Saturday, May 17, 2014
ज्योतिष वाला 'क्रांतिस्वर' ,ये बेवकूफ कौन है?
केजरीवाल भक्त के वचन :
दीवार पर लिखा कुछ को दीख जाता है और कुछ देख कर अनदेखा कर जाते हैं लेकिन दीवार के उस पर क्या लिखा है ? या क्या लिखा जा रहा है? अक्सर सबको न दीख सकता है और न समझ आ सकता है। दीवार के उस पार क्या है ? क्या हो रहा है? क्या हो सकता है? जैसी बातें निसंकोच कह देने वाला इन पंक्तियों का लेखक ही वह बेवकूफ है।
विगत 01 मई को मजदूर दिवस की गोष्ठी के अवसर पर भाकपा कार्यालय में अनौपचारिक वार्ता के दौरान इन पंक्तियों के लेखक ने जिलामंत्री व दोनों सह-जिलामंत्रियों की उपस्थिती में पश्चिम बंगाल में सुश्री ममता बनर्जी की पार्टी को 30-35 सीटों की प्राप्ति का संकेत दिया था और उनको वस्तुतः 34 सीटें प्राप्त हो गई हैं। जबकि अन्य कामरेड्स का दृष्टिकोण था कि वांम -मोर्चा 24 सीटें जीतने जा रहा है जो वस्तुतः 02 सीटों पर सिमटा। संदर्भित आलेख में अब संभावित पी एम का भी विश्लेषण है जो अभी गलत प्रतीत होता है परंतु दीवार के उस पार लिखा जब इस पार आएगा तभी बेवकूफी का खुलासा हो सकेगा।
इस बेवकूफ ने प्रदेश सचिव व राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य डॉ गिरीश (चंद्र शर्मा) जी से अनौपचारिक वार्ता में लगभग दो वर्ष पूर्व ज़िक्र किया था कि यदि वाम-मोर्चा ममता जी के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव लड़े तो काफी सफलता प्राप्त कर सकता है। जब एक महान केजरीवाल भक्त तक मुझको बेवकूफ घोषित करता है तो निश्चय ही विद्वान डॉ साहब ने भी उस कथ्य को मूर्खतापूर्ण ही माना होगा। लेकिन चुनाव परिणाम क्या कहते हैं?
इसी ब्लाग में 'एकला चलो रे' की तर्ज़ पर अनेकों लेखों के माध्यम से मैंने भारत में साम्यवाद के जन-प्रिय बनाए जाने के उपाए बताए हैं जिनकी खिल्ली प्रदेश का एक बड़ा पदाधिकारी खुले आम उड़ाता है। उक्त पदाधिकारी वस्तुतः राष्ट्रीयकृत बैंक का कर्मचारी है जो घोषित तो खुद को 'एथीस्ट' करता है परंतु तांत्रिक प्रक्रियाओं से वरिष्ठ नेताओं को 'सम्मोहित' किए रहता है। 20 वर्ष पूर्व भी एक सरकारी शिक्षक तांत्रिक प्रक्रियाओं से वशीभूत करके प्रदेश पदाधिकारी बन गया था और तब प्रदेश में पार्टी का विभाजन हो गया था। सरकारी और अर्द्ध-सरकारी कर्मचारियों को किसी प्रकार की सहानुभूति न तो आम जनता से होती है न ही छोटे कार्यकर्ताओं से अतः वे पार्टी को जनता से दूर बनाए रखने के उपक्रम करते रहते हैं। इन परिस्थितियों में वाम-पंथ का जो हश्र चुनावों में हुआ है वह अपरिहार्य था।
एक तरफ 'संसदीय साम्यवाद' को मानने वाले चुनाव से दूर रहेंगे दूसरी ओर 'संसदीय लोकतन्त्र' के आलोचक क्रांतिकारी सड़कों पर सक्रिय रह कर अपनी ऊर्जा व्यय करते रहेंगे जिनको नक्सलवादी,माओवादी,आतंकवादी कह कर सरकारें कुचलती रहेंगी। लेकिन सभी 'सर्वहारा क्रान्ति' का गुण-गाँन करते रहेंगे -यह सब केवल खुद को धोखा देने के अलावा कुछ नहीं है। जब मार्क्स के हवाले से 'धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह,ब्रह्मचर्य' का विरोध किया जाता है तथा पोंगापंडितवाद,ढोंग,पाखंड,आडंबर का विरोध करने का साहस नहीं दिखाया जाता है तभी तो धर्म के नाम पर अधर्म का बोलबाला रहता है जिसका ज्वलंत उदाहरण 2014 के ये संसदीय चुनाव हैं।
तब मार्क्स ने तो यह भी कहा था कि जब जिस देश में सम्पूर्ण औद्योगीकरण हो जाएगा और मजदूर का शोषण चरम पर होगा तब वहाँ 'सर्वहारा क्रान्ति' होगी और सर्वहारा की तानाशाही उत्पादन और वितरण के संसाधनो पर नियंत्रण करके 'प्रत्येक से उसकी क्षमता के अनुसार और प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार' अवसर व लाभ देगी। तो फिर एक कृषि-प्रधान देश रूस में 1917 में क्रांति क्यों की गई थी? वह तो सर्वहारा क्रांति थी भी नहीं वह तो कई दलों के मोर्चे की बोलेश्विक क्रान्ति थी। इसके नायक एक-दूसरे की काट-छांट में लगे रहे और धर्म न मानने के कारण जनता व कार्यकर्ताओं के शोषण से प्राप्त अवैद्ध धन का संग्रहण करते रहे वे असत्यगामी पार्टी नेता ही आज के रूस के पूंजीपति हैं। 1949 में कृषि-प्रधान देश चीन में भी साम्यवादी क्रांति कर दी गई जो आज 'स्टेट केपिटलिज्म' के रूप में चल रही है।
क्या खूब 'एथीस्ट' तर्क होते हैं कि मार्क्स की एक बात न मान कर अधीरता से क्रांति कर देते है जो बाद में असफल हो जाती है और दूसरी बात के गलत अर्थ लिए जाते हैं। मार्क्स ने कहीं भी धर्म के सद्गुणों का विरोध नहीं किया है। मार्क्स ने यूरोप में प्रचलित -'ओल्ड टेस्टामेंट' व 'प्रोटेस्टेंट' रूपी रिलीजन्स का विरोध किया था जो वाजिब था क्योंकि वे अधर्म थे न कि धर्म। इसी प्रकार हिन्दुत्व,इस्लाम आदि अधर्मी रिलीजन्स का विरोध किया जाना चाहिए न कि धर्म का। 'साम्यवाद' और 'मार्कसवाद' को जब तक वास्तविक धर्म पर नहीं चलाया जाएगा और मजहबों-रिलीजन्स के पोंगापंडितवाद,ढोंग,पाखंड,आडंबर का सार्वजनिक खंडन करके जनता को समझाया नहीं जाएगा तब तक फासीवादी /नाजीवादी शक्तियों को शिकस्त देना संभव ही नहीं है केवल शहादतें दे कर अपनी पीठ थपथपा लेने से क्रांति नहीं आएगी । जन-क्रांति के लिए जनता-जनार्दन के समक्ष जाना होगा केवल सरकारी कर्मचारियों को नेता बना कर उनके भरोसे क्रांति की जाएगी तो असफलता मिलना स्वभाविक है।
~विजय राजबली माथुर ©
इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।
Monday, May 12, 2014
कौन बनेगा प्रधानमंत्री ?---विजय राजबली माथुर
प्रायोजित भविष्यवाणी जो निश्चय ही गलत साबित होगी :
हिंदुस्तान-लखनऊ-03/04/2014 के इस स्कैन को पढ़ने हेतु डबल क्लिक करें।
इस प्रकार के प्रायोजित भविष्यवाणियों का कोई वैज्ञानिक आधार न होकर धनदाता की संतुष्टि मात्र होता है। 2004 के चुनावों में राजग गठबंधन के परास्त होने के बाद 'बाबाजी' नामक पत्रिका ने 15 दिनों के भीतर पुनः बाजपेयी साहब के पी एम बनने की भविष्यवाणी कर दी थी और खुद बाजपेयी साहब पत्रिका संचालक से मिलने पहुँच गए थे लेकिन क्या हुआ?
उपरोक्त मामले में लखनऊ से केवल राजनाथ सिंह व उनके छिपे हुये सहयोगी अभिषेक मिश्रा जी का ज़िक्र हुआ है बाकी उम्मीदवारों का कोई उल्लेख नहीं है। वाराणासी में मोदी की सफलता का कसीदा काढ़ा गया है जबकि वह पश्चिम क्षेत्र से आते हैं। उनके हितैषी मुलायम सिंह जी का ज़िक्र है जो पश्चिम उत्तर प्रदेश के हैं। इस श्रंखला में सुश्री ममता बनर्जी का कोई ज़िक्र नहीं है जो कि वस्तुतः पूर्व-क्षेत्र की वास्तविक प्रतिनिधि हैं।
11-04-2014 को दिया गया मेरा विश्लेषण:
Lucknow ·:08-22pm
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/671115686283744
इसकी पुष्टि मेरठ के ज्योतिषी साहब के विश्लेषण से भी होती है :
बहुत पहले मैंने यह विश्लेषण दिया था जिसे 23 फरवरी 2014 को दोबारा ब्लाग पर प्रकाशित किया था एक नज़र उसका भी अवलोकन कर लें :
~विजय राजबली माथुर ©
इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।
हिंदुस्तान-लखनऊ-03/04/2014 के इस स्कैन को पढ़ने हेतु डबल क्लिक करें।
इस प्रकार के प्रायोजित भविष्यवाणियों का कोई वैज्ञानिक आधार न होकर धनदाता की संतुष्टि मात्र होता है। 2004 के चुनावों में राजग गठबंधन के परास्त होने के बाद 'बाबाजी' नामक पत्रिका ने 15 दिनों के भीतर पुनः बाजपेयी साहब के पी एम बनने की भविष्यवाणी कर दी थी और खुद बाजपेयी साहब पत्रिका संचालक से मिलने पहुँच गए थे लेकिन क्या हुआ?
उपरोक्त मामले में लखनऊ से केवल राजनाथ सिंह व उनके छिपे हुये सहयोगी अभिषेक मिश्रा जी का ज़िक्र हुआ है बाकी उम्मीदवारों का कोई उल्लेख नहीं है। वाराणासी में मोदी की सफलता का कसीदा काढ़ा गया है जबकि वह पश्चिम क्षेत्र से आते हैं। उनके हितैषी मुलायम सिंह जी का ज़िक्र है जो पश्चिम उत्तर प्रदेश के हैं। इस श्रंखला में सुश्री ममता बनर्जी का कोई ज़िक्र नहीं है जो कि वस्तुतः पूर्व-क्षेत्र की वास्तविक प्रतिनिधि हैं।
11-04-2014 को दिया गया मेरा विश्लेषण:
Lucknow ·:08-22pm
नरेंद्र
मोदी की राजनीति व उनके शुभ समय की जोरदार चर्चाये चल रही हैं । NBT
द्वारा एक वर्ष पूर्व प्रकाशित उनकी जन्म कुंडली के अनुसार वह 64वें वर्ष
में चल रहे हैं अर्थात अपनी कुंडली के चौथे भाव में जहां 'गुरु' अपनी शत्रु
राशि में स्थित है। 'गुरु' का गुण यह भी है कि जहां जिस भाव में बैठता है
उसे 'नष्ट' करता है। उनके साथ ऐसा ही रहा भी है विवाहित होकर भी 'विधुर'
जैसा जीवन इसी 'गुरु' की कृपा रही है। अब पत्नी की घोषणा करके भी सुखों पर
हमलों को उन्होने आमंत्रित कर लिया है। जन्म लग्न में भी परस्पर शत्रु
'चंद्र'-'मंगल' स्थित हैं। ये सम्मिलित रूप से उनके मस्तिष्क को प्रभावित
कर रहे हैं जैसा कि उनकी कार्य प्रणाली व वक्तव्यों से सिद्ध होता है। लग्न
का चंद्र मस्तिष्क को व्यथित रखता है।
महादशा-अंतर्दशा उनको 'आर्थिक' लाभ पहुंचाने वाली है इसी लिए कारपोरेट घरानों ने उनके लिए लूट की पूंजी के पिटारे खोल दिये हैं। लेकिन उनके 'कर्म' भाव में बैठ कर 'शनि' उनके कर्मफल को नष्ट कर रहा है। संकेत साफ हैं। वह केवल मोहरा ही रहने वाले हैं सफलता उनसे कोसों दूर रहने वाली है।
महादशा-अंतर्दशा उनको 'आर्थिक' लाभ पहुंचाने वाली है इसी लिए कारपोरेट घरानों ने उनके लिए लूट की पूंजी के पिटारे खोल दिये हैं। लेकिन उनके 'कर्म' भाव में बैठ कर 'शनि' उनके कर्मफल को नष्ट कर रहा है। संकेत साफ हैं। वह केवल मोहरा ही रहने वाले हैं सफलता उनसे कोसों दूर रहने वाली है।
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/671115686283744
इसकी पुष्टि मेरठ के ज्योतिषी साहब के विश्लेषण से भी होती है :
बहुत पहले मैंने यह विश्लेषण दिया था जिसे 23 फरवरी 2014 को दोबारा ब्लाग पर प्रकाशित किया था एक नज़र उसका भी अवलोकन कर लें :
"अखबारी विश्लेषण से अलग मेरा विश्लेषण
यह है कि जन्म के बाद ममता जी की 'चंद्र महादशा' 07 वर्ष 08 आठ माह एवं 07
दिन शेष बची थी। इसके अनुसार 03 जूलाई 2010 से वह 'शनि'महादशांतर्गत
'शुक्र' की अंतर्दशा मे 03 सितंबर 2013 तक चलेंगी। यह उनका श्रेष्ठत्तम समय
है। इसी मे वह मुख्य मंत्री बनी हैं। 34 वर्ष के मजबूत बामपंथी शासन को
उखाड़ने मे वह सफल रही हैं तो यह उनके अपने ग्रह-नक्षत्रों का ही स्पष्ट
प्रभाव है।
इसके बाद पुनः 'सूर्य' की शनि मे
अंतर्दशा 15 अगस्त 2014 तक उनके लिए अनुकूल रहने वाली है और लोकसभा के
चुनाव इसी अवधि के मध्य होंगे। केंद्र (दशम भाव मे )'शनि' उनको 'शश योग'
प्रदान कर रहा है जो 'राज योग'ही है।
27 नवंबर 2012 को स्थगित रैली 16 फरवरी
2014 को लखनऊ में आयोजित करवाकर ममता जी ने संकेत दे दिया है कि यदि
मुलायम सिंह प्रकाश करात के फेर में फंसे रहे तो वह उनके सहयोग के बगैर
ही फेडरल फ्रंट की दिशा में बढ़ सकती हैं।यदि उत्तर-प्रदेश में ममता जी ने
मायावती जी से तालमेल बैठा लिया तो यहाँ भी उनको काफी मजबूती मिल जाएगी। सी पी एम में भाजपा के भगौड़ों को शामिल किए जाने से उसके भविष्य की दिशा का खुलासा हो चुका है। इस
सूरत में ममता बनर्जी के तर्क जनता को आसानी से ग्राह्य हो सकते हैं। सी
पी एम की शुतुरमुरगी चालें वामपंथ को जोरदार झटका दे सकती हैं। तब 'पाछे
पछताए होत क्या? जब चिड़ियाँ चुग गईं खेत' । अभी भी बहुत समय है कि सी पी एम
को छोड़ कर समस्त वामपंथ एकजुट होकर ममता बनर्जी के नेतृत्व में
भाजपा/कांग्रेस/आ आ पा को संयुक्त रूप से चुनावों में परास्त कर सकता है।
~विजय राजबली माथुर ©
इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।
Saturday, May 10, 2014
संसदीय लोकतन्त्र बचाना है तो 'कारपोरेट कम्यूनिज़्म' से बचना होगा ---विजय राजबली माथुर
वर्ष
2014 में हो रहे 16 वीं संसद के चुनावों की सबसे मत्वपूर्ण और यादगार बात
रहेगी-'कारपोरेट कम्यूनिज़्म' का अभ्युदय । मजदूरों की कमर तोड़ने व
कम्युनिस्ट आंदोलन को बाधित करने हेतु पहले 'कारपोरेट ट्रेड यूनियनिज़्म' को
खड़ा किया गया जिसके अंतर्गत मेनेजमेंट के नुमाइंदे ट्रेड यूनियन में घुस
कर अंदर से मजदूरों की एकता तोड़ देते थे फिर मेनेजमेंट समर्थक यूनियनें
बनने लगीं,उसके बाद जातिगत आधार पर अर्थात श्रमिक एकता छिन्न-भिन्न हो गई।
2011 मे कारपोरेट भ्रष्टाचार के संरक्षण तथा मजदूरों के शोषण को और तीव्र करने हेतु हज़ारे/केजरीवाल आंदोलन खड़ा किया गया जिसका परिणाम AAP/आ आ पा है जिसे JNU के प्रोफेसर एवं छात्र नग्न समर्थन दे रहे हैं और खुद को कम्युनिस्ट वामपंथी भी कह रहे हैं। आ आ पा की टीम संघी मानसिकता के लोगों का जमावड़ा है और उसे कम्युनिस्ट-वामपंथी 'बनारस' में कदमताल करते हुये समर्थन प्रदान कर रहे हैं। इनकी कोशिश बनारस के मुस्लिमों को मूर्ख बना कर केजरीवाल को वोट दिलवाना है जिससे मोदी की जीत सुगम हो जाये। CPM की केरल यूनिट में भाजपाइयों को शामिल करने के बाद अब प्रकाश करात साहब ने आ आ पा /केजरीवाल को अपने मोर्चे में शामिल करने का संकेत भी दे दिया है। यह है-'कारपोरेट कम्यूनिज़्म' का ज्वलंत उदाहरण।
यदि दिल्ली की सड़कों पर कभी कम्युनिस्टों का संघ से संघर्ष होगा तब इन क्रांतिकारी कम्युनिस्टों को संघियों के साथ-साथ कार्पोरेटी कम्युनिस्टों से भी संघर्ष करना होगा। चुनावों से दूर भागने के कारण 'संसदीय साम्यवाद' तब विफल होगा और कमांड सशस्त्र क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के हाथों में होगी जिनमें उतावले और अपरिपक्व लोग भी शामिल होंगे। ऐसी क्रांति को आज ही के दिन 10 मई 1857 के दिन प्रारम्भ हुई क्रांति की भांति कुचल देना शासकों के लिए बहुत आसान होगा। अतः 'संसदीय साम्यवाद' के समर्थकों को नितांत जागरूकता के साथ सजग रहना होगा।
***********************************************
उपरोक्त स्टेटस फेसबुक पर देने का आशय यह था कि समय रहते वस्तु-स्थिति से सबको परिचित करा दिया जाये। एक तरफ तो 'संसदीय साम्यवाद' को तेलंगाना संघर्ष के बाद ही अपना लिया गया है जिसके परिणाम स्वरूप 1952 के प्रथम चुनावों में कम्युनिस्ट पार्टी मुख्य विपक्षी दल बन कर उभरी थी। किन्तु दूसरी ओर आज संसद और विधानसभाओं/स्थानीय निकायों के चुनावों आदि में भागीदारी न करने के कारण संसदीय संस्थानों में कम्युनिस्टों की उपस्थिती नगण्य है। अतः क्रांतिकारी कम्युनिस्ट जो संख्या में चाहे जितने भी हों परस्पर संघर्ष रत रहते हुये सशस्त्र क्रान्ति के स्वप्न देखते रहते हैं।
सशस्त्र क्रांति वाले अपनी इस प्रकार की हरकतों के कारण सही उद्देश्य के बावजूद जनता का समर्थन नहीं हासिल कर सकते हैं। वहीं संसदीय लोकतन्त्र वाले संसदीय चुनावों से दूर रहने के कारण और अपने 'एथीस्ट वाद 'के चलते जनता में लोकप्रियता हासिल करने से वंचित रहते हैं। एथीस्ट्वादी 'धर्म' का विरोध करते हैं क्योंकि उनकी निगाह और ज्ञान के अनुसार पोंगापंडितवाद,ढोंग,पाखंड,आडंबर ही धर्म है।
'धर्म'=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।
इन सद्गुणों का महर्षि कार्ल मार्क्स ने किस पुस्तक में विरोध किया है?मार्क्स ने उस समय यूरोप में प्रचलित रोमन केथोलिक और प्रोटेस्टेंट रिलीजन्स का विरोध इसलिए किया है कि वे धर्म नहीं ढोंग-पाखंड-आडंबर हैं। उसी प्रकार हिन्दुत्व,इस्लाम आदि रिलीजन्स का भी विरोध किया जाना चाहिए किन्तु 'धर्म' का विरोध करने का औचित्य क्या है?धर्म वह है जो मनुष्य और मानव समाज को धारण करने हेतु आवश्यक है उसका विरोध करके कैसे मार्क्स वाद लागू किया जा सकता है?और यही वजह है इसके रूस में उखड़ने तथा चीन में 'विकृत' हो जाने की।
धर्म का विरोध करते हुये तथा खुद को नास्तिक-एथीस्ट घोषित करते हुये कम्युनिस्ट विद्वान व नेता गण ढोंग -पाखंड -आडंबर को गले लगाए रहते हैं तथा पोंगापंडितवाद का संरक्षण करते हैं। चाहे क्रांतिकारी हों अथवा संसदीय लोकतन्त्र के समर्थक कभी भी मार्कसवाद को सफल नहीं बना पाएंगे यदि 'धर्म' -वास्तविक पर नहीं चलेंगे तो।
क्रान्ति=क्रान्ति कोई ऐसी वस्तु नहीं होती जिसका विस्फोट एकाएक या अचानक होता है। बल्कि इसके अनंतर 'अन्तर'के तनाव को बल मिलता रहता है।
जैसे कि ब्रिटिश दासता में उत्पीड़ित होते-होते अंततः 22 जून 1857 को उनकी सत्ता को उखाड़ने का निश्चय करके तैयारी चल ही रही थी कि मंगल पांडे के बैरकपुर छावनी में विद्रोह करने व बलिदान देने से भड़के सैनिकों ने 10 मई को मेरठ छावनी से बगावत का बिगुल बजा दिया।'अपरिपक्वता' एवं उतावलेपन के कारण अधूरी तैयारी पर हुई क्रान्ति पारस्परिक फूट के चलते विफल हो गई।
यही भय आज भी विद्यमान है कि सशस्त्र क्रान्ति के पक्षधर कम्युनिस्ट कहीं अधीरता व अपरिपक्वता के कारण असमय क्रान्ति का बिगुल बजा कर असफलता का वरन न कर लें। कम से कम नक्सलियों की कारगुजारियाँ तो ऐसे ही संकेत देती हैं।
अतः आज आवश्यकता इस बात की है कि संसदीय लोकतन्त्र के समर्थक व सशस्त्र क्रांति के समर्थक कम्युनिस्ट आपस में मिल कर रण-नीति व मोर्चा बनाएँ तथा वास्तविक धर्म को पहले खुद समझ कर फिर जनता को बेधड़क समझाएँ कि जिसे शोषकों-उतपीडकों द्वारा धर्म की संज्ञा दी जा रही है वह धर्म नहीं बल्कि ढोंग-पाखंड-आडंबर मात्र है। किन्तु क्या 'क्रान्ति' की बातें करने वाले कम्युनिस्ट समाज और जनता को वास्तविकता समझा पाएंगे जबकि वे खुद ही उलझे हुये हैं? तभी तो नया कारपोरेट कम्यूनिज़्म पनप रहा है।
2011 मे कारपोरेट भ्रष्टाचार के संरक्षण तथा मजदूरों के शोषण को और तीव्र करने हेतु हज़ारे/केजरीवाल आंदोलन खड़ा किया गया जिसका परिणाम AAP/आ आ पा है जिसे JNU के प्रोफेसर एवं छात्र नग्न समर्थन दे रहे हैं और खुद को कम्युनिस्ट वामपंथी भी कह रहे हैं। आ आ पा की टीम संघी मानसिकता के लोगों का जमावड़ा है और उसे कम्युनिस्ट-वामपंथी 'बनारस' में कदमताल करते हुये समर्थन प्रदान कर रहे हैं। इनकी कोशिश बनारस के मुस्लिमों को मूर्ख बना कर केजरीवाल को वोट दिलवाना है जिससे मोदी की जीत सुगम हो जाये। CPM की केरल यूनिट में भाजपाइयों को शामिल करने के बाद अब प्रकाश करात साहब ने आ आ पा /केजरीवाल को अपने मोर्चे में शामिल करने का संकेत भी दे दिया है। यह है-'कारपोरेट कम्यूनिज़्म' का ज्वलंत उदाहरण।
यदि दिल्ली की सड़कों पर कभी कम्युनिस्टों का संघ से संघर्ष होगा तब इन क्रांतिकारी कम्युनिस्टों को संघियों के साथ-साथ कार्पोरेटी कम्युनिस्टों से भी संघर्ष करना होगा। चुनावों से दूर भागने के कारण 'संसदीय साम्यवाद' तब विफल होगा और कमांड सशस्त्र क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के हाथों में होगी जिनमें उतावले और अपरिपक्व लोग भी शामिल होंगे। ऐसी क्रांति को आज ही के दिन 10 मई 1857 के दिन प्रारम्भ हुई क्रांति की भांति कुचल देना शासकों के लिए बहुत आसान होगा। अतः 'संसदीय साम्यवाद' के समर्थकों को नितांत जागरूकता के साथ सजग रहना होगा।
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उपरोक्त स्टेटस फेसबुक पर देने का आशय यह था कि समय रहते वस्तु-स्थिति से सबको परिचित करा दिया जाये। एक तरफ तो 'संसदीय साम्यवाद' को तेलंगाना संघर्ष के बाद ही अपना लिया गया है जिसके परिणाम स्वरूप 1952 के प्रथम चुनावों में कम्युनिस्ट पार्टी मुख्य विपक्षी दल बन कर उभरी थी। किन्तु दूसरी ओर आज संसद और विधानसभाओं/स्थानीय निकायों के चुनावों आदि में भागीदारी न करने के कारण संसदीय संस्थानों में कम्युनिस्टों की उपस्थिती नगण्य है। अतः क्रांतिकारी कम्युनिस्ट जो संख्या में चाहे जितने भी हों परस्पर संघर्ष रत रहते हुये सशस्त्र क्रान्ति के स्वप्न देखते रहते हैं।
सशस्त्र क्रांति वाले अपनी इस प्रकार की हरकतों के कारण सही उद्देश्य के बावजूद जनता का समर्थन नहीं हासिल कर सकते हैं। वहीं संसदीय लोकतन्त्र वाले संसदीय चुनावों से दूर रहने के कारण और अपने 'एथीस्ट वाद 'के चलते जनता में लोकप्रियता हासिल करने से वंचित रहते हैं। एथीस्ट्वादी 'धर्म' का विरोध करते हैं क्योंकि उनकी निगाह और ज्ञान के अनुसार पोंगापंडितवाद,ढोंग,पाखंड,आडंबर ही धर्म है।
'धर्म'=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।
इन सद्गुणों का महर्षि कार्ल मार्क्स ने किस पुस्तक में विरोध किया है?मार्क्स ने उस समय यूरोप में प्रचलित रोमन केथोलिक और प्रोटेस्टेंट रिलीजन्स का विरोध इसलिए किया है कि वे धर्म नहीं ढोंग-पाखंड-आडंबर हैं। उसी प्रकार हिन्दुत्व,इस्लाम आदि रिलीजन्स का भी विरोध किया जाना चाहिए किन्तु 'धर्म' का विरोध करने का औचित्य क्या है?धर्म वह है जो मनुष्य और मानव समाज को धारण करने हेतु आवश्यक है उसका विरोध करके कैसे मार्क्स वाद लागू किया जा सकता है?और यही वजह है इसके रूस में उखड़ने तथा चीन में 'विकृत' हो जाने की।
धर्म का विरोध करते हुये तथा खुद को नास्तिक-एथीस्ट घोषित करते हुये कम्युनिस्ट विद्वान व नेता गण ढोंग -पाखंड -आडंबर को गले लगाए रहते हैं तथा पोंगापंडितवाद का संरक्षण करते हैं। चाहे क्रांतिकारी हों अथवा संसदीय लोकतन्त्र के समर्थक कभी भी मार्कसवाद को सफल नहीं बना पाएंगे यदि 'धर्म' -वास्तविक पर नहीं चलेंगे तो।
क्रान्ति=क्रान्ति कोई ऐसी वस्तु नहीं होती जिसका विस्फोट एकाएक या अचानक होता है। बल्कि इसके अनंतर 'अन्तर'के तनाव को बल मिलता रहता है।
जैसे कि ब्रिटिश दासता में उत्पीड़ित होते-होते अंततः 22 जून 1857 को उनकी सत्ता को उखाड़ने का निश्चय करके तैयारी चल ही रही थी कि मंगल पांडे के बैरकपुर छावनी में विद्रोह करने व बलिदान देने से भड़के सैनिकों ने 10 मई को मेरठ छावनी से बगावत का बिगुल बजा दिया।'अपरिपक्वता' एवं उतावलेपन के कारण अधूरी तैयारी पर हुई क्रान्ति पारस्परिक फूट के चलते विफल हो गई।
यही भय आज भी विद्यमान है कि सशस्त्र क्रान्ति के पक्षधर कम्युनिस्ट कहीं अधीरता व अपरिपक्वता के कारण असमय क्रान्ति का बिगुल बजा कर असफलता का वरन न कर लें। कम से कम नक्सलियों की कारगुजारियाँ तो ऐसे ही संकेत देती हैं।
अतः आज आवश्यकता इस बात की है कि संसदीय लोकतन्त्र के समर्थक व सशस्त्र क्रांति के समर्थक कम्युनिस्ट आपस में मिल कर रण-नीति व मोर्चा बनाएँ तथा वास्तविक धर्म को पहले खुद समझ कर फिर जनता को बेधड़क समझाएँ कि जिसे शोषकों-उतपीडकों द्वारा धर्म की संज्ञा दी जा रही है वह धर्म नहीं बल्कि ढोंग-पाखंड-आडंबर मात्र है। किन्तु क्या 'क्रान्ति' की बातें करने वाले कम्युनिस्ट समाज और जनता को वास्तविकता समझा पाएंगे जबकि वे खुद ही उलझे हुये हैं? तभी तो नया कारपोरेट कम्यूनिज़्म पनप रहा है।
Sunday, April 20, 2014
रसोई गैस और रिलायान्स की लूट जनता की कमर गई टूट ---विजय राजबली माथुर
government had not withdrawn the notification on price hike....... "Reliance is arm-twisting fertiliser companies to sign agreements with it based on the increased price of $8.4 per mmbtu from April 1". He said the government is "conveniently looking the other way, even as fertiliser companies are being brow-beaten to sign this patently illegal agreement".
रिलायंस इंडस्ट्रीज समानांतर सरकार है : गोपालकृष्ण गांधी
ऊपर दिये गए दोनों लिंक्स पर दो ब्लाग्स में वे तथ्य सम्मिलित किए गए हैं जिनसे रिलायंस द्वारा जनता की लूट को समझने में आसानी होगी।
लखनऊ चिल्ड्रेन्स एकेडमी की प्राचार्या पारुल सिंह जी का यह कथन कितना यथार्थपरक है जिस पर ध्यान अवश्य ही दिया जाना चाहिए-"सरकार को निम्न वर्ग के बारे में भी सोचना चाहिए कि वह सिलेन्डर की तय संख्या से अधिक लेने पर रु 1300/-का सिलेन्डर कैसे लेगा?"
अभी भी सरकार ने 'आधार कार्ड' योजना को रद्द नहीं किया है और मामला सर्वोच्च न्यायालय में चल रहा है। इस देशद्रोही योजना के विरुद्ध केवल पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी ने ही आवाज़ उठाई है।
Petroleum Ministry has created a confusion to deprive the poor people. They have made AADHAAR CARD mandatory for disbursement of subsidy on LPG cylinder purchase. I am shocked with this decision.
रिलायंस तथा विदेशी कंपनियों को लाभ पहुंचाने हेतु बढ़ती लागत के आधार पर रसोई गैस के दाम लगातार बढ़ाए जाते रहे हैं दूसरी ओर कोयला तथा लकड़ी का प्रयोग 'पर्यावरण प्रदूषण' के नाम पर वर्जित किया गया है। आखिरकार गरीब वर्ग किस प्रकार अपनी रसोई में भोजन पकाएगा? इस ओर कौन सोचेगा? सरकार का कार्य क्या उद्योगपति/व्यापारी की सेवा करना और गरीब जनता का उत्पीड़न व शोषण करना है?2009 तक हम लोग आगरा में थे और अक्सर बस द्वारा मथुरा जाना होता था। फरह में मथुरा रिफायनरी के सामने से जब बस गुजरती थी तो साफ-साफ दिखाई देता था कि रिफायनरी में लगी चिमनी से लगातार आग की लपटें निकल रही हैं। ज्ञात यह हुआ कि सिलेंडरों के आभाव में लगभग 300 (तीन सौ) सिलेंडरों में भरने लायक गैस जला दी जाती है। वर्ष में 109500 (एक लाख नौ हज़ार पाँच सौ ) सिलेन्डर गैस अकेले मथुरा रिफायनरी से ही फूंकी जाती रही है। इस प्रकार देश की अन्य रिफायनरियों में भी गैस की बरबादी को जोड़ लिया जाये तो जितना ईंधन व्यर्थ नष्ट किया जा रहा है क्या उसे संचित करके ज़रूरतमन्द जनता को मुहैया नहीं कराया जा सकता है? रिफायनरियों के इंजीनियर अपने कमीशन के चक्कर में नई दूसरी कंपनियों को सिलेन्डर निर्माण की अनुमति नहीं देते हैं तथा पुरानी कंपनिये क्षमतानुसार ही तो निर्माण कर सकती हैं लेकिन नई कंपनियों को आने न देने में इंजीनियरों को प्रोत्साहित करती हैं। इस प्रकार ईंधन की अनावश्यक बरबादी,लूट खसोट जनता पर भारी पड़ती जा रही है।
'बुभिक्षुतम किं न करोति पापं' । यदि जनहित को यों ही नज़रअंदाज़ किया जाता रहेगा तो एक दिन भूखी जनता रिलायंस इंडस्ट्रीज पर टूट पड़ेगी और उसके समानान्तर साम्राज्य को उखाड़ फेंकेगी। अतः समय रहते सरकार को कम से कम रिलायंस की रिफायनरियों का राष्ट्रीयकरण करके,ईंधन की बरबादी रोक कर गैस की कीमतों में तत्काल कमी करनी चाहिए।
~विजय राजबली माथुर ©
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Tuesday, April 15, 2014
आधार की सूचनाएँ हो सकती हैं चोरी/आधार योजना रद्द कराने वाले को ही 'वोट' दें ---विजय राजबली माथुर
कारपोरेट के तीन दलाल - नीलकेनी,मोदी और केजरीवाल।
इन चुनावों में हराना है इन तीनों को हर हाल,हर हाल। ।
The UIDAI was set up by executive notification on 28th January, 2009 to be initially located in the Planning Commission. It was decided early on that the law would be thought about at some, indefinite, later date. A Bill was actually introduced only on 3rd December 2010, over two months after the UIDAI had begun to enroll and data base the citizenry. It happened even then only because many groups and individuals were insistent, demanding to know how a project that was collecting personal information, including fingerprints and iris, was proceeding without public discussion and parliamentary consideration. The Bill was referred to the Standing Committee on Finance which on 13th December 2011, which roundly rejected the Bill, and recommended that the project be sent back to the drawing board. What did the UIDAI do? They carried straight on with enrolment, and the law fell into a well of silence. When the Supreme Court began to hear cases that had been filed before it challenging the UID project, then it was that talk of a revised Bill was briefly revived, but it led to nothing. So, there is still no law, nothing to define the limits of the project and protect the citizenry against situations such as loss of the data, data theft, abuse by anyone gaining access to the data, and recognise the privacy interest of the individual.
http://www.kractivist.org/aadhaar-the-many-wrongs-of-an-unseemly-project-uid/
And so it goes on. No respect for law, for court orders, for the individual’s privacy. Using a technology that is uncertain and untested. Deploying coercion and compulsion. Making a business without our data. And more, much more. Such as creating a database that make surveillance, tagging, tracking so much simpler than it was. Such as handing over our data to foreign companies with close links with intelligence agencies including the CIA and Homeland Security in the US, and then saying, most amazingly (in an RTI) that they had no means of knowing that they were foreign companies! And, most unforgivably, causing a culture to emerge when every person will be presumed to be a potential wrongdoer and therefore with each person having to ensure that they are transparent to those who want to control us, and our actions.
The hard-earned gains of getting the state to be transparent by using the RTI is turned on its head, and it is now we who are to be transparent to the state and to whoever else has access to the data and in the many places where the number resides. This, we are told, is how the system is being set right. How much more irony can our democracy bear!
Usha Ramanathan
~विजय राजबली माथुर ©
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