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Tuesday, June 17, 2025

कांग्रेस का भविष्य: सोनिया-युग ------ Kanak Tiwari






(12) आज कांग्रेस यही बताने में मशगूल है कि यदि अंदरूनी संकट फोड़े की तरह फूट रहा हो तो उस पर सोनिया गांधी के हाथ ही मरहम लगा सकते हैं। लोग राजीव को उनके बुरे दिनों में इटली कांग्रेस का सरगना बताते थे। फिर भी उस परिवार से अपने संबंधों की डींग मारते अघाते नहीं थे। इटली से भारत आई नेहरू परिवार की बहू में कांग्रेस-रक्त होने से उनकी विश्वसनीयता और अनुकूलता इस कदर बढ़ी कि अच्छे से अच्छे अखाड़ची कांग्रेसी को विनय की मुद्रा में उनसे मिलने 10, जनपथ अपने राजनीतिक वजूद को बचाए रखने के लिए जाना पड़ता है। लोकसभा के चौदहवें चुनाव में सोनिया के समर्थन में दिया गया जन-ऐलान राजनीतिज्ञों और मीडिया सहित विदेशियों को भी चकित कर गया। ‘फील गुड‘ के निर्माता और ‘इंडिया शाइनिंग‘ के निर्देशक ‘फील बैड‘ करते अंधेरे में एक दूसरे की शूटिंग करते रहे। 10 जनपथ नई कांग्रेसी राजनीतिक संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण गवाह, खिलाड़ी और हस्ताक्षर है। 
मूल प्रश्न ये हैं:
(13) नेतृत्व को लेकर सोनिया गांधी निस्सन्देह वह ’फेवीकोल’ हैं जिससे पूरी पार्टी के टूटते हाथ पांव जुड़ जाते हैं। लेकिन कांग्रेस की आत्मा कहां है? स्वदेशी का विरोध, विचारों की सफाई, वंशवाद की बढ़ोत्तरी, समाजवाद का खात्मा, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का समर्थन और पश्चिमी अपसंस्कृति के सामने समर्पण करने के बाद कांग्रेस और अन्य दक्षिणपंथी पार्टियों में क्या फर्क रह जाता है? सड़क पर यदि कांग्रेस और भाजपा के दो कार्यकर्ता चलें, तो उन्हें देखकर कोई नहीं अलग अलग पहचान पाता, जबकि चार दशक पहले तक बात ऐसी नहीं थी। कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य भी गाहे बगाहे जीन्स और टी शर्ट्स पहनकर दूरदर्शन के झरोखों से जनता को निकट दर्शन देते हैं। पैन्ट कोट और विलायती सूट डांटे रहने का फैशन भी कांग्रेस में है। देहाती गंध की गमक लिए लाखों कांग्रेसी कार्यकर्ता अब दरी बिछाने वालों की जमात तक में शामिल नहीं हैं। अब तो उनके बदले शामियाना भंडार वाले कांग्रेस नगर रचने के ठेकेदार हो गये हैं। हर चीज अब बाजार से किराये पर है। पूरा मंच, शामियाना, खान-पान, विज्ञापन एजेन्सियों से ठेके में छपा साहित्य, ढोकर लाये गये श्रोता, भाषण पढ़ते अशुद्ध हिन्दी के नवजात प्रवाचक। ऐसा लगता है स्टूडियो में कांग्रेस-लीला नामक किसी फिल्म की शूटिंग हो रही है। 
(14) संघ परिवार पर कांग्रेस का तीखा आक्रमण तर्कसंगत है कि परिवार ने भारत की आज़ादी के लिए घरों में दुबक कर बैठने के अलावा कुछ नहीं किया। लेकिन आज खुद कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों में से कितनों ने अथवा उनके पूर्वजों ने आजादी के आन्दोलन में हिस्सेदारी की है? पराजय-विशेषज्ञ कांग्रेस की जीत की रणनीति बनाते हैं। जिन्होंने जीवन में कोई चुनाव नहीं लड़ा। जो अपने राज्य से एक वार्ड का चुनाव जीत नहीं पाते। जो लगातार हार रहे हैं। जो हारने के बावजूद राज्य सभा में आसानी से पहुंच जाते हैं, लेकिन दूसरों को नहीं जाने देते। जो आखिरी बार हार चुके हैं। ऐसे तत्व ने मिलकर कांग्रेस की अगली लोकसभा में जीत की गारन्टी करते रहते हैं। कांग्रेस कार्य समिति तथा प्रदेशों के कई शीर्ष नेता ऐसे भी हैं जिन्होंने कभी न कभी कांग्रेस छोड़ी भी है। इनमें से कई नेताओं ने तो इन्दिरा गांधी तक को धोखा दिया। फिर भी सोनिया गांधी उन पर विश्वास किए बैठी हैं। कांग्रेस अकेली पार्टी है जिसके संविधान में प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष पद एक ही व्यक्ति को दिए जाने के प्रावधान रचे गए हैं। जिस पार्टी में गांधी जैसा राज्य शक्ति की खिलाफत करने वाला नेता पैदा हुआ, उस पार्टी में खुले आम दिल्ली से लेकर पंचायतों तक वंशवाद की राजनीति चलाई जाती रही है। नेहरू गांधी परिवार ने यदि देश की सेवा की होगी तो कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों, मुख्यमंत्रियों, सांसदों और विधायकों के परिवार वालों को आम कांग्रेस कार्यकर्ता के ऊपर क्यों तरजीह दी जा रही है? पूरी पार्टी को कुछ परिवार क्यों जकड़े हुए हैं? 
(15) चाहे जो हो, मनमोहनसिंह को प्रधानमंत्री बनाया जाना सोनिया गांधी के यश के खाते की घटना नहीं हो सकती। कथित आर्थिक सुधारों का नायक जननायक नहीं होता। एक सेवानिवृत्त नौकरशाह के लिए इतनी पेंशन ठीक नहीं थी कि वह मूल वेतन से ही ज्यादा हो जाए। देश या कांग्रेस कोई घाटा उठाती ‘पब्लिक कम्पनी‘ नहीं रही है जिसका प्रबंधन विशेषज्ञ को इस भय के साथ सौंप दिया जाए, ताकि वह कम्पनी बीमार नहीं हो जाए। वह अर्थशास्त्र के अध्यापक की नौकरी नहीं बल्कि सेवा के अर्थ का अध्यापन है। मनमोहन सिंह ने ही वित्तमंत्री के रूप में वल्र्ड बैंक, गैट, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, निजीकरण जैसे शब्दों के अर्थ पढ़ाए हैं। सोनिया की विजय आक्रमण पर प्रतिरक्षा की विजय थी। विरोधाभास यह भी कि बहुलवादी संस्कृति में विश्वास करने वाली कांग्रेस एकल प्रचारक सोनिया तक कैद होकर रह गई। सोनिया गांधी इतिहास का भूकम्प नहीं हो सकतीं। वे अतिशयोक्ति अलंकार के काबिल भी नहीं हैं। हो सकता है मनमोहनसिंह को प्रधानमंत्री बनाने के पीछे कई राजनीतिक कारण भी रहे होंगे। 
 मनमोहन सिंह के बदले राजनीतिक व्यक्ति यदि प्रधानमंत्री होता तो पार्टी पतन के रास्ते पर शायद इस तेज़ी से नहीं जा पाती। एक गैरराजनीतिज्ञ, मनोनीत प्रधानमंत्री ने किसी अन्य लोकतंत्र में इस कदर अपना शिकंजा संगठन और सरकार पर नहीं कसा जैसा करतब भारत में हुआ। 
चुनावों में पराजय
(16) जनता ने 1989 के बाद कांग्रेस को केन्द्र की एकल सत्ता से बेदखल कर दिया। यह अलग बात है कि सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के कारण उसे पांच वर्ष सत्ता में रहने का राजनीतिक परिस्थितियों के कारण 1991 में अवसर मिल गया था और 2003 तथा 2008 में भी। लोकतंत्र में सत्तासीन होना ही कामयाब होना है। चुनावों में कांग्रेस का पतन फीनिक्स पक्षी की दंत-कथाओं की तरह उन तंतुओं से नहीं बना है, जिनमें पांच सौ बरस बाद भी शरीर के भस्म हो जाने पर राख से जी उठने की कालजयी कुदरती क्षमता होती है। सवाल उठता रहा कि आत्महंता और अहंकारी तथा अधकचरे कांग्रेसियों के हुजूम को किसी अनुशासित सेना में बदलने की शक्ति क्या कांग्रेस के नेतृत्व में बची रही है? सवाल उठता रहा कि भविष्य यानी वक्त एक निर्मम हथियार है। उसे कांग्रेसियों की गरदन से भी कोई परहेज़ नहीं है। क्या कांग्रेस आत्म प्रशंसा में गाफिल रही अथवा निराशा के महासमुद्र में विलीन होने को बेताब हो गई थी? क्या कांग्रेस के कर्णधार केवल उनके पूर्वजों के गौरवशाली इतिहास को ढोने लेकिन नहीं बांचने का दंभ लिए हुए मतदाताओं को घर की मुर्गी समझते रहेंगे?














  ~विजय राजबली माथुर ©
 

Friday, June 19, 2020

मंजुल भारद्वाज की कविताओं ने मोड़ा राजनैतिक बहस का रुख ! ------ सायली पावसकर ,रंगकर्मी

  
मंजुल भारद्वाज की कविताओं ने मोड़ा राजनैतिक बहस का रुख !




आपदा मनुष्य को एक नयी पहचान देती है। आज की विकट स्थिति ने समाज, मानव प्रकृति और व्यवस्था के असली चेहरे को उजागर किया है, ऐसी स्थिति आमतौर पर हमारे सामने नहीं आती और यह दुनिया के इतिहास में पहली बार है (कम से कम मेरे जीवन में मैंने इसे पहली बार देखा और अनुभव किया है) जहां सत्ता, संविधान, व्यवस्था, सामाजिक स्थिति, मानवी प्रवृत्ति के विभिन्न पहलू सामने आ रहें हैं।



आज, पूरे विश्व के सामने प्रकृति में हस्तक्षेप के परिणामस्वरूप, 'कोरोना' यह आपदा हमारे सामने है।  इस आपदा ने पूरी दुनिया में एक बड़ी आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक और मनोवैज्ञानिक तबाही का प्रभाव डाला है।  यह तबाही बिना किसी भेदभाव के सभी को प्रभावित कर रही है।  जीवन बचाने का संघर्ष सभी का अनवरत जारी है।



उत्पन्न हुई आपदा के कारण समाज में सभी लोग जिम्मेदारी से काम कर रहें हैं।  स्वास्थ्य कर्मी जान बचाने के लिए काम कर रहें हैं। जरूरतमंदों की मदद के लिए सेवार्थी संगठन कार्य कर रहें हैं। लेकिन मौलिक मानवी अधिकारों के लिए कौन लड़ रहा है? जो स्थिति उत्पन्न हुई है, उसकी जड़ में कौन जा रहा है?  उसका निष्पक्ष विश्लेषण कौन कर रहा है?



किसी आपदा से उभरने के लिए समेकित प्रयास की आवश्यकता है । आज हमारे पास कितना भी धन या विलासिता क्यों न हो, स्वास्थ्य सेवाएं और कल्याणकारी राज्य संस्थाएं बहुमूल्य संसाधन हैं और ऐसी आपदाओं के समय उनकी अपरिहार्यता सिद्ध होती है। आज काल इंसानों पर कहर ढा रहा है, लेकिन इस काल को इंसान ने स्वयं निर्माण किया है।  मानवता को नष्ट करनेवाला यह भूमंडलीकरण का भयावह काल है!



फासीवादी शासन और उनका शासक, लोकतंत्र का भीड़तंत्र में परिवर्तन होना, धार्मिक रंगों के साथ समाज को लगातार विभाजित करती पूंजीवादी दलालों की मीडिया, समाज संवेदनहीन हो रहा है, वहाँ "मानवता" अपनी अंतिम सांसे ले रही है । इन आपदाओं से निपटने के दौरान हमारी व्यवस्था की खामियां हमारे सामने आयी हैं।  अब मुख्य मुद्दा यह है कि क्या इन खामियों को नजरअंदाज किया जाए या उन्हें महत्वपूर्ण बिंदुओं के रूप में प्रस्तुत किया जाए।  इस तरह के और कई मुद्दे सामने आने हैं, लेकिन वे सामने नहीं आ पाते।



ऐसे समय में, कलाकार, रचनाकार, नाटककार और साहित्यकार इनकी विशेष भूमिका है, जहाँ वे अपनी कला को माध्यम बनाते हुए अपने साहित्य रचनाओं के माध्यम से हेतुपूर्ण मौलिक प्रश्न, मौलिक अधिकार और उद्देश्य प्रस्तुत करेंगे। कलासत्व को मानवता के लिए एवं विश्व के सौहार्द के लिए रचनेवाले सृजनकार शाश्वत विचार स्वरूप इस काल से लड़ते हैं । इसी भूमिका के लिए रंगचिंतक मंजुल भारद्वाज प्रतिबद्ध हैं ।



मजदूरों के साथ हो रहे इस घातक प्रकरण के बारे में सभी को सहानुभूति है । आज के परिस्थिति में भी मजदूरों के मुद्दे, उनके प्रश्न विकास के जुमलों में फंसे हैं। पहले ही मजदूरों कि यह हालत, उसपर उनके मौलिक अधिकारों का हनन, इससे यह स्पष्ट होता है कि, मजदूरों का इस यंत्रणा में कोई स्थान नहीं।



इस तथ्य से कोई इनकार नहीं करता है कि यह बीमारी ऊपरी और मध्यम वर्गों से शोषित-गरीब वर्गों तक फैल गई है।  फिर भी, गरीब और मजदूर, शोषित और पीड़ित हैं।  कुल मिलाकर, यह स्पष्ट है कि नव-उदारवादी व्यवस्था में, राजनैतिक क्षेत्र और समाज में श्रमिकों के लिए कोई सहवेदना नहीं बची है।  क्योंकि राजनैतिक कोष होने के बावजूद, मजदूर चलने के लिए मजबूर हैं।  भले ही धान के गोदाम भरे पड़े हैं, फिर भी भुखमरी होती है।  यह भूमंडलीकरण का भयावह सच है।



मंजुल भारद्वाज सर के अंदर बेचैनी थी, उनके अंदर का एक हिस्सा जहां विश्वास था, आस्था थी। उन्होंने इस तबाही में संसद, न्यायपालिका, इनके संवेदनहीनता को महसूस किया ।  सत्ता और पूंजीवादी व्यवस्था नग्न रूप में सामने आ गए। लॉकडाउन में प्रगतिशील, बुद्धिजीवी, परिवर्तनवादी, मध्यम वर्ग सभी घर में तालेबंद हैं।  लेकिन ये मजदूर जहां मार्ग दिखा, उस दिशा में चल रहें हैं, तेज धूप में भोजन और पानी के बिना।  क्योंकि वे सरकार की शर्तों पर जीने को तैयार नहीं हैं।  वे जानवरों की तरह नहीं रहना चाहते। वे नए तरीके खोज रहें हैं और यह उनका एक सचेत आंदोलन है।  यह नयी, अनोखी, अलग दृष्टि मंजुल जी की कविता से व्यक्त होती है।



जहां मध्यम वर्ग इस बात पर सहमत था कि थाली और ताली पिट कर, दीये जलाकर सब कुछ पहले जैसे हो जाएगा, वहां सरकार मजदूरों के पहल से हिल गई। मजदूरों ने सरकार को जवाबदेही के लिए मजबूर किया।



एकांत की परिधि को भेदते हुए यह कवि अपने जीवित होने का अर्थ तलाश रहा है।  वह मानवीय प्रवृत्ति, यथार्थ, संवेदनाओं, पाखंडी सत्ता और मृत्यु का वर्णन अपनी काव्य रचनाओ में उजागर करता है।



अपने ज़िंदा होने पर शर्मिंदा हूँ !

- मंजुल भारद्वाज



आजकल मैं श्मशान में हूँ

कब्रिस्तान में हूँ



सरकार का मुखिया हत्यारा है

सरकार हत्यारी है



अपने नागरिकों को मार रही है

सरकारी अमला गिद्ध है



नोंच रहा है मृत लाशों को

देश का मुखिया गुफ़ा में छिपा है



भक्त अभी भी कीर्तन कर रहे हैं

इस त्रासदी पर



देश की सेना पुष्प वर्षा कर रही है

बैंड बजा रही है



मैं हूँ जलाई और दफनाई

लाशें गिन रहा हूँ



रोज़ ज़िंदा होने की

शर्मिंदगी महसूस कर रहा हूँ



क्या क्या गुमान था

कोई संविधान था



कोई न्याय का मंदिर था

एक संसद थी



कभी एक लोकतंत्र था

आज सभी मर चुके हैं



ज़िंदा है सिर्फ़ मौत !



मजदूरों के सत्याग्रह ने जीवन संघर्ष की मशाल जलाई। इसने मृत लोकतंत्र को पुनर्जीवित किया।  आज, उन्होंने अपनी विवशता को अपना हथियार बना लिया है, मौत से लड़ रहें हैं। जीने के लिए, मानवता को जिंदा रखने के लिए !



अंतिम व्यक्ति लोकतंत्र की लड़ाई लड़ रहा है!

 - मंजुल भारद्वाज



भारतीय समाज और व्यवस्था का

अंतिम व्यक्ति चल रहा है



वो रहमो करम पर नहीं

अपने श्रम पर

ज़िंदा रहना चाहता है



व्यवस्था और सरकार

उसे घोंट कर मारना चाहती है

अपने टुकड़ों पर आश्रित करना चाहती है

उसे खोखले वादों से निपटाना चाहती है



अंतिम व्यक्ति का विश्वास

सरकार से उठ चुका है

उसे अपने श्रम शक्ति पर भरोसा है



जब भगवान, अल्लाह के

दरबार बन्द हैं

उनकी ठेकेदारी करने वाली

यूनियन लापता हैं

तब अंतिम व्यक्ति ने

अपनी विवशता को ताक़त में बदला है



मरना निश्चीत है तो

स्वाभिमान से जीने का संघर्ष हो

अंतिम व्यक्ति अपनी मंज़िल पर चल पड़ा है



वो हिंसक नहीं है

पुलिस और व्यवस्था की हिंसा सह रहा है

मुख्य रास्तों की नाका बन्दी तोड़

नए रास्तों पर चल रहा है



उसके इस अहिंसक सत्याग्रह ने

सरकार को नंगा कर दिया है

सोशल मीडिया, ट्विटर ट्रेंड के

छद्म को ध्वस्त कर दिया है

गोदी मीडिया को 70 महीने में

पहली बार निरर्थक कर दिया है



अंतिम व्यक्ति का

यह सविनय अवज्ञा आंदोलन है

लोकतंत्र की आज़ादी के लिए

वो कभी भूख से मर रहा है

कभी हाईवे पर कुचला जा रहा है

कहीं रेल की पटरी पर मर रहा है

पर अंतिम व्यक्ति चल रहा है



जब मध्यम वर्ग अपने पिंजरों में

दिन रात कैद है

तब भी यह अंतिम व्यक्ति

दिन रात चल रहा है



सरकार को मजबूर कर रहा है

अपनी कुर्बानी से मध्यम वर्ग के

ज़मीर को कुरेद रहा है



ज़रा सोचिए देश बन्दी में

यह अंतिम व्यक्ति लोकतंत्र के लिए

लड़ रहा है

यह गांधी की तरह

अपनी विवशता को

अपना हथियार बना रहा है

शायद गांधी को पहले से पता था

उसके लोकतंत्र और विवेक का

वारिसदार अंतिम व्यक्ति होगा !



गांधी ने कहा था, गांव की ओर चलो !  गांधी के इन शब्दों को आज मजदूरों ने सार्थक किया है।  गांधी का विचार है कि देश की वास्तविक प्रगति ग्रामीण विकास पर आधारित हो।  मजदूरों के इस सत्याग्रह ने बताया कि आत्मनिर्भरता की असली जड़ गांव में है।  (इसीलिए संकट के समय सभी लोग अपने गांव गए)।  यदि गांवों में शाश्वत विकास की जड़ें मजबूत होती, तो मजदूरों को अपने गांवों, घरों और परिवारों को छोड़कर परजीवी शहरों में आने की आवश्यकता ही नहीं होती।



उपरोक्त कविता की रचना उसी अंतिम व्यक्ति के बारे में है, जो गांधी का अंतिम (हाशिये का व्यक्ति) व्यक्ति, कार्ल मार्क्स का सर्वहारा और अंबेडकर का शोषित व्यक्ति है।  गांधी ने इस हाशिये के व्यक्ति को राजनैतिक प्रक्रिया से जोड़ा और भारतीय लोकतंत्र को मजबूत बनाया। अंबेडकर ने जातिवाद के शोषण और शोषितों के दमन को उजागर किया। जन्म के संयोग को चुनौती दी और व्यवस्था में सहभागी होने के लिए समान अधिकार प्राप्त कराए।  कार्ल मार्क्स ने वर्ग संघर्ष की रूपरेखा को तोड़कर सर्वहारा की सत्ता को स्थापित करने का सूत्र दिया।



आज के इस दौर में जहां बाजारवाद, भूमंडलीकरण लोकतंत्र के मूल्यों को नष्ट कर रहा है, जहां समाज असंवेदनशील होकर तालियां और थालियां बजा रहा है, जहां जनप्रतिनिधि बुनियादी, कल्याणकारी सेवाएं प्रदान करने के बजाय केवल घोषणा कर रहें हैं, वहां मजदूर गांधी के अहिंसा के मार्ग का अनुसरण कर रहें हैं।  इस विचार को ध्यान में रखते हुए, मंजुल भारद्वाज जैसे रचनाकार अपने कार्यों से न्याय, समता और समानता के मूल्यों को भारतीय लोकतंत्र के जड़ों से जोड़  कर नए राजनैतिक सूत्रपात को प्रस्थापित कर रहें हैं।



इन मुद्दों का यहां पूरी तरह से विश्लेषण हो, कि जीन मजदूरों के नाम पर इतने सारे ट्रेड यूनियन और मजदूर यूनियन खड़े हैं, वे श्रमिकों में इस दृष्टि को जागृत करने और उन्हें अपनी ताकत का एहसास कराने में सक्षम नहीं हो पाए। "यूनियन" मालिकों और सरकार से लड़ती है।  मजदूर यूनियन पेंशन और अधिकारों के लिए लड़ती है। पैदल चलते इस सत्याग्रह की शुरुआत किसी ने नहीं की थी। घर जाने की उनकी प्रतिबद्धता, यह उनके होने की और उनके सुरक्षा की प्राथमिकता थी।  इसीलिए ये मजदूर बिना किसी आंदोलन या मोर्चा के संगठित हुए।



भारत आत्मनिर्भर था जब गांव समृद्ध थे। गांव के किसान आज भी विश्व के पोषणकर्ता हैं। राजनैतिक वर्चस्ववाद ने, अपने विकास को बेचने के लिए नव उदारवादी विचारों से शहर निर्माण किए। परजीवी शहरों ने भूमंडलीकरण के बाजारों को सींचा। आजभी अपने गांव स्वावलंबी हैं। हमारे सत्ताधीश जिस आत्मनिर्भरता की बात कर रहें हैं, उनका खोखलापन और भाषणबाजी की निरर्थकता को दर्शाने वाली यह रचना .. 



क्रूर मज़ाक और मौन भारत!

-       मंजुल भारद्वाज



थोथा चना बजा घना



मज़दूरों की मौत

मज़दूरों का पलायन

और

‘आत्म निर्भर भारत’

मोदी का क्रूर मज़ाक !



अंतर जान लीजिये

संसाधन हीन मज़दूर

साधन सम्पन्न मोदी

संकल्प हीन मोदी

संकल्पबद्ध मज़दूर



रस्ते पर बच्चे को

जन्म देती माँ

ग़रीबों को बच्चों को

मौत देता मोदी



श्रमिकों को बर्बाद करने के लिए

12 घंटे का बंधुआ गुलाम बनाता मोदी

पूंजीपतियों को 20लाख करोड़



मज़दूर रस्ते पर पैसे पैसे को मोहताज़

संकट काल में

देश में निर्मित चप्पल पर

चलता आत्म निर्भर भारत



मौन भारत ने आज

अपने टीवी पर

फिर सुना 

प्रधान का क्रूर मज़ाक है !





मैं पिछले कुछ दिनों से इस प्रणाली की कमज़ोरी को महसूस कर रही हूँ, हम सभी कोरोना के साथ अपने जुनून और अथक प्रयासों से लड़ रहें हैं।  लेकिन भूख, भय, भ्रम और मूल कारणों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय दिशा बदलने के कई प्रयास सामने आ रहें हैं।  संवेदनहीन होकर मन को परेशान करने वाले सवालों को अनदेखा नहीं कर सकते, उन्हें अपनी कला के माध्यम से, रचनाओं के माध्यम से, हम रंगकर्मी अभिव्यक्त कर रहें हैं,  इनपर चर्चा - विचार मंथन करके इन मुद्दों को एक सार्थक दिशा दे रहें हैं जिससे हम भी स्वस्थ रहें और विश्व भी।



सच हमेशा कड़वा होता है इसलिए सच्चाई को सवालों के स्वरूप में सामने रखना पड़ता है, जिसकी आज जरूरत है।  आज व्यवस्था के खोखलेपन पर प्रश्न उठाना आवश्यक है, क्योंकि यदि इन प्रश्नों का अब हल नहीं निकाला, तो वे अधिक भयानक रूप में सामने आएंगे।  इसलिए मेरे लिए इन सवालों को स्वीकारना और इनका सामना करना बहुत सकारात्मक है।  इन कविताओं के माध्यम से, कवि हम सभी से पूछता है कि हम इन सवालों में, यथार्थ में, न्याय और समता के कलात्मक रंगकर्म में और मजदूरों के संघर्ष में कहां हैं ?



रंगचिंतक मंजुल भारद्वाज ऐसे नाटककार हैं जो प्रश्न उपस्थित करते हैं और सभी को उत्तर खोजने के लिए प्रेरित करते हैं।  पैदल चलते श्रमिकों ने अपने कृति के माध्यम से कई सवाल उठाए हैं। उन्ही प्रश्नों के माध्यम से व्यवस्था को जगाने के लिए वे निरंतर कार्यरत हैं।



समाज की इस फ्रोज़न स्टेट को तोड़ने के लिए, रंगचिंतक मंजुल भारद्वाज की यह काव्यात्मक रचना -



मज़दूरों को पूछना चाहिए था!

 -  मंजुल भारद्वाज



मज़दूर और गरीब अपने आप

निर्णय नहीं ले सकते

उन्हें अपने मालिकों से

पूछना चाहिए था



मालिक से नहीं तो

अपनी चुनावी रैली में

ट्रकों और बसों में बिठाकर

भीड़ बनाने वाले नेताओं से

पूछना चाहिए था



नेताओं से नहीं पूछा तो

पढ़े लिखे सभ्य नागरिकों से

जो WHO की सलाह पर

सामाजिक दूरी जैसे

नस्लवादी, जाति वादी

नारे को प्रसारित कर थे

उनसे पूछना चाहिए था



हाथ धोने की सलाह का

प्रसार करने वाले मध्यमवर्ग से

पूछना चाहिए था



भगवान के बन्द दरवाजों पर जाकर

पूछना चाहिए था

सरकार को

समाज को सलाह देने वाले

बुद्धिजीवियों से

पूछना चाहिए था



समाज को आईना दिखाने वाले

मनुष्य के दुःख, सुख लिखने वाले

कवियों, साहित्यकारों

मनोरंजन के नाम पर

भावनाओं का व्यापार करने वाले

कलाकारों से पूछना चाहिए था



कमबख्त मजदूरों ने

किसी यूनियन के नेता से भी नहीं पूछा

बिना विचार किए

संगठन बनाए

निकल गए पैदल भूखे प्यासे

अपने घरों की ओर



कैसे कर सकते हैं मज़दूर ऐसे?

मज़दूरों ने बिना पूछे बगावत कर दी

इसका मलाल है

गहरा दुख है

समाज के ठेकेदारों को!



कैसे पुलिस के डंडे से

नहीं टूटे मज़दूर

भूख से मर गए

पर नहीं रुके मज़दूर

कट गए पर

नहीं रुके मज़दूर

खुद मरे

पर जुमला सरकार का

कफ़न बुन गए

अपने श्रम से

मरे हुए लोकतंत्र को

ज़िंदा कर गए

पैरों से बहते खून से

मज़दूर पूरे देश की सड़कों पर

इंकलाब लिख गए!



इन पैदल चलनेवाले मजदूरों ने बुद्धिजीवियों और परिवर्तनवादीयों के अहंकार को धराशाही कर दिया। नैतिक - सभ्य, सुसंस्कृत समाज को मानवीय भावनाओं से अवगत कराया, मृत समाज की आत्मा को जगाया। घर के पिंजरे में फंसे व्यक्ति को मानव होने का एहसास दिलाया। यह तय है कि कवि की कविता ने एक राजनैतिक सूत्रपात प्रस्थापित किया है जिसपर आज समाज चल रहा है। श्रमिकों के जीवन संघर्ष को देखने की दृष्टि बदल गयी। आज, देश इस कवि की रचना से प्रेरित है, और राजनैतिक परिवेश में इनकी क्रांतिकारी कविता पर चर्चा संवाद हो रहा है।



मजदूर संगठना और उनके प्रतिनिधि इस कविता के माध्यम से अपने राजनैतिक परिदृश्य का विश्लेषण कर रहें हैं। नाटककार - कलाकार वास्तव में मजदूरों के मुद्दों पर क्या समाधान है, इस पर संवाद कर रहें हैं। संपादक और पत्रकार मजदूरों के मुद्दों को प्रार्थमिकता दे रहें हैं। राजनैतिक कार्यकर्ता लोकतंत्र की अवधारणा को प्रस्तुत करते हुए इन कविताओं के आधार पर संवाद शुरू कर रहें हैं। संक्षेप में, समाज की जड़ता (मानसिकता) टूट रही है।



रंगकर्म, कला और राजनीति का सीधा संबंध है। मूल रूप से, कला और कलाकार विद्रोही है। रंगकर्म मूल रूप से एक राजनैतिक कर्म है। यहाँ कवि ने रचनाकार एवं नाटककार की भूमिका स्पष्ट की है। रंगकर्म सत्याग्रह है, सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध है।



सांस्कृतिक चेतना का दिया जलने के लिए अहिंसात्मक सत्याग्रह जैसे आज की घड़ी में मजदूर कर रहें हैं। राज्य प्रणाली नीतियों और नियमों को बनाती है और कला मनुष्य को मनुष्य बनाती है। रंगकर्मी, रचनाकार, साहित्यकार सत्ता द्वारा दी गई अवधारणाओं को स्वीकार करते हैं और रंग दृष्टि अवधारणाओं को तोड़ती है। रंगकर्म की भूमिका क्या है, इस रचना में लिखी है।



कला दृष्टिगत सृजन

राजनीति सत का कर्म!

-       मंजुल भारद्वाज



कला आत्म उन्मुक्तता की सृजन यात्रा

राजनीति सत्ता,व्यवस्था की जड़ता को

तोड़ने का नीतिगत मार्ग



कला मनुष्य को मनुष्य बनाने की प्रक्रिया

राजनीति मनुष्य के शोषण का मुक्ति मार्ग



कला अमूर्त का मूर्त रूप

राजनीति सत्ता का स्वरूप



कला सत्ता के ख़िलाफ़ विद्रोह

कला संवाद का सौन्दर्यशास्त्र

राजनीति व्यवस्था परिवर्तन का अस्त्र



कला और राजनीति एक दूसरे के पूरक

बाज़ार कला के सृजन को खरीदता है

सत्ता राजनीति के सत को दबाती है



जिसकी चेतना राजनीति से अनभिज्ञ हो

वो कलाकार नहीं



चाहे बाज़ार उसे सदी का महानायक बना दे

झूठा और प्रपंची सत्ताधीश



चाहे लोकतंत्र की कमजोरी

संख्याबल का फायदा उठाकर



देश का प्रधानमन्त्री बन जाए

पर वो राजनीतिज्ञ नहीं बनता



राजनीतिज्ञ सर्वसमावेशी होता है

सत उसका मर्म एवं संबल होता है



कलाकार पात्र के दर्द को जीता है

राजनीतिज्ञ जनता के दुःख दर्द को मिटाता है



कलाकार और राजनीतिज्ञ जनता की

संवेदनाओं से खेलते नहीं है

उसका समाधान करते हैं



कलाकार व्यक्ति के माध्यम से

समाज की चेतना जगाता है

राजनीति व्यवस्था का मंथन करती है



कला मंथन के विष को पीती है

राजनीति अमृत से व्यवस्था को मानवीय बनाती है



कला एक मर्म

राजनीति एक नीतिगत चैतन्य



दोनों एक दूसरे के पूरक

जहाँ कला सिर्फ़ नाचने गाने तक सीमित हो

वहां नाचने गाने वाले जिस्मों को



सत्ता अपने दरबार में

जयकारा लगाने के लिए पालती है



जहाँ राजनीति का सत विलुप्त हो

वहां झूठा,अहमक और अहंकारी सत्ताधीश होता हो



वहां जनता त्राहिमाम करती है

समाज में भय और देश में युद्धोउन्माद होता है



हर नीतिगत या संवैधानिक संस्था को

ढाह दिया जाता है



इसलिए

कला दृष्टि सम्पन्न सृजन साधना है

और

राजनीति सत्ता का सत है

दृष्टि का सृष्टिगत स्वरूप है

दोनों काल को गढ़ने की प्रकिया

दोनों मनुष्य की ‘इंसानी’ प्रक्रिया ...!



देश की सरहद पर दुश्मनों को खत्म करने वाले, सीमा पर अपना लहू बहाने वाले जवान और लहूलुहान कदमों से भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करने वाले, देश के भीतर के शत्रु को राष्ट्रहित का पाठ पढ़ाने वाले, दमनकारी सत्ता के खिलाफ लड़ने वाले मजदूर एक समान हैं। यह दृष्टि देने वाली रचना -



सरहद पर सैनिक और सड़क पर चलता मज़दूर

-       मंजुल भारद्वाज



1

दर्द की चाशनी में पगी

कविता लिखी जा रही है

खूब पढ़ी जा रही हैं

आभासी पटल पर वायरल हैं

पढने वाले दर्द से व्याकुल हो

खूब रो रहे हैं

कवि अभिभूत हैं !



2

कवि दर्द को पिरो

अपने असहाय होने की

गाथा लिख रहा है

अपनी निरर्थकता को

स्वीकार कर रहा है

प्रबुद्ध वर्ग इससे अभिभूत है!



3

पर दर्द सहने

दर्द देने वाले को

साफ़ साफ़ किस चश्में से

कौन कवि देख रहा है?

यह कविता से नदारद है

जैसे शरीर से रीढ़!



4

दर्द के यह शब्द बहादुर कवि

क्या बर्फ़ में पिघलते गलते

सैनिकों को भी लाचार

विवश,विचार हीन,मज़बूर

बताने की हिम्मत करेगें?

या

देश भक्ति में उनके

संघर्ष,साहस,वीरता का

वीर रस में गुणगान करेंगे

क्योंकि वो सरहद पर

दुश्मन से लड़ते हैं

पर

देश के अंदर

देश की सत्ता पर बैठे

संविधान और लोकतंत्र के विध्वंसक से

संघर्ष करने वाले मज़दूर

बदहवास हैं

लाचार हैं

विचार हीन हैं

क्यों?



रंगों का अर्थ, मर्म और अभिव्यक्ति का कर्म को समझने वाले ही "रंगकर्मी" हैं .. विवेक, समग्रता, शोषितों की पक्षधरता .. विकारों पर विचारों की विजय .. यही जीवन की दृष्टि है ... जब जीवन दृष्टि 'रंग' को 'कर्म' से आलोकित करती है तब कलात्मक संवेदनाओं से समानता और न्याय की दृष्टि निर्माण होती है!

- मंजुल भारद्वाज



मंजुल भारद्वाज की काव्यरचना भारतीय लोकतंत्र और राजनीति के परिपेक्ष में गहरा प्रभाव डाल रही है। जिससे संविधान की जड़ें और मजबूत बनेंगी यह सुनिश्चित है।



बदलाव के लिए एक वैचारिक चिंगारी अनिवार्य है। इस वैचारिक चिंगारी को "थिएटर ऑफ़ रेलेवेंस" नाटक सिद्धांत  विगत 28 वर्षों से लोगों के मन में उद्वेलित कर रहा है। हाँ, हम रंगकर्मीयों का यह दृढ़ विश्वास और दृढ़ संकल्प है कि सांस्कृतिक चेतना को जागृत करने वाली ऐसी ज्वलंत रचनाओं से सांस्कृतिक क्रांति का उदय अवश्य होगा !






लेखिका ------
सायली पावसकर


रंगकर्मी



~विजय राजबली माथुर ©

Tuesday, August 6, 2019

थोपी गई एकता भ्रम का एक आवरण रचती है ------ हेमंत कुमार झा


जो लोग "एक विधान, एक निशान" की बातें करते हुए उत्साह और उन्माद से भर कर इसे राष्ट्रीय एकता से जोड़ते हैं वे अर्द्धसत्य ही नहीं, भ्रामक सत्य का प्रचार कर रहे हैं। एकता थोपी हुई नहीं होती और अगर थोपी जाती है तो वह एकता नहीं होती।

थोपी गई एकता भ्रम का एक आवरण रचती है जिसकी सतह के नीचे पनपता जाता है असंतोष, जो अंततः आक्रोश का रूप लेता है।

ऐसी ऊपरी एकता का छद्म आवरण निर्मित करने वाली प्रवृत्ति एक तरफ अंतर्विरोधों को छिपा कर सत्ता-संरचना के भीतर मौजूद वर्चस्वमूलक शक्तियों और उनके षड्यंत्रों पर पर्दा डालने का काम करती है।

इस आलोक में अगर हम कश्मीर के मामलों को देखें तो अधिक आश्वस्ति का अहसास नहीं होता। भविष्य को लेकर एक संशय, एक डर बन जाता है कि पता नहीं, आगे क्या हो।

वैसे, धारा 370 को निष्प्रभावी बना कर पूर्ण बहुमत वाली भाजपा सरकार ने अपने होने को सार्थक किया है। उनका तो यह एक प्रमुख एजेंडा था ही। चुनाव दर चुनाव वे अपने घोषणापत्रों में इसे दुहराते रहे हैं। देश भर में फैले भाजपा के करोड़ों कार्यकर्त्ताओं और धुर समर्थकों की आंखों में दशकों से यह सपना तैरता रहा है कि उनकी पूर्ण बहुमत की सरकार बने और राम मंदिर निर्माण, समान नागरिक संहिता के साथ ही कश्मीर से धारा 370 का खात्मा हो। आज मोदी-शाह की जोड़ी ने इनमें से एक को अंजाम तक पहुंचाया तो उनके साहस की दाद देनी चाहिये। उनके कार्यकर्त्ताओं के मन में उत्साह का संचार तो हुआ ही है, अपने लोकप्रिय नेता के प्रति उनकी आस्था भी निश्चित रूप से बढ़ी होगी।

लेकिन, देश के संवेदनशील मुद्दों के सम्यक निपटान और कार्यकर्त्ताओं की संतुष्टि में फर्क है। देश कार्यकर्ताओं और समर्थकों से अधिक महत्वपूर्ण है और कोई राजनेता इतिहास में इस आधार पर परखा जाता है कि उसके फैसलों ने देश की दूरगामी दशा-दिशा पर कैसा प्रभाव डाला।

बहुसंख्यक वर्चस्ववाद और इससे उपजे उन्माद की संतुष्टि के लिये उठाए गए कदमों को इतिहास किस नजरिये से देखता है यह उसके अनेक अध्यायों को पलट कर देखा जा सकता है।

कश्मीर का मुद्दा इस देश के लिये ऐसा नासूर बन गया था जो अब असह्य पीड़ा देने लगा था। न जाने कितनी शहादतें, न जाने कितने संसाधनों की बर्बादी। कोई राह नजर नहीं आ रही थी।

ऐसे में, अगर नरेंद्र मोदी ने गतिरोध को तोड़ा है तो उन्हें इस मुद्दे को हैंडल करने का अवसर मिलना चाहिये। यह अवसर उनके पास है भी क्योंकि 5 वर्षों की उनकी दूसरी पारी अभी शुरू ही हुई है।

यद्यपि, इस अंजाम तक पहुंचने के लिये जिस तरीके को उन्होंने अपनाया उसे अनेक संविधान विशेषज्ञ संविधान सम्मत नहीं बता रहे। केंद्र द्वारा नियुक्त राज्यपाल की सहमति कश्मीर के जन प्रतिनिधियों की सहमति नहीं है। राज्यपाल कश्मीरी जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करते।

बीते दस-पंद्रह दिनों में कश्मीर में जो हालात बनाए गए और इस कारण देश में जो सनसनी फैली, उसने कश्मीर मुद्दे को लेकर सरकार के तौर-तरीकों को संदेह से भर दिया है। आप कह सकते हैं कि और कोई तरीका बचा ही नहीं था। लेकिन, आप यह भी कह सकते हैं कि यह मोदी-शाह मार्का समाधान है। हालांकि, इस मार्का समाधान के अपने खतरे हैं, अपने अंतर्विरोध हैं।

समझ में नहीं आता कि वे कश्मीर समस्या को सुलझाना चाह रहे हैं या देश की बहुसंख्यक आबादी को सनसनी में डाल कर, उन्माद से भर कर उनमें ऐसी नकारात्मकता का संचार करना चाहते हैं जो अल्पसंख्यक विरोध के नाम पर उनके पीछे एकजुट रहे और देश की खस्ताहाल होती अर्थव्यवस्था से ध्यान हटा कर भीड़ की शक्ल में बहुसंख्यकवाद की पाशविक ताकत के अहसास से भर कर उन्मादी नारे लगाती रहे।

गांधी ने उद्देश्य तक पहुंचने के लिये साधनों की पवित्रता पर जो जोर दिया था उसकी प्रासंगिकता इस मामले में अहम है।

क्या नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने इस फैसले के लिये जिन तरीकों को अपनाया वे राजनीतिक और नैतिक रूप से उचित हैं? आप किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में बसी एक-सवा करोड़ की आबादी को मनमर्जी से, सत्ता और शक्ति के सहारे अनंत समय तक हांक नहीं सकते। दमन हमेशा प्रतिकार को जन्म देता है, भले ही प्रतिकार के उभरने में वक्त लगे।

गौर कीजिये उन तत्वों पर, जो देश के, खास कर उत्तर भारत के विभिन्न शहरों में सड़कों पर, चौराहों पर अबीर-गुलाल ऐसे उड़ा रहे हैं, जैसे किसी जीत के जश्न में डूबे हों। कौन हैं वे लोग?

ये वही लोग हैं जिनकी नौकरियां छीनी जा रही हैं, जिनके रोजगार के अवसर संकुचित होते जा रहे हैं, श्रम कानूनों में बदलाव लाकर जिन्हें कारपोरेट का गुलाम बनाया जा रहा है, नेशनल मेडिकल कमीशन बिल के माध्यम से जिनके बच्चों की जिंदगियों को झोला छाप डॉक्टरों के भरोसे किया जा रहा है, जिनके बच्चों को शिक्षा के अवसरों से वंचित करने की सारी तैयारियां नई शिक्षा नीति में कर ली गई है।

जिनकी अपनी जिंदगियां खुद के लिये, उनके परिवार और समाज के लिये सवाल बन कर खड़ी हैं, समस्या बन कर खड़ी हैं वे कश्मीर समस्या के लिये सड़कों पर भीड़ की शक्ल में मजमा लगाए खड़े हैं, एक दूसरे पर गुलाल उड़ा रहे हैं, उकसाने वाले नारे लगा रहे हैं। उन्हें नहीं पता कि माहौल में उड़ता गुलाल उनकी दृष्टि को इस तरह से धुंधली कर रहा है कि वे न सत्य को पहचान पा रहे, न उन खंदकों को पहचान पा रहे जिनमे वे बाल-बच्चों समेत गिरते जा रहे हैं।


बहरहाल, समाधान की दिशा में बढ़ा सरकार का यह निर्णायक कदम अधिक आश्वस्त नहीं कर रहा। एक भय का संचार भी मन में हो रहा है। ताकत के दम पर अस्मितावादी विवादों का हल निकल जाए, यह कैसे संभव होगा? आप पाकिस्तान को रगड़ सकते हैं, आतंकियों को रौंद सकते हैं लेकिन अपने ही भाई-बंधुओं को न आप रगड़ सकते हैं, न रौंद सकते हैं। अगर कश्मीर देश का है तो कश्मीरी भी देश के हैं और देश उनका है। भावनाओं में दूरी बाकी रह गई तो ताकत का प्रयोग कर स्थापित की गई एकता अपने भीतर इतने अंतर्विरोधों को जन्म देगी कि कभी भी ऐसी ऊपरी एकता का शीराज़ा बिखर सकता है। यह बहुत भयानक मंजर हो सकता है।


https://www.facebook.com/hemant.kumarjha2/posts/2288525081255392
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 धारा 370 का ख़ात्मा क्यों कश्मीर और इतिहास के साथ धोखाधड़ी है
By दिलीप ख़ान • 05/08/2019 at 5:20PM

15-16 मई 1949 को सरदार वल्लभ भाई पटेल के घर पर कश्मीर के भविष्य को लेकर एक अहम बैठक हुई थी. बैठक में जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला भी मौजूद थे. बैठक का एजेंडा ‘राज्य में नए संविधान के गठन’ और ‘भारत में राज्य के विलय से जुड़े विषय’ था. पटेल की सहमति के साथ नेहरू ने उसके दो दिन बाद 18 मई को शेख अब्दुल्ला को चिट्ठी लिखी, “जम्मू-कश्मीर राज्य का अब भारत में सम्मिलन हो चुका है. भारत को विदेश मामलों, रक्षा और संचार पर वहां क़ानून बनाने का अधिकार होगा. वहां की संविधान सभा तय करेगी कि बाक़ी मुद्दों पर वो किस तरह का क़ानून बनाना चाहती है और भारत के किन क़ानूनों को मानना चाहती है.” 
यहां पर ये बताना ज़रूरी है कि संविधान की धारा 370 को ड्राफ़्ट करने वाले गोपालस्वामी अयंगर ने उस वक़्त शेख अब्दुल्ला और सरदार पटेल के बीच हुई ‘मामूली असहमतियों’ को हल करने का दावा करते हुए संविधान सभा के सामने इस धारा को पेश किया था. भारत की संविधान सभा में इस मुद्दे पर कश्मीर की तरफ़ से बातचीत करने के लिए शेख अब्दुल्ला के साथ-साथ मिर्ज़ा मुहम्मद अफ़ज़ल बेग़, मौलाना मोहम्मद सईद मसूदी और मोती राम बागड़ा ने हिस्सा लिया था और ड्राफ़्ट पर अब्दुल्ला और पटेल की स्वीकृति हासिल करने के बाद 16 अक्टूबर 1949 को संविधान सभा में इस प्रस्ताव को पेश किया था. इसके ठीक अगले दिन 17 अक्टूबर 1949 को संविधान सभा ने इसे मंजूरी दे दी. 
जवाहर लाल नेहरू के साथ शेख अब्दुल्ला


उस वक़्त इस धारा को अनुच्छेद 306A के नाम से जाना जाता था. पटेल की दो बातों पर असहमति थी. पटेल का मानना था कि जब जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा बन रहा है तो वहां पर मौलिक अधिकार और नीति निदेशक तत्व भी लागू होने चाहिए. लेकिन, वार्ता के बाद उन्होंने 370 के प्रावधानों को मंजूरी दे दी थी. महाराजा हरि सिंह ने भारत में सम्मिलन (इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन) को जिन बातों पर मंजूरी दी थी, उनमें दो प्रावधान सबसे ज़्यादा अहम हैं. उसके उपबंध 5 में कहा गया है, “मेरी विलय संधि में किसी भी तरह का संशोधन नहीं हो सकता. भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के तहत इसमें कोई बदलाव तब तक नहीं हो सकता, जब तक ये मुझे मंजूर ना हो.” उपबंध 7 में कहा गया है, “भारत के भविष्य के संविधान को (हमारे यहां) लागू करने पर बाध्य नहीं किया जा सकता.”


इस अर्थ में देखें तो कश्मीर के लोगों से धारा 370 के मार्फ़त स्वायत्तता का भारत ने जो वादा किया था, उस वादे को बाद में काफ़ी तोड़ा-मरोड़ा गया और आख़िरकार नरेन्द्र मोदी सरकार ने उसे पूरी तरह ख़त्म कर दिया. संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक़ जम्मू-कश्मीर में भारतीय संविधान की सिर्फ़ दो धाराएं लागू होती हैं. धारा 1 और धारा 370. इन दोनों धाराओं में धारा 370 ही वो धारा थी, जिसके ज़रिए बाद के दिनों में भारत ने वहां कई संवैधानिक प्रावधानों को लागू किया. इस धारा में ये प्रावधान था कि राष्ट्रपति के आदेश के ज़रिए वहां किसी केंद्रीय क़ानून को लागू किया जा सकता है. 370 लागू होने के बाद से अब तक 47 प्रेसिडेशियल ऑर्डर जारी किए गए और इस तरह वहां की ‘स्वायत्तता’ को लगातार कमज़ोर किया गया. रक्षा, विदेश और संचार के अलावा कई ऐसे क़ानून वहां लागू हुए जिनका ‘ऑरिजिनल संधि’ में ज़िक्र नहीं था. 2019 तक केंद्रीय सूची में शामिल 97 में से 94 विषय वहां भी लागू हैं, समवर्ती सूची में शामिल 47 में से 26 विषय वहां लागू हैं. संविधान की 395 में से 260 अनुच्छेद वहां लागू हैं. ये सबकुछ हुआ उसी 370 के ज़रिए, जिसे स्वायत्तता के नाम पर कश्मीरियों को थमाया गया था. 


4 दिसंबर 1963 को तत्कालीन गृह मंत्री गुलजारी लाल नंदा ने धारा 370 पर टिप्पणी करते हुए कहा था, “ये धारा ना तो दीवार है और ना ही पहाड़, असल में ये एक सुरंग है. इसी सुरंग के ज़रिए वहां बहुत से अच्छी चीज़ें पहुंची हैं और आगे बहुत बुरी चीज़ें भी पहुंचेंगी.” कश्मीर और धारा 370 पर किताब लिख चुके जाने-माने इतिहासकार एजी नूरानी ने इसलिए मोदी सरकार के ताज़ा फ़ैसले को ‘असंवैधानिक और धोखाधड़ी’ करार दिया है. दिलचस्प ये है कि धारा 370 (3) के तहत राष्ट्रपति को इसमें कोई भी बदलाव करने की शक्ति दी गई है. लेकिन, इसमें राज्य की संविधान सभा की मंजूरी लेना अनिवार्य बताया गया है. 



इस बीच 1952 में शेख अब्दुल्ला और नेहरू के बीच दिल्ली क़रार हुआ और कई व्यापक मुद्दों पर सहमति बनी. उससे ठीक पहले 5 नवंबर 1951 को जम्मू-कश्मीर में संविधान सभा का गठन हुआ और 17 नवंबर 1956 को संविधान लागू होने के बाद संविधान सभा को भंग कर दिया गया. उसके बाद से ‘भारत में सम्मिलन’ (इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन) में दर्ज प्रावधानों को लगातार तोड़ा-मरोड़ा गया. दिल्ली समझौते में नेहरू ने ये कहा था, “कश्मीरी शिष्टमंडल अपने उन अधिकारों को लेकर चिंतित था, जिनमें राज्य से जुड़े विषयों को संरक्षित रखने का प्रावधान था...इनमें अचल संपत्ति और नौकरियों में नियुक्ति के मामले शामिल हैं.”


यही वो मुद्दे हैं जिनके आधार पर 1954 में राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने प्रेसिडेंशियल ऑर्डर के ज़रिए धारा 35ए लागू की थी. ये धारा 370 का ही हिस्सा है और इसमें स्थाई निवासी और नौकरियों से जुड़े प्रावधान दर्ज हैं. धारा 35ए के मुताबिक़ जम्मू-कश्मीर में 14 मई 1954 तक रहने वाले नागिरकों को वहां का ‘स्थाई निवासी’ माना गया और उन्हीं लोगों को वहां की सरकारी नौकरियों, स्कॉलरशिप हासिल करने और अचल संपत्ति रखने का अधिकार है. अगर इस व्यवस्था को भी इतिहास में तलाशें तो महाराजा हरि सिंह के ज़माने में इस तरह का प्रावधान पहली बार 1927 में किया गया था. यही वजह है कि ये नियम पाक अधिकृत कश्मीर में भी लागू है. 
दिल्ली समझौते के बाद नेहरू ने कहा था, “महाराजा हरि सिंह के ज़माने से ये नियम लागू है. हरि सिंह को इस बात का अंदेशा था कि कश्मीर की वादियों और मौसम से प्रभावित होकर बड़ी तादाद में अंग्रेज़ यहां आकर बसना चाह रहे थे. इसलिए उन्होंने बाहरियों द्वारा अचल संपत्ति ख़रीदने पर रोक लगाई...मुझे लगता है कि कश्मीर के लोगों की चिंता वाजिब है क्योंकि अगर ये व्यवस्था नही रही तो वहां ज़मीन ख़रीदकर व्यवसाय करने वाले लोगों का तांता लग जाएगा और कश्मीर घाटी लोगों से भर जाएगी.”


ऐतिहासिक दस्वातेज़ों में कश्मीरियों से किए गए ‘स्वायत्तता’ समेत तमाम वादों से धीरे-धीरे मुंह मोड़ा गया और वहां के लोगों की आवाज़ और संधियों के प्रावधानों को दरकिनार कर ‘कश्मीर हमारा है’ के नारों की ध्वनि के आधार पर केंद्र सरकार ने लगातार जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक हक़ों के साथ खिलवाड़ किया. पिछले कुछ वर्षों से धारा 370 को हटाने की मुहिम ने भारत में तेज़ी पकड़ी और बीजेपी ने इसे अपने शीर्ष एजेंडे में शामिल कर लिया. जिस अंदाज़ में राष्ट्रपति के आदेश के ज़रिए अभी धारा 370 को हटाने का ऐलान हुआ है, उसे निश्चित तौर पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. 



बीजेपी की दलील रही है कि धारा 370 ‘अस्थाई’ प्रकृति का था. संविधान के हिसाब से देखें तो बीजेपी का दावा बिल्कुल ठीक है. संविधान के भाग 21 में जिन अनुच्छेदों का ज़िक्र किया गया है उनमें धारा 370 पहला अनुच्छेद है. भाग 21 में अस्थाई, ट्रांजिशनल और विशेष प्रावधानों वाली धाराओं का ज़िक्र किया गया है. इस भाग में धारा 370 के आगे लिखा गया है: जम्मू-कश्मीर राज्य को लेकर अस्थाई प्रावधान.



लेकिन, इस ‘अस्थाई’ व्यवस्था के वक़्त भारतीय संसद ने ये भी माना था कि जब तक जम्मू-कश्मीर में शांति बहाली नहीं होती, तब तक इस धारा के साथ कोई छेड़-छाड़ नहीं होगी. सरकार ने जिस तरह अभी धारा 370 को हटाया है उसे लागू करने के लिए बलप्रयोग करना पड़ा. राज्य के सभी प्रमुख नेताओं को नज़बंद किया गया, कई हिस्सों में धारा 144 लागू की गई, अर्धसैनिक बलों की अतिरिक्त टुकड़ियां तैनात की गई, आनन-फ़ानन में अमरनाथ यात्रा को रोक दिया गया. सुप्रीम कोर्ट में धारा 370 को हटाने के लिए कई बार याचिका दायर की गई. ऐसी ही एक याचिका पर सुनवाई के दौरान अप्रैल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि भले ही धारा 370 के आगे ‘अस्थाई’ शब्द लिखा हो, लेकिन ये अस्थाई नहीं है. जस्टिस एके गोयल और आरएफ़ नरीमन की खंडपीठ ने साफ़ कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में भी ये कहा था कि इस धारा को अस्थाई नहीं माना जा सकता. 1969 में संपत प्रकाश मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने धारा 370 को अस्थाई मानने से इनकार कर दिया था. उस वक़्त पांच सदस्यीय खंडपीठ ने इसे स्थाई प्रकृति का प्रावधान करार दिया था.



कश्मीर के लोग ना सिर्फ़ व्यापक स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं, बल्कि विलय के वक़्त भारत सरकार से किए गए वादों को निभाने की मांग करते रहे हैं. जवाहर लाल नेहरू ने 7 अगस्त 1952 को कश्मीर मुद्दे पर बोलते हुए लोकसभा में कहा था, “हमने कश्मीर पर युद्ध लड़ा और बढ़िया से लड़ा. हम मैदान से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक में लड़े, लेकिन उन सबसे ज़्यादा हमने जम्मू-कश्मीर के लोगों के दिलों में इस लड़ाई को लड़ा (और जीता). इसलिए मेरा मानना है कि कश्मीर को लेकर ना तो संयुक्त राष्ट्र फ़ैसला कर सकता है, ना ही ये संसद और ना ही कोई और....फ़ैसला लेने का अधिकार सिर्फ़ कश्मीरियों का दिल और दिमाग़ को है.”




आज 370 को हटाते वक़्त उस वादे को पूरी तरह तोड़ दिया गया है. कश्मीर को लेकर किए गए अनगिनत वादों में ये सिर्फ़ एक वादा है. शेख अब्दुल्ला की नेहरू द्वारा गिरफ़्तारी से शुरू हुई कहानी का अंत उनके पोते उमर अब्दुल्ला को घर में नज़रबंद कर धारा 370 हटाने के फ़ैसले के साथ हुई है. 

https://hindi.asiavillenews.com/article/arguments-against-scrapping-article-370-repealing-it-is-deceitful-11045




 ~विजय राजबली माथुर ©

Friday, March 29, 2019

गुंडागर्दी जैसी क्यों राजनीति ------ सुजाता

  



 विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं, फेसबुक, ब्लाग वगैरह पर कुछ महिला और कुछ पुरुष लेखकों द्वारा भी समाज के पितृ  सत्तात्मक होने व महिलाओं के दोयम दर्जे की बातें बहुतायत से देखने - पढ़ने को मिल जाती हैं। लेकिन ऐसा हुआ क्यों ? और कैसे ? इस पर कोई चर्चा नहीं मिलती है। अतः यहाँ इसी का विश्लेषण किया जा रहा है जो कि,  समाजशास्त्रीय विधि पर आधारित है । समाजशास्त्रीय विश्लेषण 'अनुमान विधि 'को अपनाता है क्योंकि प्राचीन काल के कोई भी प्रमाण आज उपलब्ध नहीं हैं। इस पद्धति में जिस प्रकार 'धुआँ देख कर आग लगने '  का अनुमान   और ' किसी गर्भिणी को देख कर संभोग होने ' का अनुमान किया जाता है  जो कि, पूर्णतया सही निकलते हैं उसी प्रकार प्राप्त संकेतों के अनुसार समाज के विकास - क्रम का अनुमान किया जाता है ।  
अपने विकास के प्रारंभिक चरण में मानव समूहबद्ध अथवा झुंडों में ही रहता था। इस समय मनुष्य प्रायः नग्न ही रहता था,भूख लगने पर कच्चे फल फूल या पशुओं का कच्चा मांस खा कर ही जीवन निर्वाह करता था। कोई किसी की संपति (asset) न थी,समूहों का नेतृत्व मातृसत्तात्मक  (mother oriented) था। इस अवस्था को सतयुग पूर्व पाषाण काल (stone age) तथा आदिम साम्यवाद का युग भी कहा जाता है। परिवार के सम्बन्ध में यह ‘अरस्तु ’ के अनुसार ‘communism of wives’ का काल था (संभवतः इसीलिए मातृ सत्तामक समूह रहे हों )।
अब से दस लाख वर्ष पूर्व जब इस पृथ्वी पर मानव की सृष्टि हुई तो प्रारम्भिक तौर पर युवा नर और नारी का सृजन हुआ था।इसी प्रकार सभी प्राणी युवा रूप में ही सृजित हुये थे ।  (यदि यूरोपीय दृष्टिकोण को सही मानें तब  यह प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है  कि, पहले मुर्गी या पहले अंडा ? ) क्योंकि केवल युवा नर - नारी ही सृजन कर सकते थे बाल या वृद्ध नहीं। संतान की पहचान उसकी जननी माँ से होती थी । 
इस समय मानव को प्रकृति से कठोर संघर्ष करना पड़ता था। 'मानव के ह्रास – विकास की कहानी सतत संघर्षों को कहानी है '। अपने विकास के प्रारंभिक चरण में मानव समूहबद्ध अथवा झुंडों में ही रहता था। इस समय मनुष्य प्रायः नग्न ही रहता था,  भूख लगने पर कच्चे फल फूल या पशुओं का कच्चा मांस खा कर ही जीवन निर्वाह करता था। malthas - माल्थस  के अनुसार उत्पन्न संतानों में आहार, आवास तथा प्रजनन के अवसरों के लिए –‘जीवन के लिए संघर्ष ’ हुआ करता है जिसमे प्रिंस डी लेमार्क के अनुसार ‘व्यवहार तथा अव्यवहार ’ के सिद्दंतानुसार ‘योग्यता ही जीवित रहती है ’अथार्त जहाँ प्रकृति ने उसे राह दी वहीँ वह आगे बढ़ गया और जहाँ प्रकृति की विषमताओं ने रोका वहीँ रुक गया। कालांतर में तेज बुद्धि मनुष्य ने पत्थर और काष्ठ के उपकरणों तथा शस्त्रों का अविष्कार किया तथा जीवन पद्धति को और सरल बना लिया। इसे ‘उत्तर पाषाण काल ’ की संज्ञा दी गयी। पत्थरों के घर्षण से अग्नि का अविष्कार हुआ और मांस को भून कर खाया जाने लगा ।  शिकार की तलाश और जल की उपलब्धता के आधार पर इन समूहों को परिभ्रमण करना होता था जिस क्रम में एक स्थान या जलाशय पर नियंत्रण हेतु इन समूहों में परस्पर संघर्ष होने लगे। अपनी शारीरिक संरचना के कारण संघर्ष - युद्धों में स्त्री- नारी - महिला कमजोर पड़ने लगी और बलिष्ठ होने के कारण पुरुषों का प्रभुत्व बढ्ने लगा। अब धीरे - धीरे परिवार व समाज में भी पुरुष वर्चस्व स्थापित होता गया और परिस्थितियों के चलते स्त्री ने भी इसे स्वेच्छा से स्वीकार कर लिया। अब परिवार की पहचान स्त्री के बजाए पुरुष से होने के कारण संतान की पहचान भी माँ के बजाए पिता से होने लगी।' विवाह ' संस्था  का उदय हुआ और इसी अवस्था से समाज पुरुष - प्रधान होता चला गया है। परंतु विवाह संस्था ने परिवार को स्थिरता प्रदान की अब केवल माँ का ही दायित्व संतान के विकास का नहीं रह गया बल्कि उसमें पिता का भी योगदान मिलने लगा था। 
धीरे धीरे मनुष्य ने देखा की फल खा कर फेके गए बीज किस प्रकार अंकुरित होकर विशाल वृक्ष का आकार ग्रहण कर लेते हैं। एतदर्थ उपयोगी पशुओं को अपना दास बनाकर मनुष्य कृषि करने लगा।  कृषि के आविष्कार के कारण स्थाई रूप से निवास भी करने लगा।उत्पादित फसलों के आदान - प्रदान से समाज का निर्वहन होने लगा।  
यहाँ विशेष स्मरणीय तथ्य यह है की जहाँ कृषि उपयोगी सुविधाओं का आभाव रहा वहां का जीवन पूर्ववत ही था यत्र - तत्र पाये जाने वाले आदिवासी समाज इसका उदाहरण हैं परंतु उनमें से भी अधिकांश आज पुरुष - प्रधान हो गए हैं।  इस दृष्टि से गंगा-यमुना का दोआबा विशेष लाभदायक रहा और यहाँ उच्च कोटि की सभ्यता का विकास हुआ जो आर्य सभ्यता कहलाती है और यह क्षेत्र आर्यावर्त। कालांतर में यह समूह  सभ्य,सुसंगठित व सुशिक्षित होता  गया ।  व्यापर कला-कौशल और दर्शन में भी ये सभ्य थे। 
 महाभारत काल के बाद समाज में स्थिति बिगड़ने लगी और पौराणिक काल में ब्राह्मणों का प्रभुत्व बढ्ने के साथ - साथ नारियों की स्थिति निम्न से निम्नतर होती गई किन्तु आज स्त्रियाँ संघर्ष के जरिये  समाज में अपना खोया सम्मान प्राप्त करने में सफल हो रही हैं और विवेकवान पुरुष भी इस बात का समर्थन करने लगे हैं।
आदिम अवस्था तो वापिस नहीं लौट पाएगी किन्तु केकेयी व सीता के युग को तो पुनः स्थापित किया ही जा सकता है जिसमें नर और नारी समान थे कोई छोटा या बड़ा नहीं।
https://krantiswar.blogspot.com/2018/04/blog-post.html




~विजय राजबली माथुर ©

Thursday, December 20, 2018

गैर राजनैतिक लोग राजनीति में आयेंगे तो बंटाधार होगा ही ------ तुकाराम वर्मा

 



Tukaram Verma
Tukaram Verma
19-12-2018  
"राजनीति और अच्छे लोग " 
कितना प्रभावकारी और संतुष्टि प्रदायक लगता है यह वाक्य| अपने आप विचार कीजिये कि अच्छे लोगों की तलाश में आंदोलनों के गर्भ से जितने युवा राजनैतिक क्षेत्र को मिले उनमें से कितने लोग राष्ट्र को अच्छे मिले? और फिर वही प्रयास पुनः?
अच्छे लोगों की पहचान का क्या मानदंड है :-उच्च शिक्षा,प्रतिष्ठित परिवार,उच्च जाति,धन्नासेठी, राजशाही इतिहास अथवा "निष्कलंक सद्व्यवहारी समाज सेवा"|एक ऐसा राजनैतिक व्यक्ति जो जीवन पर्यंत अपने लिए छोटा-सा घर नहीं बना सका और मुख्यमंत्री केन्द्रीय मंत्री तथा भारतीय राजनीति का स्तम्भ रहा वह साहित्य नगरी में अभिनयी व्यक्ति से पराजित हुआ| कुछ समय बाद वह विजेता मैदान छोड़कर भाग खड़ा हुआ| इस हर्जाने के लिए कौन उत्तरदायी होगा?

राजनीति में यदि गैर राजनैतिक लोग आयेंगे तो बंटाधार के सिवा कुछ नहीं होगा|हाँ जनता को अनैतिक भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलनी चाहिये और यह कार्य भी जनता ही कर सकती है| वह भलीभाँति जानती है कि उसके क्षेत्र में कौन राजनैतिक रूप से उनके लिए उपयोगी है और कौन छल बल के प्रयोग से उनके लिए समस्यायें खड़ी करता है|
राजनैतिक स्वच्छता हेतु चुनाव सुधारों की सर्वाधिक आवश्यकता है,बहुत कुछ सुधार के बाबजूद :-
१-अभी स्वतंत्र मतदान नहीं हो पाता है| 
२-मतदाताओं के नाम मतदाता सूचि से अनधिकृत रूप से कटवाये जाते है और जुड़वाए जाते हैं|
३-प्रचार का तरीका अर्थ प्रधान है इसे रोकना होगा|
४-प्रचार तंत्र विशेष रूप से चैनल्स के विज्ञापन निष्पक्ष निर्वाचन को प्रभावित करते है और चैनल्स एजेंटों -सी भूमिका का निर्वहन करते हैं इन्हें रोका जाना चाहिये क्योंकि यह स्थिति आर्थिक दृष्टि से कमजोर प्रत्याशियों के प्रतिकूल जाती है |
५-राजनैतिक दलों पर यह प्रतिबन्ध लगना चाहिये कि वे अपराध प्रवृत्ति,जातीय,धार्मिक क्षेत्रीय उन्मादियों को टिकिट न दें ऐसे प्रत्याशियों से जनता नहीं भिड़ सकती यह कार्य पार्टी अथवा सत्ता को करना होगा|
६-समाज सेवा से जुड़े युवकों को अधिकतम अवसर मिलने चाहिये और उन्हें दलीय चाटुकारिता से बचाये रखने के हर संभव प्रयासों के साथ-साथ जनसेवा एवं स्पष्टवादिता के हेतु प्रोत्साहित करके नैतिक शक्ति संपन्न बनने देना चाहिये|
७-यह सच है कि राजनीति संतवृत्ति नहीं है लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था छल,खल,और बल आधारित व्यवस्था भी नहीं है |साम,दाम,दण्ड,भेद की नीति से उभरे बिना लोकतंत्र अमानवीय ही रहेगा|

राजनैतिक दल और उनके द्वारा उगाये गये चंदा का जो २०% हिसाब जो वे देते हैं उसके अनुसार उनके पास हजारों करोड़ की बचत चुनावों में कितना व्यय कर चुके इसका कोई अनुमान नहीं, लेकिन सभी दलों के प्रत्याशियों का व्यय लगभग एक संसदीय सीट पर २५ करोड़ रुपए सभी सांसदों का अनुमानित व्यय १५००० करोड़|

यह उस भारत का चुनावी खर्च है जिसमें किसी मजदूर को २०० प्रतिदिन कमाने में ८ घंटे हड्डी तोड़ श्रम करना आदत है और कभी-कभी 
उसे यह मजदूरी मिलती भी नहीं है और यदि मिलती है तो बहुत अपमान जनक स्थिति से गुजरने की बाद| इस २०० रूपए में कम से कम चार लोगों का भोजन और अन्य खर्चे|

करोड़ों की आवादी ऐसी है जिसे मजदूरी भी सुलभ नहीं और यह राजनैतिक दल इन सबके वोट लेकर इन पर क्या व्यवहार कर रहे हैं उसको समाज के सामने लाने में पत्रकार,साहित्यकारों की चुप्पी| कभी-कभी सरकार से आर्थिक लाभ और अन्य सुविधायें लेने के लिए इनकी बेशर्म चाटुकारिता|
आखिर हम किधर जा रहे हैं ? प्रतिदिन किस हद तक इन लोगों के सम्मान में होने वाले आयोजन और इनकी जय-जयकार करते हुए बुद्धिजीवियों के द्वारा पढ़े जाने वाले कसीदे| अफ़सोस इनके लिए हम आपस में बहस करते हैं और इन्हें अपनी किस स्वार्थी प्रवृत्ति और रूचि के तहत एक दल से दूसरे दल के लोगों को श्रेष्ठ कहते हैं| कदाचित हम लोगों की इसी दुर्वृत्ति के कारण यह राजनैतिक दल आज इस स्थिति पर पहुँचे हैं| हम लोगों ने इन्हें जाति-धर्म क्षेत्र भाषा और अपने तुच्छ हितों को ध्यान में रखकर अपना अमूल्य मत बेच दिया, न राष्ट्र का ध्यान रक्खा न समाज का| यह जानते हुए कि किस प्रत्याशी का कैसा आचरण और कैसी सोच तथा समझ है उनके गुण-अवगुणों को नज़र अंदाज किया इसी का परिणाम पूरे राजनैतिक कुए में अनैतिक अर्थ की भाँग घोल दी गई, जिसके नशे ने इन्हें मदांध बना दिया|

दोस्तो! वक्त है राजनैतिक लोगों का नहीं अपना आत्मनिरीक्षण करें फिर निर्णय लें कि आने वाले चुनाव में हमें क्या भूमिका निभानी चाहिये,यदि आप देश के हितैषी होने का दावा करते हैं तो अन्यथा जड़ता की जंजीरों में बंधे हुए सिसकते रहिये और अनैतिकता की चादर को ओढ़कर घूमिये तथा सोइए|
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~विजय राजबली माथुर ©

Wednesday, January 17, 2018

भारतवर्ष तो आर्य था हिन्दुत्व की राजनीति गुलामी का प्रतीक है ------ विजय राजबली माथुर

दुर्भाग्य से आज विद्वान कम्यूनिज़्म को धर्म विरोधी कहते हैं और कम्युनिस्ट भी इसी मे गर्व महसूस करते हैं। धर्म जिसका अर्थ 'धारण करने'से है को न मानने के कारण ही सोवियत रूस मे कम्यूनिज़्म विफल हुआ और चीन मे सेना के दम पर जो शासन चल रहा है वह कम्यूनिज़्म के सिद्धांतों पर नहीं है। 'कम्यूनिज़्म' एक भारतीय अवधारणा है और उसे भारतीय परिप्रेक्ष्य मे ही सफलता मिल सकती है।

 'नास्तिक ' स्वामी विवेकानंद के अनुसार वह है जिसका अपने ऊपर विश्वास नहीं है और 'आस्तिक' वह है जिसका अपने ऊपर विश्वास है। लेकिन पोंगापंथी उल्टा पाठ सिखाते हैं। परंतु कम्युनिस्ट सीधी बात क्यों नहीं समझाते?....................................................................यह देश का दुर्भाग्य ही है कि पढे - लिखे विद्वान तक 'सत्य ' कहने से बचते हैं और विदेशियों द्वारा हमारे देशवासियों को दिया गया नामकरण ही प्रयोग करते रहते हैं। उसकी हकीकत ...... कि, हिन्दुत्व वस्तुतः शोषण को मजबूत बनाने की एक व्यापारिक राजनीति है।.............................................. 
"गुरुडम में फंस कर जिसने सत्य से मुंह मोड़ लिया ;
पाखण्ड को ओढ़ लिया ...
इसी कारण भारत देश गुलाम हुआ ...
भाई-भाई का आपस में घोर संग्राम हुआ ;
मंदिर ..मस्जिद तोड़े संग्राम हुआ.....
बुत परस्ती में लगा हुआ देश बुरी तरह गुलाम हुआ ;
देश मेरा बदनाम हुआ....."






*************** यह देश का दुर्भाग्य ही है कि पढे - लिखे विद्वान तक 'सत्य ' कहने से बचते हैं और विदेशियों द्वारा हमारे देशवासियों को दिया गया नामकरण ही प्रयोग करते रहते हैं। उसकी हकीकत ऊपर और नीचे प्रस्तुत वीडियो देख कर समझी जा सकती है कि, हिन्दुत्व वस्तुतः शोषण को मजबूत बनाने की एक व्यापारिक राजनीति है। निम्नलिखित पूर्व प्रकाशित नोट्स इसे समझने में सहायक हो सकते हैं*************** 

December 21, 2011 ·

वेद प्रचारक ने कहा था
दौलत के दीवानों उस दिन को पहचानों ;
जिस दिन दुनिया से खाली हाथ चलोगे..
चले दरबार चलोगे....
ऊंचे-ऊंचे महल अटारे एक दिन छूट जायेंगे सारे ;
सोने-चांदी तुम्हारे बक्सों में धरे रह जायेंगे...
जिस दिन दुनिया से खाली हाथ चलोगे...
चले दरबार चलोगे.......
दो गज कपडा तन की लाज बचायेगा ;
बाकी सब यहाँ पड़ा रह जाएगा......
चार के कन्धों पर चलोगे..
.चले दरबार चलोगे......
पत्थर की पूजा न छोडी-प्यार से नाता तोड़ दिया...
मंदिर जाना न छोड़ा -माता-पिता से नाता तोड़ दिया...
बेटे ने बूढ़ी माता से नाता तोड़ दिया ;
किसी ने बूढ़े पिता का सिर फोड़ दिया....
पत्थर की पूजा न छोडी ;मंदिर जाना न छोड़ा....
दया धर्म कर्म के रिश्ते छूट रहे;
माता-पिता से नाता छोड़ दिया....
उल्टी सीधी वाणी बोलकर दिल तोड़ दिया;
बूढ़ी माता से नाता तोड़ दिया.....
पत्थर की पूजा न छोडी मंदिर जाना न छोड़ा 
बूढ़ी माँ का दिल तोड़ दिया.....
वे क्या जाने जिसने प्रभु गुण गाया नहीं ;
वेद-शास्त्रों से जिसका नाता नहीं..
जिसने घर हवन कराया नहीं...
गुरुडम में फंस कर जिसने सत्य से मुंह मोड़ लिया ;
पाखण्ड को ओढ़ लिया ...
इसी कारण भारत देश गुलाम हुआ ...
भाई-भाई का आपस में घोर संग्राम हुआ ;
मंदिर ..मस्जिद तोड़े संग्राम हुआ.....
बुत परस्ती में लगा हुआ देश बुरी तरह गुलाम हुआ ;
देश मेरा बदनाम हुआ.....

March 23, 2012 
साम्यवादी विद्वान आर एस एस की अफवाहों को सही क्यों मानते हैं ?
बेहद अफसोसनाक है साम्यवादी विद्वानों द्वारा आर एस एस की अफवाहों को सही मानना 

साम्राज्यवादी ब्रिटिश शासकों ने अपने चहेते पुराण वादियों के सहारे आर एस एस की स्थापना अफवाहों के जरिये देश को बांटने हेतु करवाई थी जिसमे वे पूरी तरह सफल रहे। आर एस एस ने अफवाह उड़ा दी कि नव-संवत हिंदुओं का केलेनडर है और साम्यवादी विद्वानों ने उसी को सच मान कर नव-संवत का विरोध आँखें बंद करके करना शुरू कर दिया। यह प्रवृति साम्यवाद के लिए आत्म-घाती है । 

सर्व प्रथम बौद्धों ने अपने मठ उजाड़ने ,विहारों को जलाने,साहित्य को नष्ट करने वाले उग्रवादियों हेतु 'हिन्दू' शब्द का प्रयोग -'हिंसा देने वाले' के संदर्भ मे किया था। फिर जब विदेशी आक्रांता भारत मे शासन करने आए तो फारसी भाषा की एक गंदी गाली-हिन्दू का प्रयोग यहा के निवासियों हेतु करने लगे और आर एस एस जो विदेशी साम्राज्यवादियों की हितचिंतक संस्था है यहाँ के लोगों को 'गर्व से हिन्दू' कहने लगी। 


बौद्धों  को सताये जाने और फारसी आक्रांताओं के आने से बहुत पहले चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सिंहासन पर बैठने के उपलक्ष्य मे चंद्र गुप्त  ने 'विक्रमादित्य '  की उपाधि धारण की और इसी दिन से 'विक्रमी संवत' नामक नया कलेंडर  चालू किया था। भारतीय इतिहास मे गुप्त काल को 'स्वर्ण युग'कहा जाता है जिसमे चंद्र गुप्त 'विक्रमादित्य'का शासन जनता के हित मे श्रेष्ठ था। भारतीय खुद को श्रेष्ठ अर्थात 'आर्ष'कहते थे जो अब अपभ्रंश रूप मे 'आर्य' कहा जाता है। यूरोप के विदेशियों ने आर्यों को यूरोप का बता दिया और 'गुलाम प्रवृति' के विद्वानों ने उसे भी सही मान लिया । इसी कारण 'विक्रमी संवत' को साम्यवादी विद्वान भी  आर एस एस की भांति ही हिन्दू  संवत मानते हैं जो सर्वथा गलत है। हिन्दू शब्द की उत्पत्ति से बहुत पहले लागू 'विक्रमी संवत' हिंदुओं का नही भारत के श्रेष्ठ आर्य शासक चंद्र गुप्त 'विक्रमादित्य' की याद दिलाता है जिस पर प्रत्येक स्वाभिमानी भारतीय को गर्व करना चाहिए और साम्यवादी विद्वानों को इसका विरोध करके आर एस एस का दावा मजबूत नहीं करना चाहिए। 
शिव अर्थात भारतवर्ष : 
"ॐ नमः शिवाय च का अर्थ है-Salutation To That Lord The Benefactor of all "यह कथन है संत श्याम जी पाराशर का.अर्थात हम अपनी मातृ -भूमि भारत को नमन करते हैं.वस्तुतः यदि हम भारत का मान-चित्र और शंकर जी का चित्र एक साथ रख कर तुलना करें तो उन महान संत क़े विचारों को ठीक से समझ सकते हैं.शंकर या शिव जी क़े माथे पर अर्ध-चंद्राकार हिमाच्छादित हिमालय पर्वत ही तो है.जटा से निकलती हुई गंगा -तिब्बत स्थित (अब चीन क़े कब्जे में)मानसरोवर झील से गंगा जी क़े उदगम की ही निशानी बता रही है.नंदी(बैल)की सवारी इस बात की ओर इशारा है कि,हमारा भारत एक कृषि -प्रधान देश है.क्योंकि ,आज ट्रेक्टर-युग में भी बैल ही सर्वत्र हल जोतने का मुख्य आधार है.शिव द्वारा सिंह-चर्म को धारण करना संकेत करता है कि,भारत वीर-बांकुरों का देश है.शिव क़े आभूषण(परस्पर विरोधी जीव)यह दर्शाते हैंकि,भारत "विविधताओं में एकता वाला देश है."यहाँ संसार में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूंजी है तो संसार का सर्वाधिक रेगिस्तानी इलाका थार का मरुस्थल भी है.विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं तो पोशाकों में भी विविधता है.बंगाल में धोती-कुर्ता व धोती ब्लाउज का चलन है तो पंजाब में सलवार -कुर्ता व कुर्ता-पायजामा पहना जाता है.तमिलनाडु व केरल में तहमद प्रचलित है तो आदिवासी क्षेत्रों में पुरुष व महिला मात्र गोपनीय अंगों को ही ढकते हैं.पश्चिम और उत्तर भारत में गेहूं अधिक पाया जाता है तो पूर्व व दक्षिण भारत में चावल का भात खाया जाता है.विभिन्न प्रकार क़े शिव जी क़े गण इस बात का द्योतक हैं कि, यहाँ विभिन्न मत-मतान्तर क़े अनुयायी सुगमता पूर्वक रहते हैं.शिव जी की अर्धांगिनी -पार्वती जी हमारे देश भारत की संस्कृति (Culture )ही तो है.भारतीय संस्कृति में विविधता व अनेकता तो है परन्तु साथ ही साथ वह कुछ  मौलिक सूत्रों द्वारा एकता में भी आबद्ध हैं.हमारे यहाँ धर्म की अवधारणा-धारण करने योग्य से है

MONDAY, MARCH 7, 2016
शिव का अर्थ है ‘कल्याण' अर्थात मानव मात्र के कल्याण हेतु जो संदेश दे वही शिव है। शिव बुद्धि,ज्ञान व विवेक का द्योतक है। 
हमारे विद्वान बुद्धिजीवी जिनमे बामपंथी भी शामिल हैं 'धर्म' का अर्थ ही नहीं समझते और न ही समझना चाहते हैं। पुरोहितवादियो ने धर्म को आर्थिक शोषण के संरक्षण का आधार बना रखा है और इसीलिए बामपंथी पार्टियां धर्म का विरोध करती हैं। जब कि वह धर्म है ही नहीं जिसे बताया और उसका विरोध किया जाता है। धर्म का अर्थ समझाया है 'शिवरात्रि' पर बोध प्राप्त करने वाले मूलशंकर अर्थात दयानंद ने। उन्होने 'ढोंग-पाखंड' का प्रबल विरोध किया है उन्होने 'पाखंड खंडिनी पताका' पुस्तक द्वारा पोंगापंथ का पर्दाफाश किया है। 
दयानन्द ने आजादी के संघर्ष को गति देने हेतु1875 मे  'आर्यसमाज' की स्थापना की थी ,उसे विफल करने हेतु ब्रिटिश शासकों ने 1885 मे  कांग्रेस की स्थापना करवाई तो आर्यसमाँजी उसमे शामिल हो गए और आंदोलन को आजादी की दिशा मे चलवाया।1906 मे अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग स्थापित करवाकर देश मे एक वर्ग को आजादी के आंदोलन से पीछे हटाया। 1920 मे हिन्दू महासभा की स्थापना करवा कर दूसरे वर्ग को भी आजादी के आंदोलन से पीछे हटाने का विफल प्रयास किया। 1925 मे साम्राज्यवादी हितों के पोषण हेतु आर एस एस का गठन करवाया जिसने मुस्लिम लीग के समानान्तर सांप्रदायिकता को भड़काया और अंततः देश विभाजन हुआ। आर्यसमाज के आर  एस एस के नियंत्रण मे जाने के कारण राष्ट्रभक्त आर्यसमाजी जैसे स्वामी सहजानन्द ,गेंदा लाल दीक्षित,राहुल सांस्कृत्यायन आदि 1925 मे स्थापित 'भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी' मे शामिल हुये जिसका गठन आजादी के क्रांतिकारी आंदोलन को गति देने हेतु हुआ था। सरदार भगत सिंह,राम प्रसाद 'बिस्मिल' सरीखे युवक 'सत्यार्थ प्रकाश'पढ़ कर ही क्रांतिकारी कम्युनिस्ट बने थे। 
दुर्भाग्य से आज विद्वान कम्यूनिज़्म को धर्म विरोधी कहते हैं और कम्युनिस्ट भी इसी मे गर्व महसूस करते हैं। धर्म जिसका अर्थ 'धारण करने'से है को न मानने के कारण ही सोवियत रूस मे कम्यूनिज़्म विफल हुआ और चीन मे सेना के दम पर जो शासन चल रहा है वह कम्यूनिज़्म के सिद्धांतों पर नहीं है। 'कम्यूनिज़्म' एक भारतीय अवधारणा है और उसे भारतीय परिप्रेक्ष्य मे ही सफलता मिल सकती है।

 'नास्तिक ' स्वामी विवेकानंद के अनुसार वह है जिसका अपने ऊपर विश्वास नहीं है और 'आस्तिक' वह है जिसका अपने ऊपर विश्वास है। लेकिन पोंगापंथी उल्टा पाठ सिखाते हैं। परंतु कम्युनिस्ट सीधी बात क्यों नहीं समझाते? 

~विजय राजबली माथुर ©

Sunday, December 31, 2017

हिन्दुत्व की राजनीति का गलत मुक़ाबला और ज़िद्द पर अड़ कर पाखंडियों के लिए खुला मैदान छोडना ------ विजय राजबली माथुर

हिन्दुत्व की राजनीति को समझते हुये उसका पर्दाफाश करना चाहिए और तर्क के आधार पर उसे अनैतिक व अधार्मिक सिद्ध करना चाहिए न कि, राहुल गांधी,अखिलेश यादव और ममता बनर्जी की भांति उसमें उलझ कर फंसना चाहिए। यदि हम सही मार्ग अपना सके तब ही आर एस एस और हिन्दुत्व की कार्पोरेटी राजनीति को परास्त कर सकेंगे अन्यथा  गलत राह पकड़ने पर  देश को दक्षिण पंथी तानाशाही का शिकार बना देंगे। 
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  हम डॉ भीम राव आंबेडकर के 27 फरवरी 1942 के वक्तव्य को देखें या डॉ जगदीश्वर चतुर्वेदी के 30 दिसंबर 2017 के फेसबुक स्टेटस को डॉ तेजल का वक्तव्य देखें अथवा प्रोफेसर अपूर्वा नन्द का साक्षात्कार सभी विद्वान आर एस एस के दुष्प्रचार के बढ़ते प्रसार से चिंतित दिखाई देते हैं । परंतु सिर्फ चिंता करने मात्र से समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। हमें वैज्ञानिक - वैचारिक आधार पर उसका प्रतिवाद करना और जनता को वास्तविकता समझाना चाहिए केवल आलोचना करके उनको परास्त नहीं कर सकते बल्कि उनका काम सुगम करना होगा।                                                                                   





अपूर्वा नन्द : 



जिसका  अपना  जीवन ही  'संतुलित ' नहीं वह संत कैसे ? : 
बहुत बड़े - बड़े विद्वान, साहित्यकार और पत्रकार भी कुछ असामाजिक प्रवृति के लोगों के लिए साधु , संत , महात्मा, आध्यात्मिक गुरु आदि आदि शब्दों का प्रयोग करते हैं। यह सब पढ़ कर वेदना होती है। मेरा अपना निजी विचार है कि, किसी भी शब्द का अपना एक विशेष महत्व और अर्थ होता है । मैंने जो निष्कर्ष निकाले हैं उनके अनुसार ------ 
समस्या की जड़ है-ढोंग-पाखंड-आडंबर को 'धर्म' की संज्ञा देना तथा हिन्दू,इसलाम ,ईसाईयत आदि-आदि मजहबों को अलग-अलग धर्म कहना जबकि धर्म अलग-अलग कैसे हो सकता है ? वास्तविक 'धर्म' को न समझना और न मानना और ज़िद्द पर अड़ कर पाखंडियों के लिए खुला मैदान छोडना संकटों को न्यौता देना है।
(1 ) धर्म= सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। 
(2 ) भगवान =  भ (भूमि-ज़मीन )+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I(अनल-अग्नि)+न (जल-पानी) । 
(3 ) चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इसलिए ये ही खुदा  हैं। 
(4 ) इनका कार्य G(जेनरेट )+O(आपरेट )+D(डेसट्राय) है अतः यही GOD हैं।
(5 ) अध्यात्म = अध्यन + आत्मा अपनी आत्मा का अध्यन करना आडंबर प्रदर्शन नहीं। 
(6 ) संत =  संतुलित हो जीवन जिसका। 
(7 ) साधु  =  साध चुका हो जो जीवन अपना। 
(8 ) भक्ति = "भक्ति"शब्द ढाई अक्षरों क़े मेल से बना है."भ "अर्थात भजन .कर्म दो प्रकार क़े होते हैं -सकाम और निष्काम,इनमे से निष्काम कर्म का (आधा क) और त्याग हेतु "ति" लेकर "भक्ति"होती है.आज भक्ति है कहाँ ?
(9 ) ज्योतिष =  अक्सर यह चर्चा सुनने को मिलती है की ज्योतिष का सम्बन्ध मात्र धर्म और आध्यात्म से है.यह विज्ञान सम्मत नहीं है और यह मनुष्य को भाग्य के भरोसे जीने को मजबूर कर के अकर्मण्य बना देता है.परन्तु ऐसा कथन पूर्ण सत्य नहीं है.ज्योतिष पूर्णतः एक विज्ञान है.वस्तुतः विज्ञान किसी भी विषय के नियम बद्ध  एवं क्रम बद्ध  अध्ययन को कहा जाता है.ज्योतिष के नियम खगोलीय गणना पर आधारित हैं और वे पूर्णतः वैज्ञानिक हैं  ********

वस्तुतः ज्योतिष में ढोंग पाखण्ड का कोंई स्थान नहीं है.परन्तु फिर भी हम देखते हैं कि कुछ लोग अपने निजी स्वार्थों की खातिर जनता को दिग्भ्रमित कर के ठगते हैं और उन्हीं के कारण सम्पूर्ण ज्योतिष विज्ञान पर कटाक्ष किया जाता है.यह एक गलत क्रिया की गलत प्रतिक्रिया है.जहाँ तक विज्ञान के अन्य विषयों का सवाल है वे What & How का तो जवाब देते हैं परन्तु उनके पास Why का उत्तर नहीं है.ज्योतिष विज्ञान में इस Why का भी उत्तर मिल जाता है.
ज्योतिष को विकृत व बदनाम किया है ब्राह्मण पुजारियों ने  :
ज्योतिष वह विज्ञान है जो मानव जीवन को सुंदर, सुखद व समृद्ध बनाने 
हेतु चेतावनी व उपाय बताता है। लेकिन आज इस विज्ञान को स्वार्थी व 
धूर्त लोगों ने पेट-पूजा का औज़ार बना कर इसकी उपादेयता को गौड़ कर 
दिया व इसे आलोचना का शिकार बना दिया है।
किन्तु हमारे विद्वान धर्म और ज्योतिष की ही आलोचना करते हैं न कि, गलत प्रयोग करने वालों की जिसका परिणाम यह होता है कि जनता गलत लोगों के चंगुल में फँसती रहती और अपना शोषण- उत्पीड़न करवाती रहती है। 
हिन्दुत्व की राजनीति को समझते हुये उसका पर्दाफाश करना चाहिए और तर्क के आधार पर उसे अनैतिक व अधार्मिक सिद्ध करना चाहिए न कि, राहुल गांधी,अखिलेश यादव और ममता बनर्जी की भांति उसमें उलझ कर फंसना चाहिए। यदि हम सही मार्ग अपना सके तब ही आर एस एस और हिन्दुत्व की कार्पोरेटी राजनीति को परास्त कर सकेंगे अन्यथा  गलत राह पकड़ने पर  देश को दक्षिण पंथी तानाशाही का शिकार बना देंगे। 

 




 ~विजय राजबली माथुर ©