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Thursday, March 9, 2017

विज्ञान पर आधारित प्राच्य भारतीय ज्ञान ------ विजय राजबली माथुर

  
हिंदुस्तान, लखनऊ, 09 मार्च 2017 , पृष्ठ --- 14
 हिंदुस्तान,लखनऊ, 04-03-2017, पृष्ठ -8 


हमारे देश में कुछ वैज्ञानिक, साईंसदान, एथीस्ट और यूरोप का गुणगान करने वाले वामपंथी लोग यह मानते हैं कि, 'वेद ' गड़रियों के गीत हैं और भारत विज्ञान से अछूता देश था । के एम एम हाईस्कूल, सिलीगुड़ी में हमारे साईन्स अध्यापक  श्री जुगल किशोर मिश्रा ( निवासी घुंडी गली, कानपुर ) तो 1965 में बड़े दावे के साथ कहा करते थे कि, भारत में साईन्स यूरोप से आई है यहाँ तो केवल पहाड़े ईजाद हुये थे। अब प्रोफेसर डी एस चौहान साहब ने विज्ञान कान्फरेंस में यह स्वीकार किया है कि, '' सबसे पहले भारत में हुई विज्ञान की उत्पत्ति " । 
हिंदुस्तान, लखनऊ, 09 मार्च 2017 , पृष्ठ --- 14 पर प्रकाशित समाचार में बताया गया है कि, " पहाड़ों पर अगले तीन दिन बारिश - बर्फबारी " लेकिन नीमच के 'चंड - मार्तंड ' पंचांग ने जो बहुत पहले ही प्रकाशित हो चुका था के पृष्ठ 54 और 55 पर 11 फरवरी से 12 मार्च 2017 और आगे  के विषय में स्पष्ट लिख दिया था :
* षडाश्टकी गुरु भौम की, सम  सप्तक गुरु -शुक्र।  
   ऋतु विषम से आपदा, मेघ गाज नव चक्र ॥  
* युति योग भृगु भौम का, राशि मीन प्रसंग। 
   बैंक कोश मुद्रा विषय, शासन नव्य  तरंग॥ 
*  चक्रवात वायु प्रबल, सांसारिक गतिचार। 
   ऋतु विषय से आपदा,  जन धन क्षति प्रहार॥ 
*  पूनम फागुन मास की, मेघ गाज गति लक्ष। 
    भावी तेजी मानिए, गल्ला धान के पक्ष ॥ 
*  फागुन में बादल बनें, किन्तु न बरसे नीर। 
    तो फिर वर्षा काल में, वर्षा बने प्रवीर॥ 
अर्थात 20 जनवरी से 28 फरवरी तक शुक्र और मंगल के  'मीन ' राशि में एक रहने एवं  27 जनवरी से गुरु 'मीन ' राशि में प्रविष्ट हो कर 'कन्या ' के गुरु के साथ 180 डिग्री का कोण बनाने वाले इन योगों  के परिणाम स्वरूप बैंकों के नए चार्ज वसूली के फरमान सामने आए ।पहाड़ों पर बर्फबारी हुई। 07 मार्च को पटना में और 09 मार्च को दिल्ली में  भी बारिश हुई एवं होली से पूर्व लखनऊ में भी बारिश की उम्मीद 'मौसम विभाग ' जता ही चुका है। 
इसके अतिरिक्त आगामी पूर्णिमा 12 मार्च,2017 को यदि बादल गरजते हैं तो निश्चित है कि, गल्ला ( गेंहू, धान ) मंहगा होगा। यदि फागुन माह में सिर्फ बादल बन कर रह जाते और बरसते नहीं तब तो आगामी वर्षा काल मे प्रचुर वर्षा होने की संभावना रहती। परंतु अब पहाड़ों के साथ - साथ ही गंगा - यमुना के दोआबे में भी बारिश हो गई है अतः वर्षा ऋतु में पर्याप्त वर्षा होने की संभावना समाप्त हो गई है। यदि भारतीय ज्योतिष विज्ञान के आंकलन ( पुजारियों / पोंगा पंडितों की कल्पना नहीं ) को ध्यान रख कर आर्थिक व जन कलयांणकारी योजनाएँ बनाई जाएँ तब इन संकटों पर निजात पाई जा सकती है। अन्यथा त्राहि - त्राहि व जन असंतोष व आंदोलनों का सामना करना ही पड़ेगा। 
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10 मार्च 2017 : 
9/10 तारीख की रात्रि में हल्की ही सही बारिश लखनऊ में भी हो ही गई तथा 10 की प्रातः आंधी के बाद 'ठंड' का एहसास भी होने ही लगा। मौसम विभाग को भी कहना ही पड़ा जिसे पंचांग में काफी पहले ही स्पष्ट कहा गया था। 







~विजय राजबली माथुर ©

Thursday, December 17, 2015

यही वे लोग हैं जो साम्यवाद को जनता से काट कर साम्राज्यवाद को मजबूत कर रहे हैं ------ विजय राजबली माथुर

*आज से 10 लाख वर्ष पूर्व जब मानव अपने वर्तमान स्वरूप मे आया तो प्रकृति के अनुरूप समाज मे पालन करने हेतु जो नियम बनाए गए वे ही 'वेद' हैं। वेद सभी समय के सभी मनुष्यों के लिए देश-काल के भेदभाव के बिना समान व्यवहार का मार्ग बताते हैं। शासकों और व्यापारियों ने अपने निजी स्वार्थ वश 'कर्मगत' वर्ण व्यवस्था को 'जन्मगत' जाति-व्यवस्था मे परिवर्तित करके शासितों का उत्पीड़न-शोषण किया। वेदोक्त परम्पराएँ विलुप्त हो गईं और समाज मे विषमता की खाई उत्पन्न हो गई। भारत मे विदेशी शासकों के आगमन पर उनके द्वारा यहाँ की जनता को 'हिन्दू' कह कर पुकारा गया जो फारसी भाषा मे एक गंदी और भद्दी गाली है। कुछ लोग अरबी भाषा के 'स ' को 'ह ' उच्चारण से जोड़ कर हिन्दू शब्द की हिमायत करते हैं तब भी यह विदेशियों की ही देंन साबित होता है। कुछ 'कुतर्क करने वाले  लोग ' हिन्दू शब्द की प्राचीनता टटोलते फिरते हैं,किन्तु ईरानियों के आने से पूर्व बौद्ध मठों,विहारों को उजाड़ने वाले उनके ग्रन्थों को जलाने वाले हिंसक लोगों को बौद्धों ने 'हिन्दू' की संज्ञा दी थी। 'हिन्दू' शब्द विदेशी और पूरी तरह से अभारतीय है। 'कुरान' की तर्ज पर विदेशी शासकों ने यहाँ के विद्वानों को 'सत्ता' व 'धन' सुख देकर 'पुराण' लिखवाये जो वेद-विपरीत हैं। किन्तु तथाकथित गर्व से हिन्दू लोग वेद और पुराण को गड्म गड करके गुमराह करते हैं और दुखद है कि प्रगतिशील बामपंथी भी उसी झूठ को मान्यता देते हैं। 

*'आर्य' सार्वभौम शब्द है और यह किसी देश-काल की सीमा मे बंधा हुआ नहीं है। आर्यत्व का मूल 'समष्टिवाद' अर्थात 'साम्यवाद' है। प्रकृति में संतुलन को बनाए रखने हेतु हमारे यहाँ यज्ञ -हवन किये जाते थे। अग्नि में डाले गए पदार्थ परमाणुओं में विभक्त हो कर वायु द्वारा प्रकृति में आनुपातिक रूप से संतुलन बनाए रखते थे.'भ'(भूमि)ग (गगन)व (वायु) ।(अनल-अग्नि)न (नीर-जल)को अपना समानुपातिक भाग प्राप्त होता रहता था.Generator,Operator ,Destroyer भी ये तत्व होने के कारण यही GOD है और किसी के द्वारा न बनाए जाने तथा खुद ही बने होने के कारण यही 'खुदा'भी है।  अब भगवान् का अर्थ मनुष्य की रचना -मूर्ती,चित्र आदि से पोंगा-पंथियों के स्वार्थ में कर दिया गया है और प्राकृतिक उपादानों को उपेक्षित छोड़ दिया गया है जिसका परिणाम है-सुनामी,अति-वृष्टि,अनावृष्टि,अकाल-सूखा,बाढ़ ,भू-स्खलन,परस्पर संघर्ष की भावना आदि-आदि.
*शीशे की तरह चमकता हुआ साफ़ है कि वैदिक संस्कृति हमें जन  पर आधारित अर्थात  समष्टिवादी बना रही है जबकि आज हमारे यहाँ व्यष्टिवाद हावी है जो पश्चिम के साम्राज्यवाद की  देन है।
*'धर्म'तो वह है जो 'धारण'करता है ,उसे कैसे छोड़ कर जीवित रहा जा सकता है.कोई भी वैज्ञानिक या दूसरा विद्वान यह दावा नहीं कर सकता कि वह-भूमि,गगन,वायु,अनल और नीर (भगवान्,GODया खुदा जो ये पाँच-तत्व ही हैं )के बिना जीवित रह सकता है.हाँ ढोंग और पाखण्ड तथा पोंगा-पंथ का प्रबल विरोध करने की आवश्यकता मानव-मात्र के अस्तित्व की रक्षा हेतु जबरदस्त रूप से है।
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Monday, August 20, 2012

वैज्ञानिक परम्पराएँ-वेद और हवन

हमारे देश मे एक फैशन चलता है कि हमारा देश एक पिछड़ा हुआ देश है और यहाँ ज्ञान,विज्ञान जो आया वह पश्चिम की देंन है। आज़ादी के एक लंबे अरसे बाद भी गुलामी की बू लोगों के दिलों से अभी निकली नहीं है। ऊपर जो स्कैन आप देख रहे हैं उसमे आधुनिक अनुसंधान के आधार पर देश मे प्रचलित कुछ प्राचीन  परम्पराओं को विज्ञान -सम्मत बताया गया है।

मैक्स मूलर साहब जर्मनी से भारत आकर यहाँ 30 वर्ष रहे और संस्कृत सीख कर  मूल पांडुलिपियाँ लेकर जर्मनी रवाना हो गए। जर्मनी भाषा मे उनके अनुवादों को पढ़ कर वहाँ अनुसंधान हुये *-होमियोपैथी,बायोकेमिक चिकित्सा पद्धतियों को वहाँ ईजाद किया गया जो एलोपेथी  से श्रेष्ठ हैं। परमाणु तथा दूसरे आयुधों का आविष्कार भी वेदोक्त ज्ञान से वहाँ हुआ। जर्मनी की द्वितीय विश्व युद्ध मे पराजय के बाद अमेरिका और रूस ने इन परमाणु वैज्ञानिकों को अपने-अपने देश मे लगा लिया। अमेरिका ने सबसे पहले जापान की आत्म समपर्ण की घोषणा के बाद रूस को डराने के लिए 06 और 09 अगस्त को परमाणु बमो का प्रहार किया।

जर्मनी आदि पाश्चात्य देशों ने षड्यंत्र पूर्वक भारत मे यह प्रचार किया कि,'वेद गड़रियों के गीत 'के सिवा कुछ भी नहीं हैं (जबकि ये ही देश खुद वेद-ज्ञान का लाभ उठा कर खुद को विज्ञान का आविष्कारक बताते रहे)। हमारे देश के पाश्चात्य समर्थक विद्वान चाहे वे दक्षिण पंथी हों या प्रगतिशील बामपंथी दोनों ही साम्राज्यवादी इतिहासकारों के 'भटकाव' को ज्ञान-सूत्र मानते हैं जिसके अनुसार 'आर्य' मध्य यूरोप से घोड़ों पर सवार होकर भारत आए और यहाँ के 'मूल निवासियों' को दास बना लिया। इसी मान्यता के कारण देश मे आजकल एक साम्राज्यवाद पोषक आंदोलन 'मूल निवासियों देश को मुक्त करो' भी ज़ोर-शोर से चल रहा है। 

साम्राज्यवादी ब्रिटिश शासकों ने( जब सेफ़्टी वाल्व के रूप मे स्थापित कांग्रेस  आर्यसमाजियों के प्रभाव से 'राष्ट्र वादी आंदोलन चलाने लगी तब )अपने हितों की रक्षा हेतु RSS का गठन एक पूर्व क्रांतिकारी के माध्यम से कराया। RSS और मुस्लिम लीग ने देश को विभाजित करा दिया। आज भी नफरत की सांप्रदायिकता फैला कर साम्राज्यवादी अमेरिका को दोनों संप्रदायों के कुछ संगठन लाभ पहुंचा रहे हैं। RSS और इसके दूसरे सहायक संगठन 'गर्व से हिन्दू' की मुहिम चलाते हैं। प्रगतिशील-बामपंथी कहलाने वाले विद्वान भी हिन्दू,इस्लाम,ईसाइयत को ही धर्म मानते हैं और प्रकट मे धर्म की आलोचना तथा छिपे तौर पर उन सांप्रदायिक गतिविधियों का पालन करते हैं। 

धर्म =सत्य,अहिंसा (मनसा,वाचा,कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य के समुच्य को धर्म कहते हैं जो शरीर को धारण करने हेतु आवश्यक हैं। जो लोग 'धर्म' की आलोचना करते हैं वे इन सदगुणो का पालन न करने को प्रेरित करते हैं। इसी कारण 1917 मे सम्पन्न साम्यवादी क्रांति रूस मे विफल हो गई क्योंकि शासक पार्टी कार्यकर्ताओं और जनता का शोषण कर रहे थे। आज वहाँ समाज-सरकार द्वारा स्थापित उद्योग पूर्व शासकों ने अपने भ्रष्टाचार की कमाई से खरीद लिए हैं और पूंजीपति बन गए हैं। 

भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)। प्रकृति के ये पाँच तत्व ही संयुक्त रूप से 'भगवान' हैं चूंकि इनको किसी ने बनाया नहीं है और ये खुद ही बने हैं इसलिए ये ही 'खुदा' हैं।  इंनका कार्य G(जेनरेट)+O(आपरेट)+D(डेसट्राय) करना है इसलिए ये ही 'गाड ' हैं। जो भगवान=खुदा=गाड को दिमागी फितूर कहते हैं वे सच से आँखें मूँद लेने को ही कहते हैं। 

भगवान या खुदा या गाड =प्रकृति के पाँच तत्व । अतः इनकी पूजा का माध्यम केवल और केवल 'हवन' है। 'पदार्थ विज्ञान' =मेटेरियल साईन्स के मुताबिक अग्नि मे यह गुण है कि उसमे डाले गए पदार्थों को 'परमाणुओ' -'एटम्स' मे विभक्त कर देती है और वायु उन परमाणुओं को पर्यावरण मे प्रसारित कर देती है। अर्थात भगवान या खुदा या गाड को वे परमाणु प्राप्त हो जाते हैं क्योंकि ये तत्व सर्वत्र व्यापक हैं-घट-घट वासी हैं। इनके अतिरिक्त नदी,समुद्र,वृक्ष,पर्वत,आकाश,नक्षत्र,ग्रह आदि देवताओं को भी हवन द्वारा प्रसारित परमाणु प्राप्त हो जाते हैं। 'देवता' =जो देता है ,लेता नहीं है। अतः इन प्राकृतिक संसाधनो के अतिरिक्त और कोई देवता नहीं होता है। 

विवाद तभी शुरू होता है जब हिन्दू,इस्लाम,ईसाइयत  आदि के नाम पर 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' को धर्म की संज्ञा देकर पूजा जाता है। वस्तुतः व्यापारियों-उद्योगपतियों और शासकों ने मिल कर ये विभाजन अपने-अपने व्यापार को चमकाने हेतु समाज मे कर रखे हैं। प्रगतिशील-बामपंथी जनता को इन लुटेरे व्यापारियों के चंगुल से छुड़ाने हेतु 'धर्म' की वास्तविक व्याख्या प्रस्तुत करने के बजाए धर्म का विरोध करते हैं किन्तु पाखंड से उनको गुरेज नहीं है उसे वे भी धर्म ही पुकारते हैं। दमन जनता का होता है।

आज से 10 लाख वर्ष पूर्व जब मानव अपने वर्तमान स्वरूप मे आया तो प्रकृति के अनुरूप समाज मे पालन करने हेतु जो नियम बनाए गए वे ही 'वेद' हैं। वेद सभी समय के सभी मनुष्यों के लिए देश-काल के भेदभाव के बिना समान व्यवहार का मार्ग बताते हैं। शासकों और व्यापारियों ने अपने निजी स्वार्थ वश 'कर्मगत' वर्ण व्यवस्था को 'जन्मगत' जाति-व्यवस्था मे परिवर्तित करके शासितों का उत्पीड़न-शोषण किया। वेदोक्त परम्पराएँ विलुप्त हो गईं और समाज मे विषमता की खाई उत्पन्न हो गई। भारत मे विदेशी शासकों के आगमन पर उनके द्वारा यहाँ की जनता को 'हिन्दू' कह कर पुकारा गया जो फारसी भाषा मे एक गंदी और भद्दी गाली है। कुछ लोग अरबी भाषा के 'स ' को 'ह ' उच्चारण से जोड़ कर हिन्दू शब्द की हिमायत करते हैं तब भी यह विदेशियों की ही देंन साबित होता है। कुछ 'कुतर्क करने वाले  लोग ' हिन्दू शब्द की प्राचीनता टटोलते फिरते हैं,किन्तु ईरानियों के आने से पूर्व बौद्ध मठों,विहारों को उजाड़ने वाले उनके ग्रन्थों को जलाने वाले हिंसक लोगों को बौद्धों ने 'हिन्दू' की संज्ञा दी थी। 'हिन्दू' शब्द विदेशी और पूरी तरह से अभारतीय है। 'कुरान' की तर्ज पर विदेशी शासकों ने यहाँ के विद्वानों को 'सत्ता' व 'धन' सुख देकर 'पुराण' लिखवाये जो वेद-विपरीत हैं। किन्तु तथा कथित गर्व से हिन्दू लोग वेद और पुराण को गड्म गड करके गुमराह करते हैं और दुखद है कि प्रगतिशील बामपंथी भी उसी झूठ को मान्यता देते हैं। 

यू एस ए की राजधानी वाशिंगटन (DC) मे अग्निहोत्र यूनिवर्सिटी मे अनवरत 24 घंटे हवन चलता रहता है जिसके परिणामस्वरूप USA के क्ष्तिज पर बना ओज़ोन का छिद्र परिपूर्ण हो गया और वह सरक कर दक्षिण-पूर्व एशिया की तरफ आ गया है। इस क्षेत्र मे प्राकृतिक प्रकोपों का कारण यह ओज़ोन छिद्र ही है जो यू एस ए आदि पाश्चात्य देशों के कुकृत्य का कुफ़ल है। किन्तु हमारे बामपंथी भाई और प्रगतिशील पत्रकार जिनमे दैनिक जागरण के चेनल IBN 7वाले प्रमुख हैं 'हवन' का घोर विरोध करते हैं-व्यंग्य उड़ाते हैं। 

यदि हमे अपने देश 'भारत' को प्रकृतिक प्रकोपों से बचाना है,अपने नागरिकों को शुद्ध पर्यावरण उपलब्ध कराना है और परस्पर भाई-चारा उत्पन्न करना है तो 'वेदोक्त हवन' का सहारा लेना ही चाहिए। अन्यथा तो जो चल रहा है चलता रहेगा फिर रोना-झींकना क्यों?

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*वेदों के 'समष्टिवाद' का ही आधुनिक रूप है 'साम्यवाद' जिसका निरूपण किया जर्मनी के महर्षि कार्ल मार्क्स ने उन जर्मन ग्रन्थों के अवलोकन के पश्चात जो वेदों की मूल पांडु लिपियों से अनूदित थे। लेकिन भारतीय साम्यवादी विद्वान 'साम्यवाद' को पाश्चात्य विज्ञान मानते हैं और इसी मुगालते मे जनता से कटे रहते हैं। वस्तुतः 'साम्यवाद'='समष्टिवाद' मूल रूप से भारतीय अवधारणा है और इसे लागू भी तभी किया जा सकेगा जब हकीकत को समझ लिया जाएगा।
http://krantiswar.blogspot.in/2012/08/blog-post_3188.html

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योगीराज श्री कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन शोषण-उत्पीड़न और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करते हुये ही बीता किन्तु ढ़ोंगी-पोंगापंथी-पुरोहितवाद ने आज श्री कृष्ण के संघर्ष को 'विस्मृत' करने हेतु उनको अवतार घोषित करके उनकी पूजा शुरू करा दी। कितनी बड़ी विडम्बना है कि 'कर्म' पर ज़ोर देने वाले श्री कृष्ण के 'कर्मवाद' को भोथरा करने के लिए उनको अलौकिक बता कर उनकी शिक्षाओं को भुला दिया गया और यह सब किया गया है शासकों के शोषण-उत्पीड़न को मजबूत करने हेतु। अनपढ़ तो अनपढ़ ,पढे-लिखे मूर्ख ज़्यादा ढोंग-पाखंड मे उलझे हुये हैं।

तथा कथित प्रगतिशील साम्यवादी बुद्धिजीवी जिंनका नेतृत्व विदेश मे बैठे पंडित अरुण प्रकाश मिश्रा और देश मे उनके बड़े भाई पंडित ईश मिश्रा जी  करते हैं सांप्रदायिक तत्वों द्वारा निरूपित सिद्धांतों को धर्म मान कर धर्म को त्याज्य बताते हैं। जबकि धर्म=जो शरीर को धारण करने के लिए आवश्यक है वही 'धर्म' है;जैसे-सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य । अब यदि ढ़ोंगी प्रगतिशीलों की बात को सही मान कर धर्म का विरोध किया जाये तो हम लोगों से इन सद्गुणों को न अपनाने की बात करते हैं और यही कारण है कि सोवियत रूस मे साम्यवाद का पतन हो गया(सोवियत भ्रष्ट नेता ही आज वहाँ पूंजीपति-उद्योगपति हैं जो धन जनता और कार्यकर्ता का शोषण करके जमा किया गया था उसी के बल पर) एवं चीन मे जो है वह वस्तुतः पूंजीवाद ही है।दूसरी ओर थोड़े से  पोंगापंथी केवल 'गीता' को ही महत्व देते हैं उनके लिए भी 'वेदों' का कोई महत्व नहीं है। 'पदम्श्री 'डॉ कपिलदेव द्विवेदी जी कहते हैं कि,'भगवद  गीता' का मूल आधार है-'निष्काम कर्म योग'
"कर्मण्ये वाधिकारस्ते ....................... कर्मणि। । " (गीता-2-47)

इस श्लोक का आधार है यजुर्वेद का यह मंत्र-
"कुर्वन्नवेह कर्मा................... न कर्म लिपयाते नरो" (यजु.40-2 )

इसी प्रकार सम्पूर्ण बाईबिल का मूल मंत्र है 'प्रेम भाव और मैत्री' जो यजुर्वेद के इस मंत्र पर आधारित है-
"मित्रस्य मा....................... भूतानि समीक्षे।  ....... समीक्षा महे । । " (यजु .36-18)

एवं कुरान का मूल मंत्र है-एकेश्वरवाद-अल्लाह की एकता ,उसके गुण धर्मा सर्वज्ञ सर्व शक्तिमान,कर्त्ता-धर्त्तासंहर्त्ता,दयालु आदि(कुरान7-165,12-39,13-33,57-1-6,112-1-4,2-29,2-96,87-1-5,44-6-8,48-14,1-2,2-143 आदि )। 

इन सबके आधार मंत्र हैं-

1-"इंद्रम मित्रम....... मातरिश्चा नामाहू : । । " (ऋग-1-164-46)
2-"स एष एक एकवृद एक एव "। । (अथर्व 13-4-12)
3-"न द्वितीयों न तृतीयच्श्तुर्थी नाप्युच्येत। । " (अथर्व 13-5-16)
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 'आर्य'=श्रेष्ठ अर्थात वे स्त्री पुरुष जिनके आचरण और कार्य श्रेष्ठ हैं 'आर्य' है इसके विपरीत लोग अनार्य हैं। न यह कोई जाति थी न है।


'आर्य' सार्वभौम शब्द है और यह किसी देश-काल की सीमा मे बंधा हुआ नहीं है। आर्यत्व का मूल 'समष्टिवाद' अर्थात 'साम्यवाद' है। प्रकृति में संतुलन को बनाए रखने हेतु हमारे यहाँ यज्ञ -हवन किये जाते थे। अग्नि में डाले गए पदार्थ परमाणुओं में विभक्त हो कर वायु द्वारा प्रकृति में आनुपातिक रूप से संतुलन बनाए रखते थे.'भ'(भूमि)ग (गगन)व (वायु) ।(अनल-अग्नि)न (नीर-जल)को अपना समानुपातिक भाग प्राप्त होता रहता था.Generator,Operator ,Destroyer भी ये तत्व होने के कारण यही GOD है और किसी के द्वारा न बनाए जाने तथा खुद ही बने होने के कारण यही 'खुदा'भी है।  अब भगवान् का अर्थ मनुष्य की रचना -मूर्ती,चित्र आदि से पोंगा-पंथियों के स्वार्थ में कर दिया गया है और प्राकृतिक उपादानों को उपेक्षित छोड़ दिया गया है जिसका परिणाम है-सुनामी,अति-वृष्टि,अनावृष्टि,अकाल-सूखा,बाढ़ ,भू-स्खलन,परस्पर संघर्ष की भावना आदि-आदि.
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शीशे की तरह चमकता हुआ साफ़ है कि वैदिक संस्कृति हमें जन  पर आधारित अर्थात  समष्टिवादी बना रही है जबकि आज हमारे यहाँ व्यष्टिवाद हावी है जो पश्चिम के साम्राज्यवाद की  देन है। दलालों के माध्यम से मूर्ती पूजा करना कहीं से भी समष्टिवाद को सार्थक नहीं करता है,जबकि वैदिक हवन सामूहिक जन-कल्याण की भावना पर आधारित है। IBN 7 के पत्रकार हवन का विरोध पोंगापंथ को सबल बनाने हेतु करते है और दूसरे चेनल वाले भी। साम्राज्यवादी -विदेशी तो खुद को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए वेदों का विरोध करते ही हैं एवं उनके निष्कर्षों का लाभ लेकर उसे अपना आविष्कार बताते हैं।

ऋग्वेद के मंडल ५/सूक्त ५१ /मन्त्र १३ को देखें-

विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्निः स्वस्तये.
देवा अवन्त्वृभवः स्वस्तये स्वस्ति नो रुद्रः पात्व्हंससः ..

(जनता की कल्याण -कामना से यह यज्ञ  रचाया.
विश्वदेव के चरणों में अपना सर्वस्व चढ़ाया..)

जो लोग (अरुण प्रकाश मिश्रा -ईश मिश्रा जी और उनके चेले सरीखे )धर्म की वास्तविक व्याख्या को न समझ कर गलत  उपासना-पद्धतियों को ही धर्म मान कर चलते हैं वे अपनी इसी नासमझ के कारण ही  धर्म की आलोचना करते और खुद को प्रगतिशील समझते हैं जबकि वस्तुतः वे खुद भी उतने ही अन्धविश्वासी हुए जितने कि पोंगा-पंथी अधार्मिक होते हैं। 

ऋग्वेद के मंडल ७/सूक्त ३५/मन्त्र १ में कहा गया है-

शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शन्न इन्द्रावरुणा रातहव्या डे
शमिन्द्रासोमा सुविताय शंयो :शन्न इन्द्रा पूष्णा वाजसात..

(सूर्य,चन्द्र,विद्युत्,जल सारे सुख सौभाग्य बढावें.
रोग-शोक-भय-त्रास हमारे पास कदापि न आवें..)

वेदों में किसी व्यक्ति,जाति,क्षेत्र,सम्प्रदाय,देश-विशेष की बात नहीं कही गयी है.वेद सम्पूर्ण मानव -सृष्टि की रक्षा की बात करते हैं.इन्हीं तत्वों को जब मैक्समूलर साहब जर्मन ले गए तो वहां के विचारकों ने अपनी -अपनी पसंद के क्षेत्रों में उनसे ग्रहण सामग्री के आधार पर नई -नई खोजें प्रस्तुत कीं हैं.जैसे डा.हेनीमेन ने 'होम्योपैथी',डा.एस.एच.शुस्लर ने 'बायोकेमिक'  भौतिकी के वैज्ञानिकों ने 'परमाणु बम'एवं महर्षि कार्ल मार्क्स ने 'वैज्ञानिक समाजवाद'या 'साम्यवाद'की खोज की। 


दुर्भाग्य से महर्षि कार्ल मार्क्स ने भी अन्य विचारकों की भाँती ही गलत उपासना-पद्धतियों (ईसाइयत,इस्लाम और हिन्दू ) को ही धर्म मानते हुए धर्म की कड़ी आलोचना की है ,उन्होंने कहा है-"मैंन  हैज क्रियेटेड द गाड फार हिज मेंटल सिक्योरिटी ओनली".आज भी उनके अनुयाई एक अन्धविश्वासी की भांति इसे ब्रह्म-वाक्य मान कर यथावत चल रहे हैं.जबकि आवश्यकता है उनके कथन को गलत अधर्म के लिए कहा गया मानने की.'धर्म'तो वह है जो 'धारण'करता है ,उसे कैसे छोड़ कर जीवित रहा जा सकता है.कोई भी वैज्ञानिक या दूसरा विद्वान यह दावा नहीं कर सकता कि वह-भूमि,गगन,वायु,अनल और नीर (भगवान्,GODया खुदा जो ये पाँच-तत्व ही हैं )के बिना जीवित रह सकता है.हाँ ढोंग और पाखण्ड तथा पोंगा-पंथ का प्रबल विरोध करने की आवश्यकता मानव-मात्र के अस्तित्व की रक्षा हेतु जबरदस्त रूप से है।  
http://krantiswar.blogspot.in/2012/08/blog-post_9.html

~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Saturday, December 7, 2013

विज्ञान के नाम पर अवैज्ञानिकता का प्रचार :यही है प्रगतिशीलता?---विजय राजबली माथुर



प्रिंस डी लेमार्क और डार्विन सरीखे जीव विज्ञानियों के 'विकास' एवं  'व्यवहार और अव्यवहार' सिद्धान्त के विपरीत यूजीन मैकार्थी द्वारा सूअर और चिम्पाजी को मानव का पूर्वज घोषित किया जाना 'विज्ञान' को हास्यास्पद ही बना रहा है। 'विज्ञान' सिर्फ वह ही नहीं है जिसे किसी प्रयोगशाला में बीकर और रसायनों के विश्लेषणात्मक अध्यन से समझा जा सकता है। मेरठ कालेज,मेरठ में 1970 में 'एवरी डे केमिस्ट्री' की कक्षा में प्रो.तारा चंद माथुर साहब  के प्रश्न के उत्तर में मैंने उनको विज्ञान की सर्वसम्मत परिभाषा सुना दी थी-"विज्ञान किसी भी विषय के नियमबद्ध एवं क्रमबद्ध अध्यन को कहा जाता है" और उन्होने इस जवाब को सही बताया था।

वैज्ञानिकों के मध्य ही यह विवाद चलता रहा है कि 'पहले मुर्गी या पहले अंडा?' इस संबंध में मैं आप सब का ध्यान इस बात की ओर खींचना चाहता हूँ कि, पृथ्वी की सतह ठंडी होने पर पहले वनस्पतियाँ और फिर जीवों की उत्पत्ति के क्रम में सम्पूर्ण विश्व में एक साथ युवा नर एवं मादा जीवों की उत्पति स्वम्य  परमात्मा ने प्रकृति से 'सृष्टि' रूप में की और बाद में प्रत्येक की वंश -वृद्धि होती रही। डार्विन द्वारा प्रतिपादित 'survival of the fittest'सिद्धान्त के अनुसार जो प्रजातियाँ न ठहर सकीं वे विलुप्त हो गईं;जैसे डायनासोर आदि। अर्थात  उदाहरणार्थ पहले परमात्मा द्वारा युवा मुर्गा व युवा मुर्गी की सृष्टि की गई फिर आगे अंडों द्वारा उनकी वंश-वृद्धि होती रही। इसी प्रकार हर पक्षी और फिर पशुओं में क्रम चलता रहा। डार्विन की रिसर्च पूरी तरह से 'सृष्टि' नियम को सही ठहराती है।   

मानव की उत्पति के विषय में सही जानकारी 'समाज विज्ञान' द्वारा ही मिलती है। समाज विज्ञान के अनुसार जिस प्रकार 'धुएँ'को देख कर यह अनुमान लगाया जाता है कि 'आग' लगी है और 'गर्भिणी'को देख कर अनुमान लगाया जाता है कि 'संभोग'हुआ है उसी प्रकार समाज विज्ञान की इन कड़ियों के सहारे 'आर्य' वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि अब से लगभग दस लाख वर्ष पूर्व मानव की उत्पति -'युवा पुरुष' और 'युवा स्त्री' के रूप में एक साथ विश्व के तीन विभिन्न क्षेत्रों -अफ्रीका,मध्य यूरोप और त्रिवृष्टि=तिब्बत में हुई थी और आज के मानव उनकी ही सन्तानें हैं।  प्रकृति के प्रारम्भिक रहस्य की सत्यता की  पुष्टि अब तक के वैज्ञानिक दृष्टिकोणों से ही होती है।

आज से नौ लाख वर्ष पूर्व 'विश्वमित्र 'जी ने अपनी प्रयोगशाला में 'गोरैया'-चिड़िया-चिरौंटा,नारियल वृक्ष और 'सीता' जी की उत्पति टेस्ट ट्यूब द्वारा की थी। 'त्रिशंकू'सेटेलाईट उनके द्वारा ही अन्तरिक्ष में प्रस्थापित किया गया था जो आज भी सुरक्षित परिभ्रमण कर रहा है।  

वस्तुतः आज का विज्ञान अभी तक उस स्तर तक पहुंचा ही नहीं है जहां तक कि अब से नौ लाख वर्ष पूर्व पहुँच चुका था। उस समय के महान वैज्ञानिक और उत्तरी ध्रुव-क्षेत्र(वर्तमान-साईबेरिया)के शासक 'कुंभकर्ण'ने तभी यह सिद्ध कर दिया था कि 'मंगल'ग्रह 'राख़' और 'चट्टानों'का ढेर है लेकिन आज के वैज्ञानिक मंगल ग्रह पर 'जल' होने की निर्मूल संभावनाएं व्यक्त कर रहे हैं और वहाँ मानव बस्तियाँ बसाने की निरर्थक कोशिशों में लगे हुये हैं। इस होड़ा-हाड़ी में अब हमारा देश भी 'मंगलयान' के माध्यम से शामिल हो चुका है। सभ्यताओं एवं संस्कृतियों के उत्थान-पतन के साथ-साथ वह विज्ञान और उसकी खोजें नष्ट हो चुकी हैं मात्र उनके संदर्भ स्मृति(संस्मरण) और किस्से-कहानियों के रूप में संरक्षित रह गए हैं। आज की वैज्ञानिक खोजों के मुताबिक 'ब्रह्मांड' का केवल 4 (चार)प्रतिशत ही ज्ञात है बाकी 96 प्रतिशत अभी तक अज्ञात है-DARK MATTER-अतः केवल 4 प्रतिशत ज्ञान के आधार पर मानव जाति को सूअर और चिम्पाजी  का वर्ण -संकर बताना विज्ञान की खिल्ली उड़ाना ही है प्रगतिशीलता नहीं।विज्ञान का तर्क-संगत एवं व्यावहारिक पक्ष यही है कि युवा नर और युवा नारी के रूप में ही परमात्मा-ऊर्जा-ENERGY द्वारा मनुष्यों की भी उत्पति हुई है और आज का मानव उन आदि मानवों की ही संतान है न कि सूअर और चिम्पाजी का वर्ण-संकर अथवा 'मतस्य'से विकसित प्राणी।


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Thursday, August 9, 2012

श्री कृष्ण -साम्यवाद और वेद विज्ञान ------ विजय राजबली माथुर

ज़िला मंत्री-भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी,लखनऊ ने काउंसिल की एक बैठक मे श्री कृष्ण के बचपन की उस घटना का उल्लेख करते हुये कार्यकर्ताओं का आह्वान किया था कि हमे उनसे प्रेरणा लेकर संघर्ष पथ  पर बढ़ना चाहिए। कामरेड  जिलमंत्री ने स्पष्ट किया कि उस समय गावों का शहरों द्वारा शोषण चरम पर था और बालक श्री कृष्ण को यह गवारा न हुआ अतः उन्होने शहरों की ओर 'मक्खन' ले जाती ग्वालनों की मटकियाँ फोड़ने का कार्यक्रम अपने बाल साथियों के साथ चलाया था।

योगीराज श्री कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन शोषण-उत्पीड़न और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करते हुये ही बीता किन्तु ढ़ोंगी-पोंगापंथी-पुरोहितवाद ने आज श्री कृष्ण के संघर्ष को 'विस्मृत' करने हेतु उनको अवतार घोषित करके उनकी पूजा शुरू करा दी। कितनी बड़ी विडम्बना है कि 'कर्म' पर ज़ोर देने वाले श्री कृष्ण के 'कर्मवाद' को भोथरा करने के लिए उनको अलौकिक बता कर उनकी शिक्षाओं को भुला दिया गया और यह सब किया गया है शासकों के शोषण-उत्पीड़न को मजबूत करने हेतु। अनपढ़ तो अनपढ़ ,पढे-लिखे मूर्ख ज़्यादा ढोंग-पाखंड मे उलझे हुये हैं।


तथा कथित प्रगतिशील साम्यवादी बुद्धिजीवी जिंनका नेतृत्व विदेश मे बैठे पंडित अरुण प्रकाश मिश्रा और देश मे उनके बड़े भाई पंडित ईश मिश्रा जी  करते हैं सांप्रदायिक तत्वों द्वारा निरूपित सिद्धांतों को धर्म मान कर धर्म को त्याज्य बताते हैं। जबकि धर्म=जो शरीर को धारण करने के लिए आवश्यक है वही 'धर्म' है;जैसे-सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य । अब यदि ढ़ोंगी प्रगतिशीलों की बात को सही मान कर धर्म का विरोध किया जाये तो हम लोगों से इन सद्गुणों को न अपनाने की बात करते हैं और यही कारण है कि सोवियत रूस मे साम्यवाद का पतन हो गया(सोवियत भ्रष्ट नेता ही आज वहाँ पूंजीपति-उद्योगपति हैं जो धन जनता और कार्यकर्ता का शोषण करके जमा किया गया था उसी के बल पर) एवं चीन मे जो है वह वस्तुतः पूंजीवाद ही है।दूसरी ओर थोड़े से  पोंगापंथी केवल 'गीता' को ही महत्व देते हैं उनके लिए भी 'वेदों' का कोई महत्व नहीं है। 'पदम्श्री 'डॉ कपिलदेव द्विवेदी जी कहते हैं कि,'भगवद  गीता' का मूल आधार है-'निष्काम कर्म योग'

"कर्मण्ये वाधिकारस्ते ....................... कर्मणि। । " (गीता-2-47)

इस श्लोक का आधार है यजुर्वेद का यह मंत्र-

"कुर्वन्नवेह कर्मा................... न कर्म लिपयाते नरो" (यजु.40-2 )

इसी प्रकार सम्पूर्ण बाईबिल का मूल मंत्र है 'प्रेम भाव और मैत्री' जो यजुर्वेद के इस मंत्र पर आधारित है-

"मित्रस्य मा....................... भूतानि समीक्षे।  ....... समीक्षा महे । । " (यजु .36-18)

एवं कुरान का मूल मंत्र है-एकेश्वरवाद-अल्लाह की एकता ,उसके गुण धर्मा सर्वज्ञ सर्व शक्तिमान,कर्त्ता-धर्त्तासंहर्त्ता,दयालु आदि(कुरान7-165,12-39,13-33,57-1-6,112-1-4,2-29,2-96,87-1-5,44-6-8,48-14,1-2,2-143 आदि )। 


इन सबके आधार मंत्र हैं-


1-"इंद्रम मित्रम....... मातरिश्चा नामाहू : । । " (ऋग-1-164-46)

2-"स एष एक एकवृद एक एव "। । (अथर्व 13-4-12)
3-"न द्वितीयों न तृतीयच्श्तुर्थी नाप्युच्येत। । " (अथर्व 13-5-16)


पहले के विदेशी शासकों ने हमारे महान नेताओं -राम,कृष्ण आदि को बदनाम करने हेतु तमाम मनगढ़ंत कहानियाँ यहीं के चाटुकार विद्वानों को सत्ता-सुख देकर लिखवाई जो 'पुराणों' के रूप मे आज तक पूजी जा रही हैं। बाद के अंग्रेज़ शासकों ने तो हमारे इतिहास को ही तोड़-मरोड़ दिया। यूरोपीय इतिहासकारों ने लिख दिया आर्य एक जाति-नस्ल थी जो मध्य यूरोप से भारत एक आक्रांता के रूप मे आई थी जिसने यहाँ के मूल निवासियों को गुलाम बनाया। इसी झूठ को ब्रह्म वाक्य मानते हुये 'मूल निवासियों भारत को आज़ाद करो' आंदोलन चला कर भारत को छिन्न-भिन्न करने का कुत्सित प्रयास चल रहा है। अंग्रेजों ने लिख दिया कि 'वेद गड़रियों के गीत हैं' और साम्राज्यवाद विरोधी होने का दंभ भरने वाले पंडित अरुण प्रकाश मिश्रा सरीखे उद्भट विद्वान उसी आधार पर वेदों को अवैज्ञानिक बताते नहीं थकते हैं।


जर्मनी के मैक्स मूलर साहब भारत आए और यहाँ 30 वर्षों तक रह कर 'संस्कृत' सीख कर वेदों को समझा एवं मूल पांडु लिपियाँ एकत्र कर चलते बने। जर्मन मे उनके अनुवाद किए गए फिर अङ्ग्रेज़ी आदि दूसरी भाषाओं मे जर्मन भाषा से अनुवाद हुये। हिटलर ने खुद को आर्य घोषित करते हुये दूसरों के प्रति नफरत फैलाई जो कि आर्यत्व के विपरीत है। 'आर्य'=श्रेष्ठ अर्थात वे स्त्री पुरुष जिनके आचरण और कार्य श्रेष्ठ हैं 'आर्य' है इसके विपरीत लोग अनार्य हैं। न यह कोई जाति थी न है।


'आर्य' सार्वभौम शब्द है और यह किसी देश-काल की सीमा मे बंधा हुआ नहीं है। आर्यत्व का मूल 'समष्टिवाद' अर्थात 'साम्यवाद' है। प्रकृति में संतुलन को बनाए रखने हेतु हमारे यहाँ यज्ञ -हवन किये जाते थे। अग्नि में डाले गए पदार्थ परमाणुओं में विभक्त हो कर वायु द्वारा प्रकृति में आनुपातिक रूप से संतुलन बनाए रखते थे.'भ'(भूमि)ग (गगन)व (वायु) ।(अनल-अग्नि)न (नीर-जल)को अपना समानुपातिक भाग प्राप्त होता रहता था.Generator,Operator ,Destroyer भी ये तत्व होने के कारण यही GOD है और किसी के द्वारा न बनाए जाने तथा खुद ही बने होने के कारण यही 'खुदा'भी है।  अब भगवान् का अर्थ मनुष्य की रचना -मूर्ती,चित्र आदि से पोंगा-पंथियों के स्वार्थ में कर दिया गया है और प्राकृतिक उपादानों को उपेक्षित छोड़ दिया गया है जिसका परिणाम है-सुनामी,अति-वृष्टि,अनावृष्टि,अकाल-सूखा,बाढ़ ,भू-स्खलन,परस्पर संघर्ष की भावना आदि-आदि.


एक विद्वान की इस प्रार्थना पर थोडा गौर करें -

ईश हमें देते हैं सब कुछ ,हम भी तो कुछ देना सीखें.
जो कुछ हमें मिला है प्रभु से,वितरण उसका करना सीखें..१ ..

हवा प्रकाश हमें मिलता है,मेघों से मिलता है पानी.
यदि बदले में कुछ नहीं देते,इसे कहेंगे बेईमानी..
इसी लिए दुःख भोग रहे हैं,दुःख को दूर भगाना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..२ ..

तपती धरती पर पथिकों को,पेड़ सदा देता है छाया.
अपना फल भी स्वंय न खाकर,जीवन उसने सफल बनाया..
सेवा पहले प्रभु को देकर,बाकी स्वंय बरतना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..३..

मानव जीवन दुर्लभ है हम,इसको मल से रहित बनायें.
खिले फूल खुशबू देते हैं,वैसे ही हम भी बन जाएँ..
जप-तप और सेवा से जीवन,प्रभु को अर्पित करना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..४..

असत नहीं यह प्रभुमय दुनिया,और नहीं है यह दुखदाई.
दिल-दिमाग को सही दिशा दें,तो बन सकती है सुखदाई ..
'जन'को प्रभु देते हैं सब कुछ,लेकिन 'जन'तो बनना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..५..

शीशे की तरह चमकता हुआ साफ़ है कि वैदिक संस्कृति हमें जन  पर आधारित अर्थात  समष्टिवादी बना रही है जबकि आज हमारे यहाँ व्यष्टिवाद हावी है जो पश्चिम के साम्राज्यवाद की  देन है। दलालों के माध्यम से मूर्ती पूजा करना कहीं से भी समष्टिवाद को सार्थक नहीं करता है,जबकि वैदिक हवन सामूहिक जन-कल्याण की भावना पर आधारित है। IBN 7 के पत्रकार हवन का विरोध पोंगापंथ को सबल बनाने हेतु करते है और दूसरे चेनल वाले भी। साम्राज्यवादी -विदेशी तो खुद को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए वेदों का विरोध करते ही हैं एवं उनके निष्कर्षों का लाभ लेकर उसे अपना आविष्कार बताते हैं।

ऋग्वेद के मंडल ५/सूक्त ५१ /मन्त्र १३ को देखें-

विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्निः स्वस्तये.
देवा अवन्त्वृभवः स्वस्तये स्वस्ति नो रुद्रः पात्व्हंससः ..

(जनता की कल्याण -कामना से यह यज्ञ  रचाया.
विश्वदेव के चरणों में अपना सर्वस्व चढ़ाया..)

जो लोग (अरुण प्रकाश मिश्रा -ईश मिश्रा जी और उनके चेले सरीखे )धर्म की वास्तविक व्याख्या को न समझ कर गलत  उपासना-पद्धतियों को ही धर्म मान कर चलते हैं वे अपनी इसी नासमझ के कारण ही  धर्म की आलोचना करते और खुद को प्रगतिशील समझते हैं जबकि वस्तुतः वे खुद भी उतने ही अन्धविश्वासी हुए जितने कि पोंगा-पंथी अधार्मिक होते हैं। 

ऋग्वेद के मंडल ७/सूक्त ३५/मन्त्र १ में कहा गया है-

शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शन्न इन्द्रावरुणा रातहव्या डे
शमिन्द्रासोमा सुविताय शंयो :शन्न इन्द्रा पूष्णा वाजसात..

(सूर्य,चन्द्र,विद्युत्,जल सारे सुख सौभाग्य बढावें.
रोग-शोक-भय-त्रास हमारे पास कदापि न आवें..)

वेदों में किसी व्यक्ति,जाति,क्षेत्र,सम्प्रदाय,देश-विशेष की बात नहीं कही गयी है.वेद सम्पूर्ण मानव -सृष्टि की रक्षा की बात करते हैं.इन्हीं तत्वों को जब मैक्समूलर साहब जर्मन ले गए तो वहां के विचारकों ने अपनी -अपनी पसंद के क्षेत्रों में उनसे ग्रहण सामग्री के आधार पर नई -नई खोजें प्रस्तुत कीं हैं.जैसे डा.हेनीमेन ने 'होम्योपैथी',डा.एस.एच.शुस्लर ने 'बायोकेमिक'  भौतिकी के वैज्ञानिकों ने 'परमाणु बम'एवं महर्षि कार्ल मार्क्स ने 'वैज्ञानिक समाजवाद'या 'साम्यवाद'की खोज की। 

दुर्भाग्य से महर्षि कार्ल मार्क्स ने भी अन्य विचारकों की भाँती ही गलत उपासना-पद्धतियों (ईसाइयत,इस्लाम और हिन्दू ) को ही धर्म मानते हुए धर्म की कड़ी आलोचना की है ,उन्होंने कहा है-"मैंन  हैज क्रियेटेड द गाड फार हिज मेंटल सिक्योरिटी ओनली".आज भी उनके अनुयाई एक अन्धविश्वासी की भांति इसे ब्रह्म-वाक्य मान कर यथावत चल रहे हैं.जबकि आवश्यकता है उनके कथन को गलत अधर्म के लिए कहा गया मानने की.'धर्म'तो वह है जो 'धारण'करता है ,उसे कैसे छोड़ कर जीवित रहा जा सकता है.कोई भी वैज्ञानिक या दूसरा विद्वान यह दावा नहीं कर सकता कि वह-भूमि,गगन,वायु,अनल और नीर (भगवान्,GODया खुदा जो ये पाँच-तत्व ही हैं )के बिना जीवित रह सकता है.हाँ ढोंग और पाखण्ड तथा पोंगा-पंथ का प्रबल विरोध करने की आवश्यकता मानव-मात्र के अस्तित्व की रक्षा हेतु जबरदस्त रूप से है। 

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05-09-2015 ---
25-08-16 

Monday, July 25, 2011

ऋतु अनुकूल मेह बरसे दुखप्रद दुष्काल न आवे

वृक्ष रूप में बच्चों ने चेन्ने के एक स्कूल में बैठ कर हमको वृक्षों एवं पर्यावरण की रक्षा का अनुपम सन्देश दिया है;देखें २९ जून २०११ के हिंदुस्तान,लखनऊ-पृष्ठ १७  पर  प्रकाशित इस तस्वीर की स्कैन कापी- 




"येभ्यो माता ................................................................आदित्यां अनुमदा स्वस्तये " (ऋग्वेद मंडल १० /सूक्त ६३ में वर्णित इस मन्त्र के भवानी दयाल सन्यासी जी द्वारा किये काव्यानुवाद की प्रथम पंक्ति को इस लेख का शीर्षक बनाया गया है-

ऋतू अनुकूल मेंह बरसे दुखप्रद दुष्काल न आवे.
सुजला सुफला मातृ भूमि हो,मधुमय क्षीर पिलावे..

आज से १० लाख वर्ष पूर्व जब मानव की इस पृथ्वी पर सृष्टि हुई तो रचयिता (परमात्मा)ने इस प्रथ्वी का उपभोग करने हेतु मानव के लिए कुछ नियमों का निरूपण किया .पूर्व सृष्टि में मोक्ष-प्राप्त आत्माओं को इस धरती पर ऋषियों के रूप में भेज कर उनसे इन वेदों का उपदेश दिलाया गया है.जिस प्रकार किसी भी संगठन अथवा संस्था के निर्माण से पूर्व बाई-लाज या विधान बनाया जाता है उसी प्रकार  इस सृष्टि में निर्वहन हेतु वेदोक्त उपदेश हैं.अपने अहंकार,अज्ञान और विदेशी भटकाव से ग्रस्त विद्वान वेदों के महत्व को नकार कर उनकी आलोचना करते हैं या कुछ उनकी गलत व्याख्या प्रस्तुत करते हैं जिसका परिणाम हम सब के समक्ष अपने वीभत्स रूप में मुंह बाये खड़ा है.

चेन्ने के स्कूली बच्चों द्वारा वृक्षों के महत्व को समझाने का प्रयास स्तुत्य एवं अनुकरणीय है.इस प्रकृति में पदार्थ तीन अवस्थाओं में हमें मिलते हैं जिनका परस्पर रूपांतरण होता रहता है और वे कभी नष्ट नहीं होते हैं.परन्तु मानव ने प्रकृति-नियमों की अवहेलना करके इन पदार्थों का कृत्रिम रूपांतरण कर दिया है जो मानव के अस्तित्व के लिए ही संकट का हेतु बन गया है.आज प्रथ्वी पर वृक्ष आदि वनस्पतियों का अंधाधुंध दोहन होने के  कारण अकाल पड़ता जा रहा है और कार्बन गैसें मात्रा में बढ़ कर प्रथ्वी का तापमान बढाती जा रही हैं.पर्वतों पर ग्लेशियरों के पिघलने का खतरा उत्पन्न हो गया है ,यदि ऐसा हुआ तो समुद्र में जल बढ़ कर काफी आबादी का सफाया कर देगा और शेष मनुष्य जल एवं वर्षा के आभाव में भूख-प्यास से तड़प-तड़प कर असमय मौत के कराल गाल में समाविष्ट होने को बाध्य होंगे.
19 जूलाई 2011 का समपादकीय -
('हिंदुस्तान'-लखनऊ-19/07/2011)

चेन्ने के स्कूली बच्चों,शिक्षकों ,अभिभावकों को धन्यवाद कि,उन्होंने प्रकृति की इस गंभीर समस्या को मानवीय दृष्टिकोण से उठाया है.आज का संकट अपनी वैज्ञानिक -वैदिक संस्कृति को तिलांजली देने (और अवैज्ञानिक-पौराणिक पद्धति को आत्मसात करने )के कारण उत्पन्न हुआ है.प्रकृति में संतुलन को बनाए रखने हेतु हमारे यहाँ यग्य-हवन किये जाते थे.अग्नि में डाले गए पदार्थ परमाणुओं में विभक्त हो कर वायु द्वारा प्रकृति में आनुपातिक रूप से संतुलन बनाए रखते थे.'भ'(भूमि)ग (गगन)व (वायु) ।(अनल-अग्नि)न (नीर-जल)को अपना समानुपातिक भाग प्राप्त होता रहता था.Generator,Operator ,Destroyer भी ये तत्व होने के कारण यही GOD है और किसी के द्वारा न बनाए जाने तथा खुद ही बने होने के कारण यही 'खुदा'भी है. अब भगवान् का अर्थ मनुष्य की रचना -मूर्ती,चित्र आदि से पोंगा-पंथियों के स्वार्थ में कर दिया गया है और प्राकृतिक उपादानों को उपेक्षित छोड़ दिया गया है जिसका परिणाम है-सुनामी,अति-वृष्टि,अनावृष्टि,अकाल-सूखा,बाढ़ ,भू-स्खलन,परस्पर संघर्ष की भावना आदि-आदि.

एक विद्वान की इस प्रार्थना पर थोडा गौर करें -

ईश हमें देते हैं सब कुछ ,हम भी तो कुछ देना सीखें.
जो कुछ हमें मिला है प्रभु से,वितरण उसका करना सीखें..१ ..

हवा प्रकाश हमें मिलता है,मेघों से मिलता है पानी.
यदि बदले में कुछ नहीं देते,इसे कहेंगे बेईमानी..
इसी लिए दुःख भोग रहे हैं,दुःख को दूर भगाना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..२ ..

तपती धरती पर पथिकों को,पेड़ सदा देता है छाया.
अपना फल भी स्वंय न खाकर,जीवन उसने सफल बनाया..
सेवा पहले प्रभु को देकर,बाकी स्वंय बरतना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..३..

मानव जीवन दुर्लभ है हम,इसको मल से रहित बनायें.
खिले फूल खुशबू देते हैं,वैसे ही हम भी बन जाएँ..
जप-तप और सेवा से जीवन,प्रभु को अर्पित करना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..४..

असत नहीं यह प्रभुमय दुनिया,और नहीं है यह दुखदाई.
दिल-दिमाग को सही दिशा दें,तो बन सकती है सुखदाई ..
'जन'को प्रभु देते हैं सब कुछ,लेकिन 'जन'तो बनना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..५..

शीशे की तरह चमकता हुआ साफ़ है कि वैदिक संस्कृति हमें जन  पर आधारित अर्थात  समष्टिवादी बना रही है जबकि आज हमारे यहाँ व्यष्टिवाद हावी है जो पश्चिम के साम्राज्यवाद की  देन है. दलालों के माध्यम से मूर्ती पूजा करना कहीं से भी समष्टिवाद को सार्थक नहीं करता है.जबकि वैदिक हवन सामूहिक जन-कल्याण की भावना पर आधारित है.

ऋग्वेद के मंडल ५/सूक्त ५१ /मन्त्र १३ को देखें-

विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्निः स्वस्तये.
देवा अवन्त्वृभवः स्वस्तये स्वस्ति नो रुद्रः पात्व्हंससः ..

(जनता की कल्याण -कामना से यह यग्य रचाया.
विश्वदेव के चरणों में अपना सर्वस्व चढ़ाया..)

जो लोग धर्म की वास्तविक व्याख्या को न समझ कर गलत  उपासना-पद्धतियों को ही धर्म मान कर चलते हैं वे अपनी इसी नासमझ के कारण ही  धर्म की आलोचना करते और खुद को प्रगतिशील समझते हैं जबकि वस्तुतः वे खुद भी उतने ही अन्धविश्वासी हुए जितने कि पोंगा-पंथी अधार्मिक होते हैं.

ऋग्वेद के मंडल ७/सूक्त ३५/मन्त्र १ में कहा गया है-

शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शन्न इन्द्रावरुणा रातहव्या डे
शमिन्द्रासोमा सुविताय शंयो :शन्न इन्द्रा पूष्णा वाजसात..

(सूर्य,चन्द्र,विद्युत्,जल सारे सुख सौभाग्य बढावें.
रोग-शोक-भय-त्रास हमारे पास कदापि न आवें..)

वेदों में किसी व्यक्ति,जाति,क्षेत्र,सम्प्रदाय,देश-विशेष की बात नहीं कही गयी है.वेद सम्पूर्ण मानव -सृष्टि की रक्षा की बात करते हैं.इन्हीं तत्वों को जब मैक्समूलर साहब जर्मन ले गए तो वहां के विचारकों ने अपनी -अपनी पसंद के क्षेत्रों में उनसे ग्रहण सामग्री के आधार पर नई -नई खोजें प्रस्तुत कीं हैं.जैसे डा.हेनीमेन ने 'होम्योपैथी',डा.एस.एच.शुस्लर ने 'बायोकेमिक'  भौतिकी के वैज्ञानिकों ने 'परमाणु बम'एवं महर्षि कार्ल मार्क्स ने 'वैज्ञानिक समाजवाद'या 'साम्यवाद'की खोज की.

दुर्भाग्य से महर्षि कार्ल मार्क्स ने भी अन्य विचारकों की भाँती ही गलत उपासना-पद्धतियों (ईसाइयत,इस्लाम और हिन्दू ) को ही धर्म मानते हुए धर्म की कड़ी आलोचना की है ,उन्होंने कहा है-"मैंन  हैज क्रियेटेड द गाड फार हिज मेंटल सिक्योरिटी ओनली".आज भी उनके अनुयाई एक अन्धविश्वासी की भांति इसे ब्रह्म-वाक्य मान कर यथावत चल रहे हैं.जबकि आवश्यकता है उनके कथन को गलत अधर्म के लिए कहा गया मानने की.'धर्म'तो वह है जो 'धारण'करता है ,उसे कैसे छोड़ कर जीवित रहा जा सकता है.कोई भी वैज्ञानिक या दूसरा विद्वान यह दावा नहीं कर सकता कि वह-भूमि,गगन,वायु,अनल और नीर (भगवान्,GODया खुदा जो ये पाँच-तत्व ही हैं )के बिना जीवित रह सकता है.हाँ ढोंग और पाखण्ड तथा पोंगा-पंथ का प्रबल विरोध करने की आवश्यकता मानव-मात्र के अस्तित्व की रक्षा हेतु जबरदस्त रूप से है. 

यदि हम चेन्ने के स्कूली बच्चों द्वारा बताए संदेश पर चल कर अपने वृक्षों और पर्यावरण की रक्षा हेतु आगे बढ़ें तो मानवता की सच्ची सेवाऔर रक्षा दोनों होगी.

Tuesday, March 1, 2011

"ॐ नमः शिवाय च ------ विजय राजबली माथुर

"ॐ नमः शिवाय च का अर्थ है-Salutation To That Lord The Benefactor of all "यह कथन है संत श्याम जी पाराशर का.अर्थात हम अपनी मातृ -भूमि भारत को नमन करते हैं.वस्तुतः यदि हम भारत का मान-चित्र और शंकर जी का चित्र एक साथ रख कर तुलना करें तो उन महान संत क़े विचारों को ठीक से समझ सकते हैं.शंकर या शिव जी क़े माथे पर अर्ध-चंद्राकार हिमाच्छादित हिमालय पर्वत ही तो है.जटा से निकलती हुई गंगा -तिब्बत स्थित (अब चीन क़े कब्जे में)मानसरोवर झील से गंगा जी क़े उदगम की ही निशानी बता रही है.नंदी(बैल)की सवारी इस बात की ओर इशारा है कि,हमारा भारत एक कृषि -प्रधान देश है.क्योंकि ,आज ट्रेक्टर-युग में भी बैल ही सर्वत्र हल जोतने का मुख्य आधार है.शिव द्वारा सिंह-चर्म को धारण करना संकेत करता है कि,भारत वीर-बांकुरों का देश है.शिव क़े आभूषण(परस्पर विरोधी जीव)यह दर्शाते हैंकि,भारत "विविधताओं में एकता वाला देश है."यहाँ संसार में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूंजी है तो संसार का सर्वाधिक रेगिस्तानी इलाका थार का मरुस्थल भी है.विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं तो पोशाकों में भी विविधता है.बंगाल में धोती-कुर्ता व धोती ब्लाउज का चलन है तो पंजाब में सलवार -कुर्ता व कुर्ता-पायजामा पहना जाता है.तमिलनाडु व केरल में तहमद प्रचलित है तो आदिवासी क्षेत्रों में पुरुष व महिला मात्र गोपनीय अंगों को ही ढकते हैं.पश्चिम और उत्तर भारत में गेहूं अधिक पाया जाता है तो पूर्व व दक्षिण भारत में चावल का भात खाया जाता है.विभिन्न प्रकार क़े शिव जी क़े गण इस बात का द्योतक हैं कि, यहाँ विभिन्न मत-मतान्तर क़े अनुयायी सुगमता पूर्वक रहते हैं.शिव जी की अर्धांगिनी -पार्वती जी हमारे देश भारत की संस्कृति (Culture )ही तो है.भारतीय संस्कृति में विविधता व अनेकता तो है परन्तु साथ ही साथ वह कुछ  मौलिक सूत्रों द्वारा एकता में भी आबद्ध हैं.हमारे यहाँ धर्म की अवधारणा-धारण करने योग्य से है.हमारे देश में धर्म का प्रवर्तन किसी महापुरुष विशेष द्वारा नहीं हुआ है जिस प्रकार इस्लाम क़े प्रवर्तक हजरत मोहम्मद व ईसाईयत क़े प्रवर्तक ईसा मसीह थे.हमारे यहाँ राम अथवा कृष्ण धर्म क़े प्रवर्तक नहीं बल्कि धर्म की ही उपज थे.राम और कृष्ण क़े रूप में मोक्ष -प्राप्त आत्माओं का अवतरण धर्म की रक्षा हेतु ही,बुराइयों पर प्रहार करने क़े लिये हुआ था.उन्होंने कोई व्यक्तिगत धर्म नहीं प्रतिपादित किया था.आज जिन मतों को विभिन्न धर्म क़े नाम से पुकारा जा रहा है ;वास्तव में वे भिन्न-भिन्न उपासना-पद्धतियाँ हैं न कि,कोई धर्म अलग से हैं.लेकिन आप देखते हैं कि,लोग धर्म क़े नाम पर भी विद्वेष फैलाने में कामयाब हो जाते हैं.ऐसे लोग अपने महापुरुषों क़े आदर्शों को सहज ही भुला देते हैं.आचार्य श्री राम शर्मा गायत्री परिवार क़े संस्थापक थे और उन्होंने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा था -"उन्हें मत सराहो जिनने अनीति पूर्वक सफलता पायी और संपत्ति कमाई."लेकिन हम देखते हैं कि,आज उन्हीं क़े परिवार में उनके पुत्र व दामाद इसी संपत्ति क़े कारण आमने सामने टकरा रहे हैं.गायत्री परिवार में दो प्रबंध समितियां बन गई हैं.अनुयायी भी उन दोनों क़े मध्य बंट गये हैं.कहाँ गई भक्ति?"भक्ति"शब्द ढाई अक्षरों क़े मेल से बना है."भ "अर्थात भजन .कर्म दो प्रकार क़े होते हैं -सकाम और निष्काम,इनमे से निष्काम कर्म का (आधा क) और त्याग हेतु "ति" लेकर "भक्ति"होती है.आज भक्ति है कहाँ?महर्षि दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना धर्म में प्रविष्ट कुरीतियों को समाप्त करने हेतु ही एक आन्दोलन क़े रूप में की थी.नारी शिक्षा,विधवा-पुनर्विवाह ,जातीय विषमता की समाप्ति की दिशा में महर्षि दयानंद क़े योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता.आज उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज में क्या हो रहा है-गुटबाजी -प्रतिद्वंदिता .


काफी अरसा पूर्व आगरा में आर्य समाज क़े वार्षिक निर्वाचन में गोलियां खुल कर चलीं थीं.यह कौन सी अहिंसा है?जिस पर स्वामी जी ने सर्वाधिक बल दिया था. स्वभाविक है कि, यह सब नीति-नियमों की अवहेलना का ही परिणाम है,जबकि आर्य समाज में प्रत्येक कार्यक्रम क़े समापन पर शांति-पाठ का विधान है.यह शांति-पाठ यह प्रेरणा देता है कि, जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में विभिन्न तारागण एक नियम क़े तहत अपनी अपनी कक्षा (Orbits ) में चलते हैं उसी प्रकार यह संसार भी जियो और जीने दो क़े सिद्धांत पर चले.परन्तु एरवा कटरा में गुरुकुल चलाने  वाले एक शास्त्री जी ने रेलवे क़े भ्रष्टतम व्यक्ति जो एक शाखा क़े आर्य समाज का प्रधान भी रह चुका था क़े भ्रष्टतम सहयोगी क़े धन क़े बल पर एक ईमानदार कार्यकर्ता पर प्रहार किया एवं सहयोग दिया पुजारी व पदाधिकारियों ने तो क्या कहा जाये कि, आज सत्यार्थ-प्रकाश क़े अनुयायी ही सत्य का गला घोंट कर ईमानदारी का दण्ड देने लगे हैं.यह सब धर्म नहीं है.परन्तु जन-समाज ऐसे लोगों को बड़ा धार्मिक मान कर उनका जय-जयकारा करता है.आज जो लोगों को उलटे उस्तरे से मूढ़ ले जाये उसे ही मान-सम्मान मिलता है.ऐसे ही लोग धर्म व राजनीति क़े अगुआ बन जाते हैं.ग्रेषम का अर्थशास्त्र में एक सिद्धांत है कि,ख़राब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है.ठीक यही हाल समाज,धर्म व राजनीति क़े क्षेत्र में चल रहा है.


दुनिया लूटो,मक्कर से.
रोटी खाओ,घी-शक्कर से.
   एवं
अब सच्चे साधक धक्के खाते हैं .
फरेबी आज मजे-मौज  उड़ाते हैं.
आज बड़े विद्वान,ज्ञानी और मान्यजन लोगों को जागरूक होने नहीं देना चाहते,स्वजाति बंधुओं की उदर-पूर्ती की खातिर नियमों की गलत व्याख्या प्रस्तुत कर देते हैं.राम द्वारा शिव -लिंग की पूजा किया जाना बता कर मिथ्या सिद्ध करना चाहते हैं कि, राम क़े युग में मूर्ती-पूजा थी और राम खुद मूर्ती-पूजक थे. वे यह नहीं बताना चाहते कि राम की शिव पूजा का तात्पर्य भारत -भू की पूजा था. वे यह भी नहीं बताना चाहते कि, शिव परमात्मा क़े उस स्वरूप को कहते हैं कि, जो ज्ञान -विज्ञान का दाता और शीघ्र प्रसन्न होने वाला है. ब्रह्माण्ड में चल रहे अगणित तारा-मंडलों को यदि मानव शरीर क़े रूप में कल्पित करें तो हमारी पृथ्वी का स्थान वहां आता है जहाँ मानव शरीर में लिंग होता है.यही कारण है कि, हम पृथ्वी -वासी शिव का स्मरण लिंग रूप में करते हैं और यही राम ने समझाया भी होगा न कि, स्वंय ही  लिंग बना कर पूजा की होगी. स्मरण करने को कंठस्थ करना कहते हैं न कि, उदरस्थ करना.परन्तु ऐसा ही समझाया जा रहा है और दूसरे विद्वजनों से अपार प्रशंसा भी प्राप्त की जा रही है. यही कारण है भारत क़े गारत होने का.


जैसे सरबाईना और सेरिडोन क़े विज्ञापनों में अमीन सायानी और हरीश भीमानी जोर लगते है अपने-अपने उत्पाद की बिक्री का वैसे ही उस समय जब इस्लाम क़े प्रचार में कहा गया कि हजरत सा: ने चाँद क़े दो टुकड़े  कर दिए तो जवाब आया कि, हमारे भी हनुमान ने मात्र ५ वर्ष की अवस्था में सूर्य को निगल लिया था अतः हमारा दृष्टिकोण श्रेष्ठ है. परन्तु दुःख और अफ़सोस की बात है कि, सच्चाई साफ़ करने क़े बजाये ढोंग को वैज्ञानिकता का जामा ओढाया जा रहा है.

यदि हम अपने देश  व समाज को पिछड़ेपन से निकाल कर ,अपने खोये हुए गौरव को पुनः पाना चाहते हैं,सोने की चिड़िया क़े नाम से पुकारे जाने वाले देश से गरीबी को मिटाना चाहते हैं,भूख और अशिक्षा को हटाना चाहते हैंतो हमें "ॐ नमः शिवाय च "क़े अर्थ को ठीक से समझना ,मानना और उस पर चलना होगा तभी हम अपने देश को "सत्यम,शिवम्,सुन्दरम"बना सकते हैं.आज की युवा पीढी ही इस कार्य को करने में सक्षम हो सकती है.अतः युवा -वर्ग का आह्वान है कि, वह सत्य-न्याय-नियम और नीति पर चलने का संकल्प ले और इसके विपरीत आचरण करने वालों को सामजिक उपेक्षा का सामना करने पर बाध्य कर दे तभी हम अपने भारत का भविष्य उज्जवल बना सकते हैं.काश ऐसा हो सकेगा?हम ऐसी आशा तो संजो ही सकते हैं.
" ओ ३ म *नमः शिवाय च" कहने पर उसका मतलब यह होता है.:-
*अ +उ +म अर्थात आत्मा +परमात्मा +प्रकृति 
च अर्थात तथा/ एवं / और 
शिवाय -हितकारी,दुःख हारी ,सुख-स्वरूप 
नमः नमस्ते या प्रणाम या वंदना या नमन 


शिव-रात्रि पर ही मूल शंकर को बोद्ध  हुआ था और वह शिव अर्थात कल्याणकारी की खोज में निकल पड़े थे और आचार्य डॉ.रविदत्त शर्मा के शब्दों में उन्हें जो बोद्ध हुआ वह यह है :-


जिस में शिव का दर्शन हो,वही रात्रि है शिवरात्रि.
करे कल्याण जीवन का,वही रात्रि है शिवरात्रि..
कभी मन में विचार ही नहीं,शिव कौन है क्या है?
जो दिन में ही भटकते हैं;सुझाए  क्या उन्हें रात्रि..
शिव को खोजने वाला,फकत स्वामी दयानंद था.
उसी ने हमको बतलाया,कि होती क्या है शिवरात्रि..
शिव ईश्वर है जो संसार का कल्याण करता है.
आत्म कल्याण करने के लिए आती है शिवरात्रि..
धतूरा भांग खा कर भी,कहीं कल्याण होता है?
जो दुर्व्यसनों में खोये,उनको ठुकराती है शिवरात्रि..
सदियाँ ही नहीं युग बीत जायेंगे जो अब भी न संभले.
जीवन भर रहेगी रात्रि,न आयेगी शिवरात्रि..
आर्यों के लिए यह पर्व एक पैगाम देता है.
उपासक सच्चे शिव के बनने से होती है शिव रात्रि..
प्रकृति में लिप्त भक्तों  ,नेत्र  तो    खोलो.
ज्ञान के नेत्र से देखोगे,तो समझोगे शिवरात्रि..
ऋषि की बात मानो अब न भटको रहस्य को समझो.
यह तो बोद्ध रात्रि है,जिसे  कहते हो शिवरात्रि..


हम देखते हैं ,आज आर्य समाज को भी आर.एस.एस.ने जकड लिया है और वहां से भी 'आर्य'की बजाये विदेशियों द्वारा दिए गए नाम का उच्चारण होने लगा है.1875 में महर्षि स्वामी दयानंद ने (१८५७ की क्रांति में भाग लेने और उसकी विफलता से सबक के बाद)'आर्यसमाज'की स्थापना देश की आजादी के लिए की थी.कलकत्ता में कर्नल नार्थ ब्रुक से भेंट कर शीघ्र स्वाधीनता की कामना करने पर उसने रानी विक्टोरिया को लिखे पत्र में कहा-"दयानंद एक बागी फ़कीर है (Revolutionary Saint )"इलाहबाद हाई कोर्ट में उन पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाया गया.महर्षि ने अपने जीवन काल में जितने भी आर्य समाजों की स्थापना की वे छावनियों वाले शहर थे.दादा भाई नौरोजी ने कहा है-"सर्व प्रथम स्वराज्य शब्द महर्षि दयानंद के "सत्यार्थ प्रकाश"में पढ़ा". 'कांग्रेस का इतिहास ' में डॉ.पट्टाभी सीता राम्माय्या ने लिखा है स्वतंत्रता आन्दोलन के समय जेल जाने वालों में ८५ प्रतिशत व्यक्ति आर्य समाजी होते थे.


आर्य समाज को क्षीण करने हेतु रिटायर्ड आई.सी.एस. जनाब ए.ओ.ह्युम की मार्फ़त वोमेश चन्द्र बेनर्जी के नेतृत्त्व में इन्डियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना सेफ्टी वाल्व के रूप में हुयी थी लेकिन दयान्द के इशारे पर आर्य समाजी इसमें प्रवेश करके स्वाधीनता की मांग करने लगे.


१९०५ में बंगाल का असफल विभाजन करने के बाद १९०६ में ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन को मोहरा बना कर मुस्लिम लीग तथा १९२० में कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेताओं (मदन मोहन मालवीय,लाला लाजपत राय आदि) को आगे कर हिन्दू महासभा का गठन फूट डालो और राज करो की नीति के तहत (ब्रिटिश साम्राज्यवाद की दुर्नीति ) हुआ एवं एच.एम्.एस.के मिलिटेंट संगठन के रूप में आर.एस.एस.अस्तित्व में आया जो आज आर्य समाज को विचलित कर रहा है.नतीजा फिर से ढोंग-पाखंड को बढ़ावा मिल रहा है.
अब यदि देश को फिर गुलाम होने से बचाना है तो ढोंग-पाखंड को ठुकरा कर दयानंद के बताये मार्ग पर चलना ही होगा.'आर्याभी विनय ' के एक मन्त्र की व्याख्या करते हुए महर्षि लिखते हैं-"हे परमात्मन हमारे देश में कोई विदेशी शासक न हो आर्यों का विश्व में चक्रवर्त्ति साम्राज्य हो" (ये सम्पूर्ण तथ्य श्री रामावतार शर्मा द्वारा "निष्काम परिवर्तन "पत्रिका के मार्च १९९९ में लिखित लेख से लिए गए हैं)


इस शिव रात्रि पर लोग सही संकल्प ले सकें तो देश का भविष्य सुखद हो सकता है.वर्ना तो सर्वत्र ढोंग-पाखण्ड का प्रचार हो ही रहा है ,रसातल में जाने से कोई रोक नहीं सकता.
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24 फरवरी 2017 








Thursday, October 28, 2010

पूजा क्या ,क्यों और कैसे ? ------ विजय राजबली माथुर

यह धन और धरती बंट क़े रहेगी ,भूखी जनता अब चुप न रहेगी .नारे लगाने वालों क़े मत क़े प्रणेता कार्ल मार्क्स महर्षि चार्वाक से प्रभावित थे . चार्वाक परमात्मा को नहीं मानते थे और उन्होंने कहा था -"जब तक जियो मौज से जियो ;घी पियो चाहे उधार ले क़े पियो ."इसी प्रकार कार्ल मार्क्स ने कहा "man has created the god for his mental security only ."परन्तु विश्व का बहुमत परमात्मा को मानता है चाहे वह खुदा कहता हो अर्थात वह शक्ति जो खुद ही बनी है उसे किसी ने बनाया नहीं है चाहे god कहे जिसका अभिप्राय ही generate ,operate ,destroy से है .हम भारतीय उस शक्ति को परमात्मा कहते हैं जिसने स्वंयअपना नाम ओ३म  बताया है .परमात्मा ने मनुष्य रूपी प्राणी का नाम कृतु रखा है अर्थात कर्म करने वाला .मनुष्य शरीर में आत्मा को कर्म करने की छूट है ,अन्य योनिओं में आत्मा केवल भोग ही भोगता रहता है .मनुष्य कहा ही इसलिए जाता है क्योंकि यह मननशील  प्राणी है जो अपने बुध्दी व विवेक से मनन करता हुआ कर्म करता है .कर्म तीन प्रकार क़े होते हैं ---सद्कर्म ,दुष्कर्म और अकर्म .सद्कर्म का फल अच्छा ,दुष्कर्म का बुरा फल और अकर्म का दण्ड मिलता है .अकर्म का अर्थ है वह ड्यूटी ,दायित्व या फ़र्ज़ जो किया जाना चाहिए था परन्तु किया नहीं गया .हालाँकि यह सद्कर्म या दुष्कर्म तो नहीं है परन्तु इस अकर्म से दूसरे प्राणी का जो अहित हुआ वह परमात्मा की निगाह में दण्ड  का भागीदार बना देता है .जब कर्मों क़े अनुसार फल मिलना ही है तो फिर परमात्मा को याद क्यों किया जाये ?यह प्रश्न स्वभाविक है .हमें यह मनुष्य  शरीर परमात्मा की कृपा से मिला है जिसमे हमें कर्म करने की छूट मिली है ,इसलिए परमात्मा को धन्यवाद देने हेतु हमें उसकी उपासना अथवा उसकी पूजा करनी चाहिए .पूजा वह विधि है जिससे परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त किया जा सकता है .यों तो परमात्मा सर्वत्र है हमारे शरीर में भी है परन्तु उसका ध्यान करना ,उसे याद करना ही पूजा कहलाता है .

वास्तविक पूजा कैसे हो ?                 

पूजा परमात्मा का ध्यान करने की विधि है और परमात्मा को धन्यवाद देने हेतु की जाती है परन्तु इसे कैसे करें -इस विषय में घोर मतभेद ,व्यापक विवाद एवं अनेकों भ्रांतियां हैं .तरह -तरह क़े लोगों ने अपनी सुविधा और इच्छा से तरह -तरह की पूजा विधियाँ गढ़ ली हैं .कोई मानस पाठ करा रहा है ,कोई भागवद पाठ ,कोई गीता पाठ ,कोई देवी जागरण ,कोई सुन्दर काण्ड पाठ ,कोई कुरआन की अज़ान दे रहा है तो कोई बाईबिल से प्रयेर कर रहा है .परन्तु ये सभी पधितियाँ अवैज्ञानिक हैं और उनसे परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त नहीं किया जा सकता है .जिस प्रकार किसी संस्था क़े निर्माण क़े समय पहले उसका विधान तैयार किया जाता है उसी प्रकार सृष्टी निर्माण क़े समय परमात्मा ने भी सृष्टी -संचालन हेतु सृष्टी क़े निर्माण क़े ही साथ विधान प्रस्तुत किया है जिसे हम वैदिक -ज्ञान कहते हैं .पूर्व सृष्टी की प्रलय क़े समय मोक्ष -प्राप्त आत्माओं में से श्रेष्ठ को परमात्मा ने इस सृष्टी का विधान प्रस्तुत करने हेतु इस पृथ्वी पर भेजा जिन्होंने ऋग्वेद ,यजुर्वेद ,सामवेद और अथर्ववेद की रचना की है .इन वेदों में गूढ़ ज्ञान -विज्ञान क़े साथ -साथ परमात्मा से सान्निध्य स्थापित करने का ज्ञान भी बताया गया है .

वेदों में बताया गया है -परमात्मा का मुख अग्नि है .अग्नि में मंत्रोच्चार क़े साथ डाले गए पदार्थ वायु की सहायता से परमात्मा तथा सभी जड़ देवताओं तक पहुंचा दिए जाते हैं .अग्नि का गुण है पदार्थ को सूक्ष्म परमाणुओं (Atoms )में परिवर्तित कर देना और वायु उनको सम्बंधित तक पहुँचाने का कार्य करता है .हवन में डाली गई जडी -बूटियाँ ,बूरा ,गूगल ,घी ,किशमिश तथा आम की समिधा टी .बी .,टायफायड़ आदि विभिन रोगों क़े कीटाणुओं (BACTARIAS )को नष्ट करने का कार्य करते हैं .इससे पर्यावरण शुद्ध होता है और डाले गए पदार्थों का पचास प्रतिशत भाग नासिका क़े माध्यम से धूम्र -चिकित्सा (SMOKE TREATMENT )द्वारा हवन पर बैठे मनुष्यों को तुरन्त मिल जाता है शेष पचास प्रतिशत जन -कल्याण हेतु पुण्य क़े रूप में संचित हो जाता है .हवन करने से पहले परमात्मा से प्रार्थना की जाती है .प्रार्थना क़े वैज्ञानिक महत्त्व को अब   अमेरिकी चिकित्सा वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार कर लिया है .८ सितम्बर २००३ को दैनिक जागरण ने प्रकाशित किया था कि सन १९६५ ई .में माउन्ट एवरेस्ट फतह करने वाले कैप्टन एम् .एस .कोहली ने अपनी पुस्तक " मिराकल आफ अरदास इनक्रेडिबल सर्वाइवर्स एंड एडवेंचर्स " में रहस्योदघाटन किया है कि अमेरिकी शोधकर्ताओं ने कुछ मरीजों क़े लिए दुआएं (प्रार्थनाएँ )कराईं तो यह सिद्ध हुआ कि जिन मरीजों का आपरेशन हुआ था और उनके लिए दुआ की गई उनके ठीक होने की रफ़्तार पचास से सौ प्रतिशत बढ़ गई .

महाभारत काल क़े बाद हमारी प्राचीन वैज्ञानिक हवन की पूजा पद्धति को छोड़ कर अन्य विकृत और अवैज्ञानिक पूजा पद्धतिओं को विकसित किया गया है और उसी का दुष्परिणाम हम सब भुगत रहे हैं .पोंगापंथी कर्मकांडियो ने हवन को ढकोसला बना कर रख दिया है और उपयुक्त तथा उचित प्रार्थनाओं को महत्त्व न देकर जनता को दिग्भ्रमित करके अपना उल्लू सीधा करते हैं .

यदि हम वैज्ञानिक पूजा (हवन )प्रारम्भ करने से पूर्व वैज्ञानिक विधि से प्रार्थना भी करें तो की गई प्रार्थनाओं क़े आधार पर परमात्मा मनुष्य की बात उसी प्रकार स्वीकार करता है जिस प्रकार माता -पिता अपने बच्चे क़े अनुनय -विनय को स्वीकार कर लेते हैं .यदि हम परमात्मा क़े गणपति रूप से रक्षा ,स्वास्थ्य आदि की प्रार्थना ,विष्णु स्वरूप से कल्याणकारी पालन की प्रार्थना तथा शिव स्वरूप से दीर्घायु और उत्तम जीवन -यापन की प्रार्थना हवन से पूर्व कर लें तो उस हवन द्वारा प्राप्त होने वाला सुफल द्विगुणित  हो सकता है .परन्तु आज क़े आपा -धापी क़े युग में लोग तीन घंटे पिक्चर हाल में बैठ सकते हैं ,सारी -सारी रात डिस्को पार्टी में बैठ सकते हैं ,न तो उनके पास प्रार्थना और हवन में बैठने का समय है न ही पोंगापंथियों  द्वारा अपना दायित्व निर्वहन किया जा रहा है ---परिणाम परिवारों ,समाज और राष्ट्र क़े विघटन क़े रूप में सामने है .हम मनुष्य हैं क्या हम मनन करेंगे कि पुनः अपनी प्राचीन पूजा (हवन )और प्रार्थना को अपना कर जीवन को सुखमय बना सकें ?


(यह आलेख पहली दफा २००३ में कायस्थ -सभा ,आगरा की त्रेमासिक पत्रिका "प्रेरणा "में फिर दूसरी बार  वैश्य -समुदाय की मांग पर उनकी त्रेमासिक पत्रिका "अग्र मन्त्र "क़े मई -जुलाई २००४ अंक में प्रकाशित हो चुका है .ब्लाग -जगत क़े जागरूक साथियों  क़े हितार्थ पुनः प्रकाशित किया जा रहा है .अगले अंकों में स्तुतियों को देने 
का प्रयास करेंगे )


(डॉ.दाराल की नेक टिप्पणी क़े बाद यह कटिंग लगा दी गयी है.) 



(इस वीडियो में आप विदेशियों को गायत्री मन्त्र का पाठ करते भी देख सकते हैं)
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16-07-2016