Saturday, August 13, 2011

A I S F का प्लेटिनम जुबली समारोह

अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस 12 अगस्त को प्रारम्भ होकर 13 अगस्त को मनाए गए रक्षाबंधन पर्व जिसका संबंध ज्ञान-विज्ञान के प्रचार-प्रसार से है के दिवस A I S F का प्लेटिनम जुबली समारोह सम्पन्न हुआ। 75 वर्ष पूर्व आजादी के आंदोलन को बल प्रदान करने हेतु इस संगठन की स्थापना महात्मा गांधी एवं गुरुवर रवीन्द्रनाथ टैगोर के आशीर्वाद से लखनऊ के गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल मे हुयी थी। सम्मेलन के स्वागताध्यक्ष लखनऊ के पी .एन .भार्गव साहब को इसका महामंत्री तथा जवाहर लाल नेहरू जी को अध्यक्ष चुना गया था। 12-13 अगस्त 1936 की पुनरावृत्ति 12-13 अगस्त 2011 को   उसी हाल मे हुयी जब A I S F का प्लेटिनम जुबली समारोह मनाया गया। यह हमारी खुश किस्मती थी कि एक कार्यकर्ता के रूप मे हमे भी इस मे भागीदारी करने का मौका मिला।

सम्मेलन मे आए अधिकांश प्रतिनिधियों को उसी छेदी लाल धर्मशाला मे ठहराया गया था जिसमे 1936 मे आए प्रतिनिधि को ठहराया गया था। यह वही धरमशाला है जिसमे ठहर कर क्रांतिकारी रामप्रसाद 'बिस्मिल'ने अपने साथियों के साथ 'काकोरी' अभियान की रूप-रेखा तैयार की थी। ये दोनों स्थान क्रांतिकारियों की कर्मस्थली रह चुकने के कारण किसी तीर्थ से कम कतयी नहीं हैं। यह भी हमारा परम-सौभाग्य है कि हमे A I S F के प्लेटिनम जुबली समारोह के दौरान इनमे भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ।

12 अगस्त को प्रातः 10 बजे छेदी लाल धरमशाला प्रांगण मे झण्डारोहन का .डी.नरसिंघा राओ जी के कर-कमलों द्वारा सम्पन्न हुआ जो इस संगठन के प्रभाव शाली नेता रह चुके हैं। उदघाटन भाषण पूर्व न्यायाधीश हैदर अब्बास रजा साहब ने दिया जो खुद इस संगठन के कर्मठ नेता रह चुके हैं। अब्बास साहब ने A I S F को मजबूत बनाने के साथ-साथ सम्पूर्ण बाम-पंथ की एकता पर बल दिया।  उन्होने छात्रों का आह्वान किया कि वे आज शिक्षा पर आए संकट और उस पर बढ़ते बाजारीकरण के प्रभाव को समाप्त करने की दिशा मे जोरदार आंदोलन चलाएं। बाद मे का .अतुल कुमार 'अनजान' ने अपने उद्बोधन मे बताया कि जस्टिस साहब ने अपने छात्र जीवन मे शिक्षा के प्रारम्भ हुये निजीकरण का तीव्र विरोध किया था और आंदोलन का सफल नेतृत्व किया था । 'अनजान' साहब ने यह भी बताया कि उस आंदोलन का नारा था-"यू पी के तीन चोर-मुंशी,गुप्ता,जुगल किशोर"।के एम मुंशी तब गवर्नर थे,चन्द्र्भानु गुप्ता मुख्यमंत्री और जुगल किशोर शिक्षा मंत्री थे।

जस्टिस अब्बास साहब के बाद स्वागताध्यक्ष डा.गिरीश का स्वागत भाषण हुआ था जिसे आप बड़ा देखने के लिए इस स्कैन इमेज पर डबल क्लिक करके पढ़ सकते हैं। ---


बिहार A  I S  F ने अपनी राष्ट्रीय परिषद को एक मशाल भेंट की जिसे उनके राष्ट्रीय कार्यालय ,आसिफ अली रोड ,दिल्ली मे सजाया जाएगा। 



पूर्व छात्र नेतागण -एस सुधाकर रेड्डी साहब (पूर्व सांसद ),अमरजीत कौर जी आदि के भाषण बेहद तर्कसंगत एवं प्रभावशाली रहे। 13 अगस्त को "वर्तमान स्थितियों मे छात्रों की भूमिका" विषय पर एक गोष्ठी हुयी जिसमे प्रो .अशोक वर्धन ,प्रो .अली जावेद,राज्य सभा सदस्य का .अजीज पाशा ने प्रकाश डाला और छात्रों का मार्ग-दर्शन किया। ये सभी अपने समय के प्रभावशाली छात्र नेता रहे हैं।

A I S F के अध्यक्ष परमजीत ढाबा और महामंत्री अभय मनोहर टकसाल ने भविष्य मे शिक्षा विदों के सुझाव पर अमल करने का आश्वासन दिया। का .टकसाल चाहते थे कि खुशवंत सिंह के पिता शोभा सिंह के महिमामंडन को रोका जाये जिनकी गवाही सरदार भगत सिंह की फांसी का आधार बनी थी। सम्मेलन मे शिक्षा पर घटते बजट की तीव्र आलोचना की गई और विदेशी विश्वविद्यालयों को खोले जाने की निन्दा।



सम्मेलन के समापन से पूर्व स्वागत समिति के अध्यक्ष डा .गिरीश ने जिन 25-30 कार्यकर्ताओं का नाम लेकर आभार और धन्यवाद दिया उनमे मेरा नाम भी 19 वे न .पर था।



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कार्यक्रम  के कुछ फोटोस-
प्रदर्शनी 


हौल के भीतर से मंच  का दृश्य 

हौल के भीतर से मंच  का दृश्य 

हौल के भीतर से मंच  का दृश्य 

हौल के भीतर से मंच  का दृश्य 

हौल के भीतर से मंच  का दृश्य 

Tuesday, August 9, 2011

स्वतन्त्रता आंदोलन मे युवा/छात्रों का योगदान ------ विजय राजबली माथुर

1922 ई .मे गांधी जी द्वारा चौरी-चौरा कांड के नाम पर असहयोग आंदोलन वापिस लेने पर युवा/छात्र क्रान्ति की ओर मुड़े । क्रांतिकारी आंदोलन को चलाने और बम आदि बनाने हेतु काफी धन की आवश्यकता थी। अतः राम प्रसाद 'बिस्मिल'/चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व मे क्रांतिकारियों ने सरकारी खजाना कब्जे मे लेने की योजना बनाई। 09 अगस्त 1925 की रात्रि लखनऊ के 'काकोरी'रेलवे स्टेशन पर पेसेंजर गाड़ी के गार्ड से खजाने को हस्तगत किया गया। आज इस घटना को हुये 86 वर्ष पूर्ण हो गए हैं।


इस क्रांतिकारी घटना मे भाग लेने वाले स्वातंत्र्य योद्धाओं मे राम प्रसाद 'बिस्मिल',अशफाक़ उल्ला खान ,रोशन सिंह तथा राजेन्द्र सिंह लाहिड़ी को 17 एवं 19 दिसंबर 1927 को ब्रिटिश सरकार ने फांसी दे दी। बिस्मिल उस समय शाहजहाँपुर के मिशन स्कूल मे नौवी कक्षा के छात्र थे। वह पढ़ाई कम और आंदोलनों मे अधिक भाग लेते थे। गोरा ईसाई हेड मास्टर भी उनका बचाव करता था। एक बार जब वह कक्षा मे थे तो ब्रिटिश पुलिस उन्हें पकड़ने पहुँच गई। उस हेड मास्टर ने पुलिस को उलझा कर कक्षा अध्यापक से राम प्रसाद''बिस्मिल' को रेजिस्टर  मे गैर-हाजिर करवाया और भागने का संदेश दिया। बिस्मिल दूसरी मंजिल से खिड़की के सहारे कूद कर भाग गए और पुलिस चेकिंग करके बैरंग लौट गई। लेकिन खजाना कांड मे फांसी की सजा ने हमारा यह होनहार क्रांतिकारी छीन लिया। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क मे पुलिस से घिरने पर चंद्रशेखर 'आजाद'ने भी खुद कोअपनी ही पिस्तौल की गोली से  शहीद कर लिया। 


(Shaheed Smarak-Patna)




होनहार युवा/छात्रों ने आजादी की मशाल को थामे रखा जब 08 अगस्त 1942 को गांधी जी के आह्वान पर 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' का प्रस्ताव पास किया गया था। लगभग सभी बड़े नेता ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए थे। इस दशा मे सम्पूर्ण आंदोलन युवाओं और छात्रों द्वारा संचालित किया गया था। 11 अगस्त 1942 को पटना सचिवालय से यूनियन जेक को उतार कर तिरंगा छात्रों ने फहरा दिया था किन्तु सभी सातों छात्र ब्रिटिश पुलिस की गोलियों से शहीद हो गए थे। उनकी स्मृति मे वहाँ उनकी प्रतिमाएँ स्थापित की गई हैं। इस अभियान का नेतृत्व राजेन्द्र सिंह जी ने किया था और सबसे आगे उन्हीं की मूर्ती है। इस अभियान के संबंध मे श्री अजय प्रकाश ने एक लेख  लिखा था जो 18 जनवरी 1987 को प्रकाशित -'पटना हाईस्कूल भूतपूर्व छात्र संघ' की 'स्मारिका' मे छ्पा था ,आप भी उसकी स्कैन कापी देख सकते हैं-
(बड़े अक्षरों मे पढ़ने हेतु डबल क्लिक करें)






उसी स्मारिका मे छपा यह लेख आज भी छात्रों/युवाओं के महत्व को रेखांकित करता है-










'लोकसंघर्ष' मे प्रकाशित महेश राठी साहब के एक महत्वपूर्ण लेख द्वारा बताया गया है कि,"आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन का बेहद गौरवमयी और प्रेरणापरद हिस्सा है। ए .आई .एस .एफ .भारतीय स्वाधीनता संग्राम का वह भाग है जिसके माध्यम से देश के छात्र समुदाय ने आजादी की लड़ाई मे अपने संघर्षों और योगदान की अविस्मरणीय कथा लिखी"। 


राठी साहब ने बताया है कि,भारतीय छात्र आंदोलन का संगठित रूप 1828 मे सबसे पहले कलकत्ता मे 'एकेडेमिक एसोसिएशन'के नाम से दिखाई दिया जिसकी स्थापना एक पुर्तगाली छात्र विवियन डेरोजियो द्वारा की गई । 1840 से 1860 के मध्य 'यंग बंगाल मूवमेंट'के रूप मे दूसरा संगठित प्रयास हुआ। 1848 मे दादा भाई नौरोजी की पहल पर मुंबई मे 'स्टूडेंट्स लिटरेरी और सायींटिफ़िक सोसाइटी '
की स्थापना हुयी। कलकत्ता के आनंद मोहन बॉस और सुरेन्द्र नाथ बनर्जी द्वारा 1876 मे 'स्टूडेंट्स एसोसिएशन'की स्थापना हुयी जिसने 1885 मे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना मे महती भूमिका अदा की। 16 अक्तूबर 1905 मे बंगाल विभाजन के बाद छात्रों एवं युवाओं ने जबर्दस्त आंदोलन चलाया जिसमे आम जनता का भी सहयोग रहा।


1906 मे राजेन्द्र प्रसाद जी (जो पहले राष्ट्रपति बने थे) की पहल पर 'बिहारी स्टूडेंट्स सेंट्रल एसोसिएशन'की स्थापना हुयी जिसने बनारस से कलकत्ता तक अपनी शाखाएँ खोली और 1908 मे बिहार मे इसी संगठन के बल पर कांग्रेस की स्थापना हुयी। श्रीमती एनी बेसेंट ने 1908 मे 'सेंट्रल हिन्दू कालेज'नामक पत्रिका मे एक अखिल भारतीय छात्र संगठन बनाने का विचार प्रस्तुत किया।


25-12-1920 को नागपूर मे आल इंडिया कालेज स्टूडेंट्स कान्फरेंस का आरंभ हुआ जिसकी स्वागत समिति के अध्यक्ष आर .जे .गोखले थे। इसका उदघाटन लाला लाजपत राय ने किया था। 1920 से 1935 तक देश मे बड़े स्तर पर विद्यालयों  और महा विद्यालयों की स्थापना हुयी। आजादी के संघर्ष मे छात्रों की महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई दे रही थी।


26 मार्च 1931 को कराची मे जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता मे एक अखिल भारतीय छात्र सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसमे देश भर से 700 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। 23 जनवरी 1936 को यू .पी .विश्वविद्यालय छात्र फेडरेशन ने अपनी कार्यकारिणी मे अखिल भारतीय छात्र सम्मेलन बुलाने का निर्णय लिया। पी .एन .भार्गव की अध्यक्षता मे एक स्वागत समिति का गठन किया गया जिसने देश के सभी छात्र संगठनों तथा कांग्रेस,सोशलिस्ट पार्टी और भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी सहित सभी राजनीतिक धड़ों से संपर्क बनाया।


12-13 अगस्त 1936 को लखनऊ मे -सर गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल मे A I S F का स्थापना सम्मेलन सम्पन्न हुआ जिसमे 936 प्रतिनिधियों ने भाग लिया जिसमे से 200 स्थानीय और शेष 11 प्रांतीय संगठनों के प्रतिनिधि थे। सम्मेलन मे महात्मा गांधी,रवीन्द्रनाथ टैगोर,सर तेज बहादुर सप्रू और श्री निवास शास्त्री सरीखे गणमान्य व्यक्तियों के बधाई संदेश भी प्राप्त हुये। सम्मेलन का उदघाटन जवाहर लाल नेहरू ने किया।


A I S F के स्थापना सम्मेलन मे पी .एन .भार्गव पहले महा सचिव निर्वाचित हुये । 'स्टूडेंट्स ट्रिब्यून'इसका पहला आधिकारिक मुख पत्र था। 22-11-1936 को लाहौर मे दूसरा सम्मेलन हुआ जिसकी अध्यक्षता शरत चंद बॉस ने की और उसमे 150 लोगों ने भाग लिया। इसमे छात्रों का एक मांग पत्र भी तैयार हुआ।
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आजादी के आंदोलन मे सक्रिय और महत्वपूर्ण भाग लेने वाला यह संगठन आगामी 12-13 अगस्त 2011 को लखनऊ के उसी गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल मे अपनी प्लेटिनम जुबली मनाने जा रहा है जिसका खुला निमंत्रण A I S F की ओर से जारी किया गया है-






Friday, August 5, 2011

तुलसी दास की प्रासंगिकता---विजय राजबली माथुर

05 अगस्त 2011 (श्रावण शुक्ल सप्तमी)-तुलसी जयंती पर-





गोस्वामी तुलसीदास मानव जीवन के पारखी थे,
सच्चे इतिहासकार,कुशल राजनीतिज्ञ और विचारों के सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषक भी थे । जिस समय उनका आविर्भाव हुआ,भारतीय जन-जीवन क्षत-विक्षत हो चुका था । मानवीय विचारधाराओं का संगम साहित्य लुप्तप्राय हो चुका था । भारत मे एक विदेशी सत्ता-मुगल साम्राज्य की स्थापना हो चुकी थी । धन-वैभव मे मुगल शासक भोग-विलास मे लिप्त रहते थे । दूसरी ओर भारतीय दर्शन मृतप्राय हो चुका था । निर्गुणोपासक निराकार सर्वव्याप्त ईश्वर -प्रचार मे निमग्न थे,तो वैष्णव कर्मकाण्ड और आडंबर का राग आलाप रहे थे । ऐसे विषम समय मे तुलसीदास ने 'रामचरितमानस'की रचना करके समाज,धर्म और राष्ट्र मे एक नूतन क्रांति की सृष्टि कर दी ।

रामचरितमानस कोई नरकाव्य नहीं है । यह कोई छोटा-मोटा ग्रन्थ नहीं है । यह मानव जीवन का विज्ञान(ह्यूमन साइन्स )है । विज्ञान किसी भी विषय के क्रमबद्ध एवं नियमबद्ध (श्रंखलाबद्ध) अध्ययन का नाम है । इसमे मानव-जीवन के आचार-विचार,रहन-सहन ,परिवार,राज्य और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों पर विशद,गूढ एवं व्यापक प्रकाश डाला गया है । गोस्वामी जी ने इस ग्रन्थ की रचना 'सर्वजन हिताय' की है । किसी भी लेखक या साहित्यकार पर सामयिक परिस्थितियों का प्रभाव न्यूनाधिक रूप मे अवश्य ही पड़ता है । फिर गोस्वामी जी ने इसे 'स्वांतःसुखाय'लिखने की घोषणा कैसे की?दरअसल बात यह है कि तत्कालीन शासक अपने दरबार मे चाटुकार कवियों को रखते थे और उनकी आर्थिक समस्या का समाधान कर दिया करते थे । इसके विनिमय मे ये राज्याश्रित दरबारी कवि अपने आश्रयदाता की छत्र छाया मे इन शासकों की प्रशंसा मे क्लिष्ट साहित्य की रचना करते थे । अर्थात जब गोस्वामी तुलसीदास के समकालीन कवि 'परानतःसुखाय'साहित्य का सृजन कर रहे थे तुलसीदास ने 'रामचरितमानस'की रचना राज्याश्रय से विरक्त होकर 'सर्वजन सुखाय-सर्वजन हिताय'की । 'सब के भला मे हमारा भला' के वह अनुगामी थे । एतदर्थ रामचरितमानस को 'स्वांतः सुखाय'लिखने की घोषणा करने मे गोस्वामी जी ने कोई अत्युक्ति नहीं की ।

रामचरितमानस तुलसीदास की दिमागी उपज नहीं है और न ही यह एक-दो दिन मे लिखकर तैयार किया गया है । इस ग्रंथ की रचना आरम्भ करने के पूर्व गोस्वामी जी ने देश,जाति और धर्म का भली-भांति अध्ययन कर सर्वसाधारण की मनोवृति  को समझने की चेष्टा की और मानसरोवर से रामेश्वरम तक इस देश का पर्यटन किया ।

तुलसीदास ने अपने विचारों का लक्ष्य केंद्र राम मे स्थापित किया । रामचरित के माध्यम से उन्होने भाई-भाई और राजा-प्रजा का आदर्श स्थापित किया । उनके समय मे देश की राजनीतिक स्थिति सोचनीय थी । राजवंशों मे सत्ता-स्थापन के लिए संघर्ष हो रहे थे । पद-लोलुपता के वशीभूत होकर सलीम ने अकबर के विरुद्ध विद्रोह किया तो उसे भी शाहज़ादा खुर्रम के विद्रोह का सामना करना पड़ा और जिसका प्रायश्चित उसने भी कैदी की भांति मृत्यु का आलिंगन करके किया । राजयोत्तराधिकारी 'दारा शिकोह'को शाहज़ादा 'मूहीजुद्दीन 'उर्फ 'आलमगीर'के रंगे हाथों परास्त होना पड़ा । इन घटनाओं से देश और समाज मे मुरदनी छा गई ।

ऐसे समय मे 'रामचरितमानस' मे राम को वनों मे भेजकर और भरत को राज्यविरक्त (कार्यवाहक राज्याध्यक्ष)सन्यासी बना कर तुलसीदास ने देश मे नव-चेतना का संचार किया,उनका उद्देश्य  सर्वसाधारण  
मे राजनीतिक -चेतना का प्रसार करना था । 'राम'और 'भरत 'के आर्ष चरित्रों से उन्होने जनता को 'बलात्कार की नींव पर स्थापित राज्यसत्ता'से दूर रहने का स्पष्ट संकेत किया । भरत यदि चाहते तो राम-वनवास के अवसर का लाभ उठा कर स्वंय को सम्राट घोषित कर सकते थे  राम भी 'मेजॉरिटी हेज अथॉरिटी'एवं 'कक्की-शक्की मुर्दाबाद'के नारों से अयोध्या नगरी को कम्पायमानकर सकते थे । पर उन्होने ऐसा क्यों नहीं किया?उन्हें तो अपने राष्ट्र,अपने समाज और अपने धर्म की मर्यादा का ध्यान था अपने यश का नहीं,इसीलिए तो आज भी हम उनका गुणगान करते हैं । ऐसा अनुपमेय दृष्टांत स्थापित करने मे तुलसीदास की दूरदर्शिता व योग्यता की उपेक्षा नहीं की जा सकती । क्या तुलसीदास ने राम-वनवास की कथा अपनी चमत्कारिता व  बहुज्ञता के प्रदर्शन के लिए नहीं लिखी?उत्तर नकारात्मक है । इस घटना के पीछे ऐतिहासिक दृष्टिकोण छिपा हुआ है । (राष्ट्र-शत्रु 'रावण-वध की पूर्व-निर्धारित योजना' को सफलीभूत करना)।

इतिहासकार सत्य का अन्वेषक होता है । उसकी पैनी निगाहें भूतकाल के अंतराल मे प्रविष्ट होकर तथ्य के मोतियों को सामने रखती हैं । वह ईमानदारी के साथ मानव के ह्रास-विकास की कहानी कहता है । संघर्षों का इतिवृत्त वर्णन करता है । फिर तुलसीदास के प्रति ऐसे विचार जो कुत्सित एवं घृणित हैं (जैसे कुछ लोग गोस्वामी तुलसीदास को समाज का पथ-भ्रष्टक सिद्ध करने पर तुले हैं ) लाना संसार को धोखा देना है ।

तुलसीदास केवल राजनीति के ही पंडित न थे ,वह 'कट्टर क्रांतिकारी समाज सुधारक'भी थे । उनके समय मे कर्मकाण्ड और ब्राह्मणवाद प्राबल्य पर था । शूद्रों की दशा सोचनीय थी,उन्हें वेद और उपनिषद पढ़ने का अधिकार न था ,उन्हें हरि-स्मरण करने नहीं दिया जाता था । उनके हरि मंदिर प्रवेश पर बावेला मच जाता था। शैव और वैष्णव परस्पर संघर्ष रत थे। यह संघर्ष केवल निरक्षरों तक ही सीमित न था। शिक्षित और विद्वान कहे जाने वाले पंडित और पुरोहित भी इस संघर्ष का रसास्वादन कर आत्म विभोर हो उठते थे।

तुलसी दास ने इसके विरोध मे आवाज उठाई । उन्होने रामचरित मानस मे पक्षियों मे हेय व निकृष्ट 'काग भूषण्डी'अर्थात कौआ के मुख से पक्षी-श्रेष्ठ गरुड को राम-कथा सुनवाकर जाति-पांति के बखेड़े को अनावश्यक बताया । यद्यपि वह वर्ण-व्यवस्था के विरोधी नहीं थे । वह वेदों के 'कर्मवाद'सिद्धान्त के प्रबल समर्थक थे जिसके अनुसार शरीर से न कोई ब्राह्मण होता है और न शूद्र ,उसके कर्म ही इस सम्बन्ध मे निर्णायक हैं।

राम को शिव का और शिव को राम का अनन्य भक्त बताकर और राम द्वारा शिव की पूजा कराकर एक ओर तो तुलसीदास ने शैवो और वेष्णवोंके पारस्परिक कलह को दूर करने की चेष्टा की है तो दूसरी ओर् राष्ट्र्वादी दृष्टिकोण उपस्थित किया है(शिव यह हमारा भारत देश ही तो है)

इतने पुनीत और पवित्र राष्ट्र्वादी ऐतिहासिक दृष्टिकोण को साहित्य के क्षेत्र मे सफलता पूर्वक उतारने का श्रेय तुलसीदास को ही है। तुलसीदास द्वारा राम के राष्ट्र्वादी कृत्यों व गुणगान को रामचरित मानस मे पृष्ठांकित करने के कारण ही कविवर सोहन लाल दिवेदी को गाना पड़ा-

कागज के पन्नों को तुलसी,तुलसी दल जैसा बना गया। 
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(यह लेख सर्वप्रथम सप्तदिवा साप्ताहिक,आगरा के 28 जूलाई से 03 अगस्त 1982 अंक मे प्रकाशित हुआ था जिसे अब ब्लाग मे शामिल किया है। )



28 जूलाई 1982 को 'सप्तदीवा'आगरा मे प्रकाशित यह लेख 30 वर्ष की आयु की समझ से लिखा था जिसे आज 29 वर्ष बाद पुनः प्रकाशित कर रहे हैं तुलसी दास जी की जयंती-श्रावण शुक्ल सप्तमी के अवसर पर ।

खेद यह है कि कुछ दूसरे ब्लागो पर आपको तुलसी दास जी का दूसरा रूप दिखाया जाएगा जो उनका था नहीं। तमाम लोग भक्ति-अध्यात्म के नाम पर महान 'ऐतिहासिक-राजनीतिक ग्रंथ' को जनता के सामने पाखंडी रूप मे प्रस्तुत करते और तमाम वाहवाही लूटते हैं। अफसोस आज के विज्ञान के युग मे भी लोग-बाग अपनी सोच को परिष्कृत नहीं करना चाहते। खैर मैंने अपना फर्ज अदा किया है। -





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03 -08-2014
:22 अगस्त 2015 

Wednesday, August 3, 2011

दूसरे भगवान की कृपा ?

Hindustan-Lucknow-03/08/2011

Hindustan-Lucknow-03/08/2011

Hindustan-Lucknow-02/08/2011
Hindustan-Lucknow-04/08/2011

Hindustan-Lucknow-04/08/2011
Hindustan-Lucknow-05/08/2011
(डा.सौदान सिंह जी को इस तथ्य की तहक़ीक़ात करानी चाहिए कि क्या संबन्धित डा .के सम्बंध किसी अंतर्राष्ट्रीय गिरोह से तो नहीं हैं जो मानव अंगों की तस्करी करता हो?यदि ग्रामीण कर्मियों को न पकडवाते तो गिरोह के सदस्य उन लाचार मरीजों को उठा ले जाते और उनके अंग निकाल कर विदेश मे बेच दिये जाते। कर्मियों को धन देकर निजी एंबूलेंस से भेजा गया था जो उस डा .ने अपने पाकेट से नहीं दिया होगा।

'चिकित्सा समाज सेवा है-व्यवसाय नहीं' की शपथ लेने वाले किस स्तर पर गए उसका अंदाज कार्यवाहक जिलाधिकारी महोदया के शब्दों से ही हो जाता है।
05 08 2011)

Tuesday, August 2, 2011

विद्रोही स्व-स्वर में

इसी शीर्षक से एक तुकबंदी तब लिखी थी जब होटल मुग़ल,आगरा में किसी संघर्ष का समय था.अचानक किसी बात के जवाब में आफिस में तत्काल लिख कर इसे प्रसारित कर दिया था.इसी शीर्षक से एक पृथक  ब्लॉग भी चल रहा है और आज उसे प्रारम्भ किये हुए एक वर्ष भी पूर्ण हो गया है.यह अलग ब्लॉग बनाने का कारण यह था कि उसमें व्यक्तिगत संघर्षों का विवरण दिया जा सके.वैसे आम तौर पर किसी एक को दुसरे के व्यक्तिगत जीवन से तब तक कोई सरोकार नहीं होता जब तक कि उसका उसके व्यक्तिगत जीवन पर कोई प्रभाव न पड़ रहा हो.जिन बातों का उल्लेख किया जा रहा है उनमें से किसी भी बात का प्रभाव ब्लाग जगत के किसी भी व्यक्ति पर नहीं पड़ता है.लेकिन यदि मैं कहीं असफल रहा हूँ तो क्या उससे बचा जा सकता था?या यदि सफलता हासिल की तो क्या और कोई भी उसी प्रकार सफल हो सकता है?दुसरे की ठोकर देख कर खुद को ठोकर खाने से बचाना चाहिए अतः वह ब्लॉग पढ़ने के बाद यदि कोई भी अपने जीवन में असफलता से बच कर सफल हो सके तो यह सब लिखना सार्थक हो सकता है -इसी ध्येय को लेकर 'विद्रोही स्व-स्वर में' ब्लाग शुरू किया था.

ब्लाग जगत में जैसा कि प्रचलंन है लोग अपने -अपने हिसाब से टिप्पणियाँ देते हैं.उस ब्लॉग पर मेरे उद्देश्य को भांप कर सटीक टिप्पणियाँ केवल डा.डंडा लखनवी जी ने ही दी हैं.उनके अतिरिक्त मनोज कुमार जी, वीणा श्रीवास्तव जी,अल्पना वर्मा जी,के.आर.जोशी साहब(Patali The Village),जी.एन.शा साहब भी टिप्पणी देने वालों में प्रमुख हैं.इन सभी के प्रति बहुत-बहुत आभार.

जब टिप्पणियों का जिक्र हुआ है तो  श्री राम शिव  मूर्ती  यादव साहब की प्रशंसा न करना अन्याय होगा.राम शिव मूर्ती जी ने मुझे अपना ब्लाग 'यदुकुल'देखने को निमंत्रित किया था.कुछ लेखों पर मैंने अनुकूल टिप्पणियाँ दी थीं परन्तु 'बाबा रामदेव 'सम्बंधित लेख पर मैंने प्रतिकूल टिप्पणी दी थी जिसे उन्होंने डिलीट नहीं किया है.उनके विपरीत एक अच्छे कवि ज्यादातर ई मेल द्वारा अपनी कवितायें देखने को कहते थे उनकी बाबा रामदेव संबंधी कविता पर भी विपरीत टिप्पणी की थी परन्तु उन्होंने उसे रोक लिया.जबकि वह जानते थे और देख चुके थे मेरे ब्लॉग पर राम देव विरोधी लेख था तो निमंत्रित ही क्यों किया?इन कवि महोदय के विपरीत मैंने अपने लेख पर अभद्र टिप्पणी लिखने वाले 'गर्व से...'पार्टी के ब्लॉगर की टिप्पणी को प्रकाशित कर दिया था.यह तुलना आर.एस.एस.संबंधी ब्लागर्स की फासिस्ट प्रवृति को उजागर करने हेतु की है.अतः राम  शिव  मूर्ती यादव साहब का बहुत-बहुत आभारी हूँ कि वह लोकतांत्रिक उदार विचारों का निर्वहन करते हैं.

उस ब्लॉग की शुरुआत बचपन के लखनऊ के काल से हुई थी और फिर क्रमशः बरेली,शाहजहांपुर,सिलीगुड़ी ,शाहजहांपुर,मेरठ,होते हुए आगरा में बिताए -अनुभव किये वर्णन दिए हैं.१९८१ और १९८२ में दो बार कारगिल टेम्पोरेरी ट्रांसफर पर गए वहाँ का वर्णन भी दिया है जो महत्वपूर्ण हैऔर जिन्हें केवल रक्षा मंत्रालय से संबद्ध मनोज कुमार जी ने ही समझा है.

अभी आगरा में बिताये और २७ वर्षों का वर्णन आना है तब उसके बाद ही लौट कर लखनऊ आने का क्रम होगा.किन्तु उस ब्लाग के एक वर्ष पूर्ण होने के अवसर का लाभ उठा कर इस दौरान यहाँ की कुछ बातों का उल्लेख करना अप्रासंगिक  न होगा.

अपने एक निकटतम और घनिष्टतम रिश्तेदार जो हमारे लखनऊ आने के प्रबल विरोधी रहे है और हाल ही में एक वैवाहिक कार्यक्रम में लखनऊ पधारने पर हमारे घर भी आये थे और उस घटना का थोडा विवरण इस ब्लॉग में दिया जा चूका है उसका दोहराव न करते हुए इतना ही बताना आवश्यक है कि वे क्यों हमारे लखनऊ पुनः आने के विरोधी थे.हम उन  पर अविश्वास नहीं करते थे और इसी बात का नाजायज फायदा वे लोग उठा कर हमें नुक्सान पहुंचाते रहे और यहाँ आने पर उसकी पोल खुल गई,यही भय उन्हें सताता था.उनके छोटे दामाद और उनके घनिष्ठ मित्र (और भतीज दामाद) कुकू के भतीज दामाद दोनों साफ्टवेयर इंजीनियर हैं उनकी मदद से उन लोगों ने पोल खुलने से पूर्व हमारे ब्लाग्स से कुछ तस्वीरें आदि गायब करा दीं.हालांकि इससे उन्हें क्या लाभ हुआ हम अब भी नहीं समझ सके हैं.परन्तु निष्कर्ष निकलता है कि उन्होंने यह ट्रायल इसलिए किया होगा कि भविष्य में उनकी कारगुजारियों का उल्लेख होने पर वे ब्लाग से उसे चोरी से हटा सकें.यही नहीं उनकी छोटी बिटिया ने फेक आई डी बना कर कुछ ढुलमुल यकीन ब्लागर्स को हमारे विरुद्ध अनर्गल लिख कर भेजा जिसका उन पर प्रभाव भी पड़ा.एक ब्लॉगर साहब ने तो ई.मेल् भेज कर प्रश्न उठाया जब मैं ब्राह्मण नहीं हूँ तो ज्योतिष क्यों कर रहा हूँ?जब आगरा में था तो डा.बी.एम्.उपाध्याय,डा.वी.के.तिवारी,श्री एम्.एल.दिवेदी,पं.सुरेश पालीवाल ,इ.एस.एस.शर्मा आदि अनेकों जन्मगत ब्राह्मणों ने मुझ से ग्रह शान्ति और हवन करवाए थे;किसी ने भी मेरे गैर-ब्राह्मण होने का परहेज नहीं किया था.अब भी एक ब्राह्मण ब्लॉगर ने अपनी जन्म-पत्री का विश्लेषण मुझ से करवाया है.समय -समय पर मैं ज्योतिष संबंधी चेतावनियाँ इसी ब्लॉग में देता रहता हूँ. विमान एवं रेलों की दुर्घटनाएं और मुम्बई बम -विस्फोट उन विश्लेषणों के सही होने के प्रमाण हैं.लेकिन आरी में जब लकड़ी के हत्थे लगते हैं तब ही लकड़ी  कटती है उसी प्रकार जब अपने ही लोग मुखालफत करते हैं तब ही उसका असर होता है.यही सोच कर धूर्त-मंडली ने हमारे रिश्तेदार महोदय को मोहरा बना रखा है और वे बने आ रहे हैं.

वैसे तो उन साहब की मौसी के देवर श्री सतीश माथुर ने हमारे भाई अजय से बहुत पहले बहुत कुछ बताया था,लेकिन हम लोग समझते थे कि वे हमारे साथ अपनी कलाकारी नहीं दिखाएंगें जो हम लोगों की भारी भूल सिद्ध हुई और उसी गलती का खामियाजा अब तक भुगतते रहे.हमारे लखनऊ आने पर उन्होंने अपने इंजीनियर मित्र के अनुज लुटेरिय  तथा बाबूजी के एक वकील भतीजा का माध्यम लेकर हमें हर तरह से परेशान  करने का उपक्रम बना लिया.वे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हमने लखनऊ आकर भारी गलती की.क्योंकि अब यहाँ उनका अलीगढ़ का जादू फेल हो गया तो ओछे हथकंडों का सहारा लिया.यूं तो वे अपनी छोटी बेटी की शादी के समय से रिश्ते तोडना चाह रहे थे परन्तु अब लखनऊ आकर ऐसे करतब कर गए जिनके बाद (वे रिश्ते में सबसे छोटे और मैं सबसे बड़ा था इसलिए चुपचाप बर्दाश्त कर रहा था उन्हें लगता था वे अपने अमीर होने के नाते झुका रहे हैं) व्यर्थ में  अब और झुकना हमारे लिए भी मुश्किल हो गया.'एक बिल्ली की याचना भरी पुकार' लेख में उल्लेख सचित्र किया था कि बिल्ली के बच्चों को दूध इसलिए दिया कि वे ताकतवर होकर हमारे घर से चले जाएँ और वे पास में ही अन्यत्र चले गए.किन्तु दूध का दान (जरूरतमंद को देना दान ही है)हमारे लिए घातक  है.परिणामतः एक रोज(२७ जून २०११) तेज बारिश में ऊपर से कपडे लाते में मैं सीढ़ियों पर फिसलता चला गया.चोटें तो बहुत आईं,किन्तु अपनी वैज्ञानिक पूजा पद्धति के बल पर झेल गया और अपनी ही दवाओं से ठीक भी हो गया.१९८२ में कुकू और उसकी माँ ने भी मेरी हत्या करने का प्रयास किया था तब भी बच ही गया था इलाज करने वाले .डा.आर.के.टंडन ने उस एक्सीडेंट की पुलिस में रिपोर्ट करना चाहा था परन्तु बाबूजी ने ही पता नहीं क्यों उन्हें रोक दिया जो आगे के लिए बहुत घातक सिद्ध हुआ.इन लोगों ने हमेशा कुक्कू परिवार को फायदा पहुंचाने का प्रयत्न किया है.कोशिश तो इन लोगों ने यशवन्त को भी मुझ से अलग करने की बहुत की.नाकामयाब रहने पर उसे क्षति पहुंचाने के नित नए प्रयास खुद और अपनी बेटी-दामाद के माध्यम से करते रहते हैं.मैं किसी को नुक्सान नहीं पहुंचाता इसलिए खुद भी नुक्सान उठाने से बच ही जाता हूँ.२७ दिसंबर२०१०  को पूनम भी सीढ़ियों से रात में गिर गईं थीं इसी प्रकार तब भी उपचार किया था. अभी ०८ जुलाई को रात के समय बिल्ली और उसके बच्चों पर बिलौटा ने हमला कर दिया वे सब हमारे घर की छत पर आ कर बचाव की गुहार करने लगे.बिलौटा को भगाया तो वह भागते समय दीवार पर बैठे बिल्ली के दोनों काला व भूरा बच्चों पर कूदता हुआ गया.काला वाला हमारे घर की छत पर गिरा उसे कम चोट लगी यशवन्त ने तो उसे हाथ का सहारा देकर रोका और २० फुट नीचे गिरने से बचा लिया, किन्तु भूरा वाला दुसरे के घर की नीची छत पर गिरा उसके पिछले दोनों पैरों में गंभीर चोटें आ गईं.पहले पूनम ने उसकी रक्षा हेतु खुद स्तुतियाँ कीं फिर मुझे भी करने को कहा.हालांकि वे सब दुसरे के घर पर डेरा डाले थे परन्तु उनके जीवन की रक्षार्थ सफल प्रार्थना हम लोगों ने की और अब वह बिल्ली बच्चा भी ३० फुट ऊपर-नीचे चढ-उतर जाता है.हमारी वैज्ञानिक और पोंगा-पाखण्ड रहित पूजा पद्धति का मखौल ब्लॉग जगत में खूब हुआ है किन्तु प्रत्येक प्राणी का कल्याण केवल उसी से संभव है;ढोंग वाली विकृत पद्धति जिसका पालन ज्यादातर लोग करते हैं केवल लूट और शोषण का रक्षण करती है.अफ़सोस है कि पढ़े-लिखे विद्वान और उच्चाधिकारी भी इंसान की बनाई मूर्तियों को पूजते तथा घंटे बजा कर गौरान्वित होते हैं.27 जूलाई से हमने 'जन हित मे' एक नए ब्लाग के माध्यम से कुछ स्तुतियों को सार्वजनिक करना भी प्रारम्भ किया है .

लखनऊ वापिसी का लाभ इतना ही है कि हमें इंटरनेट में ब्लॉग के माध्यम से अनेकों विद्वानों के विचारों को जानने का मौका मिला उनमें से कुछ से व्यक्तिगत मुलाक़ात भी हुई और अनुभव अच्छा रहा.इस वर्ष लखनऊ में 'आल इण्डिया स्टुडेंट्स फेडरेशन ' के ७५ वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में एक समारोह अमीनाबाद के गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल में संपन्न होने जा रहा है.व्यक्तिगत रूप से उसमें भाग लेने का अवसर मिल रहा है,यदि अभी आगरा में रहता तो मेरे लिए यहाँ आकर भाग लेना मुमकिन नहीं हो पाता.हमारे वे रिश्तेदार कहते हैं सम्मान से पेट नहीं भरता है मुफ्त में इंटरनेट पर सलाह देना बंद करो.उम्र और रिश्ते में छोटे होकर वे हमें बेढंगा उपदेश देते हैं.पेट तो भिखारी  और जानवर भी भर लेते हैं किन्तु उनका मान-सम्मान क्या  है?


मनोज कुमार जी,डा.दराल साहब,डा.डंडा लखनवी जी  सरीखे विद्वान जब अपनी टिप्पणियों में सराहना करते हैं तो हम समझते हैं कि हमारा लिखना सार्थक है.धन तो टिकाऊ होता नहीं है ये सद्भावनाएं हमारे लिए  अमूल्य निधि हैं.