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Saturday, July 5, 2014

ब्रह्मांड प्रकृति भगवान और धर्म के नाम पर अधर्म का हैवान ---विजय राजबली माथुर


घूम रहे ब्रह्माण्ड में कितने तारे, ग्रह, नक्षत्र
किंतु प्रकृति ने बस हमको ही दी है
मीठे पानी की नदियाँ, सुंदर झरने और हरे भरे वन.
लेकिन हमने प्रकृति के उपहार का बस उपहास बनाया
जैसे चाहा वैसे इसको रौंदा, कुचला, दास बनाया.
धरती की छाती पर हमने, गाड़ के खूंटे, बाँट ली धरती,
जब कराह से काँपी धरती, हम बोले भूचाल है आया.
नदियों को मैला करके, हालत कर दी नाले से बदतर,
नदियाँ तट को तोड़ चलीं, तो हम बोले कि बाढ़ है आई.
काट दिए सब जंगल, वन और पर्वत को नंगा कर डाला,
बारिश रस्ता भूल गई और हम बोले सूखा है आया.
जाने क्या क्या बहा दिया जब हमने सागर के पानी में,
सागर ने प्रतिकार किया तो हमने कहा सूनामी आई.
.
प्रकृति माँ है, हमने प्रकृति का कितना अपमान किया
माँ के जब आँसू निकले, प्राकृतिक आपदा नाम दिया.
बात याद रखनी थी जो वह भूल गया क्यों अपना मन
प्रकृति ने बस हमको दी है, मीठे पानी की नदियाँ,
सुंदर झरने और हरे भरे वन!!






 (यह चिंता 21 मार्च 2012 को फेस बुक पर बिहारी बाबू -सलिल वर्मा जी ने  व्यक्त की थी। उनकी यह रचना और चिन्ता मुझे सर्वोत्कृष्ट प्रतीत हुई  इसका समाधान मै नीचे दे रहा हूँ):


                                        यज्ञ  माहात्म्य

लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की।
जो वस्तु अग्नि मे जलाई,हल्की होकर वो ऊपर उड़ाई।
करे वायु से मिलान,जाती है रस्ता गगन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 1 । ।

फिर आकाश मण्डल मे भाई,पानी की होत सफाई।
वृष्टि होय अमृत समान,वृद्धि होय अन्न और धन की।
लिखा वेदों मे विधान,अद्भुत है महिमा हवन की। । 2 । ।

जब अन्न की वृद्धि होती है,सब प्रजा सुखी होती है।
न रहता दु : ख का निशान ,आ जाती है लहर अमन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 3 । ।

जब से यह कर्म छुटा है,भारत का भाग्य लुटा है।
'सुशर्मा'करते बयान सहते हैं मार दु :खन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 4 । ।

जनाब 'हवन' एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। कैसे? Material  Science (पदार्थ विज्ञान ) के अनुसार अग्नि मे जो भी चीजें डाली जाती हैं उन्हे अग्नि परमाणुओ (Atoms) मे विभक्त कर देती है और वायु उन परमाणुओ को बोले गए मंत्रों की शक्ति से संबन्धित ग्रह अथवा देवता तक पहुंचा देती है।

देवता=जो देता है और लेता नहीं है जैसे-अग्नि,वायु,आकाश,समुद्र,नदी,वृक्ष,पृथ्वी,ग्रह-नक्षत्र आदि।(पत्थर के टुकड़ों तथा कागज पर उत्कीर्ण चित्र वाले नहीं )। 

मंत्र शक्ति=सस्वर मंत्र पाठ करने पर जो तरंगें (Vibrations) उठती हैं वे मंत्र के अनुसार संबन्धित देवता तक डाले गए पदार्थों के परमाणुओ को पहुंचा देती हैं।

अतः हवन और मात्र हवन (यज्ञ ) ही वह पूजा या उपासना पद्धति है जो कि पूर्ण रूप से वैज्ञानिक सत्य पर आधारित है। बाकी सभी पुरोहितों द्वारा गढ़ी गई उपासना पद्धतियेँ मात्र छ्ल हैं-ढोंग व पाखंड के सिवा कुछ भी नहीं हैं। चाहे उनकी वकालत प्रो . जैन अर्थात 'ओशो-रजनीश' करें या आशा राम बापू,मुरारी बापू,अन्ना/रामदेव,बाल योगेश्वर,आनंद मूर्ती,रवी शंकर जैसे ढ़ोंगी साधू-सन्यासी। 'राम' और 'कृष्ण' की पूजा करने वाले राम और कृष्ण के शत्रु हैं क्योंकि वे उनके बताए मार्ग का पालन न करके ढ़ोंगी-स्वांग रच रहे हैं। राम को तो विश्वमित्र जी 'हवन'-'यज्ञ 'की रक्षा हेतु बाल काल मे ही ले गए थे। कृष्ण भी महाभारत के युद्ध काल मे भी हवन करना बिलकुल नहीं भूले। जो लोग उनके द्वारा प्रदर्शित मार्ग -हवन करना छोड़ कर उन्हीं की पूजा कर डालते हैं वे जान बूझ कर उनके कर्मों का उपहास उड़ाते हैं। राम और कृष्ण को 'भगवान' या भगवान का अवतार बताने वाले इस वैज्ञानिक 'सत्य ' को स्वीकार नहीं करते कि 'भगवान' न कभी जन्म लेता है न उसकी मृत्यु होती है। अर्थात भगवान कभी भी 'नस' और 'नाड़ी' के बंधन मे नहीं बंधता है क्योंकि,-

भ=भूमि अर्थात पृथ्वी।
ग=गगन अर्थात आकाश।
व=वायु।
I=अनल अर्थात अग्नि (ऊर्जा )।
न=नीर अर्थात जल।

प्रकृति के ये पाँच तत्व ही 'भगवान' हैं और चूंकि इन्हें किसी ने बनाया नहीं है ये खुद ही बने हैं इसी लिए ये 'खुदा' हैं। ये पांचों तत्व ही प्राणियों और वनस्पतियों तथा दूसरे पदार्थों की 'उत्पत्ति'(GENERATE),'स्थिति'(OPERATE),'संहार'(DESTROY) के लिए उत्तरदाई हैं इसलिए ये ही GOD हैं। पुरोहितों ने अपनी-अपनी दुकान चमकाने के लिए इन को तीन अलग-अलग नाम से गढ़ लिया है और जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ रहे हैं। इनकी पूजा का एकमात्र उपाय 'हवन' अर्थात 'यज्ञ' ही है और कुछ भी कोरा पाखंड एवं ढोंग।

                                         यज्ञ महिमा

होता है सारे विश्व का कल्याण यज्ञ से।
जल्दी प्रसन्न होते हैं भगवान यज्ञ से। ।

1-ऋषियों ने ऊंचा माना है स्थान यज्ञ का।
करते हैं दुनिया वाले सब सम्मान यज्ञ का।
दर्जा है तीन लोक मे-महान यज्ञ का।
भगवान का है यज्ञ और भगवान यज्ञ का।
जाता है देव लोक मे इंसान यज्ञ से। होता है ...........

2-करना हो यज्ञ प्रकट हो जाते हैं अग्नि देव।
डालो विहित पदार्थ शुद्ध खाते हैं अग्नि देव।
सब को प्रसाद यज्ञ का पहुंचाते हैं अग्नि देव।
बादल बना के भूमि पर बरसाते हैं अग्निदेव।
बदले मे एक के अनेक दे जाते अग्नि देव।
पैदा अनाज होता है-भगवान यज्ञ से।
होता है सार्थक वेद का विज्ञान यज्ञ से। होता है ......

3-शक्ति और तेज यश भरा इस शुद्ध नाम मे ।
 साक्षी यही है विश्व के हर नेक काम मे।
 पूजा है इसको श्री कृष्ण-भगवान राम ने।
होता है कन्या दान भी इसी के सामने।
मिलता है राज्य,कीर्ति,संतान यज्ञ से।
सुख शान्तिदायक मानते हैं सब मुनि इसे। होता है .....

4-वशिष्ठ विश्वमित्र   और नारद मुनि इसे।
इसका पुजारी कोई पराजित नहीं होता।
भय यज्ञ कर्ता को कभी किंचित नहीं होता।
होती हैं सारी मुश्किलें आसान यज्ञ से। होता है ......

5-चाहे अमीर है कोई चाहे गरीब है।
 जो नित्य यज्ञ करता है वह खुश नसीब है।
हम सब मे आए यज्ञ के अर्थों की भावना।
'जख्मी'के सच्चे दिल से है यह श्रेष्ठ कामना।
होती हैं पूर्ण कामना--महान यज्ञ से । होता है ....  



हम जानते हैं कि आपके इर्द-गिर्द छाए   हज़ारे/केजरीवाल  और सुबरमनियम स्वामी के चेले-चपाटे  आपको हकीकत  स्वीकारने नहीं देंगे। नीचे स्कैन मे आप ओज़ोन पर्त की जो समस्या देख रहे हैं वह भी 'हवन'पद्धती को त्यागने का ही परणाम है। -



Hindustan-Lucknow-30/03/2012



भोपाल गैस कांड के बाद यूनियन कारबाईड ने खोज करवाई थी कि तीन परिवार सकुशल कैसे बचे। निष्कर्ष मे ज्ञात हुआ कि वे परिवार घर के भीतर हवन कर रहे थे और दरवाजों व खिड़कियों पर कंबल पानी मे भिगो कर डाले हुये थे। ट्रायल के लिए गुजरात मे अमेरिकी वैज्ञानिकों ने 'प्लेग' के कीटाणु छोड़ दिये। इसका प्रतिकार करने हेतु सरकार ने हवन के पैकेट बँटवाए थे और 'हवन' के माध्यम से उस प्लेग से छुटकारा मिला था। तब से लगातार अमेरिका मे 'अखंड हवन' चल रहा है और जो ओजोन का छिद्र अमेरिका के ऊपर था वह खिसक कर दक्षिण-पूर्व एशिया की तरफ आ गया है। लेकिन भारत के लोग ओशो,मुरारी और आशाराम बापू ,रामदेव,अन्ना हज़ारे,गायत्री परिवार जैसे ढोंगियों के दीवाने बन कर अपना अनिष्ट कर रहे हैं । परिणाम क्या है  एक विद्वान ने यह बताया है-


परम पिता से प्यार नहीं,शुद्ध रहे व्यवहार नहीं। 
इसी लिए तो आज देख लो ,सुखी कोई परिवार नहीं। । परम ... । । 
फल और फूल अन्य इत्यादि,समय समय पर देता है। 
लेकिन है अफसोस यही ,बदले मे कुछ नहीं लेता है। । 
करता है इंकार नहीं,भेद -भाव तकरार  नहीं। 
ऐसे दानी का ओ बंदे,करो जरा विचार नहीं। । परम ....। । 1 ।  ।
मानव चोले मे ना जाने कितने यंत्र लगाए हैं। 
कीमत कोई माप सका नहीं,ऐसे अमूल्य बनाए हैं। । 
कोई चीज बेकार नहीं,पा सकता कोई पार नहीं । 
ऐसे कारीगर का बंदे ,माने तू उपकार नहीं। । परम ... । । 2 । । 
जल,वायु और अग्नि का,वो लेता नहीं सहारा है। 
सर्दी,गर्मी,वर्षा का अति सुंदर चक्र चलाया है। । 
लगा कहीं दरबार नहीं ,कोई सिपाह -सलारनहीं। 
कर्मों का फल दे सभी को ,रिश्वत की सरकार नहीं। । परम ... । । 3 । । 
सूर्य,चाँद-सितारों का,जानें कहाँ बिजली घर बना हुआ। 
पल भर को नहीं धोखा देता,कहाँ कनेकशन लगा हुआ। । 
खंभा और कोई तार नहीं,खड़ी कोई दीवार नहीं। 
ऐसे शिल्पकार का करता,जो 'नरदेव'विचार नहीं। । परम .... । । 4 । ।  
आज  इस पाखंडी नारे का परित्याग करने कि-सीता राम,सीता राम कहिए जाहि विधि राखे राम ताही विधि रहिए-और वास्तविकता को स्वीकारते हुये इस तथ्य का पालन करने का संकल्प लेना चाहिए कि,"सीता-राम,सीता-राम कहिए ---जाहि विधि रहे राम ताही विधि रहिए।"
आलसी और अकर्मण्य लोग राम को दोष दे कर बच निकलना चाहते हैं।  राम ने जो त्याग किया  और कष्ट देश तथा देशवासियों के लिए खुद व पत्नी सीता सहित सहा उसका अनुसरण करने -पालन करने की जरूरत है । राम के नाम पर आज देश को तोड़ने और बांटने की साजिशे हो रही हैं जबकि राम ने पूरे 'आर्यावृत ' और 'जंबू द्वीप'को एकता के सूत्र मे आबद्ध किया था और रावण के 'साम्राज्य' का विध्वंस किया था । राम के नाम पर क़त्लो गारत करने वाले राम के पुजारी नहीं राम के दुश्मन हैं जो साम्राज्यवादियो के मंसूबे पूरे करने मे लगे हुये हैं । जिन वेदिक नियमों का राम ने आजीवन पालन किया आज भी उन्हीं को अपनाए जाने की नितांत आवश्यकता है।


  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Monday, April 14, 2014

दीवार पर लिखे को न समझा तो भारत झेलेगा प्रकृति का रौद्र रूप......




एक नज़र पूर्व प्रकाशित इस लेख पर भी डाल लें :


"Friday, July 8, 2011


विकास या विनाश

१९४७ में जब हमारा देश औपनिवेशिक गुलामी से आजाद हुआ था तो हमारे यहाँ सुई तक नहीं बंनती थी और आज हमारे देश में राकेट ,मिसाईलें तक बनने लगी हैं.विकास तो हुआ है जो दीख रहा है उसे झुठलाया नहीं जा सकता.लेकिन यह सारा विकास ,सारी प्रगति,सम्पूर्ण समृद्धि कुछ खास लोगों के लिए है शेष जनता तो आज भी भुखमरी,बेरोजगारी,कुपोषण आदि का शिकार है.गरीब और गरीब तथा अमीर और अमीर हुआ है.आजादी का अर्थ यह नहीं था.इसके लिए सरदार भगत सिंह,चंद्रशेखर आजाद,रामप्रसाद बिस्मिल,अश्फाक उल्लाह खां,रोशन लाल लाहिरी आदि अनेकों क्रांतिकारियों ने कुर्बानी नहीं दी थी.यह मार्ग विकास का नहीं ,विनाश का है.

विकास का लाभ आम जन को मिले इस उद्देश्य से प्रेरित नौजवानों नें नक्सलवाद का मार्ग अपना लिया और छत्तीस गढ की भाजपा सरकार ने इन्हें कुचलने हेतु 'सलवा-जुडूम' तथा एस पी ओ का गठन स्थानीय युवकों को लेकर कर लिया था जिसे भंग करने का आदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि,"इस सशस्त्र विद्रोह के लिए सामजिक,आर्थिक विषमता,भ्रष्ट शासन तंत्र और 'विकास के आतंकवाद'  हैं".

जस्टिस बी.सुदर्शन रेड्डी का मत है-"मिडिल क्लास की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए हो रहे औद्योगिकीकरण व् अंधाधुंध माइनिंग के कारण किसान जमीन-जंगल से लगातार बेदखल हो रहे हैं.नक्सल आंदोलन के पैदल सिपाही यही किसान और आदिवासी हैं"

(Hindustan-08/07/2011-Lucknow-Page-16)


"कोरिया की पास्को कं.को उड़ीसा में ५० वर्ष तक लौह अयस्क ले जाने हेतु किसानों की उपजाऊ जमीन दे दी गयी है लेकिन किसान कब्ज़ा नहीं छोड़ रहे हैं और ऐसा करना उनका जायज हक है.२४ जून को सारे देश में किसानों के प्रति एकजुटता प्रदर्शित करने हेतु 'पास्को विरोधी दिवस' मनाया गया था (इस ब्लाग में इस आशय का एक लेख भी दिया था),किन्तु अधिकाँश लोग अपने-अपने में मस्त थे,उन्हें उड़ीसा के गरीब किसानों से कोई मतलब नहीं था .नंदीग्राम और सिंगूर में हल्ला बोलने वाली मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी भी चुप्पी साधे रहीं.

'नया जमाना',सहारनपुर के संस्थापक संपादक स्व.कन्हैया लाल मिश्र'प्रभाकर' ने आर.एस.एस.नेता लिमये जी से एक बार कहा था कि शीघ्र ही दिल्ली की सत्ता के लिए सड़कों पर संघियों-कम्यूनिस्टों के मध्य संघर्ष होगा.दिल्ली नहीं तो छत्तीस गढ़ में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पूर्व यह हो ही रहा था.१९२५ में आजादी के आंदोलन को गति प्रदान करने हेतु जब 'भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी' का गठन किया गया तो ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने अपने पृष्ठपोषक बुद्धिजीवियों को बटोर कर आर.एस.एस.का गठन करवा दिया जिसने साम्राज्यवाद की सहोदरी 'साम्प्रदायिकता' को पाला-पोसा और अंततः देश का विभाजन करा दिया.१९४७ में हुआ विभाजन १९७१ में एक और विभाजन लेकर आया जिसने दो राष्ट्रों की थ्योरी को ध्वस्त कर दिया.भारत के ये तीनों हिस्से भीषण असमानता के शिकार हैं.तीनों जगह सत्ताधीशों ने अवैध्य कमाई के जरिये जनता का खून चूसा है.तीनों जगह आम जनता का जीवन यापन करना बेहद मुश्किल हो रहा है.सरकारें साम्राज्यवाद के आधुनिक मसीहा अमेरिका के इशारे पर काम कर रही हैं न कि अपने-अपने देश की जनता के हित में.

तीनों देशों में फिरकापरस्त लोग अफरा-तफरी फैला कर जीवन की मूलभूत समस्याओं से ध्यान हटा रहे हैं.लोक-लुभावन नारे लगा कर पूंजीपतियों के पिट्ठू ही साधारण जन को ठग कर सत्ता में पहुँच जाते हैं.जाति,धर्म.सम्प्रदाय,गोत्र ,क्षेत्रवाद की आंधी चला कर सर्व-साधारण को गुमराह कर दिया जाता है.जो लोग गरीबों के रहनुमा हैं किसानों और मजदूरों के हक के लड़ाका हैं वे अपने अनुयाइयों के वोट हासिल नहीं कर पते हैं और सत्ता से वंचित रह जाते हैं.नतीजा साफ़ है जो प्रतिनिधि चुने जाते हैं वे अपने आकाओं को खुश करने की नीतियाँ और क़ानून बनाते हैं ,आम जन तो उनकी वरीयता में होता ही नहीं है.

क्या आम जनता इसके लिए उत्तरदायी है?कुछ हद तक तो है ही क्योंकि वही तो जाति,धर्म ,सप्रदाय के बहकावे में गलत लोगों को वोट देकर भेजती है.लेकिन इसके लिए जिम्मेदार मुख्य रूप से समाज में प्रचलित अवैज्ञानिक मान्यताएं और धर्म के नाम पर फैले अंध-विशवास एवं पाखण्ड ही हैं.विज्ञान के अनुयायी और साम्यवाद के पक्षधर सिरे से ही धर्म को नकार कर अधार्मिकों के लिए मैदान खुला छोड़ देते हैं जिससे उनकी लूट बदस्तूर जारी रहती है और कुल नुक्सान साम्यवादी-विचार धारा तथा वैज्ञानिक सोच को ही होता है.

धर्म=जो धारण करता है वही धर्म है -यह धारणा कैसे अवैज्ञानिक और मजदूर-किसान विरोधी हो गयी.लेकिन किसान-मजदूर विरोधी लोग जम कर धर्म की गलत व्याख्या प्रस्तुत करके किसान और मजदूर को उलटे उस्तरे से लूट ले जाते हैं क्योंकि हम सच्चाई बताते ही नहीं तो लोग झूठे भ्रम जाल में फंसते चले जाते हैं.

भगवान=भूमि का 'भ'+गगन का 'ग'+वायु का 'व्'+अनल(अग्नि)का अ ='I'+नीर(जल)का' न ' मिलकर ही भगवान शब्द बना है यह कैसे अवैज्ञानिक धारणा हुयी,किन्तु हम परिभाषित नहीं करते तो ठग तो भगवान के नाम पर ही जनता को लूटते जाते हैं.

(चूंकि प्रकृति के ये पांचों तत्व(भगवान) खुद ही बने हैं इनको किसी ने बनाया नहीं है इसलिए ये ही सम्मिलित रूप से 'खुदा' हैं। इनका कार्य उत्पत्ति (GENERATE),पालन (OPRATE) और संहार (DESTROY)है अर्थात ये ही GOD हैं )
मंदिरों से प्राप्त खजाने इस बात का गवाह हैं कि ये मंदिर बैंकों की भूमिका में थे जहाँ समाज का धन सुरक्षित रखा गया था लेकिन आज इसे 'ट्रस्ट'के हवाले करके समृद्ध लोगों की मौज मस्ती का उपाय मुकम्मिल करने की बातें हो रही हैं.१९६२ में गोला बाजार,बरेली में हम लाला धरम प्रकाश जी के मकान में किराए पर रहते थे.जो दीवार कच्ची अर्थात मिट्टी की बनी थी उसे ढहा कर उन्होंने पक्की ईंटों की दीवार बनवाई .कच्ची दीवार से गडा खजाना निकला तुरंत पुलिस पहुँच गयी क्योंकि कानूनन पुराना खजाना सरकार  या समाज की संपत्ति है.पुलिस को भेंट चढा कर उन्होंने रिपोर्ट लगवा दी खजाने की खबर झूठी थी.लेकिन मंदिरों से प्राप्त खजाने की खबर तो झूठी नहीं है फिर इसे किसी ट्रस्ट को क्यों सौंपने की बातें उठ रही हैं ,यह क्यों नहीं सीधे सरकारी खजाने में जमा किया जा रहा है?यदि यह धन सरकारी खजाने में पहुंचे तो गरीब तबके के विकास और रोजगार की अनेकों योजनाएं परिपूर्ण हो सकती हैं.जो करोड़ों लोग भूख से बेहाल हैं उन्हें दो वक्त का भोजन नसीब हो सकता है.

कहीं भी किसी भी उपासना स्थल से प्राप्त होने वाला खजाना राष्ट्रीय धरोहर घोषित होना चाहिए न कि किसी विशेष हित -साधना का माध्यम बनना चाहिए.चाहे संत कबीर हों ,चाहे स्वामी दयानंद अथवा स्वामी विवेकानंद और चाहे संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन डाक्टर अम्बेडकर सभी ने आम जन के हित पर बल दिया है न कि वर्ग विशेष के हित पर.अतः यदि समय रहते आम जन का समाज ने ख्याल नहीं किया तो आम जन बल प्रयोग द्वारा समाज से अपना हक हासिल कर ही लेगा."

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उपर्युक्त लेख में सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों को ही शामिल किया गया है किन्तु यदि प्रकृति की 'प्रकृति' को न समझा गया तो जैसा  कि वैज्ञानिक खोजें बता रही हैं भारत को उत्तराखंड,कुम्भ,देवघर,आदि सरीखी प्राकृतिक विभीषीकाओं  का निश्चय ही सामना करना पड़ेगा। यदि इनसे बचाव करना है तो इस अवैज्ञानिक विकास (वस्तुतः विनाश ) की प्रक्रिया को पूर्ण विराम देकर मानवोचित समाज-व्यवस्था भी स्थापित करनी होगी,समानता पर आधारित राज-व्यवस्था भी स्थापित करनी होगी और प्रकृति से सामंजस्य वाली प्राचीन भारतीय पद्धती भी पुनर्स्थापित करनी होगी। ऐसी संभावनाएं फिलहाल अभी तो न के बराबर हैं। अतः तैयार रहना होगा प्राकृतिक प्रकोप झेलने को।
  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है। 
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28-04-2015 : 

Friday, October 28, 2011

मनोज दास जी,बाम-पंथ और आध्यात्मिकता

हिंदुस्तान,लखनऊ,25 अक्तूबर,2011 
उडिया भाषा के प्रख्यात साहित्यकार मनोज दास जी जो खुद बाम-पंथी रहे हैं और अब आध्यात्मिकता के मार्ग से जन-कल्याण मे लगे हुये हैं यहाँ स्पष्ट रूप से कह गए हैं कि 'बुकर पुरस्कार' भारत को नीचा दिखाने वालों को दिया जाता है और "बुकर पुरस्कार तय करने वाली कमेटी सामाजिक यथार्थ और कामुकता का काकटेल है।"

अभी कुछ ही दिनों पहले जन-लोकपाल को नियुक्त करने की कमेटी मे 'बुकर' पुरस्कार प्राप्त लोगों को रखने की मांग एक भारत-विरोधी शख्स ने खुले आम रखी थी। उसी शख्स ने स्वाधीनता दिवस पर ब्लैक आउट रखवाया था उसी ने राष्ट्रध्वज का अपमान करवाया था और आज भी वह तथा उसके गैंग के लोग निर्बाध  घूम रहे हैं।दुर्भाग्य यह है कि विद्वान भी जिनमे इंटरनेटी ब्लागर्स भी शामिल हैं उसी देशद्रोही शख्स के अंध-भक्त बने हुये हैं।

मनोज दास जी ने बताया है कि आज 36 प्रतिशत लोग 'अवसाद'-डिप्रेशन -से ग्रस्त हैं । बच्चों को अपने माँ-बाप पर नही ,फेसबुक और एस एम एस पर विश्वास है।मेरे विचार मे  उसी प्रकार इंटरनेटी ब्लागर्स को देश-भक्तों पर नही 'अन्ना' पर विश्वास है। अन्ना आंदोलन कांग्रेस  के मनमोहन गुट,संघ/भाजपा ,भारतीय और अमेरिकी कारपोरेट घरानों तथा अमेरिकी प्रशासन के सहयोग  से 'कारपोरेट-भ्रष्टाचार के संरक्षण' हेतु चलाया गया था। अपने उद्देश्य मे वह जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ कर पूरी तरह सफल रहा है।  टाटा,अंबानी,नीरा राडिया आदि उद्योगपति और उनके दलाल जिनहोने 'राजा' आदि मंत्री अपने हितार्थ बनवाए खुले घूम रहे हैं और राजा आदि मंत्री जिनहोने इन उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाया जेल मे विराजमान हैं। राजनेताओं का मखौल उड़ाने वाली किरण बेदी एयर टिकटों का घपला करके और अरविंद केजरीवाल प्राप्त चंदे मे घपला करके भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन मे जनता को बेवकूफ बना रहे थे। हमारे इंटरनेटी ब्लागर्स उनका गुणगान कर रहे थे/हैं। सम्पूर्ण परिस्थितियों के लिए धर्म के नाम पर फैली अधार्मिकता जिम्मेदार है। लेकिन अफसोस कि हमारा बाम-पंथ अधार्मिकों की परिभाषा स्वीकार करके धर्म का विरोध करता तथा जनता की सहानुभूति खोता रहता है। जब मै धर्म की परिभाषा बताने का प्रयास करता हूँ तो सांप्रदायिक तत्व मुझ पर प्रहार करते हैं और हमारे बाम-पंथी बंधु भी उसका विरोध करते हैं। 'सत्य' कड़ुवा होता है और उसे कोई भी स्वीकार नहीं करना चाहता।

आध्यात्मिकता=अध्ययन +आत्मा= अपनी आत्मा का अध्ययन करना ही अध्यात्म है।


धर्म=जो धारण करता है (शरीर को धारण करने हेतु जो आवश्यक है वही धर्म है बाकी सब अधर्म है,एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए मूली अथवा दही का सेवन करना धर्म है लेकिन जुकाम-खांसी के रोगी व्यक्ति हेतु वही दही अथवा मूली सेवन अधर्म है)। यह व्यक्ति सापेक्ष है। सब को एक ही तरह नहीं हाँका जा सकता।

भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन)+व (वायु)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)। इन पाँच प्रकृतिक तत्वों के समन्वय को भगवान कहते हैं इनके पहले अक्षरों के संयोजन से और चूंकि ये खुद ही बने हैं इन्हें किसी ने बनाया नहीं है इसीलिए इन्हे 'खुदा' भी कहते हैं और चूंकि ये GENERATE,OPERATE ,DESTROY करते हैं पहले अक्षरों के संयोजन से इन्हे ही GOD भी कहते हैं। भगवान=खुदा =GOD तीनों एक ही के तीन नाम हैं। मतभेद कहाँ है?

मतभेद जो है वह दलालों=पुरोहितों ने अपने निजी स्वार्थ मे जनता को बाँट कर शोषण करने हेतु उत्पन्न किया है। अतः हमे पुरोहितवाद का जम कर और डट कर विरोध करना है न कि,अध्यात्म,भगवान,खुदा या गाड का या शरीर को धारण करने वाले धर्म का।

बाम-पंथ,कम्यूनिस्ट और वैज्ञानिक यहीं गलती करते हैं कि वे ढ़ोंगी-पोंगापंथी-पुरोहितों की व्याख्या को धर्म मान कर धर्म का विरोध करते हैं। महर्षि कार्ल मार्क्स ने भी पुरोहितवाद को ही धर्म मान कर उसका विरोध किया है। आज के कम्यूनिस्ट भी दक़ियानूसी पोंगापंथियों के काले कारनामों को ही धर्म मान कर धर्म का विरोध करते हैं जबकि उन्हे वास्तविकता को समझ कर,पहचान कर जनता को भी समझाना चाहिए तभी 'मानव को मानव के शोषण 'से मुक्त कराकर 'मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध' बनाया जा सकेगा अन्यथा पुरोहितवाद का शिकार होकर परस्पर संघर्षरत रह कर जनता अपना उल्टे उस्तरे से मुंडन कराती रहेगी।

साहित्यकार मनोज दास जी ने जनता को  बामपंथ के मर्म  को समझाने हेतु अध्यात्म का मार्ग अपना कर एक  सकारात्मक पहल की है। हम उनके प्रयासों की सफलता की कामना करते हैं और 'भाई-दोज़' के इस पावन पर्व पर दुनिया मे भाई-चारा और अमन कायम करने की दिली ख़्वाहिश रखते हैं।

'भाई-दोज' पर' चित्रगुप्त-पूजा' भी होती है। 'चित्रगुप्त' के संबंध मे भी पुरोहितवाद ने भ्रांति फैला रखी है। ढोंगियों के अनुसार ब्रह्मा जी की काया से उत्पन्न होने के कारण 'कायस्थ'कहलाने वाले चित्रगुप्त की एक पत्नी ब्राह्मण कन्या और दूसरी नाग कन्या थीं। पढे-लिखे और समझदार कहलाने वाले कायस्थ इसे ही सही मान कर इतराते हैं। लेकिन यह पुरोहितवाद के शिकंजे को और मजबूत करने वाली मनगढ़ंत दन्त-कथा है।

वस्तुतः अब से दस लाख वर्ष पूर्व जब मानव आज जैसी स्थिति मे आया तो बुद्धि,ज्ञान और विवेक द्वारा उसने मनन करना प्रारम्भ किया और इसीलिए वह 'मनुष्य' कहलाया। उस समय 'काया' से संबन्धित ज्ञान देने वाले को 'कायस्थ' कहा गया। अर्थात मनुष्य की 'काया' से संबन्धित सभी प्रकार का ज्ञान देना इस कायस्थ का कर्तव्य था। 12 राशियों के आधार पर चित्रगुप्त की 12 संतानों की गणना प्रचलित हो गई। 

'चित्रगुप्त' कोई व्यक्ति-विशेष नहीं है बल्कि प्रत्येक मनुष्य के 'अवचेतन-मस्तिष्क' मे  गुप्त रूप से सक्रिय रहने वाला उसका अपना ही 'चित्त' है । प्रत्येक मनुष्य द्वारा किए गए सदकर्म,दुष्कर्म और अकर्म का लेखा-जोखा उसके अपने मस्तिष्क के इसी 'चित्त' पर गुप्त रूप से अंकित होता रहता है जो मोक्ष-प्राप्ति तक जन्म-जन्मांतर मे उस मनुष्य के 'कारण शरीर' और 'सूक्ष्म शरीर' के साथ उसकी 'आत्मा' के साथ चलता रहता है और उसी अनुरूप आगामी जन्म मे उसका 'भाग्य' या प्रारब्ध निर्धारित होता है।

अतः चित्रगुप्त पूजा का अभिप्राय तो मानव मस्तिष्क मे  इस 'गुप्त' रूप से अवस्थित 'चित्त' को स्वस्थ व संतुलित रखने से है न कि,पुरोहितवादी वितंडवाद  मे फँसने से।

बढ़ती आबादी के साथ-साथ जब  'कायस्थ' पर अधिक भार हो गया तो 'श्रम-विभाजन' के आधार पर शिक्षा को चार वर्गों मे बाँट दिया गया-
1-ब्रह्मांड से संबन्धित ज्ञान को ब्रह्म-विद्या और देने वाले को 'ब्राह्मण' कहा गया ,उत्तीर्ण करने पर विद्यार्थी को 'ब्राह्मण' की उपाधी दी जाती थी। 
2-क्षात्र विद्या जिसमे सैन्य तथा सामान्य प्राशासन आता था को 'क्षत्री' कहा गया। 
3-व्यापार,बानिज्य से समांबंधित ज्ञान को 'वैश्य' -उपाधि  से विभूषित किया गया। 
4-विभिन्न प्रकार की सेवाओं से संबन्धित ज्ञान प्राप्त  करने वालों को 'क्षुद्र' की उपाधि मिलती थी। 

ये चारों उपाधियाँ अर्जित ज्ञान के आधार पर थीं। 'कर्म' करना उनका उद्देश्य था। जैसे बिना डिग्री के डॉ की संतान डॉ नहीं हो सकती,इंजीनियर की संतान बिना डिग्री के इंजीनियर नहीं हो सकती उसी प्रकार उस समय भी ये उपाधियाँ ज्ञानार्जन से प्राप्त करने वाला ही उसके अनुरूप उन्हें धारण व उनका उपयोग कर सकता था। एक ही पिता की अलग-अलग सन्तानें उपाधि के आधार पर -ब्राह्मण,क्षत्री,वैश्य और क्षुद्र हो सकती थीं।

कालांतर मे शोषणवादी व्यवस्था मे 'पुरोहितवाद' पनपा और उसने इन उपाधियों-डिगरियों के स्थान पर 'कर्म'सिद्धान्त की अवहेलना करके 'जातिगत'व्यवस्था फैला दी जो आज तक उत्पीड़न और शोषण का माध्यम बनी हुई है।

जरूरत तो इस बात की है कि अपनी प्राचीन 'कर्म-सिद्धान्त'पर आधारित ज्ञान-व्यवस्था को बहाल करने मे कम्यूनिस्ट तथा बामपंथी कोशिश करें तथा जनता को जागरूक करें और 'पुरोहितवाद' की जकड़न से उसे छुड़ाए। लेकिन पुरोहितवादियो के कुचक्र मे फंस कर अभी बामपंथ एवं कम्यूनिस्ट आंदोलन इस ओर से आँखें मूँदे हुये है और इसीलिए सफल नहीं हो पा रहा है। हम आशा करते हैं कि महापंडित राहुल सांस्कृतियायान ,स्वामी सहजानन्द सरस्वती और क्रांतिकारी गेंदा लाल दीक्षित सरीखे आर्यसमाजी -कम्यूनिस्टों से प्रेरणा लेकर बामपंथ और कम्यूनिस्ट आंदोलन जनता को 'सन्मार्ग' पर ला सकेगा।

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Thursday, October 28, 2010

पूजा क्या ,क्यों और कैसे ? ------ विजय राजबली माथुर

यह धन और धरती बंट क़े रहेगी ,भूखी जनता अब चुप न रहेगी .नारे लगाने वालों क़े मत क़े प्रणेता कार्ल मार्क्स महर्षि चार्वाक से प्रभावित थे . चार्वाक परमात्मा को नहीं मानते थे और उन्होंने कहा था -"जब तक जियो मौज से जियो ;घी पियो चाहे उधार ले क़े पियो ."इसी प्रकार कार्ल मार्क्स ने कहा "man has created the god for his mental security only ."परन्तु विश्व का बहुमत परमात्मा को मानता है चाहे वह खुदा कहता हो अर्थात वह शक्ति जो खुद ही बनी है उसे किसी ने बनाया नहीं है चाहे god कहे जिसका अभिप्राय ही generate ,operate ,destroy से है .हम भारतीय उस शक्ति को परमात्मा कहते हैं जिसने स्वंयअपना नाम ओ३म  बताया है .परमात्मा ने मनुष्य रूपी प्राणी का नाम कृतु रखा है अर्थात कर्म करने वाला .मनुष्य शरीर में आत्मा को कर्म करने की छूट है ,अन्य योनिओं में आत्मा केवल भोग ही भोगता रहता है .मनुष्य कहा ही इसलिए जाता है क्योंकि यह मननशील  प्राणी है जो अपने बुध्दी व विवेक से मनन करता हुआ कर्म करता है .कर्म तीन प्रकार क़े होते हैं ---सद्कर्म ,दुष्कर्म और अकर्म .सद्कर्म का फल अच्छा ,दुष्कर्म का बुरा फल और अकर्म का दण्ड मिलता है .अकर्म का अर्थ है वह ड्यूटी ,दायित्व या फ़र्ज़ जो किया जाना चाहिए था परन्तु किया नहीं गया .हालाँकि यह सद्कर्म या दुष्कर्म तो नहीं है परन्तु इस अकर्म से दूसरे प्राणी का जो अहित हुआ वह परमात्मा की निगाह में दण्ड  का भागीदार बना देता है .जब कर्मों क़े अनुसार फल मिलना ही है तो फिर परमात्मा को याद क्यों किया जाये ?यह प्रश्न स्वभाविक है .हमें यह मनुष्य  शरीर परमात्मा की कृपा से मिला है जिसमे हमें कर्म करने की छूट मिली है ,इसलिए परमात्मा को धन्यवाद देने हेतु हमें उसकी उपासना अथवा उसकी पूजा करनी चाहिए .पूजा वह विधि है जिससे परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त किया जा सकता है .यों तो परमात्मा सर्वत्र है हमारे शरीर में भी है परन्तु उसका ध्यान करना ,उसे याद करना ही पूजा कहलाता है .

वास्तविक पूजा कैसे हो ?                 

पूजा परमात्मा का ध्यान करने की विधि है और परमात्मा को धन्यवाद देने हेतु की जाती है परन्तु इसे कैसे करें -इस विषय में घोर मतभेद ,व्यापक विवाद एवं अनेकों भ्रांतियां हैं .तरह -तरह क़े लोगों ने अपनी सुविधा और इच्छा से तरह -तरह की पूजा विधियाँ गढ़ ली हैं .कोई मानस पाठ करा रहा है ,कोई भागवद पाठ ,कोई गीता पाठ ,कोई देवी जागरण ,कोई सुन्दर काण्ड पाठ ,कोई कुरआन की अज़ान दे रहा है तो कोई बाईबिल से प्रयेर कर रहा है .परन्तु ये सभी पधितियाँ अवैज्ञानिक हैं और उनसे परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त नहीं किया जा सकता है .जिस प्रकार किसी संस्था क़े निर्माण क़े समय पहले उसका विधान तैयार किया जाता है उसी प्रकार सृष्टी निर्माण क़े समय परमात्मा ने भी सृष्टी -संचालन हेतु सृष्टी क़े निर्माण क़े ही साथ विधान प्रस्तुत किया है जिसे हम वैदिक -ज्ञान कहते हैं .पूर्व सृष्टी की प्रलय क़े समय मोक्ष -प्राप्त आत्माओं में से श्रेष्ठ को परमात्मा ने इस सृष्टी का विधान प्रस्तुत करने हेतु इस पृथ्वी पर भेजा जिन्होंने ऋग्वेद ,यजुर्वेद ,सामवेद और अथर्ववेद की रचना की है .इन वेदों में गूढ़ ज्ञान -विज्ञान क़े साथ -साथ परमात्मा से सान्निध्य स्थापित करने का ज्ञान भी बताया गया है .

वेदों में बताया गया है -परमात्मा का मुख अग्नि है .अग्नि में मंत्रोच्चार क़े साथ डाले गए पदार्थ वायु की सहायता से परमात्मा तथा सभी जड़ देवताओं तक पहुंचा दिए जाते हैं .अग्नि का गुण है पदार्थ को सूक्ष्म परमाणुओं (Atoms )में परिवर्तित कर देना और वायु उनको सम्बंधित तक पहुँचाने का कार्य करता है .हवन में डाली गई जडी -बूटियाँ ,बूरा ,गूगल ,घी ,किशमिश तथा आम की समिधा टी .बी .,टायफायड़ आदि विभिन रोगों क़े कीटाणुओं (BACTARIAS )को नष्ट करने का कार्य करते हैं .इससे पर्यावरण शुद्ध होता है और डाले गए पदार्थों का पचास प्रतिशत भाग नासिका क़े माध्यम से धूम्र -चिकित्सा (SMOKE TREATMENT )द्वारा हवन पर बैठे मनुष्यों को तुरन्त मिल जाता है शेष पचास प्रतिशत जन -कल्याण हेतु पुण्य क़े रूप में संचित हो जाता है .हवन करने से पहले परमात्मा से प्रार्थना की जाती है .प्रार्थना क़े वैज्ञानिक महत्त्व को अब   अमेरिकी चिकित्सा वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार कर लिया है .८ सितम्बर २००३ को दैनिक जागरण ने प्रकाशित किया था कि सन १९६५ ई .में माउन्ट एवरेस्ट फतह करने वाले कैप्टन एम् .एस .कोहली ने अपनी पुस्तक " मिराकल आफ अरदास इनक्रेडिबल सर्वाइवर्स एंड एडवेंचर्स " में रहस्योदघाटन किया है कि अमेरिकी शोधकर्ताओं ने कुछ मरीजों क़े लिए दुआएं (प्रार्थनाएँ )कराईं तो यह सिद्ध हुआ कि जिन मरीजों का आपरेशन हुआ था और उनके लिए दुआ की गई उनके ठीक होने की रफ़्तार पचास से सौ प्रतिशत बढ़ गई .

महाभारत काल क़े बाद हमारी प्राचीन वैज्ञानिक हवन की पूजा पद्धति को छोड़ कर अन्य विकृत और अवैज्ञानिक पूजा पद्धतिओं को विकसित किया गया है और उसी का दुष्परिणाम हम सब भुगत रहे हैं .पोंगापंथी कर्मकांडियो ने हवन को ढकोसला बना कर रख दिया है और उपयुक्त तथा उचित प्रार्थनाओं को महत्त्व न देकर जनता को दिग्भ्रमित करके अपना उल्लू सीधा करते हैं .

यदि हम वैज्ञानिक पूजा (हवन )प्रारम्भ करने से पूर्व वैज्ञानिक विधि से प्रार्थना भी करें तो की गई प्रार्थनाओं क़े आधार पर परमात्मा मनुष्य की बात उसी प्रकार स्वीकार करता है जिस प्रकार माता -पिता अपने बच्चे क़े अनुनय -विनय को स्वीकार कर लेते हैं .यदि हम परमात्मा क़े गणपति रूप से रक्षा ,स्वास्थ्य आदि की प्रार्थना ,विष्णु स्वरूप से कल्याणकारी पालन की प्रार्थना तथा शिव स्वरूप से दीर्घायु और उत्तम जीवन -यापन की प्रार्थना हवन से पूर्व कर लें तो उस हवन द्वारा प्राप्त होने वाला सुफल द्विगुणित  हो सकता है .परन्तु आज क़े आपा -धापी क़े युग में लोग तीन घंटे पिक्चर हाल में बैठ सकते हैं ,सारी -सारी रात डिस्को पार्टी में बैठ सकते हैं ,न तो उनके पास प्रार्थना और हवन में बैठने का समय है न ही पोंगापंथियों  द्वारा अपना दायित्व निर्वहन किया जा रहा है ---परिणाम परिवारों ,समाज और राष्ट्र क़े विघटन क़े रूप में सामने है .हम मनुष्य हैं क्या हम मनन करेंगे कि पुनः अपनी प्राचीन पूजा (हवन )और प्रार्थना को अपना कर जीवन को सुखमय बना सकें ?


(यह आलेख पहली दफा २००३ में कायस्थ -सभा ,आगरा की त्रेमासिक पत्रिका "प्रेरणा "में फिर दूसरी बार  वैश्य -समुदाय की मांग पर उनकी त्रेमासिक पत्रिका "अग्र मन्त्र "क़े मई -जुलाई २००४ अंक में प्रकाशित हो चुका है .ब्लाग -जगत क़े जागरूक साथियों  क़े हितार्थ पुनः प्रकाशित किया जा रहा है .अगले अंकों में स्तुतियों को देने 
का प्रयास करेंगे )


(डॉ.दाराल की नेक टिप्पणी क़े बाद यह कटिंग लगा दी गयी है.) 



(इस वीडियो में आप विदेशियों को गायत्री मन्त्र का पाठ करते भी देख सकते हैं)
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16-07-2016