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Tuesday, June 17, 2025

कांग्रेस का भविष्य: सोनिया-युग ------ Kanak Tiwari






(12) आज कांग्रेस यही बताने में मशगूल है कि यदि अंदरूनी संकट फोड़े की तरह फूट रहा हो तो उस पर सोनिया गांधी के हाथ ही मरहम लगा सकते हैं। लोग राजीव को उनके बुरे दिनों में इटली कांग्रेस का सरगना बताते थे। फिर भी उस परिवार से अपने संबंधों की डींग मारते अघाते नहीं थे। इटली से भारत आई नेहरू परिवार की बहू में कांग्रेस-रक्त होने से उनकी विश्वसनीयता और अनुकूलता इस कदर बढ़ी कि अच्छे से अच्छे अखाड़ची कांग्रेसी को विनय की मुद्रा में उनसे मिलने 10, जनपथ अपने राजनीतिक वजूद को बचाए रखने के लिए जाना पड़ता है। लोकसभा के चौदहवें चुनाव में सोनिया के समर्थन में दिया गया जन-ऐलान राजनीतिज्ञों और मीडिया सहित विदेशियों को भी चकित कर गया। ‘फील गुड‘ के निर्माता और ‘इंडिया शाइनिंग‘ के निर्देशक ‘फील बैड‘ करते अंधेरे में एक दूसरे की शूटिंग करते रहे। 10 जनपथ नई कांग्रेसी राजनीतिक संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण गवाह, खिलाड़ी और हस्ताक्षर है। 
मूल प्रश्न ये हैं:
(13) नेतृत्व को लेकर सोनिया गांधी निस्सन्देह वह ’फेवीकोल’ हैं जिससे पूरी पार्टी के टूटते हाथ पांव जुड़ जाते हैं। लेकिन कांग्रेस की आत्मा कहां है? स्वदेशी का विरोध, विचारों की सफाई, वंशवाद की बढ़ोत्तरी, समाजवाद का खात्मा, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का समर्थन और पश्चिमी अपसंस्कृति के सामने समर्पण करने के बाद कांग्रेस और अन्य दक्षिणपंथी पार्टियों में क्या फर्क रह जाता है? सड़क पर यदि कांग्रेस और भाजपा के दो कार्यकर्ता चलें, तो उन्हें देखकर कोई नहीं अलग अलग पहचान पाता, जबकि चार दशक पहले तक बात ऐसी नहीं थी। कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य भी गाहे बगाहे जीन्स और टी शर्ट्स पहनकर दूरदर्शन के झरोखों से जनता को निकट दर्शन देते हैं। पैन्ट कोट और विलायती सूट डांटे रहने का फैशन भी कांग्रेस में है। देहाती गंध की गमक लिए लाखों कांग्रेसी कार्यकर्ता अब दरी बिछाने वालों की जमात तक में शामिल नहीं हैं। अब तो उनके बदले शामियाना भंडार वाले कांग्रेस नगर रचने के ठेकेदार हो गये हैं। हर चीज अब बाजार से किराये पर है। पूरा मंच, शामियाना, खान-पान, विज्ञापन एजेन्सियों से ठेके में छपा साहित्य, ढोकर लाये गये श्रोता, भाषण पढ़ते अशुद्ध हिन्दी के नवजात प्रवाचक। ऐसा लगता है स्टूडियो में कांग्रेस-लीला नामक किसी फिल्म की शूटिंग हो रही है। 
(14) संघ परिवार पर कांग्रेस का तीखा आक्रमण तर्कसंगत है कि परिवार ने भारत की आज़ादी के लिए घरों में दुबक कर बैठने के अलावा कुछ नहीं किया। लेकिन आज खुद कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों में से कितनों ने अथवा उनके पूर्वजों ने आजादी के आन्दोलन में हिस्सेदारी की है? पराजय-विशेषज्ञ कांग्रेस की जीत की रणनीति बनाते हैं। जिन्होंने जीवन में कोई चुनाव नहीं लड़ा। जो अपने राज्य से एक वार्ड का चुनाव जीत नहीं पाते। जो लगातार हार रहे हैं। जो हारने के बावजूद राज्य सभा में आसानी से पहुंच जाते हैं, लेकिन दूसरों को नहीं जाने देते। जो आखिरी बार हार चुके हैं। ऐसे तत्व ने मिलकर कांग्रेस की अगली लोकसभा में जीत की गारन्टी करते रहते हैं। कांग्रेस कार्य समिति तथा प्रदेशों के कई शीर्ष नेता ऐसे भी हैं जिन्होंने कभी न कभी कांग्रेस छोड़ी भी है। इनमें से कई नेताओं ने तो इन्दिरा गांधी तक को धोखा दिया। फिर भी सोनिया गांधी उन पर विश्वास किए बैठी हैं। कांग्रेस अकेली पार्टी है जिसके संविधान में प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष पद एक ही व्यक्ति को दिए जाने के प्रावधान रचे गए हैं। जिस पार्टी में गांधी जैसा राज्य शक्ति की खिलाफत करने वाला नेता पैदा हुआ, उस पार्टी में खुले आम दिल्ली से लेकर पंचायतों तक वंशवाद की राजनीति चलाई जाती रही है। नेहरू गांधी परिवार ने यदि देश की सेवा की होगी तो कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों, मुख्यमंत्रियों, सांसदों और विधायकों के परिवार वालों को आम कांग्रेस कार्यकर्ता के ऊपर क्यों तरजीह दी जा रही है? पूरी पार्टी को कुछ परिवार क्यों जकड़े हुए हैं? 
(15) चाहे जो हो, मनमोहनसिंह को प्रधानमंत्री बनाया जाना सोनिया गांधी के यश के खाते की घटना नहीं हो सकती। कथित आर्थिक सुधारों का नायक जननायक नहीं होता। एक सेवानिवृत्त नौकरशाह के लिए इतनी पेंशन ठीक नहीं थी कि वह मूल वेतन से ही ज्यादा हो जाए। देश या कांग्रेस कोई घाटा उठाती ‘पब्लिक कम्पनी‘ नहीं रही है जिसका प्रबंधन विशेषज्ञ को इस भय के साथ सौंप दिया जाए, ताकि वह कम्पनी बीमार नहीं हो जाए। वह अर्थशास्त्र के अध्यापक की नौकरी नहीं बल्कि सेवा के अर्थ का अध्यापन है। मनमोहन सिंह ने ही वित्तमंत्री के रूप में वल्र्ड बैंक, गैट, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, निजीकरण जैसे शब्दों के अर्थ पढ़ाए हैं। सोनिया की विजय आक्रमण पर प्रतिरक्षा की विजय थी। विरोधाभास यह भी कि बहुलवादी संस्कृति में विश्वास करने वाली कांग्रेस एकल प्रचारक सोनिया तक कैद होकर रह गई। सोनिया गांधी इतिहास का भूकम्प नहीं हो सकतीं। वे अतिशयोक्ति अलंकार के काबिल भी नहीं हैं। हो सकता है मनमोहनसिंह को प्रधानमंत्री बनाने के पीछे कई राजनीतिक कारण भी रहे होंगे। 
 मनमोहन सिंह के बदले राजनीतिक व्यक्ति यदि प्रधानमंत्री होता तो पार्टी पतन के रास्ते पर शायद इस तेज़ी से नहीं जा पाती। एक गैरराजनीतिज्ञ, मनोनीत प्रधानमंत्री ने किसी अन्य लोकतंत्र में इस कदर अपना शिकंजा संगठन और सरकार पर नहीं कसा जैसा करतब भारत में हुआ। 
चुनावों में पराजय
(16) जनता ने 1989 के बाद कांग्रेस को केन्द्र की एकल सत्ता से बेदखल कर दिया। यह अलग बात है कि सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के कारण उसे पांच वर्ष सत्ता में रहने का राजनीतिक परिस्थितियों के कारण 1991 में अवसर मिल गया था और 2003 तथा 2008 में भी। लोकतंत्र में सत्तासीन होना ही कामयाब होना है। चुनावों में कांग्रेस का पतन फीनिक्स पक्षी की दंत-कथाओं की तरह उन तंतुओं से नहीं बना है, जिनमें पांच सौ बरस बाद भी शरीर के भस्म हो जाने पर राख से जी उठने की कालजयी कुदरती क्षमता होती है। सवाल उठता रहा कि आत्महंता और अहंकारी तथा अधकचरे कांग्रेसियों के हुजूम को किसी अनुशासित सेना में बदलने की शक्ति क्या कांग्रेस के नेतृत्व में बची रही है? सवाल उठता रहा कि भविष्य यानी वक्त एक निर्मम हथियार है। उसे कांग्रेसियों की गरदन से भी कोई परहेज़ नहीं है। क्या कांग्रेस आत्म प्रशंसा में गाफिल रही अथवा निराशा के महासमुद्र में विलीन होने को बेताब हो गई थी? क्या कांग्रेस के कर्णधार केवल उनके पूर्वजों के गौरवशाली इतिहास को ढोने लेकिन नहीं बांचने का दंभ लिए हुए मतदाताओं को घर की मुर्गी समझते रहेंगे?














  ~विजय राजबली माथुर ©