Sunday, September 25, 2016

आएंगे उजले दिन जरूर आएंगे : कवि वीरेन डंगवाल की याद में संगोष्ठी





क़ैसर बाग,लखनऊ स्थित राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह के जयशंकर प्रसाद सभागार में कवि नरेश सक्सेना की अध्यक्षता में एक गोष्ठी का आयोजन 24 सितंबर,2016 को किया गया  था, जिसका कुशल संचालन डॉ चंद्रेश्वर ने  किया । डॉ चंद्रेश्वर ने  बीज वक्तव्य देते हुये यह भी बताया कि, हालांकि वीरेन  डंगवाल की कविताओं का रचनाकाल 1970 से माना जाता रहा है परंतु वह 1965 से ही कविताओं का सृजन कर रहे थे। 1967 के नक्सल बाड़ी आंदोलन का उनकी रचनाओं पर व्यापक प्रभाव रहा। अपने सम्बोधन में प्रोफेसर रवि भूषण ने अपनी खोज के आधार पर पुनः 1970 को ही उनके काव्य- सृजन का आधार वर्ष बताया जबकि नरेश सक्सेना साहब ने बताया कि, 1966-67 में 'आधार ' पत्रिका के लिए वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में वीरेन  डंगवाल से उनकी कवितायें मांगने गए थे और वह  वास्तव में 1965 से ही कवितायें लिख रहे थे। 
प्रोफेसर मैनेजर पांडे (फोटो सौजन्य से कौशल किशोर जी )

प्रोफेसर मैनेजर पांडे साहब ने बताया कि, झूठ और झूठ की व्यवस्था पूरे विश्व में हैजा व प्लेग के रूप में फैली हुई है तब ऐसे में वीरेंद्र डंगवाल सच के हामी के तौर पर उभरे। उनके अनुसार (1) कविता में जन का होना बहुत ज़रूरी है तभी कविता जंनतान्त्रिक होगी। (2 ) कविता की भाषा , संरचना,बनावटऐसी हो जो अधिकाधिक लोगों को समझ आए तभी वह जनतांत्रिक होगी। वीरेन  डंगवाल  की कविता में ये दोनों बातें है अतः वह जनतांत्रिक कवि थे। वह राजनीतिक चेतना व संवेदना के कवि थे। उनकी हर कविता में राजनीतिक धारा ज़रूर दीखेगी। 
प्रोफेसर रवि भूषण , रांची (फोटो सौजन्य से कौशल किशोर जी )

प्रोफेसर रवि भूषण साहब ने बताया कि, 19970 से 1995 के कार्यकाल में सार्थक और घातक दोनों प्रकार की कविताओं का सृजन हुआ है जबकि इसी कार्यकाल में वीरेन डंगवाल की कविताओं में संयम पाया जाता है। उनकी एक कविता की एक पंक्ति 'काफी बुरा समय है ' की व्याख्या करते हुये उन्होने बताया कि, 1980 तक का समय बुरा था तो उसके बाद का समय बहुत बुरा था। 1982 में इन्दिरा गांधी ने पहली बार विश्व बैंक से ऋण लिया था। 1984 में दूसरी बार इसलिए नहीं लिया कि, शर्तें बहुत कड़ी थीं और छह माह बाद ही उनकी हत्या कर दी गई थी। इसी आर्थिक प्रभाव का ही नतीजा था कि, पंजाब का खालिस्तान व कश्मीर का उग्रवाद आंदोलन सामने आए। 1966 में इन्दिरा के आगमन से जिस भ्रम का प्रारम्भ हुआ था अंततः वह 1975 में आपातकाल में परिणत हुआ। वीरेन   डंगवाल की कविताओं में इस कालक्रम का पूरा प्रभाव परिलक्षित होता है। 

गोष्ठी के सफल आयोजन का श्रेय कौशल किशोर जी का है। प्रमुख उपस्थित लोगों में डॉ गिरीश श्रीवास्तव,रवीन्द्र वर्मा, सुभाष राय, किरण सिंह,कात्यायनी,उषा राय, ताहिरा हसन, डॉ निर्मला सिंह, भगवान स्वरूप कटियार,आदियोग,डॉ रवीकान्त, ओ पी सिन्हा, विजय राजबली माथुर भी शामिल रहे।

Tuesday, September 20, 2016

ऐसे शासक ही चुने विवाद व विग्रह नहीं ------ विजय राजबली माथुर



September 15 at 6:22pm · 
बेहद ताज्जुब होता है जब फेसबुक पर विद्वानों को धर्म,ईश्वर,आस्तिक,नास्तिक,साधू,संत,सत्संग,भगवान आदि-आदि की निरर्थक बहस में उलझते देखता हूँ। वस्तुतः समस्या की जड़ है-ढोंग-पाखंड-आडंबर को 'धर्म' की संज्ञा देना तथा हिन्दू,इसलाम ,ईसाईयत आदि-आदि मजहबों को अलग-अलग धर्म कहना जबकि धर्म अलग-अलग कैसे हो सकता है? वास्तविक 'धर्म' को न समझना और न मानना और ज़िद्द पर अड़ कर पाखंडियों के लिए खुला मैदान छोडना संकटों को न्यौता देना है।
धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। 
भगवान =भ (भूमि-ज़मीन )+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I(अनल-अग्नि)+न (जल-पानी)
चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इसलिए ये ही खुदा हैं। 
इनका कार्य G(जेनरेट )+O(आपरेट )+D(डेसट्राय) है अतः यही GOD हैं।
साधू = जिसने अपने जीवन को साध लिया है वही साधू,रंगीन पोशाकधारी नहीं। 
संत= जिसने जीवन को संतुलित बना लिया हो और समाज के संतुलन हेतु प्रयास रत हो।
सत्संग= अच्छे लोगों का साथ देना न कि, ढ़ोल-मजीरा,चिमटा बजाना। 
ईश्वर = जो ऐश्वर्य सम्पन्न हो । क्या आज ऐसा कोई है? 
आस्तिक = जिसका अपने ऊपर विश्वास हो। 
नास्तिक = जिसका अपने ऊपर विश्वास न हो किसी दूसरे द्वारा निर्देशित हो। 
आत्मा = वह शक्ति- ऊर्जा -energy जो प्राणी शरीर को संचालित करती है। 
परमात्मा = वह अदृश्य शक्ति- अदृश्य ऊर्जा - unforeseen energy जो संसार की असंख्य आत्माओं को संचालित करती है। 
विज्ञान = किसी भी विषय का नियमबद्ध और क्रमबद्ध अध्यन न कि सिर्फ बीकर द्वारा प्रयोगशाला में सिद्ध करने की कला मात्र। 

इसी प्रकार हर विवाद का समाधान किया जाये तो समस्या ही न बचे तब इन विद्वानों की विद्वता का क्या मोल रह जाये इसलिए समाज में विवाद व विग्रह कायम रखे जाते हैं।
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/1169607073101267 




September 19, 2012 · 
गणेश=ग+ण+ईश =ज्ञान +मोक्ष +नायक =परमात्मा का वह स्वरूप जो ज्ञान और मोक्ष का प्रदाता है। यह शोर -शराबा तो अज्ञान और पाप का द्योतक है जो आज कल सड़कों पर दिखाई देता है।गण +ईश=गणेश =जननायक=राष्ट्रपति। राष्ट्रपति एवं जननायकों को गणेश जैसा होना चाहिए इस रूप का संदेश वही है। अर्थात शासक सुने सबकी (हाथी जैसे कान और सूंघने की सूंड जैसी शक्ति)और सब बातों को पचा कर रखने वाला हो जो करना हो वह कहे नही (खाने के दाँत और दिखाने के और)तथा पंच मार्गियों,देशद्रोहियों,आतंकियों को कुचल कर रखे -चूहे की सवारी का यही आशय है। ढोंग करने की अपेक्षा ऐसे शासक ही चुने यही इस पर्व का महत्व है।
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/412248028837179



श्राद्ध और तर्पण :
 जीवित माता-पिता-गुरु-सास-ससुर की इच्छा को श्रद्धा पूर्वक 'तृप्त' करना ही 'श्राद्ध- तर्पण ' है। उनकी आत्मा की तृप्ति के नाम पर ढ़ोंगी-पाखंडी को खिलाना केवल 'फ्लश 'के जरिये फिजूल की बरबादी है। 



 ~विजय राजबली माथुर ©
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Thursday, August 4, 2016

कायस्थ जो वर्णाश्रम व्यवस्था से ऊपर था गिर कर याचक कैसे बन गया ? ------ विजय राजबली माथुर




मानव काया से संबन्धित सम्पूर्ण शिक्षा देने वाला 'कायस्थ' आज इतना गिर गया है कि कभी अपने लिए नौकरियों में आरक्षण मांगता है, कभी राजनीतिक दलों से चुनाव में सीटें। जो कायस्थ वर्णाश्रम व्यवस्था से ऊपर होता था, समाज का दिग्दर्शक होता था वही आज दूसरों की नकल में याचक बना फिर रहा है। पतन की चरमावस्था है यह।

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1064128636982445&set=a.154096721318979.33270.100001559562380&type=3

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 पौराणिक-पोंगापंथी -ब्राह्मणवादी व्यवस्था मे जो छेड़-छाड़ विभिन्न वैज्ञानिक आख्याओं के साथ की गई है उससे 'कायस्थ' शब्द भी अछूता नहीं रहा है।
 'कायस्थ'=क+अ+इ+स्थ
क=काया या ब्रह्मा ;
अ=अहर्निश;इ=रहने वाला;
स्थ=स्थित। 
'कायस्थ' का अर्थ है ब्रह्म से अहर्निश स्थित रहने वाला सर्व-शक्तिमान व्यक्ति। 


आज से दस लाख वर्ष पूर्व मानव जब अपने वर्तमान स्वरूप मे आया तो ज्ञान-विज्ञान का विकास भी किया। वेदों मे वर्णित मानव-कल्याण की भावना के अनुरूप शिक्षण- प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई। जो लोग इस कार्य को सम्पन्न करते थे उन्हे 'कायस्थ' कहा गया। क्योंकि ये मानव की सम्पूर्ण 'काया' से संबन्धित शिक्षा देते थे  अतः इन्हे 'कायस्थ' कहा गया। किसी भी  अस्पताल मे आज भी जेनरल मेडिसिन विभाग का हिन्दी रूपातंरण आपको 'काय चिकित्सा विभाग' ही लिखा मिलेगा। उस समय आबादी अधिक न थी और एक ही व्यक्ति सम्पूर्ण काया से संबन्धित सम्पूर्ण जानकारी देने मे सक्षम था। किन्तु जैसे-जैसे आबादी बढ़ती गई शिक्षा देने हेतु अधिक लोगों की आवश्यकता पड़ती गई। 'श्रम-विभाजन' के आधार पर शिक्षा भी दी जाने लगी। शिक्षा को चार वर्णों मे बांटा गया-

1- जो लोग ब्रह्मांड से संबन्धित शिक्षा देते थे उनको 'ब्राह्मण' कहा गया और उनके द्वारा प्रशिक्षित विद्यार्थी शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत जो उपाधि धारण करता था वह 'ब्राह्मण' कहलाती थी और उसी के अनुरूप वह ब्रह्मांड से संबन्धित शिक्षा देने के योग्य माना जाता था। 
2- जो लोग शासन-प्रशासन-सत्ता-रक्षा आदि से संबन्धित शिक्षा देते थे उनको 'क्षत्रिय'कहा गया और वे ऐसी ही शिक्षा देते थे तथा इस विषय मे पारंगत विद्यार्थी को 'क्षत्रिय' की उपाधि से विभूषित किया जाता था जो शासन-प्रशासन-सत्ता-रक्षा से संबन्धित कार्य करने व शिक्षा देने के योग्य  माना जाता था। 
3-जो लोग विभिन व्यापार-व्यवसाय आदि से संबन्धित शिक्षा प्रदान करते थे उनको  'वैश्य' कहा जाता था। इस विषय मे पारंगत विद्यार्थी को 'वैश्य' की उपाधि से विभूषित किया जाता था जो व्यापार-व्यवसाय करने और इसकी शिक्षा देने के योग्य माना जाता था। 
4-जो लोग विभिन्न  सूक्ष्म -सेवाओं से संबन्धित शिक्षा देते थे उनको 'क्षुद्र' कहा जाता था और इन विषयों मे पारंगत विद्यार्थी को 'क्षुद्र' की उपाधि से विभूषित किया जाता था जो विभिन्न सेवाओं मे कार्य करने तथा इनकी शिक्षा प्रदान करने के योग्य माना जाता था। 

ध्यान देने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि,'ब्राह्मण','क्षत्रिय','वैश्य' और 'क्षुद्र' सभी योग्यता आधारित उपाधियाँ थी। ये सभी कार्य श्रम-विभाजन पर आधारित थे । अपनी योग्यता और उपाधि के आधार पर एक पिता के अलग-अलग पुत्र-पुत्रियाँ  ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और क्षुद्र हो सकते थे उनमे किसी प्रकार का भेद-भाव न था।'कायस्थ' चारों वर्णों से ऊपर होता था और सभी प्रकार की शिक्षा -व्यवस्था के लिए उत्तरदाई था। ब्रह्मांड की बारह राशियों के आधार पर कायस्थ को भी बारह वर्गों मे विभाजित किया गया था। जिस प्रकार ब्रह्मांड चक्राकार रूप मे परिभ्रमण करने के कारण सभी राशियाँ समान महत्व की होती हैं उसी प्रकार बारहों प्रकार के कायस्थ भी समान ही थे।

 कालांतर मे व्यापार-व्यवसाय से संबन्धित वर्ग ने दुरभि-संधि करके  शासन-सत्ता और पुरोहित वर्ग से मिल कर 'ब्राह्मण' को श्रेष्ठ तथा योग्यता  आधारित उपाधि-वर्ण व्यवस्था को जन्मगत जाति -व्यवस्था मे परिणत कर दिया जिससे कि बहुसंख्यक 'क्षुद्र' सेवा-दाताओं को सदा-सर्वदा के लिए शोषण-उत्पीड़न का सामना करना पड़ा उनको शिक्षा से वंचित करके उनका विकास-मार्ग अवरुद्ध कर दिया गया।'कायस्थ' पर ब्राह्मण ने अतिक्रमण करके उसे भी दास बना लिया और 'कल्पित' कहानी गढ़ कर चित्रगुप्त को ब्रह्मा की काया से उत्पन्न बता कर कायस्थों मे भी उच्च-निम्न का वर्गीकरण कर दिया। खेद एवं दुर्भाग्य की बात है कि आज कायस्थ-वर्ग खुद ब्राह्मणों के बुने कुचक्र को ही मान्यता दे रहा है और अपने मूल चरित्र को भूल चुका है। कहीं कायस्थ खुद को 'वैश्य' वर्ण का अंग बता रहा है तो कहीं 'क्षुद्र' वर्ण का बता कर अपने लिए आरक्षण की मांग कर रहा है। 

शूद्रक लिखित संस्कृत नाटक 'मृच्छ्कटिक ' में  कायस्थों को निम्न जाति का वर्णन किया गया है और ब्राह्मणों का सहायक घोषित किया गया है। यह सब 'चित्रगुप्त' की संतान बताने की काल्पनिक  ब्राह्मणवादी कहानी ( जिसे कायस्थ शिरोधार्य कर रहे हैं )का दुष्परिणाम है । 



यह जन्मगत जाति-व्यवस्था शोषण मूलक है और मूल भारतीय अवधारणा के प्रतिकूल है। आज आवश्यकता है योग्यता मूलक वर्ण-व्यवस्था बहाली की एवं उत्पीड़क जाति-व्यवस्था के निर्मूलन की।'कायस्थ' वर्ग को अपनी मूल भूमिका का निर्वहन करते हुये भ्रष्ट ब्राह्मणवादी -जातिवादी -जन्मगत व्यवस्था को ध्वस्त करके 'योग्यता आधारित' मूल वर्ण व्यवस्था को बहाल करने की पहल करनी चाहिए।

 


~विजय राजबली माथुर ©
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Tuesday, July 12, 2016

जोजीला दर्रा का प्लेटिनम है कश्मीर समस्या की जड़ ------ विजय राजबली माथुर

श्रीनगर - लेह मार्ग पर 'द्रास क्षेत्र' में 'जोजीला' दर्रे के क्षेत्र में स्वर्ण से भी महंगी धातु 'प्लेटिनम' है जो 'यूरेनियम' के उत्पादन में सहायक है ही है कश्मीर विवाद की जड़। 

वस्तुतः 1857 की प्रथम क्रान्ति के बाद से ही ब्रिटिश साम्राज्यवादी फूट डालो और शासन करो की जिस नीति पर चलते आ रहे थे उसके बावजूद जब 1942 के भारत-छोड़ो आंदोलन, एयर-फोर्स व नेवी में विद्रोह तथा आज़ाद हिन्द फौज की गतिविधियों के कारण जब उनका टिके रहना मुश्किल हो गया तब नए साम्राज्यवादी सरगना यू एस ए ने भारत-विभाजन का सुझाव दिया जिस पर मेजर लार्ड ऐटली ने अपने प्रधान मंत्रित्व काल में अमल करते हुये पाकिस्तान व भारत दो स्वतंत्र देशों को सत्ता सौंप दी थी। पाकिस्तान तो तत्काल अमेरिकी प्रभुत्व में चला गया था किन्तु नेहरू जी ने गुट-निरपेक्ष आंदोलन के बैनर तले अमेरिका से दूरी बनाए रखी थी जिस कारण वह पाकिस्तान के माध्यम से भारत को परेशान करता रहा था। 1947 के बाद 1965 का संघर्ष भी उसी कड़ी में था और 1971 का बांग्लादेश व 1999 का कारगिल संघर्ष भी ।

जब जिया-उल-हक साहब की उपयोगिता अफगान समस्या के बाद समाप्त हो गई तब यू एस ए ने उनको अपने राजदूत की कीमत पर भी हवाई जहाज समेत उड़ा दिया था। ओसामा-बिन-लादेन के सफाये के साथ ही यू एस ए ने पाकिस्तान की सार्वभौमिकता को अमान्य कर दिया है। उसके लिए अब पाकिस्तान उपयोगी नहीं रह गया है विशेषकर तब जब मोदी के नेतृत्व में आर एस एस समर्थक सरकार भारत में गठित हो चुकी है। जब सरकार के माध्यम से भारत को अपने समर्थन में यू एस ए खड़ा देख रहा है तब पाकिस्तान के अस्तित्व का मतलब ही क्या रह जाता है? 


 इस वक्त पाकिस्तान को झुका कर यू एस ए भारत में मोदी की हैसियत को मजबूत करना चाहता है जिनकी सरकार का लोकप्रिय होना दीर्घकालीन अमेरिकी हितों के अनुरूप होगा। निकट भविष्य में पाकिस्तान के स्थान पर कई छोटे-छोटे देश सृजित करवा कर अमेरिका भारत की बहुसंख्यक जनता के दिलों में अपना राज जमा कर अपने देश के व्यापारिक हितों को ही साधेगा जबकि यहाँ की जनता को लगेगा कि वह यहाँ कि बहुसंख्यक जनता का हितैषी है और यह सब मोदी व उनकी सरकार के चलते संभव हुआ है। 


 इस बात की कोई सम्भावना नहीं है कि  मोदी साहब शास्त्री जी जैसी (1965 ) या इंदिरा जी जैसी (1971 ) दृढ़ता दिखाएंगे। तब तक भारत से नेहरू जी की  व्यावहारिक नीतियों का सफाया नहीं हुआ था और देश का स्वाभिमान कायम था। लेकिन 1975  में हुये देवरस-इन्दिरा 'गुप्त-समझौते' के तहत 1980 में इंदिराजी की पुनर्वापसी से देश में आर एस एस का जो प्रभाव बढ़ना शुरू हुआ था वह 1991 में मनमोहन सिंह के वित्तमंत्री बनने के साथ ही मजबूत होता गया तथा 13 दिन, 13 माह और 60 माह की ए बी वाजपेयी सरकारों के दौरान उसने शासन-प्रशासन और इंटेलीजेंस में तगड़ी पकड़ बना ली थी। मनमोहन सिंह जी का 120 माह का कार्यकाल आर एस एस की दोहरी खुशियों का था जिसमें सत्ता व विपक्ष उसके ही इशारे पर चल रहा था। मोदी के सत्तारोहण ( जिसमें मनमोहन सिंह जी का सक्रिय योगदान है ) से सत्ता तो सीधे-सीधे आर एस एस से ही प्रभावित है किन्तु अब विपक्ष को पुनः अपनी पकड़ में लाने हेतु आर एस एस तमाम तिकड़में एक साथ चल रहा है। आ आ पा के रूप में उसे एक नया राजनीतिक दल तो मिल ही चुका है पुराने क्षेत्रीय दलों जैसे सपा, बसपा आदि-आदि को अप्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहित करके आर एस एस राजनीति में व्यापक रूप से अपने पैर पसार रहा है। भारत में सर्वहारा (दलित ) वर्ग को व्हाईट हाउस की नीतियों के तहत मोदी के पीछे गुप-चुप ढंग से लामबंद किया जा रहा है। 


तमाम राजनीतिक विरोध के बावजूद इंदिरा जी की इस बात के लिए तो प्रशंसा करनी ही पड़ेगी कि उन्होंने अपार राष्ट्र-भक्ति के कारण कनाडाई,जर्मन या किसी भी विदेशी कं. को वह मलवा देने से इनकार कर दिया क्योंकि उसमें 'प्लेटिनम'की प्रचुरता है.सभी जानते हैं कि प्लेटिनम स्वर्ण से भी मंहगी धातु है और इसका प्रयोग यूरेनियम निर्माण में भी होता है.कश्मीर के केसर से ज्यादा मूल्यवान है यह प्लेटिनम.सम्पूर्ण द्रास क्षेत्र प्लेटिनम का अपार भण्डार है.अगर संविधान में सरदार पटेल और रफ़ी अहमद किदवई ने अनुच्छेद  '३७०' न रखवाया  होता  तो कब का यह प्लेटिनम विदेशियों के हाथ पड़ चुका होता क्योंकि लालच आदि के वशीभूत होकर लोग भूमि बेच डालते और हमारे देश को अपार क्षति पहुंचाते.अनुच्छेद ३७० को हटाने का आन्दोलन चलाने वाले भी छः वर्ष सत्ता में रह लिए परन्तु इतना बड़ा देश-द्रोह करने का साहस नहीं कर सके,क्योंकि उनके समर्थक दल सरकार गिरा देते,फिर नेशनल कान्फरेन्स भी उनके साथ थी जिसके नेता शेख अब्दुल्ला साहब ने ही तो महाराजा हरी सिंह के खड़यंत्र  का भंडाफोड़ करके कश्मीर को भारत में मिलाने पर मजबूर किया था .तो समझिये जनाब कि अनुच्छेद  ३७० है 'भारतीय एकता व अक्षुणता' को बनाये रखने की गारंटी और इसे हटाने की मांग है-साम्राज्यवादियों की गहरी साजिश.और यही वजह है कश्मीर समस्या की .साम्राज्यवादी शक्तियां नहीं चाहतीं कि भारत अपने इस खनिज भण्डार का खुद प्रयोग कर सके इसी लिए पाकिस्तान के माध्यम से विवाद खड़ा कराया गया है.इसी लिए इसी क्षेत्र में चीन की भी दिलचस्पी है.इसी लिए ब्रिटिश साम्राज्यवाद की रक्षा हेतु गठित आर.एस.एस.उनके स्वर को मुखरित करने हेतु 'अनुच्छेद  ३७०' हटाने का राग अलापता रहता है.इस राग को साम्प्रदायिक रंगत में पेश किया जाता है.साम्प्रदायिकता साम्राज्यवाद की ही सहोदरी है.यह हमारे देश की जनता का परम -पुनीत कर्तव्य है कि, वह सरकार की गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखे कि वह यू एस ए के मंसूबे न पूरे कर दे। 


अनुच्छेद 370 को समाप्त कराने की मांग उठाते रहे लोग जब सत्ता में मजबूती से आ गए हैं तब बिना पाकिस्तान के अस्तित्व के ही 'जोजीला'दर्रे में स्थित 'प्लेटिनम' जो 'यूरेनियम' के उत्पादन में सहायक है यू एस ए को देर सबेर हासिल होता दीख रहा है । अड़ंगा चीन व रूस की तरफ से हो सकता है और उस स्थिति में भारत-भू 'तृतीय विश्वयुद्ध' का अखाड़ा भी बन सकती है। देश और देश कि जनता का कितना नुकसान तब होगा उसका आंकलन वर्तमान सरकार नहीं कर सकती है तो क्या विपक्ष भी नहीं करेगा ? और जनता से तादात्म्य स्थापित करने का कोई प्रयास साम्राज्यवाद विरोधी खेमे की ओर से भी अभी तो नहीं हो रहा है अभी तो वही पुरानी लीक ही पीटी जा रही है जिसका इस देश कि जनता पर कभी भी कोई भी असर हो ही नहीं सकता है।

अफसोसनाक बात यह है कि साम्राज्यवाद विरोधी साम्यवाद/वामपंथ के हिमायती यू एस ए व आर एस एस के इस अभियान का कोई विकल्प न प्रस्तुत करके उनकी चालों का शिकार होते जा रहे हैं और अपने ही हाथों अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी चलाते जा रहे हैं। पोंगापंथ, ढोंगवाद/ब्रहमनवाद तेजी से अपनी पकड़ मजबूत करता जा रहा है और प्रगतिशीलता/वैज्ञानिकता के नाम पर जिस तरीके से उसका विरोध किया जाता है उससे उसे अत्यधिक मजबूती ही मिलती जाती है। आज जब जनता को वास्तविक धर्म का मर्म समझाये जाने कि ज़रूरत थी तब माकपा महासचिव उसी पोंगापंथ के पथ का अनुसरण करके अंततः अपने विरोधियों को ही शक्तिशाली बनाने का कार्य शुरू कर चुके हैं। आज शासन में  तो अब संभव ही नहीं  है  अतः विपक्ष में लाल बहादुर शास्त्री जैसे अदम्य साहसी नेता की परमावश्यकता है जो जनता का दिल जीत कर किसान,जवान और मजदूर के हितों का संघर्ष चला कर नेतृत्व कर सके। 






  ~विजय राजबली माथुर ©
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Wednesday, June 29, 2016

मौकापरस्ती की वजह से राज्यसभा के औचित्य पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं ------ केसी त्यागी

  


राज्यसभा के अस्तित्व पर बहस बेमानी

केसी त्यागी, वरिष्ठ जद-यू नेता First Published:28-06-2016 09:53:54 PMLast Updated:28-06-2016 09:53:54 PM



न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा: वृद्धा न ते ये न वदन्ति
धर्मं।/ नासौ धर्मों यत्र न सत्यमस्ति न तत्सत्यं यच्छलेनानुविद्धम्।।
राज्यसभा के प्रवेश द्वार पर लिखा महाभारत का यह श्लोक कहता है कि जिस सभा में वृद्धजन (अनुभवी जन) नहीं, वह सभा नहीं; जो धर्म की बात न कहें, वे वृद्धजन नहीं; जिसमें सत्य नहीं, वह धर्म नहीं और जो कपट से पूर्ण हो, वह सत्य नहीं। लेकिन विडंबना यह है कि आज देश में राज्यसभा के अस्तित्व पर ही प्रश्न उठाए जा रहे हैं।

किसी भी संघीय शासन में विधायिका का ऊपरी सदन सांविधानिक बाध्यता के चलते राज्य के हितों की रक्षा करने के लिए होता है। इसी सिद्धांत के चलते राज्यसभा का गठन हुआ है। राज्यसभा का गठन एक पुनरीक्षण सदन के रूप में हुआ है, जो लोकसभा द्वारा पास किए गए प्रस्तावों की समीक्षा करे। संविधान के अनुच्छेद-80 में राज्यसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 निर्धारित की गई है, जिनमें से 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं और 238 सदस्य राज्यों और संघ-राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधि होते हैं।

हालांकि, राज्यसभा के सदस्यों की वर्तमान संख्या 245 है, जिनमें से 233 सदस्य राज्यों और संघ राज्य-क्षेत्र दिल्ली व पुडुचेरी के प्रतिनिधि हैं और 12 राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत। राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाने वाले सदस्य ऐसे व्यक्ति होते हैं, जिन्हें साहित्य, विज्ञान, कला और समाजसेवा जैसे क्षेत्रों के संबंध में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव होता है। ये 12 मनोनीत सदस्य संसद में विशेषज्ञों की कमी पूरी करते हैं।

संविधान से राज्यसभा को दो ऐसे विशेषाधिकार प्राप्त हैं, जो लोकसभा के पास भी नहीं हैं। अनुच्छेद-249 के अंतर्गत राज्यसभा संसद को राज्य सूची के अंतर्गत सूचीबद्ध किसी भी विषय पर कानून बनाने के लिए प्राधिकृत कर सकता है। केंद्र और राज्य, दोनों में ही समान नई 'ऑल इंडिया सर्विसेज' बनाने का अधिकार संसद को राज्यसभा की ही मंजूरी से मिल सकता है। यह बात सही है कि राज्यसभा का गठन ब्रिटेन के 'हॉउस ऑफ लॉर्ड्स' से प्रेरित होकर किया गया था, पर यह उसकी तरह कमजोर बिल्कुल नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि इसके सांविधानिक विशेषाधिकार ही देश में संघीय साम्यावस्था और संतुलन बनाए रखने में अब तक असाधारण भूमिका निभाते आए हैं।

मोदी सरकार ऐसी पहली सरकार नहीं है, जिसे राज्यसभा में बहुमत न होने के कारण विभिन्न विधेयकों को पारित कराने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री ही ऐसे प्रधानमंत्री रहे हैं, जिन्हें अपने पूरे कार्यकाल के दौरान ऊपरी सदन में पूर्ण बहुमत प्राप्त रहा। ज्यादातर शासक दलों को राज्यसभा में बहुमत न होने के कारण मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। विपक्ष को भरोसे में न ले पाना यह सरकार की कमजोरी हो सकती है, लेकिन इस आधार पर किसी सदन को समाप्त करने का विचार अलोकतांत्रिक है। राज्यसभा वही काम कर रही है, जो उसे सौंपा गया था। किसी भी विधेयक के पास होने से पहले उस पर गहन चिंतन और वाद-संवाद होना चाहिए। संवाद-सहमति के माध्यम से कानून बनाए जाने चाहिए। इस संदर्भ में सरकार की भूमिका काफी अहम है और यह देखना उसकी जिम्मेदारी है कि किस प्रकार से हर पक्ष की जायज मांगों के आधार पर एक समावेशी विधेयक पास हो।

हमारे संविधान में 'चेक ऐंड बैलेंस' के सिद्धांत को आधार बनाया गया है। राज्यसभा को संविधान से मिला हुआ विशिष्ट दर्जा इसी का एक उदाहरण है। कुछ लोगों द्वारा केवल 245 सांसदों को राज्यसभा मान लेना उनके अल्प ज्ञान का सूचक है। भारत की संघीय व्यवस्था में राज्यसभा देश के हर राज्य और उसकी जनता का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था है। ऐसे में, इसे समाप्त करने की मांग उठाने वाले देश की संसद में राज्यों की अभिव्यक्ति को खत्म कर देना चाहते हैं। इस प्रकार की मांग अलोकतांत्रिक होने के साथ-साथ असांविधानिक भी है। जिन बीमारियों के आधार पर राज्यसभा के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न खड़े किए जा रहे हैं, उनसे तो देश का हर संस्थान ग्रसित है। बाकी सदनों में तो हालत और भी खराब है। राज्यसभा में कुछ ही नाम सामने आए हैं, जिन्होंने इसकी गरिमा को ठेस पहुंचाई है।

लेकिन उन दलों का क्या, जो टिकट ही पैसे लेकर देते हैं? कई बार तो उनकी सरकार भी बनती है। तो क्या लोकसभा और विधानसभा समेत ऐसी सभी संस्थाओं को भंग करके देश में संसदीय प्रणाली को ही खत्म कर देना चाहिए? या फिर समस्या का निदान निकालने की तरफ ध्यान दिया जाना चाहिए? आर्थिक और सामाजिक विधेयकों को, जिनका कि समाज व देश की उन्नति में दूरगामी असर पड़ सकता है, सिर्फ राजनीतिक विरोध के कारण बाधित करना उचित नहीं है। लेकिन जिसे बदलने की जरूरत है, वह तंत्र नहीं, बल्कि पक्षपातपूर्ण व परस्पर टकराव की राजनीति है।

विगत दिनों हुए राज्यसभा सीटों के चुनाव में विधायकों के क्रय-विक्रय, क्रॉस वोटिंग और वोट को खराब करने जैसी अनियमितताएं उजागर हुई हैं। इससे यह साफ हुआ है कि अवैध पूंजी और काले धन के इस्तेमाल से राजनीति की नैतिक पूंजी का तेजी से क्षरण हो रहा है। यह एक गंभीर विषय है, इस पर विस्तृत चर्चा होनी चाहिए। राजनीति को साफ करने के लिए सुधार के प्रयास तेज किए जाने चाहिए। इसके विपरीत देखने में आ रहा है कि राजनीतिक मौकापरस्ती की वजह से हर दिन किसी-न-किसी बहाने से राज्यसभा के औचित्य पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं। राज्यसभा की कार्य-प्रणाली पर बहस होनी चाहिए, बदलते राजनीतिक परिवेश में इसकी बदलती भूमिका पर भी चर्चा होनी चाहिए। लेकिन जो लोग इसके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं, क्या वे लोग किसी तरह की रचनात्मक बहस करने को तैयार हैं? या फिर इसी तरह की वाक्पटुता चलती रहेगी? चुनाव सुधार राजनीतिक दलों व चुनाव आयोग के बीच का विषय है। लेकिन इसके नाम से किसी संस्था को कैसे कठघरे में खड़ा किया जा सकता है? कुछ लोगों की गलतियों के लिए पूरी संस्था जिम्मेदार नहीं हो सकती।

हमारी संसद की पूर्णता दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) से है और किसी एक के साथ छेड़छाड़ करने का विचार रखना भी वास्तव में संविधान की आत्मा से खिलवाड़ होगा। संविधान की आत्मा को अक्षुण्ण रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट को संविधान से कई विशेषाधिकार प्राप्त हैं। उसी प्रकार, देश के संघीय ढांचे की आत्मा को बनाए रखने की जिम्मेदारी संविधान निर्माताओं ने राज्यसभा को सौंपी है, जिसे उसने अभी तक बखूबी निभाया है और उम्मीद यही है कि आगे भी वह इसका ईमानदारी से निर्वाह करती रहेगी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)
http://www.livehindustan.com/news/guestcolumn/article1-meaningless-debate-on-rajya-sabha-existence-541904.html





~विजय राजबली माथुर ©
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