रहा है। रण-नीति का तक़ाज़ा था कि 'गैर भाजापा' और 'गैर कांग्रेस'मोर्चे का नेता ममता जी को स्वीकार करके दोनों को परास्त किया जाता। किन्तु राजनीतिक लाभ को नहीं व्यक्तिगत द्वेष को वरीयता देने से हानि उठानी पड़ सकती है क्योंकि यहाँ भी हो सकता है कि कांग्रेस घोषित न सही तो अघोषित तालमेल ममता जी से बैठा कर लाभदायक स्थिति अपने लिए बना सकती है।



"अखबारी विश्लेषण से अलग मेरा विश्लेषण यह है कि जन्म के बाद ममता जी की 'चंद्र महादशा' 07 वर्ष 08 आठ माह एवं 07 दिन शेष बची थी। इसके अनुसार 03 जूलाई 2010 से वह 'शनि'महादशांतर्गत 'शुक्र' की अंतर्दशा मे 03 सितंबर 2013 तक चलेंगी। यह उनका श्रेष्ठत्तम समय है। इसी मे वह मुख्य मंत्री बनी हैं। 34 वर्ष के मजबूत बामपंथी शासन को उखाड़ने मे वह सफल रही हैं तो यह उनके अपने ग्रह-नक्षत्रों का ही स्पष्ट प्रभाव है।
इसके बाद पुनः 'सूर्य' की शनि मे अंतर्दशा 15 अगस्त 2014 तक उनके लिए अनुकूल रहने वाली है और लोकसभा के चुनाव इसी अवधि के मध्य होंगे। केंद्र (दशम भाव मे )'शनि' उनको 'शश योग' प्रदान कर रहा है जो 'राज योग'ही है।

हाल ही में ममता बनर्जी को अन्ना हज़ारे द्वारा व्यक्त समर्थन से बौखला कर कुछ वामपंथी चिंतकों ने उनको RSS/मोदी समर्थक घोषित कर दिया है जिसका जवाब ममता जी ने इस प्रकार दिया है:

:"ममता ने कहा,किसी भी हाल में मोदी को नहीं दूंगी समर्थन"

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता 


बनर्जी ने भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी को समर्थन 

देने से साफ इनकार कर दिया है। ममता ने कहा कि भाजपा दंगे 

करवाकर सत्ता में आने वाली पार्टी है। एक समाचार पत्र को दिए 

साक्षात्कार में ममता ने कहा कि न भाजपा,कांग्रेस का विकल्प नहीं हो 

सकती और न ही कांग्रेस,भाजपा का विकल्प हो सकती है। हम न तो 

भ्रष्ट सरकार के साथ रह सकते हैं और न ही दंगे करवाने वाली पार्टी के 

साथ जा सकते हैं। ओपिनियन पोल के मुताबिक तृणमूल कांग्रेस 

आगामी लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में सबसे बड़ी पार्टी के तौर 

पर उभरेगी।केन्द्र में अगले गठबंधन को आकार देने में तृणमूल कांग्रेस 

बड़ा फैक्टर हो सकती है। खुद के अगले प्रधानमंत्री बनने को लेकर भी 

ममता बनर्जी स्पष्ट नहीं है। तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ने कहा कि कई 

नेता हैं जो देश के अच्छे नेता हो सकते हैं। लोकतंत्र और जनता ही तय 

करेगी कि अगला प्रधानमंत्री कौन होगा। ममता ने कहा कि केन्द्र में 

अगली सरकार नया गठबंधन बना सकता है। बकौल ममता,मुझे 


लगता है कि अगर चुनाव के बाद भाजपा और कांग्रेस की सीटों को जोड़कर 



देखेंगे तो आंकड़ा आधे से भी कम होगा। फेडरल फ्रंट ही भविष्य है।

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27 नवंबर 2012 को स्थगित रैली 16 फरवरी 2014 को लखनऊ में  आयोजित करवाकर ममता जी ने संकेत दे दिया है कि यदि मुलायम सिंह प्रकाश करात के फेर में फंसे रहे तो वह  उनके  सहयोग के बगैर ही फेडरल फ्रंट की दिशा में बढ़ सकती हैं।यदि उत्तर-प्रदेश में ममता जी ने मायावती जी से तालमेल बैठा लिया तो यहाँ भी उनको काफी मजबूती मिल जाएगी।  सी पी एम में भाजपा के भगौड़ों को शामिल किए जाने से उसके भविष्य की दिशा का खुलासा हो चुका है। इस सूरत में ममता बनर्जी के तर्क जनता को आसानी से ग्राह्य हो सकते हैं। सी पी एम की शुतुरमुरगी चालें वामपंथ को जोरदार झटका दे सकती हैं। तब 'पाछे पछताए होत क्या? जब चिड़ियाँ चुग गईं खेत' । अभी भी बहुत समय है कि सी पी एम को छोड़ कर समस्त वामपंथ एकजुट होकर  ममता बनर्जी के नेतृत्व में भाजपा/कांग्रेस/आ आ पा  को संयुक्त रूप से चुनावों में परास्त कर सकता है। 

~विजय राजबली माथुर ©
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Tuesday, July 12, 2011

समझदारों की नासमझी

इंटरनेट के माध्यम से ब्लॉग का प्रयोग करने वाले सभी लोग समझदार होते हैं.एक-दुसरे के विचारों को पढ़ने-समझने का बेहतरीन मौका इसके द्वारा मिलता है ,लेकिन यदि पढ़ कर भुला दिया जाए या उसकी उपेक्षा कर दी जाए तो उसे मेरी समझ से नासमझी मानना चाहिए.आज आप सब को ऐसी ही कुछ बातें बताना चाहता हूँ.

गुरु मेष राशी और शनि के कन्या राशी में होने से षडाष्टक योग बन रहा है जिसके परिणामस्वरूप शासन तंत्र को विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा ,श्रमिकों के कोप का सामना करना पड़ेगा.(पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ा कर सर्कार ने आग में घी झोंक ही दिया है).यान-खान दुर्घटनाओं के भी योग इससे उत्पन्न हो रहे हैं और स्वास्थ्य एवं राहत कार्यों हेतु विशेष व्यय करना पड़ेगा.


१० जुलाई को हुए हादसे से पूर्व ०२ जुलाई को ही 'कुछ इधर की कुछ उधर की' शीर्षक से लिखे लेख द्वारा इस प्रकार की दुर्घटनाओं की चेतावनी दी थी.परन्तु बुद्धिमान लोगों ने बचाव का कोई प्रबंध नहीं किया और अकाल मौत के मुंह में समां गए.अधिकृत रूप से कुल ७० मौतें बतायी जा रही हैं,यह कैसे संभव है?एक जेनरल कोच में सैंकडों यात्री सफर करते हैं और पूरा का पूरा कोच ध्वस्त हो जाए और एक भी मौत न हो? एस.-२ कोच भी चकनाचूर हो गया और तमाम कोच एक-दुसरे पर चढ गए और कुल मौतें हईं सिर्फ ७० यह बात बिलकुल अविश्वसनीय है.



'पं.बंगाल के बंधुओं से एक बेपर की उड़ान' शीर्षक से लिखे लेख में सुश्री ममता बैनर्जी से सावधान रह कर वोट देने की अपील की थी.परन्तु बंग-बंधुओं ने उपेक्षा की और ममता जी को सत्ता सौंप दी.हिंदुस्तान ,लखनऊ के १२ जुलाई के सम्पादकीय का अवलोकन करें (चित्र ऊपर)तो स्पष्ट होगा उनका ध्येय क्या था? इसी प्रकार पं.बंगाल का शासन अब चलेगा जैसा २२ जून को टाटा कारखाने में सरकारी संरक्षण में लूट से जाहिर भी हो जाता है.यह कह कर बच के नहीं भागा जा सकता ग्रहों के प्रकोप का मुकाबला कैसे करें? प्रत्येक बात का उपचार और उपाय होता है.यदि बचाव करेंगें तो बचेंगें नहीं तो पिसेंगे.मेरा इरादा तो सार्वजनिक रूप से कुछ स्तुतियों और प्रार्थनाओं को जो अर्वाचीन ऋषि-मुनियों द्वारा रचित हैं ब्लॉग पर देने का था.किन्तु ममता जी के पूर्व मंत्रालय के आधीन कार्य-रत भ्रष्ट सर्जन और 'गर्व से....'के  प्रवक्ता द्वारा मेरे विचारों को 'मूर्खतापूर्ण कथा'कहने और उसका आर.एस.एस.के पिट्ठू ब्लागर्स द्वारा समर्थन करने के कारण उस प्रक्रिया को त्याग दिया.हालांकि उससे से असंख्य लोग लाभान्वित हो सकते थे.०२ जुलाई वाले लेख में आगे और भी कुछ चेतावनियाँ दी हैं.यदि समय रहते उपाय किये जाएँ तो घटनाओं को घटित होने से न रोक पाने के बावजूद जान-माल की सुरक्षा की जा सकती है.

ममता जी ने अपने दो वर्ष के रेल मंत्रित्व काल में रेलवे की सुरक्षा प्रणाली की और कतई ध्यान नहीं दिया.एक वर्ष से रेलवे बोर्ड में 'सदस्य यातायात' का पद खाली चला आ रहा है.यातायात की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करे?यदि ये उपाय किये जाते तो भी इतनी जन-हानि नहीं होती.लेकिन बात जब 'गर्व से....'एवं संकीर्ण साम्प्रदायिकता के निर्वहन की हो तो वैज्ञानिक उपायों को कौन महत्त्व देता है?यदि अन्ना,रामदेव,रवि शंकर या आशा राम कुछ भी बहका दें तो लोग लपक कर उसे अपना लेंगे भले ही काफी नुक्सान भी उठाना पड़े .वैज्ञानिक उपाय बताना तो मूर्खतापूर्ण कथा के रूप में उपहास का हेतु बन जाता है.

राहुल की कवायद मायावती को सत्ता में वापिस लाने हेतु

हिन्दुस्तान के प्रधान संपादक एवं आई.बी.एन.-७ के मेनेजिंग एडिटर महोदय अन्य गणमान्य लोगों की भाँती ही आज कल श्री राहुल गांधी के गुण-गान में लगे हुए हैं.पूरी की पूरी कारपोरेट लाबी राहुल को किसानों के मसीहा के रूप में पेश कर रही है.प्राचारित किया जा रहा है राहुल २०१२ के चुनावों में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत यूं.पी. में दिला देंगें.बिहार में उनका करिश्मा देखा ही जा चूका है अब यहाँ भी देख लीजियेगा. राहुल गांधी जी की कृपा से मायावती जी आसान जीत के साथ सत्ता में वापिस आ जायेंगीं.

मुलायम सिंह जी जो बसपा को सत्ता में साझीदार बनाने का सर्व-प्रथम श्रेय रखते हैं.अब भाजपा के पूरक के रूप में कार्य कर रहे हैं.इसी लिए आर.एस.एस. समर्थित रामदेव जी का समर्थन करने में उन्होंने पल भर की भी देर नहीं की.यह बात पढ़े-लिखे लोगों को भले ही न समझ आये,परन्तु भोली समझी जाने वाली ग्रामीण जनता को खूब समझ में आती है.बाद में भाजपा ने भी बसपा को खूब सत्ता सुख दिलाया है.अब राहुल साहब प्रदेश सरकार की मुखालफत के नाम पर गांव वालों को भरमा रहे हैं.ऐसे में कांग्रेस की जितनी भी ताकत बढ़ेगी विपक्ष के वोट उतने ही बतेंगें और भाजपा को स्पष्ट लाभ होगा.परन्तु प्रदेश का मुस्लिम वोटर यदि भाजपा को सत्ता में आने देना चाहेगा तभी कांग्रेस को वोट देगा अन्यथा उसका थोक वोट भाजपा को हराने हेतु बसपा को ही मिलेगा जिसकी संभावना अधिक है.जाहिर है मायावती जी को राहुल के अभियान से लाभ ही लाभ है.यही कारण है जबानी हल्ले के अलावा राहुल के विरुद्ध कोई कारवाई बसपा सरकार ने नहीं की है.

क्या बसपा,भाजपा,कांग्रेस को एक साथ पराजित किया जा सकता है?

जवाब हाँ में हो सकता है यदि समझदारी से काम लिया जाए और बेवजह का अहंकार पाल कर नासमझी न बरती जाए तो.परन्ति ऐसी संभावना कम ही है जो अहंकार का त्याग किया जा सके.बिहार में लालू जी ने और यूं.पी.में मुलायम जी ने कम्यूनिस्ट आंदोलन को भारी क्षति पहुंचाई है एवं दोनों के सामने उसका परिणाम भी भुगतने को मिला है.गरीब किसान-मजदूर के हिमायती विधायिकाओं में नहीं पहुँच सके और उनका उत्पीडन-शोषण व्यापक रूप से बढ़ गया है.किसानों की उपजाऊ भूमि हडप कर सरकारें बिल्डरों को सौंप रही हैं जो कुछ राहत मिली है वह न्यायालय के कारण ही.

यदि मुलायम सिंह जी की कथनी और करनी एक है और वह सच में साम्प्रदायिक भाजपा को हराना चाहते हैं तो उन्हें अपनी सरकार बनाने का दावा छोडना होगा.कम्यूनिस्ट एवं किसान नेता का.अतुल कुमार अनजान जिनकी छवि भी उज्जवल है और जो जुझारू नेता भी हैं उनके नेतृत्व में मुलायम सिंह जी एक नया मोर्चा बनाने का मार्ग प्रशस्त करें भले ही इसके लिए उन्हें पूर्व कृत्य के लिए पश्चाताप भी करना पड़े,तब यह संभावना बन सकती है -कांग्रेस,भाजपा और बसपा जो तीनों वर्ग-चरित्र में एक ही हैं एक साथ सत्ता से दूर हो जाएँ.प्रदेश की जनता ऐसा ही चाहती भी है.अभी समय भी पर्याप्त है प्रयास किया जा सकता है,समय बीतने के साथ-साथ परिस्थितियां हाथ से निकलती जायेंगीं.

मुझे लगता है इस आंकलन को समझदार लोग दिवा स्वप्न कह कर उपहास उड़ाएंगें  और फिर एक बार नासमझी का परिचय देंगें.